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Tuesday, November 1, 2016

हर तानाशाह चाहता है की पूरा राष्ट्र आत्मसमर्पण करे।



                   इतिहास हमे बताता है की जब नादिरशाह ने दिल्ली पर आक्रमण किया तो उसके साथ कुछ हजार सैनिक थे। और उसने दिल्ली के सवा लाख नागरिकों के सर काटकर उनके ढेर पर अपनी पताका फहराई। ऐसा इसलिए हुआ की उन सवा लाख लोगों ने विरोध करने की बजाय गर्दन झुका कर सर कटवा लिए। नादिरशाह के लिए काम आसान हो गया। इसी तरह जब प्लासी के युद्ध के बाद विजयी ब्रिटिश जनरल ने शहर में प्रवेश किया तो उसके साथ केवल दो हजार सैनिक थे और उन्हें देखने के लिए बीस हजार लोग सड़क के दोनों और खड़े थे। जनरल ने अपनी डायरी में लिखा है की अगर वो लोग विरोध का फैसला लेते तो हमारी बोटियाँ भी नही बचती।
                    इस तरह के किस्सों से इतिहास भरा पड़ा है। हर तानाशाह की चाहत होती है की पूरा राष्ट्र उसके सामने आत्मसमर्पण कर दे। कोई उसका विरोध न करे। क्योंकि उसे अपनी ताकत की सीमा और अपनी कमजोरी दोनों का पता होता है। उसके शासन का पूरा दारोमदार इसी बात पर टिका होता है की लोग उसका विरोध न करें।
                    और विरोध की शुरुआत होती है सवाल करने से। जब कोई सवाल करता है तो विरोध की शुरुआत हो जाती है। इसलिए हर तानाशाह का पहला फतवा ये होता है की शासन पर कोई सवाल न किया जाये। और फिर किसी न किसी बहाने इसे हररोज दोहराया जाता है। जैसा अब हो रहा है। शासक पक्ष की मांग है की शासन पर कोई सवाल नही उठाया जाये। कभी उसे राष्ट्रवाद से जोड़ा जाता है, कभी आतंकवाद से। लेकिन शासन की वो व्यवस्था जिसे हम लोकतंत्र कहते हैं और जिसमे हम स्वतन्त्र न्याय प्रणाली का भरोसा देते हैं उसकी तो शुरुआत ही सवाल करने से होती है। उसमे तो सवाल करने के लिए बाकायदा संस्थाओं का निर्माण किया गया है। CAG नाम की संस्था केवल सवाल उठाने के लिए ही बनाई गयी है। न्याय पालिका का तो आधार ही सवाल उठाने पर आधारित है। पुलिस के माध्यम से राज्य जब किसी नागरिक पर कोई आरोप लगाता है तो अदालत में उसे सवाल करने की पूरी छूट दी जाती है, पुलिस द्वारा पेश किये गए एक एक सबूत की स्वतन्त्र रूप से छानबीन होती है। और आरोप को साबित करने की जवाबदेही पुलिस यानि राज्य की होती है। जब तक अदालत सबूतों से सन्तुष्ट नही होती तब तक आरोपी को गुनाहगार नही माना जाता।
