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Sunday, September 27, 2015

क्या भाजपा ( BJP ) वाकई में आरएसएस ( RSS ) के एजेंडे पर काम कर रही है ?

भाजपा पर हमेशा से ये आरोप लगता रहा है की वो आरएसएस के गुप्त एजेंडे पर काम कर रही है। लेकिन इस बार आरोप गुप्त नही बल्कि खुले तौर पर आरएसएस के एजेंडे पर काम करने का है। भाजपा और आरएसएस ने कभी भी आपसी रिश्तों का खण्डन नही किया है बल्कि उसे स्वीकार किया है। लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद इन रिश्तों का खुल कर सामने आना इस आरोप को और ज्यादा सही होने को प्रमाणित करता है। यहां सवाल ये है की आरएसएस का वो एजेंडा आखिर है क्या जिसको लागु करने का लोग आरोप लगा रहे हैं और सारे रिश्तों की स्वीकारोक्ति के बावजूद भाजपा जिससे इंकार करती रही है।
                   आरएसएस एक हिन्दू उच्च जातियों का संगठन है जिसकी स्थापना आजादी से पहले हुई थी। परन्तु इसकी स्थापना आजादी की लड़ाई में किसी योगदान के लिए नही बल्कि भारत में हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के उद्देश्य से हुई थी। आरएसएस को अंग्रेजों से कोई तकलीफ नही थी इसलिए आरएसएस के सर संघ चालक गोलवरकर ने उस समय हिन्दुओं से ये आह्वान किया था की आजादी की लड़ाई में शामिल हो कर अपनी शक्ति और समय बर्बाद करने की कोई जरूरत नही है। और हिन्दुओं को अंग्रेजों से बड़े दुश्मन मुस्लिमों, ईसाईयों और कम्युनिष्टों के खिलाफ लड़ना चाहिए।
                    आरएसएस जिस हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करना चाहता है उसमे उसकी योजना मनु स्मृति के अनुसार बताये गए ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय और शूद्र की चार श्रेणियों में बंटे समाज की स्थापना करना है। इस समाज में दलितों और महिलाओं को कोई अधिकार नही होंगे और उसी तरह दूसरे धर्म को मानने वालों को भी कोई अधिकार नही होंगे। उसकी अवधारणा में लोकतंत्र कहीं फिट नही बैठता है। अब जरूरत इस बात की है की आखिर इसकी स्थापना के लिए कौनसे काम करने जरूरी होंगे।

                १. आजादी की लड़ाई में कोई भी हिस्सेदारी ना होने और इसे एक महान उपलब्धि के रूप में स्वीकार ना करने की समझ और उसके बाद आजादी की लड़ाई ने हमारे देश में जिन लोकतान्त्रिक और प्रगतिशील मूल्यों की स्थापना की थी वो सब आरएसएस के हमले के दायरे में हैं। ये मूल्य धर्मनिरपेक्षता, समानता और स्वतंत्रता के साथ सामाजिक न्याय के मूल्य थे। ये सभी मूल्य आरएसएस के मानस  में मौजूद हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा में फिट नही बैठते हैं।

                 २. इसलिए आरएसएस हमेशा ऐसे कार्यक्रमों और ब्यानो को बढ़ावा देती है जिससे हिन्दुओं और दूसरे धर्म के लोगों के बीच गहरी विभाजन रेखा खींची जा सके। वो इस काम को कभी भी ठंडा नही होने देना चाहती इसलिए उसके नेता कुछ ना कुछ ऐसे बयान देते रहते हैं जिससे हिन्दू और गैर हिन्दू हमेशा आमने सामने रहें। इस खाई को चौड़ा करने के लिए वो हर उस चीज और विविधता को मुद्दा बनाते हैं जो इन समुदायों के बीच में है , जैसे खाने पीने की आदतों में फर्क, कपड़ों और पहनावे में फर्क, पूजा पद्धति में फर्क, त्योहारों और धार्मिक मान्यताओं में फर्क। इसलिए आरएसएस सबसे पहले उस जगह हमला करता है जहां उसे ज्यादा लोगों का समर्थन मिलने की उम्मीद होती है और फिर आहिस्ता आहिस्ता एक एक कदम उसे आगे बढ़ाता रहता है। जैसे पहले उसने बीफ बैन को मुद्दा बनाया ताकि गाय के प्रति हिन्दुओं की भावनाओं को भुनाया जा सके फिर धीरे धीरे मीट बैन तक चले गए।

                   ३. आरएसएस के लोग ईद पर क़ुरबानी को भी मुद्दा बना रहे हैं जबकि हिन्दुओं के कितने मंदिरों में ही अब तक बलि की प्रथा जारी है। झारखंड से रोज डायन कहकर महिलाओं को मारने की खबरें आती हैं। पूरी दुनिया में मुस्लिम ईद पर क़ुरबानी देते हैं अब इस को भी विवाद का विषय बनाना उस बड़ी साजिश का ही हिस्सा है जिसमे कभी भी इस आग को ठंडा ना होने देने की बात है। आरएसएस को मालूम है की मुस्लिम कभी भी ईद पर क़ुरबानी की प्रथा को बंद करने की मांग को मान नही सकते। जिस जीव हत्या को बहाना बनाकर आरएसएस मुस्लिमो पर हमले कर रहा है तो उसे सभी तरह के पशुओं , मछलियों, मुर्गे, बकरे और सूअर इत्यादि सभी तरह के पशुओं के पालने पर प्रतिबंध लगाना होगा। साथ ही उसे सभी तरह के हिंसक जानवरों जैसे शेर इत्यादि को भी खत्म करना होगा क्योंकि वो सभी जीव हत्या के कारण हैं। लेकिन चूँकि हमला मुस्लिमो पर है इसलिए इस प्रतिबंध को मुस्लिमो की मान्यताओं, खाने की आदतों और काम धंधे तक ही सिमित रखना होगा। मीट बैन के लिए आरएसएस और बीजेपी ने इस बार जैन समुदाय को बहाना बनाया और तर्क दिया की चूँकि जैन समुदाय अल्पसंख्यक है इसलिए उसकी भावनाओं का भी सम्मान करना चाहिए। जब मुस्लिमो का सवाल आता है तब आरएसएस का तर्क होता है की उसे बहुमत की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए।

                          ४.आरएसएस ने मुस्लिमो के खिलाफ नफरत फ़ैलाने के अपने अभियान में शुरुआत उन मुगल हमलावरों से की जो भारत को लूटने के इरादे से आये थे और जिनसे भारतीय जनता के मन में नफरत का भाव था जैसे मोहम्मद गौरी और गजनी। धीरे धीरे ये उसे बढ़ाकर पुरे मध्यकाल तक ले आये लेकिन इसमें भी उन्होंने ओरंगजेब जैसे शासकों को सामने रखा। आज हालत ये है की वो भारतीय  इतिहास के महान शासकों जैसे अकबर और टीपू सुल्तान को भी देशद्रोही साबित करने पर तुले हैं। अब बात इससे भी आगे बढ़ चुकी है और यहां तक की उनका हमला पूरी तरह साम्प्रदायिक रूप ले चूका है और इसमें हर मुस्लिम शामिल है चाहे  वो उपराष्ट्रपति अहमद अंसारी ही क्यों ना हों। पूरी दुनिया में विभाजनकारी ताकतें इसी तरह आहिस्ता आहिस्ता अपने विरोध का दायरा बढ़ती हैं और अपने पैर फैलाती हैं।

                          ५. आजादी की लड़ाई के स्वतंत्रता, समाजवाद और भाईचारे जैसे मूल्यों पर हमला करने के लिए उन्होंने कांग्रेस के मौजूदा नेताओं को चुना। सोनिया के विदेशी मूल को मुद्दा बनाने के बाद पूरा गांधी परिवार उनके हमले के दायरे में आ गया। यहां तक की UPA सरकार के भृष्टाचार को भी उन्होंने गांधी परिवार पर व्यक्तिगत हमले के लिए प्रयोग किया। उसके बाद जवाहरलाल नेहरू पर हमला करने के लिए उन्होंने सरदार पटेल और नेहरू के मतभेदों को बढ़ा चढ़ा कर दिखाया। अब वो नेहरू पर हमला करने के लिए नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को मोहरा बना रहे हैं। ये हमला नेहरू पर नही बल्कि उन सभी मूल्यों पर है जो आरएसएस की राह में रोड़ा हैं। ये लोग नेहरू को बहाना बना कर उन सभी मूल्यों पर हमला कर रहे हैं। जबकि सच्चाई ये है की इनके खुद के पास नेहरू के कद के आसपास का तो छोडो उसके पांच प्रतिशत का भी कोई नेता नही है।

                          ६. आरएसएस को अपनी इस मुहीम में सबसे ज्यादा खतरा वामपंथियों से है। क्योंकि यही एक विचारधारा है जो आरएसएस को रोक सकती है। वामपंथियों से मतलब केवल राजनैतिक पार्टियां नही बल्कि वो सभी लोग हैं जो शिक्षा, साहित्य और कला के क्षेत्र में पुरे देश में फैले हुए हैं। इसलिए मोदी सरकार आने के तुरंत बाद उन्होंने सबसे तेज हमला हमारी शिक्षा व्यवस्था और शिक्षा, साहित्य और कला से जुड़े संस्थानों पर किया। सभी मुख्य संस्थानों में से काबिल लोगों को बाहर करके अपने तीसरे और चौथे दर्जे के लोगों को भरना शुरू किया। FTII से लेकर IIT और नेशनल बुक ट्रस्ट तक सारी नियुक्तियां और पुरे देश में शिक्षा के स्लैब्स को बदलने की मुहीम इसी का हिस्सा है। इन्होने भाषा को भी इस विभाजन का आधार बना दिया। अब जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को नक्सलियों और ड्रग्स का अड्डा बताना और अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को राष्ट्रद्रोहियों का अड्डा बताना भी इसी हमले का हिस्सा है।

                              ७. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का ये बयान की हिन्दू धर्म ने कभी भी महिलाओं की बराबरी की बात नही की और बार बार ये दोहराना की महिलाओं की पहली जिम्मेदारी घर होती है या उसके संगठनो द्वारा वेलेंटाइन डे इत्यादि पर हमले करना, महिलाओं के प्रति आरएसएस की सोच और एजेंडे  को सामने लाता है। अब आरक्षण पर मोहन भागवत के लगातार बयान दलितों के प्रति उसकी सोच के परिचायक हैं। संघ अभी इन चीजों को लागु करने की स्थिति में नही है इसलिए इन पर एक आदमी बयान देता है और दूसरा खंडन करता है ताकि दोनों तरफ के लोगों को संकेत दिया जा सके। भारत के संविधान के जिन हिस्सों पर संघ को घोर आपत्ति है उसमे महिलाओं और दलितों की बराबरी वाले हिस्से शामिल हैं। ये बात भी किसी से छिपी नही  है की संघ ने तो संविधान की जगह मनु स्मृति लागु करने की मांग की थी।

                                और इन ऊपर के सभी कार्यक्रमों को मोदी सरकार पूरी तैयारी और जोर के साथ लागु कर रही है। बेसक अभी कुछ विदेशी निवेशकों को जाने वाले गलत संदेशों को रोकने के लिए और NDA में शामिल दूसरी पार्टियों को बेनकाब होने से बचाने के लिए प्रधानमंत्री कभी कभी कुछ अच्छी बातें भी कह देते हैं जो भरम फ़ैलाने के लिए जरूरी है लेकिन जमीन पर सब कुछ उसी तरह से लागु किया जा रहा है जो आरएसएस चाहती है। फिर इस बात में किसको संदेह रह जाता है की बीजेपी आरएसएस के एजेंडे पर काम कर रही है।

