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Thursday, September 14, 2017

बुलेट ट्रैन -- देश को बर्बाद कर देने वाले इस महाविनाशी सपने को रोको।


         
  कल प्रधानमंत्री मोदी और जापान के प्रधानमंत्री सिंजो आबे ने अहमदाबाद में बुलेट ट्रैन का शिलान्यास कर दिया। हालाँकि इस के समर्थन और विरोध में बहुत कुछ कहा जा चुका है, लेकिन ये मामला कितना भयावह और गैरजिम्मेदार है इसका अंदाजा किसी को नहीं है। न तो विरोध करने वालों को है और न ही समर्थन करने वालों को है। इसलिए एक बार इसका हिसाब किताब लगा लिया जाये ये बहुत जरूरी है। वरना नोटबंदी की तरह पछताने के सिवा कुछ हाथ नहीं आएगा।
                  सरकार की तरफ से मीडिया में जो जानकारी दी गयी है उसके अनुसार इस पर 110000 करोड़ डॉलर का खर्च आएगा, जिसमे से 85000 करोड़ डॉलर का कर्ज जापान देगा, जिस पर  0 . 1 % का मामूली  ब्याज देना पड़ेगा। शेष 25000 करोड़ डॉलर का खर्चा भारत सरकार करेगी।
                     अब इसमें दो मुख्य बातें हैं  जिन पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। पहला ये की बुलेट ट्रैन के लिए बनाया गया पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर केवल बुलेट ट्रैन के लिए ही इस्तेमाल हो सकता है। ऐसा नहीं है की उस पर बाकी पटरियों की तरह हर तरह की गाड़ियां चल सकती हैं। दूसरा सवाल ये है की इस ट्रैन में एकबार में करीब 725 यात्री सफर कर सकेंगे। जिस पर अगर अतिउदार और अधिकतम अनुमान भी लगाया जाये तो ये ट्रैन दो राउंड ट्रिप अहमदाबाद और मुंबई के बीच लगा सकती है। अगर सभी सीटों की पूरी बुकिंग भी मान ली जाये ( जो इसके किराय को देखते हुए असम्भव है ) तो ये पूरी कवायद केवल 725 x 4 यानि केवल 2900 लोगों के लिए की जा रही है।
                    अब इस पर होने वाले खर्च में से केवल ब्याज के खर्च का हिसाब ही लगाया जाये तो वो इस तरह है।
                  जापान का कर्ज और ब्याज   85000 करोड़ x 0 . 1 %   = 85 करोड़
                  भारत सरकार का कर्ज   25000 करोड़ x 7 %   =   1750 करोड़       ( मौजूदा बांड वैल्यू के हिसाब से जिसके अनुसार सरकार घरेलू मार्किट, बैंक इत्यादि से अपनी जरूरतों के लिए कर्ज लेती है। )

                                                         कुल ब्याज = 1750 +85  = 1835 करोड़ डॉलर सालाना ,
    यानी   करीब 5 करोड़ डॉलर प्रतिदिन = 5 x 64 ( मौजूदा डॉलर रेट )  320 करोड़ रूपये प्रतिदिन
    इसका मतलब ये  हुआ की  320 करोड़ को 2900 यात्रियों से भाग दिया जाये तो =  11 लाख तीन हजार रूपये।
        यानि प्रति यात्री प्रतिदिन 11 लाख रूपये तो केवल ब्याज का खर्चा होगा। इससे तो अच्छा था की प्रति यात्री के लिए एक चार्टर्ड प्लेन चला देते तो भी इससे कम नुकशान होता।
                       इसलिए मेरी हर नागरिक से अपील है की वो इस विनाशकारी परियोजना का विरोध करे।
                                            

Saturday, July 29, 2017

नितीश कुमार और आकाश में घूमती हुई अंतरआत्माएँ

                 भारत के आकाश में बहुत सी  अंतरआत्माएँ घूम रही थी। अलग अलग वेशभूषायें और अलग अलग अंदाज में। अचानक दो  अंतरआत्माएँ आमने सामने आ गयी। एक अंतरात्मा नई नवेली दुल्हन के वेश में थी और दूसरी अंतरात्मा विधवा के वेश में थी। दुल्हन के वेश वाली अंतरात्मा को अपने सामने अचानक आ गयी विधवा को देखकर अच्छा नहीं लगा। वह उस पर जोर से चिल्लाई, ' दिखाई नहीं देता, क्या टककर मारने का इरादा है। "
               "माफ़ करना बहन, मन दुखी था इसलिए ध्यान नहीं रहा। वैसे तुम कौन हो, पहले तो तुम्हे कभी देखा नहीं ?" विधवा अंतरात्मा ने पूछा।
                " मैं नितीश कुमार की अंतरात्मा हूँ, अभी दो दिन पहले ही हमारी शादी हुई है बिहार के हित  में। " दुल्हन अंतरात्मा ने इतराते  जवाब दिया।
                  विधवा अंतरात्मा के होठों पर एक हल्की सी मुस्कान आयी। बोली,' जाओ बहन, मैं तो तुम्हे सदासुहागण रहने का आशीर्वाद भी नहीं दे सकती। "
                  दुल्हन अंतरात्मा अचानक पलटी। उसने विधवा अंतरात्मा के कंधे पर हाथ रखकर कहा, " तुमने ऐसा क्यों कहा और तुम हो कौन ? "
                 " मैं भी नितीश कुमार की अंतरात्मा ही हूँ। अभी बीस महीने पहले हमारी शादी हुई थी। फेरों के वक्त नितीश कुमार ने मुझे वचन दिया था की मिटटी में मिल जायेंगे लेकिन बीजेपी के साथ नहीं जायेंगे। अभी कुछ दिन पहले तक भी वो संघमुक्त भारत बनाने के लिए घर से निकले थे और थोड़ी देर के बाद कुछ रोती हुई अंतरआत्मायें मेरे घर आयी और मुझे बताया की मैं विधवा गयी। " उसकी आँखों से आँसू टपकने लगे।
                 दुल्हन अंतरात्मा गंभीर हो गयी। उसे अपनी शादी की क्षणभंगुरता साफ नजर आने लगी। वो दोनों साथ साथ चलती हुई थोड़ी ही आगे गयी थी की बदबू का एक जोरदार झोंका आया और सामने बहुत सी अन्तरात्माओं की लाशे बिखरी हुई थी। वह सहम गयी और उसने विधवा अंतरात्मा की तरफ देखा।
                     विधवा अंतरात्मा ने नाक  पर रुमाल रखते हुए कहा ," ये उन बिहारियों और देश के अलग अलग हिस्सों के उन लोगों की अंतरआत्मायें हैं जिन्होंने बीजेपी को हराने के लिए नितीश कुमार का समर्थन किया था। दो दिन पहले अचानक सुनामी आयी और ये बेमौत मारी गयी। "
                   " तो इनका अंतिम संस्कार क्यों नहीं कर देते ?" दुल्हन अंतरात्मा ने पूछा।
                    " जगह कहां है ? सारे श्मशान और कब्रिस्तान पहले ही मीडिया की अन्तरात्माओं से भरे हुए हैं। " विधवा अंतरात्मा ने अफ़सोस जताया।
                       अचानक एक तरफ से अन्तरात्माओं का एक झुण्ड रोता बिलखता हुआ आता दिखाई दिया।  दोनों उस तरफ देखने लगी। जब वो पास आयी तो उनसे पूछा की तुम कौन हो और रो क्यों रही हो ?
                      उन अन्तरात्माओं ने रोते रोते कहा, " हम गुजरात के कुछ नेताओं की अंतरआत्मायें हैं। पहले हमे ऊना कांड पर और साम्प्रदायिकता पर रोने को कहा गया था। हम वहां रो ही रही थी की अचानक संदेश आया की रोना बंद करो और मंगलगान गाओ। भला ऐसा भी कभी होता है ? हमे कपड़े बदलने तक का मौका नहीं दिया। हमारे पतियों ने ये कहकर की कांग्रेस बीजेपी को हराने के लिए कुछ नहीं कर रही है बीजेपी की सदस्य्ता ले ली। आदमी ऐसा कैसे कर सकता है। इस तरह हम एक  साथ विधवा हो गयी।  हम तो कहती हैं की भगवान किसी अंतरात्मा की शादी किसी नेता से ना करवाए।"
                     अचानक दुल्हन अंतरात्मा ने अपने सारे जेवर उतार कर फेंक दिए। माथे का सिंदूर पोंछ दिया और घूमकर विधवा अंतरात्मा से बोली, " माफ़ करना दीदी, नितीश कुमार ने मिटटी में मिलने की शर्त पूरी कर दी। अब उस आदमी के अंदर इतनी जगह ही नहीं बची है की कोई अंतरात्मा उसके अंदर रह सके। इसलिए मैं उससे तलाक ले रही हूँ। दो दिन बाद विधवा होने से अच्छा है की तलाक ले लूँ। " और वो एक तरफ चली गयी। बाकि की अंतरआत्मायें उसे जाते हुए देखती रही।

Saturday, April 15, 2017

व्यंग -- भारत में रोड शो का राजनैतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और ऐतिहासिक महत्व।

                  भारत में आजकल राजनीती में रोड शो का बहुत महत्व है। सही तरीके से कहा जाये तो कुछ लोगों की तो राजनीती चल ही रोड शो के कारण रही है। वैसे रोड शो सबसे आसान काम होता है। इसमें आपको केवल खड़े होकर हाथ हिलाना होता है। राजनीती में आने वाले ज्यादातर लोग वो होते हैं जिन्हे स्कूल में हाथ ऊपर करके खड़े रहने का खासा अभ्यास होता है। इसमें आयोजकों को भी आसानी रहती है। लोग अगर कम हों तो पहले वाले लोगों को आगे पहुंचाया जा सकता है। बाकी तो बस हाथ हिलाना है। न किसी मुद्दे पर अपनी राय स्पष्ट करनी होती है और न किसी सवाल का जवाब देना होता है। आप हाथ हिलाकर चले जाइये, बाकी का काम मीडिया कर देगा।
                  वैसे रोड शो का मतलब होता है रोड के ऊपर शो करना, या फिर रोड को ही शो करना। अभी उत्तर प्रदेश के चुनाव में अखिलेश एक तरफ रोड के ऊपर शो कर रहे थे और दूसरी तरफ आगरा लखनऊ एक्सप्रेस वे नाम के रोड को शो कर रहे थे। अब हमारे प्रधानमंत्री लगभग हररोज रोड के ऊपर शो करते रहते हैं। अगर वो दो चार दिन रोड शो न करें तो उनके हाथ में दर्द होने लगता है।
                   रोड के ऊपर होने वाले शो भी अलग अलग तरह से होने लगे हैं। कुछ दिन पहले तमिलनाडु के किसानो ने ठीक प्रधानमंत्री कार्यालय के सामने सारे कपड़े उतार कर शो कर दिया। परन्तु प्रधानमंत्री और उनकी सरकार को ये शो पसंद नहीं आया इसलिए उनके शो को कोई देखने नहीं आया। इस तरह के शो पिछले दिनों सड़कों पर बहुत हुए हैं। जैसे कहीं किसान सड़क पर सब्जी डाल रहे हैं, कहीं दूध बिखेर रहे हैं। लेकिन किसानो के रोड शो भी कोई शो होते हैं ? मुझे लगता है किसी दिन किसान इकट्ठे होकर रोड पर सरकार  के कपड़े उतारने का शो न कर दें।
                     लेकिन जिस तरह के प्रभावशाली शो करने की महारत हमारी पुलिस को है उसका कोई सानी नहीं है। उसका मुकाबला केवल सेना ही कर सकती है। अभी हाल ही में हमारी सेना ने कश्मीर में एक आदमी को जीप के आगे बांधकर बहुत ही कामयाब शो किया था। इस शो के बाद पूरी दुनिया को हमारी कश्मीर नीति की गहराई समझ में आ गयी। जो चीज दुनिया को पाकिस्तान लगातार गला फाड़कर नहीं समझा पा रहा था वो हमारी सेना के एक रोड शो ने समझा दिया। जबसे हमारे प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी ने इसराइल को अपना सबसे भरोसेमंद साथी घोषित किया है, हमारी सेना उसके विडिओ देखकर रणनीति बना रही है। कुछ दिन बाद दुनिया को ये फर्क करना मुश्किल हो जायेगा की अमुक रोड शो कश्मीर का है या फिलिस्तीन का।
                         हमारे यहां कुछ सांस्कृतिक किस्म के रोड शो भी होते हैं। इस तरह के रोड शो अभी योगी जी के आशीर्वाद से उत्तर प्रदेश की सड़कों पर हो रहे हैं। जिसमे कुछ ऐसे लोग, जिन्हे कोई शरीफ आदमी घर के अंदर बैठाना भी खतरनाक समझता है, मिलकर आजकल बेटियों को बचा रहे हैं। ये लड़कियों को गालियां देते हैं, उनके साथ रोड पर मारपीट करते हैं ताकि उन्हें बचाया जा सके। एक दो बार पिट जाएँगी तो अपने आप घर से बाहर निकलना बंद कर देंगी। ये एक आजमाया हुआ और कामयाब तरीका है जो इन्होने तालिबान से लिया है। तालिबान के साथ इनके वैचारिक और सांस्कृतिक संबंध हैं सो उसके आजमाए हुए तरीकों का इस्तेमाल करना इनका हक बनता है।

