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Sunday, November 19, 2017

गुजरात चुनाव का हिसाब किताब केवल 5 % स्विंग से बदल सकता है

              जितनी निगाहें इस बार के गुजरात चुनाव के ऊपर लगी हुई हैं उतनी शायद ही किसी राज्य के विधानसभा चुनाव पर लगी हों। इसका एक कारण गुजरात में पाटीदार आंदोलन के चुनाव पर असर को जानने की उत्सुकता भी है और GST के बाद गुजरात के व्यापारियों के मूड को देखने की उत्सुकता भी है।
                  इस बात में कोई दो राय नहीं हैं की GST के कारण व्यापारियों का एक बड़ा तबका सरकार से नाराज है। सूरत में खासकर टेक्सटाइल से जुड़े व्यापारी खासे नाराज हैं। इसका एक कारण तो GST नेटवर्क की मुश्किलियाँ भी हैं और दूसरी तरफ टेक्सटाइल पर GST का मौजूदा स्वरूप उसके आधारभूत तर्क के ही खिलाफ है। अबाधित इनपुट क्रेडिट को टेक्सटाइल के मामले में लागु नहीं किया गया है। इसलिए लोगों को इस बात की उत्सुकता है की व्यापारी अपनी नाराजगी वोट के वक्त जाहिर करते हैं या नहीं।
                पिछले एक महीने में बहुत से लोगों से इस बारे में बातचीत हुई। इसमें दो विरोधी चीजें निकल कर सामने आयी। पहली ये की हर आदमी ये मानता है की लोग सरकार से नाराज हैं। दूसरी बात ये की लोगों को इस बात का अंदेशा है की जीत तो बीजेपी की ही होगी। इसके बारे में लोगों का कहना है की प्रधानमंत्री मोदी चुनाव के आखरी दौर में कुछ न कुछ ऐसा मुद्दा निकाल कर ले आएंगे की लोग बीजेपी को वोट कर देंगे। दूसरी बात जो लोग कहते हैं वो ये है की पूरे मीडिया में केवल बीजेपी ही दिखाई देती है बाकी कुछ दिखाई ही नहीं देता। एक और बात लोग कहते हैं की बीजेपी इस चुनाव को मोदी और राहुल के बीच भाषण प्रतियोगिता में बदल देगी और लोग मोदीजी के भाषण पर तालियां बजाते हुए बीजेपी को वोट कर देंगे। लेकिन इसमें एक विरोधी बात भी निकल कर आयी।
                   जब मैंने लोगों से ये पूछा की पिछले तीन चुनावों के दौरान बीजेपी और कांग्रेस के बीच वोटों का अंतर् लगभग 9 % का रहा है। और ये तीनो चुनाव एकतरफा माने जाते थे। अगर केवल 5 % वोट की स्विंग बीजेपी से कांग्रेस के पक्ष में हो जाती है तो बाजी पलट सकती है और बीजेपी हार सकती है। इस पर लोगों की प्रतिक्रिया आश्चर्यजनक थी। लोगों का कहना था की क्या वाकई में पांच प्रतिशत से बाजी पलट सकती है ? फिर वो कहते की इस बार स्विंग तो पांच प्रतिशत से ज्यादा होगी। अगर इतनी ही स्विंग से बीजेपी हार सकती है तो इस बार उसके हारने के चान्स ज्यादा हैं।
                   असल में मीडिया की एकतरफा कवरेज ने लोगों की सोचने समझने की शक्ति और सही जानकारी होने की क्षमता को भारी नुकशान पहुंचाया है। इसका असर बीजेपी के विरोधियों पर ही नहीं बल्कि उसके समर्थकों पर भी पड़ता है और उन्हें चारों तरफ हरा हरा ही नजर आने लगता है और नतीजे इण्डिया शाइनिंग जैसे आ सकते हैं। गुजरात चुनाव में मुकाबला केवल ये है की क्या कांग्रेस अपने पक्ष में केवल पांच प्रतिशत की स्विंग करवा सकती है नहीं। और इस बार के हालात  देखकर ये बहुत सम्भव लगता है और इसे हर आदमी स्वीकार करता है। 

Friday, October 21, 2016

GST की टैक्स की स्लैब आम आदमी के विरुद्ध नही होनी चाहिए !


