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Tuesday, August 23, 2016

व्यंग -- अब तुम अकेले हो धनञ्जय।

                     हाँ धनञ्जय, इस प्रतियोगिता में तुम अकेले हो। ये तो तुम्हे मालूम ही होगा की ये द्धापर युग नही है बल्कि कलियुग है। जो सुविधाएँ तुम्हे द्धापर युग में हासिल थी वो अब नही हैं। उस समय तो पूरी सत्ता, पूरा समाज और यहां तक की खुद भगवान भी तुम्हारी जीत के लिए प्रयासरत रहते थे। दूसरे प्रतियोगियों को इसका मलाल भी रहता था और एतराज भी। लेकिन वो कुछ कर नही सकते थे। अब तुम कर्ण को ही लो। जितनी बार भी उससे तुम्हारी प्रतियोगिता हुई, पूरी दुनिया उसे हराने और तुम्हे जिताने लग जाती। कोई भी प्रतियोगिता कभी भी बराबरी पर नही हुई। उसके पास तुम्हारे जैसे सरकारी कोच भी नही थे और सरकारी साधन भी नही थे। उसके बावजूद उसने जब भी तुम्हे ललकारा, तुम्हारे लोगों ने नियम बदल दिए। द्रोपदी का स्वयम्बर तो तुम्हे याद  होगा ? उसे अवसर दिए बिना ही बाहर कर दिया गया। वरना शायद ये देश महाभारत के युद्ध से बच जाता। उसे लायक होने के बावजूद सरकारी विद्यालयों में शिक्षा नही मिली। क्योंकि उस समय क्षत्रियों के लिए 100 % आरक्षण का प्रावधान था। उसने जब ब्राह्मण ऋषि परसुराम से अपनी जाति  छुपाकर शिक्षा प्राप्त की तब परसुराम ने भी उसे श्राप दे दिया। उसके बावजूद तुम उसे युद्ध में हरा नही पाए। तुमने उसे धोखे से मारा और तुम्हारे मित्र कृष्ण ने तुम्हारी इज्जत बचाने के लिए उसे नियमानुसार सिद्ध कर दिया। लेकिन आम लोग इस बात को भूले नही। आज भी आम जन में कर्ण का सम्मान तुमसे ज्यादा है।
                       इस प्रतियोगिता में पितामह भीष्म भी नही हैं जो महिलाओं को प्रतियोगिता से बाहर कर दें। हालाँकि भीष्म के नए अवतार मोहन भागवत ने महिलाओं को हर तरह की प्रतियोगिता से बाहर रखने को जरूर कहा, लेकिन लोग केवल हँस कर रह गए। अब तो लोग कहते हैं की अगर मोहन भगवत की बात मान ली जाती तो भारत को उतने ही मैडल मिलते जितनी संख्या का आविष्कार आर्यभट्ट ने किया था।
                      इस प्रतियोगिता में एकलव्य का अंगूठा काटने की भी मनाही है और कृष्ण को भी कह दिया गया है की बहुत सक्षम हो तो खुद ही उतर जाओ प्रतियोगिता में। बाहर बैठे तुम्हारे लोग हे नरसिंह, हे योगेश्वर, चिल्लाते रहेंगे लेकिन जीतना तो तुम्हे अपनी ताकत पर ही पड़ेगा। यहां कृष्ण खुद हारने पर जरासंध के सामने भीम को नही उतार सकते।
                    सो हे पार्थ, जरा ध्यान रखना। ये कलियुग है और तुम्हे कोई आरक्षण प्राप्त नही है। यहां तुम निपट अकेले हो।

Monday, October 26, 2015

NEWS -- बिहार चुनाव में मोदी जी का साम्प्रदायिक कार्ड

खबरी -- मोदी जी के आज बक्सर की रैली में भाषण के क्या मायने हैं ?

