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Friday, January 17, 2020

हिटलर युग के किस्से

 सरकार बदलने के बाद एक मशहूर लेखिका ने सरकार के समर्थन में लिखने का व्यवसाय चुना। जो भी कोई सरकार की आलोचना करता तो वह अपने लेख में उसको झिड़क देती। एक समय लोगों ने कहा की तानाशाही बढ़ रही है और असहिष्णुता का वातावरण है तो उसने ऐसा कहने वालों को जोरदार फटकार लगाई और मौजूदा निजाम को इतिहास का सबसे सहनशील और लोकतान्त्रिक निजाम बताया। इस लेखिका का एक बेटा विदेश में रहता था। एक दिन उसने इस निजाम पर एक सख्त टिप्पणी कर दी। निजाम ने तुरंत उसकी नागरिकता वापिस ले ली और उसे दुश्मन देश का नागरिक घोषित कर दिया। घबराई हुई लेखिका ने उन सब लोगों को फोन करके मदद मांगी जो रोज उसे फोन करके उसके लेखों पर बधाई देते थे और तारीफ करते थे। लेकिन किसी ने भी उसका फोन नहीं उठाया।
                    जब उसने इसका कारण पता किया तो मालूम हुआ की जिस तरह उसने इस निजाम के समर्थन में लिखने का व्यवसाय चुना था उसी तरह उन लोगों ने भी सरकार के समर्थन में लिखने वालों की तारीफ करने का व्यवसाय चुना था।
                        ये किस्सा आप हिटलर युग के किस्सों पर छपी हुई किताब के अगले संस्करण में पढ़ सकते हैं। 

Friday, March 11, 2016

अनुपम खेर इरादतन झूठा है।

                  जब भी कोई साम्प्रदायिक अथवा जातीय इत्यादि संगठन अपने अनुयायिओं से सम्बोधित होता है तो उसकी थीम ये होती है की हमारे साथ अन्याय हो रहा है। इसी तरह इनके नेता भी व्यक्तिगत रूप से अन्याय का शिकार होने का राग अलापते हैं। वो जो उदाहरण देते हैं वो पहली नजर में उनकी बातों कि तस्दीक करते हैं लेकिन उनके असल कारण दूसरे होते हैं। उनके अनुयायिओं का एक तबका हमेशा उनकी इस साजिश का शिकार रहता है।
                   अनुपम खेर इस बात का बहुत ही चतुराई से उपयोग करते हैं। वो बहुत पहले से बीजेपी समर्थक कश्मीरी संगठन से जुड़े रहे हैं। लेकिन वो हमेशा  अपने आप को तठस्थ दिखाने की कोशिश करते हैं। वो इस बात को भी छिपा लेते हैं की उनकी पत्नी बीजेपी की सांसद हैं।
                    पिछले कुछ दिनों से वो बीजेपी और संघ की तरफ से इस सरकार पर सवाल उठाने वाले लेखकों, बुद्धिजीवियों और छात्रों के खिलाफ मोर्चा संभाले हुए हैं। जाहिर है जब ये लेखक, बुद्धिजीवी या छात्र सत्ता द्वारा भेदभाव जैसे मुद्दे उठाते हैं तो उनको काउन्टर करने के लिए उनके विरोधी भी ठीक वैसे ही मुद्दे उनके सामने खड़े करने की कोशिश करते हैं। इसी क्रम में उन्हें झूठ का सहारा लेना पड़ता है।
                    अनुपम खेर ने इसी शृंखला में पहले ये आरोप लगाया था की पाकिस्तान सरकार ने उन्हें साहित्य सम्मेलन में भाग लेने के लिए वीजा नही दिया। वो दिखाना चाहते थे की देखो मैं भी मोदीजी की तरह भेदभाव का शिकार हूँ और साथ में महत्त्वपूर्ण आदमी भी हूँ। बाद में जब पाकिस्तान उच्चायुक्त ने  ये बताया की अनुपम खेर ने वीजा के लिए आवेदन ही नही किया है तो वो चुप रह गए। इसी क्रम में अब उन्होंने JNU पर ये आरोप लगाया है की JNU ने उनकी फिल्म दिखने से इंकार कर दिया और वो असहनशीलता के शिकार हैं। अब उस पर JNU से बयान आया है की अनुपम खेर झूठ बोल रहे हैं। और चूँकि मौजूदा सैमेस्टर की बुकिंग पूरी हो चुकी थी और उसने अगले सैमेस्टर के लिए आवेदन ही नही किया।
                 ये सारी घटनाएँ ये दिखाती हैं की अनुपम खेर कोई गलती से तथ्यों को नही तोड़ मरोड़ रहे हैं बल्कि वो इरादतन ऐसा कर रहे हैं ताकि अपनी सरकार और संस्थाओं के पापों को काउन्टर किया जा सके।

