बहुत अजीब किस्म के हालात हैं। ये हालात ना केवल हमारे यहां हैं, बल्कि पूरी दुनिया में हैं। 1991 से पूरी दुनिया में बाजार आधारित अर्थव्यवस्था के समर्थक हर चीज को बाजार के भरोसे छोड़ देने पर जोर दे रहे हैं। उनका तर्क है की हर चीज बाजार को तय करने दो। धीरे धीरे बाजार हर चीज को ठीक कर देगा। इसके बाद पूरी दुनिया में सरकारों ने हर चीज को बाजार के भरोसे छोड़ देने का सैद्धांतिक फैसला कर लिया। कुछ देशों की सरकारें जो इससे असहमत थी उन्हें भी IMF और विश्व बैंक ने शर्तें रख कर इसके लिए मजबूर किया। बाजार अर्थव्यवस्था के हिमायती इस कदर हावी हो गए की उन्होंने देश की कुछ आधारभूत चीजों को भी बाजार के भरोसे छोड़ने की वकालत की और इसमें कामयाब भी रहे। जैसे उन्होंने कृषि उत्पादों के दाम भी बाजार के भरोसे छोड़ने और उसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की प्रणाली को खत्म करने की मांग की। यहां तक की उन्होंने तो न्यूनतम वेतन कानून भी खत्म करके उसे भी बाजार के भरोसे छोड़ देने की वकालत की। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत जरूरतों को तो बाजार के भरोसे छोड़ ही दिया सरकार ने।

इन लोगों ने रूपये को भी पूर्ण परिवर्तनीय बनाने पर जोर दिया। हालाँकि अभी ऐसे लोगों की तादाद भी बहुत अधिक थी जो इसके खिलाफ थे। लेकिन जब शेयर बाजार और रुपया ओंधे मुंह गिरने की स्थिति में होता है तो यही लोग उसे बचाने के लिए सरकार से हस्तक्षेप करने के लिए दौड़े चले आते हैं। सरकार शेयर बाजार को गिरने से बचाने के लिए सभी सरकारी वित्तीय संस्थाओं को शेयर बाजार को गिरने से रोकने के लिए बाजार में उत्तार देती है। जिसका असली मतलब ये होता है की इन संस्थाओं में जमा आम आदमी का पैसा शेयर बाजार के हवाले किया जा रहा होता है। कई बार ऐसा होता है की ये वित्तीय संस्थाएं शेयर बाजार और करेंसी को बचाने की कोशिश में खुद दिवालिया हो जाती हैं। शेयर बाजार को बचाने लिए सरकार इस हद तक चली जाती है की पेंशन फंड में रखी मजदूरों की बचत को भी इसमें झोँक देती है।

अभी हाल का उदाहरण हमारे सामने है। सरकार ने संसद में इन्स्योरंस बिल पास करके निजी कम्पनियों को इस सेक्टर में अपना हिस्सा बढ़ाने के रास्ते खोल दिए। इसका सबसे ज्यादा नुकशान LIC को ही होगा जो अब तक जीवन बीमा के क्षेत्र में लगभग एकाधिकार रखती है। LIC के पास प्रीमियम का जो पैसा जमा होता है वो कम ब्याज पर लम्बी अवधि के ऋण के रूप में सरकारी परियोजनाओं में लगता है। अब जब LIC का हिस्सा घटेगा तो सरकार को कम ब्याज पर और लम्बी अवधि के लिए मिलने वाला पैसा भी कम होगा। परन्तु सरकार देशी और विदेशी कम्पनियों के दबाव में इस सारी चीजों पर आँख मूंदने पर तैयार हो गयी। लेकिन जब सरकार पब्लिक सेक्टर के उद्योगों में विनिवेश करती है और उसे शेयर बाजार से समर्थन नही मिलता तब वो सारे शेयर खरीदने के लिए LIC पर दबाव डालती है और उसे मजबूर करती है की वो ये शेयर खरीदे। अभी भी जब सरकार ने इंडियन ऑयल के 10 % शेयर बेचने के लिए बाजार में रखे तो उसी दिन शेयर मार्किट 1600 अंक गिर गया। इंडियन ऑयल के शेयर की कीमतों को गिरने से बचाने के लिए उसने LIC को बाजार में उत्तर कर खरीददारी करने को कहा। और उस दिन इंडियन ऑयल के शेयर को गिरने से बचाने के लिए LIC ने अरबों रूपये की खरीददारी की। इसी तरह कई बार LIC ने सरकार द्वारा बेचे जाने वाले पब्लिक सेक्टर के उद्योगों के कुल शेयरों का 70 से 95 % तक हिस्सा खरीदा।

अब जब रुपया गिरकर 66 रूपये से नीचे चला गया तो रिजर्व बैंक के गवर्नर ने उसे गिरने से बचाने के लिए बाजार में हस्तक्षेप की घोषणा की। फिर सवाल ये आता है की ये कैसी बाजार अर्थव्यवस्था है जिसमे शेयर बाजार को तो सरकार बाजार के भरोसे नही छोड़ सकती और बाकि सारी जनता को उसने बाजार के भरोसे छोड़ दिया। पहले तो सरकारी वित्तीय संस्थाएं और बैंक शेयर मार्किट को बचाते बचाते खुद डूबने की स्थिति में आ जाते हैं, फिर उसमे रखे आम आदमी के पैसों का बहाना करके सरकार बजट में से उनको बेलआउट पैकेज देती है। यानि दूसरे तरीके से आम जनता का पैसा शेयर मार्किट में सट्टा करने वाले देशी और विदेशी कम्पनियों को खैरात में दे दिया जाता है। इस पर इस बाजार आधारित अर्थव्यवस्था का कोई पैरोकार विरोध नही करता।
कुल मिलाकर मामला ये है की बहाना किसी भी चीज का हो, सरकार का उद्देश्य केवल आम आदमी की जेब से पैसा निकाल के बड़े लोगों की जेब में डालना होता है।