गप्पी -- बीजेपी और मोदी जी, दोनों को अब ये अधिकाधिक स्पष्ट होता जा रहा है की वो बिहार चुनाव हार रहे हैं। चुनाव प्रचार शुरू होने के बाद बीजेपी के नेताओं ने जो भी मुद्दे उठाये उनसे उनका नुकशान ही ज्यादा हुआ। बाद में मोहन भागवत के आरक्षण पर दिए गए भाषण ने पूरी बजी ही पलट दी और बीजेपी का एजेंडा खुल कर सामने आ गया। अब बक्सर की रैली में मोदी जी ने ये कह कर की नितीश और लालू प्रशाद दलितों और पिछड़ों का आरक्षण छीन कर मुसलमानो को देना चाहते हैं और वो यानि मोदी जी अपनी जान दे देंगे लेकिन उनका आरक्षण नही छीनने देंगे, संघ की पुरानी साम्प्रदायिक लाइन ले ली है।  मोदी जी को मालूम है की मुसलमानो का तो कोई वोट उन्हें मिलने वाला नही है और दलितों और पिछड़ों के वोट में अगर वो सेंध नही लगा पाये तो वो चुनाव नही जीत सकते। इसलिए ये मोदी जी और आरएसएस का आखरी दांव है।
                     लेकिन अगर आरक्षण का मुद्दा मोदी जी और आरएसएस बहस में लेकर आते हैं तो उन्हें कुछ अप्रिय सवालों के जवाब भी देने पड़ेंगे। जैसे लालू जी पहले दिन से जातिगत जनगणना का मसला उठा रहे हैं। लालू जी का कहना है की जातिगत जनगणना के आंकड़े जारी किये जाएँ और दलितों और पिछड़ों को उनकी जनसंख्या के हिसाब से आरक्षण दिया जाये। इस पर बीजेपी को अपना रुख साफ करना होगा। दूसरा आर्थिक आधार पर आरक्षण के मोहन भागवत के बयान पर भी उन्हें स्पष्ट जवाब देना होगा। जातिगत आरक्षण के युद्ध में मोदी जी लालू और नितीश को हरा पाएंगे अभी तो मुस्किल लगता है, बाकि वक्त बताएगा।