Tuesday, October 25, 2016

मुल्ला नसीरूदीन और भारतीय राजनीति

           
                मुल्ला नसीरूदीन की एक पुरानी कहानी है जो आज के राजनैतिक हालात पर एकदम फिट बैठती है। बात इस तरह है की मुल्ला नसीरूदीन अपने पडौस के राज्य में व्यापार करने जाते थे। एक बार उस राज्य के राजा ने दूसरे राज्यों से आने वाले कुछ सामान पर प्रतिबन्ध लगा दिया। और उस प्रतिबन्ध को लागु करने के लिए बड़ी मात्रा में सैनिको को राज्य के दरवाजे पर तैनात कर दिया। सैनिक पूरी ईमानदारी और मेहनत से बाहर से आने वाले व्यापारियों की तलाशी लेते की कहीं कोई प्रतिबन्धित वस्तु तो लेकर नही जा रहा। उन्हें मुल्ला नसीरूदीन पर पूरा शक था इसलिए उसके साथ वो अतिरिक्त सतर्कता से पेश आते। मुल्ला नसीरूदीन हररोज अपने गधों पर घास के बड़े बड़े गटठर लाद कर आते। सैनिक उनके गटठर खोल कर पूरी सतर्कता से तलाशी लेते लेकिन उन्हें कुछ नही मिलता। इस तरह काफी समय बीत गया। इस दौरान व्यापार से मुल्ला नसीरूदीन ने काफी पैसा कमाया। सैनिक हैरान थे। वो अच्छी तरह तलाशी लेते थे लेकिन उसकी घास में उन्हें कभी कुछ नही मिला। वो सोच रहे थे की आखिर मुल्ला नसीरूदीन इतना पैसा कैसे बना रहे हैं।
                   एक दिन वहां के दरोगा ने मुल्ला नसीरूदीन को कोई भी कार्यवाही ना करने और उन्हें आने जाने की पूरी छूट देने का भरोसा दिलाते हुए उससे पूछा की वो घास के गटठर में क्या छुपा कर ले जाते हैं ?
                   मुल्ला ने हंसते हुए बताया की वो घास का नही बल्कि गधों का व्यापार करते हैं। सैनिक घास की तलाशी में लगे रहते हैं और वो हररोज अपने साथ लाये गए गधे बेच कर वापिस आ जाता है।
                      यही हाल हमारी राजनीति का हो गया है। पूंजीपति वर्ग अपने गधे बेच रहा है और हम घास की तलाशी में लगे हुए हैं। सरकार ने सरकारी कम्पनियां बेच दी, किसानों और आदिवासियों की जमीने पूजीपतियों को थमा दी, रक्षा सौदों में दलाली को क़ानूनी कर दिया, बैंको का पैसा धन्ना सेठों को देकर माफ़ कर दिया और हम बीफ पर, तीन तलाक पर, सर्जिकल स्ट्राइक पर, समान सिविल कोड पर और राम मन्दिर पर बहस कर रहे हैं। हमे ये दिखाई ही नही देता की इन सब की आड़ में पूंजीपति वर्ग अपने गधे बेच रहा है और आराम से है।

Monday, October 24, 2016

राजनितिक मिलीभगत और सत्ता के दुरूपयोग के प्रतीक - अनुराग ठाकुर

photo of anurag thakur and rajiv shukla sitting and talking

                जब से क्रिकेट में सट्टे बाजी को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने लोढ़ा कमेटी का गठन किया है, तब से पुरे देश की आँखें फ़टी रह गयी हैं। रोज रोज जो नए नए रहस्योद्घाटन हो रहे हैं उनसे BCCI के रुतबे, उसके पदाधिकारियों की राजनीती से ऊपर उठ कर मिलीभगत और सत्ता के दुरूपयोग के जो किस्से बाहर आ रहे हैं वो किसी परीलोक से कम नही हैं। हजारों करोड़ की सट्टेबाजी, खिलाडियों की खरीद फरोख्त, खेल के नाम पर किये जाने वाले कुकर्म, और करोड़ों के वारे न्यारे करने की तरकीबें देख कर लोग अचंभित हैं। जो राजनैतिक दल किसी भी मामले पर एकमत नही होते, जो एक दूसरे के खिलाफ खोद खोद कर व्यक्तिक आरोप ढूढंते हैं, वो लोग कैसे BCCI में जाते ही पक्के रिस्तेदार हो जाते हैं।
                   खैर, हम ठाकुर की बात कर रहे थे। अनुराग ठाकुर हिमाचल प्रदेश के बीजेपी के नेता हैं। हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री श्री प्रेम कुमार धूमल के सुपुत्र हैं और बीजेपी की युवा शाखा के राष्ट्रिय अध्यक्ष रह चुके हैं। वर्तमान में हिमाचल से ही बीजेपी के लोकसभा के सांसद हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जब राजनीतिकों और सरकारी अफसरों पर BCCI का पदाधिकारी बनने पर रोक लगाई तो अनुराग ठाकुर पर भी तलवार लटकने लगी। उसके बाद कहा गया की अनुराग ठाकुर खिलाडी कोटे से आये हैं। जब इसकी पूरी तफ्सील में जाया गया तो ये बात सामने आयी। -
                  जब श्रीमान धूमल जी हिमाचल के मुख्यमंत्री थे तो अनुराग ठाकुर को क्रिकेट की संस्थान में शामिल करने के लिए बहुत ही भारी तिकड़म की गयी।  चूँकि क्रिकेट की सलेक्शन कमेटी में शामिल होने के लिए किसी भी राष्ट्रिय स्तर की प्रतियोगिता में खेला हुआ खिलाडी होने की शर्त है, इसलिए एक दिन अचानक अनुराग ठाकुर को रणजी ट्रॉफी की हिमाचल की टीम का कप्तान बना दिया गया। उसका जम्मू-कश्मीर के खिलाफ मैच हुआ तो जनाब ठाकुर जीरो पर आउट हो गए। वो सात मिनट क्रीज पर रहे। और उन्हें राष्ट्रिय स्तर पर क्रिकेट खेलने का सर्टिफिकेट मिल गया। उससे पहले अनुराग ठाकुर किसी जिला स्तर की टीम में भी नही रहे। उसके पहले या बाद में उन्होंने कोई मैच नही खेला। इस तरह उनका हिमाचल क्रिकेट एसोसिएसन की सिलेक्शन कमेटी शामिल होने और उसके बाद BCCI  पदाधिकारी बनने का रास्ता साफ हो गया। इसके लिए कई बार नियमो को बदला गया। बाद में उनको हिमाचल में क्रिकेट अकेडमी बनाने के नाम पर करोड़ों की जमीन फ्री में दे दी गयी।
इसके बारे में पूरी कहानी नेट पर उपलब्ध है। http://www.dnaindia.com/sport/report-the-curious-case-of-anurag-thakur-the-cricketer-2185336  

             उसके बाद से अनुराग ठाकुर बखूबी BCCI को सम्भाल रहे हैं। कांग्रेस और एनसीपी समेत कई पार्टियों के नेता उनके सहयोगी हैं। किसी भी राजनितिक पार्टी ने उनके खिलाफ कोई प्रभावी जाँच की माँग नही की। संसद में अनुराग ठाकुर राबर्ट वाड्रा के खिलाफ जहर उगलते हैं, कांग्रेस और बीजेपी के सांसद दूसरे को कोसते हैं , लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट अनुराग ठाकुर सवाल उठाता है तो वकील के रूप में कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल उनका  बचाव करते हैं। अब कुछ लोग इसे वकील के पेशे से जुडी जिम्मेदारी और दोनों चीजों को अलग करने की बात करेंगे, परन्तु जब नलिनी चिदम्बरम का मामला होता है तो ये बात नही होती और एथिक्स की बात की जाती है। सबको मालूम है की ये तुम भी खाओ, हमे भी खाने दो का मामला है। पहले भी एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल की बेटी को कान्ट्रेक्ट का मामला सामने आया था। इसलिए BCCI सत्ता के दुरूपयोग और राजनैतिक मिलीभगत का संस्थान बन गया है और अनुराग ठाकुर उसके सही प्रतीक हैं।
                   इसके साथ ये बात भी ध्यान रखने की है की वो बीजेपी के नेता है जो भृष्टाचार के नाम पर दूसरों को पानी पी पी कर कोसती है।  

Tuesday, October 11, 2016

ये सेना नही, सत्ता है जो हत्याएं करती है

                एक सैनिक हत्यारा नही होता। एक हत्यारे को सेना की सर्विस में नही रखा जाता। लेकिन सत्ता जो हत्याएं करती है, वो उसकी जवाबदेही के समय सैनिक की तरफ ऊँगली करती है।
                 एक सैनिक जब सेना में जाता है तो उसे इस बात का अच्छी तरह पता होता है की उसे सर्वोच्च बलिदान देना है। वो जब अपने देश की रक्षा करता है तब भी वो हत्याएं नही करता, युद्ध में भी नही। वो अपनी मातृभूमि की रक्षा करता है और इसके लिए उसे विरोधी से मुकाबला करना होता है जान की बाजी लगाकर। और इसमें या तो उसकी जान चली जाती है या फिर विरोधी की। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध के भी नियम निर्धारित हैं। कोई सैनिक गिरफ्तार हो जाता है तो उसके साथ मानवीय व्यवहार होना चाहिए। दुश्मन देश के सैनिक का मृत्यु के बाद सिर या कोई अंग काटना युद्ध अपराध की श्रेणी में आता है। लेकिन अब तो सरकार की पार्टी के लोग हर रोज सिर लेकर आने की मांग करते हैं। दोनों तरफ से इसके लिए उन्माद पैदा किया जाता है। इस उन्माद में बहकर कोई सैनिक इस तरह की हरकत कर भी देता है और फिर जवाब और प्रति जवाब का सिलसिला शुरू हो जाता है। एक देशभक्त और जान देने को तैयार सैनिक को हत्यारे में बदलने की मुहीम चलती है।
                 जब एक सैनिक राजनैतिक नेतृत्व के फैसले के अनुसार किसी मिशन पर होता है तो उसकी जिम्मेदारी उस नेतृत्व की होती है। सैनिक को तो उस मिशन के सही या गलत होने पर सवाल उठाने का हक भी नही होता। इसलिए सेना द्वारा किये गए हर काम के लिए राजनैतिक नेतृत्व को जिम्मेदार माना जाता है। इसके कई सारे उदाहरण हैं। जब अंग्रेज हिंदुस्तान पर शासन करते थे तब वो ब्रिटेन से सेना लेकर नही आये थे। उनकी सेना में भरतीय सैनिक थे जो अंग्रेजों के कहने पर हिंदुस्तानियों पर गोली चलाते थे। लेकिन आजादी के बाद भी उन्हें कभी दुश्मन या गद्दार नही माना गया। क्योंकि उन फैसलों के लिए वो जिम्मेदार नही थे।
                    लेकिन अब अजीब सवाल खड़ा हो गया है। राजनैतिक नेतृत्व फैसला लेकर किसी इलाके की जनता पर दमन करता है और जब उसकी ज्यादतियों पर सवाल उठता है तो सेना के पीछे छुप जाता है। सैनिकों को जिम्मेदार बताता है। भारत में भी लगभग हर हिस्से में जमीन के लिए संघर्ष चल रहे हैं। चाहे झारखण्ड हो, छत्तीसगढ़ हो या फिर कश्मीर हो, हर जगह सेना सड़क पर है। सरकार को उद्योगपतियों के लिए जमीन चाहिए, जो लोग देने को तैयार नही। उसे खाली कराने की लड़ाई जारी है । सेना जबरदस्ती लोगों से जमीन खाली करवा रही है। लेकिन वो वहां अपने लिए कुछ नही कर रही है। उसी तरह जब वहां के किसान या आदिवासी सेना का विरोध करते हैं तो कई बार उसमे सैनिको की जान भी चली जाती है। तब सरकार चिल्लाती है की देखो ये सेना और सैनिकों के दुश्मन हैं। सरकार जिनके लिए जमीन खाली करवा रही है उन मालिकों का मीडिया भी सरकार के सुर में सुर मिलाता है और लोगों को देशद्रोही करार दे देता है। एक पूरा प्रचार तन्त्र काम करता है। कई बार सैनिक भी वहां के लोगों को सरकार की बजाए अपना विरोधी मान लेते हैं।
                      ये उन्माद सरकारों की मदद करता है। लोगों की समस्याओं को हल करने में विफल सरकारें इस उन्माद की आड़ में सभी सवालों से बच जाती हैं और लोगों से उनका सब कुछ छीन लेती हैं। जो लोग सरकार में होते हैं, जो जिस वर्ग के प्रतिनिधि होते हैं उसके लिए ही काम करते हैं। सेना के प्रतिनिधियों के रूप में टीवी चैनलों पर बैठने वाले कितने ही लोग किसी ऐसे संगठन के सदस्य होते हैं जहां से उन्हें लगातार फायदा मिलता है। उद्योगपति और सरकार मिलकर उनके लिए इसका प्रबन्ध करते हैं। टीवी चैनलों के मालिक यही उद्योगपति होते हैं। वो केवल अपने मुताबिक खबरें देते हैं। कोई ईमानदार पत्रकार अगर इनकी मर्जी से काम नही करता है तो या तो उसे धमका दिया जाता है या बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।
                      सेना के हितैषी होने का दावा करने वाले इन राष्ट्रवादियों और सरकारों की पोल उस समय खुल जाती है जब सैनिको के लिए सुविधाओं का सवाल आता है। उनको जो वेतन दिया जाता है उससे केवल जिन्दा रहा जा सकता है। आज भी हमारे भूतपूर्व सैनिक पेन्सन की मांग को लेकर महीनों से धरने पर बैठे हैं। अब ये खबर आयी है की घायल होने वाले सैनिकों की पेन्सन को घटाकर आधा कर दिया गया है। एक बार आप सैनिक सेवा के लायक नही रहे फिर आपकी कोई जरूरत नही है। भाड़ में जाओ।
                       इसलिए लोगों और सैनिकों, दोनों का फर्ज है की वो राजनैतिक नेतृत्व यानि सरकार को फैसलों की जिम्मेदारी लेने के लिए मजबूर करें। सरकार को सैनिकों के पीछे छिपने नही दें।

