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Friday, December 16, 2016

व्यंग -- रेल यात्रा के दौरान चाय " वाले " पर चर्चा

                 अभी अभी रेल द्वारा दिल्ली से घर पहुंचा हूँ। रेल की यात्रा भी किसी भारत भृमण से कम नही होती है। पहले तो इस पर इम्तिहान में प्रस्ताव तक लिखवाये जाते थे। आज भी ऐसा ही हुआ। रेल में सबसे ज्यादा चर्चा नोटबन्दी पर हो रही थी। लगभग सभी लोग अपनी अपनी परेशानियां गिनवा रहे थे। तभी किसी ने कहा की क्यों ना चाय पी ली जाये। उसके बाद चर्चा का रुख चाय की तरफ मुड़ गया।
                   एक आदमी ने कहा की अगर किसी से पूछा जाये की दुनिया में सबसे घटिया चाय कहाँ मिलती है तो वो बिना सोचे बता देगा की रेल में। रेल मंत्री प्रभुजी बेसक रेल में सर्ज प्राइस लागु करवा सकते हैं, लेकिन रेल की चाय का स्तर नही सुधार सकते।
                   भाई लेकिन एक बात है, एक चायवाला चिल्ला चिल्ला कर कह रहा था की उसने रेल में चाय बेचीं है फिर भी लोगों ने पुरे देश की चाय बनाने का ठेका उसको ही दे दिया और अब चाय की शिकायत कर रहे हैं। दूसरे आदमी ने हंसते हुए कहा।
                  सब जोर से हंस पड़े। तभी एक चायवाला डिब्बे में दाखिल हुआ। उसने आते ही आवाज लगाई। गरमागरम चाय पी लो, अदरक इलायची वाली चाय !अच्छी ना लगे तो पैसे मत देना।
                  एक आदमी ने पूछा की भाई चाय गर्म तो है ना ?
                  बिलकुल, अभी अभी ताजी बना कर लाया हूँ , दस मिनट भी नही हुए।  चाय वाले ने जवाब दिया।
                  दूसरे आदमी ने पूछा की इसमें अदरक इलायची है क्या सचमुच में ?
                  एकदम है  भाई साब , बिना अदरक और इलायची के चाय क्या ख़ाक बनेगी ? वो तो डालनी ही पड़ती है। चाय वाले ने कहा।
                 देखो अगर चाय अच्छी नही हुई तो पैसे नही देंगे, पहले बता देते हैं। एक और यात्री ने तसल्ली करने के लिए कहा।
                  अरे अगर चाय अच्छी नही होगी तब न ! पहले पी लो बाद में पैसे देना। चाय वाले ने पुरे आत्मविश्वास से कहा।
                   सबने उससे चाय ले ली। पहली घूंट भरते ही मुंह का स्वाद बिगड़ गया। चाय वैसी ही थी जैसी रेल में होती है।
                   ये तो लगभग ठंडी हो चुकी है।  एक यात्री ने कहा।
                  अब घर से यहां तक आते आते इतनी ठंडी तो हो ही जाती है। वैसे अभी भी काफी गर्म है। इससे ज्यादा गरम तो पी भी नही जा सकती। चाय वाले ने आराम से उत्तर दिया।
                  लेकिन इसमें अदरक और इलायची का तो निशान भी नही है।  दूसरे यात्री ने शिकायत की।
                   हम तो डालते है साब, आपको मालूम नही पड़ा होगा। यकीन ना हो तो मेरे घर चल कर देख लीजिये, अब तक छलनी में मिलेगी।  चाय वाले ने इत्मिनान से कहा।
                   हम नही लेंगे इतनी घटिया चाय। लो वापिस लो। एक यात्री ने झल्लाकर कहा।
                    अब झूठी चाय कैसे वापिस ले सकता हूँ। आपको वापिस देनी थी तो बिना झूठी किये देते। चाय वाले ने कहा।
                    लेकिन तुमने तो कहा था की अच्छी ना लगे तो पैसे मत देना। अब क्या हो गया ? और बिना पिए कैसे पता चलेगा की चाय कैसी है।  उस यात्री ने प्रतिवाद किया।
                    देखिये भाई साब, पैसे तो आपको देने ही पड़ेंगे। जहां तक मेरे कहने का मतलब था तो चाय बेचने के लिए कुछ बातें तो कह दी जाती हैं उन को पकड़ कर नही बैठना चाहिए। समझ लीजिये की वो जुमला था।  चाय वाले ने पूर्ण शांति से बात पूरी की।
                     सब एक दूसरे का मुंह ताक रहे थे। आखिर में एक यात्री ने कहा, " दोनों एक जैसे निकले, ऊपर वाला भी और नीचे वाला भी। "
                 
