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Wednesday, August 30, 2017

नोटबंदी के कारण 2 लाख फर्जी कम्पनियां पकड़े जाने का झूठ

                       नोटबंदी की विफलता इतनी बड़ी है की अब इसका उद्देश्य साबित करने की कोशिश में सरकार हकलाने लगी है। अब उसको खुद नहीं पता होता की वो क्या कह रही है और क्यों कह रही है।  इस विफलता को छिपाने की कोई भी कोशिश कामयाब नहीं हो पा रही है। शुरू में इसकी सफलता पर कुछ अर्थशास्त्री सवाल उठा रहे थे, कुछ समय बाद साधारण अर्थशास्त्र का विद्यार्थी भी इसकी विफलता को समझने लगा था। अब तो हालत ये है की साधारण आदमी, जिसका अर्थशास्त्र से कोई लेना देना नहीं है वो भी इसकी विफलता को खुली आँखों से देख सकता है। अब अगर कोई नोटबंदी के फायदे गिनवाने की कोशिश करता है तो सामने वाला पहले ही हसना शुरू कर देता है।
                         इस क्रम में सबसे ज्यादा फजीहत अगर किसी की हुई है तो वो है रिजर्व बैंक। सरकार के फैसले की जिम्मेदारी और उसकी विफलता को छुपाने की कोशिश में रिजर्व बैंक ने अपनी साख में बट्टा लगा लिया है। लगातार नो महीने तक ये कहना की अभी वो नोटों की गिनती कर रहा है, उसे हास्यास्पद स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है। हालाँकि इस फैसले की सफलता और विफलता की पूरी जिम्मेदारी प्रधानमंत्री की है, लेकिन हमारे प्रधानमंत्री तो अब मान-अपमान और हंसी मखौल से ऊपर उठ चुके हैं। अब तो हालत ये है की प्रधानमंत्री कुछ भी बोल देते हैं और सरकार तुरंत उस बयान की सफाई ढूढ़ने में लग जाती है। जैसे 56लाख नए करदाता जुड़ने वाला बयान। जिस पर वित्तमंत्रालय  से लेकर CBDT तक सफाई नहीं पेश कर पा रहे हैं और उस पर बड़ी बात ये की ये आंकड़ा प्रधानमंत्री ने लालकिले से पेश कर दिया।
                        अब रिजर्व बैंक ने आखिर में ये आंकड़ा पेश कर दिया है की 99 % नोट बैंक में वापिस आ गए हैं। यानि रिजर्व बैंक के अनुसार जो केवल मात्र 16 हजार करोड़ के नोट वापिस नहीं आये उनकी रकम उतनी भी नहीं बनती जितना नए नोटों पर खर्चा हो गया है। और इसमें भी एक चालाकी की गयी है। रिजर्व बैंक ने ये आंकड़ा देते हुए (मार्च तक ) शब्द का प्रयोग किया है। सबको मालूम है की मार्च तक सरकार ने जिला कोपरेटिव बैंको में जमा 1000 और 500 के नोटों को स्वीकार नहीं  किया था। अगर उस रकम को भी जोड़ लिया जाये  तो लोगों की वो आशंका सही साबित हो जाएगी की कहीं घोषित रकम से ज्यादा नोट तो वापिस नहीं आ गए। क्योंकि लोगों को शक है की नोट जमा कराने के दौरान बड़े पैमाने पर नकली नोट भी जमा हुए हो सकते हैं, क्योंकि रिजर्व बैंक के पास तो नोट गिनने तक का इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं था फिर असली नकली देखने का तो सवाल ही कहां पैदा होता है।
                      लेकिन अब रिजर्व बैंक का आंकड़ा सामने आने के बाद सरकार एक बार फिर नोटबंदी की सफलता के पक्ष में एक बहुत ही हास्यास्पद तर्क दे रही है। वो तर्क ये है की नोटबंदी के कारण 2 लाख फर्जी कम्पनियों का पता चला। जो लोग भी थोड़ा सा भी इस प्रक्रिया को समझते हैं की इन तथाकथित फर्जी कम्पनियों और नोटबंदी का आपस में कोई लेना देना नहीं है। असल में ये मामला इस तरह है - हर साल लाखों लोग रजिस्ट्रार ऑफ़ कम्पनीज ( ROC ) के पास नई कम्पनी रजिस्टर्ड करवाते हैं। इसके पीछे भविष्य में कोई काम शुरू करने की इच्छा होती है। लेकिन कई तरह के कारणों की वजह से वो कामकाज शुरू नहीं कर पाते हैं। इसलिए उनमे से बहुत से लोग ROC में सालाना लेखा पेश नहीं करते। और कुछ शून्य कामकाज का लेखा पेश करते हैं। ROC अपने नियमो के हिसाब से लेखा पेश न करने वाली कंपनियों की सदस्य्ता हर साल कैंसिल कर देती है। ये एक सामान्य प्रक्रिया है और इसका रिकार्ड हमेशा ROC के पास रहता है। इस साल सरकार के कहने पर ROC ने ऐसी कम्पनियों का रजिस्ट्रेशन बड़ी तादाद में एक साथ रद्द कर दिया। बस इतना सा मामला है और इसका नोटबंदी से कुछ भी लेना देना नहीं है। ROC को हमेशा पता होता है की कितनी कम्पनिया शून्य कामकाज के स्तर पर हैं।
                      अब सरकार इसको इस तरह पेश कर रही है जैसे उसने बहुत बड़ा गोलमाल पकड़ लिया हो जो सालों से चल रहा था। अगर ऐसा है तो सरकार बताये की कितने लोगों पर केस दर्ज हुआ है। और कितने लोग जेल के अंदर हैं। जबकि ऐसा कुछ नहीं है। सरकार का व्यवहार खिसियायी बिल्ली जैसा हो गया है और इसके  कारण हमारा देश पूरी दुनिया में मजाक का पात्र बन गया है।