Tuesday, September 29, 2015

बिहार, भाजपा और जातिवाद की राजनीती

             बिहार में भाजपा लालू प्रसाद यादव पर जातिवाद की राजनीती का आरोप लगा रही है। साथ ही ये दावा भी कर रही है की वो ये चुनाव विकास के एजेंडे पर लड़ रही है। मीडिया भी जातिवाद की बात होते ही लालू यादव को लपेटना शुरू कर देता है। लेकिन सवाल ये है की कौन चाहता है की बिहार जातिवाद की राजनीती से बाहर निकले। बिहार में चुनाव लड़ने वाली सभी पार्टियों का अपना एजेंडा है जो कहीं ना कहीं जातिवाद से जाकर जुड़ जाता है।
                बिहार में जाती हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रही है। जमीनो पर अगदी जातियों का कब्जा और खेतिहर मजदूरी करने वाले लोगों के बीच का संघर्ष भी अपने अंतिम रूप में जाती युद्ध का रूप लेता रहा है। बीजेपी पुरे देश में हिंदूवादी राजनीती करती रही है भले ही वो इसकी पैकेजिंग कभी राष्ट्रवाद के नाम पर करती रही हो या संस्कृति के नाम पर। परन्तु उसके मूल में हमेशा हिंदुत्व की राजनीती रही है।पिछला लोकसभा चुनाव, जिसमे नरेंद्र मोदी को पूर्ण बहुमत मिला, उसके लिए बीजेपी ये दावा करती रही है की वो चुनाव विकास के नाम पर लड़ा गया था। लेकिन असलियत ये है की उस समय भी हिंदुत्व की विकासशील पैकेजिंग की गयी थी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ये है की लोकसभा में बीजेपी के चुने गए 282 सांसदों में एक भी मुस्लिम नही है। नारा था सबका साथ सबका विकास।
               अब जब बिहार का चुनाव नजदीक आ रहा था तो बीजेपी ही बिहार में जातिगत एजेंडा तय कर रही थी। नीतीश और लालू के जातीय गठबंधन को चुनौती देने के लिए बीजेपी ने ही जीतनराम मांझी को मोहरा बनाकर महादलित को राजनीती का मुद्दा बनाया। प्रधानमंत्री मोदी की रैलियों में केवल महादलित ही छाया रहा। लेकिन जातिगत राजनीती में लालूप्रसाद के यादव और उसके साथ ही पिछड़े वोट बैंक को कोई ढंग की चुनौती बीजेपी नही दे पाई। अगदी जातियों को अपने अपने पक्ष में गोलबंद करने की कोशिश में मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा करने वाला बयान दे दिया और फंस गए। इस बयान से बीजेपी को अगड़ों में तो समर्थन बढ़ा परन्तु दूसरी तरह पिछड़ों का धुर्वीकरण लालू यादव की तरफ होता दिखाई दिया। अब बीजेपी इस धुर्वीकरण को रोकने के लिए लालू यादव पर जातिगत राजनीती के आरोप लगा रहे हैं।
                 लेकिन क्या अब बीजेपी जातिगत राजनीती से किनारा कर रही है ? बिलकुल नही। जब लालू यादव ये कहते हैं की ये अगड़ों और पिछड़ों के बीच की लड़ाई है तो उसके जवाब में गिरिराज सिंह और रविशंकर प्रसाद ये बयान देते हैं की NDA का मुख्यमंत्री भी कोई दलित या पिछड़ा ही होगा और कोई स्वर्ण जाती का व्यक्ति मुख्यमंत्री नही होगा, ये बयान किस तरह जातिवादी नही है ?
