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Thursday, February 15, 2018

PNB घोटाले पर सरकार के रुख पर उठते सवाल

                   PNB के 11400 करोड़ के घोटाले पर टीवी पर बहस के दौरान बीजेपी के प्रवक्ता सरफराज आलम ने कहा की ये घोटाला कांग्रेस की देन है और इस पर कांग्रेस को देश से माफ़ी मांगनी चाहिए। उसने ये भी कहा की कांग्रेस के शासन के दौरान पीएमओ से फोन करके बैंको पर दबाव डाल कर बड़े बड़े लोन दिलवाये जाते थे और उनमे कमीशन लिया जाता था।
                     ये आरोप अपनी जिम्मेदारी से पीछा छुड़ाने की नाकाम कोशिश के साथ साथ अपनी भाषा के स्तर पर निहायत घटिया भी है। लेकिन फिर भी अगर इसे सच मान लें, तो भी कुछ सवालों के जवाब बीजेपी को देने ही होंगे। जैसे -
१.  इस तरह कमीशन लेकर दिलवाये गए लोन के अपराध में आपने कितने कांग्रेस नेताओं को पकड़ा ? या आप भी उनसे हिस्से की बात कर रहे थे।
२. हरएक लोन का हर साल नवीनीकरण होता है। इस तरह दिलवाये गए कितने लोन का नवीनीकरण नहीं किया गया ये बात देश को बताइये।
३. अगर PNB के LOU फरवरी 2017 में जारी किये गए तो उनके लिए किसने फोन किया था उसका नाम देश को बताइये।
४. अरुण जेटली ने दावोस के लिए प्रधानमंत्री के साथ गए उद्योगपतियों के समूह के बारे में किये गए ट्वीट में नीरव मोदी का भी नाम है।  ये रिकार्ड की चीज है, तो अब बीजेपी और सरकार उससे इंकार क्यों कर रही है ?
५. RBI के पूर्व निदेशक ने कहा की बैंक का स्विफ्ट SWIFT सिस्टम और CBS सिस्टम finacal आपस में जुड़ा हुआ नहीं था जिसकी वजह से ये घोटाला सम्भव हो सका। सत्यम के केस में भी ठीक यही कहा गया था। फिर इतने दिन तक RBI किस चीज का इंतजार कर रहा था और उसके रैगुलेटर की जिम्मेदारी का क्या मतलब है। अगर उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं है तो पुरे देश के आम आदमी का पैसा बैंको के कर्मचारियों के रहमोकरम पर है।
           ये कुछ सवाल हैं जिनका जवाब मौजूदा सरकार और बीजेपी को देना चाहिए और उसे देना होगा।

               इसके अलावा एक चीज देश की जनता को भी समझनी होगी। जिस तरह से ये सरकार अपनी हर विफलता की जिम्मेदारी पिछली कांग्रेसी सरकारों पर और पिछले 70 सालों पर डालती है उससे ये मौका भी आ सकता है। मन लीजिये किसी ताकतवर देश के साथ कोई युद्ध हो जाता है और उसमे देश को नुकशान उठाना पड़ता है तो सरकार का जवाब ये होगा -
               पिछली सरकारों ने अच्छे हथियार नहीं खरीदे, सैनिको को उचित प्रशिक्षण नहीं दिया गया और सीमा पर इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण नहीं हुआ इस लिए हम युद्ध में कामयाब नहीं हुए।
                देश ये सुनने के लिए तैयार रहे।

Saturday, November 18, 2017

Moody.s की रेटिंग और उसके पीछे का सच।

        जबसे मूडीज ने भारत की रेटिंग बढ़ाई है, पूरी सरकार और उसके टीवी चैनल उस पर लगातार कार्यक्रम किये जा रहे हैं। मूडीज, एस&पी, और फिच जैसी संस्थाएं पूरी दुनिया में सरकारों और वित्तीय संस्थानों की रेटिंग जारी करती रहती हैं जिससे देशी विदेशी निवेशकों को वहां के माहौल की जानकारी मिल सके। लेकिन जब ये एजेंसियां किसी देश की रेटिंग कम करती हैं तो वहां की सरकार उस पर सवाल उठाती हैं, उनके रेटिंग के तरीके में दोष निकालती हैं। और जब रेटिंग बढ़ती है तो पुरे जोर शोर से उसका श्रेय लेती हैं। लेकिन क्या ये एजंसियां वाकई किसी देश की सही रेटिंग जारी करती हैं? या ये इसको manipulate भी करती हैं ?
            इसके बहुत से उदाहरण हमारे सामने हैं जिनमे इन एजेंसियों पर manipulation के आरोप लगे हैं। खुद Moody,s पर जर्मनी, UK और अमेरिका में manipulation के लिए भारी भरकम जुर्माने लगे हैं। Moody,s पर तो अमेरिका में ऐसी सिक्योरिटीज को अच्छी रेटिंग देने के आरोप लगे हैं जो असल में कोई कीमत ही नहीं रखती थी और उन्ही सिक्योर्टीज के कारण 2008 का संकट पैदा हुआ था, जिसके बाद Moody,s पर अमेरिका में केस चला और जिसे निपटाने के लिए Moody,s को लाखों डालर देकर उसे अदालत से बाहर निपटाना पड़ा।
              ये एजेंसियां रेटिंग तय करने की फ़ीस लेती हैं। इसलिए ये आरोप भी लगते रहे हैं और साबित भी होते रहे हैं की विश्व की कुछ वित्तीय संस्थाएं अपना घटिया मॉल ( बांड्स इत्यादी ) बेचने के लिए इन एजेंसियों का सहारा लेती हैं।
                लेकिन इससे अलग भी, अगर ये सही पैमानों का इस्तेमाल करके भी रेटिंग जारी करती हों तो उसका क्या मतलब होता है ये समझना बहुत जरूरी है। इनकी रेटिंग का अर्थ होता है की किसी देश के कानून और व्यवस्था वहां मुनाफाखोरी और वित्तीय संस्थाओं के प्रति कितने उदार हैं। अगर किसी देश में अन्य चीजों के साथ इन कंपनियों को मुनाफा कमाने और उसे लेजाने के अबाधित रास्ते उपलब्ध हैं तो उसकी रेटिंग ज्यादा ऊँची होगी। इसके कुछ उदाहरण निम्न प्रकार से हैं -
१.  अगर किसी देश की सरकार किसानो को न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी करती है और उसे सही तरीके से लागु करती है तो उसकी रेटिंग कम हो जाएगी क्योंकि ये एजंसियां उसे मुक्त व्यापार के रास्ते में रुकावट मानती हैं।
२.  इसी तरह अगर किसी देश में सख्त श्रम कानून हैं और सरकार सामाजिक सेवाओं पर ज्यादा पैसा खर्च करती है तो उसकी रेटिंग भी कम हो जाएगी। जैसे अगर सरकार स्कूलों और हस्पतालों पर पैसा खर्चना बंद करके उन्हें प्राइवेट कर दे तो उसकी रेटिंग बढ़ जाएगी।
३.  इसी तरह अगर सरकार कंपनियों को करों में छूट देती है और आम आदमी पर करों का बोझ बढ़ाती है तो उसकी रेटिंग ज्यादा रहेगी।
               इसलिए इन एजेंसियों की ऊँची रेटिंग किसी देश की जनता के जीवन स्तर को तय नहीं करती, अलबत्ता वहां मुनाफा कमाने की कितनी सहूलियत है इसको प्रतिबिम्बित करती है। इसलिए इन एजेंसियों की बढ़ती हुई रेटिंग पर खुश होने के लिए आम आदमी के पास कोई कारण नहीं होता है। 

Thursday, September 21, 2017

अर्थव्यवस्था को सम्भालने के बहुत कम विकल्प बचे हैं सरकार के पास।

                   पिछले क्वार्टर के जीडीपी के आंकड़े 5 . 7 % आने के बाद भले ही अमित शाह इसको टेक्निकल कारण बता रहे हों, लेकिन सरकार को मालूम है की स्थिति वाकई गंभीर है। ये लगातार छठी तिमाही है जिसमे जीडीपी की दर लगातार गिरी है। लेकिन अब तक सरकार इसके लिए अपनी नीतियों को जिम्मेदारी देने के लिए तैयार नहीं है। जबकि सारी दुनिया के अर्थशास्त्री मानते हैं की सरकार द्वारा लिए गए लगातार गलत फैसलों की वजह से ही जीडीपी गिर रही है।
                    सबसे पहले नोटबंदी ने अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ दी। नोटबंदी का सबसे ज्यादा नुकशान गांवों और दूरदराज के इलाकों पर हुआ। नगदी की कमी के कारण असंगठित क्षेत्र के रोजगार समाप्त हो गए। उसके कारण सब्जियों और दूसरे कृषि उत्पादों की कीमतें एकदम गिर गयी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार ही ये कमी 25 % से ज्यादा है। इसके कारण दो साल से लगातार सूखे की मार झेल रहे किसानो की हालत बद से बदतर हो गयी। दूसरी तरफ सरकारी और गैरसरकारी नौकरियों के अवसर लगभग समाप्त हो गए जिससे ग्रामीण क्षेत्र को जो सहारा मिलता था वो भी खत्म हो गया। उसके साथ ही खेती के बाद इस क्षेत्र में दूसरी जो चीज बड़े पैमाने पर रोजगार उपलब्ध करवाती है वो है पशुपालन। सरकार के पशुओं के खरीद बिक्री के नियमो में किये गए फेरफार ने सीमांत किसानो के लिए ये भी घाटे का सौदा बन गया। थोड़ी बहुत जो कसर बाकी बची थी वो गोरक्षकों के नाम पर जारी गुंडागर्दी ने पूरी कर दी। इसका सीधा असर चमड़े के उत्पादन और व्यापार पर पड़ा। जिससे समाज के बिलकुल निचले तबके के गरीब लोगों के रोजगार समाप्त हो गए। और आज हालत ये है की ग्रामीण क्षेत्र, जो हमारे देश की अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ी भूमिका रखता है भारी मंदी का शिकार हो गया।
                  उसके बाद जो क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है, चाहे रोजगार देने का मामला हो या उत्पादन का, वो है लघु उद्योग और रिटेल व्यापार। ये दोनों मिलकर देश में सबसे ज्यादा लोगों को रोजगार मुहैया करवाते हैं। लेकिन सरकार के GST लागु करने के फैसले और उसके बाद इसे लागु करने के तरीके ने इन दोनों क्षेत्रों की कमर तोड़ दी। इस तरह जहां जहां भी विकास की गुंजाइश थी हर तरफ हमला किया गया। लोग पहले हमले से सम्भल भी नहीं पाते की तुरंत दूसरा हमला हो जाता। और सबसे बड़ी बात ये की सरकार में कोई भी ये मानने को तैयार नहीं की कोई समस्या है। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने तो अर्थव्यवस्था के नकारात्मक आंकड़ों को टेक्निकल कारणों की वजह से आया बता दिया।
                    लेकिन अब वित्तमंत्री अरुण जेटली के बयान के बाद लगता है की सरकार को कम से कम इतना तो पता है अर्थव्यवस्था में सचमुच कोई गिरावट है। लेकिन सवाल यह है की सरकार के पास इस स्थिति में हस्तक्षेप करने की कितनी गुंजाइश और दिशा मौजूद है।
                    साल की तीसरी तिमाही के एडवांस टैक्स के आंकड़े उम्मीद से कम हैं। GST के बाद टैक्स क्लैक्शन के जो आंकड़े पहले बताये जा रहे थे अब उन पर सवाल उठ रहे हैं। कुल 95000 करोड़ की क्लैक्शन के सामने 65000 करोड़ इनपुट टैक्स क्रेडिट का क्लेम है और बड़ी कंपनियों ने अब तक क्लेम का दावा भी पेश नहीं किया है। इसके बाद सरकार की नींद उड़ी हुई है। सरकार के बड़े अधिकारीयों के ऑफ़ दा रिकार्ड बयान आ चुके हैं की कम कलेक्सन के कारण खर्च में कटौती करनी पड़ सकती है। CAD एक झटके में बढ़कर २. ६ % हो गया है और साल के अंत तक इसके 3. 6 %  पहुंचने आसार है। सरकार का बजट  में घोषित खर्च अपनी 94 % के स्तर पर पहुंच चूका है।
                     इन हालात को देखते हुए सरकार के पास बहुत सीमित विकल्प मौजूद हैं। और जो विकल्प मौजूद हैं तो क्या सरकार उन्हें अपनाने का साहस दिखाएगी। पिछले तीन साल से अर्थव्यवस्था सरकारी इन्वैस्टमैंट पर ही चल रही थी। प्राइवेट सेक्टर पहले ही अपनी क्षमता से कम पर चल रहा था सो उसमे किसी नई इन्वैस्टमैंट की उम्मीद ही नहीं थी। अब प्राइवेट सेक्टर की क्षमता और घटकर 70 % पर आ गयी है इसलिए एकमात्र सहारा सरकारी निवेश का ही बचा है। दूसरी तरफ लोगों को सहायता की तुरंत जरूरत है। लेकिन जिस तरह उच्चस्तरीय बैठक के तुरंत बाद वित्तमंत्री ने बयान दिया है की तेल की कीमतों में कोई कटौती नहीं होगी, उसे देखते हुए लगता नहीं है की सरकार लोगों को कोई राहत देगी। उल्टा कुछ लोगों को शक है की सामाजिक योजनाओं में कटौती हो सकती है। मनरेगा जैसी योजनाओं में कटौती हो सकती है, और नौकरियों पर बैन को बढ़ाया जा सकता है। अगर सचमुच में ऐसा होता है तो ये इलाज भी बीमारी से भयानक हो सकता है। अगर लोगों के पास खरीद शक्ति नहीं होगी तो मंदी के सर्कल से बाहर निकलना असम्भव हो जायेगा। 

