देश के कुछ बुद्धिजीविओं ने कहा की देश में असहनशीलता और असहिष्णुता का माहौल है। उन्होंने इस बात पर की सरकार इस माहौल को ठीक करने के लिए काम करने की बजाए, उन संगठनो को बढ़ावा दे रही है जो इस माहोल को बिगाड़ रहे हैं अपने पुरुस्कार लौटा दिए।
इस पर प्रतिक्रिया हुई, जो की होनी ही थी। पहले तो सरकार के प्रवक्ताओं ने इस देश में हुए अब तक के सारे अपराध ये कह कर गिनवा दिए की तब इन्होने पुरुस्कार क्यों नही लोटाये। इससे बात नही बनी। पुरुस्कार लौटाने का सिलसिला जारी रहा। अब इस को और ज्यादा जोर से गलत साबित करने की जरूरत थी। उसके बाद जो हुआ, वो इस प्रकार है। -
सरकार के एक प्रवक्ता ने कहा की देश में कोई असहनशीलता का माहोल नही है। देश एकदम सही और शांतिपूर्वक तरीके से चल रहा है। ये जो साहित्यकार हैं, ये सब के सब या तो वामपंथी हैं या कांग्रेसी हैं। ये अपना सरक्षण खत्म होने के कारण घबराये हुए हैं। इन्होने बहुत मलाई काटी है। इन्होने अपनी किताबें बेचीं हैं और देश में मुफ्त का सम्मान प्राप्त किया है। पिछले साठ सालो में आरएसएस से संबंधित लोगों को पुरुस्कार नही दिए गए। ये मान लेते हैं की उनमे कोई काबिल नही था, लेकिन क्या इसको लोकतंत्र कहते हैं। कुछ तो दिया होता। लेकिन नही, सारे अकादमिक पदों पर यही लोग बैठ गए। हमारे लोगों को तीसरे दर्जे में भी नही बैठने दिया, क्या ये लोकतंत्र है ? लोकतंत्र मिलबाँटकर खाने का नाम होता है लेकिन इन्होने हमे केवल इसलिए नही पूछा की हम काबिल नही थे। अब हम इन सब लोगों की सफाई कर देंगे। हर एक अकादमिक संस्थान में एक गजेन्द्र चौहान बिठा देंगे। और इन लोगों के सारे काम पर प्रतिबंध लगा देंगे। साथ में मैं ये भी कहना चाहता हूँ की देश में पूरी तरह सहनशीलता का माहोल है। ये लोग समझ लें इस बात को।
उसके बाद दूसरे प्रवक्ता आये। उसने कहा की ये सब लोग राजनीती कर रहे हैं और हम इसको बर्दाश्त नही करेंगे। ये लोग राष्ट्र विरोधी हैं। ये सब देश विरोधी है। ये सब हिन्दू विरोधी हैं। ये ऐसे ऐसे कालेजों से आये हैं जहां नकस्लवादी भरे पड़े हैं। वहां हम BSF का कैंप बना देंगे। हम उन युनिवर्सिटियों को बंद कर देंगे। मान लिया की उनमे से बहुत से लोग अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बहुत सम्मान रखते हैं लेकिन उससे हमे क्या फर्क पड़ता है। हमने नोबल पुरुस्कार प्राप्त अमृत्य सेन को नालंदा विश्वविद्यालय से बाहर किया या नही। हमने अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज को नक्सलवादी बताकर जेल में बंद किया या नही। हमारे खिलाफ कोई किताब लिखी जाएगी तो हम उसका मुंह काला कर देंगे। लोगों को क्या खाना चाहिए ये जब तक हमारी सरकार है तब तक तो हम ही बताएंगे, वरना मारे भी जा सकते हैं। और जहां तक असहिष्णुता की बात है ऐसा कुछ भी नही है। अगर ये लोग बोलना, लिखना बंद कर दें तो इनको कोन क्या कहता है ?
