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Wednesday, August 30, 2017

नोटबंदी के कारण 2 लाख फर्जी कम्पनियां पकड़े जाने का झूठ

                       नोटबंदी की विफलता इतनी बड़ी है की अब इसका उद्देश्य साबित करने की कोशिश में सरकार हकलाने लगी है। अब उसको खुद नहीं पता होता की वो क्या कह रही है और क्यों कह रही है।  इस विफलता को छिपाने की कोई भी कोशिश कामयाब नहीं हो पा रही है। शुरू में इसकी सफलता पर कुछ अर्थशास्त्री सवाल उठा रहे थे, कुछ समय बाद साधारण अर्थशास्त्र का विद्यार्थी भी इसकी विफलता को समझने लगा था। अब तो हालत ये है की साधारण आदमी, जिसका अर्थशास्त्र से कोई लेना देना नहीं है वो भी इसकी विफलता को खुली आँखों से देख सकता है। अब अगर कोई नोटबंदी के फायदे गिनवाने की कोशिश करता है तो सामने वाला पहले ही हसना शुरू कर देता है।
                         इस क्रम में सबसे ज्यादा फजीहत अगर किसी की हुई है तो वो है रिजर्व बैंक। सरकार के फैसले की जिम्मेदारी और उसकी विफलता को छुपाने की कोशिश में रिजर्व बैंक ने अपनी साख में बट्टा लगा लिया है। लगातार नो महीने तक ये कहना की अभी वो नोटों की गिनती कर रहा है, उसे हास्यास्पद स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है। हालाँकि इस फैसले की सफलता और विफलता की पूरी जिम्मेदारी प्रधानमंत्री की है, लेकिन हमारे प्रधानमंत्री तो अब मान-अपमान और हंसी मखौल से ऊपर उठ चुके हैं। अब तो हालत ये है की प्रधानमंत्री कुछ भी बोल देते हैं और सरकार तुरंत उस बयान की सफाई ढूढ़ने में लग जाती है। जैसे 56लाख नए करदाता जुड़ने वाला बयान। जिस पर वित्तमंत्रालय  से लेकर CBDT तक सफाई नहीं पेश कर पा रहे हैं और उस पर बड़ी बात ये की ये आंकड़ा प्रधानमंत्री ने लालकिले से पेश कर दिया।
                        अब रिजर्व बैंक ने आखिर में ये आंकड़ा पेश कर दिया है की 99 % नोट बैंक में वापिस आ गए हैं। यानि रिजर्व बैंक के अनुसार जो केवल मात्र 16 हजार करोड़ के नोट वापिस नहीं आये उनकी रकम उतनी भी नहीं बनती जितना नए नोटों पर खर्चा हो गया है। और इसमें भी एक चालाकी की गयी है। रिजर्व बैंक ने ये आंकड़ा देते हुए (मार्च तक ) शब्द का प्रयोग किया है। सबको मालूम है की मार्च तक सरकार ने जिला कोपरेटिव बैंको में जमा 1000 और 500 के नोटों को स्वीकार नहीं  किया था। अगर उस रकम को भी जोड़ लिया जाये  तो लोगों की वो आशंका सही साबित हो जाएगी की कहीं घोषित रकम से ज्यादा नोट तो वापिस नहीं आ गए। क्योंकि लोगों को शक है की नोट जमा कराने के दौरान बड़े पैमाने पर नकली नोट भी जमा हुए हो सकते हैं, क्योंकि रिजर्व बैंक के पास तो नोट गिनने तक का इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं था फिर असली नकली देखने का तो सवाल ही कहां पैदा होता है।
                      लेकिन अब रिजर्व बैंक का आंकड़ा सामने आने के बाद सरकार एक बार फिर नोटबंदी की सफलता के पक्ष में एक बहुत ही हास्यास्पद तर्क दे रही है। वो तर्क ये है की नोटबंदी के कारण 2 लाख फर्जी कम्पनियों का पता चला। जो लोग भी थोड़ा सा भी इस प्रक्रिया को समझते हैं की इन तथाकथित फर्जी कम्पनियों और नोटबंदी का आपस में कोई लेना देना नहीं है। असल में ये मामला इस तरह है - हर साल लाखों लोग रजिस्ट्रार ऑफ़ कम्पनीज ( ROC ) के पास नई कम्पनी रजिस्टर्ड करवाते हैं। इसके पीछे भविष्य में कोई काम शुरू करने की इच्छा होती है। लेकिन कई तरह के कारणों की वजह से वो कामकाज शुरू नहीं कर पाते हैं। इसलिए उनमे से बहुत से लोग ROC में सालाना लेखा पेश नहीं करते। और कुछ शून्य कामकाज का लेखा पेश करते हैं। ROC अपने नियमो के हिसाब से लेखा पेश न करने वाली कंपनियों की सदस्य्ता हर साल कैंसिल कर देती है। ये एक सामान्य प्रक्रिया है और इसका रिकार्ड हमेशा ROC के पास रहता है। इस साल सरकार के कहने पर ROC ने ऐसी कम्पनियों का रजिस्ट्रेशन बड़ी तादाद में एक साथ रद्द कर दिया। बस इतना सा मामला है और इसका नोटबंदी से कुछ भी लेना देना नहीं है। ROC को हमेशा पता होता है की कितनी कम्पनिया शून्य कामकाज के स्तर पर हैं।
                      अब सरकार इसको इस तरह पेश कर रही है जैसे उसने बहुत बड़ा गोलमाल पकड़ लिया हो जो सालों से चल रहा था। अगर ऐसा है तो सरकार बताये की कितने लोगों पर केस दर्ज हुआ है। और कितने लोग जेल के अंदर हैं। जबकि ऐसा कुछ नहीं है। सरकार का व्यवहार खिसियायी बिल्ली जैसा हो गया है और इसके  कारण हमारा देश पूरी दुनिया में मजाक का पात्र बन गया है।

