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Tuesday, October 1, 2019

डरावने आंकड़े आ रहे हैं अर्थ व्यवस्था के।

            पिछले कई क़्वार्टर से अर्थ व्यवस्था बैक गियर में जा रही है। अब ये स्पष्ट हो चूका है की ये गिरावट किसी क़्वार्टर की किसी खास वजह से नहीं है बल्कि एक लगातार जारी ढलान की तरफ और ढांचागत कारणों से है। अब तो इसको लगभग सरकार ने भी मान लिया है भले ही दबी जुबान में सही। लेकिन सरकार और उसके कुछ खास लोगों को अब भी उम्मीद है की ये अपने आप ठीक हो जाएगी। इसके लिए सरकार ने कुछ कदमो की घोषणा भी की लेकिन जानकारों का मानना है की सरकार के कदमो से कॉरपोरेट सैक्टर को आर्थिक लाभ तो मिलेगा लेकिन इन कदमो से बाजार में मांग पैदा नहीं होगी और लिहाजा अर्थ व्यवस्था में कोई सुधार नहीं होगा।
              जानकारों का मानना है की अर्थ व्यवस्था में मंदी लोगों की क्रय शक्ति कम होने के चलते मांग में आयी गिरावट की वजह से है और जिस पर इन कदमो का कोई असर होने वाला नहीं है। फिर भी एक आशावादी तबके को सुधार की उम्मीद है और वो इसका इंतजार कर रहे हैं।
                 लेकिन जब भी अर्थ व्यवस्था से संबंधित कोई भी आंकड़ा सामने आता है तो उसमे बीमारी के बढ़ने के संकेत हैं न की घटने के। अब इस क्रम में जो ताज़ा आंकड़े आये हैं वो तो बहुत ही डरावने हैं। 30 सितम्बर 2019 को जारी आंकड़ों के अनुसार अर्थ व्यवस्था की हालत निम्न अनुसार है।

१. देश का फिस्कल डेफिसिट 5538.40 B  डॉलर हो गया जो पिछले महीने से करीब 62 B डॉलर ज्यादा है।

२. भारत का चालू खाता घाटा -14.30 B डॉलर हो गया जो  पहले -4.60  B  डॉलर था।

३.  भारत का चालू खाता घाटा जीडीपी के -2.00 % हो गया जो पहले -0.70 % था।

४.  भारत का भुगतान संतुलन -46.20  B  डॉलर हो गया जो पिछली अवधी में। 35.20  B  डॉलर था।

५.  सबसे भयानक बात ये की भारत का इंफ्रास्ट्रक्चर आउटपुट -0.5 % हो गया जो 52 महीने का निचला स्तर है और जो पिछली अवधि में 2.7 % था।

            इसका सीधा सा मतलब ये है की औद्योगिक उत्पादन तेजी से गिर रहा है , भुगतान संतुलन बिगड़ रहा है और घाटा बढ़ रहा है। इसका सीधा असर ये होता है की सरकार इ हस्तक्षेप करने की क्षमता घट जाती है और सुधार की उम्मीद फीकी होती चली जाती है। 

Saturday, November 18, 2017

Moody.s की रेटिंग और उसके पीछे का सच।

        जबसे मूडीज ने भारत की रेटिंग बढ़ाई है, पूरी सरकार और उसके टीवी चैनल उस पर लगातार कार्यक्रम किये जा रहे हैं। मूडीज, एस&पी, और फिच जैसी संस्थाएं पूरी दुनिया में सरकारों और वित्तीय संस्थानों की रेटिंग जारी करती रहती हैं जिससे देशी विदेशी निवेशकों को वहां के माहौल की जानकारी मिल सके। लेकिन जब ये एजेंसियां किसी देश की रेटिंग कम करती हैं तो वहां की सरकार उस पर सवाल उठाती हैं, उनके रेटिंग के तरीके में दोष निकालती हैं। और जब रेटिंग बढ़ती है तो पुरे जोर शोर से उसका श्रेय लेती हैं। लेकिन क्या ये एजंसियां वाकई किसी देश की सही रेटिंग जारी करती हैं? या ये इसको manipulate भी करती हैं ?
            इसके बहुत से उदाहरण हमारे सामने हैं जिनमे इन एजेंसियों पर manipulation के आरोप लगे हैं। खुद Moody,s पर जर्मनी, UK और अमेरिका में manipulation के लिए भारी भरकम जुर्माने लगे हैं। Moody,s पर तो अमेरिका में ऐसी सिक्योरिटीज को अच्छी रेटिंग देने के आरोप लगे हैं जो असल में कोई कीमत ही नहीं रखती थी और उन्ही सिक्योर्टीज के कारण 2008 का संकट पैदा हुआ था, जिसके बाद Moody,s पर अमेरिका में केस चला और जिसे निपटाने के लिए Moody,s को लाखों डालर देकर उसे अदालत से बाहर निपटाना पड़ा।
              ये एजेंसियां रेटिंग तय करने की फ़ीस लेती हैं। इसलिए ये आरोप भी लगते रहे हैं और साबित भी होते रहे हैं की विश्व की कुछ वित्तीय संस्थाएं अपना घटिया मॉल ( बांड्स इत्यादी ) बेचने के लिए इन एजेंसियों का सहारा लेती हैं।
                लेकिन इससे अलग भी, अगर ये सही पैमानों का इस्तेमाल करके भी रेटिंग जारी करती हों तो उसका क्या मतलब होता है ये समझना बहुत जरूरी है। इनकी रेटिंग का अर्थ होता है की किसी देश के कानून और व्यवस्था वहां मुनाफाखोरी और वित्तीय संस्थाओं के प्रति कितने उदार हैं। अगर किसी देश में अन्य चीजों के साथ इन कंपनियों को मुनाफा कमाने और उसे लेजाने के अबाधित रास्ते उपलब्ध हैं तो उसकी रेटिंग ज्यादा ऊँची होगी। इसके कुछ उदाहरण निम्न प्रकार से हैं -
१.  अगर किसी देश की सरकार किसानो को न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी करती है और उसे सही तरीके से लागु करती है तो उसकी रेटिंग कम हो जाएगी क्योंकि ये एजंसियां उसे मुक्त व्यापार के रास्ते में रुकावट मानती हैं।
२.  इसी तरह अगर किसी देश में सख्त श्रम कानून हैं और सरकार सामाजिक सेवाओं पर ज्यादा पैसा खर्च करती है तो उसकी रेटिंग भी कम हो जाएगी। जैसे अगर सरकार स्कूलों और हस्पतालों पर पैसा खर्चना बंद करके उन्हें प्राइवेट कर दे तो उसकी रेटिंग बढ़ जाएगी।
३.  इसी तरह अगर सरकार कंपनियों को करों में छूट देती है और आम आदमी पर करों का बोझ बढ़ाती है तो उसकी रेटिंग ज्यादा रहेगी।
               इसलिए इन एजेंसियों की ऊँची रेटिंग किसी देश की जनता के जीवन स्तर को तय नहीं करती, अलबत्ता वहां मुनाफा कमाने की कितनी सहूलियत है इसको प्रतिबिम्बित करती है। इसलिए इन एजेंसियों की बढ़ती हुई रेटिंग पर खुश होने के लिए आम आदमी के पास कोई कारण नहीं होता है। 

Thursday, September 21, 2017

अर्थव्यवस्था को सम्भालने के बहुत कम विकल्प बचे हैं सरकार के पास।

                   पिछले क्वार्टर के जीडीपी के आंकड़े 5 . 7 % आने के बाद भले ही अमित शाह इसको टेक्निकल कारण बता रहे हों, लेकिन सरकार को मालूम है की स्थिति वाकई गंभीर है। ये लगातार छठी तिमाही है जिसमे जीडीपी की दर लगातार गिरी है। लेकिन अब तक सरकार इसके लिए अपनी नीतियों को जिम्मेदारी देने के लिए तैयार नहीं है। जबकि सारी दुनिया के अर्थशास्त्री मानते हैं की सरकार द्वारा लिए गए लगातार गलत फैसलों की वजह से ही जीडीपी गिर रही है।
                    सबसे पहले नोटबंदी ने अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ दी। नोटबंदी का सबसे ज्यादा नुकशान गांवों और दूरदराज के इलाकों पर हुआ। नगदी की कमी के कारण असंगठित क्षेत्र के रोजगार समाप्त हो गए। उसके कारण सब्जियों और दूसरे कृषि उत्पादों की कीमतें एकदम गिर गयी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार ही ये कमी 25 % से ज्यादा है। इसके कारण दो साल से लगातार सूखे की मार झेल रहे किसानो की हालत बद से बदतर हो गयी। दूसरी तरफ सरकारी और गैरसरकारी नौकरियों के अवसर लगभग समाप्त हो गए जिससे ग्रामीण क्षेत्र को जो सहारा मिलता था वो भी खत्म हो गया। उसके साथ ही खेती के बाद इस क्षेत्र में दूसरी जो चीज बड़े पैमाने पर रोजगार उपलब्ध करवाती है वो है पशुपालन। सरकार के पशुओं के खरीद बिक्री के नियमो में किये गए फेरफार ने सीमांत किसानो के लिए ये भी घाटे का सौदा बन गया। थोड़ी बहुत जो कसर बाकी बची थी वो गोरक्षकों के नाम पर जारी गुंडागर्दी ने पूरी कर दी। इसका सीधा असर चमड़े के उत्पादन और व्यापार पर पड़ा। जिससे समाज के बिलकुल निचले तबके के गरीब लोगों के रोजगार समाप्त हो गए। और आज हालत ये है की ग्रामीण क्षेत्र, जो हमारे देश की अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ी भूमिका रखता है भारी मंदी का शिकार हो गया।
                  उसके बाद जो क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है, चाहे रोजगार देने का मामला हो या उत्पादन का, वो है लघु उद्योग और रिटेल व्यापार। ये दोनों मिलकर देश में सबसे ज्यादा लोगों को रोजगार मुहैया करवाते हैं। लेकिन सरकार के GST लागु करने के फैसले और उसके बाद इसे लागु करने के तरीके ने इन दोनों क्षेत्रों की कमर तोड़ दी। इस तरह जहां जहां भी विकास की गुंजाइश थी हर तरफ हमला किया गया। लोग पहले हमले से सम्भल भी नहीं पाते की तुरंत दूसरा हमला हो जाता। और सबसे बड़ी बात ये की सरकार में कोई भी ये मानने को तैयार नहीं की कोई समस्या है। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने तो अर्थव्यवस्था के नकारात्मक आंकड़ों को टेक्निकल कारणों की वजह से आया बता दिया।
                    लेकिन अब वित्तमंत्री अरुण जेटली के बयान के बाद लगता है की सरकार को कम से कम इतना तो पता है अर्थव्यवस्था में सचमुच कोई गिरावट है। लेकिन सवाल यह है की सरकार के पास इस स्थिति में हस्तक्षेप करने की कितनी गुंजाइश और दिशा मौजूद है।
                    साल की तीसरी तिमाही के एडवांस टैक्स के आंकड़े उम्मीद से कम हैं। GST के बाद टैक्स क्लैक्शन के जो आंकड़े पहले बताये जा रहे थे अब उन पर सवाल उठ रहे हैं। कुल 95000 करोड़ की क्लैक्शन के सामने 65000 करोड़ इनपुट टैक्स क्रेडिट का क्लेम है और बड़ी कंपनियों ने अब तक क्लेम का दावा भी पेश नहीं किया है। इसके बाद सरकार की नींद उड़ी हुई है। सरकार के बड़े अधिकारीयों के ऑफ़ दा रिकार्ड बयान आ चुके हैं की कम कलेक्सन के कारण खर्च में कटौती करनी पड़ सकती है। CAD एक झटके में बढ़कर २. ६ % हो गया है और साल के अंत तक इसके 3. 6 %  पहुंचने आसार है। सरकार का बजट  में घोषित खर्च अपनी 94 % के स्तर पर पहुंच चूका है।
                     इन हालात को देखते हुए सरकार के पास बहुत सीमित विकल्प मौजूद हैं। और जो विकल्प मौजूद हैं तो क्या सरकार उन्हें अपनाने का साहस दिखाएगी। पिछले तीन साल से अर्थव्यवस्था सरकारी इन्वैस्टमैंट पर ही चल रही थी। प्राइवेट सेक्टर पहले ही अपनी क्षमता से कम पर चल रहा था सो उसमे किसी नई इन्वैस्टमैंट की उम्मीद ही नहीं थी। अब प्राइवेट सेक्टर की क्षमता और घटकर 70 % पर आ गयी है इसलिए एकमात्र सहारा सरकारी निवेश का ही बचा है। दूसरी तरफ लोगों को सहायता की तुरंत जरूरत है। लेकिन जिस तरह उच्चस्तरीय बैठक के तुरंत बाद वित्तमंत्री ने बयान दिया है की तेल की कीमतों में कोई कटौती नहीं होगी, उसे देखते हुए लगता नहीं है की सरकार लोगों को कोई राहत देगी। उल्टा कुछ लोगों को शक है की सामाजिक योजनाओं में कटौती हो सकती है। मनरेगा जैसी योजनाओं में कटौती हो सकती है, और नौकरियों पर बैन को बढ़ाया जा सकता है। अगर सचमुच में ऐसा होता है तो ये इलाज भी बीमारी से भयानक हो सकता है। अगर लोगों के पास खरीद शक्ति नहीं होगी तो मंदी के सर्कल से बाहर निकलना असम्भव हो जायेगा। 

Sunday, August 21, 2016

डॉ उर्जित पटेल नए RBI गवर्नर

खबरी -- रिज़र्व बैंक के नए गवर्नर के बारे में क्या ख्याल है ?