Wednesday, September 13, 2017

नोटबंदी पर सरकार का रुख, " रपट पड़े तो हर गंगा "

                 नोटबंदी एक विफल प्रोग्राम साबित हो चूका है। लेकिन सरकार और बीजेपी लगातार बयान बदल बदल कर कहीं न कहीं इज्जत बचाने की कोशिश कर रहे हैं। जब प्रधानमंत्री मोदीजी ने इसकी घोषणा की , तब उन्होंने  इसके कारण और लक्ष्य बताये थे। जैसे जैसे समय गुजरा तो ये समझ में आया की इससे कुछ भी हासिल नहीं हुआ, उलटे अर्थव्यवस्था का भट्ठा बैठ गया और करोड़ों लोगों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। उसके तुरंत बाद बीजेपी और सरकार में बैठे मंत्रियों ने बयान बदलने शुरू कर दिए। सबसे पहले कहा गया की नोटबंदी लोगों को डिज़िटल लेनदेन की आदत डालने के लिए की गयी थी। उसके बाद ये आंकड़े भी आ गए की जून के बाद डिजिटल लेनदेन की संख्या में भारी गिरावट आयी है।
                 लेकिन जो मुख्य मसला था वो था कालाधन।  सरकार इस बात को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर पेश करना चाहती है की जैसे वो कालेधन और भृष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ रही है। इसके लिए इस बात में विफल होने के बाद की तीन-चार लाख करोड़ रूपये कागज के टुकड़ों में बदल जायेंगे, सरकार ने तुरंत पलटी मार कर कहना शुरू किया की हमने तो नोटबंदी की ही इसलिए थी की सारा पैसा बैंक में वापिस आ जाये। और की अब हमारे पास इस बात के आंकड़े हैं की किस किस का धन काला है और उन सब को पकड़ लिया जायेगा।
                  लेकिन सरकार का ये बयान भी उसकी कार्यवाही से मेल नहीं खाता। सुप्रीम कोर्ट में एक महिला की इस याचिका पर की उसे बैंक में पैसा जमा करने का एक मौका दिया जाये, उसके जवाब में सरकार ने कहा की अगर एक मौका और दे दिया गया तो नोटबंदी का उद्देश्य ही समाप्त हो जायेगा। तो आपका उद्देश्य क्या था ? अगर आपका उद्देश्य सारा पैसा सिस्टम में वापिस लाने का था तो बाकी का भी आ जाने दो। फिर आप जिला सहकारी बैंको में जमा हुए करीब नौ हजार करोड़ रूपये को लेने से क्यों इंकार कर रहे हो ? फिर आप देश से बाहर नेपाल इत्यादि में रहने वाले भारतीयों का पैसा लेने से इंकार क्यों कर रहे हो। दूसरे अब बचा ही क्या है ? RBI के अनुसार केवल 16000 करोड़ के नोट ही बाहर बचे हैं बाकी तो सब जमा हो चुके हैं।
                इसके केवल दो कारण हो सकते हैं। पहला ये की आपका उद्देश्य वो नहीं था जो आप अब बता रहे हैं, बल्कि वही था जो घोषणा करते वक्त बताया गया था।
                 और दूसरा कारण ये की एक मौका और दे देने से तय रकम से ज्यादा पैसा बैंक में आ सकता है और नकली नोटों का वो आंकड़ा भी सामने आ जायेगा जो इस दौरान बैंको में जमा हो गए। 

Saturday, July 22, 2017

गौ रक्षकों पर सरकार का बयान भरोसा पैदा नहीं करता।

                गौ रक्षकों द्वारा लगातार की जा रही हिंसा और उसमे कई जान चले जाने के महीनो बाद प्रधानमंत्री ने हिंसा की आलोचना करने वाला बयान जारी किया। उससे पहले लगातार हो रही हिंसा पर पूरा देश उन्हें मुंह खोलने के लिए कहता रहा, लेकिन उनके मुंह से इसके खिलाफ एक शब्द नहीं निकला। इससे हिंसा करने वाले गौ रक्षकों में इस बात का स्पष्ट संकेत गया की सरकार की मंशा क्या है। प्रधानमंत्री का ये बयान संसद का सत्र शुरू होने के एक दिन पहले और सुप्रीम कोर्ट में इस पर होने वाली सुनवाई से तीन दिन पहले आया। जानकारों का स्पष्ट मानना है की ये संसद में विपक्ष के हमले से बचने और सुप्रीम कोर्ट में किसी सख्त टिप्पणी से बचने की कवायद भर है। वरना क्या कारण था की सुदूर साइबेरिया में होने वाली दुर्घटना में अगर कोई मौत हो जाती है तो हमारे प्रधानमंत्री का ट्वीट वहां के प्रधानमंत्री के बयान से भी पहले आ जाता है। इसलिए लोग मानते हैं की गौ रक्षकों की हिंसा को बीजेपी, आरएसएस और सरकार का समर्थन प्राप्त है।
                     प्रधानमंत्री ने जब गौ रक्षकों की हिंसा की आलोचना करने वाला बयान दिया तो वो भी एकदम सीधा और स्पष्ट होने की बजाय किन्तु और परन्तु वाला बयान है। इसमें उन्होंने देश की बहुसंख्या द्वारा गाय को माता मानने जैसे शब्दों को शामिल कर दिया जो गौ रक्षकों को इस बयान की गंभीरता की असलियत बता देते हैं। और यही कारण है की उसके बाद भी गौ रक्षकों की हिंसा कम नहीं हुई।
                    इस मामले में सरकार और संघ परिवार की मंशा एकदम साफ है। एक तरफ सरकार गौ रक्षकों की हिंसा रोकने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर डालती है और दूसरी तरफ राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आने वाले पशु व्यापार पर केंद्र की तरफ से नोटिफिकेशन जारी करती है। वहीं खुद उनकी पार्टी की राज्य सरकारें सारे सबूतों को अनदेखा करके हिंसा करने वाले गौ रक्षकों पर केस दर्ज करने की बजाय पीड़ितों पर की केस दायर करती हैं।
                   इसके साथ ही उस घटनाक्रम को भी देखना होगा जिसमे गुजरात चुनावों में इस बार बीजेपी की पतली हालत को देखते हुए बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए " आलिया, मालिया, जमालिया " जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। लगभग सभी मोर्चों पर विफल बीजेपी सरकार अब लोगों के सवालों का जवाब देने की पोजीशन में नहीं है। इसलिए उसे अब केवल साम्प्रदायिक विभाजन का ही सहारा है। उसका विकास और भृष्टाचार विरोध का नकली प्रभामंडल ध्वस्त हो चूका है। इसलिए अब उसे इस विभाजन की जरूरत पहले किसी भी समय से ज्यादा है। इसलिए उसके हर कार्यक्रम और बयान में साम्प्रदायिक रुझान साफ नजर आता है। अब तो ये इतना स्पष्ट है की दूर विदेशों में बैठे लोगों को भी साफ साफ दिखाई दे रहा है। न्यूयॉर्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट से लेकर दा इण्डिपेंडन्ट जैसे अख़बारों में छपने वाले लेख इसके गवाह हैं।
                     इसलिए लोगों को प्रधानमंत्री और उसकी ही तर्ज पर संसद में दिए गए अरुण जेटली के किन्तु परन्तु वाले बयानों पर भरोसा करने की बजाय साम्प्रदायिक विभाजन के विरोध की अपनी कोशिशों को और  तेज करना चाहिए।