Sunday, July 23, 2017

मुद्रा लोन, रोजगार के आंकड़े और नोटों की गिनती।

                    अभी अभी केंद्र सरकार का बयान आया है की उसने पिछले तीन सालों में सात करोड़ से ज्यादा लोगों को रोजगार दिया है। और ये रोजगार उसने मुद्रा बैंक से साढ़े तीन लाख करोड़ लोन देकर दिया है। उसके बाद सब तरफ इसकी चर्चा है और कुछ भक्त तो ये भी कह रहे हैं की देखो, मोदीजी ने वायदा तो सालाना दो करोड़ नौकरियों का किया था और रोजगार सात करोड़ से ज्यादा लोगों को दे दिया।
                     इस पर सबसे ज्यादा हैरानी की बात ये है की लोगों को पता ही नहीं है की सरकार ने उनको रोजगार दे दिया। और लोग हैं की फालतू में लाइन लगा कर खड़े हैं और सरकार को कोस रहे हैं। अब सरकार का काम लोगों को रोजगार देना था सो दे दिया, लोगों को इसका पता लगे न लगे ये सरकार की जिम्मेदारी थोड़ी है। कुछ लोग कह रहे हैं की वायदा नौकरियों का था और सरकार अब घुमा फिरा कर रोजगार के आंकड़े दे रही है। इस पर भक्त लोग कह रहे हैं की रोजगार और नौकरी में क्या फर्क होता है ? लोगों की भाषा कमजोर है तो ये मोदीजी की जिम्मेदारी थोड़ी है।
                       ये बयान सुनते ही मेरे पड़ौसी तुरंत मेरे घर पर आ धमके। पता नहीं वो मेरे घर को सरकार का लोक सम्पर्क विभाग का दफ्तर क्यों समझते हैं ? आते ही सवाल दागा ," ये सात करोड़ लोगों को रोजगार कैसे दे दिया ?"
                       मैंने कहा, " जब सरकार कह रही है तो दिया ही होगा। वैसे सरकार का कहना है की उसने सात करोड़ लोगों को साढ़े तीन लाख करोड़ का लोन मुद्रा योजना से दिया है जिससे उन्हें रोजगार मिला। "
                       " लेकिन लोन तो पहले से धंधा कर रहे लोगों को मिलता है। अगर किसी छोटे दुकानदार ने अपनी पूंजी की जरूरत के लिए पचास हजार का लोन ले लिया तो क्या उसे दूसरा रोजगार मिल गया। वो तो पहले से ही रोजगार शुदा था। " पड़ोसी ने अगला सवाल किया।
                        मैंने कहा ," देखो, अगर किसी दुकानदार के पास पैसे नहीं हैं तो उसे तो देर सबेर बेरोजगार होना ही था। तुम ऐसा समझ लो की सरकार ने उसे एडवांस में रोजगार दे दिया। "
                          " ऐसे कैसे समझ लें ? तुमने पहले से रोजगार शुदा लोगों को लोन दिया और अब उसे नए रोजगार में खपा रहे हो। " पड़ोसी ने सख्त एतराज किया और लगभग मुझे ही सरकार मान लिया।
                       " देखो, तुम ये तो मानते ही हो न की देश में बहुत भृष्टाचार है। इसमें बहुत से लोगों ने गलत काम धंधा दिखाकर और बैंक के लोगों से मिलीभगत करके भी लोन लिया होगा। इसके अलावा सरकारी पार्टी के कार्यकर्ताओं को भी लोन मिला होगा। तो उनको रोजगार मिला की नहीं ?" मैंने स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की।
                       मेरे पड़ोसी की आँखे चौड़ी हो गयी। उसने गर्दन हिला कर कहा। " बहुत अच्छे, चलो ये बताओ की सरकार को कैसे पता चला की साढ़े तीन लाख करोड़ का लोन दिया गया है ?"
                           " कमाल  करते हो, बैंको के आंकड़े हैं और कैसे पता चलेगा। " मैंने कहा।
                        "लेकिन रिजर्व बैंक में तो अभी तक नोटों की गिनती चल रही है। उसको तो ये भी नहीं मालूम की उसके पास कितना पैसा है। वो कैसे बता सकता है की कितने का लोन दिया। अगर सारे नोट गिनने के बाद एक दो लाख करोड़ का फर्क आ गया तो क्या करोगे ?" मेरे पड़ोसी ने आखरी पैंतरा आजमाया।
                        " तो सरकार अपने आंकड़े सुधार लेगी और क्या करेगी। अगर रकम बढ़ गयी तो विजय माल्या के खाते में जमा कर देंगे। " मैंने पीछा छुड़वाना चाहा।
                         हा हा हा। पड़ोसी ने ठहाका लगाया और चला गया।