                      इसलिए अब सरकार के कामो पर सवाल उठाने को ही देशद्रोही घोषित किया जाने लगा है। और तो और सरकार के मंत्री तक इस बात को कहते हैं की सरकार और पुलिस पर सवाल उठाने बन्द कर दो। यानि अब लोकतंत्र और न्यायपालिका का कोई मतलब नही रह जाने वाला है। जिन आरोपियों के खिलाफ आपके पास कोई सबूत नही है उन्हें आप फर्जी एनकाउंटर में मार डालो और मीडिया को साथ में लेकर जोर जोर से चिल्लाओ की आतंकवादी मार दिए। कोई सवाल करे तो उसे देश द्रोही और आतंकवादियों का सहयोगी घोषित कर दो। इससे आने वाले समय की मुश्किलों का अंदाज लगाया जा सकता है।
                     दूसरी तरफ उसने लोगों के बीच में एक ऐसा तबका तैयार कर लिया है जो सरकार की भाषा बोलता है। जैसे ही कोई सवाल उठता है ये उस पर टूट पड़ते हैं। इस सरकार में बैठे हुए और इसकी तरफ से पागल कुत्तों की तरह भोकने वाले लोगों इन लोगों की साख ये है की ये वही लोग हैं जो अंग्रेजों का विरोध करने वालों के भी खिलाफ थे और इमरजेंसी में माफ़ी मांग मांग भागने वालों में सबसे आगे थे। इनका दोगलापन हररोज सामने आता है लेकिन इनको कोई फर्क नही पड़ता। असल में ये लोग उद्योगपतियों के पे रोल पर काम करते हैं और हर बयान को विज्ञापन का डायलॉग समझते हैं। इसलिए इन्हें कभी भी उसके गलत होने पर शर्म नही आती।
                      इसके कुछ उदाहरण है। जब गुजरात में फर्जी एनकाउंटर के मामले सामने आये तो इन्होंने जोर जोर से चिल्लाकर उन्हें सही ठहराया। दूसरी तरफ जब अदालत ने उस समय की गुजरात सरकार, जिसके उस समय के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी थे से इस बारे में अपना पक्ष रखने को कहा तो , उसने गुजरात हाईकोर्ट में हलफनामा देकर खुद उन एनकाउंटरों को फर्जी करार दिया। लेकिन उसके नेताओं और भक्तों को आज भी पूछा जाये तो वो इन्हें अब भी सही बताएंगे। ये चाहते हैं की जब ये  कन्हैया को गद्दार कहें तो पूरा देश उसे गद्दार कहे भले ही इनकी पुलिस अदालत में ये कहे की उसके पास कन्हैया के खिलाफ कोई सबूत नही है। ये इस बात का कभी जवाब नही देंगे की देश के गृहमंत्री जेनयू को हाफिज सईद से कैसे जोड़ रहे थे।
                   लेकिन इन्हें केवल इतना याद  रखने की जरूरत है की लोग सवाल करना बन्द नही करेंगे। और इनके लाख कोशिश करने के बावजूद देश की संस्थाए इतनी कमजोर नही हुई हैं की इनको जिम्मेदार नही ठहराया जा सके।

