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Sunday, December 18, 2016

नोटबन्दी ने गरीबों को कहीं का नही छोड़ा।

                व्यक्ति के अहंकार का मूल उसकी मूर्खता में होता है। हर मुर्ख व्यक्ति दम्भी और अहंकारी होता है। जब ये स्थिति किसी सरकार चलाने वालों के साथ होती है तो स्थिति बहुत ही भयावह हो जाती है। ठीक वैसी ही, जैसी अब है। लोग भूख से मर रहे हैं, अर्थव्यवस्था तबाह हो गयी है, काम धंधे बन्द हैं और सरकार के मंत्री अपनी वफादारी सिद्ध करने की होड़ में इस फैसले को कभी ऐतिहासिक तो कभी गेम चेंजर बता रहे हैं। रोज बैंक की लाइनों से लाशें घर लोट रही हैं, मजबूर, रोते बिलखते लोगों के फोटो अख़बार में छप रहे हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार जाने वाली ट्रेने वापिस लौटते हुए मजदूरों से भरी हुई हैं। किसान अपनी उपज को सड़कों पर फेंक देने को मजबूर हैं। सभी छोटे और मध्यम उद्योग लगभग बन्दी की हालत में हैं। और सरकार के वरिष्ठ मंत्री, प्रधानमंत्री सहित, टीवी पर डिजिटल इकोनॉमी के फायदे बता रहे हैं। एक लोकतान्त्रिक देश के लोगों के साथ इससे क्रूर मजाक हो नही सकता।
                  कॉरपोरेट मीडिया और कॉरपोरेट की सरकार द्वारा तय किये गए मापदण्ड कुछ लोगों के दिमाग पर इतने हावी हो चुके हैं की वो अपनी समझबूझ खो चुके हैं। अब भी कुछ लोग हैं जो नोटबन्दी के फायदे समझाने लगते हैं। उन्हें देख कर तरस आता है। आजादी से पहले भी कुछ लोग अंग्रेजी हुकूमत के फायदे गिनवाते थे। अंग्रेजो को विकास का प्रतीक बताया जाता था। अब भी वैसा ही है। उन्हें कुछ भी दिखाई नही देता।
                    लोगों की तकलीफों को छुपाने की भरसक कोशिशों के बावजूद टीवी कुछ ऐसे दृश्यों को दिखाने के लिए मजबूर है जिसमे चाय बागानों के मजदूर झाड़ियों के पत्ते उबाल कर खा रहे हैं। उन्हें कहा जा रहा है की भविष्य की बेहतरी के लिए सब्र करें। किसका भविष्य ? जिन लोगों को दो वक्त की रोटी विलासिता लगती हो वो भूखे रहकर किस भविष्य की उम्मीद करें। पीठ पर बैग लटकाये बेरोजगार नोजवानो की एक भीड़,  जिसके लिए देश का सबसे क्रन्तिकारी नेता वो है जो फ्री वाईफाई दे दे , आज देश में विचार के मुद्दे तय कर रही है। जो कारपोरेट की भाषा बोलती है और गैस की सब्सिडी लेने पर अपने माँ बाप