Thursday, February 9, 2017

नोटबंदी - जीना भी मुश्किल, मरना भी मुश्किल।

           ये एक पुरानी हिंदी फिल्म का गीत है जो अब हम सब भारतीयों पर खरा उतर रहा है। जब से नोटबन्दी हुई है और सरकार रोज नए नए नियम तय कर रही है उससे लोगों का जीना तो मुश्किल हो ही गया था, अब मरणा भी मुश्किल हो गया है। जैसे - 
             रिजर्व बैंक ने करंट खातों से रकम उठाने की सीमा खत्म करने की घोषणा कर दी। साथ ही एटीएम से भी सीमा हटा ली गयी। लेकिन इसके साथ निजी कम्पनियों की तरह एक टर्म एंड कन्डीशन लगा दी। वो ये है की रिजर्व बैंक ने भले ही सीमा हटा ली हो, लेकिन बैंक अपनी सुविधा के अनुसार सीमा तय कर सकते हैं। अब हाल ये है की बैंक में 20000 का चैक लेकर जाओ तो बैंक कहता है की केवल 12000 मिल सकते हैं। अब क्या करें ? यानी जीना भी मुश्किल, और मरना भी मुश्किल।
              यही हाल एटीएम का है। सीमा समाप्त कर दी गयी है लेकिन एटीएम बन्द हैं। पुरे शहर में 15 - 20 % एटीएम ही चालू हैं। उनमे भी कब कैश खत्म हो जायेगा पता नही है। मार्च के बाद सरकार और RBI सारी सीमाएं हटाने की घोषणा कर देंगी। लेकिन देश बन्द एटीएम और बैंक में नाकाफी नकदी के भरोसे रह जायेगा।
              दूसरा मुद्दा सरकार के दूसरे नियमो का है। सरकार कहती है की आप घर पर एक सीमा से ज्यादा पैसा नही रख सकते। अगर जरूरत है तो डिजिटल पेमेन्ट करिये। डिजिटल पेमेन्ट करेंगे तो चार्ज लगेगा। आप बैंक से नकदी निकालेंगे तो चार्ज लगेगा। आपकी मजबूरी है की आप चार्ज देकर भुगतान करें। सारा देश बंधक हो गया और इसको लोकतंत्र कहते हैं। ये पूरी दुनिया में अपनी तरह का अकेला लोकतंत्र है। प्रधानमंत्री कहते हैं की पूरी दुनिया के अर्थशास्त्रियों के पास हमारी नोटबन्दी का मूल्यांकन करने का पैमाना ही नही है। यानि पूरी दुनिया के अर्थशास्त्रियों ने अब तक जो पढ़ा है वो सब बेकार गया। अब इस लोकतंत्र के मूल्यांकन के लिए भी दुनिया के समाजशास्त्रियों और राजनीती के विद्यार्थियों को नए पैमाने तय करने पड़ेंगे। उन्हें ये सीखना होगा की अब तक वो जिसे तानाशाही कहते आये हैं, उसे अब लोकतंत्र में कैसे फिट किया जाये।
               अब आपको जिन्दा रहने का चार्ज देना पड़ेगा। कैश निकलोगे तो चार्ज और डिजिटल पेमेंट करोगे तो चार्ज। और लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए इसमें भी बायें हाथ से जेब काटने का प्रबन्ध किया गया है। सरकार कहती है की कार्ड से पट्रोल खरीदने पर ग्राहक को कोई चार्ज नही देना पड़ेगा और की चार्ज का भुगतान तेल कम्पनियां करेंगी। यानि तेल कम्पनियां चार्ज का खर्च निकालने के लिए कीमत उस हिसाब से तय करेंगी। सरकार तो पहले ही कह चुकी है की अब तेल की कीमतें तय करना कम्पनियों पर छोड़ दिया गया है और सरकार का उसमे कोई दखल नही है। यानि अब आपको तेल की कीमत में चार्ज जोड़ कर देना होगा। इसी तरह बाकि सामान की कार्ड पेमेंट करने पर दुकानदार को जो चार्ज देना होता है वो सामान की कीमत में जुड़ जाता है। जाहिर है की कोई भी व्यापारी अपने पास से उसका भुगतान क्यों करेगा। इस तरह अब आपकी जेब काटने से पहले आपको देशभक्ति और भृष्टाचार से लड़ने वाले सिपाही होने का एनस्थिसिया दिया जायेगा और फिर आपकी जेब काटी जाएगी। और आप जेब कटवाकर ख़ुशी ख़ुशी मोदी मोदी करते हुए घर चले जायेंगे। जो लोग सरकार की इस बाजीगरी को नही समझते हैं और भक्ति की मुद्रा में हैं उनको तो कोई परेशानी नही है। जो लोग इसको समझते हैं उनके लिए तो जीना भी मुश्किल, मरना भी मुश्किल।

नोटबन्दी से कर्ज सस्ता होने की उम्मीद भी समाप्त।

                 

p chidambaram image speeking in parliament
8 नवम्बर को प्रधानमंत्री मोदी ने नोटबन्दी की घोषणा करते हुए इसके चार उद्देश्य बताये थे। उसके बाद हर दिन गुजरने के साथ उन्हें और उनकी सरकार को ये अहसास होने लगा की इन उद्देश्यों में से कोई भी पूरा नही होने जा रहा है। इसके बाद हर रोज वो और उनकी पार्टी इस पर अपना स्टैंड बदलने लगी। इसी क्रम में भृष्टाचार और कालेधन से होती हुई कैशलेस इंडिया की बातें करने लगी। लोगों को डिज़िटल लेनदेन करने के लिए मजबूर करने के तमाम उपाय किये गए। और कैशलेस होने का सबसे बड़ा फायदा ये बताया गया की एक तो इससे टैक्स चोरी रुकेगी, दूसरा बैंको के पास बड़ी मात्रा में कैश उपलब्ध होने के कारण लोगों को सस्ता कर्ज मिलेगा, जिससे अर्थव्यवस्था में तेजी आएगी। सरकार के सारे मंत्री लोगों को सस्ते कर्ज के फायदे गिनवाने लगे। नोटबन्दी की विफलता को छुपाने की ये सरकार की आखिरी कोशिश थी। लेकिन पिछले तीन दिन में ये कोशिश भी दम तोड़ गयी।
                        रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने मुद्रा पालिसी पर विचार करते हुए ये कह कर ब्याज दर घटाने से इंकार कर दिया की खुदरा महंगाई दर अपनी जगह चिपकी हुई है और कच्चे तेल और धातुओं के मूल्य में होने वाली बढ़ोतरी और रूपये की घटती हुई कीमत के कारण इसके बढ़ने का खतरा मौजूद है। इसलिए रेपो रेट में कोई भी बदलाव सम्भव नही है। इसके साथ की रिजर्व बैंक ने ब्याज दर कम होने के सायकिल के समाप्त होने की घोषणा करके भविष्य में ब्याज कम होने की सम्भावना पर भी पूर्णविराम लगा दिया।  RBI के निर्णय की घोषणा होते ही सभी बैंको के अध्यक्षों  घोषणा कर दी की और ब्याज कम करने के लिए अब बैंकों के पास कोई जगह ( रूम ) नही है। यानि ब्याज कम होने का आखरी बहाना भी समाप्त हो गया। अब सरकार के पास नोटबन्दी से हासिल फायदा गिनाने के लिए कुछ नही बचा है। नोटबन्दी का फैसला एक आपराधिक और गैरजिम्मेदाराना फैसला था जिसने देश की अर्थव्यवस्था को गंभीर और स्थाई नुकशान पहुंचाया है।
                        आज बजट पर चर्चा के दौरान राज्य सभा में बोलते हुए पूर्व वित्त मंत्री पी चिदम्बरम ने जिस तरह आंकड़ों के साथ सरकार के इस निर्णय की आलोचना की, उसका कोई भी जवाब बीजेपी के पास नही था। उसके नेता केवल कांग्रेस के 44 सीटों पर आ जाने जैसे घिसेपिटे जुमले ही दोहराते रहे। उन्होंने चिदम्बरम की एक भी बात का जवाब नही दिया।