Sunday, July 16, 2017

नोटों की गिनती और उर्जित पटेल का मजाक।

                    जिस दिन उर्जित पटेल ने संसदीय कमेटी के सामने ये कहा की अभी तक RBI को पता नहीं है की कितने नोट बैंको में जमा हुए हैं, और अभी तक नोटों की गिनती चल रही है , तो उनका ये बयान सुनकर मुहल्ले के चबूतरे पर बैठे लोगों का हँस हँस कर बुरा हाल हो गया। पता नहीं संसदीय समिति के सदस्यों का क्या हाल हुआ होगा। उसकी एक झलक तो समिति के सदस्य श्री दिग्विजय सिंह के उस सवाल से मिल सकती है जिसमे उसने श्री उर्जित पटेल से ये पूछा की मई 2019 तक तो RBI बता देगा न की कितना पैसा जमा हुआ है ?
                      उस दिन चबूतरे पर एक भक्त भी बैठा हुआ था और उसकी समझ में नहीं आ रहा था की आखिर इस बात पर लोग हँस क्यों रहे हैं। उसने ये कहा भी की इसमें उर्जित पटेल ने क्या गलत कह दिया , और की वो नोट गिनकर बता देगा। इस पर लोगों को एक बार हँसी का दौरा पड़ गया।
                      आज वो भक्त मेरे पास आया और बोला की उसे पचास हजार रुपयों की जरूरत है और मैं उसे ये रुपया उधार दे दूँ।
                      लेकिन मैं तो घर पर इतना रुपया नहीं रखता। मैंने कहा।
                      कोई बात नहीं , आप मुझे चैक दे दीजिये। आपके बैंक खाते में तो रुपया होगा ही। उसने कहा।
                      मैं आपको चैक नहीं दे सकता। क्योंकि मुझे पता नहीं  है की मेरे खाते में और बैंक में रुपया है की नहीं है। मैंने जवाब दिया।
                     कमाल करते हो भाई साहब, आपके खाते  में जो रुपया होगा वो तो आपकी पास बुक में जमा होगा ? उसने एतराज जताया।
                      लेकिन बैंक में कितना रुपया है और उसमे मेरा कितना है ये तो गिनने के बाद ही पता चलेगा ? मैंने जवाब दिया।
                      आप अजीब आदमी हैं। आपने बैंक में जो रुपया जमा करवाया होगा वो तो बैंक ने गिनकर ही लिया होगा और उसके हिसाब से ही आपके खाते में जमा किया होगा ? उसने फिर नाराजगी दिखाई।
                      भाई साहब, अब तक तो मैं भी यही समझता था। और ये भी समझता था की बैंक जो पैसा RBI में जमा करवाते हैं, RBI उसे गिनकर ही लेती है और उसके हिसाब से ही बैंक के खाते में जमा करती है। लेकिन पिछले आठ महीनो से सरकार और RBI , दोनों कह रहे हैं की उन्हें पता नहीं है की कितना पैसा जमा हुआ है और उसकी गिनती चल रही है। आपने उर्जित पटेल का बयान नहीं सुना ? मुझे लगता है की पहले वो RBI का पैसा गिनेंगे, फिर सभी बैंको का गिनेंगे, फिर उसे खातों से मिलाएंगे और उसके बाद मुझे पता चलेगा की मेरा कितना पैसा है। आप एक काम कीजिये, गिनती पूरी होने के बाद आइये और चैक ले जाइये।

Thursday, March 2, 2017

राष्ट्रवाद पर अरुण जेटली

खबरी -- राष्ट्रवाद पर आज आये अरुण जेटली के बयान पर क्या कहना है ?

गप्पी -- अरुण जेटली ने कहा है की राष्ट्रवाद कोई खराब शब्द नही है, और केवल भारत में ही इसे गलत रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
              इस पर पहली बात तो ये है की पूरी दुनिया के मानवतावादी और जाने माने और प्रगतिशील लोग राष्ट्रवाद के बारे में कोई अच्छी राय नही रखते। इस पर हजारों लेख और टिप्पणियां मौजूद हैं और ये कोई भारत का सवाल नही है।
              दूसरे, इसे जो लोग प्रयोग करते हैं उनकी मंशा पर इसका अर्थ निर्भर करता है। कोई देश आजादी की लड़ाई में अपने देशवासियों को शामिल करने के लिए इसका प्रयोग कर सकता है , तो कोई इसे किसी हमलावर देश के खिलाफ लोगों को एकजुट करने के लिए राष्ट्रवाद शब्द का प्रयोग करता है।
                लेकिन हालात तब बिगड़ते हैं जब लोगों का कोई समूह अपने ही देश के लोगों के दूसरे समूह को गद्दार और देशविरोधी साबित करने के लिए राष्ट्रवाद शब्द का प्रयोग करता है , जैसा की आरएसएस और बीजेपी कर रहे हैं। ये लोग अपने हिसाब से राष्ट्रवाद की परिभाषा तय करते हैं और उसे दूसरों पर थोपते हैं। इस प्रयास में राष्ट्रवाद शब्द न केवल विभाजनकारी भूमिका निभाता है, बल्कि एक समुदाय के खिलाफ अत्याचार और जुल्म का पर्यायवाची बन जाता है। इस तरह के प्रयोग जर्मनी से लेकर अरब तक और अफ्रीका से लेकर भारत तक होते रहे हैं। इसलिए बुद्धिजीवी इसके दुरूपयोग की सम्भावनाओ को ध्यान में रखते हुए इसे बहुत अच्छा नही मानते।
                 लेकिन अरुण जेटली इस बात को जिस मौजूदा विवाद के सन्दर्भ में उठा रहे हैं उसमे क्या वो बताएंगे की क्या आजादी खराब शब्द है जिस पर आरएसएस और बीजेपी इतना हो-हल्ला मचाये हुए है ?

Monday, January 9, 2017

आंकड़ों की कलाबाजी से देश को गुमराह कर रहे हैं अरुण जेटली।

             
  नोटबन्दी के फैसले के बाद सरकार की साँस फूली हुई है। सरकार को अच्छी तरह मालूम है की नोटबन्दी अपने घोषित उद्देश्यों में पूरी तरह फेल हो चुकी है। उल्टा इसके कारण लोगों और अर्थव्यवस्था को जो नुकशान हुआ है वो बहुत बड़ा है। लेकिन चूँकि ये बीजेपी की सरकार है जिसने कभी भी अपनी गलती स्वीकार नही की, चाहे कुछ भी हो जाये। ठीक उसी तरह जैसे भृष्टाचार के किसी भी आरोप की जाँच की मांग को नही मानकर ये रट लगाए रखना की सरकार पर एक भी भृष्टाचार का आरोप नही है।  इसलिए पूरी पार्टी और सरकार, मीडिया का इस्तेमाल करके इस तरह का सन्देश देने की कोशिश कर रही हैं जैसे नोटबन्दी से फायदा हुआ हो। इसके लिए पूरी सरकार को इस काम पर लगा दिया गया है की किसी भी तरह आंकड़ों को तोड़ मरोड़ कर ये सिद्ध किया जाये की नोटबन्दी से फायदा हुआ है।
                 इसी क्रम में वित्तमंत्री अरुण जेटली हररोज आंकड़ों की कलाबाजी से देश को गुमराह करने की कोशिश करते हैं। मीडिया में दाऊद की सम्पत्ति जब्त करने जैसी झूठी खबरें प्लांट की जा रही हैं। अरुण जेटली जिस तरह से अर्थव्यवस्था के आंकड़ों की कलाबाजी कर रहे हैं उसे अगर ठीक तरह से समझ जाये तो वो इस तरह से है।
                 एक आदमी अपने बच्चे को लेकर डॉक्टर के पास गया और कहा की बच्चे की ग्रोथ नही हो रही है। डॉक्टर ने उसे दो महीने में सब कुछ ठीक करने का भरोसा देकर मोटी फ़ीस ऐंठ ली। दो महीने के बाद बच्चे का वजन और कम हो गया। बच्चे के बाप और डॉक्टर का झगड़ा हुआ। लोग जमा हो गए। डॉक्टर कह रहा था की बच्चे का विकास हुआ है और उसका वजन बढ़ गया है। इसके तर्क में डॉक्टर ने लोगों को बताया की बच्चे का वजन पिछली नवम्बर में 8 किलो था जो अब 9 किलो हो गया है, तो बताओ वजन बढा है की नही ? बच्चे का बाप कह रहा है की अक्टूबर में जब मैं बच्चे को डॉक्टर के पास लेकर आया था तब उसका वजन 10 किलो था जो अब घटकर 9 किलो रह गया है।
                  अरुण जेटली ठीक उस डॉक्टर की तरह बात कर रहे हैं। वो नवम्बर के टैक्स और जीडीपी के आंकड़ों की तुलना पिछले साल से कर रहे हैं जबकि असलियत ये है की सितम्बर और अक्टूबर के मुकाबले नवम्बर  दिसम्बर में टैक्स और जीडीपी में कमी आयी है और अर्थव्यवस्था में मंदी साफ दिखाई दे रही है। लेकिन अरुण जेटली इनकी तुलना करना ही नही चाहते।
                   नोटबन्दी के बाद सरकार कोई भी आंकड़ा सार्वजनिक नही करना चाहती। ना तो रिजर्व बैंक के गवर्नर और ना ही वित्त मंत्री, ये बताने को तैयार हैं की कितने नोट वापिस जमा हो गए। और ना ही ये बताने को तैयार हैं की कितना कालाधन पकड़ा गया। इसको छिपाने के लिए इस तरह के बयान दिए जा रहे हैं की इनकम टैक्स, बैंको में जमा हुए 4 लाख करोड़ रुपयों की छानबीन कर रहा है। ताकि लोगों को ऐसा लगे की कुछ तो हाथ लगा है। जबकि असलियत ये है की इनकम टैक्स के नोटिस देने भर से या छानबीन करने से कोई धन काला नही हो जाता। इससे पहले इनकम टैक्स ने जिन लोगों की छानबीन करके जिन लोगों को टैक्स भरने के लिए कहा था, वो सारे केस कोर्ट में पैंडिंग हैं और अब सरकार उसके निपटारे के लिए रोज नई स्कीमो की घोषणा करती है। अगर इनकम टैक्स इतना सक्षम है तो उनकी उगाही क्यों नही कर लेता। और दूसरा इनकम टैक्स अगर किसी के खिलाफ टैक्स चोरी का मामला बनाता भी है और वो कोई देशी विदेशी बड़ी कम्पनी होती है तो सरकार खुद इनकम टैक्स के खिलाफ खड़ी हो जाती है, जैसे वोडाफोन के केस में हुआ।
                  इसलिए आंकड़ों की बाजीगरी से देश को गुमराह करना बन्द कीजिये और सीधे सीधे ये बताइये की नोटबन्दी से पहले महीने, यानि अकटूबर के मुकाबले क्या पोजिशन है।

