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Thursday, March 16, 2017

भारत में राजनैतिक सवालों पर कॉरपोरेट मीडिया का बदलता रुख।

                     अभी कुछ साल पहले की ही बात है की भारत का कॉरपोरेट मीडिया इस बात पर बहस करता था की चुनाव के बाद में बने हुए गठबंधन ( Post poll alliance ) अनैतिक होते हैं और की इस तरह के गठबंधन चुनाव से पहले ( Pre poll alliance)  होने चाहिए। तब भी वो कोई राजनीती में अनैतिकता के सवाल पर चिंतित नही था। उसकी तब की चिंता थी वामपंथ के समर्थन से बनने वाली UPA सरकारें। तब भारत का कॉरपोरेट क्षेत्र वामपंथ को अपने रस्ते की बड़ी रुकावट मानता था। इसलिए किसी भी तरह वो इस गठबंधन और समर्थन को अनैतिक सिद्ध करने पर लगा रहता था।
                     उसके बाद स्थिति बदली। बीजेपी की सरकारों का दौर शुरू हुआ।  कॉरपोरेट की पसन्दीदा सरकारें थी। इसलिए इनके सारे कारनामो को या तो मजबूरीवश लिए गए फैसले बताना शुरू किया, अगर ये सम्भव नही हुआ तो इतिहास से दूसरे अनैतिक उदाहरण ढूंढे गए और उन्हें सही सिद्ध किया जाने लगा। जब बीजेपी ने जम्मू कश्मीर में पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बनाई, तो राजनैतिक इतिहास के इस सबसे अवसरवादी फैसले को इस तरह पेश किया गया गोया इसके बिना तो देश बर्बाद हो जाता। उस दिन के बाद आपको कभी भी किसी भी न्यूज़ चेंनल पर Post Poll Alliance or Pre Poll Alliance पर कोई चर्चा नही मिलेगी।
                      उसके बाद महाराष्ट्र का उदाहरण सामने आया। किस तरह सत्ता में साझेदार दो पार्टियां एक दूसरे के खिलाफ जहर उगलती हैं और मलाई में हिस्सेदार भी हैं। उसके बाद ये बहस भी मीडिया से समाप्त हो गयी की क्या एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ने वाली दो मुख्य पार्टियां आपस में मिलकर सरकार बना सकती हैं या नही।
                     और अब ताजा उदाहरण है गोवा चुनाव का। जिसमे सभी तरह की नैतिकता और संवैधानिक तरीकों को ताक पर रखकर बीजेपी ने सरकार बना ली। इस मामले पर मीडिया की कवरेज लाजवाब थी।  सारी चीजों को छोड़कर मीडिया बहस को यहां ले आया की गडकरी ज्यादा तेज थे या दिग्विजय सिंह। जैसे ये कोई जनमत और संवैधानिक सवाल न होकर गडकरी और दिग्विजय के बीच 100 मीटर की दौड़ का मामला हो। सारे सवाल खत्म। गडकरी ज्यादा तेज थे सो बीजेपी की सरकार बन गयी।
                      अब बीजेपी के समर्थन में मीडिया सारी बहसों को यहां ले आया की पहले जब ऐसा हुआ था तब कोई क्यों नही बोला ? मुझे तो ऐसा लग रहा है की अगर मीडिया का ऐसा ही रुख रहा ( जो की ऐसा ही रहने वाला है ) तो मान लो कभी मोदीजी को बहुमत नही मिले और वो सेना की मदद से सरकार पर कब्जा कर लें तो मीडिया कहेगा की जब बाबर सेना के बल पर देश पर कब्जा कर रहा था तब तुम कहाँ थे। या मान लो देश के चार पांच बड़े उद्योगपति देश का सारा पैसा लेकर विदेश भाग जाएँ तो मीडिया कहेगा की जब मोहम्मद गौरी और गजनी देश को लूट कर  ले गए थे तब तुम क्यों नही बोले।

Monday, September 21, 2015

Vyang -- अगर ऐसा ना होता तो ?