Demonetisation a grave mistake by govt: P Chidambaram

                       आने वाले समय में नोटबन्दी सरकार के लिए विफलता का मील का पत्थर साबित होने जा रही है।

Sunday, December 18, 2016

नोटबन्दी ने गरीबों को कहीं का नही छोड़ा।

                व्यक्ति के अहंकार का मूल उसकी मूर्खता में होता है। हर मुर्ख व्यक्ति दम्भी और अहंकारी होता है। जब ये स्थिति किसी सरकार चलाने वालों के साथ होती है तो स्थिति बहुत ही भयावह हो जाती है। ठीक वैसी ही, जैसी अब है। लोग भूख से मर रहे हैं, अर्थव्यवस्था तबाह हो गयी है, काम धंधे बन्द हैं और सरकार के मंत्री अपनी वफादारी सिद्ध करने की होड़ में इस फैसले को कभी ऐतिहासिक तो कभी गेम चेंजर बता रहे हैं। रोज बैंक की लाइनों से लाशें घर लोट रही हैं, मजबूर, रोते बिलखते लोगों के फोटो अख़बार में छप रहे हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार जाने वाली ट्रेने वापिस लौटते हुए मजदूरों से भरी हुई हैं। किसान अपनी उपज को सड़कों पर फेंक देने को मजबूर हैं। सभी छोटे और मध्यम उद्योग लगभग बन्दी की हालत में हैं। और सरकार के वरिष्ठ मंत्री, प्रधानमंत्री सहित, टीवी पर डिजिटल इकोनॉमी के फायदे बता रहे हैं। एक लोकतान्त्रिक देश के लोगों के साथ इससे क्रूर मजाक हो नही सकता।
                  कॉरपोरेट मीडिया और कॉरपोरेट की सरकार द्वारा तय किये गए मापदण्ड कुछ लोगों के दिमाग पर इतने हावी हो चुके हैं की वो अपनी समझबूझ खो चुके हैं। अब भी कुछ लोग हैं जो नोटबन्दी के फायदे समझाने लगते हैं। उन्हें देख कर तरस आता है। आजादी से पहले भी कुछ लोग अंग्रेजी हुकूमत के फायदे गिनवाते थे। अंग्रेजो को विकास का प्रतीक बताया जाता था। अब भी वैसा ही है। उन्हें कुछ भी दिखाई नही देता।
                    लोगों की तकलीफों को छुपाने की भरसक कोशिशों के बावजूद टीवी कुछ ऐसे दृश्यों को दिखाने के लिए मजबूर है जिसमे चाय बागानों के मजदूर झाड़ियों के पत्ते उबाल कर खा रहे हैं। उन्हें कहा जा रहा है की भविष्य की बेहतरी के लिए सब्र करें। किसका भविष्य ? जिन लोगों को दो वक्त की रोटी विलासिता लगती हो वो भूखे रहकर किस भविष्य की उम्मीद करें। पीठ पर बैग लटकाये बेरोजगार नोजवानो की एक भीड़,  जिसके लिए देश का सबसे क्रन्तिकारी नेता वो है जो फ्री वाईफाई दे दे , आज देश में विचार के मुद्दे तय कर रही है। जो कारपोरेट की भाषा बोलती है और गैस की सब्सिडी लेने पर अपने माँ बाप को मुफ्तखोर कहती है। क्या उसे मालूम है की जो किसान अपनी उपज सड़क पर फेंक कर जा रहा है वो उसके आधा साल की मेहनत का परिणाम है। आज जब उसे खेत में डालने के लिए खाद नही मिल रहा है तो उसका भविष्य उसकी आँखों के सामने बरबाद हो रहा है। अगर दो या तीन महीने के बाद स्थिति थोड़ी बहुत सामान्य हो भी जाती है, जिसकी उम्मीद नही है तो भी उसके किस काम की ? ये कोई मोबाइल का रिचार्ज नही है की जब पैसा आएगा तब करवा लेंगे। पहले से जीवन मृत्यु की लड़ाई लड़ रहा कृषि क्षेत्र तब तक लकवे का शिकार हो जायेगा।
                   उसके बावजूद सरकार अपने जनविरोधी फैसले पर अडिग है। उसके सारे वायदे एक एक करके खोखले साबित हो चुके हैं। अब ना कालेधन का कोई सवाल बचा है, ना आतंकवाद की टूटी हुई कमर दिखाई दे रही है और जाली नोटों का तो ये हाल है की शायद जितने जाली नोट अब पकड़े गए हैं उतने तो दस साल में भी नही पकड़े गए होंगे। अब सरकार मुंह छुपाने के लिए डिजिटल इकोनॉमी की बात कर रही है। क्या करेगी सरकार उसके लिए ? बीजेपी के कार्यकर्ताओं को भेजेगी लोगों को डिजिटल इकोनॉमी के फायदे बताने और paytm की app कैसे काम करती है उसकी ट्रेनिग देने ? जिस देश की 35 % जनता को सरकार 70 साल में क ख ग नही सीखा पाई ( गुजरात सहित ) , उसे अब दो महीने में डिजिटल कर दिया जायेगा ? इससे बड़ा मजाक हो नही सकता। इस पर टीवी पर भाषण देने वाले लोग असल में इस देश के बारे में कुछ नही जानते। हर रोज सरकार के प्रतिनिधि नए नियम और नई धमकियां लेकर आ जाते हैं। संसद को पहली बार सरकार ने नही चलने दिया। जब विपक्ष ने बहस के किसी नियम पर सहमति दिखाने की कोशिश की तभी सरकार  सांसद तख्तियाँ लिए नारे लगाते हुए नजर आये। प्रधानमंत्री रैली में कहते हैं की उन्हें संसद में बोलने नही  दिया गया, क्या वो एक फुटेज दिखा सकते हैं की जब वो बोलने के लिए खड़े हुए हों। नही। हर रोज नोटबन्दी का विरोध करने वालों को देशद्रोही बताया जा रहा है। खुद प्रधानमंत्री अपने पार्टी के सांसदों को विपक्ष का पर्दाफाश करने का आव्हान कर रहे हैं। उन्हें कालेधन के समर्थक करार दे रहे हैं। अब किसका पर्दाफाश करेंगे ? सारे बैंकों, सरकार के दिए गए संवैधानिक वचनों और नागरिक अधिकारों का तो पहले ही पर्दाफाश हो चूका है।
नोटबन्दी ने गरीबों को कहीं का नही छोड़ा।

