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Sunday, October 9, 2016

मनोहर पर्रिकर जी , इतनी गलतफहमियां मत पालिये।

                   सेना की सर्जिकल स्ट्राइक के बाद इस सरकार के मंत्रियों और पार्टी के कार्यकर्ताओं ने खुद अपनी पीठ इतनी थपथपाई है की अब उसमे से खून निकलने लगा है। और इन पीठ थपथपाने वालों का नेतृत्व जाहिर है की रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर कर रहे हैं। इस होड़ में उन्होंने दो बातें ऐसी कही हैं जो सेना के लिए अपमान की श्रेणी में आती हैं। सेना की इस कामयाबी को राजनैतिक तौर पर भुनाने और वोटों की फसल काटने के लिए उन्होंने उत्तर प्रदेश में, जहां चुनाव निकट है, जिला स्तर पर अपने सम्मान समारोह रखवा लिए हैं जो आगे जाकर तहसील स्तर तक जा सकते हैं। लेकिन उन्होंने कहा," मेरे रक्षा मंत्री बनने से पहले सेना ने ६५ साल में कुछ नही किया और मैंने सेना को हनुमान की तरह उसका भुला हुआ बल याद दिलाया। " इस बयान को अनदेखा किया जा सकता था अगर इसे देने वाला देश का  रक्षा मंत्री नही होता। इसलिए मैं इस पर कुछ बातें कहना अपना फर्ज समझता हूँ।
                    आदरणीय मंत्रीजी, क्या आपको मालूम है की अब तक सेना को कितने परमवीर चक्र, महावीर चक्र और वीर चक्र दिए गए हैं ? आपको ये तो मालूम होगा  की ये चक्र सैनिकों को युद्ध में उनकी वीरता और अदम्य साहस के लिए दिए जाते हैं और ये कोई पदम् पुरस्कार नही हैं जो अपनी पार्टी के नालायक लोगों को भी बांटे जा सकते हैं बगैर किसी योगदान के। इसके अलावा सीमा पर अदम्य साहस और शौर्य की पता नही कितनी कहानियां दफन हैं क्योंकि उन्हें देख कर सुनाने वाला कोई जिन्दा नही बचा। आपने कितनी सहजता से कह दिया की सेना ने 65 साल में कुछ नही किया।
                     क्या आपको ये भी मालूम नही है की इसी सेना ने पाकिस्तान के उस समय दो टुकड़े कर दिए थे जब आप स्कूल में पढ़ रहे थे। क्या आप बता सकते हैं की अगर आप रक्षा मंत्री नही होते तो सेना से आपका क्या रिश्ता है। आपने तो शायद कभी सैनिक सेवा के लिए आवेदन भी नही किया होगा।
                       मेरी हैसियत नही है की मैं भारतीय सेना के शौर्य का वर्णन कर सकूँ, लेकिन मैं आपको कुछ चीजें जरूर बताना चाहूंगा।
                       क्या आपने ब्रिगेडियर उस्मान का नाम सुना है ? अविभाजित भारत की बलोच रेजिमेंट के ब्रिगेडियर उस्मान, जिन्हें पाकिस्तान ने सेना प्रमुख बनने का ऑफर दिया था। लेकिन उन्होंने बलोच रेजिमेंट छोड़कर भारत में डोगरा रेजिमेंट ज्वाइन कर ली और पाकिस्तान की सेना प्रमुख की ऑफर ठुकरा दी। वो ब्रिगेडियर उस्मान 1948 में ही कश्मीर के मोर्चे पर शहीद हो गए।  बहादुरी के लिए उन्हें नोशेरवां का शेर कहा जाता है। और आज आपकी पार्टी से जुड़े गली मोहल्ले के गुंडे उनके रिश्तेदारों से देशभक्ति का सबूत मांग रहे हैं।
                      चलो कोई बात नही। आप ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी को तो जानते होंगे ? वही जिनके कारनामो पर बार्डर फिल्म बनी है और जिनका रोल सन्नी दियोल अदा कर रहे थे। भगवान का शुक्र है की ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी अभी तक स्वस्थ हैं। आप एकबार उनसे जरूर मिलिए। हाँ, अगर आप देश के  रक्षा मंत्री नही होते या आपकी जगह कोई कोई दूसरा आदमी होता तो  इस तरह के बयान के बाद ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी के सामने जाने से पहले मैं उसे डायपर पहनने की सलाह जरूर देता।
                       आपने हवलदार अब्दुल हमीद का नाम तो जरूर सुना होगा ? 1965 के युद्ध के परमवीर चक्र विजेता। जिनकी बहादुरी ने अमेरिकी पैटन्ट टैंको की इज्जत पर वो बट्टा लगाया था तो कभी धुल नही पाया। लोगों में ये कहावत शुरू हो गयी थी की हवलदार अब्दुल हमीद के सामने आने पर अमेरिकी पैटन्ट टैंक गत्ते के डब्बे में बदल जाता है। ये उस समय की बात है जब आप केवल दस साल के थे। और आज उन्ही अब्दुल हमीद का परिवार भुखमरी की हालत में है।
                     मैंने पहले ही कहा की सेना की बहादुरी की कहानिया लिखना मेरी हैसियत से बाहर हैं। मैं तो केवल आपको कुछ उदाहरण दे रहा था।

Saturday, October 8, 2016

सेना सेना चिल्लाना बन्द करो, सैनिकों की सुध लो !


