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Friday, December 11, 2015

ओक्टुबर IIP के आंकड़े 9. 8 % और उनका विश्लेषण

ओक्टुबर IIP के आंकड़े 9. 8 % आये और उस पर इकोनॉमी में तेजी का दावा किया जा रहा है। लेकिन अगर इस आंकड़े को ठीक से देखा जाये तो पता चलता है की इसमें सारी बढ़ोतरी कंज्यूमर ड्यूरेबल्स के उत्पादन में बढ़ोतरी की वजह से हुई है। पिछले साल अक्टूबर में कंज्यूमर ड्यूरेबल का आंकड़ा -4.6 % था और इस बार ये आंकड़ा 42.2  % पर है।
                    इसका एक मुख्य कारण ये है की इस साल दिवाली नवंबर के महीने में थी और दिवाली पर होने वाली कंज्यूमर ड्यूरेबल्स का उत्पादन अक्टूबर के महीने में हुआ है। और उसकी तुलना पिछले साल के अक्टूबर से की जा रही है।
                     कुछ दिन पहले आये कोर-सेक्टर के आंकड़े कमजोर थे और किसी भी अर्थव्यवस्था में सुधार के असली संकेत कोर- सेक्टर यानि बिजली, स्टील और खान जैसी आधारभूत क्षेत्रों में सुधार से मिलते हैं। इसलिए अक्टूबर IIP  आंकड़ों से कोई स्थाई नतीजा निकालने से पहले अगले तीन-चार महीनो के आंकड़ों पर ध्यान रखने की जरूरत है।

Wednesday, September 30, 2015

RBI द्वारा ब्याज दर में कमी और विकास के दावे


 RBI ने ब्याज दरों में 50 पैसे की कटौती कर ही दी। कई दिनों से सरकार और खासकर वित्त मंत्री अरुण जेटली रिजर्व बैंक के प्रति अपनी नाराजगी व्यक्त कर रहे थे। इस नाराजगी में सरकार ऐसा आभास दे रही थी जैसे इस देश का विकास रिजर्व बैंक ने रोक हुआ हो। ब्याज दरों में कमी से मांग में बढ़ौतरी होती है ये बात तो सही है लेकिन रिजर्व बैंक द्वारा की गयी कमी का उपयोग किस चीज के लिए होता है सब कुछ इस पर निर्भर करता है।
                    रिजर्व बैंक अब तक एक रूपये पच्चीस पैसे की कटौती कर चूका है लेकिन बैंकों ने मुस्किल से पचास पैसे घटाए हैं। RBI के गवर्नर रघुराम राजन इस पर आपत्ति भी प्रकट कर चुके हैं। इस बार की कटौती के बाद भी एकाध बैंक ने बीस पैसे की कटौती की घोषणा की है। केंद्रीय बैंक की दरों में कटौती का प्रयोग बैंको ने अपने मुनाफे बढ़ाने के लिए कर लिया। जब तक बैंक आम उपभोक्ता तक ब्याज दरों में कटौती का लाभ नही पहुंचाएंगे उससे मार्किट में तेजी कैसे आएगी। लेकिन हमारे वित्त मंत्री जो बार बार गवर्नर से अपनी नाराजगी प्रकट करते रहे हैं, उन्होंने बैंकों के लिए एक शब्द नही बोला। हमारे बैंकों की और पुरे प्राइवेट सैक्टर की हालत ये है की वो किसी की नही सुनता। और सरकार की इच्छा भी उससे कुछ कहने की नही है। अब तक पॉलिसी के रूप में जो भी निर्णय लिए गए हैं वो सभी निजी सैक्टर ने अपने मुनाफे के लिए उपयोग कर लिए हैं।
                    बैंक जैसे ही ब्याज दर में कमी होती है डिपॉज़िट पर ब्याज दर घटा देते हैं। इससे पेंशन और जमापूंजी के ब्याज पर गुजर करने वाले लोगों के लिए मुश्किल खड़ी हो जाती है। दूसरी तरफ बैंक लोन की ब्याज दरों में कोई कटौती नही करते हैं या नाम मात्र की कमी करते हैं जिससे मांग पर कोई असर नही पड़ता है। इसके लिए बैंक गुंजाइश ना होने का बहाना बनाते हैं। इस गुंजाइश ना होने का सबसे बड़ा कारण ये है की निजी क्षेत्र इन बैंको का लाखों करोड़ रुपया खाकर बैठ गया है। हर साल NPA का स्तर बढ़ता जाता है। बैंक हर साल निजी क्षेत्र का लाखों करोड़ रुपया माफ़ कर देते हैं जिससे उनके मुनाफे और बैलेंस सीट पर असर पड़ता है। और इस सारी स्थिति का बिझ वो आम आदमी पर डाल देते हैं चाहे वो बैंक में जमा कराने वाला हो या लोन लेने वाला हो। इस लालची और जन विरोधी तरीके को जब तक बदला नही जायेगा उसका मार्किट पर कोई असर पड़ने वाला नही है। और सरकार इस बारे में कुछ बोलती नही है या उसका समर्थन इनके साथ है।
                    दूसरा सवाल ब्याज दरों में कटौती का विदेशी पूंजी पर पड़ने वाला असर है। मार्किट के विशेषज्ञ ये मानते हैं की पिछले दिनों में विदेशों से भारत के DEBT में निवेश के बढ़ते आंकड़े का मुख्य कारण हमारे यहां की ऊँची ब्याज दरें हैं। जैसे ही रिजर्व बैंक ब्याज दरों में कटौती करता है हमारे यहां से वो निवेश वापिस जाने की प्रकिर्या शुरू हो जाती है। इससे रूपये की कीमत गिरती है और हमारे आयत और महंगे हो जाते हैं। हमारा देश कच्चे मॉल का और पट्रोलियम पदार्थों का मुख्य आयात करता है। इनके महंगे होने से हमारा तैयार माल दूसरे देशों के मुकाबले महंगा हो जाता है और निर्यात और कम हो जाते हैं। इसलिए ये जरूरी नही है की ब्याज दरों में कटौती का लाभ ही हो।
                     अगर सरकार ब्याज दरों में कटौती को मांग बढ़ने के सायकिल के साथ जोड़ना चाहती है तो उसे ये सुनिश्चित करना होगा की ब्याज दरों में कटौती का लाभ निचे मार्किट तक पहुंचे और इसका इस्तेमाल बैंक अपने मुनाफे बढ़ाने के लिए ना करें। वरना ये सारी कवायद बेकार हो जाएगी।

