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Thursday, February 9, 2017

नोटबन्दी से कर्ज सस्ता होने की उम्मीद भी समाप्त।

                 

p chidambaram image speeking in parliament
8 नवम्बर को प्रधानमंत्री मोदी ने नोटबन्दी की घोषणा करते हुए इसके चार उद्देश्य बताये थे। उसके बाद हर दिन गुजरने के साथ उन्हें और उनकी सरकार को ये अहसास होने लगा की इन उद्देश्यों में से कोई भी पूरा नही होने जा रहा है। इसके बाद हर रोज वो और उनकी पार्टी इस पर अपना स्टैंड बदलने लगी। इसी क्रम में भृष्टाचार और कालेधन से होती हुई कैशलेस इंडिया की बातें करने लगी। लोगों को डिज़िटल लेनदेन करने के लिए मजबूर करने के तमाम उपाय किये गए। और कैशलेस होने का सबसे बड़ा फायदा ये बताया गया की एक तो इससे टैक्स चोरी रुकेगी, दूसरा बैंको के पास बड़ी मात्रा में कैश उपलब्ध होने के कारण लोगों को सस्ता कर्ज मिलेगा, जिससे अर्थव्यवस्था में तेजी आएगी। सरकार के सारे मंत्री लोगों को सस्ते कर्ज के फायदे गिनवाने लगे। नोटबन्दी की विफलता को छुपाने की ये सरकार की आखिरी कोशिश थी। लेकिन पिछले तीन दिन में ये कोशिश भी दम तोड़ गयी।
                        रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने मुद्रा पालिसी पर विचार करते हुए ये कह कर ब्याज दर घटाने से इंकार कर दिया की खुदरा महंगाई दर अपनी जगह चिपकी हुई है और कच्चे तेल और धातुओं के मूल्य में होने वाली बढ़ोतरी और रूपये की घटती हुई कीमत के कारण इसके बढ़ने का खतरा मौजूद है। इसलिए रेपो रेट में कोई भी बदलाव सम्भव नही है। इसके साथ की रिजर्व बैंक ने ब्याज दर कम होने के सायकिल के समाप्त होने की घोषणा करके भविष्य में ब्याज कम होने की सम्भावना पर भी पूर्णविराम लगा दिया।  RBI के निर्णय की घोषणा होते ही सभी बैंको के अध्यक्षों  घोषणा कर दी की और ब्याज कम करने के लिए अब बैंकों के पास कोई जगह ( रूम ) नही है। यानि ब्याज कम होने का आखरी बहाना भी समाप्त हो गया। अब सरकार के पास नोटबन्दी से हासिल फायदा गिनाने के लिए कुछ नही बचा है। नोटबन्दी का फैसला एक आपराधिक और गैरजिम्मेदाराना फैसला था जिसने देश की अर्थव्यवस्था को गंभीर और स्थाई नुकशान पहुंचाया है।
                        आज बजट पर चर्चा के दौरान राज्य सभा में बोलते हुए पूर्व वित्त मंत्री पी चिदम्बरम ने जिस तरह आंकड़ों के साथ सरकार के इस निर्णय की आलोचना की, उसका कोई भी जवाब बीजेपी के पास नही था। उसके नेता केवल कांग्रेस के 44 सीटों पर आ जाने जैसे घिसेपिटे जुमले ही दोहराते रहे। उन्होंने चिदम्बरम की एक भी बात का जवाब नही दिया।

Demonetisation a grave mistake by govt: P Chidambaram

                       आने वाले समय में नोटबन्दी सरकार के लिए विफलता का मील का पत्थर साबित होने जा रही है।

Tuesday, January 12, 2016

November IIP DATA -- पटरी से उत्तर रही है विकास की गाड़ी।

          ये सरकार जिस एक चीज का नाम लेकर सत्ता में आई थी वो थी विकास। इस सरकार ने चुनावों के दौरान विकास के बड़े बड़े वायदे किये थे। पुरे देश में मोदीजी ने विकास के गुजरात मॉडल को सभी समस्याओं का हल बताया था। जिन लोगों ने गुजरात को देखा नही था या फिर बीजेपी की नजर से देखा था, वो बहुत उत्साहित थे। मीडिया ने ऐसा माहौल बना दिया था जैसे बीजेपी और नरेंद्र मोदी के आते ही विकास की गाड़ी सरपट दौड़ने लगेगी। कॉर्पोरेट सैक्टर भी कोल् और 2G के सारे अहसान और लूट को भूलकर जो कांग्रेस ने उसको खुली छूट देकर लूटने दिया था, नरेंद्र मोदी के पीछे लामबंद हो गया। लेकिन इस देश की विशेषताओं को समझते हुए कोई सही विकास का मॉडल उसके पास नही था। उसने UPA से जिस अवस्था में गाड़ी संभाली थी उसे वो एक इंच भी आगे नही बढ़ा पाई। आशंका तो ये जाहिर की जा रही हैं की अगर सरकार इन्ही नीतियों पर चलती रही तो देश की गाड़ी गड्ढे में उतर जाएगी।
           आज नवंबर महीने के IIP के आंकड़े घोषित हुए हैं। उनके अनुसार IIP की दर -3. 2 % है। पिछले महीने यही दर जब 9 . 8 % आई थी तो इस सरकार के मंत्रियों ने बहुत जोर जोर से अपनी पीठ थपथपाई थी। इसी ब्लॉग में मैंने तब भी लिखा था की त्योहारों के महीने के आंकड़ों से विकास  अंदाजा नही लगाया जाना चाहिए और कम से कम तीन लगातार महीनो के आंकड़े आने तक इंतजार करना चाहिए। उस समय का विश्लेषण
करते हुए हमने उसको उदाहरण ना मानने के कारण बताये थे। अब नवंबर के आंकड़े उसके आसपास तो दूर, नकारात्मक स्थिति में आ गए हैं। हालाँकि जिस तरह त्योहारों के महीने में अतिरिक्त उत्पादन होता है उसी तरह उसके तुरंत बाद के महीने में उत्पादन में एकदम कमी भी आती है। लेकिन इन आंकड़ों में सबसे ज्यादा चिंता का आंकड़ा है कैपिटल गुड्स में जो -25 % है। किसी भी विकासशील अर्थव्यवस्था में इस मद में एक अच्छी वृद्धि की उम्मीद की जाती है।
                दूसरी चिंता की बात ये है की उपभोक्ता महंगाई की दर बढ़ रही है। जिसमे खाद्य पदार्थों के मामले में ये 6 . 4 % हो गयी है जो वांछित दर से ज्यादा है। इसलिए रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज कम करने की संभावना खत्म हो जाती है।
                   कुल मिलाकर देश के विकास की गाड़ी पटरी से उतर रही है। और दूसरी तरफ इस सरकार का ध्यान लोगों की खरीद शक्ति बढ़ाने के उपाय करने की बजाय बुलेट ट्रेन जैसे अव्यवहारिक प्रोजेक्टों पर है। जिनसे केवल देश पर ब्याज और भुगतान का दबाव ही पैदा होगा।