Wednesday, April 27, 2016

अगुस्ता हैलीकॉप्टर --बीजेपी की इच्छा केवल राजनीती करने की है जाँच करने की नहीं।

           अगुस्ता हैलीकॉप्टर घोटाले में इटली की अदालत का फैसला आने के बाद बीजेपी ने फिर से कांग्रेस पर हमला बोल दिया है। राजनीती में घोटालों का पर्दाफाश करना पार्टियों का दायित्व होता है। लेकिन कई बार यही चीज शुद्ध राजनितिक दावपेंच का माध्यम बन जाती है। कांग्रेस ने इसके जवाब में अन्य बातों के साथ ये भी पूछा है की दो साल से सारी जाँच एजेंसियां केंद्र सरकार के पास हैं, तो उसने इस मामले की जाँच अब तक पूरी क्यों नहीं की ?
              बाबरी मस्जिद के गिराए जाने के बाद बीजेपी और आरएसएस को ये बात समझ में आ गई की मामलो को निपटाना उनके लिए खतरनाक हो सकता है। उससे पहले रामजन्मभूमि - बाबरी मस्जिद मुद्दा बीजेपी के लिए एक प्रमुख और लाभदायक मुद्दा रहा था। लेकिन जैसे ही बाबरी मस्जिद गिराई गई तब से स्थिति बदल गई। अब ये मुद्दा बीजेपी के गले की हड्डी बन गया है। अब जवाब देने की बारी बीजेपी की है। अब हर चुनाव में पहले तो बीजेपी को ये राग अलापना पड़ता है की राम मंदिर हमारे लिए  कभी भी चुनावी मुद्दा नहीं था। उसके बाद अपने कार्यकर्ताओं को समझाते हुए पहले वो लोकसभा में बहुमत ना होने का बहाना करती थी अब राज्य सभा में बहुमत का बहाना करती है। मान लो कभी ऐसा भी हो जाये की उसका राज्य सभा में भी बहुमत हो जाये   तो वो दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत का बहाना करेगी। उसके बाद अदालत को जिम्मेदार बताएगी।
               इसलिए बीजेपी को ये बात समझ में आ गई है की मसलों को लटकाना ही समझदारी है। आप चुनाव से पहले के केवल भृष्टाचार से जुड़े मुद्दों की बात कर लो तो उनकी लिस्ट इस प्रकार है।
१.  हमारी सरकार आते ही 100 दिन में विदेशों का काला  धन भारत आ जायेगा।
२   हमारी सरकार आते ही विदेशो में कालेधन के मालिकों के नाम सार्वजनिक कर दिए जायेंगे।
३.  हमारी सरकार आते ही राबर्ट वाड्रा जेल में होंगे और किसानों की जमीन वापिस ले ली जाएगी।
४.  सेना से जुडी हुई खरीद के तमाम सौदों की जाँच तुरंत खत्म करके उनके जिम्मेदार लोगों को सजा दी जाएगी।
५.  बंगाल के शारदा चिटफंड घोटाले की जाँच करके तुरंत गरीबों को उनका पैसा दिलवा दिया जायेगा।
                 लेकिन ऊपर की लिस्ट में से कौनसा काम हुआ। एक भी नहीं। क्योंकि बीजेपी को मालूम है की जिसकी जाँच पूरी हुई वो मुद्दा समाप्त। इसलिए उसका मकसद जाँच को लटकाना है। ऐसा नहीं है की कुछ जाँच सरकार की मर्जी के खिलाफ धीमी चल रही हैं। सरकार ने भृष्टाचार के मामले में एकदम एक तरफा रुख अपनाया है। एक  तरफ वो विपक्षी नेताओं के खिलाफ जाँच को लटकाए रखना चाहती है ताकि उनका चुनाव में प्रयोग किया जाये या गठबंधन के लिए दबाव डाला जाये। बिहार चुनाव में मुलायम सिंह का रुख सबने देखा था और सीबीआई का इस्तेमाल भी सबने देखा था।
                दूसरी तरफ उसने ये रुख अपनाया है की उसके लोगों और सरकारों के खिलाफ कितने ही मजबूत आरोप क्यों न हों वो एक भी आरोप की जाँच स्वीकार नहीं करेगी और पूरी दुनिया में ये कोरस गाती रहेगी की उसके ऊपर एक भी दाग नहीं है। साथ ही वो भृष्टाचार की जाँच करने वाले संवैधानिक संस्थाओं को भी काम नहीं करने देगी। इसलिए उसने दो साल होने के बावजूद ना तो लोकपाल की नियुक्ति की और ना ही CVC और CIC की। मोदीजी जब गुजरात के मुख्य्मंत्री थे तब भी उन्होंने 12 साल तक गुजरात में लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं होने दी थी। ये भृष्टाचार मुक्त सरकार का मोदी मॉडल है।

Thursday, March 17, 2016

Vyang -- राजनीती का दूसरा पाठ -- गंगा गए तो गंगाराम, जमना गए तो जमनादास।

                 भक्तो- आज राजनीती का दूसरा पाठ सिखाया जायेगा। वैसे तो तुम इतने काबिल हो की बिना सिखाये भी तुम ऐसा ही करते हो। वरना संघ की पाठशाला में दाखिला ही नही मिलता। भक्तो, राजनीती में कभी भी अपनी जबान पर स्थिर नही होना चाहिए। ये मुहावरा याद रखो की जुबान तो होती ही पलटी मारने के लिए है। जो व्यक्ति जुबान नही बदल सकता वह राजनीती के काबिल नही है। और बाकि किसी राजनीती के काबिल हो या ना हो, संघ की राजनीती के तो बिलकुल काबिल नही है। इसलिए हमेशा एक बात याद रखो की गंगा गए तो गंगाराम और जमना गए तो जमनादास। जगह और लोग देखकर अपने सुर बदल दो। जैसे-
                 अभी केंद्र में हमारी सरकार है , पंजाब में भी हमारी सरकार है और हरियाणा में भी हमारी सरकार है। हरियाणा और पंजाब का पानी पर विवाद है। लेकिन एक अच्छे नेता की तरह जब हम पंजाब में जाते हैं तो कहते हैं की हरियाणा को एक बून्द पानी नही देंगे। जब हम हरियाणा में जाते हैं तो कहते हैं की पानी पर हरियाणा का हक है और लेकर रहेंगे। हमने पंजाब के लोगों को दिखाने के लिए विधानसभा में प्रस्ताव पास करवा दिया और अब हरियाणा की हमारी सरकार को कहा है की वो कोर्ट में जाये। मामला केंद्र में पहुंचेगा तो हम कहेंगे की ये संवेदनशील मुद्दा है और इस पर दोनों पक्षों को सयम बरतना चाहिए। साथ ही ये भी कहेंगे की ये विवाद कांग्रेस की देंन है। अगर उसने ये विवाद पहले ही निपटा दिया होता तो हमे ये झंझट नही झेलना पड़ता।
              दूसरा उदाहरण देखो। हमने हरियाणा में जाटों को आरक्षण देने का वायदा किया। उसके बाद हमेशा की तरह मुंहढ़ँककर सो गए। जब वहां आंदोलन शुरू हुआ तो सारे प्रशासन और पुलिस  लेकर गंगास्नान को निकल गए। पीछे से हमारे नेता  कार्यकर्ता जाटों को सहयोग करते रहे आरक्षण के लिए। और दूसरे नेता कार्यकर्ता गैर जाटों को भड़काते रहे आरक्षण के खिलाफ। जब हालात ज्यादा खराब हो गए तो इसे विपक्ष की साजिश करार दे दिया। अब भी हम जाटों को पुरे आरक्षण का वादा कर रहे हैं और गैर जाटों को पूरा मुआवजा देने का वादा कर रहे हैं। आहिस्ता आहिस्ता दोनों हमे अपने अपने पक्ष में समझेंगे।
                इसलिए मौका देखकर रंग बदलने की आदत डालो। इसके लिए गिरगिट के मांस के लड्डू खाए जा सकते हैं उससे रंग बदलने की गति बढ़ेगी।
                 इस पर एक छात्र ने पूछा , " गुरूजी, गिरगिट तो जहां जाता है, वहां जाकर रंग बदलता है। लेकिन हमे तो जहां जाना होता है वहां रंग बदलकर जाना होता है। "
                  " अति उत्तम ! वत्स, क्या काम करते हो। " गुरूजी प्रभावित हुए।
                  " जी गुरूजी , मेरी चाय की दुकान है। " शिष्य ने कहा।
                  " तुम में प्रधानमंत्री के पद तक जाने की योग्यता दिखाई दे रही है। " इसी तरह मेहनत करते रहो।
                 अब मैं इस बात को और सरल करूंगा ताकि मंदबुद्धि विद्यार्थी भी इसे समझ सकें। हम JNU में जिन चीजों को देशद्रोह बता रहे हैं उन्हें कश्मीर में नही बता रहे। बल्कि वहां तो हम उन्हें देशहित में बता रहे हैं। जिन चीजों को हम विपक्ष में रहते हुए लोकतंत्र का हिस्सा बताते थे उन्हें सरकार में आने के बाद देश और विकास विरोधी बता रहे हैं। ऐसे असंख्य उदाहरण हैं। तेजस्वी विद्यार्थी उन्हें देख पाएंगे।
                     ये राजनीती का बेशकीमती गुण है। इसे पहले बताये गए वायदा करके भूल जाने के गुण के साथ  मिलाकर प्रयोग किया जाये तो ये रामबाण है। दुनिया का कोई भी मतदाता इसके प्रहार से बच नही सकता। ये जी जनता होती है, ये बड़ी ही वाहियात किस्म की चीज होती है। इस पर बिलकुल भरोसा मत करो। उसे हमेशा उसके अनुरूप रंग दिखलाते रहो। यही एक कामयाब राजनेता की पहचान है। ऐसा कोनसा काम ( पाप ) है जिसका हम विपक्ष में रहते विरोध करते थे और सत्ता में आने के बाद हमने नही किया ? कुछ लोग इसे धोखाधड़ी और वादा खिलाफी कहते हैं लेकिन हम इसे राजनीती कहते हैं।
                             अगला पाठ  कल।