Friday, September 25, 2015

गुजरात सरकार की स्वावलंबन योजना और पटेल आरक्षण आंदोलन

गुजरात सरकार ने पटेलों के आरक्षण आंदोलन से निपटने के लिए अपनी बहुप्रचारित स्वावलंबन योजना की घोषणा कर दी। जैसा की अनुमान था आरक्षण आंदोलन करने वाले समुदाय ने इसको ख़ारिज कर दिया। लेकिन सवर्णो का एक वर्ग ऐसा भी है जिसने इसका स्वागत किया है। भाजपा के कार्यकर्ताओं ने हमेशा की तरह आँख मूंद कर नाचना शुरू कर दिया। सवाल ये है की क्या ये योजना आरक्षण की मांग करने वाले एक बड़े तबके की अपेक्षाओं को पूरा करती है ? ध्यान से देखा जाये तो ऐसा नही लगता।
                  निजीकरण और उदार नीतियों के कारण गुजरात में एक वर्ग ऐसा है जिसको काफी लाभ हुआ। सरकार ने जब सामाजिक सुरक्षा के कामो से अपने हाथ खिंच लिए तब इन क्षेत्रों में इस वर्ग ने अपने पैर फैलाये और भरपूर फायदा उठाया। इसका दूसरा पक्ष ये रहा की आम लोगों को सस्ते में उपलब्ध सामाजिक सुविधाएँ महंगे मूल्यों पर खरीदनी पड़ी। इससे एक तो उनकी आय पर इसका प्रभाव पड़ा दूसरी तरफ इससे जो रोजगार पैदा होना चाहिए था वो नही हुआ। यहां पर रोजगार के सवाल पर दो तरह की आलोचना है, एक तो गिनती में रोजगार कम हुए और दूसरे जो नौकरियां निजी क्षेत्र में पैदा भी हुई उनके वेतन और दूसरी सुविधाओं का स्तर बहुत ही नीचा था। सरकार ने सरकारी और ग्रांटेड स्कूलों और कालेजों में कोई बढ़ौतरी नही की और धीरे धीरे शिक्षा का लगभग पूरा क्षेत्र निजी हाथों में चला गया। निजी क्षेत्र में नौकरी करने वाले अध्यापकों को तीन-तीन, चार-चार हजार में नौकरी करनी पड़ी। सरकार ने भी खर्च घटाने के नाम पर ठेके पर अध्यापकों और दूसरे कर्मचारियों की भर्ती की जिनकी तनख्वाह सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन से भी कम रखी गयी। आहिस्ता आहिस्ता आजीविका  का ये स्रोत सूख गया। निजी क्षेत्र में पहले ही जीने लायक वेतन का अभाव था जिससे स्थिति ये पैदा हुई की बिजनेस के अलावा और कोई स्थान ऐसा नही बचा जिससे एक ठीक ठीक जीवन गुजारा जा सके। उसके बाद आई मंदी से  इस क्षेत्र में भी नए लोगों के लिए प्रवेश मुश्किल हो गया। खेती के संकट ने इसमें मिल कर उस वर्ग के लिए जो अब तक सुविधापूर्ण स्थिति में था हालात बिगाड़ दिए। जब हालात मुश्किल हुए तो इस वर्ग ने इसका इलाज आरक्षण में ढूंढने की कोशिश की।
                     इस आंदोलन से निपटने के लिए सरकार ने जो इलाज सामने रखा वो कोई काम करेगा इसमें शक है। सरकार ने इस पैकेज में जो घोषणाएं की उसका लाभ केवल 90 % से ऊपर अंक प्राप्त करने वाले और 450000 रूपये सालाना आय से कम आय वाले परिवारों को ही मिलेगा। इस शर्त के बाद लाभ मिलने वाले लोगों की संख्या बेहद कम हो जाएगी। सरकार कह रही है की ये 1000 करोड़ का पैकेज है। परन्तु अगर सरकार को इतना पैसा खर्च करना ही था तो उसे सरकारी स्कूलों और कालेजों की संख्या बढ़ाने पर करना चाहिए था जिससे रोजगार के भी नए अवसर पैदा होते और जनता के भी व्यापक हिस्से को उसका लाभ मिलता। बल्कि हो तो ये रहा है की सरकार ने जो एकाध जगह सीट बढ़ाने की घोषणा भी की है तो वहां  PPP मॉडल की बात कर रही है। दूसरा इस पैकेज में उसने नौकरियों की संख्या पर कुछ नही कहा है। और तो और जो सरकारी पद खाली पड़े हैं उनको भरने की भी कोई घोषणा नही की है। इसलिए इस पैकेज से आंदोलन करने वाले समुदाय को कोई संतुष्टि महसूस होगी ऐसा नही लगता।
                     निजीकरण की नीतियों ने जो संकट समाज में पैदा किया है अब उसका असर जमीन पर दिखाई देने लगा है। बिना इन नीतियों को बदले और बिना लोगों को राहत दिए केवल उत्सव मनाने से लोगों को संतुष्टि हो जाएगी लगता नही है।

Sunday, August 30, 2015

आरक्षण विरोधियों के दिल से फिर गरीबों के लिए खून टपक रहा है !

peoples gathering

आरक्षण विरोधियों के दिल से फिर गरीबों के लिए खून टपक रहा है। जब जब आरक्षण की बात होती है तब तब आरक्षण विरोधियों के दिल से खून टपकने लगता है, कभी टेलेंट के नाम पर और कभी गरीबों के नाम पर। अपर क्लास के कुछ लोगों को कभी भी आरक्षण हजम नही हुआ। जहां भी उन्हें लगता है की उनका सामाजिक और आर्थिक आधिपत्य प्रभावित हो रहा है, उनके दिल से खून टपकने लगता है। मंडल आयोग ने जब OBC के लिए 27 % आरक्षण की सिफारिश की थी तब इसके विरोध में इन लोगों ने बहुत बड़े पैमाने पर उत्पात मचाया था। तब ये आरक्षण का विरोध कर रहे थे। और उस समय बहाना था मेरिट का। उस समय तरह तरह के कुतर्क सुनाई देते थे, जैसे 40 % नंबरों से दाखिला लेने वाले किसी डाक्टर से कौन अपना आपरेशन करवाना चाहेगा। क्या किसी ऐसे विमान चालक पर भरोसा किया जा सकता है जिसे कम नंबरों के बावजूद आरक्षण के कारण दाखिला मिला हो। इस तरह के बहुत से उदाहरण दिए जाते थे।
                        उसके बाद जब ये उस आरक्षण को लागु होने से नही रोक पाये तो उसे निष्प्रभावी करने का दूसरा तरीका निकाला। अब उन्होंने अपनी अपनी जातियों को आरक्षण की सूचि में डालने की मांग करनी शुरू कर दी। अब की बार उन्होंने गरीबी का बहाना बनाया। अब वो दोनों तरह के तर्क दे रहे हैं। जैसे या तो आरक्षण को खत्म कर दो, या फिर हमे भी दे दो। अगर हमे आरक्षण दे देते हो तो आरक्षण सही है वरना गलत है। अब उन्हें देश में आरक्षण मिली हुई जातियों में कोई अछूत और गरीब नजर नही आता।
                          
mass protest rally
लेकिन ये जो लोग सबको समानता की बात कर रहे हैं और कभी मेरिट तो कभी गरीबी का मुद्दा उठा रहे हैं उनमे कौन कौन लोग हैं ? इनमे बड़ी तादाद में वो लोग हैं जिनके नालायक बच्चे 40 % नंबर लेकर डोनेशन वाली सीटों पर डाक्टरी कर रहे हैं। इनमे से बहुत ऐसे लोग भी हैं जो दूसरों की तो छोडो अपनी जाती के गरीबों का इलाज किफायती रेट पर करने को तैयार नही हैं। इनमे बहुत से ऐसे लोग भी हैं जो देश में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण के लिए जिम्मेदार हैं। अभी मध्यप्रदेश के व्यापम घोटाले की जो खबरें आ रही हैं उनमे इन्ही लोगों के बच्चों की बड़ी तादाद है। ये लोग प्राइवेट स्कुल चलाते हैं और बिना डोनेशन के किसी को दाखिला नही देते, लेकिन जब आरक्षण की बात आती है तो इनके दिल से गरीबों के लिए खून टपकने लगता है।
                          जो लोग सबको समानता की बात करते हैं उन्होंने एकबार भी नही कहा की सारी प्राइवेट सीटों को सरकार अपने कोटे में शामिल करे। इन्होने कभी नही कहा की सभी सरकारी स्कूलों की सीटें दुगनी की जाएँ। सभी प्राइवेट स्कुल कालेजों को सरकारी सहायता देकर भारी फ़ीस से मुक्ति दिलाई जाये। इन्होने कभी नही कहा की चार-चार हजार की फिक्स पगार पर भर्तियां बंद हों। हमारे देश में तो प्राइवेट संस्थाओं में आरक्षण नही है। इन्होने कभी नही कहा की उनमे काम के हालत सुधार कर उन्हें सरकारी नौकरियों के जैसा ही आकर्षक बनाया जाये। ये ऐसा कभी नही कहेंगे क्योंकि ये सारे निजी संस्थान यही लोग तो चलाते हैं और अपनी जाति  के गरीब मजदूरों को न्यूनतम वेतन तक नही देते।
                       
  वैसे जो लोग सही में ऐसा समझते हैं की अब छुआछूत की कोई समस्या देश में बची नही है और सामाजिक तौर पर बराबरी आ गयी है, उनको इन जातियों में शादियां करनी चाहियें। हमारे देश में कानून है की किसी दलित और स्वर्ण की शादी होने के बाद उनके बच्चे किसी का भी उपनाम प्रयोग कर सकते हैं। इस तरह उन्हें अनुसूचित जाती के आरक्षण का लाभ अपने आप मिलने लगेगा और देश से जाति  प्रथा भी दूर हो जाएगी। लेकिन वो ऐसा तो कभी नही कर सकते।
                         
  असल समस्या कहीं और है। जो काम सरकारों को करना चाहिए था उन्होंने नही किया। जो लोग सबकी समानता की बात करते हैं उन्हें सबके लिए शिक्षा और रोजगार की मांग करनी चाहिए थी। सरकारी स्कूलों और कालेजों में सीटें बढ़ाने की मांग करनी चाहिए थी। सरकार में खाली पड़े पदों को भरने की मांग करनी चाहिए। परन्तु चूँकि ये सारे काम ऊँचे स्थान पर बैठे लोगों को रास नही आते इसलिए इनकी मांग भी नही होती। इसके साथ ही ऊँची जातियों में जो गरीब लोग हैं वो अपने आप को उपेक्षित महसूस ना करें इसलिए उनके लिए 10 % आरक्षण की मांग की जा सकती है। इस पर शायद ही समाज का कोई वर्ग या जाति  विरोध करे। जरूरत पड़े तो इसके लिए कानून में बदलाव भी किया जा सकता है। क्योंकि इस मांग पर लगभग आम सहमति है। परन्तु फिर वही बात आती है। जो लोग आरक्षण के आंदोलनों का नेतृत्व करते हैं उन्हें इसका कोई फायदा नही होगा। इसलिए ये मांग नही उठाई जाएगी। उन लोगों का तो अंतिम मकसद पूरे आरक्षण की प्रणाली को ही निष्प्रभावी बनाना है।

Friday, July 24, 2015

Vyang - शिक्षा भी अब धन्धा है।

गप्पी -- हम पिछले कई दिनों से मुनाफदेय धंधों की बात कर रहे हैं। इनमे एक  धंधा है शिक्षा। वैसे तो आदिकाल से शिक्षा एक धंधा रही है। गुरुकुलों के समय भी गुरु शिक्षा देने की एवज में गुरु दक्षिणा मांगता था। और ये गुरु का विशेषाधिकार था की वो गुरु दक्षिणा में कुछ भी मांग सकता था, एकलव्य का अंगूठा भी और द्रुपद का राज्य भी। गुरुओं की इस दादागिरी से छुटकारा पाने के लिए सरकार ने इस धंधे को अपने हाथ में ले लिया। और गुरुओं से बदला लेने के लिए उनकी हालत ऐसी कर दी की उन्हें न्यूनतम वेतन के लिए धरने देने पड़ते हैं। पहले जमाने में गुरुओं ने राजकुमारों से जो अनाप-शनाप दक्षिणा मांगी थी ये उसका फल है। 

                        उसके बाद धंधादारी और दुकानदार राज के मालिक हो गए तो उन्होंने इस धंधे की संभावनाओं को देखते हुए इसका निजीकरण कर दिया। अब सर्वत्र शिक्षा की दुकाने खुलने लगी। खोलने वाले की हैसियत के हिसाब से बिल्डिंग के चौथे माले पर स्कूल, बंद पड़ी फैक्ट्री में स्कूल, घर के दो कमरों में स्कूल से लेकर राष्ट्रपति भवन से भी बड़े बड़े स्कूल। जो स्कूल नही खोल पाये उन्होंने कोचिंग क्लासें खोल ली। लेकिन मुकाबला सरकारी स्कूलों से था जो कम फ़ीस लेकर अच्छा पढ़ा रहे थे। सरकार में बैठे दुकानदारों ने सरकारी स्कूलों का सत्यानाश करना शुरू कर दिया। जहां बिल्डिंग हैं वहां अध्यापक नही हैं, अध्यापक है वहां ब्लैकबोर्ड नही हैं। अंग्रेजी की एक कहावत है की अगर आप पड़ौसी के कुत्ते को मारना चाहते हो तो पंद्रह दिन पहले से उसे पागल कहना शुरू कर दो। उसके बाद उसे मारोगे तो कोई विरोध नही करेगा। इस कहावत को सरकार में बैठे दुकानदारों ने पूरे पब्लिक सैक्टर पर लागु कर दिया। सरकारी स्कूल कुछ घोषित रूप से और कुछ अघोषित रूप से बंद किये जाने लगे। 