Sunday, March 20, 2016

व्यंग -- वोट मांगने का नया तरीका, भारत माता के नाम पर दे दे बाबा

                    बीजेपी राष्ट्रिय कार्यकारिणी की मीटिंग के बाद अरुण जेटली ने और कार्यकारिणी के अंदर प्रधानमंत्री ने कहा, और उनके कहने के बाद वेंकैया नायडू ने जो कहा, उसके बाद हालाँकि किसी और के कहने के लिए कुछ ज्यादा बचता नही है लेकिन फिर भी मैंने सोचा की मैं भी कुछ कह दूँ।
                     अरुण जेटली ने कहा की पहले की सरकारें दिशाहीन थी और ये सरकार सही दिशा में है। इसके दो मतलब होते हैं। एक तो ये की ये सरकार एक ही दिशा में है। पहले की सरकारें इसलिए दिशाहीन थी क्योंकि वो कुछ थोड़ा सा काम किसानो के लिए करती थी, थोड़ा सा मजदूरों के लिए करती थी, थोड़ा सा कर्मचारियों के लिए करती थी और बहुत सा उद्योगपतियों के लिए करती थी। इससे दिशा भरम की स्थिति उतपन्न होती थी। अब जो सरकार है वो केवल एक ही दिशा में काम करती है। बाकि लोगों की तरफ उसने देखना बंद कर दिया है ताकि दिशा भरम ना हो।
                      अंदर प्रधानमंत्री ने कहा की हम सकारात्मक हैं। मुझे लगता है श्री श्री के जलसे का असर अब तक बाकि है। विपक्ष देश को पीछे खिंच रहा है। सरकार विपक्ष के सुझाओं पर अम्ल करने को तैयार है। और उसका उदाहरण ये है की आधार बिल पर पुरे दिन राज्य सभा ने विचार करके जो चार संशोधन सुझाये थे उन्हें सरकार ने लोकसभा में पांच ही मिनट में ख़ारिज कर दिया। इससे ज्यादा सकारात्मक सरकार का उदाहरण और क्या हो सकता है। प्रधानमंत्री ने ये भी कहा की सरकार अपने रास्ते पर चलती रहेगी। किसी की नही सुनेगी। जो लोग सरकार के कहे पर भिन्न मत रखते हैं वो देशद्रोही हैं। जो सरकार से समझ में अलगाव रखते हैं वो अलगाववादी हैं।
                       उसके बाद बीजेपी ने और प्रधानमंत्री ने चुनाव के लिए एक नया मंत्र दिया। उसने कहा की अब विकास के नाम पर वोट मांगने का जमाना गया। क्योंकि ऐसी चीजों पर वोट मिलने की उम्मीद अब नही है। इसलिए अब भारत माता के नाम पर वोट मांगिये। ठीक उसी तरह जैसे अल्लाह के नाम पर लोग कुछ भी मांग लेते हैं। या भगवान के नाम पर मांग लेते हैं। अब इस बात की प्रैक्टिस करो, भारत माता के नाम पर देदे , भारत माता के नाम पर दे दे। और इसके लिए जो सबसे सही जगहें हैं जैसे मंदिरों के बाहर, बाबाओं के प्रोग्रामो के बाहर, सतसंगों के कार्यक्रमों के बाहर। वहां अपनी चटाई बिछा लीजिये और भारत माता के नाम पर मांगिये। इसके लिए ये जरूरी है की इस तरह के कार्यक्रम होते रहने चाहियें। अगर नही होते हैं तो सरकार से अनुदान दे कर करवाइये। किसी भी नाम पर करवाइये लेकिन करवाइये जरूर ताकि अपनी कुछ चटाइयां उसके बाहर बिछाई जा सकें।
                     उसके बाद माननीय वेंकैया नायडू जी आये। उन्होंने कहा की मोदीजी देश को भगवान का तोहफा है। राजनीती में चाटुकारिता और बेशर्मी का नया अध्याय शुरू हो चूका है। अब व्यक्ति पूजा को लोकतंत्र का नया आयाम साबित किया जायेगा। पहले भी बरुआ ने कोशिश की थी इंदिरा जी के नाम पर। अब उसका नया संस्करण लाये हैं श्रीमान नायडू जी। वैसे ये भी हो सकता है की भारत माता के नाम पर वोट मांगने वालों को चटाइयों पर सिंदूर लगा कर रखने के लिए कोई मूर्ती चाहिए होगी। इसलिए उस मूर्ती की तैयारी हो रही है। भक्तो एक नया नजारा पेश होने वाला है। लोग मंदिरों के बाहर एक फोटो पर सिंदूर लगा कर आवाज लगाएंगे की भारत माता के नाम पर दे दे बाबा।

Sunday, March 6, 2016

आरएसएस और बीजेपी के देशविरोधी षड्यंत्र

            
  आम लोग कई चीजों पर एकदम निर्णायक नतीजे पर नही पहुंच सकते और इस पर पहुंचने के लिए वो मीडिया द्वारा फैलाई गयी अफवाहों के शिकार हो जाते हैं। पिछले दो साल में जब से ये सरकार सत्ता में आई है इस पर आरएसएस का एजेंडा लागु करने के आरोप लगते रहे हैं। इस दौरान कुछ बड़ी घटनाएँ भी हुई हैं जिनके बारे में भी एक पक्ष का आरोप है की वो कोई अकस्मात घटी हुई घटनाएँ नही हैं, बल्कि एक सोची समझी साजिश के तहत बाकायदा प्लान करके की गयी वारदातें हैं। इन घटनाओं की प्लानिंग का आरोप बीजेपी और आरएसएस के लोगों पर है और मीडिया के एक हिस्से की इसमें साझेदारी है। बीजेपी हमेशा इससे इंकार तो करती रही है लेकिन उसने उन सवालों का जवाब कभी नही दिया जो उस पर उठाये गए। इन घटनाओं में से कुछ का विश्लेषण इस प्रकार है। --
 १.       बिहार चुनाव से पहले दादरी की घटना हुई। इसमें गाय मारने के आरोप में एक व्यक्ति अख़लाक़ की हत्या कर दी गयी। इस घटना में मुख्य आरोपी बीजेपी नेता के पुत्र निकले। असल बात ये है की जिस गाय को मारने के आरोप में भीड़ को भड़का कर ये घटना अंजाम दी गयी वो गाय मरने जैसी कोई घटना वहां हुई ही नही थी। एक झूठी कहानी गढ़कर एक समुदाय के खिलाफ भावनाएं भड़काई  गयी। फिर उसके बाद क्या हुआ ? बीजेपी और आरएसएस के सारे नेता पूरी बहस को इस मुद्दे पर ले आये की गाय को मारना सही है या गलत। पूरी बहस उस चीज पर हो रही थी जो असल में घटनास्थल पर मौजूद ही नही थी। मीडिया का एक हिस्सा पुरे जोर शोर से इसका प्रचार कर रहा था। सोशल मीडिआ में बैठे भाड़े के लोग इसे हवा दे रहे थे। और बीजेपी के सबसे बड़े नेता इस पर चुप्पी साधे  हुए थे यानि उनका मौन समर्थन इस पूरी मुहीम को हासिल था।
२.         अब JNU की घटना को देखिये। छात्रों का एक समूह एक प्रोग्राम का आयोजन करता है जिसका कोई संबंध ना वहां की चुनी हुई स्टूडेंट यूनियन से था  और ना  उसके वामपंथी अध्यक्ष से था। बीजेपी का छात्र संगठन ABVP उस प्रोग्राम से ठीक 15 मिनट पहले वाइस चांसलर से मिलकर उसकी अनुमति रद्द करवा देता है। ABVP के नेता पहले से ही इसकी तैयारी के तहत एक बदनाम न्यूज चैनल के लोगों को वहां बिना अनुमति के बुला कर रखते हैं। उसके बाद प्रोग्राम करने वाले छात्रों और ABVP के सदस्यों में झगड़ा होता है। छात्रसंघ अध्यक्ष उसमे बीच बचाव की कोशिश करता है। इतने में मुंह पर कपड़ा बांधे हुए कुछ लोग देश विरोधी नारे लगाते हैं और निकल भी जाते हैं। बात खत्म हो जाती है। उसके बाद पूरी घटना के विडिओ को छेड़छाड़ करके उसमे बाहर से नारे डाले  जाते हैं। इस काम का आरोप HRD मंत्री स्मृति ईरानी की सहयोगी शिल्पी तिवारी पर आता है। उसके बाद वही न्यूज चैनल उस बदले गए विडिओ को पूरा दिन टीवी पर दिखाता है और पूरी JNU को देशद्रोह के अड्डे में तब्दील कर देता है। उसके बाद बीजेपी के सांसद महेश गिरी देशद्रोह का मामला दर्ज करवाते हैं और पुलिस सरकार के इशारे पर छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लेते हैं। उसके बाद पूरी बीजेपी और आरएसएस लगातार वामपंथ पर देशद्रोह में शामिल होने का राग अलापते हैं। इसके बाद जो चीजें सामने आई वो इस प्रकार हैं।
                १. मीडिया के कुछ चैनलों द्वारा दिखाए गए विडिओ फर्जी थे।
                २. कन्हैया ने इस तरह का कोई नारा नही लगाया इसका कोई विडिओ सबूत पुलिस के पास नही    है।
                ३. मुंह ढंककर नारे लगाने वाला एक भी आदमी पकड़ा नही गया। और शायद ही कभी पकड़ा जाये।
         लेकिन हो क्या रहा है। इस पूरी घटना को इस तरह पेश किया जा रहा है जैसे बीजेपी को छोड़कर सभी विपक्षी पार्टियां, चाहे वो कांग्रेस हो, वामपंथी हों या जनता दल हो सब देशद्रोही हैं। अभी अभी बीजेपी के नेता अरुण झुठली ने भारतीय जनता युवा मोर्चा के कार्यक्रम में कहा की कन्हैया भारत के टुकड़े करने के नारे लगा रहे थे और दूसरी तरफ इनकी पुलिस अदालत में कह रही है की उसके पास कोई इसकी कोई विडिओ फुटेज नही है। ये व्ही अरुण झुठली हैं जो दिल्ली चुनाव में एक हाथ में माइक पकड़कर कह रहे थे की आम आदमी पार्टी रंगे हाथ पकड़ी गयी और दूसरे हाथ से उच्च न्यायालय के उस एफिडेविट पर साइन कर रहे थे जिसमे लिखा था की आम आदमी पार्टी के खातों में कोई गड़बड़ी नही पाई गयी।
               अब दूसरा सवाल ये उठता है की क्या ये कोई अलग अलग घटी हुई आकस्मिक घटनाएँ हैं। नही ये बाकायदा एक विचारधारा के आधार पर देश में एक साम्प्रदायिक विभाजन पैदा करने और उसे बनाये रखने की सोची समझी रणनीति है। इस रणनीति में मीडिया का एक हिस्सा जिसके मालिक बीजेपी के नजदीकी उद्योगपति हैं उसकी मदद करता है। इसमें सोशल मीडिया में बैठा एक भाड़े का तबका और कुछ लम्पट किस्म के लोग योगदान करते रहते हैं। देश में ऐसे लोग जिनकी सोचने और समझने की शक्ति कमजोर है वो इस बहाव में बह जाते हैं।

