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Tuesday, October 18, 2016

व्यंग -- चीनी सामान का बायकाट और हमारे शहर की मीटिंग।


                    पुरे देश में चीनी सामान और पाकिस्तानी कलाकारों के बायकाट की मुहीम चल रही है। कई दिन से हमारे शहर के निवासियों को भी लगता था की जैसे वो देशभक्त नही हैं। इसलिए कल हमारे शहर के निवासियों ने भी मीटिंग करके चीनी सामान के बॉयकाट की घोषणा कर दी। हम पाकिस्तान के कलाकारों का भी विरोध करना चाहते थे लेकिन उसपर एकराय नही बन पाई सो उसके लिए दुबारा मीटिंग करने का फैसला लिया गया। इस मीटिंग का ब्यौरा इस प्रकार है -
                    सबसे पहले शहर के एक गणमान्य नेता ने, जो सरकारी पार्टी के एक संगठन से जुड़े हैं, एक बहुत ही प्रभावशाली और प्रेरक भाषण दिया। जिसमे इस बॉयकाट की जरूरत पर जोर दिया और उसके कारणों की जानकारी दी। उन्होंने कहा, " भाइयो, हम आज पाकिस्तान के कलाकारों और चीनी सामान के बॉयकाट के लिए ये मीटिंग कर रहे हैं। मुझे इसमें भाग लेने का अवसर मिला है तो उसके लिए मैं इस सरकार का आभारी हूँ।  क्योंकि आजादी की लड़ाई में जब पूरा देश अंग्रेजी सामान की होली जला रहा था तब हम उसके विरोध में थे। इसका कारण ये था की हम अंग्रेजो को अपना माई बाप मानते थे और उनके खिलाफ आंदोलन  को देशद्रोह। आजादी के बाद हमे महसूस हुआ की हमे भी किसी ना किसी चीज का विरोध और बॉयकाट करना चाहिए। लेकिन हमे मौका ही नही मिला।
                           जब पाकिस्तान के खिलाफ लड़ाइयां हुई तो अमेरिका उसके साथ खड़ा था। उस समय भी लोगों ने अमेरिका के सामान का बॉयकाट करने के लिए कहा था, लेकिन आजादी के बाद हम ने बाप बदलकर इंग्लॅण्ड की जगह अमेरिका कर लिया था सो हम उसका बॉयकाट नही कर सकते थे। इसलिए वो मौका हमारे हाथ से निकल गया।
                            उसके बाद जब भोपाल गैस दुर्घटना हुई तो बहुत से लोगों ने यूनियन कार्बाइड के सामानों के बॉयकाट की बात की। लेकिन वो कम्पनी भी अमेरिका की ही थी सो हम मन मार कर रह गए और उस बॉयकाट में शामिल नही हो सके। इसलिए मेरा आपसे निवेदन है की इस बॉयकाट को कामयाब किया जाये ताकि हमारा नाम भी बॉयकाट करने वालों की लिस्ट में शामिल हो जाये। जय भारत। "
                        उसके बाद एक आदमी ने प्रश्न किया की क्या पाकिस्तानी कलाकारों के गाये हुए पुराने गानो को भी डिलीट किया जाये जैसे गुलाम अली वगैरा। या फिर नए गाने डाऊनलोड करने पर ही पाबन्दी है ?
                          इस  पर किसी ने कहा की केवल नए गानो पर ही प्रतिबन्ध है। तो उसने पूछा फिर उन फिल्मो का बॉयकाट क्यों कर रहे हो जो बन चुकी हैं ?
                          इस पर एक दूसरे आदमी ने कहा की पाकिस्तानी मतलब पाकिस्तानी। नया हो या पुराना, सब पर पाबन्दी है। हम कोई पुराना गाना भी नही सुनेगे।
                           एक बुजुर्ग ने पूछा की इक़बाल के लिखे उस गीत का क्या करें, " सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा। " क्योंकि बाद में इक़बाल भी पाकिस्तानी हो गए थे। और क्या फैज अहमद फैज जैसे लेखकों को पाकिस्तानी माना जाये या नही। और आजादी से पहले बनी फिल्मो के गीतों का क्या करें जिनके गायक बंटवारे में पाकिस्तान चले गए थे ?
                         इस पर काफी हो हल्ला हुआ। बाद में ये तय हुआ की इस मामले पर दुबारा से मीटिंग बुलाई जाएगी। इसलिए आज केवल चीनी सामान पर ध्यान दिया जाये।
                         चीनी सामान पर जब विचार हुआ तो ये बात आयी की जो सामान अब तक खरीदा जा चूका है उसका इस्तेमाल किया जाये या नही। मीटिंग में ऐसे बहुत लोग थे जिनके कारखानों में चीनी मशीने लगी हुई थी। और बहुत से लोगों के पास चीनी मोबाइल फोन थे और उनके घरों में चीनी सामान बड़ी तादाद  में था। सो इस सवाल पर मीटिंग में दो राय हो गयी। मामला बिदकने लगा तो अध्यक्ष ने कहा की पहले खरीदी हुई चीजों को बायकाट से  बाहर रखा जाये।
                          अगला सवाल ये आया की सरकार जो सामान चीन से खरीद रही है उसका क्या किया जाये ? जैसे सरदार पटेल की जो मूर्ति चीन से बनकर आएगी, उसे लगाने दिया जाये या नही ? जो मेट्रो रेल के समझौते चीन के साथ हुए हैं उनमे बैठा जाये या नही ? इस तरह के बहुत से सवाल खड़े हो गए।
                        बाद  में ये फैसला हुआ की बॉयकाट हो या न हो लेकिन बयान दे दिया जाये की हमारा शहर भी चीनी सामान का बॉयकाट करेगा। जिन लोगों के लड़के खाली हैं वो जलूस निकाल कर थोड़ा बहुत चीनी सामान को जला दें और किसी छोटे दुकानदार या रेहड़ी पटरी वाले के पास चीनी सामान दिखाई दे तो उसे तोड़ दिया जाये ताकि अख़बार में फोटो भी आ सके और सम्मानित नागरिकों का नुकशान भी ना हो।
                          इस तरह चीनी सामान के बॉयकाट की ये सफल मीटिंग समाप्त हुई।