गप्पी -- डॉ उर्जित पटेल एक बहुत ही काबिल और विद्धान शख्शियत हैं। मोदी सरकार के अब तक के अनुभवों को देखते हुए, और रघुराम राजन जैसे काबिल आदमी को गवर्नर की दूसरी टर्म नही दिए जाने को लेकर लोगों में ये आशंका थी की RBI गवर्नर जैसे महत्त्वपूर्ण और संवेदनशील पद पर भी किसी गजेन्द्र चौहान को ना बैठा दिया जाये। अब तक मोदी सरकार महत्त्वपूर्ण सरकारी पदों पर आरएसएस और बीजेपी से जुड़े कम योग्य लोगों को नियुक्त करती रही है। इसलिए लोगों के मन में गहरा सन्देह था। लेकिन डॉ उर्जित पटेल की नियुक्ति के बाद लोगों ने सन्तोष की साँस ली है। डॉ उर्जित पटेल बेहद काबिल इंसान हैं और एक प्रख्यात अर्थशास्त्री होने के कारण अर्थव्यवस्था की जरूरतों को अच्छी तरह समझते हैं।
               जहां तक सोशल मीडिया में उनके रिलायंस से जुड़े रहने के बारे में सवाल उठाये जा रहे हैं तो इससे ये सिद्ध नही होता की वो एक उद्योग समूह के हिसाब से निर्णय लेंगे। उनका कार्यकाल शुरू होने से पहले ही इस तरह के सवाल उठाना सही नही है।
                देश ये उम्मीद करता है की गवर्नर की हैसियत से डॉ उर्जित पटेल महंगाई को काबू में रक्खेंगे और जनता के विशाल बहुमत के हितों की रक्षा करेंगे।

Friday, December 11, 2015

ओक्टुबर IIP के आंकड़े 9. 8 % और उनका विश्लेषण

ओक्टुबर IIP के आंकड़े 9. 8 % आये और उस पर इकोनॉमी में तेजी का दावा किया जा रहा है। लेकिन अगर इस आंकड़े को ठीक से देखा जाये तो पता चलता है की इसमें सारी बढ़ोतरी कंज्यूमर ड्यूरेबल्स के उत्पादन में बढ़ोतरी की वजह से हुई है। पिछले साल अक्टूबर में कंज्यूमर ड्यूरेबल का आंकड़ा -4.6 % था और इस बार ये आंकड़ा 42.2  % पर है।
                    इसका एक मुख्य कारण ये है की इस साल दिवाली नवंबर के महीने में थी और दिवाली पर होने वाली कंज्यूमर ड्यूरेबल्स का उत्पादन अक्टूबर के महीने में हुआ है। और उसकी तुलना पिछले साल के अक्टूबर से की जा रही है।
                     कुछ दिन पहले आये कोर-सेक्टर के आंकड़े कमजोर थे और किसी भी अर्थव्यवस्था में सुधार के असली संकेत कोर- सेक्टर यानि बिजली, स्टील और खान जैसी आधारभूत क्षेत्रों में सुधार से मिलते हैं। इसलिए अक्टूबर IIP  आंकड़ों से कोई स्थाई नतीजा निकालने से पहले अगले तीन-चार महीनो के आंकड़ों पर ध्यान रखने की जरूरत है।

Thursday, October 15, 2015

Economy -- रिवर्स रेपो रेट ( Reverse Repo Rate ) कम करे रिजर्व बैंक ( RBI )

अर्थ व्यवस्था में तेजी  लाने के लिए ब्याज दरों में कमी की मांग लगातार उठती रही है। रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन के साथ तो इस मुद्दे पर वित्त मंत्री के मतभेद मीडिया में भी चर्चा का विषय रहे हैं। रिज़र्व बैंक महंगाई सहित कई चीजों को ध्यान में रखकर अपनी नीति की घोषणा करता है। देश के हालात की समीक्षा और उसके नतीजों पर अलग अलग विचार हो सकते हैं। परन्तु हमारे देश में ऊँची ब्याज दरों को अर्थ व्यवस्था में तेजी ना आने के लिए जिम्मेदार माना गया। इस पर वित्त मंत्री और दूसरे उद्योगपतियों के साथ साथ वित्त विशेषज्ञ भी अपना एतराज जताते रहे हैं। लेकिन मूल सवाल ये है की अर्थ व्यवस्था की तेजी का मामला केवल रिजर्व बैंक द्वारा रेट कम करने तक है या बैंकों द्वारा ब्याज दरों को कम करके आम उपभोक्ता तक पंहुचाने से जुड़ा है। अब तक रिजर्व बैंक 1. 25 % की दर कम कर चूका है लेकिन बैंकों ने केवल 50 -60 पैसे कम किये हैं। हैरत की बात है की जो वित्त मंत्री रिजर्व बैंक की रेट ना घटाने को लेकर सार्वजनिक आलोचना करते रहे हैं उन्होंने बैंको के रेट कम ना करने को लेकर एक शब्द नही बोला। दूसरे उद्योगपति और विशेषज्ञ भी इस पर आश्चर्य जनक रूप से चुप्पी साधे हुए हैं। आखिर ये खेल क्या है ?
                   खेल ये है की अब तक रिजर्व बैंक ने जिस रेट को कम करने की घोषणा की है उसका एक बड़ा हिस्सा बैंकों ने अपने मुनाफे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल कर लिया। एक तरफ उन्होंने लोन की दरें कम नही की , दूसरी तरफ उन्होंने लोगों द्वारा जमा करवाये जाने वाले डिपॉजिट पर ब्याज कम कर दिया। इससे लोन लेने वाले लोगों, या पहले से लोन ले चुके लोगों को तो कोई लाभ हुआ नही उल्टा बैंक में पैसा रखकर ब्याज पर गुजारा करने वाले रिटायर लोगों के लिए जरूर मुश्किलें खड़ी हो गयी। इस सारे खेल में किसी को अगर कोई फायदा हुआ तो वो बैंक ही हैं जिनके मुनाफे बिना कुछ किये बढ़ गए। आश्चर्य है की वित्त मंत्रीजी को अब अर्थ व्यवस्था पर उसके कुप्रभाव नजर नही आये। उद्योग पतिओं के मुनाफे पर आँख मूंदने वाली सरकार से और क्या उम्मीद की जा सकती है।
                     इस सारी व्यवस्था पर रिजर्व बैंक के गवर्नर जरूर अपनी नाराजगी व्यक्त करते रहे हैं। उन्होंने बैंको को ब्याज कम करने की हिदायत भी दी। लेकिन इस तरह की हिदायतों को हमेशा की तरह बैंकिंग सेक्टर ने नजरअंदाज कर दिया। इसलिए बैंको को ब्याज दर घटाने के लिए मजबूर करने के लिए और ग्राहकों तक इसका लाभ पंहुचाने के लिए रिजर्व बैंक को चाहिए की वो रिवर्स रेपो रेट में 1 % की कमी करे। पहले रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट में दो प्रतिशत का अंतर होता था जिसे कम करते करते एक प्रतिशत पर ले आया गया। ये वो दर होती है जिसके अनुसार बैंको को अपना अतिरिक्त पैसा रिजर्व बैंक में पार्क करने पर रिजर्व बैंक उन्हें ब्याज के रूप में देती है। अगर ये दर अपेक्षाकृत रूप से कम होगी तो बैंक अपना पैसा रिजर्व बैंक में पार्क करने की बजाए थोड़ा कम ब्याज पर बाजार में लोन के रूप में देंगे। अगर सरकार और रिजर्व बैंक सचमुच ब्याज दरों में कमी लाना चाहती है और उपभोक्ताओं तक उसका लाभ पंहुचना चाहती है तो उसे तुरंत ये फैसला ले लेना चाहिए।

Wednesday, September 30, 2015

RBI द्वारा ब्याज दर में कमी और विकास के दावे


 RBI ने ब्याज दरों में 50 पैसे की कटौती कर ही दी। कई दिनों से सरकार और खासकर वित्त मंत्री अरुण जेटली रिजर्व बैंक के प्रति अपनी नाराजगी व्यक्त कर रहे थे। इस नाराजगी में सरकार ऐसा आभास दे रही थी जैसे इस देश का विकास रिजर्व बैंक ने रोक हुआ हो। ब्याज दरों में कमी से मांग में बढ़ौतरी होती है ये बात तो सही है लेकिन रिजर्व बैंक द्वारा की गयी कमी का उपयोग किस चीज के लिए होता है सब कुछ इस पर निर्भर करता है।
                    रिजर्व बैंक अब तक एक रूपये पच्चीस पैसे की कटौती कर चूका है लेकिन बैंकों ने मुस्किल से पचास पैसे घटाए हैं। RBI के गवर्नर रघुराम राजन इस पर आपत्ति भी प्रकट कर चुके हैं। इस बार की कटौती के बाद भी एकाध बैंक ने बीस पैसे की कटौती की घोषणा की है। केंद्रीय बैंक की दरों में कटौती का प्रयोग बैंको ने अपने मुनाफे बढ़ाने के लिए कर लिया। जब तक बैंक आम उपभोक्ता तक ब्याज दरों में कटौती का लाभ नही पहुंचाएंगे उससे मार्किट में तेजी कैसे आएगी। लेकिन हमारे वित्त मंत्री जो बार बार गवर्नर से अपनी नाराजगी प्रकट करते रहे हैं, उन्होंने बैंकों के लिए एक शब्द नही बोला। हमारे बैंकों की और पुरे प्राइवेट सैक्टर की हालत ये है की वो किसी की नही सुनता। और सरकार की इच्छा भी उससे कुछ कहने की नही है। अब तक पॉलिसी के रूप में जो भी निर्णय लिए गए हैं वो सभी निजी सैक्टर ने अपने मुनाफे के लिए उपयोग कर लिए हैं।
                    बैंक जैसे ही ब्याज दर में कमी होती है डिपॉज़िट पर ब्याज दर घटा देते हैं। इससे पेंशन और जमापूंजी के ब्याज पर गुजर करने वाले लोगों के लिए मुश्किल खड़ी हो जाती है। दूसरी तरफ बैंक लोन की ब्याज दरों में कोई कटौती नही करते हैं या नाम मात्र की कमी करते हैं जिससे मांग पर कोई असर नही पड़ता है। इसके लिए बैंक गुंजाइश ना होने का बहाना बनाते हैं। इस गुंजाइश ना होने का सबसे बड़ा कारण ये है की निजी क्षेत्र इन बैंको का लाखों करोड़ रुपया खाकर बैठ गया है। हर साल NPA का स्तर बढ़ता जाता है। बैंक हर साल निजी क्षेत्र का लाखों करोड़ रुपया माफ़ कर देते हैं जिससे उनके मुनाफे और बैलेंस सीट पर असर पड़ता है। और इस सारी स्थिति का बिझ वो आम आदमी पर डाल देते हैं चाहे वो बैंक में जमा कराने वाला हो या लोन लेने वाला हो। इस लालची और जन विरोधी तरीके को जब तक बदला नही जायेगा उसका मार्किट पर कोई असर पड़ने वाला नही है। और सरकार इस बारे में कुछ बोलती नही है या उसका समर्थन इनके साथ है।
                    दूसरा सवाल ब्याज दरों में कटौती का विदेशी पूंजी पर पड़ने वाला असर है। मार्किट के विशेषज्ञ ये मानते हैं की पिछले दिनों में विदेशों से भारत के DEBT में निवेश के बढ़ते आंकड़े का मुख्य कारण हमारे यहां की ऊँची ब्याज दरें हैं। जैसे ही रिजर्व बैंक ब्याज दरों में कटौती करता है हमारे यहां से वो निवेश वापिस जाने की प्रकिर्या शुरू हो जाती है। इससे रूपये की कीमत गिरती है और हमारे आयत और महंगे हो जाते हैं। हमारा देश कच्चे मॉल का और पट्रोलियम पदार्थों का मुख्य आयात करता है। इनके महंगे होने से हमारा तैयार माल दूसरे देशों के मुकाबले महंगा हो जाता है और निर्यात और कम हो जाते हैं। इसलिए ये जरूरी नही है की ब्याज दरों में कटौती का लाभ ही हो।
                     अगर सरकार ब्याज दरों में कटौती को मांग बढ़ने के सायकिल के साथ जोड़ना चाहती है तो उसे ये सुनिश्चित करना होगा की ब्याज दरों में कटौती का लाभ निचे मार्किट तक पहुंचे और इसका इस्तेमाल बैंक अपने मुनाफे बढ़ाने के लिए ना करें। वरना ये सारी कवायद बेकार हो जाएगी।

Tuesday, September 29, 2015

A Cartoon on Net Neutrality and Internet.org Discussion

The Hindu
A debate on net neutrality and internet.org is growing on. After prime minister Mr. Modi visited facebook head quarter this issue capture a big space on social media.