Thursday, March 10, 2016

Vyang -- ( पहला पाठ )-- राजनीती का ब्रह्मास्त्र होता है वायदा।

                 कल हमने जिस आरएसएस राजनैतिक विश्वविद्यालय के बारे में बताया था उसमे अब क्लास शुरू हो गयी हैं। हम आपको इन क्लासों का सीधा प्रसारण बताएंगे। उसकी पहली क़िस्त -
                 अध्यापक ने क्लास में आकर पहला पाठ शुरू किया। जिसका विषय था। वायदे।
                उसने बोलना शुरू किया , " वायदा राजनीती का ब्रह्मास्त्र होता है। सभी विजेता इसी ब्रह्मास्त्र से जनता को पराजित करते हैं। विरोधी तो अपने आप परास्त हो जाते हैं। असली निशाना होती है जनता। चुनाव का पूरा तानाबाना इसी जनता के खिलाफ बुना जाता है। इसमें वायदा सबसे बड़ा अस्त्र है।
                 वायदा करने में किसी भी प्रकार का संकोच नही करना चाहिए। वायदा करने से पहले ये सोचना की उसे पूरा किया जा सकता है या नही, ये मूर्खों का काम है। वायदे का इस बात से कोई संबंध नही होता की उसे पूरा करना है। चुनाव में किये गए वायदों को पूरा करने की बात तो जनता भी नही सोचती फिर नेता को इतना सोचने की क्या जरूरत है। जनता को मालूम होता है की नेता बेवकूफ बना रहा है लेकिन उसके पास कोई ऑप्सन नही होता। अच्छे से अच्छा समझदार व्यक्ति भी वायदे के चककर में फंस जाता है। ये मालूम होते हुए भी की ये चुनाव का वायदा है वो अंदर ही अंदर उस पर विश्वास करता है। उसके मन में एक इच्छा होती है की शायद ये वायदा पूरा हो जाये। ये मनुष्य का स्वभाव है। और इसी बात का फायदा नेता को उठाना चाहिए। अब आप रोज देखते हैं की टीवी पर विज्ञापन आते हैं। लोगों को मालूम होता है की ये विज्ञापन है। इसमें कहि गयी बातों का वस्तु से दूर दूर तक भी संबंध नही होता। हर आदमी इस बात को समझता है। लेकिन जब वो दुकान पर सामान लेने जाता है तो वही वस्तु खरीदता है। उसके मन के किसी कोने में हल्की सी उम्मीद होती है की शायद विज्ञापन में कहि गयी बात का थोड़ा सा ही हिस्सा क्यों न हो लेकिन सच हो सकता है।
                  ठीक यही बात चुनाव में किये जाने वाले वायदों पर लागु होती है। लोग हर बात को समझते हुए भी अपने मन के किसी कोने में ये हल्की सी इच्छा पाल लेते हैं की शायद इसमें कुछ सच हो।
                   इसलिए वायदा करते वक्त कभी भी उसके सम्भव होने या ना होने पर विचार नही करना चाहिए। एक सफल नेता के लिए ये जरूरी है की वो बड़े बड़े वायदे करे।
                   दूसरी बात ये है की आप एक साथ दो विरोधी वायदे भी कर सकते हैं। आप पंजाब में कह सकते हैं की चण्डीगढ़ पंजाब को मिलना चाहिए और उसी दिन हरियाणा में कह सकते हैं की हरियाणा को मिलना चाहिए। इसमें कोई धर्मसंकट नही है। जिस तरह भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है की उसके भक्त को कभी भी संशय का शिकार नही होना चाहिए। उसे अपने सारे कर्म भगवान को अर्पण कर देने चाहियें , ठीक उसी तरह चुनाव में उतरे हुए योद्धा के लिए भी ये जरूरी है की वो इस तरह के संशय से दूर रहे। नेता का काम है चुनाव लड़ना और उसे किसी भी तरह जीतना। इसलिए वायदों का ऐसा चक्रव्यूह रचो की मतदाता उसमे प्रवेश तो कर जाये लेकिन बाहर ना निकल पाये। यही असली योद्धा की पहचान है। " ग़ालिब ने भी कहा है --
                            तेरे वादे पे जिए हम, ये जान की झूठ जाना,
                            के ख़ुशी से मर ना जाते, जो एतबार होता।
                                                       शेष कल।

Tuesday, March 8, 2016

Vyang -- भक्तो, चलो टैक्स पे करना बंद करें ?

                  कई दिनों से देश एक अजीब संकट का शिकार हो गया है। अचानक देश के एक बहुत बड़े हिस्से को लगने लगा है की टैक्स पेअर के पैसे का नाजायज इस्तेमाल हो रहा है। मुझे तो बहुत पहले से ऐसा लगता था लेकिन मेरी कोई सुन ही नही रहा था। अब जाकर देश को लगा है की टैक्स पेअर का पैसा बर्बाद हो गया। खासकर जब से JNU का विवाद हुआ है और लोगों को पता चला है की वहां पढ़ाई का ज्यादातर खर्चा सरकार उठाती है तब से तो बहुत से लोगों का खून खौल रहा है। 90 साल के बूढ़े से लेकर 15 साल की लड़की तक को टैक्स पेअर के पैसे की चिंता सताने लगी है। आज सुबह सुबह मेरे पड़ौसी घर में घुस आये और मेरे मुंह धोने से पहले ही मुझे लगे लताड़ने, " तुम लोगों को शर्म नही आती जो टैक्स पेअर के पैसे पर मौज करते हो और देश विरोधी नारे लगाते हो। "
             मैंने घरवाली की तरफ देखा। शायद उसने लगाया हो। लेकिन उसने इंकार में सिर हिला दिया। बच्चे सहम गए। मैंने पड़ौसी से कहा ," लगता है आपको कोई गलतफहमी हुई है। मैं तो----. "
             " कोई गलतफहमी नही है। टीवी पर सब दिखाया जा रहा है। तुम लोग देश के टैक्स पेअर के पैसे का इस तरह नाजायज इस्तेमाल कैसे कर सकते हो। " उसने मुझे बात भी पूरी नही करने दी। उसने टीवी का नाम लिया तब मेरी समझ में आया। मेरे ये पड़ोसी हमेशा उत्तर कोरिया के अणुबम्ब परीक्षण से लेकर आजम खान की भैस के खोने तक का जिम्मेदार हमेशा मुझे ही मानते हैं। उसके बाद जैसे धड़धड़ाते हुए आये थे वैसे ही धड़धड़ाते हुए चले गए।
                मैं तैयार होकर काम पर जाने के लिए निकला तो गली के नुक्क्ड़ पर करियाने की दुकान वाले ने रोक लिया। " क्यों भईये, ऐसे कैसे पतली गली से निकल रहे हो। जब जवाब देने का समय आया तो मुंह छुपा रहे हो। टैक्स पेअर का पैसा हराम का थोड़े ही है। "
                 एक घंटा होते होते मुझे इतनी गालियां मिल चुकी थी जितनी कन्हैया को भी नही मिली होंगी। अब मैंने फैसला किया की इन तथाकथित टैक्स पेअर को जवाब देना चाहिए।
                  जब तक मैं दुकान पर पहुंचा तो दो पड़ोसी दुकानदार घुस आये। आते ही बोले की क्या तुम्हे नही लगता की टैक्स पेअर  के पैसे का दुरूपयोग बंद होना चाहिए। JNU को बंद कर दिया जाये तो कैसा रहेगा ?
               केवल JNU ही क्यों, मैं तो चाहता हूँ की टैक्स पेअर के पैसे से चलने वाले सभी स्कुल कालेज ही बंद कर देने चाहियें। वैसे भी अब बचे ही कितने हैं। मैंने जवाब दिया। और मैं तो कहता हूँ की एक एक चीज को बंद करने से क्या होगा ? हमे टैक्स ही देना बंद कर देना चाहिए। ना रहेगा टैक्स और ना होगा दुरूपयोग। मैंने आगे जोड़ा।
               अब दोनों को कुछ समझ में नही आया। क्योंकि टीवी चैनलों पर इस पर तो कोई बहस हुई नही थी और हमारे ये भाई अपनी कोई निजी राय रखने की हैसियत नही रखते, देश के अधिकतर लोगों की तरह। थोड़ी देर बाद एक बोला ," अगर हम बिलकुल टैक्स देना बंद कर देंगे तो सेना का खर्च कैसे निकलेगा ? "  दूसरे ने तुरंत समर्थन में सिर हिलाया।
                " हमे सेना रखकर कोनसी प्रॉपर्टी की रक्षा करवानी है। जिनको तकलीफ होगी वो अपने पैसे से आदमी रक्खेंगे। " मैंने आराम से कहा।
                 दोनों ने एक दूसरे का मुंह देखा, फिर एक बोला, " सेना के अलावा भी बस हैं, रेल हैं, हवाई जहाज हैं और दूसरे सरकारी कर्मचारियों का वेतन है वो सब कहां से निकलेगा ? "
                 " भाई मुझे तो कोई जरूरत लगती नही है। बस और रेल सरकार की नही होंगी तो कोई प्राइवेट आदमी चलाएगा। आज भी पैसे देकर बैठते हैं तब भी पैसे देकर बैठेंगे। जहाँ तक हवाई जहाज की बात है तो जिसको जरूरत होगी वो उसका खर्चा देगा। सरकारी कर्मचारी जिसका काम करेंगे उससे पैसे लेंगे जो आज भी लेते हैं। "
                    " और, और पुलिस ? "
                  " पुलिस कोनसा हमारे जैसे आदमी का काम कभी करती है। कभी गए हो पुलिस स्टेशन ? कोई चोरी की रिपोर्ट कभी लिखवाई हो और माल मिल गया हो ऐसा कोई उदाहरण है। हमे पुलिस की कोई जरूरत नही है। " मैंने कहा।
                  दोनों को कोई तर्क नही सूझ रहा था। मैंने बोलना जारी रखा। " किसी महंगी गाड़ी वाले को चिकनी सड़कें चाहियेगी तो बनवायेगा अपने खर्चे से। किसी नेता को या चमचे को Z श्रेणी की सुरक्षा चाहिए तो अपने खर्चे पर रखेगा। मुझे तो लगता है की हम तो अब भी अपने खर्चों का पैसा दे रहे हैं। जो लोग देश के मालिक बने बैठे हैं केवल वही लोग अपने हिस्से का पैसा नही दे रहे हैं। अगर हम सब टैक्स देना बंद कर देते हैं तो उनको अपना पैसा खुद देना पड़ेगा। "
                             दोनों को कुछ समझ नही आ रहा था।  मैंने धीरे से फुसफुसा कर कहा ," ये टैक्स पेअर की बात करना बंद दो, कहीं ऐसा ना हो गरीब जनता को ये हिसाब समझ में आ जाये। "

Sunday, March 6, 2016

Vyang -- सशक्त महिलाएं और अशक्त उद्योगपति

             पिछले दो सालों में, जब से यह सरकार आई है तब से किसी ने महिला आरक्षण बिल का नाम भी नही सुना। जब बीजेपी की सरकार नही थी तो सुषमा स्वराज बाकि विपक्षी महिला सांसदों के हाथ में हाथ डालकर फोटो उतरवाती थी और महिलाओं के लिए जोशीले भाषण देती थी। लेकिन जब से उनकी सरकार आई है तब से उनकी महिला सांसदों के साथ बोलचाल बंद है। हम लगातार संसद को रोकने के लिए विपक्ष को कोसते देखते हैं और अटके हुए बिलों की सूचि अख़बारों में छपती है। लेकिन उसमे महिला आरक्षण मिल का नाम नही होता। क्योंकि वो बिल राज्य सभा में, जहां विपक्ष का बहुमत है वहां अटका हुआ नही है बल्कि लोकसभा में जहां सरकार के पास पूर्ण बहुमत है वहां अटका हुआ है। और चूँकि बीजेपी इसे पास नही कराना चाहती इसलिए इसका जिक्र नही होता। पहले हम इसे बीजेपी का दोगलापन समझते थे। लेकिन अब हमे महिलाओं  के सम्मेलन में प्रधानमंत्री का भाषण सुनकर ये मालूम हुआ की महिलाएं तो पहले ही सशक्त हैं। उसके बाद से हमे भी ज्ञानबोध हुआ। बीजेपी को ये ज्ञानबोध 18 महीने पहले हो चूका था।
             इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री के ज्ञानपूर्ण भाषण में और भी कई बातें थी जैसे हमे ये भी मालूम पड़ा की महिलाएं घर को बहुत अच्छी तरह चलाती हैं। अब तक हमे और देश को इसका पता नही था। प्रधानमंत्री अपनी पूरी भाषण कला उड़ेल रहे थे और लगातार तालियों का इंतजार कर रहे थे। माननीय सुमित्रा महाजन और माननीय नजमा हेपतुल्ला के चेहरे पर संतोष के भाव थे। इसी भाषण में प्रधानमंत्री ने एक नया रहस्योद्घाटन भी किया। उन्होंने कहा की व्यवस्था परिवर्तन से कुछ नही होता, बल्कि असल जरूरत है की महिलाएं खुद को बदलें। क्या करें ? आप कह रहे हैं की वो सशक्त हैं, अच्छा घर चलाती हैं और टेक्नोलॉजी का प्रयोग बेहतर ढंग से करती हैं। फिर किस बदलाव की जरूरत है ? महिलाएं अशक्त हो जाएँ या अच्छा घर चलाना बंद कर दें या तकनीक को भूल जाएँ। खैर इस पर ABVP के छात्र शोध करेंगे। लेकिन हमे ये मालूम हो गया की महिला आरक्षण बिल क्यों नही आ रहा। क्योंकि उसकी जरूरत ही नही है। अब भी जो लोग उसका इंतजार या उम्मीद करेंगे उनको तो पागल ही कहा जा सकता है।
              फिर इस देश में अशक्त कौन हैं भाई जिनके लिए काम करने की जरूरत है। वो हैं बेचारे उद्योगपति। ये निरीह किस्म के प्राणी आजकल बहुत मुश्किल में हैं। क्या आपको इनकी दुर्दशा के आंकड़े मालूम हैं। नही ना। मैं बताता हूँ। देश का ये तबका जिसमे कुल मिलाकर एक प्रतिशत लोग शामिल हैं वो देश की कुल सम्पत्ति के 50 प्रतिशत के मालिक हैं। केवल 50 प्रतिशत के। कितनी शर्म की बात है।  देश की पूरी आधी सम्पत्ति के मालिक ये गए गुजरे 99 प्रतिशत लोग हैं। अगर देश की आधी सम्पत्ति देश का ये गरीब गुरबा दबा कर रखेगा तो हो चूका विकास। इसलिए सरकार का पहला कर्तव्य है इस बेशकीमती सम्पत्ति को इनके कब्जे से मुक्त करवाना ताकि देश का विकास हो सके और इन बेचारे निरीह उद्योगपतियों को कुछ राहत मिल सके। इसके लिए सरकार ने प्रोविडेंट फंड पर टैक्स लगाने का प्रस्ताव रखा तो उसका विरोध हो गया, इन उद्योगपतियों ने मजबूरी में कुछ बैंकों का कर्ज नही लौटाया तो उस पर सवाल उठ रहे हैं, सरकार इनके लिए भूमि अधिग्रहण बिल लेकर आई तो उसको पास नही होने दिया और अब GST बिल को लटका कर बैठे हैं। सारा देश ही देशद्रोही हो गया है किसी को देश के विकास की चिंता ही नही है। बेचारी सरकार अकेली क्या करे ?
             

