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Thursday, February 9, 2017

नोटबंदी - जीना भी मुश्किल, मरना भी मुश्किल।

           ये एक पुरानी हिंदी फिल्म का गीत है जो अब हम सब भारतीयों पर खरा उतर रहा है। जब से नोटबन्दी हुई है और सरकार रोज नए नए नियम तय कर रही है उससे लोगों का जीना तो मुश्किल हो ही गया था, अब मरणा भी मुश्किल हो गया है। जैसे - 
             रिजर्व बैंक ने करंट खातों से रकम उठाने की सीमा खत्म करने की घोषणा कर दी। साथ ही एटीएम से भी सीमा हटा ली गयी। लेकिन इसके साथ निजी कम्पनियों की तरह एक टर्म एंड कन्डीशन लगा दी। वो ये है की रिजर्व बैंक ने भले ही सीमा हटा ली हो, लेकिन बैंक अपनी सुविधा के अनुसार सीमा तय कर सकते हैं। अब हाल ये है की बैंक में 20000 का चैक लेकर जाओ तो बैंक कहता है की केवल 12000 मिल सकते हैं। अब क्या करें ? यानी जीना भी मुश्किल, और मरना भी मुश्किल।
              यही हाल एटीएम का है। सीमा समाप्त कर दी गयी है लेकिन एटीएम बन्द हैं। पुरे शहर में 15 - 20 % एटीएम ही चालू हैं। उनमे भी कब कैश खत्म हो जायेगा पता नही है। मार्च के बाद सरकार और RBI सारी सीमाएं हटाने की घोषणा कर देंगी। लेकिन देश बन्द एटीएम और बैंक में नाकाफी नकदी के भरोसे रह जायेगा।
              दूसरा मुद्दा सरकार के दूसरे नियमो का है। सरकार कहती है की आप घर पर एक सीमा से ज्यादा पैसा नही रख सकते। अगर जरूरत है तो डिजिटल पेमेन्ट करिये। डिजिटल पेमेन्ट करेंगे तो चार्ज लगेगा। आप बैंक से नकदी निकालेंगे तो चार्ज लगेगा। आपकी मजबूरी है की आप चार्ज देकर भुगतान करें। सारा देश बंधक हो गया और इसको लोकतंत्र कहते हैं। ये पूरी दुनिया में अपनी तरह का अकेला लोकतंत्र है। प्रधानमंत्री कहते हैं की पूरी दुनिया के अर्थशास्त्रियों के पास हमारी नोटबन्दी का मूल्यांकन करने का पैमाना ही नही है। यानि पूरी दुनिया के अर्थशास्त्रियों ने अब तक जो पढ़ा है वो सब बेकार गया। अब इस लोकतंत्र के मूल्यांकन के लिए भी दुनिया के समाजशास्त्रियों और राजनीती के विद्यार्थियों को नए पैमाने तय करने पड़ेंगे। उन्हें ये सीखना होगा की अब तक वो जिसे तानाशाही कहते आये हैं, उसे अब लोकतंत्र में कैसे फिट किया जाये।
               अब आपको जिन्दा रहने का चार्ज देना पड़ेगा। कैश निकलोगे तो चार्ज और डिजिटल पेमेंट करोगे तो चार्ज। और लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए इसमें भी बायें हाथ से जेब काटने का प्रबन्ध किया गया है। सरकार कहती है की कार्ड से पट्रोल खरीदने पर ग्राहक को कोई चार्ज नही देना पड़ेगा और की चार्ज का भुगतान तेल कम्पनियां करेंगी। यानि तेल कम्पनियां चार्ज का खर्च निकालने के लिए कीमत उस हिसाब से तय करेंगी। सरकार तो पहले ही कह चुकी है की अब तेल की कीमतें तय करना कम्पनियों पर छोड़ दिया गया है और सरकार का उसमे कोई दखल नही है। यानि अब आपको तेल की कीमत में चार्ज जोड़ कर देना होगा। इसी तरह बाकि सामान की कार्ड पेमेंट करने पर दुकानदार को जो चार्ज देना होता है वो सामान की कीमत में जुड़ जाता है। जाहिर है की कोई भी व्यापारी अपने पास से उसका भुगतान क्यों करेगा। इस तरह अब आपकी जेब काटने से पहले आपको देशभक्ति और भृष्टाचार से लड़ने वाले सिपाही होने का एनस्थिसिया दिया जायेगा और फिर आपकी जेब काटी जाएगी। और आप जेब कटवाकर ख़ुशी ख़ुशी मोदी मोदी करते हुए घर चले जायेंगे। जो लोग सरकार की इस बाजीगरी को नही समझते हैं और भक्ति की मुद्रा में हैं उनको तो कोई परेशानी नही है। जो लोग इसको समझते हैं उनके लिए तो जीना भी मुश्किल, मरना भी मुश्किल।