                      अब ये धंधा खूब चमक रहा है। पहले तो दाखिला देने के लिए मोटे मोटे डोनेशन मांगो। फिर ऊँची ऊँची फ़ीस लो। फ़ीस बढ़ाने का सबसे बढ़िया तरीका ये है की उसे सत्र के बीच में बढ़ा दो ताकि छात्रों और अभिभावकों के पास कोई ऑप्सन नही हो। फिर फ़ीस तो एक बहाना है असली पैसा तो दूसरी चीजों से आता है। स्कूल की बस का मनमाना किराया वसूल करो। वर्दी एक खास दुकान से खरीदने के लिए कहो जो बाजार से दुगने दाम पर मिले। किताबें ऐसी लगाओ जो किसी ने कभी देखना तो दूर सुनी भी नही हों और स्कूल से ही खरीदने का नियम बनाओ। सत्र  के बीच में टूर प्रोग्राम तय करो। छुट्टियों में डान्स क्लास चलाओ। स्केटिंग से लेकर तैराकी तक जो जो चीजें आपको याद हों उन्हें एक्स्ट्रा गतिविधियों में शामिल कर लो। आजकल अभिभावकों में भी एक तबका ऐसा हो गया है जो चाहता है की उसका बच्चा सुपरमैन हो, वो आपका समर्थन करेगा। अब देखो एक स्कूल के नाम पर आपकी कितनी दुकाने चल रही हैं। स्टेशनरी की दुकान, कपड़े की दुकान, डांस सीखाने का धंधा और दूसरे दसियों धंधे। 

                स्कूल में पढ़े लिखे अध्यापक रखना बिलकुल जरूरी नही है। बल्कि मैं तो ये कहूँगा की अगर ट्रस्टी बारहवीं पास हैं तो अध्यापक दसवीं से ऊपर नही होने चाहियें वरना अनुशासन भंग होने का खतरा रहता है। अध्यापकों को चार हजार वेतन दीजिये और चौबीस हजार पर दस्तखत करवाइये। अध्यापक पर ये शर्त भी लगाइये की वो हजार रूपये महीने में रोज दो घंटे आपके रिश्तेदार की कोचिंग क्लास में भी पढ़ाए। 

                      धीरे धीरे विकास करिये और दूसरे माले पर दो कमरों में चलने वाले कॉलेज को डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा दिलवाइए और शिक्षा मंत्री के रिश्तेदारों को घर बैठे डिग्री भेज दीजिये । इस तरह की डिग्रियां उन लोगों को भी दी जा सकती हैं जो अच्छा पैसा दे सकते हैं लेकिन पढ़ने जैसे फिजूल कामों के लिए उनके पास समय नही है। सरकार शिक्षा में बराबरी का बहुत ख्याल रखती है। हमारे संविधान में जो समाजवाद का शब्द है उसे सही तरीके से यहां लागु किया गया है। स्कूलों में पढ़ने वालों और यूनिवर्सिटिओ के उपकुलपति, कुलपति, चेयरमैन, डायरेक्टर और यहां तक की शिक्षा मंत्री तक एक ही बौद्धिक स्तर के रक्खे गए हैं। अगर कोई इसका विरोध करता है तो उसे वामपन्थी करार दे दो जैसे वामपंथी होना कोई गाली हो या संविधान के खिलाफ हो। इस तरह धीरे धीरे सारी सरकारी सस्थाओं को या तो पागल कुत्ता बना दीजिये या बेच दीजिये। कुछ लोग ये मांग कर रहे हैं की सारे देश में शिक्षा का स्तर समान होना चाहिए। इसलिए सरकार इस मांग का आदर करते हुए सारी शिक्षा को निजी हाथों में देने की योजना पर काम कर रही है।  शिक्षा के क्षेत्र में जो सरकारी हस्तक्षेप है उसे खत्म करने के प्रयास किये जा रहे हैं। सो निजी स्कूलों को जो थोड़ा बहुत मुकाबला झेलना पड रहा है वो भी जल्दी ही खत्म हो जायेगा। इसलिए मैं तो कहता हूँ की ज्यादा सोचविचार करने की जरूरत नही है और इस धंधे में कूद पड़ो।

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Friday, July 17, 2015

Vyang -- हमारी प्रगतिशील शिक्षा व्यवस्था और छात्रों की गुंडागर्दी

गप्पी -- मुझे ये इसलिए लिखना पड रहा है क्योंकि सारे देश से छात्रों की गुण्डागर्दी के समाचार आ रहे हैं। पहला समाचार केरल से है जहां छात्र इस बात को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे की पढ़ाई शुरू होने के इतने दिन बाद भी स्कूलों में किताबें नही बांटी गयी जो सरकार को बांटनी थी। अब ये तो हद दर्जे की गुंडागर्दी है की सरकार को क्या करना चाहिए और क्या नही करना चाहिए ये भी छात्र बताएंगे। छात्रों को तो सरकार का धन्यवाद करना चाहिए की कम से कम स्कूल तो खुले हैं। अगर वो भी नही खुलते तो क्या कर लेते। जैसा की नियम है और कानून में प्रावधान है, गुंडों को सुधारने का काम पुलिस का होता है। सरकार ने संविधान के अनुसार कार्यवाही करते हुए इन गुंडा छात्रों को सुधारने का काम पुलिस को सौंप दिया। उसके बाद छात्रों की जो रक्तरंजित तस्वीरें सोशल मीडिया में छपी उन्हें देखकर मुझे विश्वास हो गया की छात्र सुधर गए होंगे। 

                         दूसरी खबर हरियाणा से आई जहां नर्सिंग की छात्राएं कोर्स पास करने के बाद डिग्री की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रही थी। बोलो, अब लड़के तो लड़के, लड़कियां भी प्रदर्शन कर रही हैं। समाज का नैतिक स्तर कहां पहुंच गया है। हरियाणा में पहले ही बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान बड़े जोर शोर से चल रहा है। वहां #SelfieWithDaughter का अभियान भी बहुत जोर शोर से चल रहा है और पूरे देश में चर्चा में भी है। अब अगर वहां बेटियां पढ़ने के बाद डिग्री जैसी तुच्छ चीज के लिए प्रदर्शन पर उत्तर आएँगी तो ये तो साफ साफ गुंडागर्दी हुई और इससे राज्य की छवि खराब होगी। जाहिर है की पूरे देश में एक ही संविधान लागु है और आपको मालूम ही है की उसमे गुंडों को सुधारने का काम पुलिस को सौंपा गया है। सो हरियाणा की सरकार ने भी संविधान का सम्मान करते हुए ये काम पुलिस को दे दिया। बाद में वहां की छत्राओं की तस्वीरें भी बहुत उत्साहवर्धक थी की हमारी पुलिस अपना काम कितना बखूबी करती है और हम हैं की हमेशा पुलिस को कोसते रहते हैं। अब मेरी हरियाणा की उन बेटियों के माँ बाप को सलाह है की वो चाहें तो खून टपकती हुई बेटियों की selfie पोस्ट कर सकते हैं। सरकार बेटियों को बचाने और पढाने के लिए कटिबद्ध है और उसने कल ही फ़िल्मी हीरोइन परिणीति चोपड़ा को इस अभियान की ब्राण्ड अम्बेसडर बनाया है। 

                             तीसरी खबर गुजरात से है जहां एक सरकारी सहायता प्राप्त लॉ कालेज की सीटें 300 कम करके इतनी ही सीटें प्राइवेट कालेजों को दे दी हैं। अब इस पर हल्ला हो रहा है। कोई बड़ा आंदोलन नही हो रहा क्योंकि इस तरह छोटी बातों पर आंदोलन की परम्परा गुजरात में खत्म हो गयी है। यहां आंदोलन करने के लिए दूसरे महत्त्वपूर्ण मुद्दे हैं जैसे सड़क के बीच में आने वाले मंदिरों और मजारों को हटाने के मुद्दे। खैर, मेरा केवल ये कहना है की गुजरात की पहचान व्यवसाय से है और अगर सरकार शिक्षा के व्यवसाय को बढ़ावा नही देगी तो गुजरात इस क्षेत्र में पिछड़ सकता है। और अगर वो इस क्षेत्र में पिछड़ गया तो गुजरात की तो पहचान ही खत्म हो जाएगी। आखिर इसी माहौल के कारण तो हमारे उद्योगपति गुजरात में निवेश करने के लिए टूट पड़ते हैं। ऐसा भी नही है की सरकार शिक्षा के गिरते स्तर से चिंतित नही है। खुद मुख्यमंत्री ने इस पर चिंता व्यक्त की है ठीक उसी तरह जैसे हमारी सरकारें महंगाई और दूसरे मुद्दों पर चिंता व्यक्त करते रहते हैं। उन्होंने गुजरात में शिक्षा का स्तर उपर उठाने के लिए प्रयास भी किये हैं. कुछ लोगों का मानना है की चार-चार हजार की फिक्स पगार पर अध्यापकों की नियुक्ति करोगे तो शिक्षा का स्तर तो गिरेगा ही। लेकिन सरकार इससे सहमत नही है। इस साल दसवीं और बारहवीं की परीक्षा में गुजरात में रिकार्ड तोड़ बच्चों को फेल कर दिया गया। सरकार का कहना है की ऐसा उसने शिक्षा का स्तर ऊँचा उठाने के लिए किया। वैसे भी जब ये बच्चे शिक्षा पूरी करके नौकरी के लिए आवेदन करते हैं तो वहां की परीक्षा में फेल हो जाते हैं। इसलिए सरकार ने केवल उन बच्चों को पास करने का फैसला किया है जो बिना स्कूलों, अध्यापकों और बिना किसी सहायता से इधर उधर से अपने खुद के प्रयासों से पढ़कर पास हो सकें। इससे भविष्य में नौकरी के लिए ली जाने वाली परीक्षाओं में उनके पास होने की सम्भावना बढ़ जाएगी। और सरकार इस के लिए लगातार प्रयास  करेगी की बच्चों को स्कूलों में कम से कम पढ़ाया जाये ताकि वो अपने पैरों पर खड़े हो सकें। 

                      इन  सारी खबरों को देखने के बाद मुझे तो पूरा यकीन हो गया है की हमारी शिक्षा व्यवस्था प्रगति कर रही है। और जरूरत इस पर और ज्यादा बजट खर्च करने की नही है, बल्कि छात्रों की गुंडागर्दी रोकने की है। इसलिए सरकार को चाहिए की वो अगले बजट में शिक्षा के लिए रखे गए पैसे का एक हिस्सा पुलिस पर खर्च करने का प्रावधान भी रक्खे। 

 

खबरी -- सरकार कर ही रही है थोड़ा तो भरोसा रक्खो।

Thursday, July 16, 2015

नीतिओं के अनुसार योजनाएं या योजना के अनुसार नीतियां

गप्पी -- पहले हमारे देश में एक योजना आयोग होता था। सरकार का दावा था की ये आयोग विकास के लिए योजनाएं बनाता है। इसी आयोग के अनुसार देश में विकास के काम हुए। असली काम कितना हुआ इस पर बहस हो सकती है लेकिन स्कूल के बच्चों को योजनाएं जरूर याद करनी पड़ती थी। पहली योजना, दूसरी योजना इत्यादि। ये किस साल से शुरू हुई और उनमे क्या काम हुआ। अब सरकार का कहना है की ये आयोग एकदम बेकार की चीज थी, और उसे भंग कर दिया गया। अब सरकार नीतियां बनाएगी, इसलिए नीति आयोग बना दिया। 

                      सुबह सुबह मेरे पड़ौसी मेरे पास आकर बैठ गए और पूछने लगे की भाई ये बताओ की क्या बिना नीति के योजनाएं बन सकती हैं? जब सरकार कोई योजना बनती होगी तो उसके पीछे कोई नीति तो होती होगी या नही ? मैं इसका जवाब देने ही वाला था की उसने दूसरा सवाल पूछ लिया की भाई ये बताओ अगर तुम नीति बनाओगे और उसको लागु करने के लिए योजना नही बनाओगे तो उसका क्या फायदा होगा ? एक बार मुझे लगा की इसको मोन्टेक सिंह आहलुवालिया या अरविन्द पनगढिया के पास भेज दूँ और कह दूँ की जो लोग योजनाएं और नीतियां बनाते हैं सीधा उनसे ही क्यों नही पूछ लेते। लेकिन संबंध खराब होने के भय  से मैं ऐसा नही कर पाया। 

                    मैं बोलना शुरू करता इससे पहले ही उसने कहा की मुझे तो लगता है की हमेशा से इस देश में एक ही योजना रही है और वो है जनता को बेवकूफ बनाने की। और ये हर सरकार की साझा नीति रही है चाहे सरकार किसी भी पार्टी की क्यों ना हो। 1971 में श्रीमती इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाने की योजना बनाई लेकिन गरीबी की जगह इंदिरा जी हट गयी। बाद में जनता पार्टी ने सम्पूर्ण क्रान्ति की योजना बनाई लेकिन दो साल में पार्टी में ही क्रान्ति हो गयी। बाद में वाजपेयी जी ने देश को चमकाने की योजना बनाई लेकिन उस पर इतनी गर्द चढ़ गयी की अब वाजपेयीजी को कुछ याद नही आ रहा। अब तुम्ही बताओ की ये सब बेवकूफ बनाने की योजनाएं थी की नही ?