मुझे बचपन में सुनी हुई एक कहावत याद आ गयी। एक आदमी अपनी पत्नी को चिट्ठी लिख रहा था। उसका एक दोस्त नजर बचाकर उसे पढ़ रहा था। ये बात उस आदमी को मालूम हो गयी। उसने चिट्ठी में लिखा की शेष बातें दूसरे पत्र में लिखूंगा। अभी तो एक मुर्ख दोस्त पास बैठा हुआ चिट्ठी पढ़ रहा है। उसका दोस्त तुरंत बोला की कमाल है यार, मैंने कुछ नही पढ़ा, फालतू में मुझे मुर्ख ना बताओ। चिट्ठी लिखने वाला आदमी बोला की क्या अब भी किसी प्रमाण की जरूरत है ? बात समझ में आते ही उसका दोस्त बहुत शर्मिंदा हुआ और उसने माफ़ी मांगी। परन्तु या तो ये लोग अब भी समझ नही पा रहे हैं या फिर इनमे इतनी नैतिकता भी नही बची है।
इसके बाद कुछ लोग और आये। उनसे पूछा गया की ये कौन हैं ? तो उनमे से कई रो पड़े, बोले देखा, हमे कोई नही पहचानता। क्योंकि हमे साहित्य अकादमी सम्मान नही दिया गया इसलिए ये हालत है। इन लोगों को जब पुरुस्कार मिला था तब भी इनकी तारीफ हो रही थी और जब ये लोटा रहे हैं तब भी इनकी तारीफ हो रही है। लेकिन इन्हे बताना होगा इन्होने 1984 में सम्मान क्यों नही लौटाया, 1975 में क्यों नही लौटाया। तब ये कहां थे ?
एक पत्रकार ने पूछ लिया आप तब कहां थे ?
देखिये हम तो कभी भी कहीं नही होते। ना हम 1984 में कहीं थे, ना 1975 में कहीं थे। दूसरी बात ये है की हमारे पास लौटाने को था ही क्या। अब हमे सरकार ने कहा है की वो हमे एडजस्ट करेगी।
लेकिन माहौल के बारे में आपका क्या कहना है ?
माहोल तो एकदम सही है। अगर आपको लिखना ही है तो ऐसी चीज लिखिए जिससे किसी को भी खराब ना लगे। सरकार की प्रशंसा में गीत लिखिए। आरएसएस की विचारधारा को समर्थन देते हुए नाटक लिखिए, भले ही लोग उसको प्रहसन समझें। उसके बाद आपको कोई कुछ कहता है तो बताइये। आप सरकार और हिंदुत्व के खिलाफ फिल्म बनाएंगे तो क्या सरकार आपको छोड़ देगी ? उसके बाद माहोल को दोष देना गलत बात है। हमे तो किसी ने कुछ नही कहा।
आपने क्या लिखा है ?
पांच साल पहले एक कविता लिखी थी तितली पर। मेरा पोता अब तक उसे गाता है। हमे तो कोई धमकी नही मिली।
इस पर प्रतिक्रिया हुई, जो की होनी ही थी। पहले तो सरकार के प्रवक्ताओं ने इस देश में हुए अब तक के सारे अपराध ये कह कर गिनवा दिए की तब इन्होने पुरुस्कार क्यों नही लोटाये। इससे बात नही बनी। पुरुस्कार लौटाने का सिलसिला जारी रहा। अब इस को और ज्यादा जोर से गलत साबित करने की जरूरत थी। उसके बाद जो हुआ, वो इस प्रकार है। -
सरकार के एक प्रवक्ता ने कहा की देश में कोई असहनशीलता का माहोल नही है। देश एकदम सही और शांतिपूर्वक तरीके से चल रहा है। ये जो साहित्यकार हैं, ये सब के सब या तो वामपंथी हैं या कांग्रेसी हैं। ये अपना सरक्षण खत्म होने के कारण घबराये हुए हैं। इन्होने बहुत मलाई काटी है। इन्होने अपनी किताबें बेचीं हैं और देश में मुफ्त का सम्मान प्राप्त किया है। पिछले साठ सालो में आरएसएस से संबंधित लोगों को पुरुस्कार नही दिए गए। ये मान लेते हैं की उनमे कोई काबिल नही था, लेकिन क्या इसको लोकतंत्र कहते हैं। कुछ तो दिया होता। लेकिन नही, सारे अकादमिक पदों पर यही लोग बैठ गए। हमारे लोगों को तीसरे दर्जे में भी नही बैठने दिया, क्या ये लोकतंत्र है ? लोकतंत्र मिलबाँटकर खाने का नाम होता है लेकिन इन्होने हमे केवल इसलिए नही पूछा की हम काबिल नही थे। अब हम इन सब लोगों की सफाई कर देंगे। हर एक अकादमिक संस्थान में एक गजेन्द्र चौहान बिठा देंगे। और इन लोगों के सारे काम पर प्रतिबंध लगा देंगे। साथ में मैं ये भी कहना चाहता हूँ की देश में पूरी तरह सहनशीलता का माहोल है। ये लोग समझ लें इस बात को।