Saturday, December 31, 2016

मोदीजी हमने तो पिंजरा देखकर ही बता दिया था की आप चुहिया पकड़ेंगे।

               लोगों ने कहा खोदा पहाड़ और निकली चुहिया। तो मोदीजी ने तुरन्त कह दिया की मुझे तो चुहिया ही पकड़नी थी। क्यों पकड़नी थी चुहिया ? क्योंकि ये चुहिया ही थी जो देश की अर्थव्यवस्था को कुतर कुतर कर खा रही थी। ये कहा मोदीजी ने।
                  लेकिन मोदीजी हमने तो पहले ही बता दिया था की आप चुहिया ही पकड़ने निकले हैं। आपके हाथ में ३"x ६" का पिंजरा था। उसमे तो बड़े साइज का चूहा भी नही आ सकता। वो अलग बात है की आप मगरमच्छ पकड़ने के दावे कर रहे थे। और हमेशा की तरह आप इतनी ऊँची आवाज में और एक ही बात को इतनी बार बोलते हैं की लोगों का ध्यान आपके हाथ में पकड़े पिंजरे की तरफ गया ही नही। आपने पहले दिन दावा किया की बड़े बड़े मगरमच्छों के यहां जो नोटों का ढेर लगा हुआ है वो कागज के टूकड़ों में बदल जायेगा। लेकिन जैसे जैसे दिन बीतते गए ये साफ हो गया की कोई भी नोट कागज के टुकड़े में नही बदलेगा। उसके बाद आप बातें बदलने लगे। और अंत में चुहिया पर आ गए।
                 लेकिन आपकी नियत कभी भी मगरमच्छ पकड़ने की थी ही नही। आपने जनधन खातों पर पाबन्दी लगाई और बदनाम किया। जबकि उनमे केवल 26000 करोड़ रूपये जमा हुए थे जो 15 लाख करोड़ के सामने चुहिया जितनी ही रकम थी। आपने किसानों और मजदूरों का दानापानी बन्द कर दिया जो इस मामले में चूहे की ही हैसियत रखते हैं। आपने बड़े मगरमच्छों और कालेधन के कुबेरों के सामने बयान देने के अलावा कुछ नही किया। उल्टा आपने चुहिया मारकर बागड़ बिल्लों को परोसने का पूरा इंतजाम कर दिया। लोगों की मेहनत की एक एक पाई बैंको में जमा करवा कर कॉरपोरेट को सस्ता कर्ज देने का रास्ता बना दिया।
                   जो लोग आपको पहले से जानते हैं वो चिल्ला चिल्ला कर कह रहे थे की ये आदमी कभी भी चुहिया पकड़ने से आगे नही जायेगा। लेकिन लोग थे की मान ही नही रहे थे। आपने कष्ट सहने के लिए  धन्यवाद तो दे दिया लेकिन ये नही बताया की ये कष्ट कितने दिन और चलेगा। कम  से कम नोट शहीदों का एक स्मारक ही बनवा देते। सुना है आपकी सरकार ने टोल नाको पर हुए नुकशान की भरपाई करने के लिए कम्पनियों को करीब 900 करोड़ रूपये देने का फैसला किया है। लेकिन जो मजदूर काम बन्द होने के कारण रेल भर भर कर गांव वापिस आ गए उनको भी कुछ दे देते। जो चाय के बागानों और जंगल में मर गए उनके लिए भी कुछ करते। लेकिन उन चूहों को केवल धन्यवाद और बागड़ बिल्लों को मलाई।
                     ये ठीक है मोदीजी की आपने मान लिया की आप केवल चुहिया ही पकड़ना चाहते थे। क्योंकि आपके ये प्यारे बिल्ले अब इतने कमजोर हो चुके हैं की वो अब दौड़ भाग करके चूहे पकड़ने की पोजीशन में नही हैं। सो अब इनको चूहे पकड़कर देने पड़ेंगे। क्योंकि ये तो मुंहलगे खास बिल्ले हैं। लेकिन लोगों का कहना है की इनकी कमजोरी ज्यादा खाने की वजह से हुई अपच के कारण है। इनके लिए अच्छा होता की अगर आप इनको कुछ दिन हल्का खाना खिलाते। कई बार ज्यादा लाड़ प्यार नुकशान का कारण भी बन सकता है। कोई मुझे बता रहा था की अब इनको चुहिया का सूप पिलाया जायेगा इसलिए आप चुहिया पकड़ने निकले थे।
                       बस एक सवाल पूछना है। कृपया ये बता दीजिये की वो कौन थे जो देश का पब्लिक सैक्टर खा गए, बैंक खा गए, सड़कें और पुल खा गए, खदान खा गए, किसानों की जमीन खा गए और,
                                                             वो भी
    जो भाईचारा खा गए, शान्ति और संस्कृति खा गए, गंगा जमनी तहजीब खा गए, सुरक्षा का अहसास खा गए , कम से कम चुहिया के बस की बात तो ये है नही।