Friday, December 16, 2016

व्यंग -- रेल यात्रा के दौरान चाय " वाले " पर चर्चा

                 अभी अभी रेल द्वारा दिल्ली से घर पहुंचा हूँ। रेल की यात्रा भी किसी भारत भृमण से कम नही होती है। पहले तो इस पर इम्तिहान में प्रस्ताव तक लिखवाये जाते थे। आज भी ऐसा ही हुआ। रेल में सबसे ज्यादा चर्चा नोटबन्दी पर हो रही थी। लगभग सभी लोग अपनी अपनी परेशानियां गिनवा रहे थे। तभी किसी ने कहा की क्यों ना चाय पी ली जाये। उसके बाद चर्चा का रुख चाय की तरफ मुड़ गया।
                   एक आदमी ने कहा की अगर किसी से पूछा जाये की दुनिया में सबसे घटिया चाय कहाँ मिलती है तो वो बिना सोचे बता देगा की रेल में। रेल मंत्री प्रभुजी बेसक रेल में सर्ज प्राइस लागु करवा सकते हैं, लेकिन रेल की चाय का स्तर नही सुधार सकते।
                   भाई लेकिन एक बात है, एक चायवाला चिल्ला चिल्ला कर कह रहा था की उसने रेल में चाय बेचीं है फिर भी लोगों ने पुरे देश की चाय बनाने का ठेका उसको ही दे दिया और अब चाय की शिकायत कर रहे हैं। दूसरे आदमी ने हंसते हुए कहा।
                  सब जोर से हंस पड़े। तभी एक चायवाला डिब्बे में दाखिल हुआ। उसने आते ही आवाज लगाई। गरमागरम चाय पी लो, अदरक इलायची वाली चाय !अच्छी ना लगे तो पैसे मत देना।
                  एक आदमी ने पूछा की भाई चाय गर्म तो है ना ?
                  बिलकुल, अभी अभी ताजी बना कर लाया हूँ , दस मिनट भी नही हुए।  चाय वाले ने जवाब दिया।
                  दूसरे आदमी ने पूछा की इसमें अदरक इलायची है क्या सचमुच में ?
                  एकदम है  भाई साब , बिना अदरक और इलायची के चाय क्या ख़ाक बनेगी ? वो तो डालनी ही पड़ती है। चाय वाले ने कहा।
                 देखो अगर चाय अच्छी नही हुई तो पैसे नही देंगे, पहले बता देते हैं। एक और यात्री ने तसल्ली करने के लिए कहा।
                  अरे अगर चाय अच्छी नही होगी तब न ! पहले पी लो बाद में पैसे देना। चाय वाले ने पुरे आत्मविश्वास से कहा।
                   सबने उससे चाय ले ली। पहली घूंट भरते ही मुंह का स्वाद बिगड़ गया। चाय वैसी ही थी जैसी रेल में होती है।
                   ये तो लगभग ठंडी हो चुकी है।  एक यात्री ने कहा।
                  अब घर से यहां तक आते आते इतनी ठंडी तो हो ही जाती है। वैसे अभी भी काफी गर्म है। इससे ज्यादा गरम तो पी भी नही जा सकती। चाय वाले ने आराम से उत्तर दिया।
                  लेकिन इसमें अदरक और इलायची का तो निशान भी नही है।  दूसरे यात्री ने शिकायत की।
                   हम तो डालते है साब, आपको मालूम नही पड़ा होगा। यकीन ना हो तो मेरे घर चल कर देख लीजिये, अब तक छलनी में मिलेगी।  चाय वाले ने इत्मिनान से कहा।
                   हम नही लेंगे इतनी घटिया चाय। लो वापिस लो। एक यात्री ने झल्लाकर कहा।
                    अब झूठी चाय कैसे वापिस ले सकता हूँ। आपको वापिस देनी थी तो बिना झूठी किये देते। चाय वाले ने कहा।
                    लेकिन तुमने तो कहा था की अच्छी ना लगे तो पैसे मत देना। अब क्या हो गया ? और बिना पिए कैसे पता चलेगा की चाय कैसी है।  उस यात्री ने प्रतिवाद किया।
                    देखिये भाई साब, पैसे तो आपको देने ही पड़ेंगे। जहां तक मेरे कहने का मतलब था तो चाय बेचने के लिए कुछ बातें तो कह दी जाती हैं उन को पकड़ कर नही बैठना चाहिए। समझ लीजिये की वो जुमला था।  चाय वाले ने पूर्ण शांति से बात पूरी की।
                     सब एक दूसरे का मुंह ताक रहे थे। आखिर में एक यात्री ने कहा, " दोनों एक जैसे निकले, ऊपर वाला भी और नीचे वाला भी। "
                 