Thursday, December 24, 2015

Vyang -- हाँ, कीर्ति आजाद के खिलाफ कार्यवाही जरूरी थी।

                जैसे ही कीर्ति आजाद को सस्पेंड करने की खबर आई, मेरे पड़ोसी मेरे यहां आ धमके। उनका लहजा और चेहरा ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कीर्ति आजाद को मैंने सस्पेंड किया हो। मैंने मौके  नजाकत को समझते हुए उन्हें सोफे पर बैठाया और खुद लाकर पानी पिलाया। उसके बाद उनके लिए चाय बनाने को आवाज लगाई और फिर सहमते हुए उनसे इस आवेश का कारण पूछा। वो फट पड़े। अब कीर्ति आजाद को सस्पेंड करने की क्या जरूरत थी ? उसने क्या किया है ?
                मैंने उसके सस्पेंसन की जिम्मेदारी लेने से बचते हुए कहा की अमित शाह ने कहा है की वो पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल थे।
                वो भृष्टाचार के खिलाफ बोल रहे थे। क्या भृष्टाचार पार्टी है ? पड़ोसी ने सोफे से उठने की कोशिश की।
                मैंने उन्हें वापिस बिठाते हुए कहा -- लेकिन अरुण जेटली का नाम आ रहा था।
                क्या अरुण जेटली पार्टी है ? पड़ोसी ने फिर उठने की कोशिश की।
                लेकिन पार्टी के नेता तो हैं।  मैंने उन्हें फिर बिठाया।
               नेता तो कीर्ति आजाद भी हैं।  इस बार उसने बैठे बैठे कहा।
                 लेकिन विपक्षी पार्टियां उनके बयानों का फायदा उठा रही थी। मैंने पास में बैठते हुए कहा।
                विपक्ष तो शत्रुघन सिन्हा के बयानों का भी फायदा उठाता है ?
                उनको भी निकालेंगे।  मैंने कहा।
               और आडवाणी जी ? पड़ोसी ने व्यंग से मुस्कुराते हुए कहा।
                वो तो निकाले जैसे ही हैं।  मैंने सफाई दी।
ओह। तो ये बात है। वैसे तुम ये बताओ की कीर्ति आजाद को धमका कर तुम क्या हासिल करना चाहते हो ? मेरे पड़ोसी मुझसे ऐसे सवाल कर रहे थे जैसे मैं अमित शाह हों।
                देखिये कोईआदमी आज दिल्ली क्रिकेट एसोसिएशन को लेकर अरुण जेटली पर आरोप लगा रहा है, कल वो गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन को लेकर नरेंद्र मोदी या अमित शाह पर आरोप लगाएगा। फिर हिमाचल में अनुराग ठाकुर ने जो क्रिकेट स्टेडियम की जमीन पर होटल बनाया है उसको दुबारा उठाएगा। इस तरह तो पार्टी चल ली। इसलिए पार्टी के हित में इस पर कार्यवाही जरूरी थी। मैंने अपनी तरफ से जवाब देने की पूरी कोशिश की।
                 ये क्रिकेट एसोसिएशन कब से पार्टी हो गयी ? और तुम तो भृष्टाचार से लड़ने की बात करते थे ?
                 भृष्टाचार से तो अब भी लड़ ही रहे हैं। सीबीआई को सख्त आदेश हैं की किसी भी विपक्षी नेता के खिलाफ कुछ भी मिलता है तो खोद कर निकालो। लेकिन अपने लोगों के खिलाफ क्यों लड़ रहे हो।
                अब तो तुम्हारे मार्गदर्शक मंडल ने भी कह दिया है की घोटालों की आवाज उठाने वालों की बजाए उनके उठाये मामलों की जाँच कराओ। --पड़ोसी ने कहा।
                 मैंने फिर प्रवक्ता की मुद्रा अपनायी , " देखिये ये जो बुजुर्ग होते हैं इनकी यही तकलीफ होती है। ये चाहे घर में हों या पार्टी में, हर रोज बिना मांगे सलाह देते रहते हैं। हम तो मार्गदर्शक मंडल का नाम मूक दर्शक मंडल रखना चाहते थे लेकिन मीडिया ने फंसा दिया। अब तो ये इतना ज्यादा बोलते हैं की इनको राज्य पाल बनाने में भी डर लगता है। "                 

 

Monday, November 30, 2015

राज्य सभा के अधिकारों में कटौती पर बहस और सीधे चुनाव का संदर्भ

पिछले कुछ समय से राज्य सभा के अधिकारों पर बहस शुरू हो गयी है। ये बहस नई चुन कर आई हुई सरकार द्वारा बहुमत ना होने के चलते राज्य सभा से अपने संविधान संशोधन बिल पास ना करवा सकने के चलते शुरू हुई है। वित्त मंत्री ने भूमि बिल और GST बिल के राज्य सभा में अटक जाने के कारण बयान देते हुए कहा की बिना चुने हुए लोग, चुने हुए लोगों के काम को अटका रहे हैं और ये लोकतंत्र के लिए सही नही है। उसके बाद कई लोगों ने इस पर अपनी बात कहि है। इसमें अभी-अभी ताजा उदाहरण बीजू जनता दल के सांसद जय पांडा के इस संदर्भ में ताजा लिखे लेख का है जिसमे उसने भी लगभग अरुण जेटली की राय का लगभग समर्थन किया है। इस पूरी पृष्ठ भूमि में इस सवाल की एक विस्तृत छानबीन की जरूरत है।
संविधान की व्यवस्था --
                                       संविधान में राज्य सभा को कुछ मामलों में लोकसभा के बराबर के अधिकार के अधिकार दिए गए हैं और कुछ मामलों में लोकसभा को अबाधित अधिकार दिए गए हैं। बजट को पास करवाने के लिए और किसी भी प्रकार के मनी बिल के संदर्भ में किसी भी बिल को राज्य सभा में पास करवाने की कोई जरूरत नही है। इस मामले में लोकसभा को पूर्ण रूप से अकेले ही अधिकृत किया गया है। लेकिन हमारे संविधान के संघीय ढांचे को देखते हुए संविधान संशोधन के मामले में और दूसरे मामलों में राज्य सभा को वो सभी अधिकार हासिल हैं जो लोकसभा को हासिल हैं। राज्य सभा राज्यों द्वारा चुने गए सदस्यों  सदन है और लगभग राज्यों की काउन्सिल की तरह काम करती है। इसलिए संविधान के  संघीय ढांचे को बनाये रखने के लिए उसे ये अधिकार दिए गए हैं। राज्य सभा के लोग कोई बिना चुनाव के आये हुए या नामित किये हुए नही हैं। फर्क केवल इतना है की ये लोग लोकसभा सदस्यों की तरह सीधे चुन कर आने की बजाए राज्य विधान सभाओं में लोगों द्वारा चुने गए, लोगों द्वारा चुने गए हैं।
सीधे चुनाव का सवाल -
                                       ये बात की राज्य सभा के सदस्य लोगों का सीधा प्रतिनिधित्व नही करते, सीधे रूप में सही होने के बावजूद दूसरे रूप में सही नही है। राज्य सभा के सदस्य विधान सभाओं के जिन सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं वो सदस्य भी लोगों द्वारा सीधे चुने जाते हैं। लेकिन राज्य सभा का चुनाव लोकसभा द्वारा एकसाथ नही होता है बल्कि हर दो साल बाद इसके एक तिहाई सदस्यों का चुनाव होता है। इसलिए अगर इन दो सालों  में किसी विधान सभा के चुनाव हुए हों ओर उसमे पार्टियों की स्थिति में बदलाव आया हो तो उसका सीधा असर इस चुनाव पर पड़ता है और नए सदस्यों के हिसाब से लोग चुने जाते हैं। लोकसभा के चुनाव में एक साथ सभी सदस्य सीधे लोगों द्वारा चुने जाते हैं इसलिए उसे सीधा लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाला सदन माना जाता है। इसलिए ये मांग उठाई जा रही है की उसे अबाधित अधिकार दिए जाएँ। लेकिन इसमें इस बात का खतरा भी रहता है की लोकसभा चुनाव में लोग किसी तात्कालिक घटना, सहानुभूति के आधार और किसी लहर के चलते भी चुन कर आ सकते हैं। और इस तरह चुन कर आये हुए लोग जल्दबाजी में संविधान में कोई ऐसा परिवर्तन या संशोधन कर सकते हैं जिसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। संविधान निर्माताओं के ध्यान में ये बात भी रही होगी और इसीलिए उन्होंने कानून बनाने और संविधान संशोधन करने जैसे मामलों में राज्य सभा को भी बराबर के अधिकार दिए ताकि इस तरह की चीजों को रोका जा सके।
लोकसभा और लोक-प्रतिनिधित्व ----
                                                            हमारे देश में लोकसभा का चुनाव जिस तरीके से होता है उसमे ये कतई जरूरी नही है की लोकसभा के चुने हुए सदस्य लोगों के बहुमत का प्रतिनिधित्व करते हों। हमारी चुनाव प्रणाली के अनुसार तो 25 % वोट लेने वाली पार्टी भी लोकसभा में बहुमत प्राप्त कर सकती है। उसके आलावा कोई ऐसी पार्टी भी सरकार में पहुंच सकती है जो देश के किसी एक क्षेत्र जैसे उत्तर या दक्षिण में ही प्रभाव रखती हो। इस हालात में केवल लोकसभा को सारी शक्तियां देना देश के संघीय ढांचे और बहुमत की राय के खिलाफ जा सकती हैं। इसलिए ऐसे मामलों में दोनों सदनों को समान अधिकार एक दूरदर्शी फैसला था।
लोकमहत्त्व के काम और राज्य सभा ---
                                                               दूसरा सवाल ये है की क्या राज्य सभा सचमुच में लोक महत्त्व के बिलों को रोकने का साधन बन गयी है ? अभी जो पार्टी सत्ता में है वो अपना प्रो-कॉर्पोरेट एजेंडा लागू करने की जल्दबाजी में है। इसलिए वो कुछ ऐसे संशोधन करना चाहती है जिन पर देश में गंभीर बहस है और देश का एक बड़ा वर्ग उनका विरोध कर रहा है। राज्य सभा पहले भी संविधान संशोधनों को मंजूरी देती रही है और ऐसा नही है की उसने सभी बिलों रोक कर रक्खा हुआ है। लेकिन अपने एजेंडे को लागु ना कर पाने की खीज में सरकार की तरफ से ऐसे बयान आ रहे हैं। इसलिए संविधान निर्माताओं की समझ और राज्य सभा को मिले अधिकारों के महत्त्व को परोक्ष या अपरोक्ष चुनाव के नाम पर कम नही किया जाना चाहिए।

Monday, October 19, 2015

OPINION -- उच्चत्तम न्यायालय के फैसले पर उठे सवालों का जवाब

NJAC  पर माननीय उच्चत्तम न्यायालय का फैसला आने के बाद सरकार के कुछ मंत्रियों और दूसरे लोगों की नकारात्मक प्रतिक्रियाएं आई हैं। इसमें अरुण जेटली ने चुने हुए लोगों के फैसले को गैर चुने हुए लोगों द्वारा बदले जाने और फैसले को कुतर्क पर आधारित बताया था। जिस पर बहुत से लोगों ने अरुण जेटली से नाराजगी भी जताई थी। किसी भी कानून के निर्माण को न्यायायिक छानबीन के तहत माना गया है और संविधान में इसका प्रावधान है। पहले भी बहुत से कानूनो को न्यायालयों ने रद्द किया है। जब कोई कानून बनता है तो ये तो स्वयं सिद्ध है की वो बहुमत का प्रतिनिधित्त्व करता है, फिर ये बहुमत कितना है या फिर सर्वसम्मत है इससे न्यायालय द्वारा छानबीन के संविधान प्रदत्त अधिकार पर क्या फर्क पड़ता है। न्यायालय जब किसी कानून की छानबीन करता है तो इस आधार पर करता है की वो कानून संविधान के बेसिक ढांचे या अधिकारों का उललंघन तो नही करता। उसमे इस बात का कोई लेना देना नही होता की उसको कितने बहुमत ने पास किया है। अरुण जेटली पहले भी " चुने हुए लोगों " का सवाल राज्य सभा के संदर्भ में उठा चुके हैं। और ये भी एक विडंबना है की खुद अरुण जेटली चुनाव हारे हुए हैं और राज कर रहे हैं। उन्हें शपथ लेते वक्त इस बात का बिलकुल ख्याल नही आया की लोकसभा चुनाव में लोगों ने उन्हें रिजेक्ट किया है।
             इस सवाल पर THE HINDU में उच्चत्तम न्यायालय के रिटायर्ड मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर एम लोढ़ा ने एक लेख में इन सब सवालों के जवाब हैं। इसे इस लिंक से देखा जा सकता है --http://www.thehindu.com/opinion/lead/njac-constitutions-will-upheld/article7781047.ece?homepage=true

