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Wednesday, May 17, 2017

जिस दिन सर्वोच्च न्यायालय किसी भी एक मौलिक अधिकार की सभी नागरिकों के लिए समान रूप से गारण्टी कर देगा, वो देश के न्यायायिक इतिहास की सबसे क्रांतिकारी घटना होगी।

               माननीय सर्वोच्च न्यायालय छुट्टियों के बावजूद तीन तलाक पर सुनवाई कर रहा है। इस सुनवाई के दौरान कई चीजों का जिक्र बार बार होता है। इनमे से एक है मूलभूत अधिकार। सबसे ख़ुशी की बात ये है की मुस्लिम महिलाओं के मूलभूत अधिकारों के लिए सबसे ज्यादा चिंतित कोई दिख रहा है तो वो सरकार है। सरकार के आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। अगर सरकारें मूलभूत अधिकारों पर सचमुच में इतनी चिंता दिखाने लगें तो अदालतों को तो काम ही आधा रह जाये। मूलभूत अधिकार तो नागरिकों को हासिल वो अधिकार हैं जिन्हे सरकारें गाहे बगाहे खत्म करने पर लगी रहती हैं और नागरिकों द्वारा मांग करने पर अदालतों को हस्तक्षेप करना पड़ता है। इस बार उल्टा हो रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे सरकार मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करना चाहती है और अदालत सहित कुछ तबके उसे रोक रहे हैं।
                कुछ लोग ये सवाल भी उठा रहे हैं की दूसरे मूलभूत अधिकारों के मामले में तो सरकार का वही रुख है। न्यूनतम मजदूरी का अधिकार संविधान के आर्टिकल 23 के तहत मूलभूत अधिकार है। लेकिन जितना उपेक्षित रवैया इसके प्रति सरकार और अदालतों का है उसे देखकर तो ये लगता ही नहीं है की ये मूलभूत अधिकार है। उसी तरह आदिवासियों के अधिकार हैं, दलितों के साथ होने वाले जुल्म भी समान मानवीय अधिकारों के अनुसार मूलभूत अधिकारों के तहत हैं। मुस्लिम महिलाओं के अलावा दूसरी महिलाओं के भी अधिकार हैं, लेकिन उन पर कोई बात नहीं होती है। अब तो लोगों को अदालतों के कुछ निर्णयों से आश्चर्य होने लगा है। सहारा-बिरला डायरी के मामले में उच्चतम न्यायालय ने जिन कागजात को सबूत मानने से इंकार कर दिया, अगर उसे सब पर लागु कर दिया जाये तो टैक्स चोरी के 90 % मामले एक झटके में समाप्त हो सकते हैं। सहारा -बिरला डायरी मामले में मोदीजी के खिलाफ मामला जिस तरह से ख़ारिज किया गया उस पर आम आदमी भी ये पूछ रहा है की क्या सुप्रीम कोर्ट को मोदीजी की दस्तखत की हुई रशीद चाहिए ?
               छत्तीसगढ़ के आदिवासियों पर होने वाले जुल्म के बारे में सारे सबूतों के बावजूद एक भी केस में किसी को सजा नहीं सुनाई गयी। यहां तक की सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले लोगों की हत्याएं हो गयी, महिलाएं गायब हो गयी, खुद सरकारी एजेंसी सीबीआई ने अपनी रिपोर्ट में पुलिस पर आदिवासियों के गांव जलाने , महिलाओं से बलात्कार करने और लोगों की हत्याओं के आरोपों को सही पाया, लेकिन अदालत  की तरफ से कोई ठोस आदेश जारी नहीं हुआ। गुजरात में फर्जी मुठभेड़ों के अभियुक्तों को, जिनको राज्य सरकार खुद फर्जी मुठभेड़ों का जिम्मेदार मानती है और कानून के अनुसार उनके खिलाफ एक पक्ष भी है, वही सरकार उन्ही लोगों को पद्दोन्ती देकर ऊँचे पदों पर नियुक्ति दे देती है, इससे बड़ा कानून का मजाक आखिर क्या हो सकता है। लेकिन अदालत इसे मूकदर्शक की तरह देखती रही।
                  सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के मामले में अदालत कभी भी उतनी ततपरता नहीं दिखाती जितनी जरूरत होती है। हालत ये है की किसी का बच्चा किडनैप हो जाये और सामने वाला फिरौती के लिए चौबीस घंटे का वक्त दे दे और पुलिस कार्यवाही करने से इंकार कर दे , और उसका परिवार पुलिस को आदेश देने के लिए ऊपरी अदालत में गुहार लगाए, तो अदालत सरकार को छह हफ्तों में जवाब दाखिल करने को कह देगी। इसलिए लोगों को लगता है की सरकार के साथ साथ अदालतों का रवैया भी गरीबों और अमीरों के मामले में अलग  अलग होता है। जो लोग मार्क्स को उद्दृत करके कहते हैं की आखिर अदालतें भी राजसत्ता का ही हिस्सा होती हैं, इस मामले में तो एकदम सही लगते हैं।
                   तीन तलाक के मामले में जो भी फैसला आये, लेकिन लोगों के मूलभूत अधिकारों की चिंता करने वाली सरकार और अदालतें जिस दिन संविधान प्रदत किसी भी एक ( केवल एक ) मूलभूत अधिकार को देश के सभी नागरिकों को  समान रूप से लागू करवा देंगी, वो दिन भारत के न्याय के इतिहास का सबसे क्रन्तिकारी होगा।

