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Sunday, August 21, 2016

GST Bill -- इसके दुष्परिणामो की जिम्मेदारी कौन - कौन लेगा ?

               राज्य सभा में लम्बे समय तक अटके GST Bill का पास होना और इस तरह पास होना, कम से कम मेरे लिए तो आश्चर्यजनक है। इस बिल पर लोगों को बहुत आपत्तियां रही हैं। कांग्रेस के अलावा वामपंथी दलों को इस पर भारी एतराज था। वो इसका विरोध तब से कर रहे थे जब से कांग्रेस इसे पास कराने की कोशिश कर रही थी। अब इस पर कांग्रेस के एतराज को कुछ लोग बदले की कार्यवाही मान रहे थे, लेकिन जो सवाल कांग्रेस ने उठाये थे वो बहुत ही वाजिब सवाल थे। जिनमे से सरकार ने दो को मान लिया। एक महत्त्वपूर्ण सवाल, जिसे सरकार ने नही माना वो टैक्स की दर पर 18 % से ऊपर एक संवैधानिक रोक से सम्बन्धित था।
                लेकिन इस पर राज्य सभा में जो बहस हुई, वो भी हैरत अंगेज थी। जदयू के नेता शरद यादव इस बिल पर आम सहमति बनाने का श्रेय ले रहे थे और नीतीश कुमार भी बाहर इस तरह की बात कर रहे थे जैसे ये बिल केवल उनके कारण ही पास हो रहा है।
                    दूसरा उदाहरण कामरेड सीताराम येचुरी का है। सी.पी.एम. जिन कारणों से इस बिल का विरोध कर रही थी वो सारे कारण सीताराम येचुरी ने अपने भाषण में एक बार फिर गिनवा दिए। उनमे सबसे महत्त्वपूर्ण सवाल राज्यों के उस अधिकार से समन्धित था जिसमे स्थानीय स्तर पर टैक्स लगाने का उनका अधिकार इसके बाद समाप्त हो जाने वाला है। उन्होंने सभी कारणों को उसी कुशलता के साथ गिनाया, लेकिन बिल का विरोध नही किया। एक जनविरोधी बिल पर इस तरह की आमसहमति भय पैदा करने वाली है।
                    इस बिल के बाद जो टैक्स की व्यवस्था लागु होगी उसमे राज्य सरकारों की भूमिका केवल राजस्व विभाग जितनी रह जाएगी। अगर कोई राज्य सरकार ये समझती है की उसे किसी वस्तु पर लोगों को टैक्स में छूट देनी है तो नही दे पायेगी। बीजेपी और हमारी पूरी मोनोपलिस्टिक व्यवस्था जिस एकीकृत और केंद्रीकृत व्यवस्था का सपना देख रही थी, ये उसकी तरफ एक बड़ा कदम है।
                     राज्य सभा की बहस में जो चीज सबसे अजीब और वितृष्णा पैदा करने वाली थी, वो ये की GST के बारे में, जो की सीधे राज्यों से सम्बन्धित है, सरकार कोई भी फैसला ले तो सभी विपक्षी सांसद सरकार और वित्त मंत्री से आजिजी कर रहे थे की उस बिल को मनी बिल के रूप में ना लाया जाये। क्योंकि मनी बिल पर राज्य सभा को वोट का अधिकार हासिल नही है। ये कैसी व्यवस्था है जिसमे राज्यों के सीधे प्रतिनिधियों को राज्यों के बारे में फैसला करने वाले बिल पर वोटिंग का अधिकार नही है। टैक्स की आमदनी बढ़ने की ख़ुशी में अतिउत्साहित सांसद इसमें इतना बदलाव तक नही करवा पाए की इससे सम्बन्धित कोई भी बिल मनी बिल के रूप में पेश नही होगा।
                    दूसरा जो उल्टा अर्थशास्त्र लोगों को पढ़ाया जा रहा है वो ये है। वित्त मंत्री बार बार ये कह रहे हैं की इससे राज्यों की आमदनी बढ़ेगी। जो दिखाई भी दे रहा है। अगर सरकार GST की दर 18 % के न्यूनतम स्तर पर भी रखती है ( जो की सम्भव नही लगता ) तो भी सभी चीजों पर सर्विस टैक्स 14 % से बढ़कर 18 % हो जायेगा। बाकि चीजों के दाम  भी बढ़ेंगे। इससे राज्यों और केंद्र, दोनों की कमाई बढ़ेगी। लेकिन उसके बाद ये कहना की इससे लोगों को सस्ती चीजें मिलेंगी, हद दर्जे का मजाक है। राज्य की कमाई बढ़ जाये और चीजें सस्ती हो जाएँ, तो बीच का पैसा क्या अमेरिका आपको देगा ? कॉरपोरेट मीडिया द्वारा बार बार बोले जा रहे इस झूठ की सच्चाई तो ये टैक्स लागु होते ही लोगों के सामने आ जाएगी। उसके बाद ?
                     इस बिल के जो दुष्प्रभाव होंगे, लोगों पर जो बोझ पड़ेगा , उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा ? क्या उसके बाद शरद यादव , अरुण जेटली, सीताराम येचुरी या तृणमूल के नेता संसद में और बाहर छाती ठोंककर ये कहेंगे की हाँ, हम हैं इसके जिम्मेदार। या फिर वही राजनैतिक बयानबाजी का दौर चलेगा। हमारी कोई सुन नही रहा, सरकार ने हमे धोखे में रक्खा, हम इस महंगाई के खिलाफ है आदि आदी।
                    या फिर लोगों को मान लेना चाहिए की सब नूरा कुश्ती है।