Tuesday, March 1, 2016

News Comment -- वीरभद्र सिंह की गुगली पर पूरी बीजेपी आउट

                 हिमाचल के मुख्यमंत्री श्री वीरभद्र सिंह ने कहा है की धर्मशाला में होने वाले भारत-पाक मैच को हिमाचल से बाहर बदल दिया जाये क्योंकि हिमाचल में पाकिस्तानी फौज द्वारा शहीद हुए सैनिकों के परिवारों को इस पर एतराज है। उन्होंने ये भी कहा है की इन हालात में हिमाचल सरकार मैच के लिए सुरक्षा मुहैया नही करवा पायेगी।
                  वीरभद्र सिंह की इस गुगली से जैसे पूरी बीजेपी एक साथ आउट हो गयी है। बीजेपी में किसी को सूझ ही नही रहा की कैसे प्रतिक्रिया दी जाये। बीजेपी नेता और BCCI के सचिव अनुराग ठाकुर ने कहा है की इससे पूरी दुनिया में गलत संदेश जायेगा। बहुत खूब ! अब तक तो आप यही राजनीती करते रहे हैं। हर सवाल पर आपने सैनिकों को सामने खड़ा कर दिया है। यहां तक की JNU के  भी,  जिसका सैनिकों से कोई लेना देना नही था आपने उनके नाम पर बहुत भावनाएं भड़काई थी और अब भी भड़का रहे हो तब गलत संदेश नही गया। अनुराग ठाकुर के पिता और हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री धूमल ने कहा है की जो सरकार एक मैच को सुरक्षा मुहैया नही करवा सकती उसे सत्ता छोड़ देनी चाहिए। भई वाह ! आपने ऐसा महाराष्ट्र सरकार के लिए तो कभी नही कहा। जरा एक मैच मुंबई में भी करवा कर दिखा दीजिये। और सत्ता छोड़ने के लिए पहले आप राजनाथ सिंह को कहिये जो अदालत तक में सुरक्षा मुहैया नही करवा पाये।
                   मैं खेलों को राजनीती से अलग रखने का हिमायती हूँ। लेकिन जिस अंधे राष्ट्रवाद का प्रचार  और उपयोग बीजेपी अपने तुच्छ राजनैतिक हितों के लिए करती रही है ये उसका सटीक जवाब है। श्री वीरभद्र सिंह को बधाई।

Sunday, January 31, 2016

Vyang -- स्मार्ट लोगों के लिए स्मार्ट सिटी

                  कुछ दिन पहले सरकार ने घोषणा की थी की वो 100 शहरों को स्मार्ट बनाएंगे। अब जो लोग सोच रहे हैं की पुरे देश को क्यों नही तो मैं उन्हें बता देना चाहता हूँ की पुरे देश को पहले डिजिटल इंडिया बनाया जा चूका है। सो एक देश को दो चीजें तो नही बनाया जा सकता। इसलिए सरकार ने शहरों को स्मार्ट बनाने का फैसला लिया है। बाद में सरकार को ध्यान आया की ये कुछ ज्यादा हो गया, सो उसने घोषणा कर दी की पहले 20 शहरों को स्मार्ट किया जायेगा और बाकी को बाद में देखा जायेगा। सो पहले 20 शहरों की घोषणा कर दी। मेरे एक मित्र पूछ रहे थे की शहरों का चुनाव किस आधार पर किया गया है ? तो मैंने उन्हें बता दिया की पहले उन शहरों का चुनाव किया गया है जो पहले ही कुछ-कुछ स्मार्ट थे। इस पर मेरे मित्र बिदक गए और बोले की पहले मदद का हक तो कमजोर का होता है। मुझे हंसी आई। मैंने उन्हें कहा की भाई कमजोर को मदद की जा सकती है जिन्दा रहने के लिए। बहुत हुआ तो चलने फिरने के लिए। अगर उसे स्मार्ट बनाया जाने लगा तो हो गया काम। फिर क्या वो लोग जो पहले ही स्मार्ट हैं, क्या वो अपना घर-बार लेकर रहने के लिए वहां जाएँ।
               और ये स्मार्ट लोग कौन हैं ? मित्र ने पूछा।
        ये स्मार्ट लोग कई तरह के होते हैं। स्मार्ट शहरों में भी कुछ स्मार्ट मुहल्ले होते हैं जिन्हे पॉश एरिया कहा जाता है, इन्ही एरिया में ये लोग रहते हैं। जिन शहरों को स्मार्ट बनाने की योजना है उनमे भी इन्ही एरिया पर ध्यान दिया जायेगा विशेष रूप से। जैसे पूरी दिल्ली को स्मार्ट नही बनाया जा रहा है। केवल नई दिल्ली म्युनिसिपल एरिया, जहां नेता, सांसद, बड़े-बड़े अफसर और पैसे वाले लोग रहते हैं उसी को स्मार्ट बनाने की योजना है। वैसे भी आम आदमी, जो खुद स्मार्ट नही है वो स्मार्ट सिटी में रहकर क्या करेगा ?
               क्या करेगा का क्या मतलब ? ये स्मार्ट लोग क्या करते हैं ? मित्र था की ठंडा होने का नाम ही नही ले रहा था।
               मैंने उसे फिर समझने की कोशिश की ," देखो भाई, ये स्मार्ट लोग बड़े बड़े काम करते हैं। लेकिन अलग अलग काम करने वाले इन स्मार्ट लोगों के काम में गजब का आपसी तालमेल होता है जो आम आदमी में नही पाया जाता। जैसे एक बड़ा स्मार्ट उद्योगपति बैंक से हजारों करोड़ का कर्ज ले लेता है। उस बैंक के स्मार्ट अधिकारी आँखे बंद करके उसे कर्ज दे देते हैं। फिर वो कर्ज लौटाने से स्मार्ट इंकार कर देता है। बैंक के लोग उससे पैसे की उगाही करते हैं तो उसके स्मार्ट वकील बैंक को अदालत में ले जाते हैं और बैंक पर आरोप लगाते हैं की बैंक उनके इज्जतदार मुवक्किल को परेशान कर रहा है और उसे पैसे मांगने का कोई हक ही नही है। उनके स्मार्ट टीवी चैनलों में बैठे स्मार्ट एंकर और स्मार्ट विशेषज्ञ आँसू बहाना शुरू करते हैं की देश में व्यापार का माहौल ही नही है। इस तरह से उद्योगपतियों को परेशान किया जायेगा तो विदेशी निवेश कैसे आएगा। रिजर्व बैंक चेतावनी जारी करता है की बैंको को खराब लोन कम करने चाहियें। रिजर्व बैंक की बात मानकर बैंक उसका लोन माफ़ कर देता है और उसके खराब लोन की संख्या कम हो जाती है। फिर वित्त मंत्री उसके उद्योग के लिए विशेष छूट का प्रस्ताव रखते हैं और बताते हैं की इससे रोजगार में बढ़ौतरी होगी। स्मार्ट विशेषज्ञ सरकार के स्मार्ट कदम का स्वागत करते हैं। जब तक वो उद्योगपति यूरोप में अपना स्मार्ट टूर खत्म करके वापिस आता है उसका कर्ज उत्तर चूका होता है, नए फायदे का रास्ता बन चुका होता है। वो उद्योगपति सीधा एयरपोर्ट से वित्त मंत्री के दफ्तर पहुंचता है, वहां से बाहर निकल कर नए निवेश की घोषणा करता है और बयान देता है की सरकार एकदम सही चल रही है और तेजी से विकास की संभावना बढ़ रही है। वो ये भी कहता है की उसके हाल के युरोप टूर के दौरान पूरी दुनिया में केवल हमारी ही चर्चा हो रही थी और की पूरी दुनिया हमारी तरफ देख रही है। टीवी चैनल में बैठा सरकारी पार्टी का स्मार्ट  प्रवक्ता इसे उद्योगपतियों में बढ़ते हुए विश्वास के रूप में व्याख्यायित करता है और "
          " और "
          और हम सब यानि देश की जनता, टीवी पर खबर सुनकर ऐसा महसूस करते हैं जैसे हमारा विकास हो रहा है। बिना आदमी और उसकी समस्याओं को छुए, उसे ये विश्वास दिलाना की उसका विकास हो रहा है क्या कम स्मार्ट बात है।

Saturday, October 10, 2015

Vyang -- बिजनेस, नैतिकता और राजनीती

जैसा की हमने पहले बताया था की हमारे मुहल्ले में एक करियाने के दुकानदार हैं और जो अपने आप को बीजेपी के अघोषित प्रवक्ता बताते हैं। हम कई बार उनकी राय जानने की कोशिश करते हैं। और वो बड़े धड़ल्ले से दुनिया के सभी मामलों पर अपना मत देते हैं। अब बिहार चुनाव पर कुछ घटनाएँ जो पिछले दिनों घटी, हमने उन पर उनकी राय जानने की कोशिश की।
          दुआ सलाम के बाद हमने उससे पूछा , " भाई साब ये खबर आई है की आपके तेज तर्रार हिंदूवादी नेता संगीत सोम उत्तर प्रदेश की मशहूर अल-दुआ नाम की बीफ सप्लाई करने वाली कम्पनी के हिस्सेदार रहे हैं, इस पर आपका क्या कहना है। "
            उन्होंने एक दम शान्ति से जवाब दिया ," देखिये लोगों को और खासकर विपक्षी पार्टियों को बिजनेस पर राजनीती नही करनी चाहिए। किसी कम्पनी में हिस्सेदारी  अपना निजी मामला है। किसी के निजी मामलों में दखल देना अच्छी बात नही है। "
            हमे इस जवाब की उम्मीद नही थी। सो कुछ देर हम सदमे की स्थिति में रहे। फिर अपने आप को संभाल कर बोले , " लेकिन अखलाक का परिवार क्या खाता है ये उसका निजी मामला नही था ? और व्यापार में अपनाये जाने वाले तरीके कब से निजी मामला हो गए ?"
              उसने फिर शान्ति से जवाब दिया, " व्यापार में केवल ये पूछा जाना चाहिए की क्या उसके पास लाइसेंस है या नही, अगर है तो बात खत्म हो जानी चाहिए। जहाँ तक अख़लाक़ की बात है वो एक हिन्दू देश में क्या खाता है ये उसका निजी मामला नही है। उसे क्या खाना चाहिए ये हम बताएंगे। इन दोनों मामलों को आपस में मिलाओ मत। अख़लाक़ का बीफ खाना गंभीर मामला है और लाइसेंस लेकर बीफ का निर्यात करना कानून के अनुसार सही है। "
              हमे समझ नही आ रहा था की हम उसके साथ बहस कैसे करें। हमने कहा , " अभी अख़बार में एक लेख आया है की विश्व हिन्दू परिषद के पूर्व अध्यक्ष विष्णु हरी डालमिया का परिवार दूसरे विश्व युद्ध के समय अंग्रेज सेना को गौ-मांस सप्लाई करता था। ऐसे परिवार के सदष्य को विश्व हिन्दू परिषद का अध्यक्ष कैसे बना दिया ?"
               उसने हमे ऐसे देखा जैसे हम पागल हो गए हों। फिर बोला, " आपने फिर बिजनेस की बात की। मैं आपको पहले ही बता चूका हूँ की बिजनेस के मामलों में राजनीती नही करनी चाहिए। और आपने ये ध्यान दिया की डालमिया परिवार ने हिन्दू धर्म की कितनी सेवा की। उन्होंने सारा गौ-मांस अंग्रेजों को खिला दिया और अपने देश के लोगों को धर्म भृष्ट होने से  बचा लिया। मैं फिर आपको कहता हूँ की बिजनेस को राजनीती या नैतिकता से मत जोड़ो। बिजनेस और नैतिकता दोनों विरोधी चीजें हैं। इस तरह तो आप ये पूछोगे की कोई बिजनेसमैन राजनेता पूरा टैक्स देता है या नही। अब टैक्स का राजनीती से क्या लेना देना है ?"
                 " आपका मतलब ये है की कोई आदमी कानून के अनुसार टैक्स ना देकर भी अच्छा राजनेता हो सकता है ? " हमने पूछा।
                 उसने फिर शान्ति से जवाब दिया, " हो सकता है का क्या मतलब है ? होते ही हैं। रोज इनकम टैक्स की रेड होती हैं, लोगों के पास काला धन मिलता है तो कोई पार्टी उसको पार्टी से निकालती है क्या ? बिजनेस, नैतिकता और राजनीती ये अलग अलग चीजें हैं। जब तक तुम इस बात को ठीक से नही समझोगे तब तक राजनीती को नही समझ सकते। "
                "  आपके हिसाब से ये जितने अपराधी आपकी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं उसमे कोई बुराई नही है। " हमने पूछा।
                " उनके आपराधिक मामलों पर कानून अपना काम करेगा और कर रहा है। उन पर कानून के अनुसार चुनाव लड़ने पर कोई रोक तो है नही। फिर उनके चुनाव लड़ने पर सवाल क्यों उठा रहे हो ?" उसने एतराज किया।
                  " आपकी पार्टी पर ये आरोप है की आपने अपनी सरकार होने का फायदा उठाकर अमित शाह के मामले में सुप्रीम कोर्ट में अपील नही की, जिससे वो बच गए। " हमने कहा।
                     वो फिर हमारी नासमझी पर थोड़ा सा मुस्कुराया फिर बोला , " क्या किसी मुसीबत में फंसे भारतीय की मदद करना अपराध है। हमने तो मानवीय कारणों से ललित मोदी तक की मदद की थी। फिर वही कानून का सवाल आता है। कानून में कहां लिखा है की हर मामले की सुप्रीम कोर्ट में अपील की जाएगी। देश की अदालतों पर वैसे ही मुकदमों की संख्या का बहुत भार है जिससे लोगों को न्याय मिलने में देरी हो रही है , हम चाहते हैं की अदालतें दूसरे मामलों पर ध्यान दें ताकि लोगों को जल्दी न्याय मिल सके। क्या लोगों को जल्दी न्याय मिले आपको इस पर एतराज है। " फिर उसने रास्ते पर जाते हुए दो-तीन लोगों को रोक कर ऊँची आवाज में पूछा , " क्यों भाइयो, देश के लोगों को जल्दी न्याय मिलना चाहिए की नही ?" जाने वाले लोगों ने कहा की जरूर मिलना चाहिए।
                        फिर उसने हमारी तरफ देख कर कहा, " देखो जनता भी अमित शाह के मामले में अपील न करने का समर्थन करती है। "
                 सचमुच हमारी समझ में कुछ नही आया और हम बेवकूफों की तरह आगे चले गए।