को मुफ्तखोर कहती है। क्या उसे मालूम है की जो किसान अपनी उपज सड़क पर फेंक कर जा रहा है वो उसके आधा साल की मेहनत का परिणाम है। आज जब उसे खेत में डालने के लिए खाद नही मिल रहा है तो उसका भविष्य उसकी आँखों के सामने बरबाद हो रहा है। अगर दो या तीन महीने के बाद स्थिति थोड़ी बहुत सामान्य हो भी जाती है, जिसकी उम्मीद नही है तो भी उसके किस काम की ? ये कोई मोबाइल का रिचार्ज नही है की जब पैसा आएगा तब करवा लेंगे। पहले से जीवन मृत्यु की लड़ाई लड़ रहा कृषि क्षेत्र तब तक लकवे का शिकार हो जायेगा।
                   उसके बावजूद सरकार अपने जनविरोधी फैसले पर अडिग है। उसके सारे वायदे एक एक करके खोखले साबित हो चुके हैं। अब ना कालेधन का कोई सवाल बचा है, ना आतंकवाद की टूटी हुई कमर दिखाई दे रही है और जाली नोटों का तो ये हाल है की शायद जितने जाली नोट अब पकड़े गए हैं उतने तो दस साल में भी नही पकड़े गए होंगे। अब सरकार मुंह छुपाने के लिए डिजिटल इकोनॉमी की बात कर रही है। क्या करेगी सरकार उसके लिए ? बीजेपी के कार्यकर्ताओं को भेजेगी लोगों को डिजिटल इकोनॉमी के फायदे बताने और paytm की app कैसे काम करती है उसकी ट्रेनिग देने ? जिस देश की 35 % जनता को सरकार 70 साल में क ख ग नही सीखा पाई ( गुजरात सहित ) , उसे अब दो महीने में डिजिटल कर दिया जायेगा ? इससे बड़ा मजाक हो नही सकता। इस पर टीवी पर भाषण देने वाले लोग असल में इस देश के बारे में कुछ नही जानते। हर रोज सरकार के प्रतिनिधि नए नियम और नई धमकियां लेकर आ जाते हैं। संसद को पहली बार सरकार ने नही चलने दिया। जब विपक्ष ने बहस के किसी नियम पर सहमति दिखाने की कोशिश की तभी सरकार  सांसद तख्तियाँ लिए नारे लगाते हुए नजर आये। प्रधानमंत्री रैली में कहते हैं की उन्हें संसद में बोलने नही  दिया गया, क्या वो एक फुटेज दिखा सकते हैं की जब वो बोलने के लिए खड़े हुए हों। नही। हर रोज नोटबन्दी का विरोध करने वालों को देशद्रोही बताया जा रहा है। खुद प्रधानमंत्री अपने पार्टी के सांसदों को विपक्ष का पर्दाफाश करने का आव्हान कर रहे हैं। उन्हें कालेधन के समर्थक करार दे रहे हैं। अब किसका पर्दाफाश करेंगे ? सारे बैंकों, सरकार के दिए गए संवैधानिक वचनों और नागरिक अधिकारों का तो पहले ही पर्दाफाश हो चूका है।
नोटबन्दी ने गरीबों को कहीं का नही छोड़ा।