देखिये सब कुछ होने पर ही निर्भर है। और जैसा हुआ है वैसा ही होने पर निर्भर है। बातचीत में बहुत लोग सवाल उठाते हैं की अगर ऐसा ना होता तो ? राजनेता तो इसे काल्पनिक सवाल कहकर ख़ारिज कर देते हैं। लेकिन हमने सोचा की अगर कुछ चीजें नही हुई होती तो क्या होता ? इस पर विचार करने पर हमने पाया की अगर ऐसा ना होता तो कैसा होता ? जैसे ----
            अगर बिहार चुनाव सामने नही होता तो मोहन भागवत के आरक्षण वाले बयान पर बीजेपी की क्या पर्तिक्रिया होती ? तो हमने पाया की कुछ ऐसी होती। 
   बीजेपी प्रवक्ता रविशंकर प्रशाद , " मोहन भागवत  जी ने बिलकुल वाजिब सवाल उठाया है। और ये सवाल देश की सारी जनता उठा रही है। उन्होंने ये कहा है की जब 65 साल से आरक्षण लागु होने के पश्चात भी उसका फायदा नही हो रहा है तो उसे खत्म कर दिया जाना चाहिए। लेकिन विपक्ष बहस से भाग क्यों रहा है ? हमारा मानना है की अब समय आ गया है की आरक्षण पर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए। "
            इसी तरह मान लो पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी नितीश से अलग नही हुए होते तो बीजेपी क्या कहती ?
           बीजेपी प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन , " नितीश को बिहार की जनता को इस बात का जवाब देना पड़ेगा की उन्होंने बिहार की जनता के सिर पर दो साल एक अक्षम आदमी को मुख्यमंत्री के तौर पर बैठा कर रक्खा। जो आदमी खुलेआम रिश्वत लेने की बात कबूल करता है और जिसने बिहार को गड्डे में धकेल दिया है उसके जिम्मेदार खुद नीतीश कुमार हैं और अब बिहार की जनता उन्हें इस बात का जवाब देगी। "
           और मान लो अगर नीतीश बीजेपी से अलग ही नही हुए होते तो बीजेपी क्या कहती ?
          बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा , " पिछले दस साल में माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी के नेतृत्व में हमने बिहार को बदहाली और पिछड़ेपन की दलदल से निकाल कर देश के सबसे ज्यादा तेजी से विकास करने वाले राज्यों में शामिल कर दिया है। पिछले दस साल में बिहार में विकास की जो गंगा बही है वो अन्धो को भी दिखाई दे सकती है और इस चुनाव में बिहार की जनता एक बार फिर माननीय नीतीश कुमार के नेतृत्व पर विश्वास जाहिर करेगी। "
              इसी तरह अगर केंद्र में UPA की सरकार होती और बीजेपी विपक्ष में होती तो GST बिल पर क्या कहती ?
           बीजेपी प्रवक्ता अरुण जेटली , " GST पर राज्यों को कुछ गंभीर चिंताएं हैं। और जब तक केंद्र सरकार राज्यों की चिंताओं का समाधान नही करती तब तक GST का समर्थन करना हमारे लिए मुश्किल होगा। और सरकार को इस पर जोर जबरदस्ती के बजाय विपक्ष को विश्वास में लेकर आगे बढ़ना चाहिए। केवल बहुमत के सहारे कानून पास करना लोकतंत्र के खिलाफ होता है। "
             मान लीजिये बीजेपी विपक्ष में होती और महंगाई के सवाल पर क्या बोलती ?
           बीजेपी प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी , " देश की जनता का महंगाई से बुरा हाल है। प्याज 100 रूपये किलो और दालें 150 रूपये किलो बिक रही हैं और सरकार महंगाई घटने के आंकड़े पेश कर रही है। सरकार को समझना चाहिए की आंकड़ों से लोगों का पेट नही भरता। "
              इसी तरह की और भी बहुत सी बातें हैं जो अगर नही हुई होती तो क्या होता ? हमने केवल कुछ ही चीजों की कल्पना की है।