Sunday, July 23, 2017

मुद्रा लोन, रोजगार के आंकड़े और नोटों की गिनती।

                    अभी अभी केंद्र सरकार का बयान आया है की उसने पिछले तीन सालों में सात करोड़ से ज्यादा लोगों को रोजगार दिया है। और ये रोजगार उसने मुद्रा बैंक से साढ़े तीन लाख करोड़ लोन देकर दिया है। उसके बाद सब तरफ इसकी चर्चा है और कुछ भक्त तो ये भी कह रहे हैं की देखो, मोदीजी ने वायदा तो सालाना दो करोड़ नौकरियों का किया था और रोजगार सात करोड़ से ज्यादा लोगों को दे दिया।
                     इस पर सबसे ज्यादा हैरानी की बात ये है की लोगों को पता ही नहीं है की सरकार ने उनको रोजगार दे दिया। और लोग हैं की फालतू में लाइन लगा कर खड़े हैं और सरकार को कोस रहे हैं। अब सरकार का काम लोगों को रोजगार देना था सो दे दिया, लोगों को इसका पता लगे न लगे ये सरकार की जिम्मेदारी थोड़ी है। कुछ लोग कह रहे हैं की वायदा नौकरियों का था और सरकार अब घुमा फिरा कर रोजगार के आंकड़े दे रही है। इस पर भक्त लोग कह रहे हैं की रोजगार और नौकरी में क्या फर्क होता है ? लोगों की भाषा कमजोर है तो ये मोदीजी की जिम्मेदारी थोड़ी है।
                       ये बयान सुनते ही मेरे पड़ौसी तुरंत मेरे घर पर आ धमके। पता नहीं वो मेरे घर को सरकार का लोक सम्पर्क विभाग का दफ्तर क्यों समझते हैं ? आते ही सवाल दागा ," ये सात करोड़ लोगों को रोजगार कैसे दे दिया ?"
                       मैंने कहा, " जब सरकार कह रही है तो दिया ही होगा। वैसे सरकार का कहना है की उसने सात करोड़ लोगों को साढ़े तीन लाख करोड़ का लोन मुद्रा योजना से दिया है जिससे उन्हें रोजगार मिला। "
                       " लेकिन लोन तो पहले से धंधा कर रहे लोगों को मिलता है। अगर किसी छोटे दुकानदार ने अपनी पूंजी की जरूरत के लिए पचास हजार का लोन ले लिया तो क्या उसे दूसरा रोजगार मिल गया। वो तो पहले से ही रोजगार शुदा था। " पड़ोसी ने अगला सवाल किया।
                        मैंने कहा ," देखो, अगर किसी दुकानदार के पास पैसे नहीं हैं तो उसे तो देर सबेर बेरोजगार होना ही था। तुम ऐसा समझ लो की सरकार ने उसे एडवांस में रोजगार दे दिया। "
                          " ऐसे कैसे समझ लें ? तुमने पहले से रोजगार शुदा लोगों को लोन दिया और अब उसे नए रोजगार में खपा रहे हो। " पड़ोसी ने सख्त एतराज किया और लगभग मुझे ही सरकार मान लिया।
                       " देखो, तुम ये तो मानते ही हो न की देश में बहुत भृष्टाचार है। इसमें बहुत से लोगों ने गलत काम धंधा दिखाकर और बैंक के लोगों से मिलीभगत करके भी लोन लिया होगा। इसके अलावा सरकारी पार्टी के कार्यकर्ताओं को भी लोन मिला होगा। तो उनको रोजगार मिला की नहीं ?" मैंने स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की।
                       मेरे पड़ोसी की आँखे चौड़ी हो गयी। उसने गर्दन हिला कर कहा। " बहुत अच्छे, चलो ये बताओ की सरकार को कैसे पता चला की साढ़े तीन लाख करोड़ का लोन दिया गया है ?"
                           " कमाल  करते हो, बैंको के आंकड़े हैं और कैसे पता चलेगा। " मैंने कहा।
                        "लेकिन रिजर्व बैंक में तो अभी तक नोटों की गिनती चल रही है। उसको तो ये भी नहीं मालूम की उसके पास कितना पैसा है। वो कैसे बता सकता है की कितने का लोन दिया। अगर सारे नोट गिनने के बाद एक दो लाख करोड़ का फर्क आ गया तो क्या करोगे ?" मेरे पड़ोसी ने आखरी पैंतरा आजमाया।
                        " तो सरकार अपने आंकड़े सुधार लेगी और क्या करेगी। अगर रकम बढ़ गयी तो विजय माल्या के खाते में जमा कर देंगे। " मैंने पीछा छुड़वाना चाहा।
                         हा हा हा। पड़ोसी ने ठहाका लगाया और चला गया।

Monday, March 6, 2017

नए बैंक चार्जिज ( Bank Charges ) से बचने के उपाय।

                   सरकार ने नोटबन्दी के बाद लोगों को इसके लिए मजबूर किया की वो अपने खर्चे चलाने के लिए नकद की बजाय डिज़िटल पेमेन्ट करें। उसके बाद डिज़िटल पेमेन्ट का प्लेटफार्म उपलब्ध करवाने वाली कम्पनियों ने इसका इस्तेमाल करने वालों पर कई तरह के चार्ज लगा दिए। उसके बाद अब बैंको ने भी छोटे ग्राहकों पर बैंक से लेनदेन करने पर कई तरह के चार्ज लगाने की घोषणा कर दी। बैंको में सामान्य आदमी जो सेविंग खाता रखता है और जो कर्मचारी सैलरी खाता रखते हैं, ये नए चार्ज उन पर लागू होंगे। एक तरफ सरकार ने कानून बना कर सैलरी को केवल बैंक में ट्रांसफर करने का आदेश जारी कर दिया और दूसरी तरफ बैंको ने उन खातों पर चार्ज लगाने की घोषणा कर दी। दूसरी तरफ सरकार ने आम आदमी को मिलने वाली हर तरह की सब्सिडी और सहायता के लिए बैंक खाता होने की शर्त लगा दी और बैंको ने उन पर चार्ज लगा दिया।
                     बड़े कॉरपोरेट घरानों द्वारा कर्जा न चुकाने के चलते बैंको को जो घाटा हो रहा है उसे पूरा करने के लिए उन्हें आम आदमी की जेब काटने की छूट दे दी गयी। पहले तेल कम्पनियों को, उसके बाद रेल मंत्रालय को और  बैंको को ये छूट मुहैया करवा दी गयी है।  गरीबों के लिए काम करने वाली सरकार के फैसले हैं।
                    इसलिए लोगों को अब थोड़ा ध्यान से लेन देन करने की जरूरत है। बैंको ने ये चार्ज दो तरह से लगाए हैं। 

१.    बैंक में बचत खाता और सैलरी खाता धारकों को अब खाते में मिनिमम बैलेंस न रखने पर चार्ज लगेगा। 

२.     बैंक से पैसे निकालने, पैसे जमा करवाने और एटीएम  इस्तेमाल करने पर चार्ज लगेगा। 