Tuesday, November 8, 2016

राजनाथ सिंह और गाय के जीन्स

खबरी -- राजनाथ सिंह ने कहा है की गाय के 80 % जीन्स आदमी से मिलते हैं।

गप्पी -- विज्ञानं के हिसाब से ये कोई बहुत बड़ा रहस्योद्घाटन नही है। बन्दर और चिम्पाजी के तो 95 - 98 % जीन्स आदमी से मिलते हैं। मगर असली सवाल ये है की राजनाथ सिंह ने ये बात गोरक्षा के सन्दर्भ में कही  है। हैरत इस बात की है की उन्हें दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक दिखाई नही देते जो 100 % उनके खुद के जीन्स से मिलते हैं।

खबरी -- नन्दिनी सुंदर और दूसरे लोगों पर छतीसगढ़ की बीजेपी सरकार ने हत्या का मुकदमा दर्ज कर दिया है।

गप्पी -- सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेखकों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, छात्रों और राजनितिक कार्यकर्ताओं पर बीजेपी द्वारा दमन की कार्यवाही के रूप में फर्जी मुकदमे दायर करना कोई नई बात नही है। ये लिस्ट गुजरात से शुरू होती है  जैसे -
१. मल्लिका साराभाई  ( जानीमानी सामाजिक कार्यकर्ता और मशहूर वैज्ञानिक डा विक्रम साराभाई की पुत्री )
२.  संजीव भट्ट           ( गुजरात के बर्खास्त आईपीएस अधिकारी )
३. तीस्ता सीतलवाड़    ( सामाजिक कार्यकर्ता और सुप्रीम कोर्ट की वकील )
४. कन्हैया और दूसरे JNU के छात्र    ( JNU छात्र संघ अध्यक्ष और पदाधिकारी )
५. सोनी सोरी                     ( छतीशगढ की आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता )
६.  दिल्ली के आप विधायक
७.  नन्दिनी सुंदर                 (  दिल्ली यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर और लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता )
८.  संजय पराते               ( मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के छतीसगढ़ राज्य सचिव और केंद्रीय कमेटी सदस्य )
९. अजय तिवारी           ( मध्यप्रदेष प्रगतिशील लेखक संघ के सचिव )
१०. जी एन साईबाबा     ( दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर )
११.  अर्चना प्रशाद         ( प्रोफेसर, JNU  )

                इनके अलावा सैंकड़ों अन्य लोगों के खिलाफ भी दमनात्मक कार्यवाही की गयी है।