                    मैं बताना ही चाहता था की वो फिर बोले, अब ये सरकार कह रही थी की कालाधन देश में वापिस आये ये हमारी नीति है। लोगों के लिए अच्छे दिन आएं ये भी हमारी नीति है। लेकिन ये कैसे होगा इसकी कोई योजना हमारे पास नही है। हमने योजना आयोग भंग कर दिया है। और ये कब तक हो जायेगा इस पर हम पहले सोचते थे की 100 दिन में हो जायेगा लेकिन वेंकय्या नायडू जी ने हमे समझाया की नौ महीने से पहले तो बच्चा भी नही हो सकता तो हमने इसको बढ़ा कर एक साल कर दिया। बाद में प्रधानमन्त्री जी ने कहा की देश को गड्ढे से बाहर निकालने के लिये कम से कम पांच साल चाहियें तो हमने इसका समय पांच साल कर दिया। अब जब अध्यक्ष जी ने 25 साल की बात की तो पार्टी ने सोचा की ये कुछ ज्यादा नही हो जायेगा तो हमने तुरंत खण्डन कर दिया। अब हमने इसके लिए नीति तो बना ली है लेकिन योजना आयोग के अभाव में हम इसको लागु कैसे करें। अब तुम बताओ की ये बेवकूफ बनाने की नीति है या नही ?

                  मैंने फिर बोलने की कोशिश की लेकिन उन्होंने फिर कहना शुरू किया, अब लोगों को ऐसा लगता है की सरकार अंदर खाने हमारी जमीन लेने की योजना बना रही है। प्रधानमन्त्री कह रहे हैं की जमीन के बिना गावों में स्कूल कैसे बनेगे, लोग कहते हैं की जिन गावों में स्कूल हैं उनमे अध्यापक नही हैं इसलिए पहले स्कूलों में अध्यापक भेजो। सरकार कहती है की बजट नही है। लोग कहते हैं की नए स्कूलों में भी अध्यापक तो चाहिए ही होंगे तो सरकार कहती है की पहले स्कूल बनने दो, अध्यापकों की बाद में सोचेंगे। अब तुम ही बताओ की ये बेवकूफ बनाने की बात हुई या नही। इतना कह कर वो उठ कर चले गए। 

                        मैं सोच रहा हूँ की वो मुझसे पूछने आये थे की बताने आये थे। 

खबरी -- अगर तुम्हे लगता है की तुम इसका जवाब दे सकते हो तो अब दे दो, ये सवाल तो सारा देश पूछ रहा है।

                   

Sunday, July 12, 2015

Vyang -- ज्योतिष के लिए अध्यादेश लाओ

गप्पी -- हमारे देश में आजकल विज्ञानं का बहुत बोलबाला है। आपको ये जानकर बहुत ख़ुशी होगी की हमारे यहां सबसे बड़ा विज्ञानं ज्योतिष को माना जाता है। और ज्योतिष में भी जो हिस्सा खगोल शास्त्र से संबंध रखता है और जिसमे ग्रहों की आकाश में स्थिति और गति की गणना की जाती है उसे नही, बल्कि उस ज्योतिष को माना जाता है जो आदमी और राशि अनुसार फल बताता है। कोई भी ज्योतिषी अपने को आइंस्टीन से दो दर्जे ऊपर समझता है। बाकि के विज्ञानों की हालत तो यह है की भौतिकी का विद्यार्थी ज्योतिषी से ज्यादा नंबर लाने का उपाय पूछता है। कुछ लोग इसे गलती से अंध विश्वास कहते हैं जबकि यह अन्धविश्वास नही है बल्कि पूर्ण विश्वास है। मशीन के सही संचालन के लिए सर्विस के शैड्यूल की जगह प्रशाद का शैड्यूल बनाया जाता है। कुछ लोग इसे नशा भी कहते हैं। लोग इसके आदी हो जाते हैं।सुबह अख़बार में सबसे पहले राशिफल देखते हैं बाद में मुख्य खबरें पढ़ते हैं। अगर अख़बार के राशिफल में उस दिन कोई बुरी खबर मिलने का योग लिखा हो तो बाकि का अख़बार नही पढ़ते। कोई कोई मजबूत दिल के लोग भी होते हैं जो उस दिन कोई बुरी खबर मिलने का योग लिखा हो तो  पहले श्रद्धांजलि वाला पेज पढ़ लेते हैं और अपने उन सभी रिश्तेदारों की फोटो चेहरा याद कर करके ढूंढते हैं जिनके टपकने का उन्हें अंदेशा होता है।

                 नशे पर मुझे याद आया की एक मशहूर ज्योतिषी हैं हमारे देश में। जिनके ग्राहकों में बड़े बड़े फ़िल्मी सितारे और राजनीतिज्ञ हैं। उनका नाम है बेजान दारूवाला। ज्योतिष भी नशा ही होता है ये इनके नाम से ही पता चल जाता है। इनके पुरखे कभी दारू का धंधा करते होंगे, ये भी धंधा तो नशे का ही करते है लेकिन उत्पाद बदल लिया है। इनका नशा धड़ल्ले से बिकता है और इतनी ऊँची कीमत पर बिकता है की आम आदमी तो उसका एक पैग नही खरीद सकता। लेकिन मुझे एक बात नही समझ में आई, की ये अपनी दारू को बेजान क्यों कहते हैं। लोग तो इनकी दारू को बहुत जानदार मानते हैं। किसी किसी को तो एक बार पी हुई महीनो नही उतरती। लेकिन ये उसे बेजान कहते हैं। हो सकता है अपनी चीज की क्वालिटी ये ज्यादा बेहतर जानते हों। इनका दारू बेचने का तरीका भी गजब का है। सामान खुद बेचते हैं और नाम गणेश जी का लेते हैं। कुछ भी कहेंगे लेकिन गणेश जी कहते हैं ये जोड़कर कहेंगे। अपनी जिम्मेदारी भी खत्म और सामने वाले पर बोझ भी पड  जाये। अब कोई ये तो कह नही सकता की गणेश जी ने गलत कहा था। अपना नाम ही नही लेते।

                 ज्योतिष को हमारे जीवन में इतने गहरे तक घुसा दिया गया है की उसके निकले मुहूर्त के बिना कोई काम नही हो सकता। हमारे एक पड़ौसी परेशान थे की उन्हें लड़की की शादी दिल्ली से जाकर मुंबई करनी पड रही थी। कारण था उस दिन दिल्ली में उनके बजट के हिसाब से कोई जगह नही मिल रही थी। मैंने कहा की दो-चार दिन बाद कर लो तो बोले मुहूर्त नही है। सारा देश उन दस दिनों में शादी करना चाहता है जिनमे मुहूर्त बताया गया होता है। उस दिन शादी के लिए न जगह मिलती है न खाना बनाने वाला , न बैंड बाजा। बाकि सारा साल सब कुछ खाली रहता है। अब तो ज्योतिषियों की हिम्मत इतनी हो गयी है की बच्चा पैदा होते ही कह देते हैं की सही समय पर नही हुआ। माँ बाप पर भारी रहेगा। उपाय में लाख रूपये का खर्चा बता देते हैं। डाक्टर कह रहा है की बच्चा सही समय पर हुआ है और कोई समस्या नही है लेकिन माँ बाप मानने को तैयार नही हैं। वो एकबार भगवान की मूर्ति की तरफ नाराजगी से देखते हैं की तुम भी कैसे कैसे काम करते हो, कम से कम सही समय का तो ध्यान रक्खा होता। तुम्हे नही मालूम था तो किसी ज्योतिषी से पूछ लेते। हमारे सिर ये फालतू की समस्या डालने की क्या जरूरत थी। गलती तुम करते हो और भुगतनी हमे पड़ेगी। 

                                          इस धंधे के बाकि व्यापारी भी छाती थोक कर धन्धा करते हैं। अख़बारों के विज्ञापन पढ़ लीजिये।     " सब जगह से निराश , 101 % गारण्टी के साथ काम करवाएं। मेरा किया कोई काट नही सकता। बाबा मूसा बंगाली -- महाकाली उपासक " इतनी गारंटी तो कोलगेट भी नही देती। मैं कहता हूँ की इन पर सर्विस टैक्स क्यों नही लागु किया जाता। वरना सरकार को बैठे बिठाये बड़ी आमदनी का जरिया हो जाता।

                   लेकिन कई बार ऐसा भी होता है की ज्योतिषी मुहूर्त देख कर पुल का उद्धघाट्न तय करता है। नेताजी नारियल फोड़ कर घर नही पहुँचते और पुल गिर जाता है। लड़का लड़की दोनों के माँ बाप अच्छी तरह शुभ मुहूर्त देखकर शादी करते हैं और छह महीने में नौबत तलाक की आ जाती है। जिस बच्चे को वो बिलकुल सही समय और योग के अनुसार पैदा हुआ बताते हैं वही ऐसे ऐसे कुकर्म करता है की माँ बाप को मुंह छिपाना मुश्किल हो जाता है। पर इसकी जिम्मेदारी लेने को कोई तैयार नही है। ज्योतिषी फ़ीस लेकर भविष्य बताता है और मुसीबत का उपाय करता है लेकिन परिणाम उल्टा निकलता है। कानून के हिसाब से तो यह ग्राहक सुरक्षा अदालत का मामला बनता है। सरकार को चाहिए की वो ज्योतिष को व्यापार घोषित कर दे ताकि लोग अदालत जा सकें। 

                       पिछले दिनों ये खबर आई थी की कुछ विश्वविधालय ज्योतिष का डिग्री प्रोग्राम शुरू कर रहे हैं। मैं कहता हूँ की देश धन्य हो जायेगा। एक तो इससे विज्ञानं के क्षेत्र में हमारी स्थिति सुधरेगी और हम योग दिवस की तरह ज्योतिष के नोबल पुरुस्कार की मांग कर सकते हैं। इससे कम से कम एक नोबल पुरुस्कार हर साल हमारे लिए पक्का हो जायेगा। दूसरा सरकार के सभी सरकारी विभाग एक स्थाई ज्योतिषी रख सकेंगे जो यह बता सकेगा की किस इमारत का फीता कौनसे मंत्री से कटवाना शुभ रहेगा। सरकार तय कर सकेगी की कौनसी सड़क किस मुहूर्त में शुरू की जाये। जिस दिन राहुकाल हो उस दिन दफ्तर में छुट्टी रक्खी जा सकती है। दफ्तर खुलने का समय बाकायदा चौघड़िया देखकर तय किया जा सकता है। साथ ही संविधान में जो साइंटिफिक टेम्परामेन्ट को बढ़ावा देने जैसी उल-जलूल बातें लिखी गयी हैं उन्हें घोषित रूप से खत्म किया जा सकेगा और उसके लिए सरकार को इतने लचर बहाने बनाने की जरूरत नही पड़ेगी जैसे वो अब बना रही है। इसलिए विश्व महत्त्व के इस काम पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है और संसद के मानसून सत्र में इसके लिए प्रस्ताव लाया जा सकता है। बल्कि मैं तो कहता हूँ की उतना इंतजार करने की भी जरूरत नही है, इसके लिए एक अध्यादेश लाया जा सकता है। वैसे भी सरकार इस महीने कोई अध्यादेश नही लाई है और उसकी छवि खराब हो रही है। 