                     इससे बचने के लिए कुछ चीजों का ध्यान रखने की जरूरत है। जैसे -

१.    सैलरी खाता धारक अपने खाते से सीधे कटने वाली होमलोन या व्हीकल लोन इत्यादि की किस्तों और दूसरी सीधी पेमेन्ट होने वाली रकम को छोड़कर बाकी पैसा एक ही बार में बैंक से निकाल लें। इस पैसे को घर पर रखें और बाकी महीने का खर्च चलायें। ये पैसा सीधे बैंक से चैक के द्वारा निकालें, क्योंकि एटीएम की लिमिट कम होती है और उससे एक बार में सारा पैसा नही निकाला जा सकता है। 
२.     बचत खाता धारक अपने बैंक खाते का कम से कम उपयोग करें। उसमे बार बार पैसे जमा करवाने और निकालने से बचें। 
३.    नकद की बजाय डिज़िटल पेमेंट करने पर आपको कभी भी किसी न किसी तरह का चार्ज लग सकता है। इसलिए छोटे लेनदेन के लिए नकदी का इस्तेमाल करें और बड़े लेनदेन के लिए चैक का इस्तेमाल करें। 

Thursday, February 9, 2017

नोटबंदी - जीना भी मुश्किल, मरना भी मुश्किल।

           ये एक पुरानी हिंदी फिल्म का गीत है जो अब हम सब भारतीयों पर खरा उतर रहा है। जब से नोटबन्दी हुई है और सरकार रोज नए नए नियम तय कर रही है उससे लोगों का जीना तो मुश्किल हो ही गया था, अब मरणा भी मुश्किल हो गया है। जैसे - 
             रिजर्व बैंक ने करंट खातों से रकम उठाने की सीमा खत्म करने की घोषणा कर दी। साथ ही एटीएम से भी सीमा हटा ली गयी। लेकिन इसके साथ निजी कम्पनियों की तरह एक टर्म एंड कन्डीशन लगा दी। वो ये है की रिजर्व बैंक ने भले ही सीमा हटा ली हो, लेकिन बैंक अपनी सुविधा के अनुसार सीमा तय कर सकते हैं। अब हाल ये है की बैंक में 20000 का चैक लेकर जाओ तो बैंक कहता है की केवल 12000 मिल सकते हैं। अब क्या करें ? यानी जीना भी मुश्किल, और मरना भी मुश्किल।
              यही हाल एटीएम का है। सीमा समाप्त कर दी गयी है लेकिन एटीएम बन्द हैं। पुरे शहर में 15 - 20 % एटीएम ही चालू हैं। उनमे भी कब कैश खत्म हो जायेगा पता नही है। मार्च के बाद सरकार और RBI सारी सीमाएं हटाने की घोषणा कर देंगी। लेकिन देश बन्द एटीएम और बैंक में नाकाफी नकदी के भरोसे रह जायेगा।
              दूसरा मुद्दा सरकार के दूसरे नियमो का है। सरकार कहती है की आप घर पर एक सीमा से ज्यादा पैसा नही रख सकते। अगर जरूरत है तो डिजिटल पेमेन्ट करिये। डिजिटल पेमेन्ट करेंगे तो चार्ज लगेगा। आप बैंक से नकदी निकालेंगे तो चार्ज लगेगा। आपकी मजबूरी है की आप चार्ज देकर भुगतान करें। सारा देश बंधक हो गया और इसको लोकतंत्र कहते हैं। ये पूरी दुनिया में अपनी तरह का अकेला लोकतंत्र है। प्रधानमंत्री कहते हैं की पूरी दुनिया के अर्थशास्त्रियों के पास हमारी नोटबन्दी का मूल्यांकन करने का पैमाना ही नही है। यानि पूरी दुनिया के अर्थशास्त्रियों ने अब तक जो पढ़ा है वो सब बेकार गया। अब इस लोकतंत्र के मूल्यांकन के लिए भी दुनिया के समाजशास्त्रियों और राजनीती के विद्यार्थियों को नए पैमाने तय करने पड़ेंगे। उन्हें ये सीखना होगा की अब तक वो जिसे तानाशाही कहते आये हैं, उसे अब लोकतंत्र में कैसे फिट किया जाये।
               अब आपको जिन्दा रहने का चार्ज देना पड़ेगा। कैश निकलोगे तो चार्ज और डिजिटल पेमेंट करोगे तो चार्ज। और लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए इसमें भी बायें हाथ से जेब काटने का प्रबन्ध किया गया है। सरकार कहती है की कार्ड से पट्रोल खरीदने पर ग्राहक को कोई चार्ज नही देना पड़ेगा और की चार्ज का भुगतान तेल कम्पनियां करेंगी। यानि तेल कम्पनियां चार्ज का खर्च निकालने के लिए कीमत उस हिसाब से तय करेंगी। सरकार तो पहले ही कह चुकी है की अब तेल की कीमतें तय करना कम्पनियों पर छोड़ दिया गया है और सरकार का उसमे कोई दखल नही है। यानि अब आपको तेल की कीमत में चार्ज जोड़ कर देना होगा। इसी तरह बाकि सामान की कार्ड पेमेंट करने पर दुकानदार को जो चार्ज देना होता है वो सामान की कीमत में जुड़ जाता है। जाहिर है की कोई भी व्यापारी अपने पास से उसका भुगतान क्यों करेगा। इस तरह अब आपकी जेब काटने से पहले आपको देशभक्ति और भृष्टाचार से लड़ने वाले सिपाही होने का एनस्थिसिया दिया जायेगा और फिर आपकी जेब काटी जाएगी। और आप जेब कटवाकर ख़ुशी ख़ुशी मोदी मोदी करते हुए घर चले जायेंगे। जो लोग सरकार की इस बाजीगरी को नही समझते हैं और भक्ति की मुद्रा में हैं उनको तो कोई परेशानी नही है। जो लोग इसको समझते हैं उनके लिए तो जीना भी मुश्किल, मरना भी मुश्किल।

Sunday, August 21, 2016

डॉ उर्जित पटेल नए RBI गवर्नर

खबरी -- रिज़र्व बैंक के नए गवर्नर के बारे में क्या ख्याल है ?

