Showing posts with label note ban. Show all posts
Showing posts with label note ban. Show all posts

Wednesday, January 4, 2017

नोटबंदी का असर - सूरत में जेम्स और ज्वैलरी की प्रदर्शनी " स्पार्कल -2017 " स्थगित।



एक तरह सरकार और वित्तमंत्री दावा कर रहे हैं की नोटबन्दी के बाद अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ है, वहीं दूसरी तरफ बाजार से जो खबरें आ रही हैं वो कुछ और कहानी कहती हैं। सूरत देश का सबसे बड़ा डायमंड हब है। यहां दिसम्बर में हर साल जेम्स और ज्वैलरी के लिए "स्पार्कल " के नाम से प्रदर्शनी का आयोजन होता था। इस प्रदर्शनी के आयोजक दक्षिण गुजरात चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स और गुजरात सरकार होते थे। इसमें हीरे और आभूषण के व्यवसाय से जुडी कम्पनियां अपने उत्पादों का प्रदर्शन और बिक्री करती थी।
                लेकिन इस बार नोटबन्दी के कारण इस प्रदर्शनी में हिस्सा लेने वाली कम्पनियों की तरफ से कोई उत्साह नही दिखाया जा रहा है। पिछले साल हिस्सा लेने वाली कम्पनियों की संख्या 120 थी, लेकिन इस बार 70 से भी कम कम्पनियों ने बुकिंग करवाई। इसलिए अब " स्पार्कल - 2017 " को स्थगित कर दिया गया है। अब इसका आयोजन 20 जनवरी के आसपास होने की सभावना है।

Monday, December 5, 2016

जन धन खाता धारकों को चोर क्यों समझती है सरकार ?

             जिन खातों को खुलवाते समय प्रधानमंत्री ये कह रहे थे की गरीब को भी सम्मान देना चाहती है सरकार। की अब गरीब भी ये कह सकता है की उसका बैंक में खाता है। और केवल खाता खुलवा देने को ही अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बता रही थी सरकार। तो ऐसा क्या हो गया की अचानक सभी जन धन खाता धारक सरकार को चोर नजर आने लगे ?
                8 नवम्बर को नोटबन्दी के बाद पुरे देश में बैंको में रुपया जमा होने लगा क्योंकि अब वो बाजार में नही चल सकता था। जिसके पास 500 और 1000 की नोटों में पैसा था वो सब उसे अपने खाते में डालने लगे। यही काम जन धन खातों में भी हुआ। लेकिन सरकार ने दूसरे लोगों का पैसा अपने खातों में जमा करने का आरोप केवल जन धन खातों पर ही लगाया। सरकार का मानना है की जन धन खाता धारकों ने अपने खातों को किराये पर दे दिया और दूसरों का काला धन सफेद करने के लिए इस्तेमाल किया। क्योंकि सरकार का मानना है की जन धन खाता धारकों के पास पैसा कहाँ से आएगा ? जिन खातों को सम्मान का प्रतीक बताकर खुलवाया गया था वो सब चोरी का कारण करार दे दिए गए। ये गरीबों के प्रति सरकार चलाने वालों का पूर्वाग्रह है जो बात चाहे जो भी करें लेकिन उनकी समझ यही है। लेकिन असलियत क्या है ?
               8 नवम्बर नोटबन्दी से पहले भी जन धन खातों में 45000 करोड़ रूपये जमा थे। नोटबन्दी के बाद इनमे 27000 हजार करोड़ रूपये जमा हुए। देश में कुल 25 . 5 करोड़ जन धन खाते हैं। इस तरह औसतन हर खाते में 1100 रूपये जमा हुए। बाकी खातों में करीब 12 लाख करोड़ जमा हो गए। लेकिन उनसे कोई शिकायत नही है। वो तो खाते पीते लोगों के खाते हैं सो उनमे तो सफेद धन जमा हुआ है। क्या सरकार का ये मानना है की देश में केवल 27000 करोड़ का ही काला धन था ? अगर नही तो केवल जन धन खातों को बदनाम करने और उन पर पाबन्दी लगाने का क्या मतलब है। लोगों का जो 45000 करोड़ रुपया उनमे पहले जमा था,  उस पर भी पाबन्दी लगा दी गयी। एक तो दूरदराज के गाँवों में नोटबन्दी के कारण वैसे ही भुखमरी के हालात हैं उस पर ये पाबन्दी उनके लिए निश्चित मौत का पैगाम है।
               बाकी सभी खातों पर खाता अनुसार जाँच होगी और जवाब माँगा जायेगा। लेकिन जन धन खातों को पहले ही काले धन के खाते मान लिया गया है। सरकार की निगाह में हर जन धन खाता धारक चोर है क्योंकि वो गरीब है।

Sunday, December 4, 2016

कैशलेस इंडिया किसके लिए ?