 

खबरी -- उम्मीद रखनी चाहिए की सरकार अच्छा सा मुहूर्त देखकर अध्यादेश जरूर लाएगी।

              
               

Thursday, July 9, 2015

Vyang-- ग्रीस, हम और लोकतन्त्र

खबरी -- क्या ग्रीस के संकट का हम पर कोई असर होगा। 


गप्पी -- सरकार कह रही है की नही होगा। बड़े बड़े अर्थशास्त्री कह रहे हैं की नही होगा। लेकिन मैं चाहता हूँ की असर हो और भारी असर हो। ठहरिये , मुझे देशद्रोही की संज्ञा देने से पहले मेरी पूरी बात सुन लीजिये। इस तरह का उतावलापन जो हम हर बात में दिखाते हैं अच्छा नही होता। 

                ग्रीस के लोगों और सरकार का कहना है की वहां का जनमत संग्रह लोकतन्त्र की लड़ाई है। अब हमारे यहां के लोगों को ये ही समझ नही आ रहा है की ये कर्जे की लड़ाई है और इसका लोकतन्त्र से क्या लेना देना है। पहले हम ग्रीस के लोगों की पूरी बात सुन लेते हैं। उनका कहना है की हम जब भी यूरोपियन यूनियन, IMF या वर्ल्ड बैंक से कर्जा लेते हैं वो हम पर शर्तें लगाता है की लौगों के वेतन में कटौती करो। पेंशन में कटौती करो। शिक्षा और स्वास्थ्य पर किये जाने वाले खर्चों में कटौती करो और वो टैक्स बढ़ाओ जो सीधे लोगों पर असर करते हैं जैसे सेल्स टैक्स। हमने ये सब किया। लोगों की खर्च करने की ताकत कम हो गयी। लोगों ने पेट पर पट्टी बांध ली। कारखानों का माल बिकना कम हो गया। उन्होंने कर्मचारियों की छंटनी की। बेरोजगारी और बढ़ गयी और स्थिति और खराब हो गयी। अब उनके अर्थशास्त्री चिल्ला रहे हैं की तुम्हारा उत्पादन क्यों नही बढ़ रहा है। हम कहते हैं की हमने तो वही किया है जो आपने करने को कहा था। अब इसका परिणाम खराब निकला, जो की निकलना ही था तो उसकी जिम्मेदारी तुम लो। वो कह रहे हैं की नही, रास्ता हम बताएंगे और जिम्मेदारी तुम्हारी होगी। अब पुराना कर्जा चुकाने के लिए नया कर्जा लो और बाकि चीजों में और कटौती करो। सारी चीजें जो सरकार की है चाहे हस्पताल हों, स्कूल हो या कारखाने हों सबको प्राइवेट को बेच दो। हम कह रहे हैं की वो तो आपके कहने पर हम पहले ही बेच चुके हैं। यहां तक की पानी तक का निजीकरण कर चुके हैं। अब उन्होंने हमारे सामने दो रास्ते छोड़े, या तो हम उनके करार पर दस्तखत करके भूखे मरें या बिना करार किये भूखे मरें। 

                      ये स्थिति थी जिसमे हमने कहा की हम भूखे मरने वाले करार पर दस्तखत नही करेंगे। देश हमारा है, तो इसका फैसला हमे लेने दो की कर्ज के पैसे का उपयोग हम कैसे करें। अगर हम ये फैसला नही कर सकते की हमे स्कूल और हस्पताल सरकारी रखने हैं या प्राइवेट, हमे अपने लोगों को उतनी पेंशन तो देनी पड़ेगी की वो जिन्दा रह सकें ये तय नही कर सकते तो काहे का लोकतंत्र। हम सारी  नीतियां तुम्हारे कहने से बनायेगे तो हमारे लोकतंत्र का क्या मतलब रह जायेगा। इसलिए हम कह रहे हैं की ये लोकतंत्र की लड़ाई है। 

                     अब हम अपनी बात करते हैं। हमारे यहां दो तरह का लोकतंत्र है एक पार्टीतंत्र और दूसरा भीड़तंत्र। कुछ लोग केवल वो करते हैं जो पार्टी या पार्टी का कोई नेता कहता है। वो कहता है की अपने गाल पर थप्पड़ मारो तो हम पहले तो अपने गाल पर थप्पड़ मारते हैं और फिर ताली बजाते हैं नेता जी के सम्मान में। दूसरे लोग वो करते हैं जो भीड़ कहती है। भीड़ किसी शरीफ आदमी की तरफ ऊँगली करके चिल्ला देती है चोर,चोर। और हम उसे मारकर उसकी सेल्फ़ी फेसबुक पर डाल देते हैं जिस पर हमारे वो मित्र जो मारने में शामिल नही हो पाये थे, धड़ाधड़ लाइक करते हैं। 

                  अब हम ग्रीस संकट के हम पर असर की बात करते हैं। ग्रीस से कहा गया की पब्लिक सैक्टर को बेच दो, हमने तो बिना कहे की सेल लगा रक्खी है। ग्रीस को कहा गया की शिक्षा पर कम खर्च करो, हमने तो पहले ही शिक्षा के बजट में कटौती कर दी है। ग्रीस को कहा गया की स्वास्थ्य सेवाओं को प्राइवेट के भरोसे छोड़ दो। हमने हालाँकि उसे पहले ही प्राइवेट के भरोसे छोड़ा हुआ था, लेकिन हमने फिर भी स्वास्थ्य के बजट में और कटौती कर दी। और ये सब हमने उनके सुझाव के अनुसार विकास के नाम पर ही किया। सो हमे कैसा खतरा। हम तो शर्तें पहले लागु करते हैं और कर्ज लेने बाद में जाते हैं। इसलिए हमारी रेटिंग लगातार बढ़ रही है। कुछ लोग ये एतराज करते हैं की ये लोकतंत्र नही है। 

                    ये लोकतंत्र कैसे नही है ? क्या हमे लोगों ने नही चुना। वैसे हम आपको बता देते हैं की हम लोकतंत्र से ज्यादा राजतन्त्र में विश्वास रखते हैं। हमारे प्रधानमंत्री इसका उदाहरण हमेशा पेश करते रहते हैं। वो चुने हुए मुख्यमंत्रियों से मिलने से इंकार कर देते हैं ,क्या ये राजतन्त्र का उदाहरण नही है। इसलिए मैं चाहता हूँ की ग्रीस संकट का  असर हो और लोग ये पूछें की पैसा कहां खर्च हो रहा है और कहां खर्च होना चाहिए। नीतियां कैसी हों ये लोग पूछें। लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं की ग्रीस का हम पर कोई असर नही होगा। मगर मैं इंतजार करूंगा क़यामत तक , खुदा करे की क़यामत हो और असर की खबर आये।

Vyang--शिवराज सिंह हाजिर हों।


गप्पी -- मध्यप्रदेश आजकल खबरों में है। खबरों में व्यापम घोटाले की वजह से है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह पर आरोप लग रहे हैं और वो इनकार कर रहे हैं हमेशा की तरह। ये तय किया गया की एक जनअदालत लगा ली जाए जिसमे शिवराज सिंह से कुछ सवाल पूछे जाएँ।

          अदालत लगी हुई है। आवाज लगाई जाती है, शिवराज सिंह हाजिर हों।

           शिवराज सिंह अदालत में हाजिर होते हैं तो जनता का वकील उनसे सवाल पूछता है।

वकील -- क्या आप जनता के सवालों का जवाब देने के लिए तैयार है ?

शिवराज सिंह -- मैं जनता के प्रति जवाबदेह नही हूँ। वैसे तो मैं किसी के प्रति भी जवाबदेह नही हूँ। परन्तु जनता के प्रति जवाबदेह होने का तो सवाल ही पैदा नही होता। हमारी पार्टी में इसका रिवाज ही नही है।

वकील -- लेकिन आप जनता के चुने हुए नुमाइन्दे हैं। आप जनता के प्रति जवाबदेही से इनकार कैसे कर सकते हैं ?

शिवराज सिंह -- मुझे मुख्यमंत्री जनता ने नही बनाया, पार्टी ने बनाया है। इसलिए मैं जनता के प्रति नही पार्टी के प्रति जवाबदेह हूँ। जनता को अपना भरम निकाल देना चाहिए।

वकील -- लेकिन आपको विधायक तो जनता ने ही चुना है।

शिवराज सिंह -- आपने मुझे यहां मुख्यमंत्री की हैसियत से बुलाया है। इसलिए बात भी उसी हिसाब से कीजिये। मैं यहां विधायक की हैसियत से नही आया। हूँ, जनता।

वकील -- क्या आप व्यापम घोटाले की नैतिक जिम्मेदारी लेते हैं। 

शिवराज सिंह -- आप हमसे नैतिकता की बात कैसे कर सकते हैं ? आपको मालूम होना चाहिए की हम राजनीती में हैं। 

वकील -- तो आप किस चीज की जिम्मेदारी लेते हैं। 

शिवराज सिंह -- हम केवल मध्यप्रदेश की जिम्मेदारी लेते हैं। मध्यप्रदेश का विकास हमारी जिद है, हमारा पैशन है। 

वकील -- लेकिन इतना बड़ा घोटाला हुआ है। 

शिवराज सिंह -- ये मध्यप्रदेश को बदनाम करने की साजिश है ये स्टैण्ड हमने कल ही तय किया है। अब आपको हररोज ये सुनने को मिलेगा की ये मध्यप्रदेश को बदनाम करने की साजिश है। बिलकुल गुजरात की तरह। ये कांग्रेस की साजिश है। 

वकील -- क्या आप कहना चाहते हैं की घोटाला नही हुआ ? तो फिर आप कैसे कहते हैं की इस घोटाले का पर्दाफाश आपने किया था। 

शिवराज सिंह -- हाँ, हम मानते हैं की घोटाला हुआ है इसीलिए तो हम जाँच करा रहे हैं। आखिर सबसे ज्यादा नुकशान तो हमारा ही हुआ है। 

वकील -- वो कैसे ?

शिवराज सिंह --  देखिए पूरी बात ध्यान से सुनिए। वरना आप कभी भी इस घोटाले की गंभीरता और हमारा नुकशान समझ नही पाएंगे। पहले कांग्रेस का राज था। दाखिलों और भर्तिओं की कोई सही प्रणाली नही थी। पर्चियों पर भर्ती हो जाती थी। हमने व्यापम की स्थापना की। आप नाम से ही समझ सकते हैं की हमारी योजना कितनी व्यापक थी। हमने सारी नौकरियों के रेट तय किये। दाखिलों के रेट तय किये। MBBS का 35 लाख और MD का एक करोड़। इसी तरह इंजीनियरिंग के रेट तय किये। फिर सभी नौकरियों के रेट तय किये। MBBS का झूठा पेपर देने के पैसे तय हुए। दलाली की दरें तय की। हमारे पास नई नौकरियां नही थी तो हमने 10 -15 साल से नौकरी कर रहे अध्यापकों को पेपर दिलवा कर 24000 अध्यापकों को बर्खास्त किया और उनकी जगह नई भर्तियां की। हम सोच रहे थे की इस तरह लगाये हुए अध्यापकों के पढाये हुए बच्चे तो भविष्य में पेपर पास ही नही कर पाएंगे और हमारा धन्धा बढ़ेगा। इस तरह की पूरी योजना बनाने और लागु करने में कितनी मेहनत होती है आप समझ सकते हैं। लेकिन अब हिसाब मिलाता हूँ तो हिसाब ही नही मिल रहा। जितनी नौकरियाँ दी गयी, दाखिले किये गए उसके हिसाब से जितना पैसा आना चाहिए था नही आया। घोटाला हो गया। इसलिए मैंने जाँच शुरू की। मेरी तो सारी मेहनत पानी में चली गयी। 

वकील -- लेकिन आपने अभी जो सीबीआई की जाँच की मांग की है तो लोग कहते हैं की रपट पड़े तो हर-गंगा। 

शिवराज सिंह -- जिन लोगों ने मेरे साथ ये घोटाला किया वो ही विपक्ष से मिल गए। कहते हैं की हमारा नाम आया है तो तुम्हारा भी आना चाहिए। कलियुग है। मैं अगर नही कहता तो भी सीबीआई जाँच तो होनी ही थी। इसलिए मैंने भी कह दिया। 

वकील -- सुना है की आपकी पार्टी के अंदर भी आपसे इस्तीफा मांगने वाले बढ़ रहे हैं क्या आपको इस्तीफा देना पड़ेगा ?