                       पहले दिन से ही, जब से GST लाने की बात हो रही थी, हम उसके जन विरोधी ढांचे पर सवाल उठाते रहे हैं। अब जबकि ये कानून संसद से पास हो चूका है, इसकी बहुत सी चीजें सामने आ चुकी हैं। उन चीजों से हमारी उन आशंकाओं की पुष्टि होती है जो हमने इसके सन्दर्भ में उठाई थी। जैसे --
                        इस कानून के आने के बाद राज्य सरकारों को टैक्स लगाने या हटाने के सारे अधिकार खो देने पड़े हैं। अब चाहकर भी कोई राज्य सरकार किसी भी चीज पर कोई टैक्स छूट नही दे सकती है और ना ही हानिकारक चीजों पर अतिरिक्त टैक्स लगा सकती है। खैर ये तो वो चीज है जिसका सबको पता था। लेकिन बहुत सी चीजें ऐसी भी हैं जिनसे उस समय सरकार इंकार कर रही थी और अब वो सामने आ रही हैं।
                       GST लागु होने के बाद भी टैक्स की कोई एक दर नही होगी। अभी जो प्रस्ताव GST काउन्सिल के पास है उसमे चार दरों का प्रावधान है। ये भी लगभग तय हो चूका है की टैक्स की स्लैब चार स्तरीय ही होगी। अब केवल उन दरों पर फैसला होना बाकी है।
                        लघु उद्योगों को जो अब तक 1 . 5 करोड़ की छूट हासिल थी, वो अब समाप्त हो जाएगी और 20 लाख से ऊपर टर्नओवर वाले सभी संस्थान GST के दायरे में होंगे। यानि लघु उद्योगों को अब तक हासिल सुरक्षा, जो उन्हें बड़ी कम्पनियों के कम्पीटिशन से बचाती थी, अब खत्म हो जाने वाली है। हम इसका जिक्र पहले भी करते रहे हैं। लेकिन तब सरकार इससे इंकार कर रही थी।
                          इसके अलावा जो सरकार अब तक कहती रही थी की इसके लागु होने के बाद राज्यों के टैक्स उगाही में कोई कमी नही आएगी। इसके लिए केंद्र सरकार का रुख ये था की सर्विस टैक्स को GST में शामिल करने के बाद उसमे से राज्य सरकारों को बड़ी रकम मिलेगी। ये बात अपने आप में सही भी है। लेकिन अब केंद्र सरकार अपनी ही कही बात से पीछे हट रही है। उसने राज्य सरकारों को इस कमी के भुगतान के लिए एक सेस लगाने का प्रस्ताव किया है। जिसका केरल सहित कई राज्यों ने विरोध किया है। अगर टैक्स की उगाही में कोई कमी ही नही आने वाली है तो उससे पहले ही सेस के नाम पर लोगों पर बोझ डालने का क्या मतलब है। केरल इत्यादि कुछ राज्यों का कहना है की अगर केंद्र को लगता है की टैक्स की उगाही कम होगी तो अभी से लक्जरी वस्तुओं पर प्रस्तावित टैक्स की दर जो 26 % है, उसे 30 % कर दिया जाये। सेस के नाम पर केंद्र अतिरिक्त उगाही करे ये ठीक नही है।
                      GST काउन्सिल की मीटिंग में सबसे बड़ा अंतर्विरोध इस बात पर है की टैक्स की दरें क्या हों। केंद्र सरकार ने चार दरों - 6 % - 12 % - 18 % - 26 % का प्रस्ताव दिया है। जिसमे आम आदमी की रोजमर्रा की चीजों पर 6 % की दर और तंम्बाकू, गुटखा, SUV और दूसरी विलासिता की चीजों पर 26 % की दर का प्रस्ताव है। लेकिन केरल के वित्त मंत्री और सीपीएम के नेता थॉमस इजाक ने इसका विरोध करते हुए कहा  है की न्यूनतम 6 % की दर को कम किया जाना चाहिए। क्योंकि सरकार का कहना है की नई दरों से पहले के मुकाबले हर वस्तु पर टैक्स की दर कम हो जाने वाली है। लेकिन आम आदमी के इस्तेमाल की चीजों पर अभी मौजूद दर 5 % है, इसलिए उसको क्यों बढ़ाया जा रहा है? दूसरी तरफ SUV इत्यादि वस्तुओं पर मौजूदा प्रभावी दर 48 % है जिसे कम करके 26 % किया जा रहा है। ये तो गरीबों की कीमत पर अमीरों को फायदा पहुंचाने वाली बात हुई। इसलिए इस मीटिंग में ये गतिरोध दूर नही हो पाया। इसलिए ये आशंका बढ़ गयी है की सरकार एक बार फिर गरीबों पर बोझ डालकर अमीरों को फायदा पहुंचाने की कोशिश कर सकती है।
                         जब से सेस लगाने की बात हुई है तब से उद्योग जगत के लोग भी बहुत निराश हैं। उनका कहना है की अगर फिर वही टैक्स और अलग से सेस का जमाना चालू रहता है तो फिर पिछली प्रणाली और इसमें क्या फर्क रह जायेगा। सरकार ने सरलीकरण का जो वादा किया था उसका क्या हुआ ?
                          इसलिए ये प्रणाली भी अपने सारे वायदों और कस्मों के बावजूद केवल टैक्स बढ़ाने की कवायद ही ना रह जाये।