Thursday, September 17, 2015

Vyang - बिजनेस फ्रेंडली राज्य बनाने पर सुझाव

पिछले दिनों वर्ल्ड बैंक ने एक लिस्ट जारी की है जिसमे भारत में सबसे आसानी से बिजनेस किये जाने वाले राज्यों की सूचि जारी की है। मुझे बड़ा दुःख हुआ जब मैंने देखा की हमारे राज्य का नंबर तो झारखण्ड, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे पिछड़े हुए राज्यों के भी बाद आता है। सो मैंने इन सभी राज्यों में मिलने वाली सुविधाओं और सहूलियतों का गहन अध्धयन करने के बाद कुछ सुझाव तैयार किये हैं जिन्हे अपनाकर दूसरे राज्य भी इस सूची में अपना नंबर सुधार सकते हैं। ये सारे सुझाव एकदम मुफ्त में और बिना मांगे दिए जा रहे हैं और मैं उम्मीद करता हूँ की इन्हे अपनाने वाले राज्य मेरी सेवाओं का सम्मान करेंगे।
सिंगल विंडो स्कीम ------- 
                                       जब कोई आदमी किसी राज्य में बिजनेस शुरू करना चाहता है तो उसे अलग अलग कई विभागों से मंजूरी लेनी पड़ती है। सभी विभागों के अधिकारी काम करने के लिए सीधे सीधे पैसे लेने की बजाय दलालों की मार्फत पैसे लेते हैं। उन सभी अधिकारीयों के दलालों को ढूंढना काफी मुस्किल भी होता है और इसमें समय भी बहुत लगता है। इसलिए सरकार को एक सिंगल विंडो स्कीम पेश करनी चाहिए जिसमे एक ही दलाल सभी विभागों के अधिकारीयों का पैसा ले ले और बाद में अधिकारी और विभाग की हैसियत के हिसाब से बंटवारा कर दे। विकसित राज्यों में इन दलालों को सचिवालय के बाहर बैठने के लिए जगह दी गयी है जिससे इन्हे ढूंढने में कोई दिक्क़त नही हो। इस अनुभव का फायदा दूसरे राज्यों द्वारा भी उठाया जा सकता है।
खनन उद्योग माफिया के भरोसे --------
                                                          सरकार को ये पता लगाने के लिए की कहां  कहां खनन किया जा सकता है और कैसे किया जा सकता है बहुत खर्चा करना पड़ता है। फिर भी अधिकारीयों के भरोसे ये काम ठीक से नही हो पाता है। इसलिए इसमें निजी क्षेत्र की भूमिका को बढ़ावा दिया जाना चाहिए और पुरे खनन क्षेत्र को माफिया के भरोसे छोड़ देना चाहिए। ये साबित हो चूका है की माफिया खनन का विकास ज्यादा तेजी से करता है। सभी बिजनेस फ्रेंडली राज्यों ने खनन को माफिया के ही भरोसे छोड़ा हुआ है। अधिकारीयों का काम केवल उनसे पैसे लेकर ऊपर  तक पहुंचाना होता है। इससे सरकार का समय भी बचता है और नए नए क्षेत्रों में खनन का विकास भी तेजी से होता है।
व्हिसल ब्लोवरों पर लगाम --------
                                                   हर राज्य में कुछ विकास विरोधी लोग होते हैं जो सरकार और बिजनेस मैन के काम में अड़ंगा लगाते रहते हैं और अपने आप को व्हिसल ब्लोवर कहते हैं। विकास के हित में इन पर लगाम लगाई जानी बहुत जरूरी है। उनमे से दो-तीन को मार दिया जाये तो बाकि को धमकाना आसान हो जायेगा। हर विकास शील राज्य ने यही तरीका अपनाया है। उसके बाद ये समस्या धीरे धीरे कम हो जाती है। पुलिस को आदेश दिए जाएँ की अगर कोई व्हिसल ब्लोवर धमकी की शिकायत लेकर पुलिस के पास आये तो उसी पर ब्लैकमेल का मुकदमा बना दिया जाये।
श्रम विभाग को नया काम --------
                                                किसी भी राज्य में उद्योग के विकास के लिए ये जरूरी है की मजदूर कानूनो को संविधान के बाहर मान लिया जाये। हर बिजनेसमैन को ये छूट दी जाये की वो कितनी ही देर काम करवाये और कितना ही वेतन दे। इसके लिए सबसे अच्छा तरीका ये है की राज्य में ठेकेदारी प्रथा को बढ़ावा दिया जाये और मजदूर कानूनों को बदलने का झंझट लेने की बजाए उन पर ध्यान ना देने का रास्ता अपनाया जाये। यूनियनों पर प्रतिबंध लगा दिया जाये और श्रम विभाग का काम केवल ठेकेदारों का पता लगाकर उनसे पैसे इक्क्ठे करने तक सिमित कर दिया जाये। वैसे ज्यादा विकसित राज्यों में तो ये काम उद्योगपतियों के जिम्मे ही है की वो हर महीने ठेकेदारों के भुगतान में से पैसे काटकर विभाग में जमा करा दे। अब जब उनको प्रोविडेंट फंड और ईएसआई जमा करवाने से छुटकारा मिल गया है तो वो इतना काम तो राज्य की भलाई में कर ही सकते हैं।
टैक्स सुधारों को लागु करना ------
                                                   टैक्स सुधारों का मुद्दा इसमें काफी मायने रखता है। सरकार को पिछले दरवाजे से जो टैक्स आता है उसकी प्रगति पर कड़ी नजर रखी जानी चाहिए। बाकि खजाने में कितना टैक्स आता है उस की ज्यादा चिंता नही करनी चाहिए। उसमे अगर कमी आती है तो पट्रोल और डीजल पर टैक्स बढ़ाकर पूरा किया जा सकता है। पिछले दरवाजे से टैक्स देने वाले व्यापारियों को बही खातेचैक करवाने से छूट दी जाये। इससे जो सफेद धन को काला करने की प्रकिर्या है उसमे तेजी आएगी। इन टैक्स सुधारों को लागु करना बिजनेस फ्रेंडली राज्य बनाने के लिए बहुत जरूरी है।
विकास के प्रचार में तेजी -----
                                               इस उपलब्धि के लिए जो काम सबसे जरूरी है वो ये की विकास के प्रचार में तेजी लाई जाये। चाहे आदिवासियों के विस्थापन का सवाल हो, चाहे किसानो की जमीन छीनने का काम हो या पर्यावरण का सवाल हो, इनका विरोध करने वाले हर आदमी और संस्था को विकास विरोधी और बाद में देशद्रोही घोषित कर दिया जाये। उनके लाइसेंस रद्द कर दिए जाएँ और मीडिया हाउसों को इसकी खबरों पर बैन लगाने के आदेश दिए जाएँ। इन लोगों पर हमला इतना तेज किया जाये की जब तक लोगों को सच्चाई समझ में आये तब तक काम पूरा हो चुका हो।
                    ये कुछ सुझाव बहुत छानबीन और विचार करने के बाद तैयार किये गए हैं और राज्य इनसे लाभ उठा सकते हैं।