Monday, December 14, 2015

Opinion -- आम सहमति का मतलब --- सरकार से सहमति

                    देश में बहुत बार आम सहमति की बात होती है। जब भी आर्थिक मामलों की बात चलती है तो ये कहा जाता है की देश में आर्थिक सुधारों को लेकर आम सहमति है। ये भी कहा जाता है की आर्थिक मामलों पर आम सहमति होनी चाहिए और उस पर राजनीती नही होनी चाहिए। विदेश मामलों में तो खासकर आम सहमति की बात की जाती है और ये दावा किया जाता है की कम से कम विदेश नीति के मामले में तो देश में आम सहमति है।
                    लेकिन पिछले कुछ सालों से आम सहमति के मायने बदल गए हैं। खासकर जब से आर्थिक सुधारों का दौर शुरू हुआ है इस बात पर खास जोर दिया जा रहा है। अब आम सहमति का मतलब हो गया है सरकार के साथ सहमति। यदि कोई किसी नीति पर सवाल उठाता है तो उसे ये कहकर हड़काया जाता है की वो कम से कम इस मामले में तो आम सहमति बनाये। दूसरे शब्दों में उसे इस बात के लिए मजबूर किया जाता है की वो सरकार की हाँ में हाँ मिलाये। अगर कोई सवाल उठाता है तो कहा जाता है की वो राजनीती कर रहा है। और राजनीती करने को बहुत बुरा माना जाता है। जब से आर्थिक सुधारों का ये दौर शुरू हुआ है सारी नीतियां कॉर्पोरेट को ध्यान में रखकर और उसके फायदे के लिए बनाई जाती हैं। भले ही लोगों की आँखों में धूल झोंकने के लिए उसे कोई नाम  दिया जाये।
                      दूसरी जो बात इस तथाकथित आम सहमति के नाम पर सामने आई है वो ये है की दो पार्टियों, यानि बीजेपी और कांग्रेस की सहमति को आम सहमति मान लिया गया है। उसके बाद चाहे सरकार हो या कॉर्पोरेट के लोग हों, या कॉर्पोरेट का मीडिया हो या फिर टीवी चैनलों में बैठे हुए विशेषज्ञ हों, सब एक ही राग अलापते हैं की इस मामले पर आम सहमति है। जबकि असलियत ये है की उन दोनों को मिले वोट का प्रतिशत  बहुत बार 50 % से कम होता है। बाकि राजनैतिक दलों से  ना कोई बात की जाती है और ना ही उनकी राय को कोई महत्त्व दिया जाता है। जब सिद्धांतों की बात होती है तो सरकार कॉपरेटिव फडरेलिज्म की बात करती है और संघीय ढांचे की आरती उतारती है।
                        GST बिल के सवाल पर ये बात बहुत ही मुखर होकर सामने आ रही है। बीजेपी ने इस बिल पर किसी पार्टी से कोई बात करने की कोशिश नही की। केवल देश के विकास की हवा का दबाव बना कर इसका समर्थन करने के लिए कहा गया। वो तो कांग्रेस के साथ उसके रिश्ते खराब होने के चलते उसे उसके साथ बातचीत करने के लिए मजबूर होना पड़ा। अगर उसके पास राज्य सभा में बिल पास करने लायक बहुमत होता तो वो कांग्रेस की तरफ मुड़ कर भी नही देखती। लेकिन इन हालात के बावजूद उसने बाकि राजनितिक पार्टियों के साथ संवाद की कोई कोशिश नही की। हमारे यहां आम सहमति का केवल यही मतलब है की अगर आपका काम निकल गया तो किसी को पूछने की जरूरत नही है।
                          विदेश नीति  पर भी अजब नजारा सामने है। सरकार का मानना है की अगर वो किसी देश को गालियां देती है तो पुरे विपक्ष को उसे गालियां देनी चाहिए और अगर वो उसके साथ गलबहियां डाल कर घूमती है तो पूरे विपक्ष को तालियां बजानी चाहियें। अगर कोई ये सवाल पूछता है की भाई गाली देने का कारण बताइये तो चारों तरफ से उस पर फिटकार डाली जाती है की देखो, देखो इस देशद्रोही को विदेशी मामले पर भी राजनीती कर रहा है। इस सरकार की पाकिस्तान नीति हो या फिर नेपाल नीति ये हमेशा सवालों के घेरे में रही हैं। विपक्ष की तो छोडो, इस सरकार के भक्तगण भी पाकिस्तान के बारे में उसकी पलटी पर खुद को एडजेस्ट नही कर पा रहे हैं।
                          उसके बाद भी अगर विपक्ष का कोई दल अपना विरोध सख्त करता है तो सरकार का तर्क होता है की संसद में चर्चा के लिए सरकार तैयार है। बीजेपी की ये सरकार बनने के बाद संसद की चर्चा का मतलब भी वही हो गया है। जिन मामलों में पुरे देश में चिंता और बहस का माहोल था उन पर भी चर्चा का ये हाल था की सरकार चर्चा से पहले जो कहती रही वही चर्चा के बाद भी कहती रही। असहिष्णुता के मामले  में चर्चा हुई। पुरे विपक्ष ने सैकड़ों उदाहरण दे कर इस खतरे को सामने रक्खा लेकिन सरकार ने वही रुख अपनाया जो चर्चा से पहले था। किसी एक सवाल पर उसने इतना तक नही कहा की सरकार इसको देखेगी या कोई कदम उठाएगी। उसके बाद अगर कोई इस मामले पर बात करता है तो सरकार का जवाब होता है की इस मामले पर संसद में चर्चा हो चुकी है और संसद ( असल में सरकार ) उसे ख़ारिज कर चुकी है। फिर किसी मामले पर सरकार कहती है की विपक्ष इस पर संसद में चर्चा क्यों नही कर रहा ? भई वो इसलिए नही कर रहा की उसे मालूम है की सरकार पर जो टेप चढ़ी हुई है वही बजने वाली है। सरकार विपक्ष की किसी भी जायज चिंता को स्वीकार करने को तैयार नही है।                          