            

Tuesday, December 6, 2016

बैंकिंग व्यवस्था से उठता विश्वास , अर्थव्यवस्था के लिए मौत की घण्टी साबित होगा।

                    नोटबन्दी के फैसले के बाद इसके जो लाभ गिनवाए गए थे वो एक एक करके छलावा साबित हो रहे हैं। अब इसके दुष्परिणाम एक एक करके सामने आने लगे हैं। उनमे से कुछ इतने बड़े, स्पष्ट और विनाशकारी हैं की आम आदमी को भी सामने दिखाई दे रहे हैं। इन्ही में से एक है बैंकिंग व्यवस्था से उठता हुआ विश्वास।
                     कोई आदमी जब अपना पैसा बैंक में रखता है तो उसके सामने दो उद्देश्य होते हैं। एक तो ये की उसका पैसा सुरक्षित है और डूबेगा नही। दूसरा ये की उसे जरूरत के समय तुरन्त पैसा मिल जायेगा। ब्याज की आमदनी इसमें कोई भूमिका नही रखती। क्योंकि बाहर मार्किट में ब्याज की दर बैंक से दुगनी तिगुनी होती है। लेकिन उसके साथ उपरोक्त दो जोखिम जुड़े होते हैं। बाहर मार्किट में पैसा ब्याज पर देने से एक तो उसके डूबने का डर रहता है जिसके लिए लोग बैंक का रुख करते हैं। लेकिन ऐसा भी नही है की बाहर ब्याज पर दिया हुआ सारा पैसा डूब ही जाता है। बाहर मार्किट में भी ऐसे लोग हैं जिनका भरोसा और साख बहुत बड़ी है। लेकिन कई बार वो भी जरूरत के समय तुरन्त पैसा नही लोटा पाते। वो महीना बीस दिन का समय लगा देते हैं। इसके लिए लोग एमरजेंसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए पैसा बैंक में रखते हैं ताकि जरूरत के समय तुरन्त मिल जाये।
                     नोटबन्दी के बाद बैंक की इसी विशेषता पर चोट पहुंची है। जिन लोगों का पैसा बैंक में था और उन्हें उसकी बहुत सख्त जरूरत थी, उन्हें भी वो पैसा नही मिला। लोगों को शादियां टाल देनी पड़ी, हस्पतालों में इलाज नही करवा पाए और गरीब लोगों को तो राशन तक की तकलीफ खड़ी  हो गयी। लाखों रुपया बैंको में जमा होने के बाद भी लोगों की हालत भिखारियों जैसी हो गयी। इस पर भी सरकार ने इसका हल निकालने की बजाय उन्हें कैशलेस इकोनॉमी के चुटकले सुनाये। आज बैंक की लाइन में खड़ा हर आदमी इस मानसिक स्थिति में पहुंच गया है की कभी भी और किसी भी तरह एक बार उसका पैसा निकल जाये, फिर वो कभी बैंक का रुख नही करेगा। लोगों का बैंकिंग व्यवस्था से विश्वास उठ गया।
                     इसके कुछ साफ और अंधे को भी दिखाई देने वाले सबूत हैं। बैंक ने एक महीने के दौरान लोगों को करीब ढाई लाख करोड़ के नए नोट बांटे हैं। लेकिन उनमे से एक भी नोट वापिस बैंक में जमा नही हुआ। ये बात SBI के अधिकारियों ने मीडिया के सामने कही है। ये लोगों के उठते हुए विश्वास का साफ संकेत हैं। इस तरह जो बैंक आज जमा हुए पैसे से छलक रहे हैं एक समय के बाद वो सूखे के शिकार हो जायेंगे। जैसे जैसे लोगों का पैसा निकलता जायेगा वो कभी वापिस नही आएगा। आयेगा भी तो बहुत कम। और ये देश की अर्थव्यवस्था के लिए मौत की घण्टी साबित होगा। बैंकिंग सिस्टम पर भरोसा किसी भी अर्थव्यवस्था की नींव होता है।
                    वैसे भी बैंको पर एक दूसरा संकट आने वाला है। वो है बड़े पैमाने पर NPA का संकट। अब तक बैंक केवल बड़े उद्योगों के NPA से जूझ रहे थे, अब लम्बी चलने वाली मन्दी के कारण आम लोगों द्वारा लिए गए लोन, चाहे वो घर के लिए हों, गाड़ी के लिए हों या पर्सनल लोन हो, कमाई की कमी के कारण उनका एक बड़ा हिस्सा डूबने वाला है। 2008 की मन्दी के बाद जिस तरह का संकट सामने आया था उसे एक बार फिर दोहराया जाने वाला है। अब तक रिजर्व बैंक ने बैंको को नवम्बर और दिसम्बर की डिफाल्ट हुई किस्तो को NPA में नही दिखाने की छूट दे दी है, लेकिन उसके बाद, यानि जनवरी में क्या होगा ?
                      सरकार पता नही क्यों इस खतरे की तरफ से आँख मूंदे हुए है। सारा देश एक दिन में कैशलेस नही हो जाने वाला है। अर्थव्यवस्था के सामने खड़े इस संकट को गम्भीरता से लिया जाना चाहिए।

Monday, December 5, 2016

जन धन खाता धारकों को चोर क्यों समझती है सरकार ?

