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Tuesday, December 6, 2016

बैंकिंग व्यवस्था से उठता विश्वास , अर्थव्यवस्था के लिए मौत की घण्टी साबित होगा।

                    नोटबन्दी के फैसले के बाद इसके जो लाभ गिनवाए गए थे वो एक एक करके छलावा साबित हो रहे हैं। अब इसके दुष्परिणाम एक एक करके सामने आने लगे हैं। उनमे से कुछ इतने बड़े, स्पष्ट और विनाशकारी हैं की आम आदमी को भी सामने दिखाई दे रहे हैं। इन्ही में से एक है बैंकिंग व्यवस्था से उठता हुआ विश्वास।
                     कोई आदमी जब अपना पैसा बैंक में रखता है तो उसके सामने दो उद्देश्य होते हैं। एक तो ये की उसका पैसा सुरक्षित है और डूबेगा नही। दूसरा ये की उसे जरूरत के समय तुरन्त पैसा मिल जायेगा। ब्याज की आमदनी इसमें कोई भूमिका नही रखती। क्योंकि बाहर मार्किट में ब्याज की दर बैंक से दुगनी तिगुनी होती है। लेकिन उसके साथ उपरोक्त दो जोखिम जुड़े होते हैं। बाहर मार्किट में पैसा ब्याज पर देने से एक तो उसके डूबने का डर रहता है जिसके लिए लोग बैंक का रुख करते हैं। लेकिन ऐसा भी नही है की बाहर ब्याज पर दिया हुआ सारा पैसा डूब ही जाता है। बाहर मार्किट में भी ऐसे लोग हैं जिनका भरोसा और साख बहुत बड़ी है। लेकिन कई बार वो भी जरूरत के समय तुरन्त पैसा नही लोटा पाते। वो महीना बीस दिन का समय लगा देते हैं। इसके लिए लोग एमरजेंसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए पैसा बैंक में रखते हैं ताकि जरूरत के समय तुरन्त मिल जाये।
                     नोटबन्दी के बाद बैंक की इसी विशेषता पर चोट पहुंची है। जिन लोगों का पैसा बैंक में था और उन्हें उसकी बहुत सख्त जरूरत थी, उन्हें भी वो पैसा नही मिला। लोगों को शादियां टाल देनी पड़ी, हस्पतालों में इलाज नही करवा पाए और गरीब लोगों को तो राशन तक की तकलीफ खड़ी  हो गयी। लाखों रुपया बैंको में जमा होने के बाद भी लोगों की हालत भिखारियों जैसी हो गयी। इस पर भी सरकार ने इसका हल निकालने की बजाय उन्हें कैशलेस इकोनॉमी के चुटकले सुनाये। आज बैंक की लाइन में खड़ा हर आदमी इस मानसिक स्थिति में पहुंच गया है की कभी भी और किसी भी तरह एक बार उसका पैसा निकल जाये, फिर वो कभी बैंक का रुख नही करेगा। लोगों का बैंकिंग व्यवस्था से विश्वास उठ गया।
                     इसके कुछ साफ और अंधे को भी दिखाई देने वाले सबूत हैं। बैंक ने एक महीने के दौरान लोगों को करीब ढाई लाख करोड़ के नए नोट बांटे हैं। लेकिन उनमे से एक भी नोट वापिस बैंक में जमा नही हुआ। ये बात SBI के अधिकारियों ने मीडिया के सामने कही है। ये लोगों के उठते हुए विश्वास का साफ संकेत हैं। इस तरह जो बैंक आज जमा हुए पैसे से छलक रहे हैं एक समय के बाद वो सूखे के शिकार हो जायेंगे। जैसे जैसे लोगों का पैसा निकलता जायेगा वो कभी वापिस नही आएगा। आयेगा भी तो बहुत कम। और ये देश की अर्थव्यवस्था के लिए मौत की घण्टी साबित होगा। बैंकिंग सिस्टम पर भरोसा किसी भी अर्थव्यवस्था की नींव होता है।
                    वैसे भी बैंको पर एक दूसरा संकट आने वाला है। वो है बड़े पैमाने पर NPA का संकट। अब तक बैंक केवल बड़े उद्योगों के NPA से जूझ रहे थे, अब लम्बी चलने वाली मन्दी के कारण आम लोगों द्वारा लिए गए लोन, चाहे वो घर के लिए हों, गाड़ी के लिए हों या पर्सनल लोन हो, कमाई की कमी के कारण उनका एक बड़ा हिस्सा डूबने वाला है। 2008 की मन्दी के बाद जिस तरह का संकट सामने आया था उसे एक बार फिर दोहराया जाने वाला है। अब तक रिजर्व बैंक ने बैंको को नवम्बर और दिसम्बर की डिफाल्ट हुई किस्तो को NPA में नही दिखाने की छूट दे दी है, लेकिन उसके बाद, यानि जनवरी में क्या होगा ?
                      सरकार पता नही क्यों इस खतरे की तरफ से आँख मूंदे हुए है। सारा देश एक दिन में कैशलेस नही हो जाने वाला है। अर्थव्यवस्था के सामने खड़े इस संकट को गम्भीरता से लिया जाना चाहिए।