Sunday, September 6, 2015

गरीब को और गरीब बनाने का हथियार है हमारी टैक्स व्यवस्था


किसी भी देश की व्यवस्था को चलाने के लिए पैसे की जरूरत  होती है। और ये पैसा सरकार के पास टैक्स के द्वारा आता है। परन्तु सारी राजनीती इस बात पर निर्भर करती है की टैक्स इकट्ठा किससे  किया जा  रहा है और खर्च किस पर किया जा रहा है। लेकिन ये मामला इतना आसान नही होता। इसलिए इस बारे में एक भ्रम का जाल फैलाया जाता है। दुनिया की बड़ी से बड़ी एकतरफा व्यवस्था भी इसका भ्रम फैलाती है की वो सारे नागरिकों की भलाई के लिए काम कर रही है। इसका प्रचार इतना प्रबल होता है की लोग उन चीजों का भी समर्थन करते हैं जो उनके खिलाफ होती हैं।
                       हमारे देश में भी इसी तरह का जाल फैलाया गया है। जिसका असर ये हुआ है की पढ़े लिखे लोगों में से भी बहुत से लोग उन चीजों का समर्थन करते हैं जो उनके खिलाफ हैं। और अगर कोई संस्था या व्यक्ति उनके हित में बात भी करता है तो सबसे ज्यादा विरोध यही लोग करते हैं। यही चीज है जिसके कारण ये जनविरोधी व्यवस्था टिकी हुई है। लोगों को उनके हितों के खिलाफ ही लामबंद कर लिया जाता है। इसलिए ये जरूरी हो गया है की लोगों तक सही जानकारी पहुंचे।
                         हर एक देश में दो तरह के टैक्स होते हैं जिन्हे इकोनोमिक्स की भाषा में प्रत्यक्ष कर और अप्रत्यक्ष कर कहते हैं। इसे आसान भाषा में सीधा कर और आड़ा कर कहा  जा सकता है। सीधा कर वह होता है जो सीधे कर के नाम से लिया जाता है जैसे इन्कम टैक्स और धन टैक्स (Wealth tax ) . और आड़ा कर वो होता है जो चीजों की कीमत में जुड़कर इकट्ठा होता है जैसे वैट या सेल्स टैक्स, एक्साइज ड्यूटी इत्यादि। ये जो कर चीजों की कीमत में जोड़कर लिया जाता है इसका प्रभाव हर आदमी पर होता है। जो भी आदमी कोई भी चीज खरीदता है उससे ये टैक्स ले लिया जाता है भले ही वह कितना ही गरीब क्यों ना हो। इसलिए जितना ये कर ज्यादा होता है उतना ही गरीबों को नुकशान होता है। अगर इस टैक्स की दर ज्यादा होती है तो उसका बोझ आम आदमी पर पड़ता है।
                          लेकिन जो सीधा कर होता है वो उन लोगों से इकट्ठा किया जाता है जो एक सीमा से ज्यादा पैसा कमा रहे होते हैं। इसमें भी टैक्स की दरें इस तरह रखी जाती हैं की कम कमाई वाले आदमी पर इसका बोझ कम पड़े और ज्यादा कमाने वाले पर ज्यादा बोझ पड़े। लेकिन हमारे देश में अगर ऊपर की ज्यादा कमाई वाले लोगों पर टैक्स की दर बढ़ाने की मांग की जाती है तो वो लोग ही इसका सबसे ज्यादा विरोध करते हैं जिनको ये टैक्स देना ही नही है। इसलिए अरबों रूपये कमाने वालों को समर्थन करने के लिए बैठे बिठाए लोग मिल जाते हैं। इसलिए इस सवाल को जरा ध्यान से समझने की जरूरत है।
                           सरकार अभी आड़ा टैक्स की प्रणाली को बदलने के लिए GST बिल लेकर आ रही है। इसमें जो सुझाव है उसके अनुसार इसकी दर 22 से 27 % के बीच रहने वाली है। इसका मतलब ये है की आम आदमी जो भी सामान या सेवा (जैसे बिजली या टेलीफोन इत्यादि का बिल ) खरीदेगा उसे कुल कीमत का एक चौथाई पैसा केवल टैक्स के रूप में देना पड़ेगा। यानि एक गरीब आदमी जो 6000 रूपये महीने में घर चलाता है उसे भी पिछले दरवाजे से हर महीने 1500 रूपये टैक्स के रूप में देने पड़ेंगे। ये टैक्स सामान की कीमत में ही जुड़ा होता है इसलिए आम आदमी को तो इसका मालूम ही नही पड़ता। परन्तु इतना भारी टैक्स होने के बावजूद देश में इसके खिलाफ कोई बोल ही नही रहा है। सरकार और मीडिया ने मिलकर ऐसा माहौल बना दिया है जैसे ये टैक्स तो हमारी अर्थव्यवस्था के लिए बहुत ही जरूरी है और देश के हित में है।
                           दूसरी तरफ सीधा कर जो इनकम टैक्स के नाम से और धन कर के नाम से लिया जाता है उसमे धन कर को तो सरकार ने इस साल से खत्म कर दिया है। ये वो कर था जो बड़ी सम्पत्ति के स्वामियों से लिया जाता था और जिसे कभी भी सरकार ने ईमानदारी से इकट्ठा करने की कोशिश नही की। वरना अगर इसे ईमानदारी से इकट्ठा किया जाता तो इससे बहुत बड़ी रकम प्राप्त हो सकती थी और आम आदमी पर इसका कोई बोझ भी नही पड़ता। हमारे देश में एक नंबर की सम्पत्ति के जो आंकड़े मौजूद हैं उसके अनुसार हमारे देश में स्थाई सम्पत्ति एक करोड़ बाईस लाख सत्तर हजार करोड़ रूपये है। इसमें लोगों के बैंक में जमा पैसा, बीमा में जमा , शेयर और दूसरे फंड में जमा पैसा शामिल नही है। इसमें केवल सोना और रियल एस्टेट जैसी चीजे ही शामिल हैं। इसमें से 74 % सम्पत्ति के मालिक केवल ऊपर के 10 % लोग हैं। और उससे भी आगे ये की इसमें से 49 % सम्पत्ति के मालिक केवल 1 % लोग हैं। अगर उन 1 % लोगों की सम्पत्ति पर सालाना केवल 1 % टैक्स ही लिया जाये तो उसकी रकम सालाना 60000 करोड़ से ज्यादा बैठती है। और ये तो वो सम्पत्ति है जो एक नंबर की है और उसकी कीमत भी उन लोगों की ही बताई हुई है।  सरकार ने ये टैक्स कभी ईमानदारी से इकट्ठा नही किया और अब उसे समाप्त कर दिया।
                      अगला उदाहरण इनकम टैक्स का है। जब भी इनकम टैक्स की दर में ऊपर के स्तर पर बढ़ौतरी की मांग उठती है तो सबसे पहले इसका विरोध वो लोग करते हैं जिन्हे वो दर जिंदगी में कभी लागु नही होगी।
2011 -12 के आंकड़ों के अनुसार 5 लाख तक की कमाई वाले लोगों से कुल 15000 करोड़ रुपया इकट्ठा हुआ था और उनकी संख्या 28844000 थी। अगर इन लोगों को टैक्स की स्लैब में 50000 रूपये की छूट दे दी जाती है तो सरकार को कुल मिला कर  5000 करोड़ का भी नुकशान नही होगा। दूसरी तरफ 20 लाख से ऊपर की कमाई बताने वाले लोगों की संख्या केवल 4 लाख 6 हजार थी। अगर इन लोगों की स्लैब में 30 % से बढ़ाकर 40 % की स्लैब कर दी जाये तो सरकार को करीब 23000 करोड़ रुपया ज्यादा मिल सकता है। सारे फेरबदल से लाभ होने वाले लोगों की संख्या 3 करोड़ है और असर पड़ने वाले लोगों की संख्या केवल 4 लाख है और सरकार को करीब 18000 करोड़ का फायदा भी हो सकता है। ये 2012 के आंकड़े हैं और अब 2015 है। इसलिए अगर एक करोड़ सालाना से ज्यादा कमाई बताने वाले लोगों पर 40 % की स्लैब लागु कर दी जाये तो मुश्किल से एक लाख लोग इससे प्रभावित होंगे और सरकार की कमाई करीब 25000 करोड़ बढ़ जाएगी।
                          लेकिन सरकार इससे उल्टा कर रही है। उसने कॉर्पोरेट टैक्स की दर को 5 % घटा दिया, धन कर खत्म कर दिया और आम लोगों पर वैट बढ़ाने जा रही है। ये सारी व्यवस्था अमीरों को और अमीर बनाने और गरीबों को गरीब बनाने के हिसाब से चल रही है। और ना केवल चल रही है बल्कि देश के मध्यम वर्ग का समर्थन भी प्राप्त कर रही है।रिजर्व बैंक द्वारा जारी किये गए 2012 -13  के अनुसार हमारे देश में कुल टैक्स उगाही में सीधे करों का हिस्सा 38 . 44 % है और आड़ा करों का हिस्सा 61 . 56 % है। गरीबी  और अमीरी का अंतर कम करने के लिए इस अनुपात को उल्टा करना जरूरी है। इसलिए इससे जो मुख्य बातें निकल कर आती हैं वो इस प्रकार हैं। ---
१.   इन्कम टैक्स की दर को एक करोड़ से ऊपर कमाई वाले लोगों के लिए 40 % किया जाये।
२.  कॉर्पोरेट टैक्स को घटाना बंद किया जाये।
३.  जीवन जरूरत की चीजों पर वैट हटाया जाये।
४.  धन कर को दुबारा और प्रभावशाली तरीके से लागु किया जाये और इसकी दर सालाना 1 % रखी जाये।

Saturday, September 5, 2015

भारत, चीन और अमेरिका में सम्पत्ति के बंटवारे की तुलना

भारत, चीन और अमेरिका ये तीन देश आर्थिक मामलों में हमेशा एक दूसरे की तुलना में उदाहरण के तौर पर पेश किये जाते रहे हैं। यहां भारत में जब भी किसी आर्थिक गतिविधि पर चर्चा होती है तो उसकी तुलना या तो चीन से की जाती है या अमेरिका से। हम आर्थिक स्थिति के अनुसार तो अमेरिका के आसपास नही हैं लेकिन दोनों की तुलना इसलिए की जाती है की दोनों विश्व के बड़े लोकतंत्र हैं और दोनों ने विकास का पूंजीवादी तरीका अपनाया है। चीन से हमारी तुलना इसलिए की जाती है, क्योंकि दोनों जनसंख्या के हिसाब से दुनिया के सबसे बड़े देश है, दोनों एशियाई देश हैं, दोनों विकासशील देश हैं और दोनों ने विकास के अलग अलग रास्ते अपनाये हैं। उदारीकरण के दौर के बाद जब चीन ने अपनी व्यवस्था को दुनिया के लिए खोला और कुछ बदलाव किये जो बाजार के अनुकूल हैं तो बहुत से विशेषज्ञों ने उदारीकरण की कुछ बुरी प्रवृतियों और उनके  नकारात्मक प्रभाव को तूल ना देने की बात करते हुए चीन के उदाहरण दिए। उन्होंने ये साबित करना चाहा, खासकर भारत के संदर्भ में की उदारीकरण के दुष्प्रभाव एकदम सामान्य किस्म के हैं और उनको एक समय के बाद खत्म किया जा सकता है। 
                          उन्होंने ये बताया की उदारीकरण के कारण अमीर और गरीब के बीच बढ़ती हुई खाई एक सामान्य बात है और उदारीकरण से जो फायदा गरीबों को होगा उससे इसके  दुष्प्रभाव कम हो जायेंगे। साथ ही उन्होंने ऐसा आभास भी दिलाने की भरपूर कोशिश की जैसे आय और सम्पत्ति का ये असमान बंटवारा एक सामान्य और ना रोकी जा सकने वाली प्रकिर्या है। लेकिन पिछले 15 सालों के आंकड़ों का अध्ययन किया जाये तो तस्वीर एकदम अलग नजर आती है। 
भारत में सम्पत्ति का बंटवारा -----
                                                  भारत के आंकड़े देखें जाएँ तो ये पता चलता है की सबसे अमीर 10 % लोगों का देश की कुल सम्पत्ति में हिस्सा सन 2000 में 65 . 90 %  था जो 2014 तक आते आते 74 % गया। जो इस बढ़ती हुई खाई को साफ तौर पर दिखाता है। साथ ही ये खाई इतनी चौड़ी और गहरी है की ये ऊपर  के 10 % लोग बाकि लोगों से इतने आगे हैं की अगर दूसरे 10 % यानि 10 से 20 % वाले लोगों का सम्पत्ति में हिस्सा देखा जाये तो वो भी केवल 9 . 4 % ही है। और देश के बाकि बचे कुल 90 % लोगों का देश की सम्पत्ति में हिस्सा केवल 26 % ही बैठता है। दूसरा आंकड़ा इससे भी भयावह है। इससे तो एकदम साफ हो जाता है की किस तरह उदारीकरण ने  अमीरों की सम्पत्ति में अनाप शनाप बढ़ौतरी की है और इस खाई को किस कदर चौड़ा किया है। ये आंकड़ा है देश के अति अमीर 1 % लोगों का। इन 1 % लोगों का देश की कुल सम्पत्ति में हिस्सा जो 2000 में 36 . 80 % था, 2014 में बढ़कर 49 % हो गया। यानि देश की आधी सम्पत्ति के मालिक केवल 1 % लोग हैं। 
                         अब इसकी एक दूसरी तुलना है जो पुरे विश्व की सम्पत्ति में और उसके हिसाब से दुनिया में गरीब, मध्यम और अमीर लोगों में हमारे देश की हिस्सेदारी पर है। पूरी दुनिया में जो सबसे गरीब 10 % लोग हैं उनमे भारतियों का हिस्सा 18 . 34 % है जबकि जो बीच के 50 से 60 % के लोग हैं उनमे हमारे केवल 12 . 5 % लोग हैं। जो सबसे ऊपर के 10 % लोग हैं उनमे भारतियों का हिस्सा केवल 1/2 % ही है। 
चीन का विश्व सम्पत्ति में हिस्सा -----------
                                                                चीन में हालत इससे बिलकुल उलटी है। वहां दुनिया के सबसे नीचे के 10 % लोगों में उसका कोई नागरिक नही है। जबकि बीच के 50 से 60 % के लोगों में चीनियों की संख्या    42 % है। और सबसे ऊपर के 10 % लोगों में उसका हिस्सा 6 . 8 % का है। उसके आंकड़े बताते हैं की उसमे मिडल क्लास के लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है और आय और सम्पत्ति का इतना असमान बंटवारा नही है। नीचे इसकी टेबल दी गयी है जिसमे भारत चीन और अमेरिका के तुलनात्मक आंकड़े दिए गए हैं। 
अमेरिका का विश्व सम्पत्ति में हिस्सा ----------
                                                                अमेरिका इस मायने में बहुत अमीर देश है। उस हिसाब से वहां अति गरीबों की संख्या तो नही ही होनी चाहिए जो की चीन में भी नही है। लेकिन ऐसा नही है। सबसे नीचे के 10 % लोगों में अमेरिकियों का हिस्सा 7 . 8 % है। क्या ये हैरानी की बात नही है। क्योंकि बीच के 50 से 60 % के लोगों में उसका हिस्सा केवल 2 % से भी कम है और ऊपर के 10 % लोगों में उसका हिस्सा 22 . 26 % है। इतनी अमीरी के बावजूद अमेरिका में गरीबों की बड़ी संख्या है। क्योंकि उसका विकास का रास्ता भेदभाव पर आधारित है। 
                              ये सभी आंकड़े THE HINDU के DATA सेक्शन से लिए गए हैं। इस टेबल से भारत, चीन और अमेरिका की तुलना को ठीक तरह से समझा जा सकता है।


                              INDIA                    CHINA               US
BOTTOM 10% 18.34 0 7.8
10-20% 32.31 3.49 0
20-30% 34.81 10.9 0
30-40% 30.17 8.94 0.97
40-50% 19.89 25.38 2.12
50-60% 12.49 42.04 1.72
60-70% 8.18 43.68 2.42
70-80% 5.14 43.14 4.02
80-90% 2.96 29.9 10.2
UPPER 10% 0.5 6.79 22.26