                     राजनीती हमेशा दो पक्षों में होती है। ये दो पक्ष कभी हिन्दू और मुस्लिम हो सकते है, कभी अगड़े या पिछड़े हो सकते है या फिर आमिर और गरीब हो सकते हैं। आरएसएस और बीजेपी हमेशा आर्थिक आधार की बात करती रही है पर वो कोई भी चुनाव आमिर और गरीब के नाम पर नही लड़ सकती। अगर उसने ये कोशिश की तो मजदूरों और किसानो के सवाल बहस में आ जायेंगे। और ये सवाल बीजेपी के विरुद्ध जायेंगे। इसलिए बीजेपी भी चाहती है की बिहार का चुनाव जाती के आधार पर लड़ा जाये बस उसमे थोड़ा सा हिन्दुत्त्व का तड़का लगा हो। और हिंदुत्तव का तड़का लगाने के लिए उसने साध्वी निरंजन ज्योति सहित अपने पुरे भगवा संगठन को काम पर लगा दिया है। इस काम में उसे ओवैसी से भी बहुत उम्मीद है। दूसरी तरफ यादवों के गठजोड़ में भरम फ़ैलाने और सेंध लगाने के लिए पप्पू यादव से लेकर मुलायम सिंह तक सभी को काम पर लगा दिया है। ये आरोप है की ये दोनों नेता अलग से गठबंधन बनाकर बीजेपी की शह पर ही लड़ रहे हैं।
                   इसलिए कोई नही चाहता, और कम से कम बीजेपी तो कभी नही चाहती की भिहार चुनाव विकास के मुद्दे पर लड़ा जाये।

Sunday, September 27, 2015

क्या भाजपा ( BJP ) वाकई में आरएसएस ( RSS ) के एजेंडे पर काम कर रही है ?

भाजपा पर हमेशा से ये आरोप लगता रहा है की वो आरएसएस के गुप्त एजेंडे पर काम कर रही है। लेकिन इस बार आरोप गुप्त नही बल्कि खुले तौर पर आरएसएस के एजेंडे पर काम करने का है। भाजपा और आरएसएस ने कभी भी आपसी रिश्तों का खण्डन नही किया है बल्कि उसे स्वीकार किया है। लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद इन रिश्तों का खुल कर सामने आना इस आरोप को और ज्यादा सही होने को प्रमाणित करता है। यहां सवाल ये है की आरएसएस का वो एजेंडा आखिर है क्या जिसको लागु करने का लोग आरोप लगा रहे हैं और सारे रिश्तों की स्वीकारोक्ति के बावजूद भाजपा जिससे इंकार करती रही है।
                   आरएसएस एक हिन्दू उच्च जातियों का संगठन है जिसकी स्थापना आजादी से पहले हुई थी। परन्तु इसकी स्थापना आजादी की लड़ाई में किसी योगदान के लिए नही बल्कि भारत में हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के उद्देश्य से हुई थी। आरएसएस को अंग्रेजों से कोई तकलीफ नही थी इसलिए आरएसएस के सर संघ चालक गोलवरकर ने उस समय हिन्दुओं से ये आह्वान किया था की आजादी की लड़ाई में शामिल हो कर अपनी शक्ति और समय बर्बाद करने की कोई जरूरत नही है। और हिन्दुओं को अंग्रेजों से बड़े दुश्मन मुस्लिमों, ईसाईयों और कम्युनिष्टों के खिलाफ लड़ना चाहिए।
                    आरएसएस जिस हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करना चाहता है उसमे उसकी योजना मनु स्मृति के अनुसार बताये गए ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय और शूद्र की चार श्रेणियों में बंटे समाज की स्थापना करना है। इस समाज में दलितों और महिलाओं को कोई अधिकार नही होंगे और उसी तरह दूसरे धर्म को मानने वालों को भी कोई अधिकार नही होंगे। उसकी अवधारणा में लोकतंत्र कहीं फिट नही बैठता है। अब जरूरत इस बात की है की आखिर इसकी स्थापना के लिए कौनसे काम करने जरूरी होंगे।