            

Saturday, December 12, 2015

Comment on News -- बुलेट ट्रेन का सपना और हमारी स्थिति

जापान के साथ बुलेट ट्रेन का जो करार हुआ है उसकी आलोचना करने वालों को टीवी चैनल और उस पर बैठे सरकारी विशेषज्ञ उन्हें विकास और रोजगार का हवाला देकर चुप करवा रहे हैं और ऐसा माहोल बना रहे हैं जैसे बुलेट ट्रेन के आते ही भारत जापान में बदल जायेगा। लेकिन हमारी असली स्थिति क्या है ?
                 रेलवे की हालत बहुत ही खराब है। उसकी पटरियां पुरानी हो चुकी हैं और उसके कई पुलों की उम्र तो निधारित समय से दुगना समय गुजार चुकी है। ट्रेनों के डब्बे पुराने हो चुके हैं और बहुत बार दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं। पिछले दिनों जो रेल दुर्घटना हुई थी वो बगैर गार्ड के फाटक पर जीप के ट्रेन से टकराने की वजह से हुई थी। हमारे देश में अभी भी बिना चौकीदार की बहुत सी रेलवे फाटक हैं। दुर्घटनाओं को रोकने के लिए जो नया सिस्टम है उसको अभी हम सभी जगह नही लगा पा रहे हैं। अभी भी बहुत सी जगह छोटी लाइन है जिसे बड़ी लाइन में बदलना हमारे बजट से बाहर है। रेलवे सुरक्षा के लिए रेलवे सुरक्षा बल में बहुत सी जगह खाली हैं जिन्हे नही भरा जा रहा है। और रेल लाइनो का बिजलीकरण करने में तो हमे बहुत साल लगने वाले हैं।
                  पिछले साल का बजट हमारे रेल बजट के इतिहास का इकलौता ऐसा बजट था जिसमे एक भी नई योजना और एक भी नई ट्रेन की घोषणा नही की गयी थी। इसके लिए ये तर्क दिया गया था की अभी पिछली अधूरी और शुरू नही की गयी योजनाओं में बहुत काम बाकि है। इसलिए पहले उसे पूरा किया जायेगा और उसके बाद नई ट्रेन या योजनाएं घोषित की जाएँगी।
                  अब जब 98000 करोड़ की बुलेट ट्रेन योजना जापान से कर्जा लेकर शुरू की जा रही है तो क्या बाकि सभी योजनाएं पूरी हो चुकी हैं। ये सरकार हमेशा अपनी सुविधा के अनुसार अपने तर्क बदलती रही है। ये योजना अगर पूरी भी हो जाये तो भी इसका किराया इतना महंगा होगा की देश के 95 % लोगों की ओकात के बाहर होगा। अहमदाबाद से मुंबई तक की केवल 540 किलोमीटर की यात्रा के लिए 98000 करोड़ का खर्च एक बड़ा बोझ तो होगा ही साथ में एक क्षेत्रीय असंतुलन भी पैदा करेगा। इसकी लागत और इसकी कलेक्शन के बीच ऐसा ना हो की हर साल एयर इंडिया की तरह बजट से पैसा डालना पड़े।
                    जो लोग इस परियोजना से देश में रोजगार पैदा होने का तर्क दे रहे हैं उनसे मैं केवल इतना पूछना चाहता हूँ की अगर हमारी मौजूदा रेल की व्यवस्था सुधारने के लिए सामान का उत्पादन किया जाता तो क्या उससे रोजगार पैदा नही होता। जापान से कर्ज लेकर काम करना था तो वो उन क्षेत्रों में भी हो सकता था। बल्कि इससे ज्यादा रोजगार पैदा हो सकता था।
                      सपने देखना कोई बुरी बात नही है , लेकिन ओकात के बाहर के और अव्यवहारिक सपने देखना खतरनाक हो सकता है।