Tuesday, September 22, 2015

Vyang -- दिल्ली पर हमले के लिए डेंगू के मच्छरों की मीटिंग


 डेंगू के मच्छरों की एक गुप्त मीटिंग दिल्ली के एक पॉस इलाके की पानी की खाली टंकी में हो रही थी। सुरक्षा का  पूरा ध्यान रक्खा गया था। यहां मीटिंग करने के पहले इस जगह की कई दिन रेकी की गयी थी और जब पूरा विश्वास हो गया तभी ये जगह फाइनल की गयी थी। इस मीटिंग में मच्छरों के एक बड़े केंद्रीय नेता पहुंच रहे थे। इस नेता  ने पूरा एक सत्र संसद भवन में गुजारा था।उसने अलग अलग पार्टियों के नेताओं का खून पीकर इंसान की फितरत को ठीक तरीके से समझा था और वही आज अपने अनुभव बाँटने यहां पहुंचे थे। सही समय पर मीटिंग शुरू हुई।
नेताजी ने बात शुरू की। " हम लोग मिलकर डेंगू का अगला बड़ा हमला दिल्ली पर ही करेंगे। क्योंकि सुरक्षा की दृष्टि से भी ये ज्यादा ठीक रहेगा। दूसरा फायदा ये होगा की दिल्ली पर हमला होने से हमे मीडिया कवरेज भी भरपूर मिलेगी। मैंने इतने दिन में ये अच्छी तरह जान लिया है की हमारे मीडिया के लोग दिल्ली से बाहर निकलने में बिलकुल दिलचस्पी नही रखते। वो ज्यादातर मुख्य समाचार यहीं बैठे बैठे बनाते हैं। फिर चाहे वो समाचार डेंगू का हो या सनी लिओन का। दूसरा फायदा ये है की यहां सरकार के तीनो विभाग आपस में इतनी बुरी तरह से लड़ रहे हैं की वो हमारे खिलाफ कोई असरदार फैसला ले ही नही सकते। सरकारें वैसे भी काम करने में कम ही विश्वास रखती हैं और यहां तो ये हालत है की अगर केजरीवाल कुछ करना चाहेंगे तो केंद्र की सरकार नही करने देगी और MCD कुछ करना चाहे तो केजरीवाल नही करने देंगे।
                    दूसरा कारण ये है की दिल्ली के स्वास्थ्य पर प्राइवेट हस्पतालों का कब्जा है। डेंगू के मरीज को आठ-दस दिन रखना  पड़ता है और उसमे कोई ओपरेसन वगैरा होता नही है तो बिल भी बहुत ज्यादा नही बन सकता। इसलिए ये हस्पताल इन मरीजों को रखेंगे नही। उन्हें तो ऐसे मरीज चाहियें जो चार-पांच दिन में चार-पांच लाख का बिल देकर बाहर हो जाएँ।
                      अगली बात ये है की इस बार डेंगू का हमला पॉस इलाकों में भी पूरी ताकत से होना चाहिए। क्योंकि इन इलाकों के लोग खुद कोई काम करने में विश्वास नही रखते। इस बार MCD उनके यहां मच्छर मारने आएगी नही और वो खुद मार सकते नही। इसलिए इन इलाकों को भी टारगेट किया जाये इससे मीडिया में भी अच्छी सुर्खियां बनेगी।
                      अब किसी को कोई सवाल पूछना हो तो पूछ सकता है। " ये कहकर उसने अपनी बात समाप्त की।
                लेकिन मरने वाले तो सभी आदमी ही होंगे। इसलिए सभी लोग कैसे इकट्ठे नही होंगे ? -- एक जवान मच्छर ने पूछा।
               नेताजी एकबार जोर से हँसे। फिर बोले ," तुम इन आदमियों को नही जानते। तुमने आदमियों के मुंह से ही ये बात हजारों बार सुनी होगी की आदमी ईश्वर की सबसे बढ़िया कृति है। फिर भी  आदमी भूख से मरते हैं , कपड़े नही हैं, घर नही हैं।  किसी दूसरे जानवर को आज तक भूखे सोते देखा है ? दुनिया के सभी प्राणियों में केवल आदमी ही है जो भूखा सोता है। और इसका कारण कोई दूसरा प्राणी नही है, खुद आदमी ही हैं जिन्होंने ऐसे हालात पैदा किये हैं की करोड़ों दूसरे आदमियों को भूखा सोना पड़ता है। मैं तो कहता हूँ की आदमी ने खुद को प्रकृति की सबसे निकृष्ट कृति बना लिया है। सो तुम उनकी एकता की बात मत करो और आराम से हमले की तैयारी करो। "
                लेकिन राजधानी पर हमले से बहुत जोर से बात मीडिया में आएगी और  वो तुरंत हमे मार डालेंगे। ----एक दूसरे मच्छर ने आशंका जताई।
               " कुछ नही होगा। हफ्तों तक वो एक दूसरे पर आरोप लगाते रहेंगे। बात ब्यायालय तक जाएगी। वो  नोटिस जारी करेगा। आरोप प्रत्यारोप का दौर जारी रहेगा और तब तक हमारा स्वाभाविक मरने का समय यानि सर्दी आ जाएगी। वो आरोप लगाते हुए जनता की अदालत में जाने की बात करेंगे और जनता बिस्तर पर पड़ी होगी। "  नेता जी ने मुस्कुराते हुए कहा।
                        और अगले दिन मच्छरों ने दिल्ली पर हमला कर दिया। और आदमी सचमुष वैसा ही कर रहे हैं जैसा मच्छरों के नेता ने कहा था।

Monday, September 21, 2015

Vyang -- अगर ऐसा ना होता तो ?

देखिये सब कुछ होने पर ही निर्भर है। और जैसा हुआ है वैसा ही होने पर निर्भर है। बातचीत में बहुत लोग सवाल उठाते हैं की अगर ऐसा ना होता तो ? राजनेता तो इसे काल्पनिक सवाल कहकर ख़ारिज कर देते हैं। लेकिन हमने सोचा की अगर कुछ चीजें नही हुई होती तो क्या होता ? इस पर विचार करने पर हमने पाया की अगर ऐसा ना होता तो कैसा होता ? जैसे ----
            अगर बिहार चुनाव सामने नही होता तो मोहन भागवत के आरक्षण वाले बयान पर बीजेपी की क्या पर्तिक्रिया होती ? तो हमने पाया की कुछ ऐसी होती। 
   बीजेपी प्रवक्ता रविशंकर प्रशाद , " मोहन भागवत  जी ने बिलकुल वाजिब सवाल उठाया है। और ये सवाल देश की सारी जनता उठा रही है। उन्होंने ये कहा है की जब 65 साल से आरक्षण लागु होने के पश्चात भी उसका फायदा नही हो रहा है तो उसे खत्म कर दिया जाना चाहिए। लेकिन विपक्ष बहस से भाग क्यों रहा है ? हमारा मानना है की अब समय आ गया है की आरक्षण पर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए। "
            इसी तरह मान लो पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी नितीश से अलग नही हुए होते तो बीजेपी क्या कहती ?
           बीजेपी प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन , " नितीश को बिहार की जनता को इस बात का जवाब देना पड़ेगा की उन्होंने बिहार की जनता के सिर पर दो साल एक अक्षम आदमी को मुख्यमंत्री के तौर पर बैठा कर रक्खा। जो आदमी खुलेआम रिश्वत लेने की बात कबूल करता है और जिसने बिहार को गड्डे में धकेल दिया है उसके जिम्मेदार खुद नीतीश कुमार हैं और अब बिहार की जनता उन्हें इस बात का जवाब देगी। "
           और मान लो अगर नीतीश बीजेपी से अलग ही नही हुए होते तो बीजेपी क्या कहती ?
          बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा , " पिछले दस साल में माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी के नेतृत्व में हमने बिहार को बदहाली और पिछड़ेपन की दलदल से निकाल कर देश के सबसे ज्यादा तेजी से विकास करने वाले राज्यों में शामिल कर दिया है। पिछले दस साल में बिहार में विकास की जो गंगा बही है वो अन्धो को भी दिखाई दे सकती है और इस चुनाव में बिहार की जनता एक बार फिर माननीय नीतीश कुमार के नेतृत्व पर विश्वास जाहिर करेगी। "
              इसी तरह अगर केंद्र में UPA की सरकार होती और बीजेपी विपक्ष में होती तो GST बिल पर क्या कहती ?
           बीजेपी प्रवक्ता अरुण जेटली , " GST पर राज्यों को कुछ गंभीर चिंताएं हैं। और जब तक केंद्र सरकार राज्यों की चिंताओं का समाधान नही करती तब तक GST का समर्थन करना हमारे लिए मुश्किल होगा। और सरकार को इस पर जोर जबरदस्ती के बजाय विपक्ष को विश्वास में लेकर आगे बढ़ना चाहिए। केवल बहुमत के सहारे कानून पास करना लोकतंत्र के खिलाफ होता है। "
             मान लीजिये बीजेपी विपक्ष में होती और महंगाई के सवाल पर क्या बोलती ?
           बीजेपी प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी , " देश की जनता का महंगाई से बुरा हाल है। प्याज 100 रूपये किलो और दालें 150 रूपये किलो बिक रही हैं और सरकार महंगाई घटने के आंकड़े पेश कर रही है। सरकार को समझना चाहिए की आंकड़ों से लोगों का पेट नही भरता। "
              इसी तरह की और भी बहुत सी बातें हैं जो अगर नही हुई होती तो क्या होता ? हमने केवल कुछ ही चीजों की कल्पना की है।

Friday, September 18, 2015

Vyang -- " मन की बात " पर रोक क्यों लगाई जाये ?

