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Sunday, July 23, 2017

मुद्रा लोन, रोजगार के आंकड़े और नोटों की गिनती।

                    अभी अभी केंद्र सरकार का बयान आया है की उसने पिछले तीन सालों में सात करोड़ से ज्यादा लोगों को रोजगार दिया है। और ये रोजगार उसने मुद्रा बैंक से साढ़े तीन लाख करोड़ लोन देकर दिया है। उसके बाद सब तरफ इसकी चर्चा है और कुछ भक्त तो ये भी कह रहे हैं की देखो, मोदीजी ने वायदा तो सालाना दो करोड़ नौकरियों का किया था और रोजगार सात करोड़ से ज्यादा लोगों को दे दिया।
                     इस पर सबसे ज्यादा हैरानी की बात ये है की लोगों को पता ही नहीं है की सरकार ने उनको रोजगार दे दिया। और लोग हैं की फालतू में लाइन लगा कर खड़े हैं और सरकार को कोस रहे हैं। अब सरकार का काम लोगों को रोजगार देना था सो दे दिया, लोगों को इसका पता लगे न लगे ये सरकार की जिम्मेदारी थोड़ी है। कुछ लोग कह रहे हैं की वायदा नौकरियों का था और सरकार अब घुमा फिरा कर रोजगार के आंकड़े दे रही है। इस पर भक्त लोग कह रहे हैं की रोजगार और नौकरी में क्या फर्क होता है ? लोगों की भाषा कमजोर है तो ये मोदीजी की जिम्मेदारी थोड़ी है।
                       ये बयान सुनते ही मेरे पड़ौसी तुरंत मेरे घर पर आ धमके। पता नहीं वो मेरे घर को सरकार का लोक सम्पर्क विभाग का दफ्तर क्यों समझते हैं ? आते ही सवाल दागा ," ये सात करोड़ लोगों को रोजगार कैसे दे दिया ?"
                       मैंने कहा, " जब सरकार कह रही है तो दिया ही होगा। वैसे सरकार का कहना है की उसने सात करोड़ लोगों को साढ़े तीन लाख करोड़ का लोन मुद्रा योजना से दिया है जिससे उन्हें रोजगार मिला। "
                       " लेकिन लोन तो पहले से धंधा कर रहे लोगों को मिलता है। अगर किसी छोटे दुकानदार ने अपनी पूंजी की जरूरत के लिए पचास हजार का लोन ले लिया तो क्या उसे दूसरा रोजगार मिल गया। वो तो पहले से ही रोजगार शुदा था। " पड़ोसी ने अगला सवाल किया।
                        मैंने कहा ," देखो, अगर किसी दुकानदार के पास पैसे नहीं हैं तो उसे तो देर सबेर बेरोजगार होना ही था। तुम ऐसा समझ लो की सरकार ने उसे एडवांस में रोजगार दे दिया। "
                          " ऐसे कैसे समझ लें ? तुमने पहले से रोजगार शुदा लोगों को लोन दिया और अब उसे नए रोजगार में खपा रहे हो। " पड़ोसी ने सख्त एतराज किया और लगभग मुझे ही सरकार मान लिया।
                       " देखो, तुम ये तो मानते ही हो न की देश में बहुत भृष्टाचार है। इसमें बहुत से लोगों ने गलत काम धंधा दिखाकर और बैंक के लोगों से मिलीभगत करके भी लोन लिया होगा। इसके अलावा सरकारी पार्टी के कार्यकर्ताओं को भी लोन मिला होगा। तो उनको रोजगार मिला की नहीं ?" मैंने स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की।
                       मेरे पड़ोसी की आँखे चौड़ी हो गयी। उसने गर्दन हिला कर कहा। " बहुत अच्छे, चलो ये बताओ की सरकार को कैसे पता चला की साढ़े तीन लाख करोड़ का लोन दिया गया है ?"
                           " कमाल  करते हो, बैंको के आंकड़े हैं और कैसे पता चलेगा। " मैंने कहा।
                        "लेकिन रिजर्व बैंक में तो अभी तक नोटों की गिनती चल रही है। उसको तो ये भी नहीं मालूम की उसके पास कितना पैसा है। वो कैसे बता सकता है की कितने का लोन दिया। अगर सारे नोट गिनने के बाद एक दो लाख करोड़ का फर्क आ गया तो क्या करोगे ?" मेरे पड़ोसी ने आखरी पैंतरा आजमाया।
                        " तो सरकार अपने आंकड़े सुधार लेगी और क्या करेगी। अगर रकम बढ़ गयी तो विजय माल्या के खाते में जमा कर देंगे। " मैंने पीछा छुड़वाना चाहा।
                         हा हा हा। पड़ोसी ने ठहाका लगाया और चला गया।