शिवराज सिंह -- सब ऊपर वाले की मर्जी पर निर्भर करता है। हम तो उसके हाथ की कठपुतलियां हैं। वैसे मैं उनको हमेशा अपना बड़ा भाई कहता रहा हूँ। लेकिन हर मुख्यमंत्री वशुन्धरा राजे की तरह ताकतवर तो नही होता न। 

                 तभी जनता में से आवाज आई की ये शिवराज सिंह नकली है। ये असली शिवराज सिंह नही है। 

अदालत ने पूछा की क्या तुम असली शिवराज सिंह नही हो ?

लेकिन मेरे सारे जवाब असली हैं आपको आम खाने से मतलब होना चाहिए। 

अदालत ने इस बात की जाँच होने तक की ये शिवराज सिंह असली है या नकली कार्यवाही स्थगित कर दी। 

 

खबरी -- लगे हाथ ये भी सीबीआई को दे देते।

Sunday, July 5, 2015

Vyang -- नालायक होने की जाँच कैसे हो।

खबरी -- मीडिया में फर्जी डिग्रियों का ढेर लग गया है। 


गप्पी -- ये जो फर्जी डिग्रियां दिखाई जा रही हैं, वो तो केवल एक ही किस्म की फर्जी डिग्रियां हैं। मुझे लगता है की बाकि के जो लोग दूसरे किस्म की फर्जी डिग्रियां लिए हैं वो अपनी डिग्री बचाने के चककर में दूसरों की डिग्रियों का मामला उठा रहे हैं। 

                           मसलन ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्हे बाकायदा यूनिवर्सिटी ने डिग्री दी है। उन लोगों ने वहां पढ़ाई भी की है लेकिन बहुत से लोगों को लगता है की ये डिग्रियां भी फर्जी हैं। छात्र कई साल लगाता है उसके बाद उसे डिग्री देते वक़्त कह दिया जाता है की लो बेटा हम लिख कर देते हैं की अब तुम किसी काम के नही रहे। वो आगे दाखिला लेने जाता है तो एंट्रेंस टेस्ट होता है। नए कालेज को पुरानी डिग्री पर भरोसा नही है। टेस्ट में फेल होता है और दाखिला नही मिलता। वो डिग्री दिखाता है दाखिला देने वाले कह देते हैं की जेब में रखो। 

                          नौकरी के लिए आवेदन करता है तो पहले परीक्षा होती है फिर इंटरव्यू होता है। क्योंकि डिग्री पर किसी को भरोसा नही है। चार लाख लोग परीक्षा में बैठते हैं और चार हजार पास होते हैं। बाकि नालायक हैं। जिन्हे नालायक युनिवर्सिटियों ने डिग्रियां थमा दी हैं। 

                           डिग्री किसी नौकरी की गारंटी नही है ये तो माना जा सकता है। लेकिन उसकी लायकात की गारंटी तो होनी ही चाहिए। आदमी के पास डिग्री असली है और लायकात फर्जी है। अब इसका क्या हो। 

                            कई बार चुन लिए जाने के बाद मालूम पड़ता है की नालायक को चुन लिया। सरकारों के साथ तो हरबार यही होता है। चुनाव में नेता बड़े बड़े दावे करते हैं। कसम खा खा कर यकीन दिलाते हैं की हम पूरी तरह लायक हैं। लोग नए कपड़े पहन कर वोट देने जाते हैं। सरकार बन जाती है। बनते ही मालूम पड जाता है की नालायक है। लोग कहते हैं की तुम नालायक हो, सरकार कहती है की नही हम तो लायक हैं। लोग कहते हैं की तुमने फलां वायदा किया था, अब मुकर रहे हो इसलिए नालायक हो। सरकार कहती है की वायदों का संबन्ध तो केवल वोट लेने से होता है, सरकार चलाने से थोड़ा ना होता है। सरकार बनने के बाद हमे इस सत्य का बोध होता है की पिछली सरकार के जिस काम को हम देश विरोधी बता रहे थे वो तो देश के हित  में था। पहले हमारे पास जानकारी नही थी अब है। जो काम पिछली सरकार ने लोगों की बार बार की मांग करने के बावजूद नही किया था और जिसके लिए हमने सरकार को जनविरोधी बताया था अब पता चला की वो तो किया ही नही जा सकता था । सरकार जनविरोधी नही थी हमे तो लगता है की जनता ही जनविरोधी है। 

                           लोग नारे लगाते हैं की वापिस आओ नालायक हो। सरकार कहती है नही आएंगे, हम चुन कर आये हैं नालायक चुनने वाले हो सकते हैं हम नही हैं। जनता नालायक है इसे बदलना होगा। इसी में देश की भलाई है। अब हम लायक हैं या नालायक हैं इसका फैसला इस जनता से लेकर चैंबर आफ कामर्स पर छोड़ देते हैं। हम हमारे लायक होने का प्रमाणपत्र अमरीका से मंगवा लेते हैं। तब तो तुम्हे भरोसा होगा की हम लायक हैं। 

                          लोग काम के लिए सरकारी दफ्तरों में जाते हैं। दस धक्के खाने के बाद काम नही होता। लोग कहते हैं कर्मचारी नालायक हैं। कर्मचारी कहते हैं की लोगों को काम करवाना ही नही आता, इन नालायक लोगों को झेलते हम परेशान हो गए हैं। लोग कहते हैं की तुम दो घण्टे लेट आये हो, कर्मचारी कहता है की साहब का बिजली का बिल भरकर आया हूँ लेट नही हूँ। लोग कहते हैं की तुम्हे साहब का बिल भरने का वेतन नही मिलता। कर्मचारी कहता है वेतन तो साहब ही देता है तुम कब देने आये थे बताओ। 

                                            जनता कहती है -नालायक 

                                            कर्मचारी कहता है -तुम नालायक 

                  हर बार सरकार और सरकारी अमला जनता को नालायक सिद्ध कर देता है। मैं चाहता हूँ की इस नालायकी को टेस्ट करने का भी कोई तरीका निकाला जाये। लेकिन ध्यान रहे की वो तरीका जनता को नालायक न सिद्ध कर दे।

Thursday, July 2, 2015

महिला सुरक्षा के लिए नारे लगाइये

खबरी -- क्या तुम समझते हो की #SelfieWithDaughter महिला सुरक्षा में कुछ योगदान करेगी ?


गप्पी -- हमारा भारत देश महान है। हमे इस बात का बड़ा गर्व है की हम ऋषियों की संतान हैं। पता नही ऐसी ऐसी चीजे कहाँ से ढूढ़ कर लाते  हैं। हमने दुनिया में कुछ बड़े कीर्तिमान स्थापित किये हैं। इसमें एक ये भी है। क्या कभी किसी ने सोचा की महिला सुरक्षा के नाम पर ये जो इस तरह के अभियान चलाए जा रहे हैं उनका मतलब क्या है। ये #SelfieWithDaughter का जो अभियान है उसका मतलब क्या है। ये अभियान बेटियों की सुरक्षा के लिए चलाया जा रहा है। पर सुरक्षा किससे ? उसके खुद के माँ बाप से ! उसके अपने माँ बाप उसे पैदा होने से पहले ही गर्भ में ही ना मार दें इसलिए। वाह ! कितने महान हैं हम और हमारी संस्कृति। जब कोई हमारे देश में महिलाओं की दयनीय स्थिति की तरफ ध्यान दिलाने की कोशिश करता है तो हम एक स्वर में चिल्लाते हैं। ये हम पर आरोप है, हमारी महान संस्कृति को बदनाम करने की साजिश है। बिना पढ़े  लिखे और बिना अक्ल के लोगों का गिरोह टूट पड़ता है उस पर। लेकिन बन्धु , सच्चाई तो यही है।

                     जब हम महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव का सवाल उठाते हैं तो उसका उदगम तो हमारे घर से होता है। हमने कभी भी इस भेदभाव के खिलाफ ईमानदारी से काम नही किया। केवल नारे लगाये की हमारे ग्रन्थों में लिखा है की हमारे यहां नारी की पूजा होती है। हमने ओरतों को देवी का दर्जा दिया है। लेकिन केवल नारे लगा देने से कभी समस्याएं हल हुई है। हम समस्या की आँख में आँख डालने को तैयार नही हैं। महान जो हैं।

                 हमने गावों में पहले इस बात को बहुत बार सुना था की दूध पीने से लड़कियों को मूंछे आ जाती हैं। लड़कियों को दूध ना देने का कितना बढ़िया इलाज निकाला था हमने। और लोग हैं की हमारी काबिलियत पर शक करते रहते हैं। हम हमेशा समस्या से ध्यान हटाने के लिए नारे लगाते हैं। और #SelfieWithDaughter भी नारा है। अगर हमे काम ही करना होता तो क्या महिला आरक्षण बिल सालों से लटका रहता। किसी की भी सरकार रही हो सबने इस पर आम सहमति ना होने का बहाना किया। जैसे संसद में सारे काम आम सहमति के द्वारा ही होते हों। क्या लैंड बिल पर आम सहमति है। क्या बीमा बिल पर आम सहमति थी। नही थी। सो बहाने मत बनाओ। या तो सच का सामना करो या इस तरह के नाटक करना बंद करो।

                  अब हमे लड़कियां नही चाहियें। लड़कियों को पालते हैं तो ऐसा लगता है जैसे किसी की बेगार कर रहे हों। हमे तो बस बहुएँ चाहियें। बहुएँ भी ऐसी की शादी करके आएं तो इतना दहेज लाएं की घर भर जाए। सुबह चार बजे उठकर रात को ग्यारह बजे तक पूरे परिवार की सेवा करें। नजर ऊपर ना उठाएँ। शराब पीकर कभी पिट जाएं तो भी चुप रहें। केवल बेटों को जन्म दें। अब ये कोई बड़ी मांग तो है नही। कोई उनसे ये पूछ ले की भाई लड़कियां नही होंगी तो बहुएं कहाँ से आएंगी तो कहेंगे की बहुएँ तो दूसरे के घर से आती हैं उसका हमारे यहां बेटियों के होने से क्या संबंध है। 

                   अब सरकार नारे लगा रही है की बेटी बचाओ। हम भी लगा रहे हैं। दूसरों से कह रहे हैं की तुम अपनी बेटी बचाओ वरना हमारे यहां बहुएँ कहाँ से आएंगी । कैसे बचाओ , ये तो सरकार बताएगी। बेटियों के लिए शिक्षा मुफ्त होगी ? नही होगी। उसके लिए इस गरीब देश के पास साधन कहाँ हैं। विज्ञापनों के लिए हैं। उन्हें रोजगार में प्राथमिकता मिलेगी ? क्यों मिलेगी ? ये तो हुई बेटियों की बात। अब बाकि महिलाओं की बात करते हैं। 

                      हम रोज बयान देते हैं की बलात्कार की सजा मौत होनी चाहिए। फिर भी लोगों को क्यों लगता है की हम महिला सुरक्षा के लिए गम्भीर नही हैं। इसीलिए तो लगता है भैया की आप गंभीर नही हैं। क्योंकि फांसी की सजा भी नारा है। अगर नारा नही होता तो महिलाओं के संगठन इसका विरोध क्यों करते। अब कोई महिला संगठनो को तो महिला विरोधी नही कह सकता। उनका कहना है की बलात्कार के केसों में खुद महिला मुख्य गवाह होती है। अगर खून और बलात्कार दोनों की सजा फांसी हो जाएगी तो कोई बलात्कारी लड़की को जिन्दा क्यों छोड़ेगा। बलात्कार के लिए फांसी की सजा का मतलब होगा पीड़ित लड़कियों की हत्या सुनिश्चित करना। महिला संगठन चाहते हैं की इसके लिए मुकदमा दर्ज करने और जाँच के लिए निश्चित नियम बनाये जाएँ। और जो पुलिस ऑफिसर इन नियमो का उल्लंघन करे उसके खिलाफ गुनाह में शामिल होने का केस  दर्ज किया जाये। 

                        छोडो यार कहाँ का पचड़ा ले बैठे। अभी तो एकबार अभियान हो गया। बाद में चुनाव आएगा  तब देखेंगे। यहां इन चीजों को कौन पूछता है। ये तो नारी की पूजा करने वाला  देश है। यहां नारी के लिए कुछ और करने की जरूरत ही कहाँ है।

                  

Monday, June 29, 2015

विज्ञानं का भविष्य बहुत उज्ज्वल है हनुमान जी की कृपा से

गप्पी -- मुझे अपने पड़ौसी के साथ सुबह सुबह बाहर जाना था। मैं उनके घर पहुंचा तो वे घर के बाहर ही मेरा इंतजार कर रहे थे। उनके साथ उनका सुपुत्र भी था जो आठवीं क्लास में पढ़ता है। पड़ौसी ने बताया की आज उसका विज्ञानं का पेपर है सो उसे भी लगे हाथ स्कूल छोड़ देते हैं। अच्छी बात है, मैंने कहा। हम तीनो साथ में चले। थोड़ी दूर चलने पर सड़क के किनारे हनुमान जी का मंदिर आया। मेरे पड़ौसी ने लड़के से कहा की बेटा जाओ मंदिर में जाकर हनुमान जी को प्रणाम करो और प्रशाद  भी ले लो। साथ ही ये भी बोल देना की हनुमान जी अगर नंबर अच्छे आये तो ग्यारह रूपये का प्रशाद भी चढ़ाएंगे। बेटा अंदर चला गया। विज्ञानं के पेपर में लड़का अब हनुमान जी के भरोसे था।

      मैंने पड़ौसी से पूछा," क्या तुम्हे लगता है की हनुमान जी ने विज्ञानं पढ़ा  होगा ?"