                १. आजादी की लड़ाई में कोई भी हिस्सेदारी ना होने और इसे एक महान उपलब्धि के रूप में स्वीकार ना करने की समझ और उसके बाद आजादी की लड़ाई ने हमारे देश में जिन लोकतान्त्रिक और प्रगतिशील मूल्यों की स्थापना की थी वो सब आरएसएस के हमले के दायरे में हैं। ये मूल्य धर्मनिरपेक्षता, समानता और स्वतंत्रता के साथ सामाजिक न्याय के मूल्य थे। ये सभी मूल्य आरएसएस के मानस  में मौजूद हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा में फिट नही बैठते हैं।

                 २. इसलिए आरएसएस हमेशा ऐसे कार्यक्रमों और ब्यानो को बढ़ावा देती है जिससे हिन्दुओं और दूसरे धर्म के लोगों के बीच गहरी विभाजन रेखा खींची जा सके। वो इस काम को कभी भी ठंडा नही होने देना चाहती इसलिए उसके नेता कुछ ना कुछ ऐसे बयान देते रहते हैं जिससे हिन्दू और गैर हिन्दू हमेशा आमने सामने रहें। इस खाई को चौड़ा करने के लिए वो हर उस चीज और विविधता को मुद्दा बनाते हैं जो इन समुदायों के बीच में है , जैसे खाने पीने की आदतों में फर्क, कपड़ों और पहनावे में फर्क, पूजा पद्धति में फर्क, त्योहारों और धार्मिक मान्यताओं में फर्क। इसलिए आरएसएस सबसे पहले उस जगह हमला करता है जहां उसे ज्यादा लोगों का समर्थन मिलने की उम्मीद होती है और फिर आहिस्ता आहिस्ता एक एक कदम उसे आगे बढ़ाता रहता है। जैसे पहले उसने बीफ बैन को मुद्दा बनाया ताकि गाय के प्रति हिन्दुओं की भावनाओं को भुनाया जा सके फिर धीरे धीरे मीट बैन तक चले गए।

                   ३. आरएसएस के लोग ईद पर क़ुरबानी को भी मुद्दा बना रहे हैं जबकि हिन्दुओं के कितने मंदिरों में ही अब तक बलि की प्रथा जारी है। झारखंड से रोज डायन कहकर महिलाओं को मारने की खबरें आती हैं। पूरी दुनिया में मुस्लिम ईद पर क़ुरबानी देते हैं अब इस को भी विवाद का विषय बनाना उस बड़ी साजिश का ही हिस्सा है जिसमे कभी भी इस आग को ठंडा ना होने देने की बात है। आरएसएस को मालूम है की मुस्लिम कभी भी ईद पर क़ुरबानी की प्रथा को बंद करने की मांग को मान नही सकते। जिस जीव हत्या को बहाना बनाकर आरएसएस मुस्लिमो पर हमले कर रहा है तो उसे सभी तरह के पशुओं , मछलियों, मुर्गे, बकरे और सूअर इत्यादि सभी तरह के पशुओं के पालने पर प्रतिबंध लगाना होगा। साथ ही उसे सभी तरह के हिंसक जानवरों जैसे शेर इत्यादि को भी खत्म करना होगा क्योंकि वो सभी जीव हत्या के कारण हैं। लेकिन चूँकि हमला मुस्लिमो पर है इसलिए इस प्रतिबंध को मुस्लिमो की मान्यताओं, खाने की आदतों और काम धंधे तक ही सिमित रखना होगा। मीट बैन के लिए आरएसएस और बीजेपी ने इस बार जैन समुदाय को बहाना बनाया और तर्क दिया की चूँकि जैन समुदाय अल्पसंख्यक है इसलिए उसकी भावनाओं का भी सम्मान करना चाहिए। जब मुस्लिमो का सवाल आता है तब आरएसएस का तर्क होता है की उसे बहुमत की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए।