उसके बाद दूसरे प्रवक्ता आये। उसने कहा की ये सब लोग राजनीती कर रहे हैं और हम इसको बर्दाश्त नही करेंगे। ये लोग राष्ट्र विरोधी हैं। ये सब देश विरोधी है। ये सब हिन्दू विरोधी हैं। ये ऐसे ऐसे कालेजों से आये हैं जहां नकस्लवादी भरे पड़े हैं। वहां हम BSF का कैंप बना देंगे। हम उन युनिवर्सिटियों को बंद कर देंगे। मान लिया की उनमे से बहुत से लोग अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बहुत सम्मान रखते हैं लेकिन उससे हमे क्या फर्क पड़ता है। हमने नोबल पुरुस्कार प्राप्त अमृत्य सेन को नालंदा विश्वविद्यालय से बाहर किया या नही। हमने अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज को नक्सलवादी बताकर जेल में बंद किया या नही। हमारे खिलाफ कोई किताब लिखी जाएगी तो हम उसका मुंह काला कर देंगे। लोगों को क्या खाना चाहिए ये जब तक हमारी सरकार है तब तक तो हम ही बताएंगे, वरना मारे भी जा सकते हैं। और जहां तक असहिष्णुता की बात है ऐसा कुछ भी नही है। अगर ये लोग बोलना, लिखना बंद कर दें तो इनको कोन क्या कहता है ?
मुझे बचपन में सुनी हुई एक कहावत याद आ गयी। एक आदमी अपनी पत्नी को चिट्ठी लिख रहा था। उसका एक दोस्त नजर बचाकर उसे पढ़ रहा था। ये बात उस आदमी को मालूम हो गयी। उसने चिट्ठी में लिखा की शेष बातें दूसरे पत्र में लिखूंगा। अभी तो एक मुर्ख दोस्त पास बैठा हुआ चिट्ठी पढ़ रहा है। उसका दोस्त तुरंत बोला की कमाल है यार, मैंने कुछ नही पढ़ा, फालतू में मुझे मुर्ख ना बताओ। चिट्ठी लिखने वाला आदमी बोला की क्या अब भी किसी प्रमाण की जरूरत है ? बात समझ में आते ही उसका दोस्त बहुत शर्मिंदा हुआ और उसने माफ़ी मांगी। परन्तु या तो ये लोग अब भी समझ नही पा रहे हैं या फिर इनमे इतनी नैतिकता भी नही बची है।
इसके बाद कुछ लोग और आये। उनसे पूछा गया की ये कौन हैं ? तो उनमे से कई रो पड़े, बोले देखा, हमे कोई नही पहचानता। क्योंकि हमे साहित्य अकादमी सम्मान नही दिया गया इसलिए ये हालत है। इन लोगों को जब पुरुस्कार मिला था तब भी इनकी तारीफ हो रही थी और जब ये लोटा रहे हैं तब भी इनकी तारीफ हो रही है। लेकिन इन्हे बताना होगा इन्होने 1984 में सम्मान क्यों नही लौटाया, 1975 में क्यों नही लौटाया। तब ये कहां थे ?
एक पत्रकार ने पूछ लिया आप तब कहां थे ?
देखिये हम तो कभी भी कहीं नही होते। ना हम 1984 में कहीं थे, ना 1975 में कहीं थे। दूसरी बात ये है की हमारे पास लौटाने को था ही क्या। अब हमे सरकार ने कहा है की वो हमे एडजस्ट करेगी।
लेकिन माहौल के बारे में आपका क्या कहना है ?
माहोल तो एकदम सही है। अगर आपको लिखना ही है तो ऐसी चीज लिखिए जिससे किसी को भी खराब ना लगे। सरकार की प्रशंसा में गीत लिखिए। आरएसएस की विचारधारा को समर्थन देते हुए नाटक लिखिए, भले ही लोग उसको प्रहसन समझें। उसके बाद आपको कोई कुछ कहता है तो बताइये। आप सरकार और हिंदुत्व के खिलाफ फिल्म बनाएंगे तो क्या सरकार आपको छोड़ देगी ? उसके बाद माहोल को दोष देना गलत बात है। हमे तो किसी ने कुछ नही कहा।
आपने क्या लिखा है ?
पांच साल पहले एक कविता लिखी थी तितली पर। मेरा पोता अब तक उसे गाता है। हमे तो कोई धमकी नही मिली।