Thursday, June 30, 2016

Vyang -- सुब्र्मण्यम स्वामी और महारथी शल्य

                        मैंने महाभारत को छः बार पढ़ा। एक चीज जो मुझे तब भी समझ में नहीं आई वो ये थी की महाभारत के युद्ध में महारथी शल्य किसकी तरफ से लड़ रहे थे ? मद्र नरेश शल्य पाण्डु की दूसरी पत्नी माद्री के भाई थे इसलिए नकुल और सहदेव के मामा थे। उनके पास बड़ी सेना थी और वो खुद भी बड़े योद्धा थे इसलिए कौरव और पांडव दोनों चाहते थे की वो उनके पक्ष में शामिल हों। लेकिन चूँकि वो पांडवों के मामा थे इसलिए वो पाण्डवों का साथ देने के लिए अपनी सेना के साथ निकले। लेकिन वो प्रशंसा को बहुत पसंद करते थे। दुर्योधन ने उनकी इसी कमजोरी का फायदा उठाया। उसने उनके रास्ते में जगह जगह जलपान और विश्राम का प्रबंध किया। उनके स्वागत के लिए इंतजाम किये। इससे फूलकर महारथी शल्य ने उनके समर्थन का वचन दे दिया।
                   उसके बाद जब कर्ण सेनापति बने और उनका मुकाबला अर्जुन से होना था तो अर्जुन के सारथी कृष्ण थे, सो कर्ण के लिए उनके मुकाबले का सारथी चाहिए। इसलिए दुर्योधन और उनके सलाहकारों ने महारथी शल्य को उनका सारथी बना दिया। बाद में युद्ध के दौरान उसने कर्ण को इतना हतोत्साहित किया की कर्ण भी लगभग भरम का शिकार हो गया और अंत में मारा गया। महाभारत के जानकार कर्ण की हार के पीछे उनके सारथी शल्य को एक प्रमुख कारण मानते हैं।
                     ठीक उसी तरह नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने राज्य सभा में सुब्र्मण्यम स्वामी को अरुण जेटली का सारथी नियुक्त कर दिया। अब सुब्र्मण्यम स्वामी योद्धा तो हैं लेकिन उनका कोई स्थाई पक्ष नहीं है। इसलिए उन्होंने पराक्रम दिखाते हुए पहले अरुण जेटली को ही घेरना शुरू कर दिया। युद्ध में मुख्य योद्धा को हराने के लिए ये जरूरी होता है की पहले उसके सहयोगी योद्धाओं को समाप्त किया जाये। इसलिए सुब्र्मण्यम स्वामी ने सबसे पहले वित्त मंत्री अरुण जेटली के सबसे मजबूत योद्धा रघुराम राजन को समाप्त किया। फिर उसने दूसरे योद्धा अरविन्द सुब्र्मण्यम का रूख किया। इसी दौरान दुर्योधन, मेरा मतलब है की नरेंद्र मोदी बीच में आ गए और उन्होंने उन्हें शत्रु पक्ष की तरफ बाण छोड़ने की सलाह दी। वरना अब तक अरुण जेटली भी कर्णगति को प्राप्त हो चुके होते। लेकिन बकरे की माँ आखिर कब तक खैर मनाएगी। अगर सुब्र्मण्यम  स्वामी को शत्रु पक्ष में पराक्रम दिखाने का मौका नहीं मिला तो उनका रूख फिर अपने ही पक्ष की तरफ हो सकता है। वो आखिर योद्धा हैं और किसी भी योद्धा का प्रथम उद्देश्य पराक्रम दिखाना होता है , ये देखना नहीं होता की सामने कौन है।
                 जिस तरह मुझे ये समझ में नहीं आ रहा की शल्य किसकी तरफ थे, उसी तरह कुछ राजनितिक विश्लेषकों को ये समझ में नहीं आ रहा की सुब्र्मण्यम स्वामी आखिर किस तरफ हैं। वो बीजेपी की तरफ किसी विचारधारा की वजह से तो हैं नहीं, बल्कि उन्हें Z सिक्योरिटी देने, फिर दिल्ली के दिल में बंगला देने और उसके बाद राज्य सभा सीट देने के कारण महारथी शल्य की तरह बीजेपी के अहसानो का बदला चुका रहे हैं। वरना ये वही सुब्र्मण्यम स्वामी हैं जिन्होंने बाकायदा अख़बार में लेख लिखकर और सबूतों के साथ अटल बिहारी बाजपेयी पर आजादी की लड़ाई में गद्दारी करने और अमेरिका के लिए जासूसी करने का आरोप लगाया था।