गप्पी -- डॉ उर्जित पटेल एक बहुत ही काबिल और विद्धान शख्शियत हैं। मोदी सरकार के अब तक के अनुभवों को देखते हुए, और रघुराम राजन जैसे काबिल आदमी को गवर्नर की दूसरी टर्म नही दिए जाने को लेकर लोगों में ये आशंका थी की RBI गवर्नर जैसे महत्त्वपूर्ण और संवेदनशील पद पर भी किसी गजेन्द्र चौहान को ना बैठा दिया जाये। अब तक मोदी सरकार महत्त्वपूर्ण सरकारी पदों पर आरएसएस और बीजेपी से जुड़े कम योग्य लोगों को नियुक्त करती रही है। इसलिए लोगों के मन में गहरा सन्देह था। लेकिन डॉ उर्जित पटेल की नियुक्ति के बाद लोगों ने सन्तोष की साँस ली है। डॉ उर्जित पटेल बेहद काबिल इंसान हैं और एक प्रख्यात अर्थशास्त्री होने के कारण अर्थव्यवस्था की जरूरतों को अच्छी तरह समझते हैं।
               जहां तक सोशल मीडिया में उनके रिलायंस से जुड़े रहने के बारे में सवाल उठाये जा रहे हैं तो इससे ये सिद्ध नही होता की वो एक उद्योग समूह के हिसाब से निर्णय लेंगे। उनका कार्यकाल शुरू होने से पहले ही इस तरह के सवाल उठाना सही नही है।
                देश ये उम्मीद करता है की गवर्नर की हैसियत से डॉ उर्जित पटेल महंगाई को काबू में रक्खेंगे और जनता के विशाल बहुमत के हितों की रक्षा करेंगे।

Thursday, October 15, 2015

Economy -- रिवर्स रेपो रेट ( Reverse Repo Rate ) कम करे रिजर्व बैंक ( RBI )

अर्थ व्यवस्था में तेजी  लाने के लिए ब्याज दरों में कमी की मांग लगातार उठती रही है। रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन के साथ तो इस मुद्दे पर वित्त मंत्री के मतभेद मीडिया में भी चर्चा का विषय रहे हैं। रिज़र्व बैंक महंगाई सहित कई चीजों को ध्यान में रखकर अपनी नीति की घोषणा करता है। देश के हालात की समीक्षा और उसके नतीजों पर अलग अलग विचार हो सकते हैं। परन्तु हमारे देश में ऊँची ब्याज दरों को अर्थ व्यवस्था में तेजी ना आने के लिए जिम्मेदार माना गया। इस पर वित्त मंत्री और दूसरे उद्योगपतियों के साथ साथ वित्त विशेषज्ञ भी अपना एतराज जताते रहे हैं। लेकिन मूल सवाल ये है की अर्थ व्यवस्था की तेजी का मामला केवल रिजर्व बैंक द्वारा रेट कम करने तक है या बैंकों द्वारा ब्याज दरों को कम करके आम उपभोक्ता तक पंहुचाने से जुड़ा है। अब तक रिजर्व बैंक 1. 25 % की दर कम कर चूका है लेकिन बैंकों ने केवल 50 -60 पैसे कम किये हैं। हैरत की बात है की जो वित्त मंत्री रिजर्व बैंक की रेट ना घटाने को लेकर सार्वजनिक आलोचना करते रहे हैं उन्होंने बैंको के रेट कम ना करने को लेकर एक शब्द नही बोला। दूसरे उद्योगपति और विशेषज्ञ भी इस पर आश्चर्य जनक रूप से चुप्पी साधे हुए हैं। आखिर ये खेल क्या है ?
                   खेल ये है की अब तक रिजर्व बैंक ने जिस रेट को कम करने की घोषणा की है उसका एक बड़ा हिस्सा बैंकों ने अपने मुनाफे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल कर लिया। एक तरफ उन्होंने लोन की दरें कम नही की , दूसरी तरफ उन्होंने लोगों द्वारा जमा करवाये जाने वाले डिपॉजिट पर ब्याज कम कर दिया। इससे लोन लेने वाले लोगों, या पहले से लोन ले चुके लोगों को तो कोई लाभ हुआ नही उल्टा बैंक में पैसा रखकर ब्याज पर गुजारा करने वाले रिटायर लोगों के लिए जरूर मुश्किलें खड़ी हो गयी। इस सारे खेल में किसी को अगर कोई फायदा हुआ तो वो बैंक ही हैं जिनके मुनाफे बिना कुछ किये बढ़ गए। आश्चर्य है की वित्त मंत्रीजी को अब अर्थ व्यवस्था पर उसके कुप्रभाव नजर नही आये। उद्योग पतिओं के मुनाफे पर आँख मूंदने वाली सरकार से और क्या उम्मीद की जा सकती है।
                     इस सारी व्यवस्था पर रिजर्व बैंक के गवर्नर जरूर अपनी नाराजगी व्यक्त करते रहे हैं। उन्होंने बैंको को ब्याज कम करने की हिदायत भी दी। लेकिन इस तरह की हिदायतों को हमेशा की तरह बैंकिंग सेक्टर ने नजरअंदाज कर दिया। इसलिए बैंको को ब्याज दर घटाने के लिए मजबूर करने के लिए और ग्राहकों तक इसका लाभ पंहुचाने के लिए रिजर्व बैंक को चाहिए की वो रिवर्स रेपो रेट में 1 % की कमी करे। पहले रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट में दो प्रतिशत का अंतर होता था जिसे कम करते करते एक प्रतिशत पर ले आया गया। ये वो दर होती है जिसके अनुसार बैंको को अपना अतिरिक्त पैसा रिजर्व बैंक में पार्क करने पर रिजर्व बैंक उन्हें ब्याज के रूप में देती है। अगर ये दर अपेक्षाकृत रूप से कम होगी तो बैंक अपना पैसा रिजर्व बैंक में पार्क करने की बजाए थोड़ा कम ब्याज पर बाजार में लोन के रूप में देंगे। अगर सरकार और रिजर्व बैंक सचमुच ब्याज दरों में कमी लाना चाहती है और उपभोक्ताओं तक उसका लाभ पंहुचना चाहती है तो उसे तुरंत ये फैसला ले लेना चाहिए।