     " क्या सुबह सुबह मजाक करते हो भाई साब, भला हनुमान जी को विज्ञानं पढ़ने  की क्या जरूरत है वो तो देवता हैं उन्हें तो सबकुछ मालूम है। "

     " लेकिन उन्हें सीताजी का पता तो नही मालूम था। वो उसे ढूंढने लंका तक गए। सब कुछ मालूम था तो वहीं क्यों बता दिया खड़े खड़े। " मैंने पूछा।

     " देवताओं के बारे में ऐसी बातें नही करते वो नाराज हो जायेंगे। " पड़ौसी के चेहरे पर सचमुच घबराहट के भाव थे।

       तब तक बेटा काम निपटा कर आ गया और हम आगे चल पड़े।

       "बेटा क्या तुम्हे मालूम है की आदमी कैसे बना >"

      " मुझे कैसे मालूम होगा अंकल ! मुझे तो अभी आदमी बनने में देर है। आप पापाजी से पूछ लीजिये। " लड़के ने जवाब दिया।

      देर क्या मुझे तो इस बात में ही शक है की तुम्हारे पापा तुम्हे कभी आदमी बनने देंगे। मैंने मन ही मन सोचा। मैंने दुबारा कोशिश की ," बेटा मेरा मतलब था की पृथ्वी पर मनुष्य कैसे पैदा हुआ ?"

      " अंकल वो तो पापाजी कहते हैं की ब्रह्मा जी ने मनुष्य की रचना की। उधर स्कूल के टीचर कहते हैं की आदमी बन्दर से बना। " लड़के ने जवाब दिया।

         मुझे कुछ आशा बंधी।

    तभी मेरे पड़ौसी बोले ," टीचर और किताबों का क्या है जी  कुछ भी लिख देते है। लेकिन हमने तो अपने लड़के को अच्छे संस्कार दिए हैं। उसे सारी बातें बताते हैं।"

        मुझे लगा मौजूदा शिक्षा मंत्री मेरे पड़ौसी से प्रभावित होकर सारे देश को अच्छे संस्कार देने की कोशिश कर रही हैं।

           " लेकिन बेटा अगर परीक्षा में ये सवाल आया तो तुम क्या लिखोगे ?" मैंने फिर पूछा।

          " अंकल, वो तो पापाजी ने कहा है की जो टीचर ने बताया है वही लिख देना वरना ये अल्पबुद्धि टीचर नंबर नही देंगे। " लड़के ने जवाब दिया।

           " अच्छा बेटा ये बताओ की रॉकेट की खोज सबसे पहले कहाँ हुई थी ?" मैंने दूसरा सवाल पूछा।

           " हमारे यहां हुई थी महाभारत काल में। " बेटे की जगह बाप ने जवाब दिया।

    अब मेरी हिम्मत  जवाब दे चुकी थी।

         मैंने सीधा बाप से सवाल किया। " हमारे देश में विज्ञानं का क्या भविष्य है ?"

      " एकदम उज्ज्वल है हनुमान जी की कृपा से। " बाप ने पूरे इत्मीनान से जवाब दिया।

      मैंने उसे धमकाते हुए गुस्से से कहा," बच्चा स्कूल से कुछ पढ़ कर आता है और तुम दूसरा कुछ पढ़ा देते हो उसे घर पर। "

          " अब शास्त्रों में जो लिखा है वही पढाते है हम तो। स्कूल की किताबों का क्या है जी हर तीन साल में  बदल जाती है। शास्त्र थोड़ा ना बदलते हैं। " बाप पूरी तरह समझा हुआ था।

           "लेकिन शास्त्रों में तो ये भी लिखा है की धरती चपटी है गोल नही है और सूर्य उसके चारों तरफ चककर लगाता है। " मैंने कहा।

           " अब वो तो सबको दीखता है कोई माने या न माने। " उसने जवाब दिया।

         तभी उस लड़के का विज्ञानं का अध्यापक वहां से गुजरा। हमें और लड़के को देखकर रुक गया। बड़ी आत्मीयता से हमारे पास आया। थैले से निकाल कर प्रशाद हमे देता हुआ बोला," शहर के बड़े हनुमान मन्दिर गया था। बस किसी तरह स्कूल का रिजल्ट अच्छा आ जाए। "

           अब मुझे पूरा विश्वास हो गया की हमारे देश में विज्ञानं का भविष्य बहुत अच्छा है हनुमान जी की कृपा से। 

 

खबरी -- ऐसी शिक्षा का कोई मूल्य नही जो आपके विचारों को ऊपर नही उठा सके।

Sunday, June 28, 2015

हम भेड़ बकरियां हैं क्या ?

गप्पी -- मैं ये  सवाल बहुत ही संजीदगी से पूछ रहा था और मेरा पड़ौसी मजाक के मूड में था। उसने तुरंत उत्तर दिया की जब आप दूध नही देते तो भेड बकरी कैसे हो सकते हो। अब मुझे कहना पड़ा की हम यानि आम जनता सदियों से ऊपर के वर्ग के लिए बाकायदा दूध देते रहे हैं। और इतना देते रहे हैं की उनकी सन्ताने इतनी मोटी  हो गयी हैं की उन्हें डाइटिंग करनी पड़ रही है। भेड़ की तरह ही वो हर साल हमे मूँड़ कर ऊन उतार लेते है। और हम सचमुच भेड़ की तरह चुपचाप बिना कोई एतराज किए ऊन उतरवाते रहते हैं।

                लेकिन मैं ये सवाल और भेड़ बकरियों से हमारी तुलना एक मुहावरे के अनुसार कर रहा था। मेरा संदर्भ दूसरा था।

                 आजकल हम कोई सामान लेने जाते हैं या सिनेमा देखने जाते हैं, बिजली का बिल जमा करवाने जाते हैं या राशन लेने जाते हैं तो क्या देखते हैं की भीड़ बहुत होती है। हर आदमी सबसे पहले काम करवाना चाहता है। शोर गुल होता है, कभी कभी गाली गलौच भी होता है। लेकिन हम इन्सानो की तरह लाइन से बारी बारी ये काम नही करते हैं। अचानक एक वाचमैन आता है या सिक्योरिटी गार्ड आता है और डण्डा हिला कर सबको लाइन में कर देता है बिलकुल भेड़ बकरियों की तरह। लाइन हम खुद भी लगा सकते थे लेकिन नही इसके लिए हमे एक गार्ड या पुलिस वाला चाहिए। जिस तरह भेड़ बकरिओं को हांकने के लिए एक रखवाला चाहिए।

                 चौराहे पर ट्रैफिक जाम है। एम्बुलेंस तक फंसी हुई है। चूँकि हर आदमी पहले निकलना चाहता है इसलिए कोई भी नही निकल पा रहा है। तभी एक पुलिस वाला आता है और सब लाइन में हो जाते हैं। हिं हिं करते हैं और चले जाते हैं। मैं इसलिए पूछ रहा था की हम भेड़ बकरियां हैं क्या ?

              आदमी घर में बैठा है। टीवी देख रहा है। टीवी पर कार्यक्रम आ रहा है की सरकार सफाई के लिए कुछ नही करती। टीवी में जगह जगह कूड़े कचरे के ढेर दिखाए जा रहे हैं। टीवी देखने वाला पूरी सरकार को गालियां दे रहा है। कोस रहा है सारे अधिकारीयों और नेताओं को। कर्मचारी काम ही नही करना चाहते। कहता है इस देश का चरित्र बिलकुल गिर गया है। यहाँ मिल्ट्री राज की जरूरत है तब सुधरेंगे लोग और तब काम करेंगे कर्मचारी। फिर काम पर जाने के लिए घर से निकलता है। हाथ में कचरे की थैली है जो गली के मोड़ पर रखी कचरापेटी में डालनी है। वह वहां तक जाता है और कचरे की थैली कचरापेटी के अंदर नही डालता उसके पास फेंक कर आगे निकल जाता है। पूरे मुहल्ले का कूड़ा कचरापेटी के पास पड़ा है और पेटी  खाली रखी है।

                 शाम को आदमी घर पर आता है। पार्किंग में गाड़ियाँ इस तरह खड़ी हुई हैं की ना तो दूसरी लगाने की जगह है और ना निकालने की जगह है। वह पूरी सोसाइटी को गालियां देता है। फिर अपनी गाड़ी इस तरह खड़ी कर देता है की चार गाड़ियों का रास्ता बंद हो जाता है। 

                  सार्वजनिक परिवहन की बस  जा रही है। सवारियों से पूरी भरी हुई है। एक आदमी एक लड़की के साथ छेड़खानी करता है। लड़की उसका विरोध करती है। झगड़ा होता है। पूरी बस की सवारियां देख रही हैं। कोई नही बोलता। साठ सवारियों के मुंह में दही जमा हुआ है। घर पर पहुंच कर इस बात पर सरकार को सौ गालियां देते हैं की एक गार्ड नही है बस में। भरी बस में एक लड़की को छेड़खानी से बचाने के लिए गार्ड चाहिए।                    इन सारे किस्सों में सरकार की जिम्मेदारी से कोई इनकार नही करता। लेकिन समाज और व्यक्ति की कोई जिम्मेदारी नही है। हमारी कोई जिम्मेदारी नही है। क्योंकि हम तो घर परिवार वाले शरीफ लोग हैं। तुम घर परिवार वाले शरीफ लोग हो तभी तो तुम्हारी जिम्मेदारी बनती है की समाज ऐसा रहे जिसमे घर परिवार इज्जत और सम्मान के साथ रह सके। 

                लेकिन नही, हम तो भेड़ बकरियां हैं। कोई हमारा दूध निकाल ले जाये, ऊन उतार ले जाये हम नही रोकेंगे। हमे चलना कैसे है खड़ा कैसे होना है रहना कैसे है, इस सब के लिए हमे एक डण्डे वाला गार्ड चाहिए।

खबरी -- जब तक लोग भेड़ बकरी रहेंगे, सरकारें और बदमाश उन्हें हांकते  रहेंगे ।

Thursday, June 25, 2015

मेरा पड़ौसी और आपातकाल

गप्पी -- मेरा एक पड़ौसी एकदम झल्लाया हुआ मेरे पास आया और बोला, " ये क्या हो रहा है भई , जो भी चैनल लगाओ एक ही रट लगी हुई है, आपातकाल, आपातकाल। मैं पूछना चाहता हूँ की आखिर ये आपातकाल आखिर है क्या बला। इससे ऐसा क्या हो जायेगा जो लोगों को इस तरह डराया  जा रहा है। अच्छा तुम बताओ की आपातकाल से क्या हो जाता है। "

" देखो आपातकाल का मतलब होता है की उसमे  सारे नागरिक अधिकार छीन लिए जाते हैं। " मैंने उसे समझाने का प्रयास किया। 

" क्या अभी आपातकाल है ?" उसने पूछा। 

" कैसी बात करते हो यार। अभी कौन कहता है की आपातकाल है। " मैंने कहा। 

" अच्छा, तो अब तुम्हे कौन सा अधिकार है। " उसने दोनों हाथ कमर पर रख लिए। 

" देखो, नागरिक अधिकारों का मतलब होता है वो बड़े बड़े अधिकार जैसे भाषण देने का अधिकार ओर…… " मैंने बताना शुरू किया तो उसने मुझे बीच में ही रोककर पूछा, " तुमने कभी भाषण दिया है ?"