Tuesday, December 6, 2016

बैंकिंग व्यवस्था से उठता विश्वास , अर्थव्यवस्था के लिए मौत की घण्टी साबित होगा।

                    नोटबन्दी के फैसले के बाद इसके जो लाभ गिनवाए गए थे वो एक एक करके छलावा साबित हो रहे हैं। अब इसके दुष्परिणाम एक एक करके सामने आने लगे हैं। उनमे से कुछ इतने बड़े, स्पष्ट और विनाशकारी हैं की आम आदमी को भी सामने दिखाई दे रहे हैं। इन्ही में से एक है बैंकिंग व्यवस्था से उठता हुआ विश्वास।
                     कोई आदमी जब अपना पैसा बैंक में रखता है तो उसके सामने दो उद्देश्य होते हैं। एक तो ये की उसका पैसा सुरक्षित है और डूबेगा नही। दूसरा ये की उसे जरूरत के समय तुरन्त पैसा मिल जायेगा। ब्याज की आमदनी इसमें कोई भूमिका नही रखती। क्योंकि बाहर मार्किट में ब्याज की दर बैंक से दुगनी तिगुनी होती है। लेकिन उसके साथ उपरोक्त दो जोखिम जुड़े होते हैं। बाहर मार्किट में पैसा ब्याज पर देने से एक तो उसके डूबने का डर रहता है जिसके लिए लोग बैंक का रुख करते हैं। लेकिन ऐसा भी नही है की बाहर ब्याज पर दिया हुआ सारा पैसा डूब ही जाता है। बाहर मार्किट में भी ऐसे लोग हैं जिनका भरोसा और साख बहुत बड़ी है। लेकिन कई बार वो भी जरूरत के समय तुरन्त पैसा नही लोटा पाते। वो महीना बीस दिन का समय लगा देते हैं। इसके लिए लोग एमरजेंसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए पैसा बैंक में रखते हैं ताकि जरूरत के समय तुरन्त मिल जाये।
                     नोटबन्दी के बाद बैंक की इसी विशेषता पर चोट पहुंची है। जिन लोगों का पैसा बैंक में था और उन्हें उसकी बहुत सख्त जरूरत थी, उन्हें भी वो पैसा नही मिला। लोगों को शादियां टाल देनी पड़ी, हस्पतालों में इलाज नही करवा पाए और गरीब लोगों को तो राशन तक की तकलीफ खड़ी  हो गयी। लाखों रुपया बैंको में जमा होने के बाद भी लोगों की हालत भिखारियों जैसी हो गयी। इस पर भी सरकार ने इसका हल निकालने की बजाय उन्हें कैशलेस इकोनॉमी के चुटकले सुनाये। आज बैंक की लाइन में खड़ा हर आदमी इस मानसिक स्थिति में पहुंच गया है की कभी भी और किसी भी तरह एक बार उसका पैसा निकल जाये, फिर वो कभी बैंक का रुख नही करेगा। लोगों का बैंकिंग व्यवस्था से विश्वास उठ गया।
                     इसके कुछ साफ और अंधे को भी दिखाई देने वाले सबूत हैं। बैंक ने एक महीने के दौरान लोगों को करीब ढाई लाख करोड़ के नए नोट बांटे हैं। लेकिन उनमे से एक भी नोट वापिस बैंक में जमा नही हुआ। ये बात SBI के अधिकारियों ने मीडिया के सामने कही है। ये लोगों के उठते हुए विश्वास का साफ संकेत हैं। इस तरह जो बैंक आज जमा हुए पैसे से छलक रहे हैं एक समय के बाद वो सूखे के शिकार हो जायेंगे। जैसे जैसे लोगों का पैसा निकलता जायेगा वो कभी वापिस नही आएगा। आयेगा भी तो बहुत कम। और ये देश की अर्थव्यवस्था के लिए मौत की घण्टी साबित होगा। बैंकिंग सिस्टम पर भरोसा किसी भी अर्थव्यवस्था की नींव होता है।
                    वैसे भी बैंको पर एक दूसरा संकट आने वाला है। वो है बड़े पैमाने पर NPA का संकट। अब तक बैंक केवल बड़े उद्योगों के NPA से जूझ रहे थे, अब लम्बी चलने वाली मन्दी के कारण आम लोगों द्वारा लिए गए लोन, चाहे वो घर के लिए हों, गाड़ी के लिए हों या पर्सनल लोन हो, कमाई की कमी के कारण उनका एक बड़ा हिस्सा डूबने वाला है। 2008 की मन्दी के बाद जिस तरह का संकट सामने आया था उसे एक बार फिर दोहराया जाने वाला है। अब तक रिजर्व बैंक ने बैंको को नवम्बर और दिसम्बर की डिफाल्ट हुई किस्तो को NPA में नही दिखाने की छूट दे दी है, लेकिन उसके बाद, यानि जनवरी में क्या होगा ?
                      सरकार पता नही क्यों इस खतरे की तरफ से आँख मूंदे हुए है। सारा देश एक दिन में कैशलेस नही हो जाने वाला है। अर्थव्यवस्था के सामने खड़े इस संकट को गम्भीरता से लिया जाना चाहिए।