Wednesday, September 30, 2015

RBI द्वारा ब्याज दर में कमी और विकास के दावे


 RBI ने ब्याज दरों में 50 पैसे की कटौती कर ही दी। कई दिनों से सरकार और खासकर वित्त मंत्री अरुण जेटली रिजर्व बैंक के प्रति अपनी नाराजगी व्यक्त कर रहे थे। इस नाराजगी में सरकार ऐसा आभास दे रही थी जैसे इस देश का विकास रिजर्व बैंक ने रोक हुआ हो। ब्याज दरों में कमी से मांग में बढ़ौतरी होती है ये बात तो सही है लेकिन रिजर्व बैंक द्वारा की गयी कमी का उपयोग किस चीज के लिए होता है सब कुछ इस पर निर्भर करता है।
                    रिजर्व बैंक अब तक एक रूपये पच्चीस पैसे की कटौती कर चूका है लेकिन बैंकों ने मुस्किल से पचास पैसे घटाए हैं। RBI के गवर्नर रघुराम राजन इस पर आपत्ति भी प्रकट कर चुके हैं। इस बार की कटौती के बाद भी एकाध बैंक ने बीस पैसे की कटौती की घोषणा की है। केंद्रीय बैंक की दरों में कटौती का प्रयोग बैंको ने अपने मुनाफे बढ़ाने के लिए कर लिया। जब तक बैंक आम उपभोक्ता तक ब्याज दरों में कटौती का लाभ नही पहुंचाएंगे उससे मार्किट में तेजी कैसे आएगी। लेकिन हमारे वित्त मंत्री जो बार बार गवर्नर से अपनी नाराजगी प्रकट करते रहे हैं, उन्होंने बैंकों के लिए एक शब्द नही बोला। हमारे बैंकों की और पुरे प्राइवेट सैक्टर की हालत ये है की वो किसी की नही सुनता। और सरकार की इच्छा भी उससे कुछ कहने की नही है। अब तक पॉलिसी के रूप में जो भी निर्णय लिए गए हैं वो सभी निजी सैक्टर ने अपने मुनाफे के लिए उपयोग कर लिए हैं।
                    बैंक जैसे ही ब्याज दर में कमी होती है डिपॉज़िट पर ब्याज दर घटा देते हैं। इससे पेंशन और जमापूंजी के ब्याज पर गुजर करने वाले लोगों के लिए मुश्किल खड़ी हो जाती है। दूसरी तरफ बैंक लोन की ब्याज दरों में कोई कटौती नही करते हैं या नाम मात्र की कमी करते हैं जिससे मांग पर कोई असर नही पड़ता है। इसके लिए बैंक गुंजाइश ना होने का बहाना बनाते हैं। इस गुंजाइश ना होने का सबसे बड़ा कारण ये है की निजी क्षेत्र इन बैंको का लाखों करोड़ रुपया खाकर बैठ गया है। हर साल NPA का स्तर बढ़ता जाता है। बैंक हर साल निजी क्षेत्र का लाखों करोड़ रुपया माफ़ कर देते हैं जिससे उनके मुनाफे और बैलेंस सीट पर असर पड़ता है। और इस सारी स्थिति का बिझ वो आम आदमी पर डाल देते हैं चाहे वो बैंक में जमा कराने वाला हो या लोन लेने वाला हो। इस लालची और जन विरोधी तरीके को जब तक बदला नही जायेगा उसका मार्किट पर कोई असर पड़ने वाला नही है। और सरकार इस बारे में कुछ बोलती नही है या उसका समर्थन इनके साथ है।
                    दूसरा सवाल ब्याज दरों में कटौती का विदेशी पूंजी पर पड़ने वाला असर है। मार्किट के विशेषज्ञ ये मानते हैं की पिछले दिनों में विदेशों से भारत के DEBT में निवेश के बढ़ते आंकड़े का मुख्य कारण हमारे यहां की ऊँची ब्याज दरें हैं। जैसे ही रिजर्व बैंक ब्याज दरों में कटौती करता है हमारे यहां से वो निवेश वापिस जाने की प्रकिर्या शुरू हो जाती है। इससे रूपये की कीमत गिरती है और हमारे आयत और महंगे हो जाते हैं। हमारा देश कच्चे मॉल का और पट्रोलियम पदार्थों का मुख्य आयात करता है। इनके महंगे होने से हमारा तैयार माल दूसरे देशों के मुकाबले महंगा हो जाता है और निर्यात और कम हो जाते हैं। इसलिए ये जरूरी नही है की ब्याज दरों में कटौती का लाभ ही हो।
                     अगर सरकार ब्याज दरों में कटौती को मांग बढ़ने के सायकिल के साथ जोड़ना चाहती है तो उसे ये सुनिश्चित करना होगा की ब्याज दरों में कटौती का लाभ निचे मार्किट तक पहुंचे और इसका इस्तेमाल बैंक अपने मुनाफे बढ़ाने के लिए ना करें। वरना ये सारी कवायद बेकार हो जाएगी।