Thursday, November 26, 2015

संविधान दिवस, बाबा साहेब अम्बेडकर और राजनाथ सिंह

आज संसद में बाबा साहेब अम्बेडकर की 125वीं जयंती पर संविधान दिवस मनाये जाने के अवसर पर संसद में इस विषय पर बोलते हुए गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा की भारत में कई बार और बार-बार अपमान सहन करने के बावजूद बाबा साहेब ने कभी देश छोड़ने की बात नही की। राजनाथ सिंह के दिमाग में उस समय भी आमिर खान छाये हुए थे।
            लेकिन राजनाथ सिंह ने  एक बात नही बताई की ब्राह्मण वादी हिंदू धर्म से अपमानित होकर और ये समझ लेने के बाद की हिन्दू धर्म में रहते हुए किसी भी दलित वर्ग के व्यक्ति के लिए बराबरी का सम्मान प्राप्त करना सम्भव नही है। और इसी कारण से बाबा साहेब अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म को त्याग कर बौद्ध धर्म अपना लिया था और समग्र दलित समाज से हिन्दू धर्म का त्याग करने की सलाह दी थी। ये ब्राह्मण वादी हिन्दू धर्म की असहिष्णुता ही थी जिसने बाबा साहेब अम्बेडकर को हिन्दू धर्म छोड़ने के लिए मजबूर किया। ये  वही लोग थे जो बाकि किसी को इस देश का नागरिक मानने को भी तैयार नही थे और आज भी वही लोग हैं जो बाकि किसी को देशभक्त मानना तो दूर, उनको इस देश का नागरिक होने का दर्जा भी देने को तैयार नही हैं।
             जब असहिष्णुता की बात होती है तो सभी असहिष्णु तत्व इस बात को इस तरह प्रचारित करते हैं जैसे ये पुरे देश के और खासकर सभी हिन्दुओं के असहिष्णु होने की बात हो। इस मामले पर पुरस्कार लौटाने वाले ज्यादातर लोग हिन्दू ही हैं। और इस असहनशीलता का शिकार होकर जान खो देने वाले दाभोलकर, कलबुर्गी और गोविन्द पंसारे तीनो हिन्दू ही थे। ये लड़ाई हिन्दू और गैर हिन्दू की नही है और ना ही भारतीय और गैर भारतीय की है। ये लड़ाई समाज को बाँटने वाले और देश को एक धर्म आधारित राज्य में बदल देने की कोशिश करने वालों और उसका विरोध करने वालों के बीच है। लेकिन इसमें दुर्भाग्य की बात ये है की इसमें ऐसे लोग भी जो हमेशा से सहिष्णु रहे हैं और इस तरह के विवाद के खिलाफ हैं वो भी दुष्प्रचार के शिकार हो जाते हैं।