"नही।"  मैंने कहा . 

" तो इस अधिकार का तुम क्या करोगे। अच्छा ये बताओ की अगर तुम बीमार हो और तुम्हारी जेब में पैसे न हों तो क्या तुम इलाज करवा सकते हो ?" उसने अपनी बात पूरी की। 

" बिना पैसे तो इलाज नही हो सकता। " मैंने कहा। 

" अगर पुलिस तुम्हे पकड़ने आये तो क्या तुम उससे पूछ सकते हो की मेरा वारंट है या नही। "

" वैसे कोई पूछता नही क्योंकि इसमें पिटने का खतरा रहता है। " मैंने कहा। 

" चलो जाने दो, ये बताओ की क्या तुम किसी बड़े आदमी को जिसने तुम्हे मारने की धमकी दी हो, बिना किसी सिफारिश या रिश्वत के उसके खिलाफ FIR दर्ज करवा सकते हो ?" उसने अगला सवाल पूछा। 

" नही करवा सकता। " मैं ढीला हो कर सच पर उत्तर आया। 

" क्या तुम अपने  बच्चो को अपनी मर्जी के स्कूल या विषय में पढ़ा  सकते हो, बिना पैसे। " 

" नही पढ़ा सकता। "

" अच्छा, कुछ बड़े अधिकारों के बारे में पूछता हूँ। क्या तुम बिना पुलिस से इजाजत लिए धरना दे सकते हो ?"

" नही दे सकता। " मैंने कहा। 

" अगर तुम्हारे पास काम नही है तो क्या तुम काम के अधिकार से परिवार का पेट भर सकते हो। "  वो अब हावी होने लगा था। 

" बिना काम परिवार कैसे  पाला जा सकता है। " मैंने जवाब दिया। 

" अगर कारखाने का मालिक नही चाहे तो क्या तुम वहां यूनियन बना सकते हो ?" उसने मुस्कुराते हुए पूछा। 

" नही, लेबर इन्स्पेक्टर अगले ही दिन मालिक को बता देता है की फलां आदमी ने यूनियन बनाने की दरख्वास्त दी है। " मैंने हकीकत के हिसाब से जवाब दिया। 

" तो तुम ये बताओ की तुम्हारे लिए आपातकाल हटा कब था। फालतू शोर मचा रक्खा है। " उसने कहा और बिना मेरे जवाब का इन्तजार किये चला गया।


खबरी -- लेकिन आपातकाल नही है इसलिए तुम ये सब कह सकते हो।


संविधान में लिखे शब्दों का अर्थ

खबरी -- हमारे संविधान में जो मार्गदर्शक सिद्धान्त दिए गए हैं उनका कोई मतलब है खरा ?

 

गप्पी -- महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने कहा था की " मैंने बेड़े की तरह पार उतरने के लिए विचारों को स्वीकार किया है, उन्हें सिर पर उठाये फिरने के लिए नही। "

इसी तरह हमने कुछ विचारों और सिद्धांतों को हमारे संविधान में भी स्वीकार किया था। मेरा अनुमान है की वे भी पार उतरने के लिए ही स्वीकार किये गए होंगे। सही बात संविधान निर्माता जाने। उन विचारों में एक विचार समाजवाद का भी था। और एक विचार ये भी था की देश में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास किया जायेगा। परन्तु आजादी से अब तक हमारे नेताओं का जो आचरण रहा है उससे तो लगता है की इन्हे सिर पर उठाये फिरने के लिए ही स्वीकार किया गया है। लेकिन नेताओं के आचरण पर बात करना आाजकल देश विरोधी प्रवृति मानी  जाती है। सो इस पर बात कौन करे। अगर आज के समय में यक्ष युधिष्टर से सवाल पूछते तो एक सवाल का जवाब इस तरह होता।

 " बताओ इस दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है। "

" जनता द्वारा नेताओं के भाषणो और आचरण में समानता की खोज सबसे बड़ा आश्चर्य है। " युधिष्टर का जवाब होता।

उसके बाद यक्ष उससे उसके एक भाई को जिन्दा करने के लिए पूछते।

तो युधिष्टर कहते की " किसी को जिन्दा करने की जरूरत नही है। बस आप मुझसे ये वादा करें की आप ये बात किसी को बताएंगे नही। "

सो इस युग में इस तरह की खोज विशुद्ध मूर्खता मानी जाएगी। आजकल नेता ज्योतिषी से मुहूर्त निकलवा कर उस संविधान की शपथ लेते हैं जिसमे वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने की बात कही गयी है। मेरी मति मारी गयी थी की मैंने एक मौजूदा सत्ताधारी नेता से पूछ लिया की मंत्री जी आपका आचरण इस बात के खिलाफ है जो संविधान में लिखा हुआ है की वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया जायेगा।

 " संविधान में तो ये भी लिखा है की समाजवाद लाया जायेगा। आ गया समाजवाद? तुमने  कांग्रेस से तो कभी पूछा नही।" मंत्री जी ने मुझे लगभग गले से पकड़ लिया।

" पूछा था, पूछा था।  कांग्रेस से भी पूछा था। बल्कि यों कहो की चिल्ला चिल्ला कर पूछा था लेकिन उसने भी जवाब नही दिया। " मैंने पिटने के डर से जल्दी जल्दी कहा।

" किसी ने नही पूछा। और भले ही पूछा हो उसे चुना तो तुमने ही था। अब भुगतो उसका फल। " नेता जी ने मुझे उलाहना दिया।

" लेकिन चुना तो आपको भी हमने ही है। " मैंने कहा।

" तो उसका फल तुम्हारी आने वाली पीढ़ियां भुगतेंगी। ? नेता जी ने जवाब दिया।

अब आने वाली पीढ़ियों का भविष्य मुझे अपने से भी काला नजर आ रहा था। मैंने सोचा की इससे निपटने के लिए मुझे पावरफुल मीडिया की मदद लेनी चाहिए। मैं एक रिपोर्टर के पास पहुंचा। उसको सारी स्थिति बताई।

     वह मुझे बोला की कौनसे चैनल से मदद लेना चाहोगे।

मैं विचार करने लगा। सामने टीवी था मैंने सोचा की टीवी चालू कर लेता हूँ। इससे सारे चैनलों के नाम याद आ जायेंगे  पहला चैनल लगाया , यहां एक बाबा काले कपड़े पहने शनि से बचने का उपाय बता रहा था। दूसरा चैनल लगाया, यहां एक महिला अजीब सा मेकअप किये बैठी थी और ताश के पत्तों से देश का भविष्य बता रही थी। मैंने  तीसरा चैनल लगाया,यहां एक बाबा जी ग्रहयोग से बिमारियों का इलाज बता रहा था। मैंने एक-एक करके सारे  न्यूज़ चैनल लगा कर देखे। सब पर कोई ना कोई बाबा या साध्वी ग्रहयोग से लोगों की समस्याओं का हल बता रही थी।

            मुझे जोर की हंसी आई, खूब हँसी आई, बहुत हँसी आई, इतनी हंसी आई की आँखों में आँसूं आ गए।

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Saturday, June 20, 2015

हम आगे तो बढ़ रहे हैं भले ही पीछे की तरफ

 गप्पी -- मैं शिक्षा के क्षेत्र की बात कर रहा हूँ। इसमें बहुत तेजी से तरक्की हो रही है। जैसा सरकार चाहती थी वैसी ही हो रही है। हमारे प्रधानमन्त्री डिजिटल इंडिया की बात करते थे। अभी अभी जो AIPMT की परीक्षा रद्द की गयी है उसके बारे में कहा गया है की उसमे एक चिप के द्वारा जो परीक्षा देने वाले के अंडरवियर में लगाई गयी थी, के द्वारा नकल की जा रही थी। किसी ने फोन करके इसकी सूचना पुलिस को दे दी और पुलिस ने छापा मारकर इस स्कैंडल को पकड़ लिया। परन्तु इससे ये बात तो साबित होती ही है की हम डिजिटल इंडिया की तरफ बढ़ रहे हैं। 

                   दूसरी महत्वपूर्ण बात जो शिक्षा के क्षेत्र हो रही है वो सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयास हैं जो शिक्षा के क्षेत्र में बहुत ही दूरगामी भूमिका निभा सकते हैं। हम शिक्षा के क्षेत्र में हमारी 5000 साल पुरानी संस्कृति की तरफ बढ़ रहे हैं। इसकी शुरुआत तब हुई जब हमारे प्रधानमन्त्री ने एक बारहवीं पास सांसद को इस क्षेत्र का मंत्री बना दिया। उसको ये जिम्मेदारी दी गयी है की वो विश्वविद्यालयों के कुलपति और उपकुलपति नियुक्त करें। ऐसा करने से पहले वो उनकी योग्यता की जाँच जरूर करेंगी। लेकिन कोई कह रहा था की किसी कुँए की गहराई मापने लिए डंडे की लम्बाई कुँए से ज्यादा होनी चाहिए। खैर ये पुरानी और दकियानूसी बात है। उन्होंने इस क्षेत्र में काम भी करना शुरू कर दिया है। पूना फिल्म इंस्टिट्यूट में गजेन्द्र चौहान को चेयरमैन नियुक्त कर दिया गया है। उनकी कुल योग्यता ये है की वो पिछले बहुत सालों से भाजपा से जुड़े रहे हैं। इस पर वहां हड़ताल हो गयी। वहां के छात्र कह रहे हैं की जिस पद पर कभी गिरीश कर्नाड , श्याम बेनेगल , अडूर गोपालकृष्णन जैसे ख्याति प्राप्त लोग रहे हो वहां सरकार ऐसी नियुक्ति कैसे कर सकती है। सरकार का कहना है की उनका तीस साल का फिल्म इन्डस्ट्री का अनुभव है। अब लोगों को ये बात समझ नही आ रही की क्या तीस साल सब्जी की रेहड़ी लगाने से कोई व्यक्ति बागवानी अनुसंधान का निदेशक होने की योग्यता प्राप्त कर सकता है। उसके बाकी निदेशक भी इसी तरह की योग्यताओं के अनुसार नियुक्त किये गए हैं। 

                     इससे पहले इतिहास अनुसंधान से जुडी एक पत्रिका का निदेशक मण्डल भंग कर दिया गया, जिसमे रोमिला थापर जैसे अंतरराष्ट्रीय श्रेणी के लोग थे। बाकि संस्थाओं के लिए भी योग्य लोगों की तलाश चल रही है। 

                     मैं कल्पना करता हूँ की मान लीजिये किसी विज्ञानं एवं तकनीकी संस्थान के निदेशक के पद के लिए इन्टरव्यू चल रहा हो तो उसका दृश्य कैसा होगा। साक्षात्कार चल रहा है। सामने बैठे उम्मीदवार से प्रसन्न पूछा जाता है, " आपकी विज्ञानं के क्षेत्र की जानकारी को अपडेट करने के लिए आप क्या करते हैं ?"

             " मैं उसके लिए पिछले तीस साल से "कल्याण" पढ़ रहा हूँ। " उम्मीदवार जवाब देता है। 

 " आपके विचारों का श्रोत क्या है और आप विज्ञानं के इतिहास के बारें में क्या जानते हैं ?" दूसरा प्रश्न पूछा जाता है। 

              " मैं मानता हूँ की विज्ञानं का उदय और अन्त हमारे वेदों में ही है। जो तरक्की हमने अस्त्र-शस्त्रों के क्षेेत्र में महाभारत काल में कर ली थी उसके बाद हमे और कुछ करने की जरूरत नही है। जहां तक विचारों का सवाल है तो गुरु जी ने जो "बंच ऑफ़ थॉट्स " लिखा था मैं नही समझता की उससे बाहर विचारों  अस्तित्व है। "

उम्मीदवार ने जवाब दिया। 

              इन्टरव्यू कमेटी के सदस्यों के चेहरे पर सन्तोष के साथ मुस्कान उभरी। उन्होंने बाकि बचे लोगों को वापिस भेज दिया। उपयुक्त उम्मीदवार मिल चूका था। 

 

खबरी -- हे भगवान इस देश का भविष्य अब केवल तुम्हारे हाथों  में है, इसे अपने अनुयायिओं से बचाइये।