Tuesday, September 1, 2015

शेयर बाजार को बाजार भरोसे क्यों नही छोड़ती सरकार ?

      
बहुत अजीब किस्म के हालात हैं। ये हालात ना केवल हमारे यहां हैं, बल्कि पूरी दुनिया में हैं। 1991 से पूरी दुनिया में बाजार आधारित अर्थव्यवस्था के समर्थक हर चीज को बाजार के भरोसे छोड़ देने पर जोर दे रहे हैं। उनका तर्क है की हर चीज बाजार को तय करने दो। धीरे धीरे बाजार हर चीज को ठीक कर देगा। इसके बाद पूरी दुनिया में सरकारों ने हर चीज को बाजार के भरोसे छोड़ देने का सैद्धांतिक फैसला कर लिया। कुछ देशों की सरकारें जो इससे असहमत थी उन्हें भी IMF और विश्व बैंक ने शर्तें रख कर इसके लिए मजबूर किया। बाजार अर्थव्यवस्था के हिमायती इस कदर हावी हो गए की उन्होंने देश की कुछ आधारभूत चीजों को भी बाजार के भरोसे छोड़ने की वकालत की और इसमें कामयाब भी रहे। जैसे उन्होंने कृषि उत्पादों के दाम भी बाजार के भरोसे छोड़ने और उसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की प्रणाली को खत्म करने की मांग की। यहां तक की उन्होंने तो न्यूनतम वेतन कानून भी खत्म करके उसे भी बाजार के भरोसे छोड़ देने की वकालत की। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत जरूरतों को तो बाजार के भरोसे छोड़ ही दिया सरकार ने।
                   