Monday, December 14, 2015

Opinion -- आम सहमति का मतलब --- सरकार से सहमति

                    देश में बहुत बार आम सहमति की बात होती है। जब भी आर्थिक मामलों की बात चलती है तो ये कहा जाता है की देश में आर्थिक सुधारों को लेकर आम सहमति है। ये भी कहा जाता है की आर्थिक मामलों पर आम सहमति होनी चाहिए और उस पर राजनीती नही होनी चाहिए। विदेश मामलों में तो खासकर आम सहमति की बात की जाती है और ये दावा किया जाता है की कम से कम विदेश नीति के मामले में तो देश में आम सहमति है।
                    लेकिन पिछले कुछ सालों से आम सहमति के मायने बदल गए हैं। खासकर जब से आर्थिक सुधारों का दौर शुरू हुआ है इस बात पर खास जोर दिया जा रहा है। अब आम सहमति का मतलब हो गया है सरकार के साथ सहमति। यदि कोई किसी नीति पर सवाल उठाता है तो उसे ये कहकर हड़काया जाता है की वो कम से कम इस मामले में तो आम सहमति बनाये। दूसरे शब्दों में उसे इस बात के लिए मजबूर किया जाता है की वो सरकार की हाँ में हाँ मिलाये। अगर कोई सवाल उठाता है तो कहा जाता है की वो राजनीती कर रहा है। और राजनीती करने को बहुत बुरा माना जाता है। जब से आर्थिक सुधारों का ये दौर शुरू हुआ है सारी नीतियां कॉर्पोरेट को ध्यान में रखकर और उसके फायदे के लिए बनाई जाती हैं। भले ही लोगों की आँखों में धूल झोंकने के लिए उसे कोई नाम  दिया जाये।
                      दूसरी जो बात इस तथाकथित आम सहमति के नाम पर सामने आई है वो ये है की दो पार्टियों, यानि बीजेपी और कांग्रेस की सहमति को आम सहमति मान लिया गया है। उसके बाद चाहे सरकार हो या कॉर्पोरेट के लोग हों, या कॉर्पोरेट का मीडिया हो या फिर टीवी चैनलों में बैठे हुए विशेषज्ञ हों, सब एक ही राग अलापते हैं की इस मामले पर आम सहमति है। जबकि असलियत ये है की उन दोनों को मिले वोट का प्रतिशत  बहुत बार 50 % से कम होता है। बाकि राजनैतिक दलों से  ना कोई बात की जाती है और ना ही उनकी राय को कोई महत्त्व दिया जाता है। जब सिद्धांतों की बात होती है तो सरकार कॉपरेटिव फडरेलिज्म की बात करती है और संघीय ढांचे की आरती उतारती है।
                        GST बिल के सवाल पर ये बात बहुत ही मुखर होकर सामने आ रही है। बीजेपी ने इस बिल पर किसी पार्टी से कोई बात करने की कोशिश नही की। केवल देश के विकास की हवा का दबाव बना कर इसका समर्थन करने के लिए कहा गया। वो तो कांग्रेस के साथ उसके रिश्ते खराब होने के चलते उसे उसके साथ बातचीत करने के लिए मजबूर होना पड़ा। अगर उसके पास राज्य सभा में बिल पास करने लायक बहुमत होता तो वो कांग्रेस की तरफ मुड़ कर भी नही देखती। लेकिन इन हालात के बावजूद उसने बाकि राजनितिक पार्टियों के साथ संवाद की कोई कोशिश नही की। हमारे यहां आम सहमति का केवल यही मतलब है की अगर आपका काम निकल गया तो किसी को पूछने की जरूरत नही है।
                          विदेश नीति  पर भी अजब नजारा सामने है। सरकार का मानना है की अगर वो किसी देश को गालियां देती है तो पुरे विपक्ष को उसे गालियां देनी चाहिए और अगर वो उसके साथ गलबहियां डाल कर घूमती है तो पूरे विपक्ष को तालियां बजानी चाहियें। अगर कोई ये सवाल पूछता है की भाई गाली देने का कारण बताइये तो चारों तरफ से उस पर फिटकार डाली जाती है की देखो, देखो इस देशद्रोही को विदेशी मामले पर भी राजनीती कर रहा है। इस सरकार की पाकिस्तान नीति हो या फिर नेपाल नीति ये हमेशा सवालों के घेरे में रही हैं। विपक्ष की तो छोडो, इस सरकार के भक्तगण भी पाकिस्तान के बारे में उसकी पलटी पर खुद को एडजेस्ट नही कर पा रहे हैं।
                          उसके बाद भी अगर विपक्ष का कोई दल अपना विरोध सख्त करता है तो सरकार का तर्क होता है की संसद में चर्चा के लिए सरकार तैयार है। बीजेपी की ये सरकार बनने के बाद संसद की चर्चा का मतलब भी वही हो गया है। जिन मामलों में पुरे देश में चिंता और बहस का माहोल था उन पर भी चर्चा का ये हाल था की सरकार चर्चा से पहले जो कहती रही वही चर्चा के बाद भी कहती रही। असहिष्णुता के मामले  में चर्चा हुई। पुरे विपक्ष ने सैकड़ों उदाहरण दे कर इस खतरे को सामने रक्खा लेकिन सरकार ने वही रुख अपनाया जो चर्चा से पहले था। किसी एक सवाल पर उसने इतना तक नही कहा की सरकार इसको देखेगी या कोई कदम उठाएगी। उसके बाद अगर कोई इस मामले पर बात करता है तो सरकार का जवाब होता है की इस मामले पर संसद में चर्चा हो चुकी है और संसद ( असल में सरकार ) उसे ख़ारिज कर चुकी है। फिर किसी मामले पर सरकार कहती है की विपक्ष इस पर संसद में चर्चा क्यों नही कर रहा ? भई वो इसलिए नही कर रहा की उसे मालूम है की सरकार पर जो टेप चढ़ी हुई है वही बजने वाली है। सरकार विपक्ष की किसी भी जायज चिंता को स्वीकार करने को तैयार नही है।                          