Sunday, December 4, 2016

कैशलेस इंडिया किसके लिए ?

                  नोटबन्दी के बाद अब जब कहने को बहुत कुछ नही बचा है तब इसके समर्थन में दो तर्क दिए जा रहे हैं। एक कैशलेस इंडिया बनाने और दूसरा ब्याज दर कम होने के। लेकिन क्या इन दोनों चीजों का जो मतलब है उसे लोग समझते हैं ? इसकी पड़ताल करना जरूरी है।
कैशलेस इंडिया --
                          सरकार का कहना है की लोगों को अपने छोटे छोटे खर्चे भी अपने मोबाइल फोन से paytm इत्यादि के द्वारा करने चाहियें। सरकार और मीडिया पुरे जोर शोर से इसके प्रचार में लग गया है। उसे इस बात से भी कोई फर्क नही पड़ता की paytm उसी चीन की कम्पनी है जिसके बहिष्कार के लिए अभी बीस दिन पहले तक बीजेपी और मीडिया ने कुछ भी बाकि नही रखा था और 20 रूपये के पटाखे खरीदने वाले को भी देश का गद्दार घोषित कर दिया था। उस समय देश की अर्थव्यवस्था को बचाने का केवल एक ही उपाय था की चीन का बहिष्कार करो, आज देश की अर्थव्यवस्था बचाने का केवल एक ही तरीका है की चीनी कम्पनी paytm को अपनाओ।
                        लेकिन हम इसके दूसरे पहलुओं पर बात करना चाहते हैं। मोबाइल फोन इत्यादि से और कार्ड के इस्तेमाल से उसके हैक होने और धोखाधड़ी का खतरा बढ़ जाता है। अब तक इसका बहुत इस्तेमाल न होने के बावजूद करीब 40000 शिकायतें सरकार को मिली थी। जब सरकार इस पर इतना जोर दे रही है तो क्या वो इसकी जिम्मेदारी लेगी की अगर किसी ग्राहक का अकाउन्ट हैक करके कोई उसका पैसा निकाल लेता है तो सरकार, बैंक या paytm जैसी कम्पनी उसकी भरपाई करेगी। नही। सरकार ने इससे साफ इंकार कर दिया है। फिर सरकार एक ऐसे तरीके पर क्यों जोर दे रही है जिसकी सुरक्षा की गारन्टी नही दी जा सकती ?
                       दूसरा एक और कारण है जिससे ये तरीका लोगों के हित में नही है। paytm या कार्ड द्वारा किये गए भुगतान पर बैंक और ये कम्पनियां डेढ़ से साढ़े तीन प्रतिशत तक का ट्रांजैक्शन चार्ज लेती हैं। ये चार्ज भुगतान लेने वाले दुकानदार को करना पड़ता है। इसलिए दुकानदार उतना भाव बढ़ा लेता है। अगर वो भाव नही बढ़ाता है तो उसका नुकशान होता है। अब ये नुकशान उन छोटे छोटे दुकानदारों को भी उठाना पड़ेगा जो अब तक नकद में व्यापार करते थे। एक अनुमान के अनुसार देश में करीब 75 लाख करोड़ का नकद लेन देन होता है। इसका सालाना हिसाब निकाला जाये और ट्रांजैक्शन चार्ज को केवल 1 . 25 % भी मान लिया जाये तो इसकी सालाना कुल रकम करीब सवा लाख करोड़ बैठती है। ये रकम सीधे paytm और रिलाएंस मनी जैसी कम्पनियों की जेब में जाएगी। इन उद्योगपतियों को बिना कुछ किये इतनी बड़ी रकम घर बैठे मिल जाएगी। यही कारण है की सरकार और मीडिया इस पर इतना जोर दे रहा है।
                          अगर सरकार लोगों के हित में इस व्यवस्था को लागु करना चाहती है तो उसे तुरन्त हमेशा के लिए ट्रांजैक्शन चार्ज को खत्म करने और इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। लेकिन ऐसा कभी नही होगा।
घटती ब्याज दर --
                            नोटबन्दी के पक्ष में जो दूसरा तर्क अब बड़ी जोर से दिया जा रहा है वो ये है की इससे ब्याज दरें कम होगी और आम लोगों को सस्ते ब्याज में मकान इत्यादि खरीदने का मौका मिलेगा। लेकिन इस पर भी थोड़ी जाँच पड़ताल की जरूरत है। आम तोर पर बैंको में आम लोगों का पैसा जमा होता है जिसमे लाखों पेंशन धारक और अपनी सारी उम्र की कमाई बैंको में रखकर उसके ब्याज की आमदनी से गुजारा करने वाले बुजुर्ग शामिल हैं। इसके साथ ही लाखों करोड़ों कर्मचारी भी शामिल हैं जिनके वेतन से एक निश्चित रकम हर महीने कटती है। दूसरी तरफ बड़े बड़े उद्योगपति बैंकों से कर्ज लेते हैं जिसके द्वारा वो उद्योगों की स्थापना करते हैं और अपना वैभवी जीवन जीते हैं। जब उद्योग नुकशान में होता है तो इनके अपने खर्चों पर कोई फर्क नही पड़ता लेकिन बैंको का पैसा डूब जाता है। इस तरह के डूबने के कगार पर खड़े कर्जों जिन्हें बैंक की भाषा में NPA कहा जाता है की राशी करीब 9 लाख 75 हजार करोड़ पर पहुंच चुकी है। आम जनता का बहुत ही छोटा हिस्सा बैंको से कर्ज लेता है। इसकी सबसे बड़ी मिसाल ये है की पूरे देश के सभी किसानों पर बैंको का जितना कर्ज है, अकेले अडानी समूह की कम्पनियों का कर्ज उसके बराबर है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है की ब्याज दरें कम होने का फायदा हमेशा उद्योगपतियों को होता है और नुकशान आम लोगों को होता है।
                       केवल इन दो तथ्यों पर ही तर्कपूर्ण जाँच पड़ताल की जाये तो सामने आता है की ये फैसला बड़े लोगों और उद्योगपतियों को ध्यान में रखकर लिया गया है जिसका भुगतान आम आदमी को करना है।

