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Tuesday, February 7, 2017

कुत्तों वाली परम्परा और प्रधानमंत्री मोदी

                  
modiji and other members image in parliyament
   आज संसद में बोलते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस नेता के इस बयान का की आरएसएस  के परिवार से किसी ने कोई क़ुरबानी नही दी, यहां तक की एक कुत्ता तक नही मरा, जवाब देते हुए कहा की वो कुत्तों की परम्परा में पले बढ़े नही हैं।
                      अब होने को तो इस बयान के बहुत से मतलब हो सकते हैं। लेकिन हमारे देश की महान परम्परा के अनुसार अगर किसी वाक्य के चार मतलब होते हों, तो छह तो निकाल ही लिए जाते हैं। सारे देश में इस बयान पर बहस हो रही है। लोग मजाक उड़ा रहे हैं। उनमे से एक आदमी की राय इस प्रकार है -
                        प्रधानमंत्री ने आखिर इस बात को स्वीकार कर ही लिया। अब तक हम कहते थे तो वो इंकार करते थे। आज मान लिया। कुत्तों वाली परम्परा का मतलब होता है वफादारी की परम्परा। पूरी दुनिया में कुत्ते को वफादारी का प्रतीक माना जाता है। और जब हम कहते थे की आरएसएस की परम्परा देश से गद्दारी की परम्परा रही है, उसने हमेशा दुश्मनो का साथ दिया। आजादी की लड़ाई में जब सारा देश गोलियां खा रहा था, लोग जेल जा रहे थे, तब आरएसएस अंग्रेजो का समर्थन कर रहा था। वह देश की जनता और अपने सदस्यों को आजादी की लड़ाई से अलग रहने को कह रहा था। अंग्रेजो के लिए मुखबिरी कर रहा था। आजादी के सिपाहियों के खिलाफ गवाहियां दे रहा था। जब मुस्लिम लीग बंटवारे की मांग कर रही थी तब उसके नेता मुस्लिम लीग के साथ साझा सरकार चला रहे थे। जब बंटवारा हुआ और दंगे भड़के, तब उसके सदस्य सीधे तौर पर दंगों में शामिल थे। जब आजादी मिली तब उसके सदस्य तिरंगा जला रहे थे। और यहां तक की उसके लोगों ने आजादी की लड़ाई के सबसे बड़े नेता और राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का कत्ल भी कर दिया। वो अलग बात है की आरएसएस गोडसे के बारे में कहता है की उसने गाँधी हत्या से पहले आरएसएस छोड़ दिया था। लेकिन जो संगठन अपनी सदस्यता का रिकार्ड तक नही रखता हो उसकी इस बात पर कितना भरोसा किया जा सकता है। गोडसे के धरवाले तो आज भी कहते हैं की गोडसे ने कभी आरएसएस नही छोड़ा था।
                         उसके बाद उसने अपनी साम्प्रदायिक विचारधारा से हमेशा इस देश की एकता अखण्डता और भाईचारे की जड़ों में मट्ठा डाला। आजादी के बाद हुए कितने ही दंगो की जाँच करने वाले आयोगों ने उसमे आरएसएस का हाथ होने की बात कही है। इसलिए जो संगठन देश  के खिलाफ काम करता हो, उसकी तुलना कुत्तों वाली परम्परा से कैसे की जा सकती है। अच्छा हुआ आज प्रधानमंत्री ने खुद ही मान लिया।