Friday, September 25, 2015

गुजरात सरकार की स्वावलंबन योजना और पटेल आरक्षण आंदोलन

गुजरात सरकार ने पटेलों के आरक्षण आंदोलन से निपटने के लिए अपनी बहुप्रचारित स्वावलंबन योजना की घोषणा कर दी। जैसा की अनुमान था आरक्षण आंदोलन करने वाले समुदाय ने इसको ख़ारिज कर दिया। लेकिन सवर्णो का एक वर्ग ऐसा भी है जिसने इसका स्वागत किया है। भाजपा के कार्यकर्ताओं ने हमेशा की तरह आँख मूंद कर नाचना शुरू कर दिया। सवाल ये है की क्या ये योजना आरक्षण की मांग करने वाले एक बड़े तबके की अपेक्षाओं को पूरा करती है ? ध्यान से देखा जाये तो ऐसा नही लगता।
                  निजीकरण और उदार नीतियों के कारण गुजरात में एक वर्ग ऐसा है जिसको काफी लाभ हुआ। सरकार ने जब सामाजिक सुरक्षा के कामो से अपने हाथ खिंच लिए तब इन क्षेत्रों में इस वर्ग ने अपने पैर फैलाये और भरपूर फायदा उठाया। इसका दूसरा पक्ष ये रहा की आम लोगों को सस्ते में उपलब्ध सामाजिक सुविधाएँ महंगे मूल्यों पर खरीदनी पड़ी। इससे एक तो उनकी आय पर इसका प्रभाव पड़ा दूसरी तरफ इससे जो रोजगार पैदा होना चाहिए था वो नही हुआ। यहां पर रोजगार के सवाल पर दो तरह की आलोचना है, एक तो गिनती में रोजगार कम हुए और दूसरे जो नौकरियां निजी क्षेत्र में पैदा भी हुई उनके वेतन और दूसरी सुविधाओं का स्तर बहुत ही नीचा था। सरकार ने सरकारी और ग्रांटेड स्कूलों और कालेजों में कोई बढ़ौतरी नही की और धीरे धीरे शिक्षा का लगभग पूरा क्षेत्र निजी हाथों में चला गया। निजी क्षेत्र में नौकरी करने वाले अध्यापकों को तीन-तीन, चार-चार हजार में नौकरी करनी पड़ी। सरकार ने भी खर्च घटाने के नाम पर ठेके पर अध्यापकों और दूसरे कर्मचारियों की भर्ती की जिनकी तनख्वाह सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन से भी कम रखी गयी। आहिस्ता आहिस्ता आजीविका  का ये स्रोत सूख गया। निजी क्षेत्र में पहले ही जीने लायक वेतन का अभाव था जिससे स्थिति ये पैदा हुई की बिजनेस के अलावा और कोई स्थान ऐसा नही बचा जिससे एक ठीक ठीक जीवन गुजारा जा सके। उसके बाद आई मंदी से  इस क्षेत्र में भी नए लोगों के लिए प्रवेश मुश्किल हो गया। खेती के संकट ने इसमें मिल कर उस वर्ग के लिए जो अब तक सुविधापूर्ण स्थिति में था हालात बिगाड़ दिए। जब हालात मुश्किल हुए तो इस वर्ग ने इसका इलाज आरक्षण में ढूंढने की कोशिश की।
                     इस आंदोलन से निपटने के लिए सरकार ने जो इलाज सामने रखा वो कोई काम करेगा इसमें शक है। सरकार ने इस पैकेज में जो घोषणाएं की उसका लाभ केवल 90 % से ऊपर अंक प्राप्त करने वाले और 450000 रूपये सालाना आय से कम आय वाले परिवारों को ही मिलेगा। इस शर्त के बाद लाभ मिलने वाले लोगों की संख्या बेहद कम हो जाएगी। सरकार कह रही है की ये 1000 करोड़ का पैकेज है। परन्तु अगर सरकार को इतना पैसा खर्च करना ही था तो उसे सरकारी स्कूलों और कालेजों की संख्या बढ़ाने पर करना चाहिए था जिससे रोजगार के भी नए अवसर पैदा होते और जनता के भी व्यापक हिस्से को उसका लाभ मिलता। बल्कि हो तो ये रहा है की सरकार ने जो एकाध जगह सीट बढ़ाने की घोषणा भी की है तो वहां  PPP मॉडल की बात कर रही है। दूसरा इस पैकेज में उसने नौकरियों की संख्या पर कुछ नही कहा है। और तो और जो सरकारी पद खाली पड़े हैं उनको भरने की भी कोई घोषणा नही की है। इसलिए इस पैकेज से आंदोलन करने वाले समुदाय को कोई संतुष्टि महसूस होगी ऐसा नही लगता।
                     निजीकरण की नीतियों ने जो संकट समाज में पैदा किया है अब उसका असर जमीन पर दिखाई देने लगा है। बिना इन नीतियों को बदले और बिना लोगों को राहत दिए केवल उत्सव मनाने से लोगों को संतुष्टि हो जाएगी लगता नही है।