Thursday, September 3, 2015

प्रति व्यक्ति आय के आंकड़े सही स्थिति नही बताते।

किसी भी जानकारी के लिए आंकड़े महत्त्वपूर्ण होते हैं। लेकिन आंकड़े अलग अलग तरह के लोगों को उनकी अलग अलग व्याख्या का मौका भी उपलब्ध करवाते हैं। आंकड़ों की व्याख्या करने वाले का इरादा समझे बिना उस व्याख्या को सही तरह से समझना मुश्किल होता है। सरकारें आंकड़ों का मकड़जाल फैला कर जनता को भर्मित करने का काम करती रही हैं। इस मायने में प्रति व्यक्ति आय के आंकड़े भी सही परिपेक्ष्य में समझने जरूरी होते हैं। प्रति व्यक्ति आय के आंकड़ों से किसी देश की कुल गरीबी या अमीरी का अनुमान तो लग सकता है, परन्तु उससे आम लोगों के जीवन स्तर को समझना इतना आसान नही है। इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण कारक  है उस देश में आय का बंटवारा किस तरह हुआ है। इसलिए प्रति व्यक्ति आय के आंकड़ों को असमानता के आंकड़ों के साथ मिलकर देखना जरूरी होता है। इसे एक छोटे से उदाहरण के द्वारा आसानी से समझा जा सकता है। 
                   एक गांव में कुल 200 लोग रहते हैं। उसमे एक कारखाना है जिसका एक आदमी मालिक है और बाकि 199 लोग उसमे नौकरी करते हैं। नौकरी करने वालों को महीना 500 रूपये वेतन मिलता है। और कारखाने का मालिक 5 लाख रुपया सालाना कमाता है तो उस गांव के प्रति व्यक्ति आय के आंकड़े इस प्रकार होंगे।              199 व्यक्ति x 6000 =  1194000 
                      एक व्यक्ति            =   500000 
                                    कुल       =    1694000 
                     प्रति व्यक्ति आय    =     1694000 / 200 = 8470 रूपये 
      इस तरह आंकड़ों में उस गांव की प्रति व्यक्ति आय 8470 रूपये होगी। 
       अब एक दूसरा उदाहरण लें। दूसरे गांव में भी 200 लोग रहते हैं। और वो सभी बाहर नौकरी करते हैं और उन्हें 700 रूपये महीना वेतन मिलता है। इस तरह उस गांव की प्रति व्यक्ति आय 12 x 700 = 8400 रूपये सालाना होगी। लेकिन उनकी प्रति व्यक्ति आय पहले गांव से 70 रूपये कम होने के बावजूद उनका रहन सहन पहले गांव से अच्छा होगा क्योंकि वहां आय का बंटवारा ज्यादा समान है। 
                    ठीक इसी तरह हमारे देश के प्रति व्यक्ति आय के आंकड़ों को समझने की जरूरत है। कभी जबकि बिहार में चुनाव नजदीक है तो आंकड़ों का गोलमाल बहुत चल रहा है। 
         प्रति व्यक्ति आय 2015 -------
                                                          हमारे देश के 2014 -15 के आंकड़े जीडीपी पैर कैपिटा के अनुसार 
            1262 . 64 $ यानि 78284 रूपये है ---- ( 1 $ = 62 Rs .)

     हमारे  देश का प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से दुनिया में 145 वां नंबर है और एशिया में 34 वां नंबर है। पूरी दुनिया की औसत प्रति व्यक्ति आय 10880 $ है और इस हिसाब से हमारी प्रति व्यक्ति आय दुनिया की औसत आय से 6 . 7 गुना कम है। बाकि विकसित देशों का हिसाब तो छोड़ ही दीजिये। 
                      लेकिन जब इसको आय वितरण के आंकड़ों के साथ मिलाकर देखा जाये तो स्थिति और भी ज्यादा भयावह हो जाती है। हमारे देश में आय और सम्पत्ति का बंटवारा बहुत ही असमान है। आंकड़ों के हिसाब से समझें तो हमारे देश में केवल 10 % लोग 74 % सम्पत्ति के मालिक हैं। अगर हम आय का वितरण भी इसी हिसाब से करें तो बाकि 90 % लोगों की प्रति व्यक्ति आय 24400 रूपये रह जाती है। अगर और 10 % ऊपर के लोग निकाल दिए जाएँ तो स्थिति हास्यास्पद हो जाती है। और जो पहले ये आंकड़े आये थे की भारत में 72 % लोग 20 रूपये रोज से कम पर गुजारा करते हैं तो स्थिति उसके आसपास ही बैठेगी। 
                      इस तरह हमारे देश के 60 % से ज्यादा लोग भयंकर गरीबी की हालत में जी रहे हैं। उनके लिए ना तो कोई रोजगार उपलब्ध है, ना ही असरकारक भोजन की सुरक्षा उपलब्ध है, ना स्वास्थ्य सेवाओं तक उनकी पहुंच है। और ये स्थिति निरंतर बिगड़ रही है। हर बार के आंकड़े सम्पत्ति के वितरण को और अमीरों के पक्ष में दिखाते हैं और ज्यादा से ज्यादा लोग भुखमरी के शिकार हो रहे हैं। इसलिए ये और भी जरूरी हो जाता है की गरीबों की मांगों का समर्थन किया जाये और उनके लिए सहायता के कार्यक्रमों को सही ढंग से लागु होने को सुनिश्चित किया जाये।

Wednesday, September 2, 2015

चीनी अर्थव्यवस्था की गिरावट का भारतीय बाजार पर असर


                      पिछले कई दिनों से चीन की अर्थव्यवस्था के बारे में काफी बुरी खबरें आ रही हैं। वहां की अर्थव्यवस्था की बढ़ौतरी की दर धीमी पड़ रही है। जो अब घटते घटते 7 . 5 % पर पहुंच चुकी है। अर्थव्यवस्था के बारे में वैसे ये कोई बुरी दर नही है लेकिन जिस तरह की दर पिछले समय में चीन में रही है उसके मुकाबले ये काफी कम है। अब चीन के निर्यात गिर रहे हैं और उससे उसके शेयर बाजार भी गिर रहे हैं। जब चीनी अर्थव्यवस्था का तेजी का दौर था उस समय में चीनी मुद्रा युआन की कीमत में लगभग 50 % तक की बढ़ौतरी हो गयी थी। अब जब निर्यात गिर रहे हैं तो उन्हें अंतर्राष्ट्रीय बाजार में प्रतियोगी बनाने के लिए चीन ने अपनी मुद्रा का करीब 4 % तक अवमूल्यन कर दिया। जिससे पूरी दुनिया के शेयर बाजारों में भूचाल आ गया। वित्तीय बाजार के विशेषज्ञों ने करेन्सी वार शुरू होने का अन्देशा जताया। चीनी शेयर बाजार को गिरने से रोकने के लिए वहां की सरकार ने अपना बहुत बड़ा रिजर्व फण्ड बाजार में लगा दिया लेकिन फिर भी वो पूरी टूर पर निवेशकों में भरोसा नही जगा पाई। उसने अपने नागरिकों से शेयर बाजार से पैसा ना निकालने की अपील की।
                         लेकिन सवाल ये है की चीनी निर्यातों के गिरने का कारण चीन के अंदर नही है। पूरी दुनिया में जो आर्थिक मंदी का माहौल 2008 से चल रहा है और जिसे अब तक दुनिया चीनी ईंजन का उपयोग करके खींच रही थी उसकी सीमा आने लगी है। अगर दुनिया में माँग नही बढ़ती है तो केवल भारी भरकम निवेशों के सहारे ओवर प्रोडक्शन करके उसे कितने दिन खिंचा जा सकता है। चीन ने निर्यातों की इस संभावित गिरावट को पहले ही भांप लिया था। और वहां के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने आते ही चीन में ढांचागत सुधारों की शुरुआत की। उसने चीनी उत्पादों को निर्यात की बजाय घरेलू मांग के अनुरूप परिवर्तन करने की शुरुआत की। इस दौरान चीन में जो रियल एस्टेट में कीमतों का गुब्बारा बन रहा था उसकी हवा निकलनी शुरू हो गयी। लेकिन चीन में जो बढ़ते हुए न्यूनतम वेतन और मजबूत सामाजिक सुरक्षा की जो व्यवस्था है उसके चलते उसकी घरेलू मांग में कोई बहुत बड़ी गिरावट ना तो आई है और ना इसकी संभावना है।
                     
   लेकिन जब चीन से ये सारी खबरें आ रही थी तो हमारे देश का वर्ग इस बात पर बहुत आशावान था की भारत को इसका फायदा मिलेगा। वो इस पर बहसों के दौरान ये बात रखता भी था और उसका रुख ये होता था की आखिर चीन से जाने के बाद ये निवेशक कहां  जायेंगे। उनके पास भारत के अलावा दूसरा कौनसा ऑप्शन मौजूद है ? उनका कहना था की इतनी तेज वृद्धि दर चीन के बाद केवल हमारे यहां है। और मुनाफे के लोभ में इधर उधर दौड़ने वाली वित्तीय पूंजी के लिए केवल भारत ही एक ठिकाना बचता है।
                    
                     परन्तु एक तो अभी जो उत्पादन के आंकड़े आये हैं वो बहुत ही निराशा जनक हैं। उसमे हम अपनी जीडीपी दर को बढ़ाना तो दूर उसे बरकरार भी नही रख पाये हैं। और हमारे शेयर बाजार से जिस तरह विदेशी निवेशक अपना पैसा निकाल रहे हैं और उसकी वजह से जो हमारा बाजार गिर रहा है वह भी कोई अच्छा संकेत नही दे रहा है। कुल मिलकर स्थिति इतनी उलझी हुई हो गयी है की हमे चीन के गिरते हुए बाजारों पर खुश होना चाहिए (जैसा की कुछ विशेषज्ञ कह रहे थे) या दुखी होना चाहिए। दूसरा हमारी सरकार की कोई भी नीति या नियत ऐसी नही दिखाई दे रही है जिसके कारण हमारे लोगों की खरीद शक्ति में कोई बढ़ौतरी हो और हमारी घरेलू मांग में बढ़ौतरी हो।
                       इसलिए ये कोई अपने आप टूट कर गिरने वाला फल नही है जो अपने आप हमारे आँगन में गिर जायेगा।

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Tuesday, September 1, 2015

शेयर बाजार को बाजार भरोसे क्यों नही छोड़ती सरकार ?

      
बहुत अजीब किस्म के हालात हैं। ये हालात ना केवल हमारे यहां हैं, बल्कि पूरी दुनिया में हैं। 1991 से पूरी दुनिया में बाजार आधारित अर्थव्यवस्था के समर्थक हर चीज को बाजार के भरोसे छोड़ देने पर जोर दे रहे हैं। उनका तर्क है की हर चीज बाजार को तय करने दो। धीरे धीरे बाजार हर चीज को ठीक कर देगा। इसके बाद पूरी दुनिया में सरकारों ने हर चीज को बाजार के भरोसे छोड़ देने का सैद्धांतिक फैसला कर लिया। कुछ देशों की सरकारें जो इससे असहमत थी उन्हें भी IMF और विश्व बैंक ने शर्तें रख कर इसके लिए मजबूर किया। बाजार अर्थव्यवस्था के हिमायती इस कदर हावी हो गए की उन्होंने देश की कुछ आधारभूत चीजों को भी बाजार के भरोसे छोड़ने की वकालत की और इसमें कामयाब भी रहे। जैसे उन्होंने कृषि उत्पादों के दाम भी बाजार के भरोसे छोड़ने और उसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की प्रणाली को खत्म करने की मांग की। यहां तक की उन्होंने तो न्यूनतम वेतन कानून भी खत्म करके उसे भी बाजार के भरोसे छोड़ देने की वकालत की। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत जरूरतों को तो बाजार के भरोसे छोड़ ही दिया सरकार ने।
                   
इन लोगों ने रूपये को भी पूर्ण परिवर्तनीय बनाने पर जोर दिया। हालाँकि अभी ऐसे लोगों की तादाद भी बहुत अधिक थी जो इसके खिलाफ थे। लेकिन जब शेयर बाजार और रुपया ओंधे मुंह गिरने की स्थिति में होता है तो यही लोग उसे बचाने के लिए सरकार से हस्तक्षेप करने के लिए दौड़े चले आते हैं। सरकार शेयर बाजार को गिरने से बचाने के लिए सभी सरकारी वित्तीय संस्थाओं को शेयर बाजार को गिरने से रोकने  के लिए बाजार में उत्तार देती है। जिसका असली मतलब ये होता है की इन संस्थाओं में जमा आम आदमी का पैसा शेयर बाजार के हवाले किया जा रहा होता है। कई बार ऐसा होता है की ये वित्तीय संस्थाएं शेयर बाजार और करेंसी को बचाने की कोशिश में खुद दिवालिया हो जाती हैं। शेयर बाजार को बचाने  लिए सरकार इस हद तक चली जाती है की पेंशन फंड में रखी मजदूरों की बचत को भी इसमें झोँक देती है।
                 