Saturday, March 12, 2016

विजय माल्या, कांग्रेस के दिए हुए लोन और बीजेपी की जिम्मेदारी

             विजय माल्या चले गए। चले ही जाना चाहिए इस देश में और रखा भी क्या था। जितना उसके लिए रखा था वो तो ले ही लिया। अब जब लगा की वापिस देना पड़ सकता है तो चले गए। जो लोग, नेता और टीवी चैनल आमिर खान पर हफ्तों इस बात पर देशद्रोही होने का आरोप लगा रहे थे की उनकी पत्नी ने ऐसा क्यों कहा की क्या हमे देश छोड़ देना चाहिए, उनमे से किसी ने इस सचमुच देश छोड़ने वाले को गद्दार नही बताया। ना राजनाथ सिंह ने, ना आरएसएस ने, और ना सोशल मीडिया पर बैठे भाड़े के देश भक्तों ने। बताते भी कैसे ? विजय माल्या ने धमकी दी है की सबकी पोल खोल दूंगा दस्तावेजों के साथ।
               लेकिन इसके बाद दूसरा सवाल ये है की जब मामला उठा की उसे जाने कैसे दिया तो बीजेपी ने कहा की सारे लोन कांग्रेस के दिए हुए हैं। अब ये नया तरीका शुरू होगा की कांग्रेस के जमाने के दिए हुए लोन कांग्रेस वसूल करेगी और बीजेपी के जमाने के दिए हुए बीजेपी। तरीका तो सही है। लेकिन मुझे एक गड़बड़ लगती है। जो लोन विश्वनाथ प्रताप सिंह, मोरारजी देसाई या आई. के. गुजराल साहब के जमाने में दिए थे उनको कौन वसूल करेगा। साथ ही अब मुझे लगता है की बैंकों का NPA इसी लिए बढ़ रहा है की वो सारे लोन कांग्रेस के जमाने में दिए गए थे तो बीजेपी सरकार क्यों वसूल करे। देश के उन सारे उद्योगपतियों को अब उस लोन का कोई पैसा चुकाने की जरूरत नही है जो कांग्रेस के जमाने में लिए थे। कभी दुबारा कांग्रेस की सरकार आएगी तो देखेंगे, वरना माले गनीमत समझ कर हजम कर लो।
             दूसरी जो चीज मुझे समझ में आई वो ये की, जो बीजेपी कहती रही है की कांग्रेस मुक्त भारत बनाएगी तो उद्योगपति उसका समर्थन क्यों करते थे। अरे भई, इसका दूसरा मतलब ये भी तो हुआ की कांग्रेस मुक्त भारत और कर्ज मुक्त उद्योगपति। जाहिर है की जो लोन कांग्रेस के जमाने में दिए गए थे उनको वसूल करने की जिम्मेदारी बीजेपी की तो है नही। इसलिए सभी उद्योगपतियों को कर्जमुक्त घोषित कर दिया जाये। और मुझे पूरा विश्वास है की बहुत जल्दी ये कर दिया जायेगा।
               मुझे इसमें कोई बुराई भी नजर नही आती। आखिर किसी दूसरे का दिया हुआ कर्जा कोई दूसरा क्यों वसूल करे। बस मुझे एक ही बात और कहनी है। यही बात बीजेपी सरकार वर्ल्ड बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और दूसरे कर्ज देने वाली संस्थाओं को भी कह दे की तुम्हारे से कर्जा कांग्रेस के जमाने में लिया गया था इसलिए हमसे तो उम्मीद मत रखना। आखिर कांग्रेस के जमाने में लिया हुआ कर्जा बीजेपी क्यों भरे।  जब वसूली की जिम्मेदारी नही है तो देने की जिम्मेदारी भी नही है।
               अब आगे से सारे काम इसी हिसाब से होंगे। स्मृति ईरानी कहती हैं की जिन अधिकारीयों ने रोहित वेमुला को बर्खास्त किया उनकी नियुक्ति कांग्रेस के जमाने में हुई थी हमने नही की। सरकार कहती है की जो एफिडेविट सीबीआई ने बदला उसका जवाब कांग्रेस देगी अधिकारी नही। जिन लोगों पर देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी थी, वो सभी अधिकारी कह रहे हैं की ये काम हमने कांग्रेस के एक नेता के दबाव में किया था। और ये वो बड़े गर्व से टीवी चैनल पर कह रहे हैं और मौजूदा सरकार उस तालियां पीट रही है की देखो, हम ना कहते थे।
                मुझे केवल एक बात का डर है। कल कोई युद्ध हो जाये और हमारी पिटाई हो जाये तो बीजेपी ये ना कह दे की इन सारे सैनिकों और अधिकारीयों की नियुक्ति कांग्रेस के जमाने में हुई थी। इसलिए मैं कहता हूँ की देश के सारे कर्मचारियों और अधिकारीयों को बर्खास्त करके नई भर्ती की जाये। सारे बैंकों को बंद करके नए बैंक खोले जाएँ। जिनका पैसा जमा है वो कांग्रेस से मांगे। जिनको देना है वो भूल जाये और नया लोन ले। उसके बाद देश में होने वाली घटनाओं की जिम्मेदारी मौजूदा सरकार की होगी।