                          ४.आरएसएस ने मुस्लिमो के खिलाफ नफरत फ़ैलाने के अपने अभियान में शुरुआत उन मुगल हमलावरों से की जो भारत को लूटने के इरादे से आये थे और जिनसे भारतीय जनता के मन में नफरत का भाव था जैसे मोहम्मद गौरी और गजनी। धीरे धीरे ये उसे बढ़ाकर पुरे मध्यकाल तक ले आये लेकिन इसमें भी उन्होंने ओरंगजेब जैसे शासकों को सामने रखा। आज हालत ये है की वो भारतीय  इतिहास के महान शासकों जैसे अकबर और टीपू सुल्तान को भी देशद्रोही साबित करने पर तुले हैं। अब बात इससे भी आगे बढ़ चुकी है और यहां तक की उनका हमला पूरी तरह साम्प्रदायिक रूप ले चूका है और इसमें हर मुस्लिम शामिल है चाहे  वो उपराष्ट्रपति अहमद अंसारी ही क्यों ना हों। पूरी दुनिया में विभाजनकारी ताकतें इसी तरह आहिस्ता आहिस्ता अपने विरोध का दायरा बढ़ती हैं और अपने पैर फैलाती हैं।

                          ५. आजादी की लड़ाई के स्वतंत्रता, समाजवाद और भाईचारे जैसे मूल्यों पर हमला करने के लिए उन्होंने कांग्रेस के मौजूदा नेताओं को चुना। सोनिया के विदेशी मूल को मुद्दा बनाने के बाद पूरा गांधी परिवार उनके हमले के दायरे में आ गया। यहां तक की UPA सरकार के भृष्टाचार को भी उन्होंने गांधी परिवार पर व्यक्तिगत हमले के लिए प्रयोग किया। उसके बाद जवाहरलाल नेहरू पर हमला करने के लिए उन्होंने सरदार पटेल और नेहरू के मतभेदों को बढ़ा चढ़ा कर दिखाया। अब वो नेहरू पर हमला करने के लिए नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को मोहरा बना रहे हैं। ये हमला नेहरू पर नही बल्कि उन सभी मूल्यों पर है जो आरएसएस की राह में रोड़ा हैं। ये लोग नेहरू को बहाना बना कर उन सभी मूल्यों पर हमला कर रहे हैं। जबकि सच्चाई ये है की इनके खुद के पास नेहरू के कद के आसपास का तो छोडो उसके पांच प्रतिशत का भी कोई नेता नही है।

                          ६. आरएसएस को अपनी इस मुहीम में सबसे ज्यादा खतरा वामपंथियों से है। क्योंकि यही एक विचारधारा है जो आरएसएस को रोक सकती है। वामपंथियों से मतलब केवल राजनैतिक पार्टियां नही बल्कि वो सभी लोग हैं जो शिक्षा, साहित्य और कला के क्षेत्र में पुरे देश में फैले हुए हैं। इसलिए मोदी सरकार आने के तुरंत बाद उन्होंने सबसे तेज हमला हमारी शिक्षा व्यवस्था और शिक्षा, साहित्य और कला से जुड़े संस्थानों पर किया। सभी मुख्य संस्थानों में से काबिल लोगों को बाहर करके अपने तीसरे और चौथे दर्जे के लोगों को भरना शुरू किया। FTII से लेकर IIT और नेशनल बुक ट्रस्ट तक सारी नियुक्तियां और पुरे देश में शिक्षा के स्लैब्स को बदलने की मुहीम इसी का हिस्सा है। इन्होने भाषा को भी इस विभाजन का आधार बना दिया। अब जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को नक्सलियों और ड्रग्स का अड्डा बताना और अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को राष्ट्रद्रोहियों का अड्डा बताना भी इसी हमले का हिस्सा है।

