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Thursday, September 14, 2017

बुलेट ट्रैन -- देश को बर्बाद कर देने वाले इस महाविनाशी सपने को रोको।


         
  कल प्रधानमंत्री मोदी और जापान के प्रधानमंत्री सिंजो आबे ने अहमदाबाद में बुलेट ट्रैन का शिलान्यास कर दिया। हालाँकि इस के समर्थन और विरोध में बहुत कुछ कहा जा चुका है, लेकिन ये मामला कितना भयावह और गैरजिम्मेदार है इसका अंदाजा किसी को नहीं है। न तो विरोध करने वालों को है और न ही समर्थन करने वालों को है। इसलिए एक बार इसका हिसाब किताब लगा लिया जाये ये बहुत जरूरी है। वरना नोटबंदी की तरह पछताने के सिवा कुछ हाथ नहीं आएगा।
                  सरकार की तरफ से मीडिया में जो जानकारी दी गयी है उसके अनुसार इस पर 110000 करोड़ डॉलर का खर्च आएगा, जिसमे से 85000 करोड़ डॉलर का कर्ज जापान देगा, जिस पर  0 . 1 % का मामूली  ब्याज देना पड़ेगा। शेष 25000 करोड़ डॉलर का खर्चा भारत सरकार करेगी।
                     अब इसमें दो मुख्य बातें हैं  जिन पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। पहला ये की बुलेट ट्रैन के लिए बनाया गया पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर केवल बुलेट ट्रैन के लिए ही इस्तेमाल हो सकता है। ऐसा नहीं है की उस पर बाकी पटरियों की तरह हर तरह की गाड़ियां चल सकती हैं। दूसरा सवाल ये है की इस ट्रैन में एकबार में करीब 725 यात्री सफर कर सकेंगे। जिस पर अगर अतिउदार और अधिकतम अनुमान भी लगाया जाये तो ये ट्रैन दो राउंड ट्रिप अहमदाबाद और मुंबई के बीच लगा सकती है। अगर सभी सीटों की पूरी बुकिंग भी मान ली जाये ( जो इसके किराय को देखते हुए असम्भव है ) तो ये पूरी कवायद केवल 725 x 4 यानि केवल 2900 लोगों के लिए की जा रही है।
                    अब इस पर होने वाले खर्च में से केवल ब्याज के खर्च का हिसाब ही लगाया जाये तो वो इस तरह है।
                  जापान का कर्ज और ब्याज   85000 करोड़ x 0 . 1 %   = 85 करोड़
                  भारत सरकार का कर्ज   25000 करोड़ x 7 %   =   1750 करोड़       ( मौजूदा बांड वैल्यू के हिसाब से जिसके अनुसार सरकार घरेलू मार्किट, बैंक इत्यादि से अपनी जरूरतों के लिए कर्ज लेती है। )

                                                         कुल ब्याज = 1750 +85  = 1835 करोड़ डॉलर सालाना ,
    यानी   करीब 5 करोड़ डॉलर प्रतिदिन = 5 x 64 ( मौजूदा डॉलर रेट )  320 करोड़ रूपये प्रतिदिन
    इसका मतलब ये  हुआ की  320 करोड़ को 2900 यात्रियों से भाग दिया जाये तो =  11 लाख तीन हजार रूपये।
        यानि प्रति यात्री प्रतिदिन 11 लाख रूपये तो केवल ब्याज का खर्चा होगा। इससे तो अच्छा था की प्रति यात्री के लिए एक चार्टर्ड प्लेन चला देते तो भी इससे कम नुकशान होता।
                       इसलिए मेरी हर नागरिक से अपील है की वो इस विनाशकारी परियोजना का विरोध करे।
                                            

Saturday, December 12, 2015

Comment on News -- बुलेट ट्रेन का सपना और हमारी स्थिति

जापान के साथ बुलेट ट्रेन का जो करार हुआ है उसकी आलोचना करने वालों को टीवी चैनल और उस पर बैठे सरकारी विशेषज्ञ उन्हें विकास और रोजगार का हवाला देकर चुप करवा रहे हैं और ऐसा माहोल बना रहे हैं जैसे बुलेट ट्रेन के आते ही भारत जापान में बदल जायेगा। लेकिन हमारी असली स्थिति क्या है ?
                 रेलवे की हालत बहुत ही खराब है। उसकी पटरियां पुरानी हो चुकी हैं और उसके कई पुलों की उम्र तो निधारित समय से दुगना समय गुजार चुकी है। ट्रेनों के डब्बे पुराने हो चुके हैं और बहुत बार दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं। पिछले दिनों जो रेल दुर्घटना हुई थी वो बगैर गार्ड के फाटक पर जीप के ट्रेन से टकराने की वजह से हुई थी। हमारे देश में अभी भी बिना चौकीदार की बहुत सी रेलवे फाटक हैं। दुर्घटनाओं को रोकने के लिए जो नया सिस्टम है उसको अभी हम सभी जगह नही लगा पा रहे हैं। अभी भी बहुत सी जगह छोटी लाइन है जिसे बड़ी लाइन में बदलना हमारे बजट से बाहर है। रेलवे सुरक्षा के लिए रेलवे सुरक्षा बल में बहुत सी जगह खाली हैं जिन्हे नही भरा जा रहा है। और रेल लाइनो का बिजलीकरण करने में तो हमे बहुत साल लगने वाले हैं।
                  पिछले साल का बजट हमारे रेल बजट के इतिहास का इकलौता ऐसा बजट था जिसमे एक भी नई योजना और एक भी नई ट्रेन की घोषणा नही की गयी थी। इसके लिए ये तर्क दिया गया था की अभी पिछली अधूरी और शुरू नही की गयी योजनाओं में बहुत काम बाकि है। इसलिए पहले उसे पूरा किया जायेगा और उसके बाद नई ट्रेन या योजनाएं घोषित की जाएँगी।
                  अब जब 98000 करोड़ की बुलेट ट्रेन योजना जापान से कर्जा लेकर शुरू की जा रही है तो क्या बाकि सभी योजनाएं पूरी हो चुकी हैं। ये सरकार हमेशा अपनी सुविधा के अनुसार अपने तर्क बदलती रही है। ये योजना अगर पूरी भी हो जाये तो भी इसका किराया इतना महंगा होगा की देश के 95 % लोगों की ओकात के बाहर होगा। अहमदाबाद से मुंबई तक की केवल 540 किलोमीटर की यात्रा के लिए 98000 करोड़ का खर्च एक बड़ा बोझ तो होगा ही साथ में एक क्षेत्रीय असंतुलन भी पैदा करेगा। इसकी लागत और इसकी कलेक्शन के बीच ऐसा ना हो की हर साल एयर इंडिया की तरह बजट से पैसा डालना पड़े।
                    जो लोग इस परियोजना से देश में रोजगार पैदा होने का तर्क दे रहे हैं उनसे मैं केवल इतना पूछना चाहता हूँ की अगर हमारी मौजूदा रेल की व्यवस्था सुधारने के लिए सामान का उत्पादन किया जाता तो क्या उससे रोजगार पैदा नही होता। जापान से कर्ज लेकर काम करना था तो वो उन क्षेत्रों में भी हो सकता था। बल्कि इससे ज्यादा रोजगार पैदा हो सकता था।
                      सपने देखना कोई बुरी बात नही है , लेकिन ओकात के बाहर के और अव्यवहारिक सपने देखना खतरनाक हो सकता है।