Sunday, September 6, 2015

गरीब को और गरीब बनाने का हथियार है हमारी टैक्स व्यवस्था


किसी भी देश की व्यवस्था को चलाने के लिए पैसे की जरूरत  होती है। और ये पैसा सरकार के पास टैक्स के द्वारा आता है। परन्तु सारी राजनीती इस बात पर निर्भर करती है की टैक्स इकट्ठा किससे  किया जा  रहा है और खर्च किस पर किया जा रहा है। लेकिन ये मामला इतना आसान नही होता। इसलिए इस बारे में एक भ्रम का जाल फैलाया जाता है। दुनिया की बड़ी से बड़ी एकतरफा व्यवस्था भी इसका भ्रम फैलाती है की वो सारे नागरिकों की भलाई के लिए काम कर रही है। इसका प्रचार इतना प्रबल होता है की लोग उन चीजों का भी समर्थन करते हैं जो उनके खिलाफ होती हैं।
                       हमारे देश में भी इसी तरह का जाल फैलाया गया है। जिसका असर ये हुआ है की पढ़े लिखे लोगों में से भी बहुत से लोग उन चीजों का समर्थन करते हैं जो उनके खिलाफ हैं। और अगर कोई संस्था या व्यक्ति उनके हित में बात भी करता है तो सबसे ज्यादा विरोध यही लोग करते हैं। यही चीज है जिसके कारण ये जनविरोधी व्यवस्था टिकी हुई है। लोगों को उनके हितों के खिलाफ ही लामबंद कर लिया जाता है। इसलिए ये जरूरी हो गया है की लोगों तक सही जानकारी पहुंचे।
                         हर एक देश में दो तरह के टैक्स होते हैं जिन्हे इकोनोमिक्स की भाषा में प्रत्यक्ष कर और अप्रत्यक्ष कर कहते हैं। इसे आसान भाषा में सीधा कर और आड़ा कर कहा  जा सकता है। सीधा कर वह होता है जो सीधे कर के नाम से लिया जाता है जैसे इन्कम टैक्स और धन टैक्स (Wealth tax ) . और आड़ा कर वो होता है जो चीजों की कीमत में जुड़कर इकट्ठा होता है जैसे वैट या सेल्स टैक्स, एक्साइज ड्यूटी इत्यादि। ये जो कर चीजों की कीमत में जोड़कर लिया जाता है इसका प्रभाव हर आदमी पर होता है। जो भी आदमी कोई भी चीज खरीदता है उससे ये टैक्स ले लिया जाता है भले ही वह कितना ही गरीब क्यों ना हो। इसलिए जितना ये कर ज्यादा होता है उतना ही गरीबों को नुकशान होता है। अगर इस टैक्स की दर ज्यादा होती है तो उसका बोझ आम आदमी पर पड़ता है।
                          लेकिन जो सीधा कर होता है वो उन लोगों से इकट्ठा किया जाता है जो एक सीमा से ज्यादा पैसा कमा रहे होते हैं। इसमें भी टैक्स की दरें इस तरह रखी जाती हैं की कम कमाई वाले आदमी पर इसका बोझ कम पड़े और ज्यादा कमाने वाले पर ज्यादा बोझ पड़े। लेकिन हमारे देश में अगर ऊपर की ज्यादा कमाई वाले लोगों पर टैक्स की दर बढ़ाने की मांग की जाती है तो वो लोग ही इसका सबसे ज्यादा विरोध करते हैं जिनको ये टैक्स देना ही नही है। इसलिए अरबों रूपये कमाने वालों को समर्थन करने के लिए बैठे बिठाए लोग मिल जाते हैं। इसलिए इस सवाल को जरा ध्यान से समझने की जरूरत है।
                           सरकार अभी आड़ा टैक्स की प्रणाली को बदलने के लिए GST बिल लेकर आ रही है। इसमें जो सुझाव है उसके अनुसार इसकी दर 22 से 27 % के बीच रहने वाली है। इसका मतलब ये है की आम आदमी जो भी सामान या सेवा (जैसे बिजली या टेलीफोन इत्यादि का बिल ) खरीदेगा उसे कुल कीमत का एक चौथाई पैसा केवल टैक्स के रूप में देना पड़ेगा। यानि एक गरीब आदमी जो 6000 रूपये महीने में घर चलाता है उसे भी पिछले दरवाजे से हर महीने 1500 रूपये टैक्स के रूप में देने पड़ेंगे। ये टैक्स सामान की कीमत में ही जुड़ा होता है इसलिए आम आदमी को तो इसका मालूम ही नही पड़ता। परन्तु इतना भारी टैक्स होने के बावजूद देश में इसके खिलाफ कोई बोल ही नही रहा है। सरकार और मीडिया ने मिलकर ऐसा माहौल बना दिया है जैसे ये टैक्स तो हमारी अर्थव्यवस्था के लिए बहुत ही जरूरी है और देश के हित में है।
                           दूसरी तरफ सीधा कर जो इनकम टैक्स के नाम से और धन कर के नाम से लिया जाता है उसमे धन कर को तो सरकार ने इस साल से खत्म कर दिया है। ये वो कर था जो बड़ी सम्पत्ति के स्वामियों से लिया जाता था और जिसे कभी भी सरकार ने ईमानदारी से इकट्ठा करने की कोशिश नही की। वरना अगर इसे ईमानदारी से इकट्ठा किया जाता तो इससे बहुत बड़ी रकम प्राप्त हो सकती थी और आम आदमी पर इसका कोई बोझ भी नही पड़ता। हमारे देश में एक नंबर की सम्पत्ति के जो आंकड़े मौजूद हैं उसके अनुसार हमारे देश में स्थाई सम्पत्ति एक करोड़ बाईस लाख सत्तर हजार करोड़ रूपये है। इसमें लोगों के बैंक में जमा पैसा, बीमा में जमा , शेयर और दूसरे फंड में जमा पैसा शामिल नही है। इसमें केवल सोना और रियल एस्टेट जैसी चीजे ही शामिल हैं। इसमें से 74 % सम्पत्ति के मालिक केवल ऊपर के 10 % लोग हैं। और उससे भी आगे ये की इसमें से 49 % सम्पत्ति के मालिक केवल 1 % लोग हैं। अगर उन 1 % लोगों की सम्पत्ति पर सालाना केवल 1 % टैक्स ही लिया जाये तो उसकी रकम सालाना 60000 करोड़ से ज्यादा बैठती है। और ये तो वो सम्पत्ति है जो एक नंबर की है और उसकी कीमत भी उन लोगों की ही बताई हुई है।  सरकार ने ये टैक्स कभी ईमानदारी से इकट्ठा नही किया और अब उसे समाप्त कर दिया।
                      अगला उदाहरण इनकम टैक्स का है। जब भी इनकम टैक्स की दर में ऊपर के स्तर पर बढ़ौतरी की मांग उठती है तो सबसे पहले इसका विरोध वो लोग करते हैं जिन्हे वो दर जिंदगी में कभी लागु नही होगी।
2011 -12 के आंकड़ों के अनुसार 5 लाख तक की कमाई वाले लोगों से कुल 15000 करोड़ रुपया इकट्ठा हुआ था और उनकी संख्या 28844000 थी। अगर इन लोगों को टैक्स की स्लैब में 50000 रूपये की छूट दे दी जाती है तो सरकार को कुल मिला कर  5000 करोड़ का भी नुकशान नही होगा। दूसरी तरफ 20 लाख से ऊपर की कमाई बताने वाले लोगों की संख्या केवल 4 लाख 6 हजार थी। अगर इन लोगों की स्लैब में 30 % से बढ़ाकर 40 % की स्लैब कर दी जाये तो सरकार को करीब 23000 करोड़ रुपया ज्यादा मिल सकता है। सारे फेरबदल से लाभ होने वाले लोगों की संख्या 3 करोड़ है और असर पड़ने वाले लोगों की संख्या केवल 4 लाख है और सरकार को करीब 18000 करोड़ का फायदा भी हो सकता है। ये 2012 के आंकड़े हैं और अब 2015 है। इसलिए अगर एक करोड़ सालाना से ज्यादा कमाई बताने वाले लोगों पर 40 % की स्लैब लागु कर दी जाये तो मुश्किल से एक लाख लोग इससे प्रभावित होंगे और सरकार की कमाई करीब 25000 करोड़ बढ़ जाएगी।
                          लेकिन सरकार इससे उल्टा कर रही है। उसने कॉर्पोरेट टैक्स की दर को 5 % घटा दिया, धन कर खत्म कर दिया और आम लोगों पर वैट बढ़ाने जा रही है। ये सारी व्यवस्था अमीरों को और अमीर बनाने और गरीबों को गरीब बनाने के हिसाब से चल रही है। और ना केवल चल रही है बल्कि देश के मध्यम वर्ग का समर्थन भी प्राप्त कर रही है।रिजर्व बैंक द्वारा जारी किये गए 2012 -13  के अनुसार हमारे देश में कुल टैक्स उगाही में सीधे करों का हिस्सा 38 . 44 % है और आड़ा करों का हिस्सा 61 . 56 % है। गरीबी  और अमीरी का अंतर कम करने के लिए इस अनुपात को उल्टा करना जरूरी है। इसलिए इससे जो मुख्य बातें निकल कर आती हैं वो इस प्रकार हैं। ---
१.   इन्कम टैक्स की दर को एक करोड़ से ऊपर कमाई वाले लोगों के लिए 40 % किया जाये।
२.  कॉर्पोरेट टैक्स को घटाना बंद किया जाये।
३.  जीवन जरूरत की चीजों पर वैट हटाया जाये।
४.  धन कर को दुबारा और प्रभावशाली तरीके से लागु किया जाये और इसकी दर सालाना 1 % रखी जाये।