                  नोटबन्दी के बाद अब जब कहने को बहुत कुछ नही बचा है तब इसके समर्थन में दो तर्क दिए जा रहे हैं। एक कैशलेस इंडिया बनाने और दूसरा ब्याज दर कम होने के। लेकिन क्या इन दोनों चीजों का जो मतलब है उसे लोग समझते हैं ? इसकी पड़ताल करना जरूरी है।
कैशलेस इंडिया --
                          सरकार का कहना है की लोगों को अपने छोटे छोटे खर्चे भी अपने मोबाइल फोन से paytm इत्यादि के द्वारा करने चाहियें। सरकार और मीडिया पुरे जोर शोर से इसके प्रचार में लग गया है। उसे इस बात से भी कोई फर्क नही पड़ता की paytm उसी चीन की कम्पनी है जिसके बहिष्कार के लिए अभी बीस दिन पहले तक बीजेपी और मीडिया ने कुछ भी बाकि नही रखा था और 20 रूपये के पटाखे खरीदने वाले को भी देश का गद्दार घोषित कर दिया था। उस समय देश की अर्थव्यवस्था को बचाने का केवल एक ही उपाय था की चीन का बहिष्कार करो, आज देश की अर्थव्यवस्था बचाने का केवल एक ही तरीका है की चीनी कम्पनी paytm को अपनाओ।
                        लेकिन हम इसके दूसरे पहलुओं पर बात करना चाहते हैं। मोबाइल फोन इत्यादि से और कार्ड के इस्तेमाल से उसके हैक होने और धोखाधड़ी का खतरा बढ़ जाता है। अब तक इसका बहुत इस्तेमाल न होने के बावजूद करीब 40000 शिकायतें सरकार को मिली थी। जब सरकार इस पर इतना जोर दे रही है तो क्या वो इसकी जिम्मेदारी लेगी की अगर किसी ग्राहक का अकाउन्ट हैक करके कोई उसका पैसा निकाल लेता है तो सरकार, बैंक या paytm जैसी कम्पनी उसकी भरपाई करेगी। नही। सरकार ने इससे साफ इंकार कर दिया है। फिर सरकार एक ऐसे तरीके पर क्यों जोर दे रही है जिसकी सुरक्षा की गारन्टी नही दी जा सकती ?
                       दूसरा एक और कारण है जिससे ये तरीका लोगों के हित में नही है। paytm या कार्ड द्वारा किये गए भुगतान पर बैंक और ये कम्पनियां डेढ़ से साढ़े तीन प्रतिशत तक का ट्रांजैक्शन चार्ज लेती हैं। ये चार्ज भुगतान लेने वाले दुकानदार को करना पड़ता है। इसलिए दुकानदार उतना भाव बढ़ा लेता है। अगर वो भाव नही बढ़ाता है तो उसका नुकशान होता है। अब ये नुकशान उन छोटे छोटे दुकानदारों को भी उठाना पड़ेगा जो अब तक नकद में व्यापार करते थे। एक अनुमान के अनुसार देश में करीब 75 लाख करोड़ का नकद लेन देन होता है। इसका सालाना हिसाब निकाला जाये और ट्रांजैक्शन चार्ज को केवल 1 . 25 % भी मान लिया जाये तो इसकी सालाना कुल रकम करीब सवा लाख करोड़ बैठती है। ये रकम सीधे paytm और रिलाएंस मनी जैसी कम्पनियों की जेब में जाएगी। इन उद्योगपतियों को बिना कुछ किये इतनी बड़ी रकम घर बैठे मिल जाएगी। यही कारण है की सरकार और मीडिया इस पर इतना जोर दे रहा है।
                          अगर सरकार लोगों के हित में इस व्यवस्था को लागु करना चाहती है तो उसे तुरन्त हमेशा के लिए ट्रांजैक्शन चार्ज को खत्म करने और इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। लेकिन ऐसा कभी नही होगा।
घटती ब्याज दर --
                            नोटबन्दी के पक्ष में जो दूसरा तर्क अब बड़ी जोर से दिया जा रहा है वो ये है की इससे ब्याज दरें कम होगी और आम लोगों को सस्ते ब्याज में मकान इत्यादि खरीदने का मौका मिलेगा। लेकिन इस पर भी थोड़ी जाँच पड़ताल की जरूरत है। आम तोर पर बैंको में आम लोगों का पैसा जमा होता है जिसमे लाखों पेंशन धारक और अपनी सारी उम्र की कमाई बैंको में रखकर उसके ब्याज की आमदनी से गुजारा करने वाले बुजुर्ग शामिल हैं। इसके साथ ही लाखों करोड़ों कर्मचारी भी शामिल हैं जिनके वेतन से एक निश्चित रकम हर महीने कटती है। दूसरी तरफ बड़े बड़े उद्योगपति बैंकों से कर्ज लेते हैं जिसके द्वारा वो उद्योगों की स्थापना करते हैं और अपना वैभवी जीवन जीते हैं। जब उद्योग नुकशान में होता है तो इनके अपने खर्चों पर कोई फर्क नही पड़ता लेकिन बैंको का पैसा डूब जाता है। इस तरह के डूबने के कगार पर खड़े कर्जों जिन्हें बैंक की भाषा में NPA कहा जाता है की राशी करीब 9 लाख 75 हजार करोड़ पर पहुंच चुकी है। आम जनता का बहुत ही छोटा हिस्सा बैंको से कर्ज लेता है। इसकी सबसे बड़ी मिसाल ये है की पूरे देश के सभी किसानों पर बैंको का जितना कर्ज है, अकेले अडानी समूह की कम्पनियों का कर्ज उसके बराबर है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है की ब्याज दरें कम होने का फायदा हमेशा उद्योगपतियों को होता है और नुकशान आम लोगों को होता है।
                       केवल इन दो तथ्यों पर ही तर्कपूर्ण जाँच पड़ताल की जाये तो सामने आता है की ये फैसला बड़े लोगों और उद्योगपतियों को ध्यान में रखकर लिया गया है जिसका भुगतान आम आदमी को करना है।