Monday, December 14, 2015

Opinion -- आम सहमति का मतलब --- सरकार से सहमति

                    देश में बहुत बार आम सहमति की बात होती है। जब भी आर्थिक मामलों की बात चलती है तो ये कहा जाता है की देश में आर्थिक सुधारों को लेकर आम सहमति है। ये भी कहा जाता है की आर्थिक मामलों पर आम सहमति होनी चाहिए और उस पर राजनीती नही होनी चाहिए। विदेश मामलों में तो खासकर आम सहमति की बात की जाती है और ये दावा किया जाता है की कम से कम विदेश नीति के मामले में तो देश में आम सहमति है।
                    लेकिन पिछले कुछ सालों से आम सहमति के मायने बदल गए हैं। खासकर जब से आर्थिक सुधारों का दौर शुरू हुआ है इस बात पर खास जोर दिया जा रहा है। अब आम सहमति का मतलब हो गया है सरकार के साथ सहमति। यदि कोई किसी नीति पर सवाल उठाता है तो उसे ये कहकर हड़काया जाता है की वो कम से कम इस मामले में तो आम सहमति बनाये। दूसरे शब्दों में उसे इस बात के लिए मजबूर किया जाता है की वो सरकार की हाँ में हाँ मिलाये। अगर कोई सवाल उठाता है तो कहा जाता है की वो राजनीती कर रहा है। और राजनीती करने को बहुत बुरा माना जाता है। जब से आर्थिक सुधारों का ये दौर शुरू हुआ है सारी नीतियां कॉर्पोरेट को ध्यान में रखकर और उसके फायदे के लिए बनाई जाती हैं। भले ही लोगों की आँखों में धूल झोंकने के लिए उसे कोई नाम  दिया जाये।
                      दूसरी जो बात इस तथाकथित आम सहमति के नाम पर सामने आई है वो ये है की दो पार्टियों, यानि बीजेपी और कांग्रेस की सहमति को आम सहमति मान लिया गया है। उसके बाद चाहे सरकार हो या कॉर्पोरेट के लोग हों, या कॉर्पोरेट का मीडिया हो या फिर टीवी चैनलों में बैठे हुए विशेषज्ञ हों, सब एक ही राग अलापते हैं की इस मामले पर आम सहमति है। जबकि असलियत ये है की उन दोनों को मिले वोट का प्रतिशत  बहुत बार 50 % से कम होता है। बाकि राजनैतिक दलों से  ना कोई बात की जाती है और ना ही उनकी राय को कोई महत्त्व दिया जाता है। जब सिद्धांतों की बात होती है तो सरकार कॉपरेटिव फडरेलिज्म की बात करती है और संघीय ढांचे की आरती उतारती है।
                        GST बिल के सवाल पर ये बात बहुत ही मुखर होकर सामने आ रही है। बीजेपी ने इस बिल पर किसी पार्टी से कोई बात करने की कोशिश नही की। केवल देश के विकास की हवा का दबाव बना कर इसका समर्थन करने के लिए कहा गया। वो तो कांग्रेस के साथ उसके रिश्ते खराब होने के चलते उसे उसके साथ बातचीत करने के लिए मजबूर होना पड़ा। अगर उसके पास राज्य सभा में बिल पास करने लायक बहुमत होता तो वो कांग्रेस की तरफ मुड़ कर भी नही देखती। लेकिन इन हालात के बावजूद उसने बाकि राजनितिक पार्टियों के साथ संवाद की कोई कोशिश नही की। हमारे यहां आम सहमति का केवल यही मतलब है की अगर आपका काम निकल गया तो किसी को पूछने की जरूरत नही है।
                          विदेश नीति  पर भी अजब नजारा सामने है। सरकार का मानना है की अगर वो किसी देश को गालियां देती है तो पुरे विपक्ष को उसे गालियां देनी चाहिए और अगर वो उसके साथ गलबहियां डाल कर घूमती है तो पूरे विपक्ष को तालियां बजानी चाहियें। अगर कोई ये सवाल पूछता है की भाई गाली देने का कारण बताइये तो चारों तरफ से उस पर फिटकार डाली जाती है की देखो, देखो इस देशद्रोही को विदेशी मामले पर भी राजनीती कर रहा है। इस सरकार की पाकिस्तान नीति हो या फिर नेपाल नीति ये हमेशा सवालों के घेरे में रही हैं। विपक्ष की तो छोडो, इस सरकार के भक्तगण भी पाकिस्तान के बारे में उसकी पलटी पर खुद को एडजेस्ट नही कर पा रहे हैं।
                          उसके बाद भी अगर विपक्ष का कोई दल अपना विरोध सख्त करता है तो सरकार का तर्क होता है की संसद में चर्चा के लिए सरकार तैयार है। बीजेपी की ये सरकार बनने के बाद संसद की चर्चा का मतलब भी वही हो गया है। जिन मामलों में पुरे देश में चिंता और बहस का माहोल था उन पर भी चर्चा का ये हाल था की सरकार चर्चा से पहले जो कहती रही वही चर्चा के बाद भी कहती रही। असहिष्णुता के मामले  में चर्चा हुई। पुरे विपक्ष ने सैकड़ों उदाहरण दे कर इस खतरे को सामने रक्खा लेकिन सरकार ने वही रुख अपनाया जो चर्चा से पहले था। किसी एक सवाल पर उसने इतना तक नही कहा की सरकार इसको देखेगी या कोई कदम उठाएगी। उसके बाद अगर कोई इस मामले पर बात करता है तो सरकार का जवाब होता है की इस मामले पर संसद में चर्चा हो चुकी है और संसद ( असल में सरकार ) उसे ख़ारिज कर चुकी है। फिर किसी मामले पर सरकार कहती है की विपक्ष इस पर संसद में चर्चा क्यों नही कर रहा ? भई वो इसलिए नही कर रहा की उसे मालूम है की सरकार पर जो टेप चढ़ी हुई है वही बजने वाली है। सरकार विपक्ष की किसी भी जायज चिंता को स्वीकार करने को तैयार नही है।