Sunday, August 23, 2015

पेमेंट बैंकों ( Payment Banks ) की स्थापना और उसके असर

                भारतीय रिजर्व बैंक ने पेमेन्ट बैंकों की स्थापना के लिए कई निजी कम्पनियों के आवेदनो को मंजूरी दे दी है। इसके साथ ही देश में इस तरह के बैंकों का या यों कह सकते हैं की एक अलग प्रकार के बैंकों का यह पहला प्रयोग होगा। इसके साथ ही इस पर इसके दूसरे बैंकों , हमारी अर्थव्यवस्था , और पुरे सिस्टम पर होने वाले असर को लेकर बहस भी शुरू हो गयी है। समाज और उद्योग के कई हलकों ने इसका स्वागत किया है तो बैंक कर्मचारियों की यूनियन ने इसका कड़ा विरोध किया है। इसलिए ये जानना जरूरी हो गया है की इसकी कार्यप्रणाली क्या होगी और ये क्या काम करेगा।
                 रिजर्व बैंक ने इसको जारी किये जाने के उद्देश्य स्पष्ट किये हैं। जिसमे रिजर्व बैंक ने जो मुख्य कारण दिए हैं वो इस प्रकार हैं। ---
१. ये बैंक शुरुआती दौर में एक लाख तक की जमाराशि प्रत्येक खाताधारक से जमा कर सकते हैं, जिसे बाद में बैंक के कामकाज को देखकर रिजर्व बैंक द्वारा बढ़ाया जा सकता है।
२. ये बैंक एटीएम कार्ड और डेबिट कार्ड जारी कर सकते हैं। लेकिन क्रेडिट कार्ड जारी नही कर सकते।
३. ये बैंक अलग अलग सेवाओं के भुगतान करने की सुविधा दे सकते हैं जो इसका मुख्य उद्देश्य है।
४. ये बैंक म्युचुअल फंड और बीमा के उत्पाद बेच सकते हैं।
५. इन बैंको की स्थापना  गावों में रहने वाले छोटे छोटे जमाकर्ताओं, दूसरी जगह जाकर काम करने वाले मजदूरों और छोटे दुकानदारों, कम आय वाले परिवारों और छोटे बचत खातों की बैंक सुविधा प्रदान करवाने के लिए की जा रही है।
                           जो काम ये बैंक नही कर सकते। 
१. ये बैंक उधार देने का काम नही कर सकते।
२. ये बैंक अपना जमा पैसा केवल सरकारी सिक्यॉरिटियों और बांड में रख सकते हैं।
       ये सारे नियम और दूसरी जानकारियां भारतीय रिजर्व बैंक की प्रेस स्टेटमेंट में देखे जा सकते हैं उसके लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं।
        ये सारी सुविधाएँ ये बैंक उच्च तकनीक का उपयोग करके मोबाईल फोन जैसे उपकरणों से उपलब्ध करवाएंगे। और इसके लिए किसी बैंक की शाखा में जाना नही पड़ेगा। और इन सेवाओं के बदले ये बैंक ग्राहक से चार्ज वसूल करेंगे। इससे दूसरे राज्यों में जाकर मजदूरी करने वाले लोगों के लिए घर पर पैसे भेजना आसान हो जायेगा।
                       इन सारी बातों को देखने पर किसी भी आदमी को इसमें कोई खराब चीज नजर नही आएगी। फिर इसका विरोध क्यों हो रहा है। इसका विरोध करने वालों में मुख्य संस्था बैंक कर्मचारियों की यूनियन है। बैंक कर्मचारियों की सबसे बड़ी यूनियन AIBEA ने एक प्रेस स्टेटमेंट जारी करके ना केवल इसका विरोध किया है बल्कि विरोध के कारणों को भी स्पष्ट किया है। जो इस प्रकार हैं।
            ( ये प्रेस स्टेटमेंट बिजनस स्टैंडर्ड में आप यहाँ  क्लिक करके देख सकते हैं.)
१. यूनियन का कहना है की ये बैंक लाइसेंस उन्ही निजी क्षेत्र की कम्पनियों को दिए गए हैं जो सरकारी बैंकों का लगभग छह लाख करोड़ रुपया डुबा कर बैठे हैं।
२. 2008 में जब पूरी दुनिया में निजी बैंकों का दिवाला निकला था तब भारतीय अर्थव्यवस्था को सरकारी बैंकों ने इसलिए बैठने से बचा लिया था क्योंकि वो रिजर्व बैंक के सख्त नियमों के अनुसार काम करते हैं। अगर दुबारा कोई ऐसी स्थिति आती है तो इन निजी बैंकों के भरोसे अर्थव्यवस्था को नही बचाया जा सकेगा।
३. छोटी छोटी बचतें भारतीय सरकारी बैंकों की रीढ़ हैं, और इन निजी पेमेंट बैंकों के आने के बाद सरकारी बैंकों में उनका स्तर गिरेगा और सरकारी बैंक भारी दबाव में आ जायेंगे।
४. छोटी बचतों के ना मिलने के कारण बैंकों का जमा राशियों पर खर्च बढ़ जायेगा जिससे सभी तरह के लोन महंगे हो जायेंगे।
५. इस तरह ये बैंक सरकारी बैंको की व्यवस्था के विरोधी साबित होंगे और आखिर में जनविरोधी साबित होंगे।
              इस पर जो दूसरे लोग भी एतराज कर रहे हैं उनमे मुख्य इस प्रकार हैं।
१. ये बैंक उच्च तकनीकी व्यवस्था पर आधारित होंगे जो की इनकी पहली शर्त है, इसलिए बिना बैंक शाखाओं के ये रोजगार विहीन विकास का नमूना होंगे जिसकी मार हमारा देश पहले ही झेल रहा है।
२. बिना उच्च मापदंडों के ये बैंक ऐसे खाते बड़ी संख्या में खोलेंगे जिनमे कालाधन जमा किया जा सकेगा। अब तक रिजर्व बैंक बड़े निजी बैंकों में भी KYC को सही ढंग से लागु नही करवा पाया है।
३. कम तकनीकी जानकारी के कारण गरीब ग्राहक बिना वजह धोखाधड़ी के शिकार होंगे, जिसे रोकने की अब तक कोई व्यवस्था नही है।
४. इसके बाद रिजर्व बैंक छोटे बैंकों के लिए लाइसेंस जारी करने जा रहा है। इस तरह ये  कुल मिलाकर बैंको के सरकारीकरण की प्रकिर्या को ही उलटने का काम होगा जो हमारे जैसे देश के लिए बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति होगी।
                   इस तरह इन बैंकों की स्थापना पर कई तरह के सवाल हैं। लोगों का एक तबका मानता है की निजी कम्पनियों को लाइसेंस देने की बजाए भारतीय डाक विभाग जैसे सरकार नियंत्रित संस्थाओं को ही इसका लाइसेंस देना चाहिए था। वैसे भी भरतीय डाक विभाग की देश के ग्रामीण क्षेत्र में 139000 शाखाएँ हैं, जबकि सारे बैंको की कुल मिलकर 44700 शाखाएं ही हैं। गरीब लोगों के पैसे को निजी हाथों में देना सुरक्षा के हिसाब से बहुत अच्छा नही माना जाता।