इन लोगों ने रूपये को भी पूर्ण परिवर्तनीय बनाने पर जोर दिया। हालाँकि अभी ऐसे लोगों की तादाद भी बहुत अधिक थी जो इसके खिलाफ थे। लेकिन जब शेयर बाजार और रुपया ओंधे मुंह गिरने की स्थिति में होता है तो यही लोग उसे बचाने के लिए सरकार से हस्तक्षेप करने के लिए दौड़े चले आते हैं। सरकार शेयर बाजार को गिरने से बचाने के लिए सभी सरकारी वित्तीय संस्थाओं को शेयर बाजार को गिरने से रोकने  के लिए बाजार में उत्तार देती है। जिसका असली मतलब ये होता है की इन संस्थाओं में जमा आम आदमी का पैसा शेयर बाजार के हवाले किया जा रहा होता है। कई बार ऐसा होता है की ये वित्तीय संस्थाएं शेयर बाजार और करेंसी को बचाने की कोशिश में खुद दिवालिया हो जाती हैं। शेयर बाजार को बचाने  लिए सरकार इस हद तक चली जाती है की पेंशन फंड में रखी मजदूरों की बचत को भी इसमें झोँक देती है।
                 
अभी हाल का उदाहरण हमारे सामने है। सरकार ने संसद में इन्स्योरंस बिल पास करके निजी कम्पनियों को इस सेक्टर में अपना हिस्सा बढ़ाने के रास्ते खोल दिए। इसका सबसे ज्यादा नुकशान LIC को ही होगा जो अब तक जीवन बीमा के क्षेत्र में लगभग एकाधिकार रखती है। LIC के पास प्रीमियम का जो पैसा जमा होता है वो कम ब्याज पर लम्बी अवधि के ऋण के रूप में सरकारी परियोजनाओं में लगता है। अब जब LIC का हिस्सा घटेगा तो सरकार को कम ब्याज पर और लम्बी अवधि के लिए मिलने वाला पैसा भी कम होगा। परन्तु सरकार देशी और विदेशी कम्पनियों के दबाव में इस सारी चीजों पर आँख मूंदने पर तैयार हो गयी। लेकिन जब सरकार पब्लिक सेक्टर के उद्योगों में विनिवेश करती है और उसे शेयर बाजार से समर्थन नही मिलता तब वो सारे शेयर खरीदने के लिए LIC पर दबाव डालती है और उसे मजबूर करती है की वो ये शेयर खरीदे। अभी भी जब सरकार ने इंडियन ऑयल के 10 % शेयर बेचने के लिए बाजार में रखे तो उसी दिन शेयर मार्किट 1600 अंक गिर गया। इंडियन ऑयल के शेयर की कीमतों को गिरने से बचाने के लिए उसने LIC को बाजार में उत्तर कर खरीददारी करने को कहा। और उस दिन इंडियन ऑयल के शेयर को गिरने से बचाने के लिए LIC ने  अरबों रूपये की खरीददारी की। इसी तरह कई बार LIC ने सरकार द्वारा बेचे जाने वाले पब्लिक सेक्टर के उद्योगों के कुल शेयरों का 70 से 95 % तक हिस्सा खरीदा।
                   
अब जब रुपया गिरकर 66 रूपये से नीचे चला गया तो रिजर्व बैंक के गवर्नर ने उसे गिरने से बचाने के लिए बाजार में हस्तक्षेप की घोषणा की। फिर सवाल ये आता है की ये कैसी बाजार अर्थव्यवस्था है जिसमे शेयर बाजार को तो सरकार बाजार के भरोसे नही छोड़ सकती और बाकि सारी जनता को उसने बाजार के भरोसे छोड़ दिया। पहले तो सरकारी वित्तीय संस्थाएं और बैंक शेयर मार्किट को बचाते बचाते खुद डूबने की स्थिति में आ जाते हैं, फिर उसमे रखे आम आदमी के पैसों का बहाना करके सरकार बजट में से उनको बेलआउट पैकेज देती है। यानि दूसरे तरीके से आम जनता का पैसा शेयर मार्किट में सट्टा करने वाले देशी और विदेशी कम्पनियों को खैरात में दे दिया जाता है। इस पर इस बाजार आधारित अर्थव्यवस्था का कोई पैरोकार विरोध नही करता।
                      कुल मिलाकर मामला ये है की बहाना किसी भी चीज का हो, सरकार का उद्देश्य केवल आम आदमी की जेब से पैसा निकाल के बड़े लोगों की जेब में डालना होता है।