Tuesday, November 24, 2015

Comment -- आमिर खान का बयान, कश्मीर और भक्तगण

देश में बढ़ती हुई असहिष्णुता के खिलाफ आमिर खान द्वारा दिए गए बयान पर जो प्रतिक्रियाएं आ रही हैं वो अपेक्षित थी। आमिर खान ने ये बयान रामनाथ गोयनका अवार्ड दिए जाने के समय हुए समारोह में दिया और उस वक्त सरकार के कुछ बड़े मंत्री और नेता, जैसे की अरुण जेटली, रविशंकर प्रशाद और संबित पात्रा वहां मौजूद थे। जाहिर है की इस पर प्रतिक्रियाएं भी आनी ही थी। लेकिन इन प्रतिक्रियाओं में एक अजीब किस्म की झल्लाहट झलक रही थी।
               इस पर प्रतिक्रिया करते हुए अनुपम खेर ने कहा की अतुल्य भारत कब से असहनशील हो गया ? संघी कलाकारों  यही मुसीबत है की वो अपने आप को ही भारत समझते हैं। आमिर खान का बयान ना तो भारत के खिलाफ था और ना ही हिन्दुओं के खिलाफ था। ये बयान केवल और केवल उन संघी गुंडा गिरोहों के खिलाफ था जो देश का माहौल बिगाड़ने  कोशिश कर रहे हैं। लेकिन हमेशा की तरह संघ से जुड़े लोग विशाल हिन्दू बहुमत  पीछे छिपने  कोशिश करते हैं और ऐसा माहोल बनाने की कोशिश करते हैं जैसे वो सारे हिन्दू समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं। अगर ऐसा होता तो  आपका बिहार में ये हाल होता ? एक दूसरे प्रवक्ता हैं अशोक पंडित, जो हर जगह घुसने  कोशिश करते हैं और बहस पर कब्जा करने की कोशिश करते हैं, और जिनके बारे में संघ के ही एक दूसरे प्रशंसक पहलाज निहलानी ने आज ही फर्जीवाड़ा करने का आरोप लगाया है उन्होंने भी ऐसी ही हिंदू प्रतिनिधि की मुद्रा अपनाई है। एक बयान परेश रावल का भी आया है जिसमे उसने कहा है की किसी भी देशभक्त को मुसीबत के समय अपनी मातृभूमि को छोड़कर नही भागना चाहिए। उन्होंने ये बयान शायद कश्मीर के संदर्भ में अशोक पंडित और अनुपम खेर के लिए दिया है जो मुसीबत के समय कश्मीर से भाग गए अब हररोज टीवी  कश्मीर-कश्मीर चिल्लाते रहते हैं। मैं कश्मीर और कश्मीरी पंडितों से जुड़े कुछ सवाल इनसे पूछना चाहता हूँ।
१.  क्या कश्मीर में अब एक भी पंडित नही रहता ? और अगर अब भी कश्मीर में पंडित रहते हैं तो वो क्यों भाग आये ?
२.  अब तो कश्मीर में और केंद्र में दोनों जगह आपकी सरकार है, फिर आप वापिस क्यों नही जा रहे ?
३.   अगर अब भी कश्मीर में हालत सामान्य नही है तो आपकी सरकार क्या कर रही है ?
४.   अगर आपको लगता है की कश्मीर के हालात पर सरकार का ज्यादा काबू नही है तो आप पिछली सरकार को क्यों कोसते थे ? क्या उसके पीछे राजनितिक कारण थे ?
५.   आपकी सरकार कश्मीर में लहराते ISIS के झंडों और उन्हें लहराने वालों पर कार्यवाही नही कर पा रही है या करना नही चाहती ?
६.   अगर आपकी सरकार कार्यवाही कर नही पा रही है तो उसका कारण बताइये। और अगर करना नही चाहती तो उसका कारण बताइये। अब ये मत कहना की ये राष्ट्रिय सुरक्षा का मामला है और इस पर बहस नही की जा सकती क्योंकि इस मांग पर आपने हजारों टीवी कार्यक्रम किये हैं।
७.   आपकी सरकार के आने के बाद आपने शरणार्थी कैम्पों में रहने वाले कश्मीरी पंडितों के लिए कौन-कौन सी नई सुविधाएँ लागु की हैं ?
           अगर आपके पास इन सब सवालों का कोई पुख्ता जवाब नही है और अगर आप इन पंडितों को घाटी में वापिस नही बसा पा रहे हैं तो टीवी बहसों में भौकना बंद कीजिये।
                      मेरा एक सवाल और सलाह भक्तों के लिए भी है। वो अपने आप को इस देश और इस देश के हिन्दुओं का ठेकेदार ना समझें। अभी इसका ठेका उन्हें नही मिला है। इस देश में रहने वाला हर नागरिक अपनी समस्याओं और परेशानियों पर अपनी राय रखने का अधिकार रखता है और सरकार से उस पर जवाब और कार्यवाही की उम्मीद भी रखता है और ये अधिकार उसे देश के संविधान ने दिया है। और ये उस संविधान ने दिया है जिसे बनाने में और लागु करने में आपके पूर्वजों की कोई भूमिका नही थी।

Friday, November 13, 2015

NEWS -- नितेश राणे अब भी शिव सैनिक ही हैं ?