Vyang -- अब बिल्ली करेगी आपके दूध की रखवाली।

खबरी -- ये " पेमेन्ट बैंक " क्या बला है ?

गप्पी -- पिछले दिनों की कुछ बहुत ही महत्त्वपूर्ण खबरों पर एक नजर डालिये। एक खबर आई की देश के टैक्स का दो लाख सत्रह हजार करोड़ रुपया केवल सत्रह लोगों पर बकाया है। धन्य हो। ऐसे लोगों की तो पूजा होनी चाहिए। हालाँकि सरकार ऐसे लोगों की पूजा कर भी रही है। इनमे से कई लोग प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं में सम्मानित प्रतिनिधियों की तरह शामिल रहते हैं। उनका सम्मान होता है और उनकी अय्यासी का खर्चा इस देश की गरीब जनता उठाती है। 
                       दूसरी महत्त्वपूर्ण खबर ये आई की देश के सरकारी बैंको का छः लाख करोड़ रुपया लगभग डूब गया है। ये लगभग शब्द जो है उसकी खोज जोर का धक्का आहिस्ता से लगने के लिए की गयी थी। वरना लगभग का कोई मतलब नही है। असली खबर ये है की छः लाख करोड़ रुपया डूब चूका है। ये कौन बेचारे भाई हैं जो बैंको से लोन लेकर उसे चूका नही पाये। इनमे कई तो ऊपर वाले सत्रह लोगों में ही हैं। जो बाकि बचे वो इनके भाई बंधु , घर परिवार वाले और इन जैसे ही कुछ दूसरे महानुभाव हैं। बेचारा आम आदमी तो बैंक का सौ रुपया नही चुका पाये तो उसके खिलाफ FIR हो जाती है। बैंक की उगाही करने वाली जीप उनका खेतों तक पीछा करती है। और तब तक करती रहती है जब तक या तो वो पैसा दे दे या आत्महत्या कर ले। 
                       ऊपर के दोनों कुकर्मों के लिए हमारा निजी क्षेत्र जिम्मेदार है। जिसके सम्मान में सारा देश दुहरा हुआ रहता है। जिससे कोई सवाल नही पूछता। जिस का अपना मीडिया है, अपने एक्सपर्ट हैं, अपनी सरकार है और अपने नासमझ समर्थक हैं। ये व्ही निजी क्षेत्र है जिसे सारी आर्थिक बिमारियों का इलाज बताया जाता है। अब इसके लिए सरकार ने एक बहुत ही बढ़िया स्कीम बनाई है। 
                        हमारे रिजर्व बैंक ने इन्हे "पेमेंट बैंक" के नाम से बैंक खोलने की अनुमति दे दी है। ये बेचारे कुछ दिनों से बहुत परेशानी में थे। उद्योगों में मंदी का माहौल चल रहा है। बैंकों का जो पैसा खाया जा सकता था खा चुके हैं। टैक्स का जो पैसा हजम हो सकता था कर चुके हैं। बैंकों से नया लोन लेने के लिए भी कोई बहाना चाहिए भले ही कितना ही कमजोर क्यों न हो। अब इस बेचारे निजी क्षेत्र का विकास रुक गया। इसके बच्चे दो लाख रूपये रोज के किराये की होटलों में कैसे रुकेंगे। पत्नी की सालगिरह पर हवाईजहाज कैसे गिफ्ट में दिया जायेगा ? हजार-हजार करोड़ के मकान कैसे बनेंगे। उनकी इस परेशानी को देखते हुए सरकार ने इन्हे ही सीधे सीधे बैंक खोलने का परोक्ष अधिकार दे दिया। लो भाई, खुद पैसा इकट्ठा करो और खुद हजम करो। किस्से पैसा इकट्ठा करो ? अरे भई आम लोगों से, जो दूर के गांव में रहते हैं, दूसरी जगहों पर जाकर मजदूरी करते हैं और जहां कोई बैंक अपनी शाखा नही खोलना चाहता। ये सारा काम आपके मोबाईल पर कर देंगे। आपको ना बैंक जाने की जरूरत पड़ेगी और ना खाता खुलवाने के लिए सबूत देने की जरूरत पड़ेगी। अपनी छोटी छोटी  बचतों को इन बिल्लियों की रखवाली में रखिये और मलाई आने का इंतजार कीजिये। 
                         देश के ये बेचारे गरीब उद्योगपति हर रोज पैसा मांगने बैंक में जाएँ ये इनके सम्मान के खिलाफ है। बैंको में जो पैसा होता है वो भी जनता का ही होता है। ये बैंकों का पैसा खाते  रहते हैं फिर सरकार जनता के बजट में से पूंजी के नाम पर और पैसा डालती रहती है ये फिर खा लेते हैं। अब इस झंझट से छुटकारा मिल जायेगा सरकार को भी और इन बेचारी कम्पनियों को भी। आम जनता का पैसा ही खाना है तो भाई सीधे खाओ ना, सरकार को बीच में क्यों डालते हो।