Saturday, December 3, 2016

व्यंग -- कैशलेस देश और कैशलेस भृष्टाचार


              8 नवम्बर को रात होते होते लोगों को पता चल गया की सरकार क्या क्या कर सकती है। जिन लोगों को सुबह दूध खरीदना था और उनके पास केवल पांच सौ का नोट था, उनकी हालत भी ऐसी हो गयी थी जैसे वर्ल्ड बैंक की क़िस्त डिफाल्ट होने वाली है। लोगों ने पूछा की ऐसा क्यों कर रहे हो ?
सरकार ने कहा की आतंकवाद बन्द करना है की नही ?
लोगों ने कहा की करना है।
तो ये आतंकवाद बन्द करने के लिए किया है।
सरकार इतना कह कर मुड़ने ही वाली थी की आतंकवादी हमले की खबर आ गयी।
लोगों ने सरकार की तरफ देखा।
सरकार ने तुरन्त कहा की जाली नोट बन्द होने चाहियें की नही ?
लोगों ने कहा की होने चाहियें।
तो ये जाली नोट बन्द करने के लिए किया है।
सरकार फिर मुड़ने वाली थी की जाली नोट पकड़े जाने की खबर आ गयी।
लोगों ने फिर सरकार की तरफ देखा।
सरकार ने तुरन्त कहा की कालाधन खत्म करना है की नही ?
लोगों ने फिर कहा की करना है।
सरकार ने कहा की सारा कालाधन कागज के टुकड़ों में बदल जायेगा। जिन लोगों के पास काले नोट हैं वो बैंकों  में ही नही आएंगे। और सारे कालेधन वाले बर्बाद हो जायेंगे। सरकार इतना कह कर मुड़ने ही वाली थी की लगातार खबरें आने लगी की ज्यादातर नोट बैंकों में जमा हो गए हैं। जिन लोगों के पास जनता को कालाधन होने का शक था वो सब बारी बारी टीवी पर आकर मुस्कुराते हुए नोटबन्दी का समर्थन कर रहे हैं।
लोगों ने फिर सरकार की तरफ देखा।
सरकार ने तुरन्त कहा की कैशलैस इकॉनोमी बनानी है।
अब लोगों ने एक दूसरे की तरफ देखा।
एक नोजवान जो जीन्स शर्ट पहने और पीछे बैग लटकाये हुए स्मार्ट फोन में बीजी था वो आगे आया और बोला की कैशलेस का मतलब है बिना नोटों वाला देश।
सरकार खुश हुई।
लोगों ने कहा की भइये, हम तो पहले ही बिना नोटों के हैं। और जिनके पास नोट हैं उनको बदल कर तुम पहले से भी बड़े नोट दे रहे हो। और नोटों के बिना हम दूध सब्जी और राशन कैसे खरीदें ?
नोजवान ने कहा की PAYTM करो।
लोगों ने फिर एक दूसरे की तरफ देखा और बोले की भाई करके दिखाओ।
तभी एक दूधवाला साईकिल पर ड्रम लादे वहां से गुजरा। नोजवान ने उसे रोककर कहा की दो लीटर दूध दो।
दूधवाले ने कहा की लाओ पैसा।
नोजवान ने कहा PAYTM है न ?
दूधवाले ने कहा -हट  और चला गया।
लोगों ने नोजवान की तरफ देखा।
नोजवान ने कहा की यही लोग देश को आगे नही बढ़ने दे रहे। जब तक देश के सारे दूधवाले, रेहड़ी सब्जी वाले, फुटपाथ पर सामान बेचने वाले और चौराहे पर बैठे मजदूर PAYTM नही करेंगे, तब तक देश आगे नही बढ़ सकता और ना ही भृष्टाचार खत्म हो सकता है। सबसे बड़े भृष्टाचारी तो यही लोग हैं।
लोगों ने एक दूसरे की तरफ देखा, फिर नोजवान की तरफ देखा, लेकिन नोजवान तब तक डाटा पैक रिचार्ज करवाने के लिए कनेक्टिविटी ढूंढने चला गया था।