Sunday, December 4, 2016

कैशलेस इंडिया किसके लिए ?

                  नोटबन्दी के बाद अब जब कहने को बहुत कुछ नही बचा है तब इसके समर्थन में दो तर्क दिए जा रहे हैं। एक कैशलेस इंडिया बनाने और दूसरा ब्याज दर कम होने के। लेकिन क्या इन दोनों चीजों का जो मतलब है उसे लोग समझते हैं ? इसकी पड़ताल करना जरूरी है।
कैशलेस इंडिया --
                          सरकार का कहना है की लोगों को अपने छोटे छोटे खर्चे भी अपने मोबाइल फोन से paytm इत्यादि के द्वारा करने चाहियें। सरकार और मीडिया पुरे जोर शोर से इसके प्रचार में लग गया है। उसे इस बात से भी कोई फर्क नही पड़ता की paytm उसी चीन की कम्पनी है जिसके बहिष्कार के लिए अभी बीस दिन पहले तक बीजेपी और मीडिया ने कुछ भी बाकि नही रखा था और 20 रूपये के पटाखे खरीदने वाले को भी देश का गद्दार घोषित कर दिया था। उस समय देश की अर्थव्यवस्था को बचाने का केवल एक ही उपाय था की चीन का बहिष्कार करो, आज देश की अर्थव्यवस्था बचाने का केवल एक ही तरीका है की चीनी कम्पनी paytm को अपनाओ।
                        लेकिन हम इसके दूसरे पहलुओं पर बात करना चाहते हैं। मोबाइल फोन इत्यादि से और कार्ड के इस्तेमाल से उसके हैक होने और धोखाधड़ी का खतरा बढ़ जाता है। अब तक इसका बहुत इस्तेमाल न होने के बावजूद करीब 40000 शिकायतें सरकार को मिली थी। जब सरकार इस पर इतना जोर दे रही है तो क्या वो इसकी जिम्मेदारी लेगी की अगर किसी ग्राहक का अकाउन्ट हैक करके कोई उसका पैसा निकाल लेता है तो सरकार, बैंक या paytm जैसी कम्पनी उसकी भरपाई करेगी। नही। सरकार ने इससे साफ इंकार कर दिया है। फिर सरकार एक ऐसे तरीके पर क्यों जोर दे रही है जिसकी सुरक्षा की गारन्टी नही दी जा सकती ?
                       दूसरा एक और कारण है जिससे ये तरीका लोगों के हित में नही है। paytm या कार्ड द्वारा किये गए भुगतान पर बैंक और ये कम्पनियां डेढ़ से साढ़े तीन प्रतिशत तक का ट्रांजैक्शन चार्ज लेती हैं। ये चार्ज भुगतान लेने वाले दुकानदार को करना पड़ता है। इसलिए दुकानदार उतना भाव बढ़ा लेता है। अगर वो भाव नही बढ़ाता है तो उसका नुकशान होता है। अब ये नुकशान उन छोटे छोटे दुकानदारों को भी उठाना पड़ेगा जो अब तक नकद में व्यापार करते थे। एक अनुमान के अनुसार देश में करीब 75 लाख करोड़ का नकद लेन देन होता है। इसका सालाना हिसाब निकाला जाये और ट्रांजैक्शन चार्ज को केवल 1 . 