अभी हाल का उदाहरण हमारे सामने है। सरकार ने संसद में इन्स्योरंस बिल पास करके निजी कम्पनियों को इस सेक्टर में अपना हिस्सा बढ़ाने के रास्ते खोल दिए। इसका सबसे ज्यादा नुकशान LIC को ही होगा जो अब तक जीवन बीमा के क्षेत्र में लगभग एकाधिकार रखती है। LIC के पास प्रीमियम का जो पैसा जमा होता है वो कम ब्याज पर लम्बी अवधि के ऋण के रूप में सरकारी परियोजनाओं में लगता है। अब जब LIC का हिस्सा घटेगा तो सरकार को कम ब्याज पर और लम्बी अवधि के लिए मिलने वाला पैसा भी कम होगा। परन्तु सरकार देशी और विदेशी कम्पनियों के दबाव में इस सारी चीजों पर आँख मूंदने पर तैयार हो गयी। लेकिन जब सरकार पब्लिक सेक्टर के उद्योगों में विनिवेश करती है और उसे शेयर बाजार से समर्थन नही मिलता तब वो सारे शेयर खरीदने के लिए LIC पर दबाव डालती है और उसे मजबूर करती है की वो ये शेयर खरीदे। अभी भी जब सरकार ने इंडियन ऑयल के 10 % शेयर बेचने के लिए बाजार में रखे तो उसी दिन शेयर मार्किट 1600 अंक गिर गया। इंडियन ऑयल के शेयर की कीमतों को गिरने से बचाने के लिए उसने LIC को बाजार में उत्तर कर खरीददारी करने को कहा। और उस दिन इंडियन ऑयल के शेयर को गिरने से बचाने के लिए LIC ने  अरबों रूपये की खरीददारी की। इसी तरह कई बार LIC ने सरकार द्वारा बेचे जाने वाले पब्लिक सेक्टर के उद्योगों के कुल शेयरों का 70 से 95 % तक हिस्सा खरीदा।
                   
अब जब रुपया गिरकर 66 रूपये से नीचे चला गया तो रिजर्व बैंक के गवर्नर ने उसे गिरने से बचाने के लिए बाजार में हस्तक्षेप की घोषणा की। फिर सवाल ये आता है की ये कैसी बाजार अर्थव्यवस्था है जिसमे शेयर बाजार को तो सरकार बाजार के भरोसे नही छोड़ सकती और बाकि सारी जनता को उसने बाजार के भरोसे छोड़ दिया। पहले तो सरकारी वित्तीय संस्थाएं और बैंक शेयर मार्किट को बचाते बचाते खुद डूबने की स्थिति में आ जाते हैं, फिर उसमे रखे आम आदमी के पैसों का बहाना करके सरकार बजट में से उनको बेलआउट पैकेज देती है। यानि दूसरे तरीके से आम जनता का पैसा शेयर मार्किट में सट्टा करने वाले देशी और विदेशी कम्पनियों को खैरात में दे दिया जाता है। इस पर इस बाजार आधारित अर्थव्यवस्था का कोई पैरोकार विरोध नही करता।
                      कुल मिलाकर मामला ये है की बहाना किसी भी चीज का हो, सरकार का उद्देश्य केवल आम आदमी की जेब से पैसा निकाल के बड़े लोगों की जेब में डालना होता है।

Friday, August 28, 2015

क्या ये भारतीय मजदूर आंदोलन का सक्रांति-काल है।


bannar of all india strike sfi-dyfi photo of a procession
2 सितंबर को होने वाली अखिल भारतीय हड़ताल की जिस तरह से तैयारियां हो रही हैं और जो खबरें आ रही हैं, उससे ये साफ हो गया है की ये भारत की अब तक की सबसे व्यापक हड़ताल होगी। इस तरह की व्यापक एकता इससे पहले भारतीय मजदूर आंदोलन में इससे पहले कभी नही देखी गयी। असल बात तो ये है की पिछले 25 सालों से भारत का मजदूर आंदोलन एक ऐसे मोड़ पर आकर खड़ा हो गया था जिससे आगे बढ़ने का रास्ता मिलना तो दूर की बात, अपने अस्तित्व की लड़ाई ही लड़ रहा था।
                1980 के दशक में जब भारी आर्थिक संकट के बाद विकासशील देशों को IMF और विश्व बैंक के पास सहायता के लिए जाना पड़ा तो उस सहायता पैकेज के साथ कुछ शर्तें भी नत्थी हो कर आई। इन शर्तों में निजीकरण की शर्त प्रमुख रूप से शामिल थी। सभी सरकारों ने सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों के निजीकरण का सिलसिला शुरू किया। इसके साथ ही श्रम कानूनो में छूट दी जाने लगी।
      
man holding play card saying imf-trapping countries in debt
   उसके बाद 1991 में आर्थिक सुधारों का दौर आया। इसमें निजीकरण के साथ ही वैश्वीकरण और उदारीकरण भी शामिल था। सरकार ने आर्थिक पुनर्संगठन के साथ ही SAP ( Structural Adjustment Programme ) शुरू किया। इसमें सभी तरह के उद्योगों के मैनेजमेंट बोर्ड में निजी क्षेत्र के लोगों को भरा जाने लगा। इस प्रोग्राम ने बड़े पैमाने पर बेरोजगारी में बढ़ौतरी की। साथ की रोजगार के क्षेत्र में स्थाई श्रमिकों की जगह ठेकेदारी प्रथा, अस्थाई मजदूर और पार्ट टाइम मजदूरों की संख्या बढ़ने लगी। बड़े पैमाने पर काम का आउटसोर्सिंग किया जाने लगा। इससे पब्लिक सैक्टर के उद्योगों में ट्रेड यूनियनों पर अस्तित्व का संकट आकर खड़ा हो गया।
                   इसके बाद उद्योगों में ट्रेड यूनियनों की बारगेनिंग पावर ( मोलभाव की ताकत ) घटने लगी। इसका प्रभाव ये हुआ की मजदूरों का विश्वास ट्रेड यूनियनों पर कम होने लगा। दूसरी तरफ उदारीकरण के समर्थक देश के नौजवानो  सब्जबाग दिखा रहे थे। उन्हें विकास के झूठे माडल दिखाए  जाने लगे। एक दौर ऐसा भी था जब आईटी क्षेत्र और मार्केटिंग के क्षेत्र में नौजवानो को काम भी मिला। इन क्षेत्रों में भले ही कोई श्रम कानून लागु नही थे लेकिन वेतन का स्तर ऊँचा था। नई पीढ़ी को उसमे ही रास्ता नजर आने लगा। लेकिन इसका बहुत जल्दी ही अंत दिखाई देने लगा। जिस बड़े पैमाने पर नए बेरोजगार कतारों में शामिल हो रहे थे, और जिस बड़े पैमाने पर लोगों को नौकरियां जा रही थी उससे संकट बढ़ने लगा।
                 
wemans procession of citu
उससे निपटने के लिए वामपन्थी ट्रेड यूनियनों की पहल पर NCC ( National Compagain Committee ) की स्थापना हुई। लेकिन सभी बड़ी ट्रेड यूनियनों के इस साझा मंच से भारतीय मजदूर संघ और इंटुक अलग रह गयी। उन्हें अभी तक सरकारों के आश्वासन पर भरोसा था। साथ ही शासन में रहने वाली दोनों बड़ी पार्टियां कांग्रेस और बीजेपी का उन पर सांगठनिक प्रभाव भी था। इस दौरान उदारीकरण की नीतियों के विरोध में कई हड़तालें और आंदोलन हुए। लेकिन हर बार कभी इंटुक और कभी भारतीय मजदूर संघ उससे अलग रहे। वामपन्थी ट्रेड यूनियनें इस अभियान को जारी रखे रही। एक समय ऐसा आया की इंटुक और भारतीय मजदूर संघ से संबंधित यूनियनों के मजदूरों ने अपनी एफिलिएशन से अलग जाकर वामपंथी आंदोलनों में शिरकत की। उसके बाद इन यूनियन के नेताओं में पुनर्विचार का दौर शुरू हुआ। साथ ही अब तक सरकार के सभी आश्वासनों और दावों की हवा निकल चुकी थी। पितृ पार्टियों से मजदूर संगठनो के मतभेद गहराने लगे। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के वित्त मंत्री यशवन्त सिन्हा और भारतीय मजदूर संघ के नेता दत्तोपंत ठेंगडी का विवाद सबको मालूम है।
                 
dharna of labour at railway track
  अब तक सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग एक महागठबंधन का निर्माण कर चुके थे। इस गठबंधन में भारतीय मजदूर संघ और इंटुक दोनों से संबंधित यूनियन भी शामिल थी। इस महागठबंधन की कार्यवाहियां कई जगह विजयी हस्तक्षेप करने में कामयाब रही। अब मजदूर संगठनो ने असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की लामबंदी शुरू की। कई ऐसे क्षेत्र जिनमे आंगनवाड़ी में काम करने वाली महिलाओं से लेकर निर्माण मजदूरों तक,  बड़ी संख्या में मजदूर लामबंद हुए। संगठित क्षेत्र में यूनियनों को जो नुकशान उठाना पड़ा था उसकी भरपाई इससे हो गयी। मजदूर संगठनो की कतारें बढ़ने लगी और उनका प्रतिरोध भी बढ़ने लगा।   एकता के कारण मजदूरों का विश्वास इन संगठनो पर बढ़ा और उनमे नए होंसले का संचार हुआ।
                     
communist party logo of hansiya and hatouda
  इसके बाद आई ये 2 सितंबर की अखिल भारतीय हड़ताल। केन्द्रीय मजदूर संगठनो की भागीदारी के मामले में इस हड़ताल को अब तक के सबसे व्यापक संगठनो का समर्थन प्राप्त है। इसके साथ ही विभिन्न छात्र और नौजवान संगठनो से लेकर, किसानो और महिलाओं के संगठनो तक ने इस हड़ताल में शामिल होने की घोषणाएँ की हैं। संगठनो के मामले में इतना व्यापक समर्थन इससे पहले कभी देखने को नही मिला। जाहिर है की ये शायद अब तक की सबसे बड़ी हड़ताल साबित हो। इस हड़ताल को सभी केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के अलावा सभी पब्लिक सैक्टर के उद्योगों के संगठनो के साथ साथ बीमा और बैंक जैसे वित्तीय क्षेत्रों की सभी यूनियन भी शामिल हैं। इस हड़ताल को राज्य सरकारों की बिजली और यातायात जैसी लगभग सभी यूनियनों का समर्थन भी प्राप्त है।
                   
            इसलिए हो सकता है की ये हड़ताल भारतीय मजदूर आंदोलन का नया सक्रांति-काल साबित हो।
                             

Thursday, August 27, 2015

अगर सबकुछ सही है तो प्रॉपर्टी क्यों बेच रही है सरकार ?


विकास के नेहरू मॉडल और मिश्रित अर्थव्यवस्था के दौर में हमारे देश में पब्लिक सेक्टर की स्थापना हुई। लेकिन ये क्षेत्र कुछ लोगों की आँखों में खटकता रहा। लेकिन हैसियत ना होने के कारण वो दिल पर पत्थर रखे रहे। आहिस्ता आहिस्ता जब हैसियत बढ़ी तो उन्होंने इस पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। जैसे जैसे उनकी हैसियत बढ़ती रही उनके सवाल भी मुखर होते रहे। सरकार केभृष्टाचार और भाई भतीजावाद के चलते पब्लिक सेक्टर के कुछ उद्योग घाटे में चलने लगे तो उनका हो-हल्ला और बढ़ गया। उन्होंने पुरे पब्लिक सेक्टर को सफेद हाथी बताना शुरू कर दिया। सरकार पर पब्लिक सेक्टर के उद्योगों को ओने-पौने दामो में बेचने का दबाव बनाया जाने लगा। इसके लिए मुख्य तौर पर दो तर्क दिए जाने लगे।
१.  सरकार का काम व्यापार करना नही बल्कि लोगों को सामाजिक सुरक्षा देना और कानून व्यवस्था बनाये रखना होता है।
२. घटे में चलने वाले पब्लिक सेक्टर के उद्योग सरकार और जनता पर बोझ हैं, इस बोझ से जितना जल्दी पीछा छुड़ा लिया जाये उतना ही बेहतर होगा।

               उसके बाद शुरू हुआ पब्लिक सैक्टर के उद्योगों का बेचना। ये उद्योग किसी भी सरकार और देश की जनता की पूंजी होते हैं उन्हें बोझ की तरह निपटाया जाने लगा। सरकार ने पहले देशी पूंजीपतियों और फिर विदेशी पूंजीपतियों को ये उद्योग लूटा दिए। इसके लिए सरकार ने एक फार्मूला बनाया जिसे कुछ लोग देश बेचने का फार्मूला भी कहते हैं। 26 -49 -74 -100 का फार्मूला।
               जब भी किसी क्षेत्र को विदेशी कम्पनियों के हवाले करना होता तो सरकार कहती की केवल 26 % हिस्सेदारी बेचीं जा रही है। और वो भी पूंजी की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए। 26 % हिस्सेदारी खरीद कर कोई विदेशी कम्पनी हमारा क्या बिगाड़ लेगी।
                 उसके बाद 49 % हिस्सेदारी बेचने का फैसला कर लिया जाता। अबकी बार तर्क दिया जाता की हमारे पास 51 % हिस्सेदारी रहेगी। इसलिए मैनेजमेंट तो हमारी ही होगी। सो देश को चिंता करने की कोई जरूरत नही है।
                   तीसरा दौर 74 % का आता। इस पर पूंजी की कमी का रोना रोया जाता। बाहर से उन्नत तकनीक और बेहतर मैनेजमेंट आने की दुहाई दी जाती और ये भी कहा जाता की चूँकि हमारी हिस्सेदारी इसमें रहेगी इसलिए विदेशी कम्पनी मनमाने फैसले नही कर पायेगी।
                    अब अंतिम दौर आता 100 % हिस्सेदारी का यानि मुकम्मल तौर पर बेच देने का। अब कहा जाता की सारे फैसले तो व्ही कम्पनी ले रही है। सरकार को कोई फायदा नही हो रहा है इसलिए इसे बेच देते हैं और इस पैसे को दूसरे पब्लिक सेक्टर के उद्योगों को मजबूत करने में लगा  देते हैं। इससे दूसरे उद्योग अच्छा काम कर पाएंगे। लोगों को सांत्वना दी जाती। और इस फार्मूले के तहत आधा देश बेच दिया।