             जिन खातों को खुलवाते समय प्रधानमंत्री ये कह रहे थे की गरीब को भी सम्मान देना चाहती है सरकार। की अब गरीब भी ये कह सकता है की उसका बैंक में खाता है। और केवल खाता खुलवा देने को ही अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बता रही थी सरकार। तो ऐसा क्या हो गया की अचानक सभी जन धन खाता धारक सरकार को चोर नजर आने लगे ?
                8 नवम्बर को नोटबन्दी के बाद पुरे देश में बैंको में रुपया जमा होने लगा क्योंकि अब वो बाजार में नही चल सकता था। जिसके पास 500 और 1000 की नोटों में पैसा था वो सब उसे अपने खाते में डालने लगे। यही काम जन धन खातों में भी हुआ। लेकिन सरकार ने दूसरे लोगों का पैसा अपने खातों में जमा करने का आरोप केवल जन धन खातों पर ही लगाया। सरकार का मानना है की जन धन खाता धारकों ने अपने खातों को किराये पर दे दिया और दूसरों का काला धन सफेद करने के लिए इस्तेमाल किया। क्योंकि सरकार का मानना है की जन धन खाता धारकों के पास पैसा कहाँ से आएगा ? जिन खातों को सम्मान का प्रतीक बताकर खुलवाया गया था वो सब चोरी का कारण करार दे दिए गए। ये गरीबों के प्रति सरकार चलाने वालों का पूर्वाग्रह है जो बात चाहे जो भी करें लेकिन उनकी समझ यही है। लेकिन असलियत क्या है ?
               8 नवम्बर नोटबन्दी से पहले भी जन धन खातों में 45000 करोड़ रूपये जमा थे। नोटबन्दी के बाद इनमे 27000 हजार करोड़ रूपये जमा हुए। देश में कुल 25 . 5 करोड़ जन धन खाते हैं। इस तरह औसतन हर खाते में 1100 रूपये जमा हुए। बाकी खातों में करीब 12 लाख करोड़ जमा हो गए। लेकिन उनसे कोई शिकायत नही है। वो तो खाते पीते लोगों के खाते हैं सो उनमे तो सफेद धन जमा हुआ है। क्या सरकार का ये मानना है की देश में केवल 27000 करोड़ का ही काला धन था ? अगर नही तो केवल जन धन खातों को बदनाम करने और उन पर पाबन्दी लगाने का क्या मतलब है। लोगों का जो 45000 करोड़ रुपया उनमे पहले जमा था,  उस पर भी पाबन्दी लगा दी गयी। एक तो दूरदराज के गाँवों में नोटबन्दी के कारण वैसे ही भुखमरी के हालात हैं उस पर ये पाबन्दी उनके लिए निश्चित मौत का पैगाम है।
               बाकी सभी खातों पर खाता अनुसार जाँच होगी और जवाब माँगा जायेगा। लेकिन जन धन खातों को पहले ही काले धन के खाते मान लिया गया है। सरकार की निगाह में हर जन धन खाता धारक चोर है क्योंकि वो गरीब है।

Sunday, December 4, 2016

कैशलेस इंडिया किसके लिए ?