Thursday, October 15, 2015

Economy -- रिवर्स रेपो रेट ( Reverse Repo Rate ) कम करे रिजर्व बैंक ( RBI )

अर्थ व्यवस्था में तेजी  लाने के लिए ब्याज दरों में कमी की मांग लगातार उठती रही है। रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन के साथ तो इस मुद्दे पर वित्त मंत्री के मतभेद मीडिया में भी चर्चा का विषय रहे हैं। रिज़र्व बैंक महंगाई सहित कई चीजों को ध्यान में रखकर अपनी नीति की घोषणा करता है। देश के हालात की समीक्षा और उसके नतीजों पर अलग अलग विचार हो सकते हैं। परन्तु हमारे देश में ऊँची ब्याज दरों को अर्थ व्यवस्था में तेजी ना आने के लिए जिम्मेदार माना गया। इस पर वित्त मंत्री और दूसरे उद्योगपतियों के साथ साथ वित्त विशेषज्ञ भी अपना एतराज जताते रहे हैं। लेकिन मूल सवाल ये है की अर्थ व्यवस्था की तेजी का मामला केवल रिजर्व बैंक द्वारा रेट कम करने तक है या बैंकों द्वारा ब्याज दरों को कम करके आम उपभोक्ता तक पंहुचाने से जुड़ा है। अब तक रिजर्व बैंक 1. 25 % की दर कम कर चूका है लेकिन बैंकों ने केवल 50 -60 पैसे कम किये हैं। हैरत की बात है की जो वित्त मंत्री रिजर्व बैंक की रेट ना घटाने को लेकर सार्वजनिक आलोचना करते रहे हैं उन्होंने बैंको के रेट कम ना करने को लेकर एक शब्द नही बोला। दूसरे उद्योगपति और विशेषज्ञ भी इस पर आश्चर्य जनक रूप से चुप्पी साधे हुए हैं। आखिर ये खेल क्या है ?
                   खेल ये है की अब तक रिजर्व बैंक ने जिस रेट को कम करने की घोषणा की है उसका एक बड़ा हिस्सा बैंकों ने अपने मुनाफे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल कर लिया। एक तरफ उन्होंने लोन की दरें कम नही की , दूसरी तरफ उन्होंने लोगों द्वारा जमा करवाये जाने वाले डिपॉजिट पर ब्याज कम कर दिया। इससे लोन लेने वाले लोगों, या पहले से लोन ले चुके लोगों को तो कोई लाभ हुआ नही उल्टा बैंक में पैसा रखकर ब्याज पर गुजारा करने वाले रिटायर लोगों के लिए जरूर मुश्किलें खड़ी हो गयी। इस सारे खेल में किसी को अगर कोई फायदा हुआ तो वो बैंक ही हैं जिनके मुनाफे बिना कुछ किये बढ़ गए। आश्चर्य है की वित्त मंत्रीजी को अब अर्थ व्यवस्था पर उसके कुप्रभाव नजर नही आये। उद्योग पतिओं के मुनाफे पर आँख मूंदने वाली सरकार से और क्या उम्मीद की जा सकती है।
                     इस सारी व्यवस्था पर रिजर्व बैंक के गवर्नर जरूर अपनी नाराजगी व्यक्त करते रहे हैं। उन्होंने बैंको को ब्याज कम करने की हिदायत भी दी। लेकिन इस तरह की हिदायतों को हमेशा की तरह बैंकिंग सेक्टर ने नजरअंदाज कर दिया। इसलिए बैंको को ब्याज दर घटाने के लिए मजबूर करने के लिए और ग्राहकों तक इसका लाभ पंहुचाने के लिए रिजर्व बैंक को चाहिए की वो रिवर्स रेपो रेट में 1 % की कमी करे। पहले रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट में दो प्रतिशत का अंतर होता था जिसे कम करते करते एक प्रतिशत पर ले आया गया। ये वो दर होती है जिसके अनुसार बैंको को अपना अतिरिक्त पैसा रिजर्व बैंक में पार्क करने पर रिजर्व बैंक उन्हें ब्याज के रूप में देती है। अगर ये दर अपेक्षाकृत रूप से कम होगी तो बैंक अपना पैसा रिजर्व बैंक में पार्क करने की बजाए थोड़ा कम ब्याज पर बाजार में लोन के रूप में देंगे। अगर सरकार और रिजर्व बैंक सचमुच ब्याज दरों में कमी लाना चाहती है और उपभोक्ताओं तक उसका लाभ पंहुचना चाहती है तो उसे तुरंत ये फैसला ले लेना चाहिए।

Wednesday, September 30, 2015

RBI द्वारा ब्याज दर में कमी और विकास के दावे


 RBI ने ब्याज दरों में 50 पैसे की कटौती कर ही दी। कई दिनों से सरकार और खासकर वित्त मंत्री अरुण जेटली रिजर्व बैंक के प्रति अपनी नाराजगी व्यक्त कर रहे थे। इस नाराजगी में सरकार ऐसा आभास दे रही थी जैसे इस देश का विकास रिजर्व बैंक ने रोक हुआ हो। ब्याज दरों में कमी से मांग में बढ़ौतरी होती है ये बात तो सही है लेकिन रिजर्व बैंक द्वारा की गयी कमी का उपयोग किस चीज के लिए होता है सब कुछ इस पर निर्भर करता है।
                    रिजर्व बैंक अब तक एक रूपये पच्चीस पैसे की कटौती कर चूका है लेकिन बैंकों ने मुस्किल से पचास पैसे घटाए हैं। RBI के गवर्नर रघुराम राजन इस पर आपत्ति भी प्रकट कर चुके हैं। इस बार की कटौती के बाद भी एकाध बैंक ने बीस पैसे की कटौती की घोषणा की है। केंद्रीय बैंक की दरों में कटौती का प्रयोग बैंको ने अपने मुनाफे बढ़ाने के लिए कर लिया। जब तक बैंक आम उपभोक्ता तक ब्याज दरों में कटौती का लाभ नही पहुंचाएंगे उससे मार्किट में तेजी कैसे आएगी। लेकिन हमारे वित्त मंत्री जो बार बार गवर्नर से अपनी नाराजगी प्रकट करते रहे हैं, उन्होंने बैंकों के लिए एक शब्द नही बोला। हमारे बैंकों की और पुरे प्राइवेट सैक्टर की हालत ये है की वो किसी की नही सुनता। और सरकार की इच्छा भी उससे कुछ कहने की नही है। अब तक पॉलिसी के रूप में जो भी निर्णय लिए गए हैं वो सभी निजी सैक्टर ने अपने मुनाफे के लिए उपयोग कर लिए हैं।
                    बैंक जैसे ही ब्याज दर में कमी होती है डिपॉज़िट पर ब्याज दर घटा देते हैं। इससे पेंशन और जमापूंजी के ब्याज पर गुजर करने वाले लोगों के लिए मुश्किल खड़ी हो जाती है। दूसरी तरफ बैंक लोन की ब्याज दरों में कोई कटौती नही करते हैं या नाम मात्र की कमी करते हैं जिससे मांग पर कोई असर नही पड़ता है। इसके लिए बैंक गुंजाइश ना होने का बहाना बनाते हैं। इस गुंजाइश ना होने का सबसे बड़ा कारण ये है की निजी क्षेत्र इन बैंको का लाखों करोड़ रुपया खाकर बैठ गया है। हर साल NPA का स्तर बढ़ता जाता है। बैंक हर साल निजी क्षेत्र का लाखों करोड़ रुपया माफ़ कर देते हैं जिससे उनके मुनाफे और बैलेंस सीट पर असर पड़ता है। और इस सारी स्थिति का बिझ वो आम आदमी पर डाल देते हैं चाहे वो बैंक में जमा कराने वाला हो या लोन लेने वाला हो। इस लालची और जन विरोधी तरीके को जब तक बदला नही जायेगा उसका मार्किट पर कोई असर पड़ने वाला नही है। और सरकार इस बारे में कुछ बोलती नही है या उसका समर्थन इनके साथ है।
                    दूसरा सवाल ब्याज दरों में कटौती का विदेशी पूंजी पर पड़ने वाला असर है। मार्किट के विशेषज्ञ ये मानते हैं की पिछले दिनों में विदेशों से भारत के DEBT में निवेश के बढ़ते आंकड़े का मुख्य कारण हमारे यहां की ऊँची ब्याज दरें हैं। जैसे ही रिजर्व बैंक ब्याज दरों में कटौती करता है हमारे यहां से वो निवेश वापिस जाने की प्रकिर्या शुरू हो जाती है। इससे रूपये की कीमत गिरती है और हमारे आयत और महंगे हो जाते हैं। हमारा देश कच्चे मॉल का और पट्रोलियम पदार्थों का मुख्य आयात करता है। इनके महंगे होने से हमारा तैयार माल दूसरे देशों के मुकाबले महंगा हो जाता है और निर्यात और कम हो जाते हैं। इसलिए ये जरूरी नही है की ब्याज दरों में कटौती का लाभ ही हो।
                     अगर सरकार ब्याज दरों में कटौती को मांग बढ़ने के सायकिल के साथ जोड़ना चाहती है तो उसे ये सुनिश्चित करना होगा की ब्याज दरों में कटौती का लाभ निचे मार्किट तक पहुंचे और इसका इस्तेमाल बैंक अपने मुनाफे बढ़ाने के लिए ना करें। वरना ये सारी कवायद बेकार हो जाएगी।

Monday, September 21, 2015

Vyang -- अगर ऐसा ना होता तो ?