25 % भी मान लिया जाये तो इसकी सालाना कुल रकम करीब सवा लाख करोड़ बैठती है। ये रकम सीधे paytm और रिलाएंस मनी जैसी कम्पनियों की जेब में जाएगी। इन उद्योगपतियों को बिना कुछ किये इतनी बड़ी रकम घर बैठे मिल जाएगी। यही कारण है की सरकार और मीडिया इस पर इतना जोर दे रहा है।
                          अगर सरकार लोगों के हित में इस व्यवस्था को लागु करना चाहती है तो उसे तुरन्त हमेशा के लिए ट्रांजैक्शन चार्ज को खत्म करने और इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। लेकिन ऐसा कभी नही होगा।
घटती ब्याज दर --
                            नोटबन्दी के पक्ष में जो दूसरा तर्क अब बड़ी जोर से दिया जा रहा है वो ये है की इससे ब्याज दरें कम होगी और आम लोगों को सस्ते ब्याज में मकान इत्यादि खरीदने का मौका मिलेगा। लेकिन इस पर भी थोड़ी जाँच पड़ताल की जरूरत है। आम तोर पर बैंको में आम लोगों का पैसा जमा होता है जिसमे लाखों पेंशन धारक और अपनी सारी उम्र की कमाई बैंको में रखकर उसके ब्याज की आमदनी से गुजारा करने वाले बुजुर्ग शामिल हैं। इसके साथ ही लाखों करोड़ों कर्मचारी भी शामिल हैं जिनके वेतन से एक निश्चित रकम हर महीने कटती है। दूसरी तरफ बड़े बड़े उद्योगपति बैंकों से कर्ज लेते हैं जिसके द्वारा वो उद्योगों की स्थापना करते हैं और अपना वैभवी जीवन जीते हैं। जब उद्योग नुकशान में होता है तो इनके अपने खर्चों पर कोई फर्क नही पड़ता लेकिन बैंको का पैसा डूब जाता है। इस तरह के डूबने के कगार पर खड़े कर्जों जिन्हें बैंक की भाषा में NPA कहा जाता है की राशी करीब 9 लाख 75 हजार करोड़ पर पहुंच चुकी है। आम जनता का बहुत ही छोटा हिस्सा बैंको से कर्ज लेता है। इसकी सबसे बड़ी मिसाल ये है की पूरे देश के सभी किसानों पर बैंको का जितना कर्ज है, अकेले अडानी समूह की कम्पनियों का कर्ज उसके बराबर है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है की ब्याज दरें कम होने का फायदा हमेशा उद्योगपतियों को होता है और नुकशान आम लोगों को होता है।
                       केवल इन दो तथ्यों पर ही तर्कपूर्ण जाँच पड़ताल की जाये तो सामने आता है की ये फैसला बड़े लोगों और उद्योगपतियों को ध्यान में रखकर लिया गया है जिसका भुगतान आम आदमी को करना है।