                              ७. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का ये बयान की हिन्दू धर्म ने कभी भी महिलाओं की बराबरी की बात नही की और बार बार ये दोहराना की महिलाओं की पहली जिम्मेदारी घर होती है या उसके संगठनो द्वारा वेलेंटाइन डे इत्यादि पर हमले करना, महिलाओं के प्रति आरएसएस की सोच और एजेंडे  को सामने लाता है। अब आरक्षण पर मोहन भागवत के लगातार बयान दलितों के प्रति उसकी सोच के परिचायक हैं। संघ अभी इन चीजों को लागु करने की स्थिति में नही है इसलिए इन पर एक आदमी बयान देता है और दूसरा खंडन करता है ताकि दोनों तरफ के लोगों को संकेत दिया जा सके। भारत के संविधान के जिन हिस्सों पर संघ को घोर आपत्ति है उसमे महिलाओं और दलितों की बराबरी वाले हिस्से शामिल हैं। ये बात भी किसी से छिपी नही  है की संघ ने तो संविधान की जगह मनु स्मृति लागु करने की मांग की थी।

                                और इन ऊपर के सभी कार्यक्रमों को मोदी सरकार पूरी तैयारी और जोर के साथ लागु कर रही है। बेसक अभी कुछ विदेशी निवेशकों को जाने वाले गलत संदेशों को रोकने के लिए और NDA में शामिल दूसरी पार्टियों को बेनकाब होने से बचाने के लिए प्रधानमंत्री कभी कभी कुछ अच्छी बातें भी कह देते हैं जो भरम फ़ैलाने के लिए जरूरी है लेकिन जमीन पर सब कुछ उसी तरह से लागु किया जा रहा है जो आरएसएस चाहती है। फिर इस बात में किसको संदेह रह जाता है की बीजेपी आरएसएस के एजेंडे पर काम कर रही है।

Monday, September 21, 2015

Vyang -- अगर ऐसा ना होता तो ?

देखिये सब कुछ होने पर ही निर्भर है। और जैसा हुआ है वैसा ही होने पर निर्भर है। बातचीत में बहुत लोग सवाल उठाते हैं की अगर ऐसा ना होता तो ? राजनेता तो इसे काल्पनिक सवाल कहकर ख़ारिज कर देते हैं। लेकिन हमने सोचा की अगर कुछ चीजें नही हुई होती तो क्या होता ? इस पर विचार करने पर हमने पाया की अगर ऐसा ना होता तो कैसा होता ? जैसे ----
            अगर बिहार चुनाव सामने नही होता तो मोहन भागवत के आरक्षण वाले बयान पर बीजेपी की क्या पर्तिक्रिया होती ? तो हमने पाया की कुछ ऐसी होती। 
   बीजेपी प्रवक्ता रविशंकर प्रशाद , " मोहन भागवत  जी ने बिलकुल वाजिब सवाल उठाया है। और ये सवाल देश की सारी जनता उठा रही है। उन्होंने ये कहा है की जब 65 साल से आरक्षण लागु होने के पश्चात भी उसका फायदा नही हो रहा है तो उसे खत्म कर दिया जाना चाहिए। लेकिन विपक्ष बहस से भाग क्यों रहा है ? हमारा मानना है की अब समय आ गया है की आरक्षण पर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए। "
            इसी तरह मान लो पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी नितीश से अलग नही हुए होते तो बीजेपी क्या कहती ?
           बीजेपी प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन , " नितीश को बिहार की जनता को इस बात का जवाब देना पड़ेगा की उन्होंने बिहार की जनता के सिर पर दो साल एक अक्षम आदमी को मुख्यमंत्री के तौर पर बैठा कर रक्खा। जो आदमी खुलेआम रिश्वत लेने की बात कबूल करता है और जिसने बिहार को गड्डे में धकेल दिया है उसके जिम्मेदार खुद नीतीश कुमार हैं और अब बिहार की जनता उन्हें इस बात का जवाब देगी। "
           और मान लो अगर नीतीश बीजेपी से अलग ही नही हुए होते तो बीजेपी क्या कहती ?
          बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा , " पिछले दस साल में माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी के नेतृत्व में हमने बिहार को बदहाली और पिछड़ेपन की दलदल से निकाल कर देश के सबसे ज्यादा तेजी से विकास करने वाले राज्यों में शामिल कर दिया है। पिछले दस साल में बिहार में विकास की जो गंगा बही है वो अन्धो को भी दिखाई दे सकती है और इस चुनाव में बिहार की जनता एक बार फिर माननीय नीतीश कुमार के नेतृत्व पर विश्वास जाहिर करेगी। "
              इसी तरह अगर केंद्र में UPA की सरकार होती और बीजेपी विपक्ष में होती तो GST बिल पर क्या कहती ?
           बीजेपी प्रवक्ता अरुण जेटली , " GST पर राज्यों को कुछ गंभीर चिंताएं हैं। और जब तक केंद्र सरकार राज्यों की चिंताओं का समाधान नही करती तब तक GST का समर्थन करना हमारे लिए मुश्किल होगा। और सरकार को इस पर जोर जबरदस्ती के बजाय विपक्ष को विश्वास में लेकर आगे बढ़ना चाहिए। केवल बहुमत के सहारे कानून पास करना लोकतंत्र के खिलाफ होता है। "
             मान लीजिये बीजेपी विपक्ष में होती और महंगाई के सवाल पर क्या बोलती ?
           बीजेपी प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी , " देश की जनता का महंगाई से बुरा हाल है। प्याज 100 रूपये किलो और दालें 150 रूपये किलो बिक रही हैं और सरकार महंगाई घटने के आंकड़े पेश कर रही है। सरकार को समझना चाहिए की आंकड़ों से लोगों का पेट नही भरता। "
              इसी तरह की और भी बहुत सी बातें हैं जो अगर नही हुई होती तो क्या होता ? हमने केवल कुछ ही चीजों की कल्पना की है।

