खबरी -- अकबर इलाहाबादी के इस शेर पर आपका क्या कहना है ?
ना तीर, ना ख़ंजर, ना तलवार निकालिये,
जब तोप हो मुकाबिल तो अख़बार निकालिये।
गप्पी -- जब अकबर इलाहाबादी ने ये शेर लिखा था तब लोगों का ऐसा मानना था की अख़बार हमेशा आम जनता और वंचितों के हक में खड़ा होगा। वो जुल्मी ताकतों का विरोध करेगा, सत्ता से जवाब तलब करेगा और सही सूचनाएं लोगों तक पहुंचाएगा। इसलिए जब जन विरोध की बात होती थी तो सही सुचना को मुख्य हथियार माना जाता था। लेकिन अब स्थिति बदल गयी है।
अब तो हालत ये है की अख़बार में भी तोप की ही फोटो मिलती है। अख़बारों का डर दूर करने के लिए सत्ता ने आसान तरीका निकाला की अख़बार भी अपने ही होने चाहियें। उसने कभी विज्ञापन का लालच दे कर, कभी डरा धमका कर और कभी सीधी मलिकी हथियाकर ये काम किया।
अब अगर भारत के टीवी के न्यूज चेंनल देखें तो मालूम पड़ेगा की सभी पर एक ही राग अलापा जा रहा होगा। चैनल सरकार से कोई सार्थक जवाब तलब करते कभी दिखाई नही पड़ेंगे। पिछले दिनों जब सर्जिकल स्ट्राइक का विवाद हुआ तो सभी चेंनल भाँडो की तरह वही गाना गा रहे थे जो सरकार गा रही थी। और अगर कोई व्यक्ति इस पर कोई साधारण सा सवाल भी पूछ लेता था तो उसे चैनल और सरकार दोनों मिलकर गद्दार घोषित कर रहे थे।
पिछले दो तीन सालों से ये खास ट्रेंड उभर कर आया है की जनता से जुड़े हुए मुद्दे मीडिया से गायब हो गए हैं। सरकार के वायदों और लोगों की तकलीफों पर कोई सवाल नही पूछे जाते । बस केवल सरकार की प्रशंसा में गीत गाये जाते हैं। भारतीय टीवी चैनलों की कोई साख दुनिया में कहीं बची नही है और उन्हें कोई गम्भीरता से नही लेता।
सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भारतीय टीवी चैनलों से ज्यादा असरकारक कवरेज तो पाकिस्तानी कैनलों और अख़बारों की रही है। पाकिस्तान सरकार के सर्जिकल स्ट्राइक से इंकार करने पर सवाल उठाये गए हैं और सरकार से सबूत मांगे गए हैं। हाफिज सईद और मसूद अजहर जैसे आतंकवादियों को सरकारी सरंक्षण का औचित्य पूछा गया है। और इस सब की कीमत भी चुकाई है। दूसरी तरफ भारतीय मीडिया केवल सरकारी प्रचार का तन्त्र बन कर रह गया है। इसका एक कारण ये भी बताया जा रहा है की ज्यादातर भारतीय न्यूज चैनल अब सीधे या परोक्ष रूप से मुकेश अम्बानी की मलिकी के हैं। जाहिर है सरकार से फायदा उठाने वाला एक उद्योगपति, जो अपने वित्तीय कारणों से जनविरोधी है, सरकार की आरती उतारने के अलावा दूसरा काम क्यों करेगा।
इस दौर में भारतीय टीवी चैनल और कुछ अख़बार भी लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहे जाने के ठीक उल्ट काम कर रहे हैं। मीडिया के प्राथमिक दायित्वों, जिसमे लोगों तक सही सूचनाएं पहुंचाना, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर असल में क्या सोच है उसकी जानकारी देना, सरकारी दावों की स्क्रूटिनी करना और लोगों की तकलीफों को दूर करने में विफल सरकार से जवाबतलब करना, ये सारी चीजें उससे गायब हैं।
इसलिए लोगों को उस मीडिया और अख़बार की तलाश करनी पड़ेगी जो अकबर इलाहाबादी के अनुसार तोप के मुकाबिल खड़ा हो सके।