                  नोटबन्दी के बाद अब जब कहने को बहुत कुछ नही बचा है तब इसके समर्थन में दो तर्क दिए जा रहे हैं। एक कैशलेस इंडिया बनाने और दूसरा ब्याज दर कम होने के। लेकिन क्या इन दोनों चीजों का जो मतलब है उसे लोग समझते हैं ? इसकी पड़ताल करना जरूरी है।
कैशलेस इंडिया --
                          सरकार का कहना है की लोगों को अपने छोटे छोटे खर्चे भी अपने मोबाइल फोन से paytm इत्यादि के द्वारा करने चाहियें। सरकार और मीडिया पुरे जोर शोर से इसके प्रचार में लग गया है। उसे इस बात से भी कोई फर्क नही पड़ता की paytm उसी चीन की कम्पनी है जिसके बहिष्कार के लिए अभी बीस दिन पहले तक बीजेपी और मीडिया ने कुछ भी बाकि नही रखा था और 20 रूपये के पटाखे खरीदने वाले को भी देश का गद्दार घोषित कर दिया था। उस समय देश की अर्थव्यवस्था को बचाने का केवल एक ही उपाय था की चीन का बहिष्कार करो, आज देश की अर्थव्यवस्था बचाने का केवल एक ही तरीका है की चीनी कम्पनी paytm को अपनाओ।
                        लेकिन हम इसके दूसरे पहलुओं पर बात करना चाहते हैं। मोबाइल फोन इत्यादि से और कार्ड के इस्तेमाल से उसके हैक होने और धोखाधड़ी का खतरा बढ़ जाता है। अब तक इसका बहुत इस्तेमाल न होने के बावजूद करीब 40000 शिकायतें सरकार को मिली थी। जब सरकार इस पर इतना जोर दे रही है तो क्या वो इसकी जिम्मेदारी लेगी की अगर किसी ग्राहक का अकाउन्ट हैक करके कोई उसका पैसा निकाल लेता है तो सरकार, बैंक या paytm जैसी कम्पनी उसकी भरपाई करेगी। नही। सरकार ने इससे साफ इंकार कर दिया है। फिर सरकार एक ऐसे तरीके पर क्यों जोर दे रही है जिसकी सुरक्षा की गारन्टी नही दी जा सकती ?
                       दूसरा एक और कारण है जिससे ये तरीका लोगों के हित में नही है। paytm या कार्ड द्वारा किये गए भुगतान पर बैंक और ये कम्पनियां डेढ़ से साढ़े तीन प्रतिशत तक का ट्रांजैक्शन चार्ज लेती हैं। ये चार्ज भुगतान लेने वाले दुकानदार को करना पड़ता है। इसलिए दुकानदार उतना भाव बढ़ा लेता है। अगर वो भाव नही बढ़ाता है तो उसका नुकशान होता है। अब ये नुकशान उन छोटे छोटे दुकानदारों को भी उठाना पड़ेगा जो अब तक नकद में व्यापार करते थे। एक अनुमान के अनुसार देश में करीब 75 लाख करोड़ का नकद लेन देन होता है। इसका सालाना हिसाब निकाला जाये और ट्रांजैक्शन चार्ज को केवल 1 . 25 % भी मान लिया जाये तो इसकी सालाना कुल रकम करीब सवा लाख करोड़ बैठती है। ये रकम सीधे paytm और रिलाएंस मनी जैसी कम्पनियों की जेब में जाएगी। इन उद्योगपतियों को बिना कुछ किये इतनी बड़ी रकम घर बैठे मिल जाएगी। यही कारण है की सरकार और मीडिया इस पर इतना जोर दे रहा है।
                          अगर सरकार लोगों के हित में इस व्यवस्था को लागु करना चाहती है तो उसे तुरन्त हमेशा के लिए ट्रांजैक्शन चार्ज को खत्म करने और इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। लेकिन ऐसा कभी नही होगा।
घटती ब्याज दर --
                            नोटबन्दी के पक्ष में जो दूसरा तर्क अब बड़ी जोर से दिया जा रहा है वो ये है की इससे ब्याज दरें कम होगी और आम लोगों को सस्ते ब्याज में मकान इत्यादि खरीदने का मौका मिलेगा। लेकिन इस पर भी थोड़ी जाँच पड़ताल की जरूरत है। आम तोर पर बैंको में आम लोगों का पैसा जमा होता है जिसमे लाखों पेंशन धारक और अपनी सारी उम्र की कमाई बैंको में रखकर उसके ब्याज की आमदनी से गुजारा करने वाले बुजुर्ग शामिल हैं। इसके साथ ही लाखों करोड़ों कर्मचारी भी शामिल हैं जिनके वेतन से एक निश्चित रकम हर महीने कटती है। दूसरी तरफ बड़े बड़े उद्योगपति बैंकों से कर्ज लेते हैं जिसके द्वारा वो उद्योगों की स्थापना करते हैं और अपना वैभवी जीवन जीते हैं। जब उद्योग नुकशान में होता है तो इनके अपने खर्चों पर कोई फर्क नही पड़ता लेकिन बैंको का पैसा डूब जाता है। इस तरह के डूबने के कगार पर खड़े कर्जों जिन्हें बैंक की भाषा में NPA कहा जाता है की राशी करीब 9 लाख 75 हजार करोड़ पर पहुंच चुकी है। आम जनता का बहुत ही छोटा हिस्सा बैंको से कर्ज लेता है। इसकी सबसे बड़ी मिसाल ये है की पूरे देश के सभी किसानों पर बैंको का जितना कर्ज है, अकेले अडानी समूह की कम्पनियों का कर्ज उसके बराबर है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है की ब्याज दरें कम होने का फायदा हमेशा उद्योगपतियों को होता है और नुकशान आम लोगों को होता है।
                       केवल इन दो तथ्यों पर ही तर्कपूर्ण जाँच पड़ताल की जाये तो सामने आता है की ये फैसला बड़े लोगों और उद्योगपतियों को ध्यान में रखकर लिया गया है जिसका भुगतान आम आदमी को करना है।

Friday, November 25, 2016

नोटबंदी -- पाबन्दी और छूट का खेल

खबरी -- सरकार ने नोटबंदी के बाद कई चीजों पर पुराने नोटों के इस्तेमाल की छूट का समय बढ़ाया।

गप्पी -- नोटबन्दी के बाद जो छूट और पाबन्दी का खेल चल रहा है वो इस प्रकार है। -

१.  किसान से सब्जी नही खरीद सकता, लेकिन पट्रोल डीजल खरीद सकता है।
२.  मजदूर को मजदूरी नही दे सकता, लेकिन मोबाइल का रिचार्ज कूपन खरीद सकता है।
३.  मुहल्ले के दुकानदार से राशन नही खरीद सकता , लेकिन उन पैसों को खाते में डालकर कार्ड से बिग बाजार से खरीद सकता है।
४.  शादी के खर्चों का भुगतान नही कर सकता, लेकिन प्राइवेट बिजली कम्पनियों के बिल का भुगतान कर सकता है।
५.  बुआई के लिए खाद नही खरीद सकता, लेकिन प्राइवेट एयर लाइन्स का टिकट खरीद सकता है।
६.  बीमार बच्चे के लिए डॉक्टर का बिल नही दे सकता , लेकिन प्राइवेट कम्पनियों के टेलीफोन का बिल दे सकता है।
७.  आटा नही खरीद सकता, लेकिन टैक्स जमा करवा सकता है।
८.   गाड़ी का पार्किंग चार्ज नही दे सकता, लेकिन प्राइवेट कम्पनियों का टोल टैक्स दे सकता है।

सरकार के लिए सभी छोटे काम धंधे करने वाले चोर हैं और बड़ी कम्पनियां ईमानदार हैं।