खबरी -- नितेश राणे ने गिरीश कर्नाड के बयान का विरोध करते हुए उनसे माफ़ी की मांग की है।

गप्पी -- मुश्किल यही है की कांग्रेस में भी ऐसे लोगों की बड़ी तादाद है जो इलाका, धर्म और सम्प्रदाय की राजनीती करते हैं।  नितेश राणे के पिता नारायण राणे कभी शिवसेना के बड़े नेता होते थे जो बाद में कांग्रेस  में शामिल हो गए। लेकिन उनकी सोच, राजनीती और तोर तरीके शिवसेना से मिलते हैं। जब पूरा देश असहिष्णुता के खिलाफ लड़ रहा है और हिन्दू संगठन कर्नाटक में गिरीश कर्नाड को जान से मारने की धमकी दे रहे हैं, उसी समय नितेश राणे का गिरीश कर्नाड पर हमला फिर से ये साबित करता है की इस लड़ाई को कांग्रेस की  अगुवाई में नही लड़ा जा सकता। हालाँकि कांग्रेस में नितेश राणे कोई नेता नही हैं फिर भी इस लड़ाई में एक असमंजस तो पैदा होती ही है।

Tuesday, November 3, 2015

कहां है असहिष्णुता ? कहां है असहनशीलता ?