देखिये सब कुछ होने पर ही निर्भर है। और जैसा हुआ है वैसा ही होने पर निर्भर है। बातचीत में बहुत लोग सवाल उठाते हैं की अगर ऐसा ना होता तो ? राजनेता तो इसे काल्पनिक सवाल कहकर ख़ारिज कर देते हैं। लेकिन हमने सोचा की अगर कुछ चीजें नही हुई होती तो क्या होता ? इस पर विचार करने पर हमने पाया की अगर ऐसा ना होता तो कैसा होता ? जैसे ----
            अगर बिहार चुनाव सामने नही होता तो मोहन भागवत के आरक्षण वाले बयान पर बीजेपी की क्या पर्तिक्रिया होती ? तो हमने पाया की कुछ ऐसी होती। 
   बीजेपी प्रवक्ता रविशंकर प्रशाद , " मोहन भागवत  जी ने बिलकुल वाजिब सवाल उठाया है। और ये सवाल देश की सारी जनता उठा रही है। उन्होंने ये कहा है की जब 65 साल से आरक्षण लागु होने के पश्चात भी उसका फायदा नही हो रहा है तो उसे खत्म कर दिया जाना चाहिए। लेकिन विपक्ष बहस से भाग क्यों रहा है ? हमारा मानना है की अब समय आ गया है की आरक्षण पर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए। "
            इसी तरह मान लो पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी नितीश से अलग नही हुए होते तो बीजेपी क्या कहती ?
           बीजेपी प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन , " नितीश को बिहार की जनता को इस बात का जवाब देना पड़ेगा की उन्होंने बिहार की जनता के सिर पर दो साल एक अक्षम आदमी को मुख्यमंत्री के तौर पर बैठा कर रक्खा। जो आदमी खुलेआम रिश्वत लेने की बात कबूल करता है और जिसने बिहार को गड्डे में धकेल दिया है उसके जिम्मेदार खुद नीतीश कुमार हैं और अब बिहार की जनता उन्हें इस बात का जवाब देगी। "
           और मान लो अगर नीतीश बीजेपी से अलग ही नही हुए होते तो बीजेपी क्या कहती ?
          बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा , " पिछले दस साल में माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी के नेतृत्व में हमने बिहार को बदहाली और पिछड़ेपन की दलदल से निकाल कर देश के सबसे ज्यादा तेजी से विकास करने वाले राज्यों में शामिल कर दिया है। पिछले दस साल में बिहार में विकास की जो गंगा बही है वो अन्धो को भी दिखाई दे सकती है और इस चुनाव में बिहार की जनता एक बार फिर माननीय नीतीश कुमार के नेतृत्व पर विश्वास जाहिर करेगी। "
              इसी तरह अगर केंद्र में UPA की सरकार होती और बीजेपी विपक्ष में होती तो GST बिल पर क्या कहती ?
           बीजेपी प्रवक्ता अरुण जेटली , " GST पर राज्यों को कुछ गंभीर चिंताएं हैं। और जब तक केंद्र सरकार राज्यों की चिंताओं का समाधान नही करती तब तक GST का समर्थन करना हमारे लिए मुश्किल होगा। और सरकार को इस पर जोर जबरदस्ती के बजाय विपक्ष को विश्वास में लेकर आगे बढ़ना चाहिए। केवल बहुमत के सहारे कानून पास करना लोकतंत्र के खिलाफ होता है। "
             मान लीजिये बीजेपी विपक्ष में होती और महंगाई के सवाल पर क्या बोलती ?
           बीजेपी प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी , " देश की जनता का महंगाई से बुरा हाल है। प्याज 100 रूपये किलो और दालें 150 रूपये किलो बिक रही हैं और सरकार महंगाई घटने के आंकड़े पेश कर रही है। सरकार को समझना चाहिए की आंकड़ों से लोगों का पेट नही भरता। "
              इसी तरह की और भी बहुत सी बातें हैं जो अगर नही हुई होती तो क्या होता ? हमने केवल कुछ ही चीजों की कल्पना की है।

Sunday, July 26, 2015

Vyang -- लो बदल दिया नाम, सारे मसले हल

खबरी -- सुना है मध्यप्रदेश सरकार ने व्यापम का नाम बदल दिया ?

गप्पी -- ये बहुत अच्छा किया। बहुत बदनामी हो रही थी। वैसे तो शैक्सपीयर ने कहा था की नाम में क्या रक्खा है। परन्तु अब समय बदल गया है। अब नाम में बहुत कुछ रक्खा है। कुछ नाम दूसरी चीजों के पर्याय हो जाते हैं। जैसे कोलगेट टूथपेस्ट का पर्याय हो गया। डालडा वनस्पति घी का पर्याय हो गया। लोग नाम किसी चीज का लेते हैं और मगज में छवि किसी दूसरी चीज की होती है। जैसे बोफोर्स का नाम आते ही घोटाला याद आने लगता था। उसी तरह व्यापम की हालत हो गयी थी। व्यापम का नाम आते ही श्मशान याद आने लगता था। रात को कोई व्यापम का जिक्र कर देता तो डर के मारे रोंगटे खड़े हो जाते थे। दहशत होने लगती थी। 

                  नाम बदलने के पीछे सरकार की दूसरी मजबूरियां भी रही होंगी। जहां व्यापम का दफ्तर है उस सड़क से लोगों ने डर के मारे आना जाना बंद कर दिया होगा। और एक सड़क बेकार हो गयी होगी। दूसरा जब कोई नई नौकरी या दाखिला निकलता होगा तो बहुत से बच्चे डर के मारे फार्म ही नही भरते होंगे। घर में छोटी मोटी  कहासुनी होने पर संतान व्यापम का फार्म भर देने की धमकी देती होगी। व्यापम का नाम आते ही पता नही किस किस का चेहरा आँखों के आगे घूम जाता होगा। मुझे तो लगता है की कर्मचारियों ने व्यापम में काम करने से इंकार कर दिया होगा परन्तु सरकार ये बात दबा गयी होगी। सो उसने इस मसले का हल निकाल दिया। उसने व्यापम का नाम बदल दिया। अब अगर कोई संसद में या बाहर व्यापम घोटाले का मामला उठाएगा तो बीजेपी और शिवराज सिंह कह सकते हैं, ' कौनसा व्यापम ? हमारे यहां तो कोई व्यापम है नही। आपके यहां है क्या। " सामने वाला चुप हो जायेगा। 

                     दूसरा राजनीती में नाम बदलने का उतना ही महत्त्व है जितना पार्टी बदलने का। महाराष्ट्र के चुनाओं में बीजेपी ने एनसीपी का नाम बदल कर नैशनल करप्ट पार्टी रख दिया। चुनाव खत्म हो गए। कुछ सीटें कम पड़ी तो शिवसेना ने आँख दिखानी शुरू कर दी। शरद पवार ने समर्थन की पेशकश की तो मोदीजी ने एनसीपी का नाम बदल कर " नैशनल कॉपरेटिव पार्टी " कर दिया। उसी तरह जम्मू-कश्मीर के चुनाव में बीजेपी ने पीडीपी का नाम बदल कर " बाप-बेटी कश्मीर लूटो पार्टी " रख दिया। लोगों ने फिर धोखा दे दिया। बीजेपी ने पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बना ली और पीडीपी का नाम बदल कर " कश्मीर विकास पार्टी "  रख दिया। 

                     अब बिहार में चुनाव आ रहे हैं तो ना जाने कितने नए नाम सुनने को मिलेंगे। शुरुआत भी हो गयी। मोदीजी ने RJD का नाम बदल कर " रोजाना जंगलराज का डर " पार्टी रख दिया। लालूजी कहाँ कम थे उन्होंने बीजेपी का  नाम बदल कर " बेशर्म और झूठी पार्टी " रख दिया। मोदीजी ने नितीश पर मांझी को हटाने को लेकर " महादलित का अपमान " करार दे दिया। बिहार के कई लोग कह रहे हैं की ये बीजेपी ही थी जिसने मांझी को कहीं का नही छोड़ा। 

                          उसी तरह नाम ही नही वायदे और नारे भी बदल रहे हैं। लोकसभा चुनाव में मोदीजी ने नारा दिया था, " कालाधन वापिस लाओ ' वायदा किया था सबको 15 -15 लाख देंगे। सारे युवाओं को रोजगार देंगे। अब नया नारा है " 24 घंटे बिजली देंगे " नया वायदा है की बिहार के लोगों को बिहार में ही काम देंगे। मोदीजी सोच रहे होंगे ये कोई दूसरे लोग हैं और लोकसभा चुनाव में दूसरे लोग थे। भूल गए होंगे, काम का दबाव रहता है। मोदीजी कह रहे हैं की बिहार को 50000 करोड़ से ज्यादा देंगे। नितीश कह रहे हैं की दे दो कौन रोक रहा है ? मोदीजी कह रहे हैं की सही समय पर इसकी घोषणा करेंगे। लोग हंस रहे हैं की नया जुमला है। 

                        कांग्रेस आरोप लगा रही है की सरकार हमारी योजनाओं का नाम बदल बदल कर वहीं  योजनाएं लागु कर रही हैं। मैं कहता हूँ की योजनाएं ही क्यों, सरकार तो हर वह काम कर रही है जो कांग्रेस करती थी। परन्तु सरकार के मंत्री इस बात के सख्त खिलाफ हैं। राजनाथसिंह कहते हैं की हमारा कोई मंत्री आरोप लगने पर UPA सरकार की तरह इस्तीफा नही देगा। बोलो फर्क हुआ की नही। अरुण जेटली जी कहते हैं की पहले हम कहते थे की संसद को चलाने की जिम्मेदारी सरकार की होती है अब हम विपक्ष से संसद चलाने की मांग को लेकर धरना दे रहे हैं। बोलो फर्क है की नही। शुष्मा जी पहले कहती थी मंत्री के पद पर रहते निष्पक्ष जाँच सम्भव ही नही है, अब कहती हैं की बिना आरोप सिद्ध हुए इस्तीफा कैसे ? बोलो फर्क हुआ की नही 

                सो राजनीती में नाम, वायदे, नारे और बयान बदलने का अपना महत्त्व है।

Saturday, July 18, 2015

Vyang -- अथ " दामाद " कथा

गप्पी -- जम्मू के एक कार्यक्रम में प्रधानमन्त्री ने एक राष्ट्रीय समस्या की तरफ देश का ध्यान खींचा। यह समस्या है दामाद समस्या। इस समस्या का मूल भारतीय संस्कृति में बहुत गहरे तक है। कांग्रेस और मीडिया इसे राबर्ट वाड्रा से जोड़कर देखते हैं तो ये उनका समस्या का सरलीकरण करना हैं। मेरा मानना है की प्रधानमन्त्री बड़ी समस्या की तरफ देश का ध्यान आकर्षित करना चाहते थे। प्रधानमन्त्री जम्मू में कांग्रेस के स्वर्गीय नेता गिरधारीलाल डोगरा की शताब्दी के अवसर पर बोल रहे थे। और गिरधारीलाल डोगरा के दामाद अरुण जेटली उनके बाजू में बैठे हुए थे। उन्होंने भाजपा के प्रवक्ताओं को भी संदेश दे दिया की अगर भविष्य में अरुण जेटली का कोई घोटाला सामने आ जाये तो वो कह सकते हैं की आखिर हैं तो एक काँग्रेसी के ही दामाद। 

                   छोड़िये, मुख्य समस्या पर आते है। भारतीय परम्परा में दामाद का महत्त्व बहुत अधिक होता है। उसे एक विशिष्ट दर्जा हासिल है। दामाद वो प्राणी होता है जो घर में बिना कुछ किये पूरी सुविधाओं और अतिरिक्त रोबदाब से रहता है। और ये सारे लक्षण उसमे सभी तरह की जाती और धर्म से परे पाये जाते हैं। दामाद किसी जाती का हो, किसी सामाजिक और आर्थिक श्रेणी में आता हो उसके इन लक्षणों पर कोई फर्क नही पड़ता। मेरे घर से थोड़ी दूर सड़क के नुक्क्ड़ पर एक बूट पालिस करने वाला लड़का बैठता था। उम्र कोई 30 साल होगी। आते जाते उससे दुआ सलाम और बातचीत हो जाती थी। वो मुझे कई दिन दिखाई नही दिया। कई दिन बाद जब वो दुबारा दिखाई दिया तो मैंने पूछा की इतने दिन कहां थे? तो उसने जवाब दिया, " मेरे साले  की शादी थी। मैं ससुराल वालों से नाराज था सो मैंने घरवाली को अकेले भेज दिया और उसको बताया की मैं एक दो दिन बाद आऊंगा। ससुर को जब पता चला की मैं नाराजगी के कारण नही आया तो वो दूसरे चार पांच लोगों को लेकर मेरे घर आये। उन्होंने सबके बीच में मुझसे माफ़ी मांगी और पैर पकड़े, तब मैं उनके साथ ससुराल गया। मैंने भी उन्हें बता दिया की आखिर मेरी भी कोई इज्जत है। इस सारे प्रोग्राम में चार पांच दिन लग गए। "