                  पूरी बीजेपी,आरएसएस और मोदी सरकार, जिस चीज का नाम लेकर सबसे ज्यादा चिल्लाती है तो वो है सेना। ये सेना क्या होती है ? मेरे ख्याल से तो ये सैनिकों और साजोसामान से मिलकर बनती है। लगातार सेना सेना चिल्लाने वाले ये लोग बताएंगे की सैनिक और साजो सामान, दोनों मोर्चों का क्या हाल है ?
                    जहां तक सैनिकों का सवाल है, तो भूतपूर्व सैनिक वन रैंक- वन पेंशन की मांग को लेकर अब भी जंतर मन्तर पर बैठे हुए हैं। उन्हें साल से ज्यादा हो गया है। उद्योगपतियों का पांच लाख करोड़ माफ़ कर देने वाली सरकार सैनिकों की पेंसन के सवाल पर संशाधनो का रोना रोती है। मैं उन तस्वीरों को भूल नही पा रहा हूँ जब पिछले 15 अगस्त को इनसे जगह खाली करवाने के लिए इन पर लाठीचार्ज किया गया था। खून टपकते सिरों के साथ खदेड़े गए इन बुजुर्ग सैनिकों की तस्वीरें अब भी आँखों के सामने आती हैं। टीवी चैनलों पर सर्जिकल स्ट्राइक पर तूफान उठाने वाले कुछ भूतपूर्व जनरल और सत्ताधारी पार्टी के नेता इस सवाल पर मुंह में दही जमा लेते हैं।
                     दूसरा उदाहरण लापता हुए AN -32 विमान का है। 29 सैनिकों के साथ लापता हुए इस विमान को ढूंढने के लिए वायुसेना और नोसेना के कितने जहाज काम पर लगाए गए थे ? ये विमान अब तक नही मिला। सरकार ने प्रक्टिकल काम जो इनके लिए किया वो इनको मृत घोषित कर देने भर का था। अगर इसको ढूढना आपके बस का नही था तो उनसे सहायता मांग लेते जिनको सारे सैनिक अड्डे इस्तेमाल करने की ताजा ताजा इजाजत दी है। मलेशिया जैसे छोटे से देश द्वारा अपने लापता विमान को ढूढने के लिए किये गए प्रयास भी आपको कोई रास्ता नही दिखा सके ?
                     तीसरा उदाहरण बिसाहड़ा का है। जहां एक सैनिक के पिता की हत्या करने वाले हत्यारे का शव आपने तिरंगे में लपेट दिया। आपके संस्कृति मंत्री, जो उरी हमले के एक भी शहीद सैनिक के घर श्रधांजलि देने नही गए, वो इस हत्यारे को श्रधांजली देने उसके घर गए, उसके लिए मुआवजे का इंतजाम करवाया और तिरंगा लपेट कर उसे उसी श्रेणी में खड़ा कर आये जिसमें  दुश्मनो से लड़कर शहीद होने वाला सैनिक होता है। क्या आप ये कहना चाहते हैं की हम सैनिकों का सम्मान करते हैं बशर्ते की वो मुसलमान ना हो।
                    अगला उदाहरण उन सैनिकों का है जो छत्तीसगढ़ और दूसरी जगहों पर न्यूनतम सुविधाओं के अभाव में अकाल मौत मर गए। क्या आप बता सकते हैं की पिछले तीन साल में, इस तरह अकाल मौत मरने वाले सैनिकों की संख्या कितनी है और सीमा पर लड़ कर मरने वाले सैनिकों की संख्या कितनी है ?  और इन सैनिकों के परिवारों को आपने क्या सुविधाएँ दी। इस सवाल का जवाब देने में कई मुखोटे उतर सकते हैं।
                    अब साजोसामान के सवाल पर आते हैं। आप एक तरफ कहते हैं की पिछली सरकारों ने कुछ नही किया और दूसरी तरफ कहते हैं की सेना युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार है। इस तैयारी के लिए जो सामान चाहिए उसकी क्या हालत है। ऐसी खबरें आ रही हैं की सेना के पास ज्यादातर सामान 1971 के युद्ध के दौरान का खरीदा  हुआ है। सेना हररोज सामान और हथियारों की कमी का मुद्दा उठाती रही है। सुना है इस सरकार ने सेना के लिए खरीदे जाने वाले हथियारों की खरीद में दलाली को क़ानूनी बना दिया है। ऐसी क्या हालत थी की बिना दलालों के हथियारों की खरीद नही हो सकती। एक राफेल विमान की जो खरीद आपने की है उसके बारे में मीडिया में इस तरह की खबरें हैं की 700 करोड़ का विमान 1600 करोड़ में खरीद गया है और वो भी तब जब राफेल बनाने वाली कम्पनी ने अम्बानी को अपना हिस्सेदार बना लिया है। इन खबरों में अतिशयोक्ति हो सकती है लेकिन कुछ तो सच्चाई भी होगी।
                    इसलिए युद्ध का उन्माद भड़काने से पहले उन चीजों की सम्भाल कीजिये जिनसे मिलकर सेना बनती है।