                         देश के कुछ बुद्धिजीविओं ने कहा की देश में असहनशीलता और असहिष्णुता का माहौल है। उन्होंने इस बात पर की सरकार इस माहौल को ठीक करने के लिए काम करने की बजाए, उन संगठनो को बढ़ावा दे रही है जो इस माहोल को बिगाड़ रहे हैं अपने पुरुस्कार लौटा दिए।
                         इस पर प्रतिक्रिया हुई, जो की होनी ही थी। पहले तो सरकार के प्रवक्ताओं ने इस देश में हुए अब तक के सारे अपराध ये कह कर गिनवा दिए की तब इन्होने पुरुस्कार क्यों नही लोटाये। इससे बात नही बनी। पुरुस्कार लौटाने का सिलसिला जारी रहा। अब इस को और ज्यादा जोर से गलत साबित करने की जरूरत थी। उसके बाद जो हुआ, वो इस प्रकार है। -
                           सरकार के एक प्रवक्ता ने कहा की देश में कोई असहनशीलता का माहोल नही है। देश एकदम सही और शांतिपूर्वक तरीके से चल रहा है। ये जो साहित्यकार हैं, ये सब के सब या तो वामपंथी हैं या कांग्रेसी हैं। ये अपना सरक्षण खत्म होने के कारण घबराये हुए हैं। इन्होने बहुत मलाई काटी है। इन्होने अपनी किताबें बेचीं हैं और देश में मुफ्त का सम्मान प्राप्त किया है। पिछले साठ सालो में आरएसएस से संबंधित लोगों को पुरुस्कार नही दिए गए। ये मान लेते हैं की उनमे कोई काबिल नही था, लेकिन क्या इसको लोकतंत्र कहते हैं। कुछ तो दिया होता। लेकिन नही, सारे अकादमिक पदों पर यही लोग बैठ गए। हमारे लोगों को तीसरे दर्जे  में भी नही बैठने दिया, क्या ये लोकतंत्र है ? लोकतंत्र मिलबाँटकर खाने का नाम होता है लेकिन इन्होने हमे केवल इसलिए नही पूछा की हम काबिल नही थे। अब हम इन सब लोगों की सफाई कर देंगे। हर एक अकादमिक संस्थान में एक गजेन्द्र चौहान बिठा देंगे। और इन लोगों के सारे काम पर प्रतिबंध लगा देंगे। साथ में मैं ये भी कहना चाहता हूँ की देश में पूरी तरह सहनशीलता का माहोल है। ये लोग समझ लें इस बात को।
                       उसके बाद दूसरे प्रवक्ता आये। उसने कहा की ये सब लोग राजनीती कर रहे हैं और हम इसको बर्दाश्त नही करेंगे। ये लोग राष्ट्र विरोधी हैं। ये सब देश विरोधी है। ये सब हिन्दू विरोधी हैं। ये ऐसे ऐसे कालेजों से आये हैं जहां नकस्लवादी भरे पड़े हैं। वहां हम BSF का कैंप बना देंगे। हम उन युनिवर्सिटियों को बंद कर देंगे। मान लिया की उनमे से बहुत से लोग अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बहुत सम्मान रखते हैं लेकिन उससे हमे क्या फर्क पड़ता है। हमने नोबल पुरुस्कार प्राप्त अमृत्य सेन को नालंदा विश्वविद्यालय से बाहर किया या नही। हमने अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज को नक्सलवादी बताकर जेल में बंद किया या नही। हमारे खिलाफ कोई किताब लिखी जाएगी तो हम उसका मुंह काला कर देंगे। लोगों को क्या खाना चाहिए ये जब तक हमारी सरकार है तब तक तो हम ही बताएंगे, वरना मारे भी जा सकते हैं। और जहां तक असहिष्णुता की बात है ऐसा कुछ भी नही है। अगर ये लोग बोलना, लिखना बंद कर दें तो इनको कोन क्या कहता है ?