                     सरकार तर्क देती की गरीबों के लिए काम करने को पैसा चाहिए। ये पैसा गरीबी दूर करने की योजनाओं में लगाया जायेगा। सरकार का काम लोगों को सामाजिक सुरक्षा और आधारभूत सुविधाएँ मुहैया करवाना होता है और सरकार अब उन पर ध्यान देगी।
                                   लेकिन हुआ क्या ?
                   सरकार ने पहले सड़कों को बनाने का काम निजी क्षेत्र को दे दिया। लो भाई, सड़क बनाओ और टोल टैक्स वसूल करो। बहाना बनाया की सरकार के पास इतना पैसा नही है। उसके बाद स्कूलों को निजी हाथों में दिया जाने लगा। कोई नया स्कुल और कालेज बनाना सरकार ने बंद कर दिया। निजी कालेजों और युनिवर्सिटियों को बढ़ आ गयी। सरकारी हस्पतालों को प्राइवेट किया जाने लगा। एक एक करके जितनी भी सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने वाली वस्तुएं थी सबसे सरकार ने अपना हाथ खिंच लिया। जो लोग कभी ये कहते थे की सरकार का काम व्यापार करना नही बल्कि लोगों को सुविधाएँ मुहैया करवाना होता है, अब कहने लगे की प्रयोग करने वाले को पैसा देना ही चाहिए ,यूजर्स पे का नारा कब आया मालूम ही नही चला।

                     दो दिन पहले सरकार ने इंडियन ऑइल का 10 % हिस्सा बेचने को बाजार में रख दिया। इंडियन ऑइल देश की नवरतन कम्पनी है और भारी मुनाफे में चलती है। सरकार का अनुमान है की इससे सरकार को करीब 9000 करोड़ रुपया मिल जायेगा। ये लोगों की प्रॉपर्टी है। सरकार को ऐसी क्या मजबूरी है जो उसे अपनी प्रॉपर्टी बेचनी पद रही है। और वो भी तब जब सरकार दावा कर रही है की उसने 2G की बोली लगाकर 2 लाख करोड़ रुपया इकट्ठा कर लिया है। और उसने कोयला खदानों की बोली लगाकर 3 लाख करोड़ रुपया इकट्ठा कर लिया है। दूसरे सारे टैक्स तो अपनी जगह हैं ही। एक तरफ प्रधानमंत्री बिहार के लिए एक लाख पैसंठ हजार करोड़ का पैकेज इस तरह घोषित कर रहे हैं जैसे किसी की लड़की की शादी में 100 रुपया कन्यादान डाल रहे हों। दूसरी तरफ नौ हजार करोड़ इकट्ठा करने के लिए नवरत्न कम्पनी का हिस्सा बेचा जा रहा है।
                   1990के बाद जो LPG का दौर ( Liberalization-Privatization-Globalization ) आया उसके बाद पूंजीवाद अपने असली रूप में सामने है। उसे अब कल्याणकारी राज्य के मुखौटे की जरूरत नही है। वो किसी के पास कुछ भी नही छोड़ देना चाहता। उसने लोगों के सपने छीन कर सेल लगा दी। अब बेहतर जिंदगी का सपना देखने की कीमत चुकानी पड़ती है। उसने राष्ट्रों की संप्रभुता छीन ली। अब उसे अपने लोगों के लिए फैसले लेने से पहले विश्व बैंक की अनुमति लेनी पड़ती है। उसने मजदूरों से इन्सान होने केवल हक ही नही अहसास भी छीन लिया। वो किसानो से उनकी जमीन छीन रहा है। वो राज्यों से असहमति का हक छीन रहा है। उसने लोगों की सारी सम्पत्ति चाहे वो सामूहिक रूप से राष्ट्र के पास हो या व्यक्तिगत हो छीन लेनी है। आज का पूंजीवाद पहले से ज्यादा नंगे रूप में सामने है। 

Tuesday, August 25, 2015

अवसर - जो हमने खो दिया। ( The opportunity that we have lost.)

आर्थिक क्षेत्र में हर राष्ट्र और समुदाय के सामने कुछ अवसर आते हैं। इन अवसरों का निर्माण कब और किन कारणों से होता है ये उस समय की परिस्थितियों पर निभर करता है। हमारा देश पिछले कुछ समय में एक सर्विस इकोनॉमी बनकर उभरा है। इसके पीछे जो प्रमुख कारण माना जाता है वो हमारे देश की जवान जनसंख्या को माना जाता है। कहा जाता है की इतनी बड़ी तादाद में नौजवान लेबर दुनिया में किसी देश के पास उपलब्ध नही है। कुछ लोगों को ये शर्म की बात लगती है तो कुछ लोगों को ये अवसर लगता है। पिछले कुछ सालों में कम्प्यूटर के क्षेत्र में जो हमारे युवा इंजीनियर बाजार में आये और हमारी कम्प्यूटर सेवा उपलब्ध करवाने वाली कम्पनियों ने पूरी दुनिया में इस कारोबार पर जो कब्जा करने की कोशिश की और उसके बाद विश्व की बड़ी कम्पनियों ने इस क्षेत्र में हमारे अपेक्षाकृत सस्ते श्रम का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया, उससे इस क्षेत्र में हमे नंबर एक पर मान लिया गया। लेकिन सर्विस इकोनॉमी आधारभूत रूप से एक परजीवी इकोनॉमी की तरह होती है। इसकी बढ़ौतरी उत्पादन के क्षेत्र की कम्पनियों की बढ़ौतरी पर सीधे रूप में निर्भर करती है। जैसे ही विकसित देशों में मंदी का दौर आया, हमे ये समझ में आ गया की केवल सर्विस बेचने के सहारे काम चलने वाला नही है। फिर हमारा ध्यान मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की तरफ गया। पिछले कुछ सालों में इस क्षेत्र पर चीन का दबदबा है। उसके सस्ते उत्पादों का मुकाबला दुनिया का कोई भी देश नही कर पा रहा है। लेकिन उसमे भी अब मंदी के लक्षण दिखाई दे रहे हैं।
                   उत्पादन क्षेत्र की मंदी ने पूरी दुनिया में धातु बाजार में मांग ना होने के चलते भारी गिरावट पैदा की। उसके साथ ही उसने सबसे ज्यादा मंदी कच्चे तेल की कीमतों में पैदा की। कभी 140 $ बैरल के भाव से बिकने वाला तेल कुल 40 $ प्रति बैरल से भी नीचे आ गया। इन दोनों क्षेत्रो में हम भारी मात्रा में आयात करते हैं। हमारा आयात बिल एकदम नीचे आ गया। हमारी अर्थव्यवस्था को मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में आगे बढ़ाने के लिए ये हमारे लिए एक स्वर्णिम अवसर था। किसी भी देश के उत्पादन को दूसरे देशों के मुकाबले सस्ता बनाने के लिए उसमे खर्च के जो जो कारक होते हैं उनमे मुख्य तौर पर एक होता है सस्ती श्रम शक्ति, और दूसरा होता है सस्ती ऊर्जा। विश्व बाजार में गिरते हुए तेल के दामों ने हमे ये अवसर उपलब्ध करवाया था। पूरी दुनिया में तेल की मांग कम होने के कारण तेल कंपनियां दबाव में हैं। अब उनके साथ कम कीमत पर लम्बी अवधि के करार करना पहले से ज्यादा आसान हैं। हमारी सरकार उनके साथ कम कीमत के करार करके और घरेलू बाजार में तेल की कीमतें आधी करके उद्योगों की उत्पादन लागत घटा सकती थी। इसके साथ ही वो उद्योगों को भी लम्बी अवधि तक कम कीमतों का भरोसा दे सकती थी। उससे जो उद्योग अभी कोयले या बिजली का उपयोग ईंधन के रूप में करते हैं, वो तेल या गैस पर शिफ्ट हो सकते थे। इससे हमारे उद्योगों का ऊर्जा बिल तो कम होता ही, माल ढुलाई के क्षेत्र में भी क्रांति हो सकती थी। रेल का माल ढुलाई भाड़ा कम हो सकता था। सड़क परिवहन का माल भाड़ा कम हो सकता था। गैस आधारित बिजली कारखानों का खर्च कम होने से बिजली के रेट कम हो सकते थे। और हमारी सस्ती शर्म शक्ति के साथ मिलकर ये हमारे उत्पादन की लागत को इतना कम कर सकते थे की हमारा माल अंतर्राष्ट्रीय बाजार में एक चुनौती बनकर उभर सकता था। 
                स्टील उत्पादन जैसे क्षेत्र में, जिसमे हम पहले ही बहुत आगे तो हैं लेकिन कीमतों के मामले में चीन की चुनौती का मुकाबला नही कर पा रहे हैं। चीन हमारे यहां से कच्चा लोहा आयात करता है। अगर ऊर्जा की कीमतें कम होती, जो स्टील उत्पादन में बहुत बड़ा कारक होती है, तो कच्चे माल की उपलब्धता और हमारी सस्ती लेबर के साथ मिलकर इस क्षेत्र में हमे चुनौती विहीन बना सकते थे। 
                   लेकिन अफ़सोस, हमारी सरका ने अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की गिरती हुई कीमतों का उपयोग अपनी टैक्स कलेक्शन बढ़ाने के लिए किया। और मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र को केवल " मेक इन इंडिया " जैसी घोषणाओं के भरोसे छोड़ दिया। हमारी सरकार पूरी दुनिया के उद्योगपतियों को हमारे यहां उद्योग लगाने के लिए आमंत्रित कर रही है, वो भी केवल सस्ती लेबर का नारा देकर। इसके लिए हम सभी तरह के श्रम कानूनों में छूट देने, या यों कहें की खत्म करने को तैयार हैं। अगर हमारे लोगों के पास पैसे ही नही होंगे तो उनकी खरीदने की शक्ति भी नही होगी। इससे उद्योगों का माल नही बिकेगा। और मंदी का एक साईकिल शुरू हो जायेगा। केवल निर्यात पर निर्भरता हमे आज के चीन जैसी स्थिति में पहुंचा सकते हैं। 
                  ये वो अवसर था जो हमारे देश की कायापलट कर सकता था और लेकिन हमारी सरकार ने उसे तात्कालिक टैक्स कलेक्शन के लिए इस्तेमाल करके बर्बाद कर दिया।
                   