Monday, September 5, 2016

लोगों की समझ ही उनकी समस्याओं का कारण है।

                लोगों की समझ ही उनकी समस्याओं का मुख्य कारण है और लोग पता नही किस हिसाब से प्रतिक्रिया करते हैं ? पिछले हफ्ते घटी दो घटनाओं ने मुझे ये लिखने के लिए मजबूर किया।
                 पहली घटना है सूरत में केंद्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी का आगमन। सूरत कपड़ा उद्योग का बड़ा केंद्र है इसलिए कपड़ा उद्योग से सम्बन्धित सरकार के फैसलों और नीतियों का यहां के लोगों पर सीधा असर होता है। कपड़ा मंत्रालय सम्भालने के बाद श्रीमती स्मृति ईरानी की यह पहली सूरत यात्रा थी। यहां के उद्योगपति और व्यापारी उनसे बहुत उम्मीद लगाए हुए थे। इसलिए उनके कार्यक्रम में उनके लिए चापलूसी भरे व्यक्तव्यों की भरमार थी। लोगों ने कहा की नारी शक्ति का आगमन कपड़ा मंत्रालय में हुआ है इसलिए इस उद्योग को उसका फायदा जरूर मिलेगा। मुझे उनकी समझ पर आश्चर्य हो रहा था। उसके बाद उन्होंने मंत्री जी के सामने ये मांग रक्खी की कपड़ा उद्योग को GST के दायरे से बाहर रक्खा जाये। और GST को केवल यार्न के उत्पादन तक सिमित रखा जाये। जाहिर है की ये सम्भव नही था। सो मंत्री जी ने साफ कह दिया की किसी भी उद्योग को किसी भी स्तर पर टैक्स से छूट का प्रावधान GST में नही है। इस बिल का उद्देश्य और प्रारूप दोनों इस बात को ध्यान में रखकर बनाये गए हैं की टैक्स का दायरा बढ़े और टैक्स की उगाही बढ़े। चूँकि इसमें सर्विस टैक्स और एक्साइज ड्यूटी भी शामिल है, इसलिए किसी उद्योग को इससे बाहर रखने का मतलब होगा उस उगाही को भी छोड़ देना जो अब तक हो रही थी। इसलिए मंत्री ने इसमें असमर्थता जाहिर कर दी। उसके बाद पुरे व्यापारी वर्ग में ये चर्चा थी की इस तरह तो सूरत कपड़ा उद्योग का भट्ठा बैठ जायेगा। जब हम GST का विरोध कर रहे थे तब ये पूरा समुदाय हमे देशद्रोही और विकास विरोधी बता रहा था। तब ये लोग GST को देश के विकास के लिए सबसे जरूरी कदम बता रहे थे। उसके समर्थन में सेमिनार और जलसे कर रहे थे। अब कह रहे हैं की हम पर मत लगाओ बाकि देश पर लगा दो। देश के विकास की जिम्मेदारी से हमे मुक्त रखो और ये काम दूसरों से करवा लो। कई लोग तो इसकी दुष्प्रभावों की आशंका से डरे हुए हैं। लेकिन जब इसका विरोध करने और इस पर विचार करने का समय था तब उनका पूरा व्यवहार भक्तों की तरह था। जो प्रभु कह रहे हैं वही सत्य है।
                       दूसरी घटना दो सितम्बर की हड़ताल से सम्बन्धित है। दो सितम्बर से कुछ दिन पहले मैं अपने बैंक में गया था। वहां हड़ताल से सम्बन्धित एक बैनर लगा हुआ था। मैंने बैंक के कर्मचारियों से उसके बारे में बात की। सभी लोग इस बात पर एकमत थे की निजीकरण और दूसरे फैसलों को रुकवाने के लिए हड़ताल बहुत जरूरी है। हर एक कर्मचारी के पास हड़ताल के लिए मजबूत तर्क थे। फिर मैंने उनसे पूछा की उनमे से किस किस ने नरेंद्र मोदी और बीजेपी को वोट दिया था। उनमे से एक को छोड़कर सबने मोदी को वोट दिया था। तब मैंने उनसे पूछा की आप लोग एक ऐसी पार्टी और नेता को वोट देकर सत्ता में लेकर आ रहे हो जो निजीकरण का समर्थक है, मजदूरों को हासिल अधिकारों में कटौती का समर्थक है , सार्वजनिक क्षेत्र को समाप्त कर देने की नीति रखता है। बीजेपी और नरेन्द्र मोदी, दोनों की नीतियां इस मामले में एकदम साफ रही हैं और उनको छिपाया भी नही गया है। बीजेपी और नरेन्द्र मोदी दोनों प्राइवेट सैक्टर को विकास का इंजन मानते हैं और सार्वजनिक क्षेत्र को देश पर बोझ मानते हैं। सत्ता में आने के बाद जब वो अपनी नीतियों को आगे बढ़ाते हैं तो आप उसके विरोध में हड़ताल करते हैं। इससे क्या होगा। इस सरकार को आपने खुद चुना है। उनके पास इसका कोई जवाब नही था।
                        मैंने ये बहुत शिद्दत से महसूस किया है की लोग वोट देने का फैसला और हड़ताल पर जाने का फैसला भी बहुत ही सतही तरीके से करते हैं। और ज्यादा पढ़े लिखे कहे जाने वाले लोग ज्यादा कन्फ्यूज होते हैं।