                         मुझे बचपन में सुनी हुई एक कहावत याद आ गयी। एक आदमी अपनी पत्नी को चिट्ठी लिख रहा था। उसका एक दोस्त नजर बचाकर उसे पढ़ रहा था। ये बात उस आदमी को मालूम हो गयी। उसने चिट्ठी में लिखा की शेष बातें दूसरे पत्र में लिखूंगा। अभी तो एक मुर्ख दोस्त पास बैठा हुआ चिट्ठी पढ़ रहा है। उसका दोस्त तुरंत बोला की कमाल है यार, मैंने कुछ नही पढ़ा, फालतू में मुझे मुर्ख ना बताओ। चिट्ठी लिखने वाला आदमी बोला की क्या अब भी किसी प्रमाण की जरूरत है ? बात समझ में आते ही उसका दोस्त बहुत शर्मिंदा हुआ और उसने माफ़ी मांगी। परन्तु या तो ये लोग अब भी समझ नही पा  रहे हैं या फिर इनमे इतनी नैतिकता भी नही बची है।
                           इसके बाद कुछ लोग और आये। उनसे पूछा गया की ये कौन हैं ? तो उनमे से कई रो पड़े, बोले देखा, हमे कोई नही पहचानता। क्योंकि हमे साहित्य अकादमी सम्मान नही दिया गया इसलिए ये हालत है। इन लोगों को जब पुरुस्कार मिला था तब भी इनकी तारीफ हो रही थी और जब ये लोटा रहे हैं तब भी इनकी तारीफ हो रही है। लेकिन इन्हे बताना होगा इन्होने 1984 में सम्मान क्यों नही लौटाया, 1975 में क्यों नही लौटाया। तब ये कहां थे ?
                             एक पत्रकार ने पूछ लिया  आप तब कहां थे ?
                         देखिये हम तो कभी भी कहीं नही होते। ना हम 1984 में कहीं थे, ना 1975 में कहीं थे। दूसरी बात ये है की  हमारे पास लौटाने को था ही क्या। अब हमे सरकार ने कहा है की वो हमे एडजस्ट करेगी।
                            लेकिन माहौल के बारे में आपका क्या कहना है ?
                        माहोल तो एकदम सही है। अगर आपको लिखना ही है तो ऐसी चीज लिखिए जिससे किसी को भी खराब ना लगे। सरकार की प्रशंसा में गीत लिखिए। आरएसएस की विचारधारा को समर्थन देते हुए नाटक लिखिए, भले ही लोग उसको प्रहसन समझें। उसके बाद आपको कोई कुछ कहता है तो बताइये। आप सरकार और हिंदुत्व के खिलाफ फिल्म बनाएंगे तो क्या सरकार आपको छोड़ देगी ? उसके बाद माहोल को दोष देना गलत बात है। हमे तो किसी ने कुछ नही कहा।
                          आपने क्या लिखा है ?
                        पांच साल पहले एक कविता लिखी थी तितली पर। मेरा पोता अब तक उसे गाता है। हमे तो कोई धमकी नही मिली।