Saturday, December 3, 2016

व्यंग -- कैशलेस देश और कैशलेस भृष्टाचार


              8 नवम्बर को रात होते होते लोगों को पता चल गया की सरकार क्या क्या कर सकती है। जिन लोगों को सुबह दूध खरीदना था और उनके पास केवल पांच सौ का नोट था, उनकी हालत भी ऐसी हो गयी थी जैसे वर्ल्ड बैंक की क़िस्त डिफाल्ट होने वाली है। लोगों ने पूछा की ऐसा क्यों कर रहे हो ?
सरकार ने कहा की आतंकवाद बन्द करना है की नही ?
लोगों ने कहा की करना है।
तो ये आतंकवाद बन्द करने के लिए किया है।
सरकार इतना कह कर मुड़ने ही वाली थी की आतंकवादी हमले की खबर आ गयी।
लोगों ने सरकार की तरफ देखा।
सरकार ने तुरन्त कहा की जाली नोट बन्द होने चाहियें की नही ?
लोगों ने कहा की होने चाहियें।
तो ये जाली नोट बन्द करने के लिए किया है।
सरकार फिर मुड़ने वाली थी की जाली नोट पकड़े जाने की खबर आ गयी।
लोगों ने फिर सरकार की तरफ देखा।
सरकार ने तुरन्त कहा की कालाधन खत्म करना है की नही ?
लोगों ने फिर कहा की करना है।
सरकार ने कहा की सारा कालाधन कागज के टुकड़ों में बदल जायेगा। जिन लोगों के पास काले नोट हैं वो बैंकों  में ही नही आएंगे। और सारे कालेधन वाले बर्बाद हो जायेंगे। सरकार इतना कह कर मुड़ने ही वाली थी की लगातार खबरें आने लगी की ज्यादातर नोट बैंकों में जमा हो गए हैं। जिन लोगों के पास जनता को कालाधन होने का शक था वो सब बारी बारी टीवी पर आकर मुस्कुराते हुए नोटबन्दी का समर्थन कर रहे हैं।
लोगों ने फिर सरकार की तरफ देखा।
सरकार ने तुरन्त कहा की कैशलैस इकॉनोमी बनानी है।
अब लोगों ने एक दूसरे की तरफ देखा।
एक नोजवान जो जीन्स शर्ट पहने और पीछे बैग लटकाये हुए स्मार्ट फोन में बीजी था वो आगे आया और बोला की कैशलेस का मतलब है बिना नोटों वाला देश।
सरकार खुश हुई।
लोगों ने कहा की भइये, हम तो पहले ही बिना नोटों के हैं। और जिनके पास नोट हैं उनको बदल कर तुम पहले से भी बड़े नोट दे रहे हो। और नोटों के बिना हम दूध सब्जी और राशन कैसे खरीदें ?
नोजवान ने कहा की PAYTM करो।
लोगों ने फिर एक दूसरे की तरफ देखा और बोले की भाई करके दिखाओ।
तभी एक दूधवाला साईकिल पर ड्रम लादे वहां से गुजरा। नोजवान ने उसे रोककर कहा की दो लीटर दूध दो।
दूधवाले ने कहा की लाओ पैसा।
नोजवान ने कहा PAYTM है न ?
दूधवाले ने कहा -हट  और चला गया।
लोगों ने नोजवान की तरफ देखा।
नोजवान ने कहा की यही लोग देश को आगे नही बढ़ने दे रहे। जब तक देश के सारे दूधवाले, रेहड़ी सब्जी वाले, फुटपाथ पर सामान बेचने वाले और चौराहे पर बैठे मजदूर PAYTM नही करेंगे, तब तक देश आगे नही बढ़ सकता और ना ही भृष्टाचार खत्म हो सकता है। सबसे बड़े भृष्टाचारी तो यही लोग हैं।
लोगों ने एक दूसरे की तरफ देखा, फिर नोजवान की तरफ देखा, लेकिन नोजवान तब तक डाटा पैक रिचार्ज करवाने के लिए कनेक्टिविटी ढूंढने चला गया था।