खबरी -- चुनाव आयोग ने " मन की बात " पर रोक लगाने से इंकार कर दिया।

गप्पी -- असल में ये मांग ही गलत थी। चुनाव आयोग ने एकदम सही फैसला किया है। विपक्षी दलों का कहना था की प्रधानमंत्री की " मन की बात " से बिहार चुनाव में मतदाताओं पर असर पड़ेगा। लेकिन ये बात तथ्यों से परे है।
              मुझे नही लगता की " मन की बात " का कोई प्रभाव मतदाताओं पर पड़ता है। मतदाताओं पर केवल मुद्दे की बात का प्रभाव पड़ता है। और प्रधानमंत्रीजी का तो ये रिकार्ड रहा है की उन्होंने कभी मुद्दे की बात ही नही की। बल्कि अब तो ये भी साफ हो गया है की लोग जिन बातों को मुद्दे की बात समझ रहे थे वो भी मुद्दे की बात नही थी। अब इस बात का शक जताना की प्रधानमंत्री अपनी " मन की बात " में मुद्दे की बात कर सकते हैं ये विपक्षी दलों की गलत धारना है। इस बात के समर्थन में मैं और भी हजारों सबूत पेश कर सकता हूँ।
                जैसे संसद के पुरे सत्र के दौरान विपक्षी दलों ने अपनी सारी कोशिशें कर ली, लेकिन क्या वो प्रधानमंत्री से मुद्दे की बात पर एक शब्द बुलवा पाये। प्रधानमंत्री ने ना तो मुद्दे की बात की और ना ही मुद्दे पर बात की। फिर भी प्रधानमंत्री पर इस बात का शक करना तो चुनावी रणनीति ही माना जायेगा।
                   दूसरा चुनाव से पहले प्रधानमंत्रीजी ने जो जो बातें कहि थी आज इतने दिन के बाद भी उनमे से किसी में कोई मुद्दा निकला। सारे देश की जनता ने बारीक़ से बारीक़ छलनी लेकर सारी बातों को कई कई बार छान लिया की एकाध मुद्दा निकल ही जाये, लेकिन नही निकला।
                     एक और सबूत है जिसके बाद तो आपको मानना ही पड़ेगा की विपक्ष की मांग गलत थी। और यही सबसे महत्त्वपूर्ण बात है। जिन मुद्दों पर प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी काम कर रही है क्या उनका जिक्र उन्होंने कभी किया। मैं तो कहता हूँ की पुरे विपक्ष ने उन पर वो बात कहने के लिए दबाव डाला, जो वो कर रहे हैं लेकिन उन्होंने नही माना। दूसरी बात ये है की प्रधानमंत्री जी जिस संगठन यानि आरएसएस से आये हैं, उसका तो इतिहास रहा है की उसने उन बातों को कभी नही माना जिनके लिए वो सारी जिंदगी काम करता रहा। और जिन बातों का जिक्र वो अपनी बातों में करते रहे हैं उनको कभी उस तरह लागु नही किया। जैसे वो बात राष्ट्रवाद और देशभक्ति की करेंगे और काम देश तोड़ने के करेंगे। एकता के नाम पर उनके द्वारा किये गए किसी भी काम में अगर कुछ नही था तो बस एकता ही नही थी। वो देश की सुरक्षा के लिए कार्यक्रम घोषित करेंगे और देश जलने लगेगा। प्रधानमंत्री लोकतंत्र और कांग्रेस मुक्त भारत दोनों की बात एक साथ करते हैं। वो सहकारी संघवाद ( Cooperative Federalism ) की बात और नीतीश मुक्त बिहार की बात एक साथ करेंगे। अब कोई ये तो नही कह सकता की प्रधानमंत्री को इन बातों के मायने नही मालूम होंगे, बाकी तो फिर नियत की बात ही बचती है।  

                       इसलिए चुनाव आयोग का फैसला एकदम सही है। और विपक्ष को इस बात पर प्रधानमंत्री पर आरोप लगाने बंद कर देने चाहियें।

Thursday, September 17, 2015

Vyang - बिजनेस फ्रेंडली राज्य बनाने पर सुझाव

पिछले दिनों वर्ल्ड बैंक ने एक लिस्ट जारी की है जिसमे भारत में सबसे आसानी से बिजनेस किये जाने वाले राज्यों की सूचि जारी की है। मुझे बड़ा दुःख हुआ जब मैंने देखा की हमारे राज्य का नंबर तो झारखण्ड, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे पिछड़े हुए राज्यों के भी बाद आता है। सो मैंने इन सभी राज्यों में मिलने वाली सुविधाओं और सहूलियतों का गहन अध्धयन करने के बाद कुछ सुझाव तैयार किये हैं जिन्हे अपनाकर दूसरे राज्य भी इस सूची में अपना नंबर सुधार सकते हैं। ये सारे सुझाव एकदम मुफ्त में और बिना मांगे दिए जा रहे हैं और मैं उम्मीद करता हूँ की इन्हे अपनाने वाले राज्य मेरी सेवाओं का सम्मान करेंगे।
सिंगल विंडो स्कीम ------- 
                                       जब कोई आदमी किसी राज्य में बिजनेस शुरू करना चाहता है तो उसे अलग अलग कई विभागों से मंजूरी लेनी पड़ती है। सभी विभागों के अधिकारी काम करने के लिए सीधे सीधे पैसे लेने की बजाय दलालों की मार्फत पैसे लेते हैं। उन सभी अधिकारीयों के दलालों को ढूंढना काफी मुस्किल भी होता है और इसमें समय भी बहुत लगता है। इसलिए सरकार को एक सिंगल विंडो स्कीम पेश करनी चाहिए जिसमे एक ही दलाल सभी विभागों के अधिकारीयों का पैसा ले ले और बाद में अधिकारी और विभाग की हैसियत के हिसाब से बंटवारा कर दे। विकसित राज्यों में इन दलालों को सचिवालय के बाहर बैठने के लिए जगह दी गयी है जिससे इन्हे ढूंढने में कोई दिक्क़त नही हो। इस अनुभव का फायदा दूसरे राज्यों द्वारा भी उठाया जा सकता है।
खनन उद्योग माफिया के भरोसे --------
                                                          सरकार को ये पता लगाने के लिए की कहां  कहां खनन किया जा सकता है और कैसे किया जा सकता है बहुत खर्चा करना पड़ता है। फिर भी अधिकारीयों के भरोसे ये काम ठीक से नही हो पाता है। इसलिए इसमें निजी क्षेत्र की भूमिका को बढ़ावा दिया जाना चाहिए और पुरे खनन क्षेत्र को माफिया के भरोसे छोड़ देना चाहिए। ये साबित हो चूका है की माफिया खनन का विकास ज्यादा तेजी से करता है। सभी बिजनेस फ्रेंडली राज्यों ने खनन को माफिया के ही भरोसे छोड़ा हुआ है। अधिकारीयों का काम केवल उनसे पैसे लेकर ऊपर  तक पहुंचाना होता है। इससे सरकार का समय भी बचता है और नए नए क्षेत्रों में खनन का विकास भी तेजी से होता है।
व्हिसल ब्लोवरों पर लगाम --------
                                                   हर राज्य में कुछ विकास विरोधी लोग होते हैं जो सरकार और बिजनेस मैन के काम में अड़ंगा लगाते रहते हैं और अपने आप को व्हिसल ब्लोवर कहते हैं। विकास के हित में इन पर लगाम लगाई जानी बहुत जरूरी है। उनमे से दो-तीन को मार दिया जाये तो बाकि को धमकाना आसान हो जायेगा। हर विकास शील राज्य ने यही तरीका अपनाया है। उसके बाद ये समस्या धीरे धीरे कम हो जाती है। पुलिस को आदेश दिए जाएँ की अगर कोई व्हिसल ब्लोवर धमकी की शिकायत लेकर पुलिस के पास आये तो उसी पर ब्लैकमेल का मुकदमा बना दिया जाये।
श्रम विभाग को नया काम --------
                                                किसी भी राज्य में उद्योग के विकास के लिए ये जरूरी है की मजदूर कानूनो को संविधान के बाहर मान लिया जाये। हर बिजनेसमैन को ये छूट दी जाये की वो कितनी ही देर काम करवाये और कितना ही वेतन दे। इसके लिए सबसे अच्छा तरीका ये है की राज्य में ठेकेदारी प्रथा को बढ़ावा दिया जाये और मजदूर कानूनों को बदलने का झंझट लेने की बजाए उन पर ध्यान ना देने का रास्ता अपनाया जाये। यूनियनों पर प्रतिबंध लगा दिया जाये और श्रम विभाग का काम केवल ठेकेदारों का पता लगाकर उनसे पैसे इक्क्ठे करने तक सिमित कर दिया जाये। वैसे ज्यादा विकसित राज्यों में तो ये काम उद्योगपतियों के जिम्मे ही है की वो हर महीने ठेकेदारों के भुगतान में से पैसे काटकर विभाग में जमा करा दे। अब जब उनको प्रोविडेंट फंड और ईएसआई जमा करवाने से छुटकारा मिल गया है तो वो इतना काम तो राज्य की भलाई में कर ही सकते हैं।
टैक्स सुधारों को लागु करना ------
                                                   टैक्स सुधारों का मुद्दा इसमें काफी मायने रखता है। सरकार को पिछले दरवाजे से जो टैक्स आता है उसकी प्रगति पर कड़ी नजर रखी जानी चाहिए। बाकि खजाने में कितना टैक्स आता है उस की ज्यादा चिंता नही करनी चाहिए। उसमे अगर कमी आती है तो पट्रोल और डीजल पर टैक्स बढ़ाकर पूरा किया जा सकता है। पिछले दरवाजे से टैक्स देने वाले व्यापारियों को बही खातेचैक करवाने से छूट दी जाये। इससे जो सफेद धन को काला करने की प्रकिर्या है उसमे तेजी आएगी। इन टैक्स सुधारों को लागु करना बिजनेस फ्रेंडली राज्य बनाने के लिए बहुत जरूरी है।
विकास के प्रचार में तेजी -----
                                               इस उपलब्धि के लिए जो काम सबसे जरूरी है वो ये की विकास के प्रचार में तेजी लाई जाये। चाहे आदिवासियों के विस्थापन का सवाल हो, चाहे किसानो की जमीन छीनने का काम हो या पर्यावरण का सवाल हो, इनका विरोध करने वाले हर आदमी और संस्था को विकास विरोधी और बाद में देशद्रोही घोषित कर दिया जाये। उनके लाइसेंस रद्द कर दिए जाएँ और मीडिया हाउसों को इसकी खबरों पर बैन लगाने के आदेश दिए जाएँ। इन लोगों पर हमला इतना तेज किया जाये की जब तक लोगों को सच्चाई समझ में आये तब तक काम पूरा हो चुका हो।
                    ये कुछ सुझाव बहुत छानबीन और विचार करने के बाद तैयार किये गए हैं और राज्य इनसे लाभ उठा सकते हैं।

