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Friday, October 21, 2016

GST की टैक्स की स्लैब आम आदमी के विरुद्ध नही होनी चाहिए !


                       पहले दिन से ही, जब से GST लाने की बात हो रही थी, हम उसके जन विरोधी ढांचे पर सवाल उठाते रहे हैं। अब जबकि ये कानून संसद से पास हो चूका है, इसकी बहुत सी चीजें सामने आ चुकी हैं। उन चीजों से हमारी उन आशंकाओं की पुष्टि होती है जो हमने इसके सन्दर्भ में उठाई थी। जैसे --
                        इस कानून के आने के बाद राज्य सरकारों को टैक्स लगाने या हटाने के सारे अधिकार खो देने पड़े हैं। अब चाहकर भी कोई राज्य सरकार किसी भी चीज पर कोई टैक्स छूट नही दे सकती है और ना ही हानिकारक चीजों पर अतिरिक्त टैक्स लगा सकती है। खैर ये तो वो चीज है जिसका सबको पता था। लेकिन बहुत सी चीजें ऐसी भी हैं जिनसे उस समय सरकार इंकार कर रही थी और अब वो सामने आ रही हैं।
                       GST लागु होने के बाद भी टैक्स की कोई एक दर नही होगी। अभी जो प्रस्ताव GST काउन्सिल के पास है उसमे चार दरों का प्रावधान है। ये भी लगभग तय हो चूका है की टैक्स की स्लैब चार स्तरीय ही होगी। अब केवल उन दरों पर फैसला होना बाकी है।
                        लघु उद्योगों को जो अब तक 1 . 5 करोड़ की छूट हासिल थी, वो अब समाप्त हो जाएगी और 20 लाख से ऊपर टर्नओवर वाले सभी संस्थान GST के दायरे में होंगे। यानि लघु उद्योगों को अब तक हासिल सुरक्षा, जो उन्हें बड़ी कम्पनियों के कम्पीटिशन से बचाती थी, अब खत्म हो जाने वाली है। हम इसका जिक्र पहले भी करते रहे हैं। लेकिन तब सरकार इससे इंकार कर रही थी।
                          इसके अलावा जो सरकार अब तक कहती रही थी की इसके लागु होने के बाद राज्यों के टैक्स उगाही में कोई कमी नही आएगी। इसके लिए केंद्र सरकार का रुख ये था की सर्विस टैक्स को GST में शामिल करने के बाद उसमे से राज्य सरकारों को बड़ी रकम मिलेगी। ये बात अपने आप में सही भी है। लेकिन अब केंद्र सरकार अपनी ही कही बात से पीछे हट रही है। उसने राज्य सरकारों को इस कमी के भुगतान के लिए एक सेस लगाने का प्रस्ताव किया है। जिसका केरल सहित कई राज्यों ने विरोध किया है। अगर टैक्स की उगाही में कोई कमी ही नही आने वाली है तो उससे पहले ही सेस के नाम पर लोगों पर बोझ डालने का क्या मतलब है। केरल इत्यादि कुछ राज्यों का कहना है की अगर केंद्र को लगता है की टैक्स की उगाही कम होगी तो अभी से लक्जरी वस्तुओं पर प्रस्तावित टैक्स की दर जो 26 % है, उसे 30 % कर दिया जाये। सेस के नाम पर केंद्र अतिरिक्त उगाही करे ये ठीक नही है।
                      GST काउन्सिल की मीटिंग में सबसे बड़ा अंतर्विरोध इस बात पर है की टैक्स की दरें क्या हों। केंद्र सरकार ने चार दरों - 6 % - 12 % - 18 % - 26 % का प्रस्ताव दिया है। जिसमे आम आदमी की रोजमर्रा की चीजों पर 6 % की दर और तंम्बाकू, गुटखा, SUV और दूसरी विलासिता की चीजों पर 26 % की दर का प्रस्ताव है। लेकिन केरल के वित्त मंत्री और सीपीएम के नेता थॉमस इजाक ने इसका विरोध करते हुए कहा  है की न्यूनतम 6 % की दर को कम किया जाना चाहिए। क्योंकि सरकार का कहना है की नई दरों से पहले के मुकाबले हर वस्तु पर टैक्स की दर कम हो जाने वाली है। लेकिन आम आदमी के इस्तेमाल की चीजों पर अभी मौजूद दर 5 % है, इसलिए उसको क्यों बढ़ाया जा रहा है? दूसरी तरफ SUV इत्यादि वस्तुओं पर मौजूदा प्रभावी दर 48 % है जिसे कम करके 26 % किया जा रहा है। ये तो गरीबों की कीमत पर अमीरों को फायदा पहुंचाने वाली बात हुई। इसलिए इस मीटिंग में ये गतिरोध दूर नही हो पाया। इसलिए ये आशंका बढ़ गयी है की सरकार एक बार फिर गरीबों पर बोझ डालकर अमीरों को फायदा पहुंचाने की कोशिश कर सकती है।
                         जब से सेस लगाने की बात हुई है तब से उद्योग जगत के लोग भी बहुत निराश हैं। उनका कहना है की अगर फिर वही टैक्स और अलग से सेस का जमाना चालू रहता है तो फिर पिछली प्रणाली और इसमें क्या फर्क रह जायेगा। सरकार ने सरलीकरण का जो वादा किया था उसका क्या हुआ ?
                          इसलिए ये प्रणाली भी अपने सारे वायदों और कस्मों के बावजूद केवल टैक्स बढ़ाने की कवायद ही ना रह जाये।