Tuesday, April 12, 2016

व्यंग -- गुरुग्राम, महाभारत और हरियाणा सरकार।

                   हरियाणा सरकार ने गुडग़ांव का नाम बदलकर गुरुग्राम कर दिया। इस तरह सरकार ने एक ऐतिहासिक भूल का सुधार कर दिया। पिछले 850 साल की गुलामी के दौरान जो जो भूलें देश ने की हैं, ये सरकार उन सब को सुधारने के लिए कटिबद्ध है। इसमें 1947 में की गई आजादी नाम की भूल भी शामिल है।
                   गुडग़ांव नाम का ये ऐतिहासिक नगर हरियाणा में दिल्ली से सटा हुआ है। हमारी कमनसीबी देखिये की हमे दिल्ली शब्द का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। कितना अच्छा लगता की दिल्ली का नाम इन्द्रप्रस्थ या हस्तिनापुर होता। तब हम सर उठकर कहते की गुरुग्राम इन्द्रप्रस्थ से सटा हुआ है। तब कोई हमसे पूछता की ये हरियाणा के किस हिस्से में है तो हम बताते की ये करुक्षेत्र से इतने किलोमीटर दूर है। लेकिन पिछली केंद्र सरकारों ने देश की प्रतिष्ठा बढ़ाने के कोई कदम नहीं उठाये। अब हम 850 साल के बाद देश की पहली हिन्दू सरकार से निवेदन करेंगे की वो दिल्ली का नाम बदल दे।
                      बात गुरुग्राम की चल रही थी सो हम आपको बताना चाहते हैं की ये वही नगर है जो कुरु शासकों ने अपने राजकुमारों को शिक्षा देने की एवज में गुरु द्रोणाचार्य को भेंट किया था। उस समय इसे विद्या का बहुत बड़ा केंद्र माना जाता था। जहां कई देशो और विदेशों से राजकुमार पढ़ने के लिए आते थे। विदेशों से हमारा मतलब मगध और सिंध आदि देशों से है। तब इन्हे विदेश कहा जाता था। उस समय महान हिन्दू राष्ट्र हस्तिनापुर की सीमाएं एक अनुमान के अनुसार एक तरफ मथुरा को छूती थी और दूसरी तरफ पटना तक जो उस समय पाटलिपुत्र कहलाता था फैली हुई थी। इस विशाल साम्राज्य के महान योद्धा गुरुग्राम से ही शिक्षा प्राप्त करते थे।राजकुमारों से अलग आम आदमी के लिए यहां शिक्षा प्राप्त करना महाभारत काल में भी असम्भव था और आज भी असम्भव है। उस समय ब्र्ह्मास्त्र का निर्माण भी हो चूका था लेकिन लड़ाई के दौरान तीरों और गदा का इस्तेमाल किया जाता था।
                       खैर बात गुरुग्राम और शिक्षा की चल रही थी। उस समय विद्या के इस महान केंद्र में केवल क्षत्रियों को ही शिक्षा दी जाती थी। वैसे तो इस बात का ध्यान रखा जाता था की कोई शुद्र गलती से भी शिक्षा प्राप्त ना कर ले, लेकिन फिर भी दुष्टात्माओं की कमी तो किसी भी काल में नहीं रही और कोई शुद्र छिप छिपाकर शिक्षा प्राप्त भी कर ले तो उससे निपटने के उपाय भी तैयार होते थे। इसमें सभी गुरुकुलों के बीच एक साझा समझ थी और एकमत था। एकलव्य और कर्ण दोनों के उदाहरण सामने हैं।
                     इसलिए मौजूदा हरियाणा सरकार भी 850 साल के बाद दिल्ली की गद्दी पर बैठी पहली हिन्दू सरकार का ही गौरवपूर्ण हिस्सा है इसलिए वो भारत खण्ड को उसका खोया हुआ गौरव वापिस दिलवाने का प्रयास करती रहेगी। इस सरकार ने ये भी नॉट किया है की मौजूदा समय में शूद्रों को शिक्षा प्राप्त करने से रोकने के लिए कुछ विशेष प्रयास करने की जरूरत है। इसलिए सरकार ने हरियाणा के 350 सरकारी स्कूलों को बंद करने का फैसला किया है। सरकार को उम्मीद है की इससे शूद्रों को शिक्षा प्राप्त करने में कठिनाई होगी। और इससे हमारी महान संस्कृति की रक्षा हो सकेगी।
                 इसके साथ ही हरियाणा सरकार पुरे देश में दिल्ली सरकार द्वारा विश्व विद्यालयों में की जा रही पुराने गौरव को वापिस दिलाने वाले सभी कदमो का पुरजोर समर्थन करती है। जिन विश्व विद्यालयों में एकलव्य और कर्ण जैसे शिष्यों की संख्या ज्यादा हो गई है उनको या तो बंद करने की कोशिश की जाएगी या फिर कम से कम अध्यापन कार्य को बाधित करने को कोशिश तो अवश्य की जाएगी। सरकार द्वारा सत्ता सम्भालते ही इस तरह के प्रयास पुरे जोर शोर से किये जा रहे हैं।
                   हरियाणा सरकार का मानना है की जल्दी ही महान आर्यावर्त के इस भूभाग को जिसे अब हरियाणा कहा जाता है उसका खोया हुआ गौरव फिर से हासिल होगा। हमने एक ही परिवार को दो पक्षों में बांटकर आपस में लड़ाने की पुराणी प्रथा को भी पुनर्जीवित किया है और अभी अभी हरियाणा में उसका सफल प्रयोग भी किया है। कुछ लोग जनता को एक ही परिवार के दो पक्षों द्वारा लड़े गए महाभारत के युद्ध के नतीजों को याद करवा रहे हैं। ऐसे लोग प्राचीन भारतीय संस्कृति के दुश्मन हैं इसलिए उन्हें देशद्रोही करार दिया जा चूका है। ये सरकार अपने एजेंडे पर कायम है और किसी को भरम में रहने की जरूरत नहीं है।