ना तीर, ना ख़ंजर, ना तलवार निकालिये,
जब तोप हो मुकाबिल तो अख़बार निकालिये।
गप्पी -- जब अकबर इलाहाबादी ने ये शेर लिखा था तब लोगों का ऐसा मानना था की अख़बार हमेशा आम जनता और वंचितों के हक में खड़ा होगा। वो जुल्मी ताकतों का विरोध करेगा, सत्ता से जवाब तलब करेगा और सही सूचनाएं लोगों तक पहुंचाएगा। इसलिए जब जन विरोध की बात होती थी तो सही सुचना को मुख्य हथियार माना जाता था। लेकिन अब स्थिति बदल गयी है।
अब तो हालत ये है की अख़बार में भी तोप की ही फोटो मिलती है। अख़बारों का डर दूर करने के लिए सत्ता ने आसान तरीका निकाला की अख़बार भी अपने ही होने चाहियें। उसने कभी विज्ञापन का लालच दे कर, कभी डरा धमका कर और कभी सीधी मलिकी हथियाकर ये काम किया।
अब अगर भारत के टीवी के न्यूज चेंनल देखें तो मालूम पड़ेगा की सभी पर एक ही राग अलापा जा रहा होगा। चैनल सरकार से कोई सार्थक जवाब तलब करते कभी दिखाई नही पड़ेंगे। पिछले दिनों जब सर्जिकल स्ट्राइक का विवाद हुआ तो सभी चेंनल भाँडो की तरह वही गाना गा रहे थे जो सरकार गा रही थी। और अगर कोई व्यक्ति इस पर कोई साधारण सा सवाल भी पूछ लेता था तो उसे चैनल और सरकार दोनों मिलकर गद्दार घोषित कर रहे थे।
पिछले दो तीन सालों से ये खास ट्रेंड उभर कर आया है की जनता से जुड़े हुए मुद्दे मीडिया से गायब हो गए हैं। सरकार के वायदों और लोगों की तकलीफों पर कोई सवाल नही पूछे जाते । बस केवल सरकार की प्रशंसा में गीत गाये जाते हैं। भारतीय टीवी चैनलों की कोई साख दुनिया में कहीं बची नही है और उन्हें कोई गम्भीरता से नही लेता।
सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भारतीय टीवी चैनलों से ज्यादा असरकारक कवरेज तो पाकिस्तानी कैनलों और अख़बारों की रही है। पाकिस्तान सरकार के सर्जिकल स्ट्राइक से इंकार करने पर सवाल उठाये गए हैं और सरकार से सबूत मांगे गए हैं। हाफिज सईद और मसूद अजहर जैसे आतंकवादियों को सरकारी सरंक्षण का औचित्य पूछा गया है। और इस सब की कीमत भी चुकाई है। दूसरी तरफ भारतीय मीडिया केवल सरकारी प्रचार का तन्त्र बन कर रह गया है। इसका एक कारण ये भी बताया जा रहा है की ज्यादातर भारतीय न्यूज चैनल अब सीधे या परोक्ष रूप से मुकेश अम्बानी की मलिकी के हैं। जाहिर है सरकार से फायदा उठाने वाला एक उद्योगपति, जो अपने वित्तीय कारणों से जनविरोधी है, सरकार की आरती उतारने के अलावा दूसरा काम क्यों करेगा।
इस दौर में भारतीय टीवी चैनल और कुछ अख़बार भी लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहे जाने के ठीक उल्ट काम कर रहे हैं। मीडिया के प्राथमिक दायित्वों, जिसमे लोगों तक सही सूचनाएं पहुंचाना, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर असल में क्या सोच है उसकी जानकारी देना, सरकारी दावों की स्क्रूटिनी करना और लोगों की तकलीफों को दूर करने में विफल सरकार से जवाबतलब करना, ये सारी चीजें उससे गायब हैं।
इसलिए लोगों को उस मीडिया और अख़बार की तलाश करनी पड़ेगी जो अकबर इलाहाबादी के अनुसार तोप के मुकाबिल खड़ा हो सके।