                             दामाद होने का अहंकार उसके चेहरे से फूटा पड रहा था। और उसमें पूर्ण सन्तोष का भाव शामिल था। ये भरतीय दामाद का सर्वव्यापी लक्षण है। 

                      अब फिर थोड़ी इस राष्ट्रीय समस्या की बात कर लेते हैं। हमारे देश में सरकारी अफसरों और कर्मचारियों को सरकारी दामाद कहा जाता है। क्योंकि उनमे भी वो सारे लक्षण पाये जाते हैं जो दूसरे दामादों में पाये जाते हैं। इस समस्या का कोई हल प्रधानमंत्रीजी के पास भी नही होगा क्योकि नेता भी अपने आप को सरकारी दामाद मानते हैं। अख़बार में खबर छपी थी की एक आदमी ने RTI के तहत प्रधानमंत्री के विदेशी दौरों पर हुए खर्च का हिसाब माँगा तो सरकार ने इंकार कर दिया। भला कोई दामादों के खर्चे का हिसाब देता है ? RTI करने वाले को भारतीय परम्परा की जानकारी नही होगी।  अधिकारीयों के खिलाफ ना जाने कितनी शिकायतें पैंडिंग हैं पर आज तक कुछ हुआ, हो ही नही सकता, दामाद जो ठहरे।

                      हमारे यहां पुरातन काल से ससुर दामादों के कुकर्मो का भोग बनते रहे हैं। कंस को बचाने के लिए और बाद में उसकी मौत का बदला लेने के लिए जरासंघ सारी उम्र कृष्ण से लड़ता रहा और आखिर में ससुरगति को प्राप्त हो गया। विरोधी पक्ष को हराने के लिए भी दामादों का प्रयोग हमारे यहां बखूबी होता रहा है। देवताओं को शुक्राचार्य से मृतसंजीवनी विद्या चुराने के लिए कच को उसका दामाद बनाना पड़ा था। शुक्राचार्य के पेट के अंदर पहुंचाने से पहले उसके घर अंदर पहुंचाने का सबसे आसान और पुख्ता रास्ता दामाद ही था। 

भारतीय परम्परा में ऋषि मुनि पुत्र ना होने पर अपनी सारी विद्या और खोज दामाद को ही सौंपते थे। और जिनको दामाद भी प्राप्त नही होता था वो अपनी सदियों के मेहनत और विद्या अपने साथ ही लेकर मर जाता था। बाकी शिष्य भले ही कितने ही काबिल क्यों ना हों किसी को भरोसे के काबिल नही माना जाता था। 

                    इसलिए राजनितिक पार्टियों और मीडिया को इस समस्या के मूल पर विचार करना चाहिए और इसे कोई छोटा मोटा ताना मानकर नही छोड़ देना चाहिए। मेरा तो ये मानना है की अगर हम ये समस्या हल करने में कामयाब हो गए तो विकास और महंगाई जैसी छोटी छोटी समस्याओं को तो चुटकी में हल किया जा सकता है। 

खबरी -- पर मुझे तो लगता है की प्रधानमंत्रीजी को केवल देश के दामादों को सम्भालना चाहिए। इनमे बहुत से देशी विदेशी उद्योगपति भी शामिल हो गए हैं।

Monday, June 22, 2015

हरी अनन्त, हरी कथा अनन्ता - आधुनिक महाभारत की कथा

गप्पी -- जिस तरह हरी ने इस संसार की रचना की, समय समय पर अवतार लेकर धर्म की रक्षा की, असंख्य लीलाएँ की और लोगों को संदेश दिए, उससे हरी कथा अनन्त हो गयी है। उसी तरह एक संसार की रचना और की गयी जिसे आईपीएल का संसार कहा जाता है। इस संसार के रचयिता ललित प्रभु हैं। इनकी कथा भी उतनी ही अनन्त है। जैसे जैसे इसका संसार लोगो के सामने दृष्टिगोचर हो रहा है इसका अनन्त स्वरूप सामने आ रहा है। कहते हैं की भगवान के हजारों नाम हैं उनमे एक नाम ललित भी है। इसमें एक महाभारत की शुरुआत हो गयी है। परन्तु इसके पात्र बदल गए हैं। किसी को समझ नही आ रहा है की कौन किसकी तरफ है।

                        इस युद्ध के महान धनुर्धर नरेन्द्र युद्ध के मैदान के बीचों बीच खड़े हैं। पहली महाभारत की तरह इस बार वो युद्ध से भागते नही हैं। परन्तु उन्हें समझ नही आ रहा है की वध किसका करना है। दुश्मन के खेमे से आवाज आ रही है की उसे अपने ही पक्ष के योद्धाओं में से कुछ का वध कर देना चाहिए। वो प्रभु  की तरफ देखते हैं। प्रभु  अपना विराट रूप दिखाते हैं। ये रूप इतना विराट है की धरती के दोनों छोरों तक फैला हुआ है। इसमें उन्हें सुषमा स्वराज का सिर दिखाई देता है अपने पूरे परिवार के साथ, वसुन्धरा राजे का सिर भी है अपने पुत्र के साथ, शशि थरूर का सर भी है , शरद पवार और प्रफुल्ल पटेल का सर भी है। महाराष्ट्र के पुलिस कमिशनर राकेश मरिया का सिर भी है। और भी न जाने कितने सिर हैं जिनकी शक्लें अभी साफ नही हैं। अर्जुन, मेरा मतलब है की नरेन्द्र असमंजस में हैं। प्रभु  धीरे धीरे मुस्कुरा रहे हैं और कह रहे हैं की वत्स," देख लो और पहचान लो, कौन दुश्मन है और कौन साथी ," नरेंद्र हक्के बक्के खड़े हैं। धीरे से पूछते है की प्रभु क्या मुझे भी आपकी तरह रण छोड़ कर भागना पड़ेगा।

                      परन्तु ये आधुनिक युग के प्रभु हैं। इन्हे मालूम था की कानून नाम के जरासंघ से वो हार सकते हैं। इसलिए युद्ध शुरू होने से पहले ही निकल लिए। अब लन्दन नाम की नई द्वारका में बैठकर ताल ठोँक रहे हैं की मैं जरासंघ से डरता नही हूँ। कंस के द्वारपालों को रिश्वत दे कर भाग निकले और अब वेनीश और मलेशिया में गोपियों के साथ रास रचा रहे हैं।

                          प्रभु  उपदेश देते हैं की मित्र अपने पिता देवेन्द्र से बात करके दो एक मेनका मंगवा लो और दुश्मन पक्ष के कुछ योद्धाओं को भेज दो। नरेन्द्र निराशा से कहते हैं की प्रभु सीबीआई नाम की मेनका को दुश्मन के दो बड़े योद्धाओं शंकर सिंह वाघेला और वीरभद्र सिंह के पास भेज चुके हैं। उसने अपने जाल में उनको फंसा भी लिया है परन्तु दुश्मन खेमा फिर भी मजबूत नजर आ रहा है। हमने जिन दो मोर्चो पर महिला योद्धाओं को लगा रक्खा है उनके बारे में अब कुछ साथी कहते हैं की ये कमजोर कड़ी हैं इन्हे बदल दो, वरना युद्ध हारने  का खतरा है। हमने उनको बदलने का सोचा ही था की उन्होंने संदेश भेज दिया की अगर उन्हें बदला गया तो वो अपनी सेना साथ में लेकर चली जाएँगी।

                       इसलिए हे प्रभु बहुत कन्फ्यूजन है , उचित मार्गदर्शन दीजिये।

प्रभु फिर मुस्कुराते हैं और कहते हैं की," हे संघेय ! तुमने मेरे साथ ठीक नही किया। तुम्हारे नियुक्त किये हुए पुजारी मेरा सारा चढ़ावा खा गए। जबकि तुमने वादा  किया था की न खाऊंगा और न खाने दूंगा।"

             नरेंद्र मुश्किल की मुद्रा में कहते हैं की हे प्रभु, आपने वचन के अनुसार अपनी पूरी यादव सेना तो दुश्मन को दे दी और खुद मेरी तरफ आने की बजाए द्वारका निकल गए। अब मेरे रथ का सारथी नही मिल रहा है। हमारे पक्ष में जिस एकमात्र योद्धा को रथयात्रा का अनुभव था हमने बब्रुवाहन की तरह उनका सिर युद्ध की शुरुआत में  उनके ही हाथों कटवा दिया था कुल की रक्षा के लिए। अब उनका कटा हुआ सिर भी अंट शंट बोलता रहता है। हमारे मराठा नरेश शल्य की भूमिका में आ गए हैं। लड़ भी हमारी तरफ से रहे हैं और गालियां भी हमे ही दे रहे हैं। अभिमन्यु अब दूध पिता बच्चा नही रहा। वो अब मगध नरेश है। हमने जिस चक्रव्यूह का निर्माण उसको  मारने  के लिए किया था उसमे वो भीम को साथ में लेकर घुस गए हैं। हमने दुशासन और जयद्रथ को भेजा तो है परन्तु वहां से खबर आ रही है की वो आपस में लड़ रहे हैं। इसलिए बहुत मुश्किल समय है प्रभु, अगर इस समय में उचित मार्गदर्शन नही मिला तो आपका ये मित्र और भक्त युद्ध हार सकता है। ऊपर  से आप अपने विराट रूप में जब राजीव शुक्ला का चेहरा दिखाते हैं तो साथ में अरुण जेटली का भी दिखा देतें हैं। अब हमारे पास कोई शकुनि भी नही है और हम केवल सुब्रमणियम स्वामी के भरोसे हैं। इसलिए हे माधव हमारी गलतियों को क्षमा करके इस मुसीबत से निकालिये।

           लड़ाई जारी है। भगवान के विराट रूप में और किस किस के सिर लगे हैं ये धीरे धीरे साफ हो रहे हैं। ये युद्ध कौरवों और पांडवों के बीच नही है। लोगों को लग रहा है की दोनों तरफ कौरव हैं। दोनों खेमे केवल एक दूसरे पर ही हमला नही कर रहे हैं बल्कि अपने पक्ष के योद्धाओं पर भी हमले हो रहे हैं। एक ही चीज एक जैसी है की प्रभु तब भी बिना हथियार उठाये सबको मार रहे थे और अब भी बिना हथियार उठाये संहार कर रहे हैं। हे प्रभु तेरी लीला अनन्त है। 

खबरी -- ये युद्ध भी अट्ठारह दिन में खत्म हो जायेगा क्या ?

Sunday, May 24, 2015

Arun Jetly on Delhi Government turf war ( अरुण जेटली का दिल्ली विवाद पर बयान )

खबरी -- दिल्ली विवाद पर वित्तमंत्री अरुण जेटली का बयान आया है। 


गप्पी -- हाँ , जिसका मतलब लगभग यह है की दिल्ली में शासन के अधिकार उपराज्यपाल के पास हैं और सुशासन देने की जिम्मेदारी अरविन्द केजरीवाल की है।