Wednesday, March 9, 2016

मिलीभगत और धोखाधड़ी को देख रही है जनता।

                क्या आपने फेवीक्विक का वो विज्ञापन देखा है जिसमे एक गरीब लारी वाले से एक महंगी कार की लाइट टूट जाती है। कार वाला बाहर निकल कर चिल्लाता है और बेचारा लारी वाला बुरी तरह डर जाता है। तभी कार वाला उससे कहता है निकाल पांच रूपये।
                 मुझे ये विज्ञापन आज NGT के उस फैसले के बाद याद आया जिसमे उसने श्री श्री रविशंकर के कार्यक्रम पर अपना फैसला सुनाते हुए लगभग उसी तरह की मांग कर दी।
                  सबसे बड़ी बात ये है की देश में ऐसा कौनसा आदमी था जिसको इस फैसले की पहले से उम्मीद ना रही हो। श्री श्री रविशंकर और उनकी संस्था तो आश्वस्त ही थी इसलिए उसकी तैयारियां अपने कार्यक्रम अनुसार चल रही थी। उसे तो रत्ती भर संदेह नही था। दूसरी तरफ सरकार थी जिसने उस को अघोषित अनुमति दे रखी थी और अनुमति ही नही दे रखी थी बल्कि पूरी सेना और पुलिस को भी इसकी तैयारियों में झोंक रखा था। पूरी बीजेपी अपने सहयोगी श्री श्री रविशंकर के साथ  खड़ी थी। संसद में मंत्री कह रहे थे की सभी अनुमतियाँ ली गयी हैं और कोर्ट में सभी सरकारी विभाग कह रहे थे की किसी अनुमति की जरूरत ही नही है। दूसरी देश की जनता है जिसे इस तरह के हर मामले में होने वाले हर निर्णय का पहले से ही अनुमान होता है। हर बार की तरह इस बार भी वही हुआ। एक दो डांट फटकार और फिर देरी का रोना रोकर अनुमति। हमारे लिए ये कोई नई बात नही है। हम ये सब एनरॉन के मामले में देख चुके हैं। जब अदालत शुरू में इस तरह के कार्यक्रम पर रोक नही लगाती तभी उसके अंतिम फैसले का अनुमान हो जाता है। और ये कोई अलग कार्यक्रम नही है भाई, वहां प्रधानमंत्री के लिए अलग मंच बन रहा है।
                   लेकिन सवाल ये है की न्याय के नाम पर इस तरह की मिलीभगत और धोखाधड़ी आखिर कब तक चलेगी। जब कोई गरीब सामने होता है तो हर संस्था को दो दो हाथ लम्बे दांत उग जाते हैं। जब 15 साल पुरानी टैक्सी पर प्रतिबंध लगाने की बात होती है और सामने गरीब टैक्सी वाले होते हैं तो यही NGT इस तरह व्यवहार करता है जैसे बब्बर शेर हो और जब मामला बड़े लोगों का होता है तो उसकी बेबसी देखते ही बनती है। तुम लाख अभिनय करो लेकिन सच्चाई लोगों को दिखाई देती है। केवल कुछ भक्तों और कुछ बुद्धिविहीन लोगों को छोड़ दिया जाये तो। मेरी कई आम लोगों से बात हुई तो उन्हें इस पर कोई आश्चर्य नही हुआ, उल्टा मेरी समझ पर आश्चर्य हुआ।
                     लेकिन मैं एक बात कहना चाहता हूँ। पर्यावरण को होने वाले नुकसान से क्या केवल गरीब लोग ही प्रभावित होंगे। जब आपने कारखानो और दूसरे जिम्मेदार लोगों को इसकी छूट दी थी तो इसका नतीजा ये हुआ की आज आपको सम-विसम फार्मूला अपनाना पड  रहा है। कल ये कार्यक्रम करके श्री श्री रविशंकर चले जायेंगे, प्रधानमंत्री को एक बड़ी भीड़ के सामने भाषण देने का मौका मिल चूका होगा लेकिन उसके बाद ? पहले से ज्यादा मैली यमुना तुम्हारे सामने होगी। और उसके साथ पर्यावरण से जुड़े वो सारे खतरे कुछ और भयावह रूप में सामने होंगे। जो लोग ये समझते हैं की इससे उन्हें कोई फर्क नही पड़ता उनके लिए जनाब राहत इन्दोरी साहब की एक गजल की एक लाइन सुना रहा हूँ हालाँकि इसे उन्होंने दूसरे संदर्भ में लिखा था।
                         लगेगी आग तो आएंगे घर कई जद में,
                                              यहां केवल हमारा मकान थोड़ी है।