Saturday, December 3, 2016

व्यंग -- कैशलेस देश और कैशलेस भृष्टाचार


              8 नवम्बर को रात होते होते लोगों को पता चल गया की सरकार क्या क्या कर सकती है। जिन लोगों को सुबह दूध खरीदना था और उनके पास केवल पांच सौ का नोट था, उनकी हालत भी ऐसी हो गयी थी जैसे वर्ल्ड बैंक की क़िस्त डिफाल्ट होने वाली है। लोगों ने पूछा की ऐसा क्यों कर रहे हो ?
सरकार ने कहा की आतंकवाद बन्द करना है की नही ?
लोगों ने कहा की करना है।
तो ये आतंकवाद बन्द करने के लिए किया है।
सरकार इतना कह कर मुड़ने ही वाली थी की आतंकवादी हमले की खबर आ गयी।
लोगों ने सरकार की तरफ देखा।
सरकार ने तुरन्त कहा की जाली नोट बन्द होने चाहियें की नही ?
लोगों ने कहा की होने चाहियें।
तो ये जाली नोट बन्द करने के लिए किया है।
सरकार फिर मुड़ने वाली थी की जाली नोट पकड़े जाने की खबर आ गयी।
लोगों ने फिर सरकार की तरफ देखा।
सरकार ने तुरन्त कहा की कालाधन खत्म करना है की नही ?
लोगों ने फिर कहा की करना है।
सरकार ने कहा की सारा कालाधन कागज के टुकड़ों में बदल जायेगा। जिन लोगों के पास काले नोट हैं वो बैंकों  में ही नही आएंगे। और सारे कालेधन वाले बर्बाद हो जायेंगे। सरकार इतना कह कर मुड़ने ही वाली थी की लगातार खबरें आने लगी की ज्यादातर नोट बैंकों में जमा हो गए हैं। जिन लोगों के पास जनता को कालाधन होने का शक था वो सब बारी बारी टीवी पर आकर मुस्कुराते हुए नोटबन्दी का समर्थन कर रहे हैं।
लोगों ने फिर सरकार की तरफ देखा।
सरकार ने तुरन्त कहा की कैशलैस इकॉनोमी बनानी है।
अब लोगों ने एक दूसरे की तरफ देखा।
एक नोजवान जो जीन्स शर्ट पहने और पीछे बैग लटकाये हुए स्मार्ट फोन में बीजी था वो आगे आया और बोला की कैशलेस का मतलब है बिना नोटों वाला देश।
सरकार खुश हुई।
लोगों ने कहा की भइये, हम तो पहले ही बिना नोटों के हैं। और जिनके पास नोट हैं उनको बदल कर तुम पहले से भी बड़े नोट दे रहे हो। और नोटों के बिना हम दूध सब्जी और राशन कैसे खरीदें ?
नोजवान ने कहा की PAYTM करो।
लोगों ने फिर एक दूसरे की तरफ देखा और बोले की भाई करके दिखाओ।
तभी एक दूधवाला साईकिल पर ड्रम लादे वहां से गुजरा। नोजवान ने उसे रोककर कहा की दो लीटर दूध दो।
दूधवाले ने कहा की लाओ पैसा।
नोजवान ने कहा PAYTM है न ?
दूधवाले ने कहा -हट  और चला गया।
लोगों ने नोजवान की तरफ देखा।
नोजवान ने कहा की यही लोग देश को आगे नही बढ़ने दे रहे। जब तक देश के सारे दूधवाले, रेहड़ी सब्जी वाले, फुटपाथ पर सामान बेचने वाले और चौराहे पर बैठे मजदूर PAYTM नही करेंगे, तब तक देश आगे नही बढ़ सकता और ना ही भृष्टाचार खत्म हो सकता है। सबसे बड़े भृष्टाचारी तो यही लोग हैं।
लोगों ने एक दूसरे की तरफ देखा, फिर नोजवान की तरफ देखा, लेकिन नोजवान तब तक डाटा पैक रिचार्ज करवाने के लिए कनेक्टिविटी ढूंढने चला गया था।