Monday, August 24, 2015

कॉर्पोरेट का इरादा केवल लूट करने का है।

            एक बात बहुत ही हास्यास्पद लगती है, और इसका कोई दूसरा लॉजिक कभी भी मेरी समझ में नही आया। प्राईवेट कंपनियां और कॉर्पोरेट जगत हमेशा पब्लिक सेक्टर के उद्योगों के निजीकरण की मांग करता है। इसके लिए वो तरह तरह के तर्क-कुतर्क करता है। परन्तु क्या हमारे देश में नए उद्योग लगाने पर पाबंदी है। जब कोई भी उद्योगपति नया उद्योग लगा सकता है तो उसे पब्लिक सेक्टर के उद्योग ही क्यों चाहिए ?
             लेकिन उसे पब्लिक सेक्टर के उद्योग ही चाहियें। क्योंकि ये उद्योग उसे कोडियों के भाव चाहियें। जनता के पैसे से बनाई गयी और जनता के पसीने से सींची गयी कंपनियां चाहियें मुफ्त के भाव। जब भी किसी सरकारी उद्योग का निजीकरण किया जाता है तो उसकी सही कीमत निकालने का नाटक किया जाता है। उसके लिए विशेषज्ञों की टीम बनाई जाती है। इस टीम में निजी रेटिंग एजेंसियों के लोग होते हैं जो उसकी कीमत इतनी कम लगाते हैं की वो उसकी सही कीमत के आसपास भी नही बैठती। इस सारे फर्जीवाड़े को बड़े शानदार ढंग से अंजाम दे दिया जाता है। सरकार और कम्पनी खरीदने वालों के बयान आते हैं की पूरी कीमत दी गयी है। अब साबित करते रहो की कीमत पूरी नही है। जब सरकार खुद चोर के साथ मिली हुई हो तो चोरी साबित करना बहुत मुश्किल होता है। सेंटूर होटल जैसे उदाहरण हमारे सामने हैं। 
                दूसरा कारण जो पब्लिक सेक्टर की कम्पनियों को खरीदने के लिए होता है वो है उस क्षेत्र से सरकारी प्रतियोगिता का समाप्त हो जाना और एकाधिकार कायम करना। पहले हमारे देश में एक MRTP एक्ट होता था जो किसी भी क्षेत्र में एकाधिकार को रोकने के लिए कदम उठाता था। अब उसे भी खत्म कर दिया गया। रेशा बनाने वाली इकलोती पब्लिक सेक्टर की कम्पनी IPCL को उसके ही प्रतिद्वंदी रिलायंस को बेच दिया गया। अब इस क्षेत्र में रिलायंस का लगभग एकाधिकार है। जो दूसरे छोटे खिलाडी हैं भी तो उन्हें हर मामले में रिलायंस का अनुकरण करना पड़ता है। 
                भारतीय कॉर्पोरेट सेक्टर लगभग हमेशा ही करों में हेराफेरी और कानून कायदों के दुरूपयोग के भरोसे रहा है। वह ईमानदारी से कोई उद्यम स्थापित करने और चलाने के बजाय सरकारी सम्पत्ति के लूट पर नजरें गड़ाए रहता है। इस निजी क्षेत्र को पब्लिक सेक्टर से ज्यादा कुशल और ज्यादा योग्य माना जाता है। लेकिन आज यही सेक्टर है जो थोड़ी सी प्रतिकूल बाजार अवस्था होते ही बैंकों के लोन की पेमेंट नही कर रहा है। लाखों के टैक्स बाकि के केसों को अदालती प्रावधानों का दुरूपयोग करके लटकाए हुए है। और इसमें उसे सरकार का पूरा सहयोग हासिल है। करीब 250000 कारखाने बंद कर चूका है और अब भी ज्यादा कुशल कहलाता है। अगर ये सेक्टर इतना ही कुशल है और पूरी कीमत देकर पब्लिक प्रॉपर्टी को खरीदना चाहता है तो उसे नए उद्योग लगाने चाहियें, इससे देश में निवेश भी बढ़ेगा और रोजगार और उत्पादन भी बढ़ेगा।

Sunday, August 23, 2015

Vyang -- अब बिल्ली करेगी आपके दूध की रखवाली।

खबरी -- ये " पेमेन्ट बैंक " क्या बला है ?

गप्पी -- पिछले दिनों की कुछ बहुत ही महत्त्वपूर्ण खबरों पर एक नजर डालिये। एक खबर आई की देश के टैक्स का दो लाख सत्रह हजार करोड़ रुपया केवल सत्रह लोगों पर बकाया है। धन्य हो। ऐसे लोगों की तो पूजा होनी चाहिए। हालाँकि सरकार ऐसे लोगों की पूजा कर भी रही है। इनमे से कई लोग प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं में सम्मानित प्रतिनिधियों की तरह शामिल रहते हैं। उनका सम्मान होता है और उनकी अय्यासी का खर्चा इस देश की गरीब जनता उठाती है। 
                       दूसरी महत्त्वपूर्ण खबर ये आई की देश के सरकारी बैंको का छः लाख करोड़ रुपया लगभग डूब गया है। ये लगभग शब्द जो है उसकी खोज जोर का धक्का आहिस्ता से लगने के लिए की गयी थी। वरना लगभग का कोई मतलब नही है। असली खबर ये है की छः लाख करोड़ रुपया डूब चूका है। ये कौन बेचारे भाई हैं जो बैंको से लोन लेकर उसे चूका नही पाये। इनमे कई तो ऊपर वाले सत्रह लोगों में ही हैं। जो बाकि बचे वो इनके भाई बंधु , घर परिवार वाले और इन जैसे ही कुछ दूसरे महानुभाव हैं। बेचारा आम आदमी तो बैंक का सौ रुपया नही चुका पाये तो उसके खिलाफ FIR हो जाती है। बैंक की उगाही करने वाली जीप उनका खेतों तक पीछा करती है। और तब तक करती रहती है जब तक या तो वो पैसा दे दे या आत्महत्या कर ले। 
                       ऊपर के दोनों कुकर्मों के लिए हमारा निजी क्षेत्र जिम्मेदार है। जिसके सम्मान में सारा देश दुहरा हुआ रहता है। जिससे कोई सवाल नही पूछता। जिस का अपना मीडिया है, अपने एक्सपर्ट हैं, अपनी सरकार है और अपने नासमझ समर्थक हैं। ये व्ही निजी क्षेत्र है जिसे सारी आर्थिक बिमारियों का इलाज बताया जाता है। अब इसके लिए सरकार ने एक बहुत ही बढ़िया स्कीम बनाई है। 
                        हमारे रिजर्व बैंक ने इन्हे "पेमेंट बैंक" के नाम से बैंक खोलने की अनुमति दे दी है। ये बेचारे कुछ दिनों से बहुत परेशानी में थे। उद्योगों में मंदी का माहौल चल रहा है। बैंकों का जो पैसा खाया जा सकता था खा चुके हैं। टैक्स का जो पैसा हजम हो सकता था कर चुके हैं। बैंकों से नया लोन लेने के लिए भी कोई बहाना चाहिए भले ही कितना ही कमजोर क्यों न हो। अब इस बेचारे निजी क्षेत्र का विकास रुक गया। इसके बच्चे दो लाख रूपये रोज के किराये की होटलों में कैसे रुकेंगे। पत्नी की सालगिरह पर हवाईजहाज कैसे गिफ्ट में दिया जायेगा ? हजार-हजार करोड़ के मकान कैसे बनेंगे। उनकी इस परेशानी को देखते हुए सरकार ने इन्हे ही सीधे सीधे बैंक खोलने का परोक्ष अधिकार दे दिया। लो भाई, खुद पैसा इकट्ठा करो और खुद हजम करो। किस्से पैसा इकट्ठा करो ? अरे भई आम लोगों से, जो दूर के गांव में रहते हैं, दूसरी जगहों पर जाकर मजदूरी करते हैं और जहां कोई बैंक अपनी शाखा नही खोलना चाहता। ये सारा काम आपके मोबाईल पर कर देंगे। आपको ना बैंक जाने की जरूरत पड़ेगी और ना खाता खुलवाने के लिए सबूत देने की जरूरत पड़ेगी। अपनी छोटी छोटी  बचतों को इन बिल्लियों की रखवाली में रखिये और मलाई आने का इंतजार कीजिये। 
                         देश के ये बेचारे गरीब उद्योगपति हर रोज पैसा मांगने बैंक में जाएँ ये इनके सम्मान के खिलाफ है। बैंको में जो पैसा होता है वो भी जनता का ही होता है। ये बैंकों का पैसा खाते  रहते हैं फिर सरकार जनता के बजट में से पूंजी के नाम पर और पैसा डालती रहती है ये फिर खा लेते हैं। अब इस झंझट से छुटकारा मिल जायेगा सरकार को भी और इन बेचारी कम्पनियों को भी। आम जनता का पैसा ही खाना है तो भाई सीधे खाओ ना, सरकार को बीच में क्यों डालते हो।

Wednesday, August 19, 2015

GST बिल अलोकतांत्रिक,संघीय प्रणाली के खिलाफ और अमीरों और बड़ी कम्पनियों के फायदे में है।

मैंने GST बिल पर कुछ दिन पहले लिखे अपने लेख में इस बिल के महंगाई बढ़ाने वाले और लघु उद्योग पर इस बिल के दुष्प्रभावों पर रौशनी डालने का प्रयास किया था। मेरा ये लेख इसी ब्लॉग में "GST बिल घोर जनविरोधी, भयंकर महंगाई बढ़ाने वाला और लघु उद्योगों की मौत का फरमान है" 
के नाम से उपलब्ध है। इस लेख में मैंने इस बिल के कुछ व्यवहारिक पहलुओं पर लिखने की कोशिश की थी। उसी दिन शाम को NDTV पर एक टीवी बहस में देश के जाने माने अर्थशास्त्री प्रो अरुण कुमार ने उन सवालों की पुष्टि की। उसके बाद GST के सवाल पर कई तरह की टीवी बहसें भी हुई और कुछ राजनितिक पार्टियों के बयान भी आये। इसी क्रम में एक बहुत ही जानकारी पूर्ण लेख पीपुल्स डेमोक्रेसी में छपा है। ये लेख भी देश के जाने माने अर्थशास्त्री और केरल योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे श्री प्रभात पटनायक ने लिखा है। ये लेख "The Debate on GST" के नाम से छपा है। इस लेख में आदरणीय प्रभात पटनायक साहब ने इस बिल के सैद्धांतिक पहलुओं को उजागर किया है। इस लेख से मेरे द्वारा उठाये गए कुछ सवलों की पुष्टि भी होती है। इस लेख में मुख्य तौर पर दो सवालों को उठाया गया है। 

१. अलोकतांत्रिक प्रणाली लाने की कोशिश 

           अपने लेख में उन्होंने ये महत्त्वपूर्ण सवाल उठाया है की इस बिल के बाद जो टैक्स प्रणाली लागु होगी वो लोगों के जनतांत्रिक अधिकारों को और उनकी  चुनाव करने के विकल्पों को सिमित करेगा। इसको ठीक तरह से इस प्रकार समझा जा सकता है। अब तक लोगों के पास अलग राजनैतिक और आर्थिक विचारधारा वाली पार्टियों को चुनने का विकल्प है। इस प्रणाली के बाद राज्य में सरकार में आने वाली किसी भी पार्टी के लिए ये असम्भव हो जायेगा की वो किसी भी जरूरत मंद तबके को किसी भी तरह की टैक्स छूट देकर राहत दे सके। अब तक राज्य सरकारें अपनी आर्थिक  और राजनैतिक नीतियों के अनुसार टैक्स की दरें तय करती हैं। जिनमे जीवन के लिए जरूरी वस्तुओं पर ये दर कम रखी जाती है और कुछ विलासिता की वस्तुओं पर टैक्स लगाकर उस नुकशान की भरपाई कर ली जाती है। GST की प्रणाली लागु होने के बाद सभी वस्तुओं पर सभी राज्यों में एक समान कर होगा और राज्य सरकार चाहे भी तो इसमें कोई बदलाव नही कर सकती। एक तरफ ये रोक राज्य सरकार के अधिकारों को बाधित करता है तो दूसरी तरफ लोगों के अपनी मर्जी का विकल्प चुनने के अधिकार को भी बाधित करता है। लोग चाहें किसी को भी चुने टैक्स की दर में कोई परिवर्तन नही हो सकता। 

२. अमीरों को राहत देने की प्रणाली 

           दूसरा महत्त्व पूर्ण सवाल जो इसमें उठाया गया है वो ये है की GST लागु होने के बाद टैक्स की दरों में एक समानता (uniformity ) आ जाएगी। जिससे अमीरों द्वारा खरीदे जाने वाले विलासिता के  सामान पर टैक्स की दर जो अभी ज्यादा हैं वो कम हो जाएगी, और गरीबों के जीवन जरूरत की चीजों पर अभी जो कम दर है वो बढ़ जाएगी। इसलिए ये बिल गरीबों के हितों के खिलाफ और अमीरों के हितों के अनुसार होगा। इस तरह की (uniformity ) अंतिम तौर पर गरीबों के खिलाफ ही होगी। 
                         इस लेख में कुछ दूसरी महत्त्वपूर्ण बातें भी हैं। लेकिन मैं केवल उन्ही पहलुओं को उठा रहा हूँ जो इस लेख के लिए जरूरी हैं। 

लघु उद्योगों के खिलाफ और बड़ी कम्पनियों के फायदे में ---

                    जिस  (uniformity ) का जिक्र श्री प्रभात पटनायक साहब जरूरत और विलासिता की वस्तुओं के संदर्भ में कर रहे हैं उसी (uniformity ) की बात मैं लघु उद्योग और बड़े उद्योगों के संदर्भ में कर रहा हूँ। GST की नई टैक्स प्रणाली लागु होने के बाद लघु उद्योगों को मिलने वाली छूट केवल कागजों में रह जाएगी और उसका कोई व्यवहारिक मतलब नही रह जायेगा। इसकी पूरी तफ्सील मैंने अपने पिछले लेख में दी है। ये बिल लघु उद्योग को बर्बाद करने के बड़े उद्योग के षड्यंत्र का हिस्सा है जिसे समझने की जरूरत है।