Monday, September 7, 2015

रिमोट से संचालित लोकतंत्र की सेल

आज के सभी बड़े अख़बारों में डैमोक्रेसी की सेल की खबरें छपी थी। शहर के एक प्रमुख मॉल में डैमोक्रेसी की सेल लगी हुई थी और वह भारी डिस्काउंट पर मिल रही थी। हमने भी डैमोक्रेसी के बारे में बहुत सुना था और उससे हमे भी इच्छा हुई की एक डैमोक्रेसी हम भी ले आये तो अच्छा रहेगा। हम घर से निकलने ही वाले थे की हमारी पत्नी ने कहा की अगर रँग वगैरा अच्छा हो तो एक डैमोक्रेसी उसके लिए भी ले आये। लेकिन उससे पहले दुकानदार से ये पक्का कर लें की अगर पसंद नही आई तो वापिस देंगे। पता नही मेरी पत्नी डैमोक्रेसी को क्या समझ रही थी। परन्तु समस्या ये थी की ठीक ठीक हमे भी मालूम नही था की ये कैसी होती है। थोड़ी देर में हम बाजार में पहुंच गए। बहुत लोग आये हुए थे। सबमे एक अजीब सी ख़ुशी थी। काउन्टर पर खड़ा हुआ एक आदमी सबसे बात कर रहा था। मैंने भी जाकर आहिस्ता से डरते डरते कहा की भाई साब अगर आप ठीक समझें तो हमारे लायक भी एक डेमोक्रेसी दिखा दीजिये।
               सेल्समैन उत्साह में था। तुरंत बोला, " अरे आप लायक की क्या बात करते हैं, हमारे पास तो डेमोक्रेसी के इतने डिजाइन हैं की आपको कोई न कोई तो जरूर पसंद आएगा। हमारे पास दस तरह की तो इम्पोर्टिड डेमोक्रेसी है। ये देखिये अमेरिकी डिजाइन, इसमें आपको बहुत ही ज्यादा फैसलिटी मिलेगी। और हमारे पास तो रिमोट वाली डेमोक्रेसी के भी कई डिजाइन हैं। "
                  रिमोट वाली डेमोक्रेसी ? मैंने आश्चर्य प्रकट किया।
              बिलकुल! और ये डेमोक्रेसी तो हम कई साल से बेच रहे हैं। कोई शिकायत नही है। बस आपको इसका रिमोट हर रोज चार्ज करना पड़ेगा वरना वो काम नही करेगा। हमने ये डेमोक्रेसी बाला साहेब ठाकरे को बेचीं थी, जब तक वो रहे वो इसको रोज चार्ज करते रहे। उनके जाने के बाद ठीक से चार्ज  नही हुआ तो प्रॉब्लम हो गयी।
                क्या कोई भारतीय पीस नही है ? मैंने पूछा।
             हैं, हैं क्यों नही, ये जातीय डेमोक्रेसी है। दूसरी जो आजकल बहुत चल रही है वो रिमोट वाली सनातन डेमोक्रेसी है जो हमने अभी अभी आरएसएस को बेचीं थी। हमने उसका डेमो भी दिया था अभी संघ मुख्यालय में। हर बटन पर सरकार नाच रही थी। खुद भागवत जी ने इसकी तारीफ की है आपने अख़बारों में तो पढ़ा ही होगा। सेल्समैन ने पूरी जानकारी दी।
               दूसरा कोई मॉडल ? मैंने और जानकारी चाही।
        एक मॉडल और था रिमोट वाला जो हमने 10 जनपथ को बेचा था। ठीक काम कर रहा था लेकिन पता नही क्या हुआ कम्पनी ने उसे वापिस ले लिया। सेल्समैन ने निराशा प्रकट की।
               कोई एकदम नया माडल, अच्छे रिमोट के साथ ? मैंने उसके साथ साथ  चलते हुए कहा।
               है लेकिन बहुत महंगा है। अभी अमित शाह लेकर गए हैं। इसका रिमोट दूसरे लोगों पर भी काम करता है। उसे हम सीबीआई डेमोक्रेसी  कहते हैं। उसका डेमो हमने मुलायम सिंह पर दिया था एकदम कामयाब रहा। सेल्समैन ने मेरी हालत पर नजर डाली।
               तभी एक दूसरा ग्राहक आया। सेल्समैन ने उससे पूछा, " कहां से आये हो भाई ?"
                " बिहार से। "
               " अरे, आओ आओ, बिहार के लिए तो हमने स्पेशल स्कीम निकाली है। " सेल्समैन मुझे छोड़कर उसकी तरफ लपका।
                " ये देखो, ये जो डेमोक्रेसी हम बिहार में बेच रहे हैं उसके साथ एक स्पेशल गिफ्ट पैकेज भी दिया जा रहा है। शर्त बस ये है की आपको डेमोक्रेसी अभी खरीदनी पड़ेगी और गिफ्ट पैकेज आपको चुनाव के बाद भेजा जायेगा। " सेल्समैन ने उसे एक पीस दिखाते हुए कहा।
               " लेकिन इस गिफ्ट पैकेज में क्या है ?" उसने पूछा।
              " देखिये ये तो सरपाईज है। इसमें कुछ भी निकल सकता है, हो सकता है 15 लाख निकल जाएँ। " सेल्समैन ने कहा।
              लेकिन बिहारी भी पक्का बिहारी था, उसको बिना देखे भरोसा नही हो रहा था। उसने कहा की पहले पैकेज खोल कर दिखाओ तभी डेमोक्रेसी लेंगे। और वह चला गया।
              " तो तुम दिखा क्यों नही देते ? इस तरह तो तुम्हारा एक भी पीस नही बिकेगा। " मैंने सेल्समैन से कहा।
              " कैसे दिखा दूँ साहब, इसमें प्रधानमंत्री के विदेशी दौरों की कैसेट हो सकती है, योग सिखाने वाली किताब हो सकती है, प्रधानमंत्री द्वारा ली गयी सैलफ़ियों का संग्रह हो सकता है। और---" सेल्समैन बीच में ही रुक गया।
             "और " मैंने पूछा।
            " जुमला भी हो सकता है। " सेल्समैन वापिस मुड़ गया।

Sunday, September 6, 2015

गरीब को और गरीब बनाने का हथियार है हमारी टैक्स व्यवस्था


किसी भी देश की व्यवस्था को चलाने के लिए पैसे की जरूरत  होती है। और ये पैसा सरकार के पास टैक्स के द्वारा आता है। परन्तु सारी राजनीती इस बात पर निर्भर करती है की टैक्स इकट्ठा किससे  किया जा  रहा है और खर्च किस पर किया जा रहा है। लेकिन ये मामला इतना आसान नही होता। इसलिए इस बारे में एक भ्रम का जाल फैलाया जाता है। दुनिया की बड़ी से बड़ी एकतरफा व्यवस्था भी इसका भ्रम फैलाती है की वो सारे नागरिकों की भलाई के लिए काम कर रही है। इसका प्रचार इतना प्रबल होता है की लोग उन चीजों का भी समर्थन करते हैं जो उनके खिलाफ होती हैं।
                       हमारे देश में भी इसी तरह का जाल फैलाया गया है। जिसका असर ये हुआ है की पढ़े लिखे लोगों में से भी बहुत से लोग उन चीजों का समर्थन करते हैं जो उनके खिलाफ हैं। और अगर कोई संस्था या व्यक्ति उनके हित में बात भी करता है तो सबसे ज्यादा विरोध यही लोग करते हैं। यही चीज है जिसके कारण ये जनविरोधी व्यवस्था टिकी हुई है। लोगों को उनके हितों के खिलाफ ही लामबंद कर लिया जाता है। इसलिए ये जरूरी हो गया है की लोगों तक सही जानकारी पहुंचे।
                         हर एक देश में दो तरह के टैक्स होते हैं जिन्हे इकोनोमिक्स की भाषा में प्रत्यक्ष कर और अप्रत्यक्ष कर कहते हैं। इसे आसान भाषा में सीधा कर और आड़ा कर कहा  जा सकता है। सीधा कर वह होता है जो सीधे कर के नाम से लिया जाता है जैसे इन्कम टैक्स और धन टैक्स (Wealth tax ) . और आड़ा कर वो होता है जो चीजों की कीमत में जुड़कर इकट्ठा होता है जैसे वैट या सेल्स टैक्स, एक्साइज ड्यूटी इत्यादि। ये जो कर चीजों की कीमत में जोड़कर लिया जाता है इसका प्रभाव हर आदमी पर होता है। जो भी आदमी कोई भी चीज खरीदता है उससे ये टैक्स ले लिया जाता है भले ही वह कितना ही गरीब क्यों ना हो। इसलिए जितना ये कर ज्यादा होता है उतना ही गरीबों को नुकशान होता है। अगर इस टैक्स की दर ज्यादा होती है तो उसका बोझ आम आदमी पर पड़ता है।
                          लेकिन जो सीधा कर होता है वो उन लोगों से इकट्ठा किया जाता है जो एक सीमा से ज्यादा पैसा कमा रहे होते हैं। इसमें भी टैक्स की दरें इस तरह रखी जाती हैं की कम कमाई वाले आदमी पर इसका बोझ कम पड़े और ज्यादा कमाने वाले पर ज्यादा बोझ पड़े। लेकिन हमारे देश में अगर ऊपर की ज्यादा कमाई वाले लोगों पर टैक्स की दर बढ़ाने की मांग की जाती है तो वो लोग ही इसका सबसे ज्यादा विरोध करते हैं जिनको ये टैक्स देना ही नही है। इसलिए अरबों रूपये कमाने वालों को समर्थन करने के लिए बैठे बिठाए लोग मिल जाते हैं। इसलिए इस सवाल को जरा ध्यान से समझने की जरूरत है।
                           सरकार अभी आड़ा टैक्स की प्रणाली को बदलने के लिए GST बिल लेकर आ रही है। इसमें जो सुझाव है उसके अनुसार इसकी दर 22 से 27 % के बीच रहने वाली है। इसका मतलब ये है की आम आदमी जो भी सामान या सेवा (जैसे बिजली या टेलीफोन इत्यादि का बिल ) खरीदेगा उसे कुल कीमत का एक चौथाई पैसा केवल टैक्स के रूप में देना पड़ेगा। यानि एक गरीब आदमी जो 6000 रूपये महीने में घर चलाता है उसे भी पिछले दरवाजे से हर महीने 1500 रूपये टैक्स के रूप में देने पड़ेंगे। ये टैक्स सामान की कीमत में ही जुड़ा होता है इसलिए आम आदमी को तो इसका मालूम ही नही पड़ता। परन्तु इतना भारी टैक्स होने के बावजूद देश में इसके खिलाफ कोई बोल ही नही रहा है। सरकार और मीडिया ने मिलकर ऐसा माहौल बना दिया है जैसे ये टैक्स तो हमारी अर्थव्यवस्था के लिए बहुत ही जरूरी है और देश के हित में है।
                           दूसरी तरफ सीधा कर जो इनकम टैक्स के नाम से और धन कर के नाम से लिया जाता है उसमे धन कर को तो सरकार ने इस साल से खत्म कर दिया है। ये वो कर था जो बड़ी सम्पत्ति के स्वामियों से लिया जाता था और जिसे कभी भी सरकार ने ईमानदारी से इकट्ठा करने की कोशिश नही की। वरना अगर इसे ईमानदारी से इकट्ठा किया जाता तो इससे बहुत बड़ी रकम प्राप्त हो सकती थी और आम आदमी पर इसका कोई बोझ भी नही पड़ता। हमारे देश में एक नंबर की सम्पत्ति के जो आंकड़े मौजूद हैं उसके अनुसार हमारे देश में स्थाई सम्पत्ति एक करोड़ बाईस लाख सत्तर हजार करोड़ रूपये है। इसमें लोगों के बैंक में जमा पैसा, बीमा में जमा , शेयर और दूसरे फंड में जमा पैसा शामिल नही है। इसमें केवल सोना और रियल एस्टेट जैसी चीजे ही शामिल हैं। इसमें से 74 % सम्पत्ति के मालिक केवल ऊपर के 10 % लोग हैं। और उससे भी आगे ये की इसमें से 49 % सम्पत्ति के मालिक केवल 1 % लोग हैं। अगर उन 1 % लोगों की सम्पत्ति पर सालाना केवल 1 % टैक्स ही लिया जाये तो उसकी रकम सालाना 60000 करोड़ से ज्यादा बैठती है। और ये तो वो सम्पत्ति है जो एक नंबर की है और उसकी कीमत भी उन लोगों की ही बताई हुई है।  सरकार ने ये टैक्स कभी ईमानदारी से इकट्ठा नही किया और अब उसे समाप्त कर दिया।
                      अगला उदाहरण इनकम टैक्स का है। जब भी इनकम टैक्स की दर में ऊपर के स्तर पर बढ़ौतरी की मांग उठती है तो सबसे पहले इसका विरोध वो लोग करते हैं जिन्हे वो दर जिंदगी में कभी लागु नही होगी।
2011 -12 के आंकड़ों के अनुसार 5 लाख तक की कमाई वाले लोगों से कुल 15000 करोड़ रुपया इकट्ठा हुआ था और उनकी संख्या 28844000 थी। अगर इन लोगों को टैक्स की स्लैब में 50000 रूपये की छूट दे दी जाती है तो सरकार को कुल मिला कर  5000 करोड़ का भी नुकशान नही होगा। दूसरी तरफ 20 लाख से ऊपर की कमाई बताने वाले लोगों की संख्या केवल 4 लाख 6 हजार थी। अगर इन लोगों की स्लैब में 30 % से बढ़ाकर 40 % की स्लैब कर दी जाये तो सरकार को करीब 23000 करोड़ रुपया ज्यादा मिल सकता है। सारे फेरबदल से लाभ होने वाले लोगों की संख्या 3 करोड़ है और असर पड़ने वाले लोगों की संख्या केवल 4 लाख है और सरकार को करीब 18000 करोड़ का फायदा भी हो सकता है। ये 2012 के आंकड़े हैं और अब 2015 है। इसलिए अगर एक करोड़ सालाना से ज्यादा कमाई बताने वाले लोगों पर 40 % की स्लैब लागु कर दी जाये तो मुश्किल से एक लाख लोग इससे प्रभावित होंगे और सरकार की कमाई करीब 25000 करोड़ बढ़ जाएगी।
                          लेकिन सरकार इससे उल्टा कर रही है। उसने कॉर्पोरेट टैक्स की दर को 5 % घटा दिया, धन कर खत्म कर दिया और आम लोगों पर वैट बढ़ाने जा रही है। ये सारी व्यवस्था अमीरों को और अमीर बनाने और गरीबों को गरीब बनाने के हिसाब से चल रही है। और ना केवल चल रही है बल्कि देश के मध्यम वर्ग का समर्थन भी प्राप्त कर रही है।रिजर्व बैंक द्वारा जारी किये गए 2012 -13  के अनुसार हमारे देश में कुल टैक्स उगाही में सीधे करों का हिस्सा 38 . 44 % है और आड़ा करों का हिस्सा 61 . 56 % है। गरीबी  और अमीरी का अंतर कम करने के लिए इस अनुपात को उल्टा करना जरूरी है। इसलिए इससे जो मुख्य बातें निकल कर आती हैं वो इस प्रकार हैं। ---
१.   इन्कम टैक्स की दर को एक करोड़ से ऊपर कमाई वाले लोगों के लिए 40 % किया जाये।
२.  कॉर्पोरेट टैक्स को घटाना बंद किया जाये।
३.  जीवन जरूरत की चीजों पर वैट हटाया जाये।
४.  धन कर को दुबारा और प्रभावशाली तरीके से लागु किया जाये और इसकी दर सालाना 1 % रखी जाये।