महिलाओं सहित सभी दबे-कुचले लोगों का विरोधी है आरएसएस

हिन्दू धर्म की जिस सनातन परम्परा में आरएसएस विश्वास करता है उसमे सभी के लिए बराबरी का बाकायदा विरोध किया गया है। उसमे कुछ जातिओं को उच्च पायदान पर बिठाया गया है और बाकियों को उनकी सेवा में लगाया गया है। यही हाल महिलाओं का है। महिलाओं को अपनी जातिगत स्थिति का शिकार तो होना ही पड़ता है साथ ही साथ महिला होने का शिकार भी बनना पड़ता है। परन्तु लोकतंत्र और एक आदमी-एक वोट की मजबूरी ने आरएसएस को खुलकर कुछ बातें कहने से रोका हुआ है। फिर भी ये बातें उसके पदाधिकारियों के ब्यानो और आरएसएस के कार्यक्रमों से सामने आ जाती है। मोदी सरकार आने के बाद आरएसएस को लगने लगा है की अब सत्ता पर उसका पक्का कब्जा हो चूका है और वो आने वाले समय में इसे किसी ना किसी बहाने बनाये रख सकती है। इसलिए उसकी ये छिपी हुई इच्छाएं और एजेंडा सामने आने लगा है।
               कुछ दिन पहले खुद मोहन भागवत ने ये बात कहि है की हिन्दू धर्म में महिलाओं की बराबरी की बात नही कहि गयी है, बल्कि एकता की बात कहि गयी है। सभी विचारक पहले ये आरोप लगाते रहे हैं की आरएसएस महिला विरोधी संगठन है। इसके जवाब में आरएसएस हमेशा ये रुख अपनाती रही है की हम तो महिलाओं की पूजा करते हैं। और  में महिलाओं को देवी का स्थान दिया गया है। और वो बराबरी के सवाल पर साफ बच कर निकल जाता है। अब चूँकि उसकी सरकार केंद्र में है और उसी संविधान की शपथ लेकर शासन कर रही है जिसमे महिलाओं को बराबरी का दर्जा हासिल है तो उसे कुछ मामलों पर अपनी स्थिति थोड़ी बहुत साफ करनी पद रही है। संसद में महिला आरक्षण का बिल सालों से लटका हुआ है जिसे बीजेपी किसी भी कीमत पर पास नही करवाना चाहती। क्योंकि पार्टी में इस पर मतभेदों को छोड़ भी दिया जाये तो भी ये आरएसएस के सिद्धांतों के खिलाफ बैठता है। आरएसएस जिस उच्च जाती, और पुरुष प्रधान समाज का हिमायती है उसमे महिलाओं को बराबरी के अधिकार की बात कैसे की जा सकती है। इसलिए मोहन भागवत ने इस मामले पर अपनी स्थिति साफ कर दी है की हिन्दू धर्म न्हिलाओं की बराबरी की बात नही करता। अब हो सकता है उसके बीजेपी के कुछ नेता कहीं डैमेज कंट्रोल के लिए फिर महिलाओं की पूजा करने के उदाहरण दें। लेकिन पूजा तो हिंदू धर्म बंदरों, सांपों और गायों की भी करता है। इसके अलावा भी बहुत से जानवरों की पूजा करता है।  जानवरों की ही क्यों, पत्थरों की भी करता है। तो महिलाओं को भी क्या आरएसएस इन जानवरों और पत्थरों की श्रेणी में गिनती है। सही कहा जाये तो बिलकुल इसी श्रेणी में गिनती है। बाकि के सारे प्रोग्राम और नारे केवल दिखावटी चीजें हैं और समस्या को उलझाये रखने के साधन हैं। बीजेपी सरकार व्यवहार में ऐसा कोई भी फैसला नही लेगी जिसमे महिलाओं को बराबरी की हैसियत हासिल हो। हाँ, बेटी बचाओ जैसे नारे जरूर लगाती रहेगी।
                      दूसरा तबका दलितों और पिछड़ों का है। हिन्दू धर्म उनके बारे में क्या क्या कहता है ये तो सबको मालूम है। लेकिन उनकी संख्या और वोट की ताकत आरएसएस को व्ही सब बातें कहने से रोकती हैं जो हिन्दू धर्म ग्रंथों में कहि गयी हैं। उससे उनके मन में गहरे तक बैठी हुई उन बातों को खत्म तो नही किया जा सकता। दलितों, आदिवासियों और समाज के निचले वर्ग के लिए आरएसएस की भावनाएं व्ही हैं जो महाभारत में द्रोणाचार्य की थी। द्रोणाचार्य ने आदिवासी एकलव्य को शिष्य बनाने से तो इंकार किया ही था लेकिन जब वो खुद अपने प्रयासों से धनुर्विद्या सिख गया और द्रोण शिष्य अर्जुन से बेहतर धनुर्धारी हो गया तो गुरुदक्षिणा की दुहाई दे कर उसका अंगूठा भी कटवा दिया। उससे पहले जब रामायण में राम ब्राह्मणो के एक ग्रुप के कहने पर तपस्वी शूद्र शम्बूक का सर काट लेते हैं। रामायण में दलितों और महिलाओं पर अत्याचार के प्रसंग भरे पड़े हैं। वहां जब किसी दलित या आदिवासी का बखान भी किया गया है तो वो भी एक आदर्श सेवक की तरह किया गया है। अगर दलित या आदिवासी सेविकाई से बाहर पैर रखने की कोशिश करता है तो वो तब के ऋषियों को भी बर्दास्त नही होता था और अब आरएसएस को भी नही होता। इसलिए आहिस्ता आहिस्ता दिल की बातें जुबान पर आ रही हैं। मोहन भागवत का आरक्षण की समीक्षा करने का बयान इसी दलित विरोध का हिस्सा है। उससे पहले आरएसएस के प्रमुख पदाधिकारी अम.जी. वैद्य आरक्षण को खत्म करने की मांग कर चुके हैं। अब इस पर तरह तरह के तर्क दिए जायेंगे। आरएसएस जानती है की दलित और पिछड़ी राजनीती के कई सूरमा अब बीजेपी के सामने दण्डवत हैं और उनमे अपने निजी स्वार्थों के आगे अब समाज की लाभ हानि कोई मायने नही रखती। आरएसएस का एजेंडा आजादी के पहले से एक उच्च वर्गीय हिन्दू राज की स्थापना रहा है। इसलिए उस समय के आरएसएस के संघ चालक गोलवलकर ने हिन्दुओं को आजादी की लड़ाई से दूर रहने का आह्वान किया था।
                      इसलिए आने वाले समय में आरएसएस और बीजेपी अपने इस एजेंडे को लागु करने या आगे बढ़ाने की हरसम्भव कोशिश करेगी। समाज में ऐसा माहोल बनाया जायेगा जिसमे इन बातों का विरोध करने वालों को देशद्रोही घोषित किया जायेगा और समर्थन करने वालों को तठस्थ बुद्धिजीवी और महान विचारक की उपाधि दी जाएगी।