Thursday, February 25, 2016

सियाचिन के शहीद हनुमंत्थप्पा की मौत के जिम्मेदार

                  पिछले दिनों सियाचिन में एक भयंकर हिम स्खलन की घटना हुई। इस घटना में वहां सुरक्षा चौकी पर तैनात भारतीय सेना के 10 जवान बर्फ के नीचे दब गए। छह दिन बाद जब हमारे देश की रेस्क्यू टीम वहां पहुंची और उन्हें बर्फ के निचे से निकाला तब तक उनमे से 9 की मौत हो चुकी थी और एक लांस नायक हनुमंत्थप्पा कोमा ही हालत में, लेकिन जीवित थे। उन्हें तुरंत दिल्ली लाया गया जहां डाक्टरों के एक दल ने जो तोड़ कोशिश की लेकिन चूँकि वो एक लम्बे समय तक बर्फ के निचे दबे रहे थे इसलिए उनके शरीर के लगभग सभी अंग काम करना बंद कर चुके थे। पुरे देश के लोगों की दुवाएं और डॉक्टरों के प्रयास उन्हें बचा नही पाये। पूरा देश साँस रोके उनके होश में आने का इंतजार कर रहा था लेकिन वो चले गए। वही यह बात भी चर्चा का विषय रही की अगर उन्हें दो तीन दिन पहले निकल लिया गया होता तो शायद उन्हें बचाया जा सकता था। ये अनुमान भी लगाया गया की हो सकता है कोई और जवान भी जीवित निकल आता। लेकिन सियाचिन की वो जगह जहां ये जवान तैनात थे वो इतने दुर्गम  क्षेत्र में है की सारी कोशिशों के बावजूद भी उससे पहले पहुंचना किसी भी हालत में सम्भव नही था। वरना कोई भी सेना अपने जवानो के लिए कोई कस्र बाकी नही रखती।
                     लेकि कल 24 फ़रवरी को एक ऐसी जानकारी सामने आई जिसे सुनकर लोग दंग रह गए। जब लोकसभा में JNU के मामले पर बहस चल रही थी तब उस पर बोलते हुए बीजू जनता दल के सदस्य श्री तथागत सतपथी ने एक चौंकाने वाली बात कही। उन्होंने कहा की जब सियाचिन में ये दुर्घटना घटित हुई तब उससे कुछ ही दुरी पर पाकिस्तान की सेना भी तैनात थी। उसने जब देखा की हिम स्खलन की वजह से भारतीय सेना बर्फ के नीचे दब गयी है तो उसने उनकी सहायता करने के लिए भारत सरकार से अनुमति मांगी। पाकिस्तान की सेना उससे कुछ ही दुरी पर थी जो कुछ मिनटों में नही तो एक दो घंटे में दुर्घटना की जगह पर पहुंच सकती थी। लेकिन भारत सरकार ने इसकी इजाजत नही दी। प्राकृतिक आपदाओं के समय दो देशों की आमने सामने तैनात सेनाएं एक दूसरे की मदद करती रही हैं। अफगानिस्तान और पाकिस्तान में आये भयंकर भूकम्प में जब पाकिस्तानी सेना की एक चौकी तबाह हो गयी थी तब भारतीय सेना ने उसे बचाया था। पुरे पाकिस्तानी मीडिया और सरकार से लेकर जनता तक ने भरतीय सेना की इस कार्यवाही के लिए धन्यवाद दिया था। हमने भी अपनी सेना की इस कार्यवाही पर गर्व का अनुभव किया था। तब क्या कारण था की इतने दुर्गम क्षेत्र में जहां हमारी  सहायता पहुंचना मुश्किल था सरकार ने पाकिस्तानी सेना को अपने सैनिकों की जान बचाने की पेशकश को ठुकरा दिया।
                      अगर उस समय भारत सरकार इसकी इजाजत दे देती तो ना केवल लांस नायक हनुमंत्थप्पा, बल्कि शायद एक दो दूसरे सैनिकों की जान भी बच सकती थी। एक तरफ भारत के प्रधानमंत्री बिना बुलाये नवाज शरीफ के यहां हलवा खाने चले जाते हैं जिसे बीजेपी असामान्य कदम की तरह पेश करते हैं दूसरी तरफ हमारे सैनिकों की जान बचाने का फैसला नही ले पाते।
                       जब लोकसभा में माँननीय सदस्य ने इसका जिक्र किया तो सरकार की तरफ से इसका कोई खंडन नही आया। पूरी बीजेपी को जैसे सांप सूंघ गया।
                     लांस नायक हनुमंत्थप्पा की शहादत के बाद बीजेपी ने अपने आप को सैनिकों और सेना का सबसे बड़ा हितैशी दिखाने की कोशिश की जो वो हमेशा से करते रहे हैं। लेकिन असलियत में उन्हें सेना के जवानो की कितनी फ़िक्र है इस घटना से साफ हो जाता है।