Thursday, December 10, 2015

हरियाणा सरकार की चुनावी शर्तों पर उच्चत्तम न्यायालय का फैसला

आज देश  दो बड़े फैसले आये। एक फैसले में उच्चत्तम न्यायालय ने हरियाणा सरकार द्वारा स्थानीय निकाय  के चुनावों में लगाई गयी न्यूनतम शिक्षा व अन्य शर्तों के खिलाफ दायर याचिका को ख़ारिज कर दिया। इस फैसले के आने के बाद हरियाणा में लगभग 82 % लोग चुनाव लड़ने की योग्यता खो चुके हैं। अब ये लोग किसी भी स्थानीय निकाय का चुनाव नही लड़ सकते।
            अभी पिछले हफ्ते संसद में संविधान दिवस मनाया गया। उस अवसर पर बोलते हुए माकपा महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा था की सार्वभौमिक मताधिकार हमारे संविधान की सबसे बड़ी ताकत है और इसके बिना लोकतंत्र की कल्पना भी नही की जा सकती। उन्होंने बीजेपी शासित राज्यों में इस अधिकार को सिमित करने वाले नियम लागु करने की आलोचना करते हुए हरियाणा सरकार के इस कानून का विशेष तौर पर जिक्र किया था और इसे लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ बताया था।
              लेकिन उसके एक हफ्ते बाद ही उच्चत्तम न्यायालय द्वारा इस पर मुहर लगाना लोगों  आश्चर्य में डालने वाला है। पहले जब महिलाओं को मताधिकार प्राप्त नही था तब उस व्यवस्था के समर्थक भी ये तर्क देते थे की महिलाएं राजकाज के बारे में कम जानती हैं। कुछ देशों में जिनके पास सम्पत्ति नही होती थी तो उनको वोट डालने का अधिकार नही होता था। अब शिक्षा की कमी होने, घर में पक्का शौचालय ना होने और किसी बैंक का कर्ज बाकि होने पर चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराया जा रहा है। ऐसा तो नही है की पिछला जमाना लौट रहा हो और देश के अनपढ़, गरीब, भूमिहीन, घरविहीन लोगों को चुनावी प्रक्रिया से बाहर किया जा रहा हो।
                बाद में कोई सरकार फिर से सम्पत्ति के आधार पर वोट की कीमत तय कर सकती है। आखिर ऐसा कैसे हो सकता है की एक ठेला लगाने वाले और मुकेश अम्बानी दोनों के वोट की कीमत एक जैसी हो।
               चार दिन पहले माननीय न्यायमूर्ति और उच्चत्तम न्यायालय के नवनियुक्त मुख्य न्यायाधीश महोदय ने देश की जनता को भरोसा देते हुए कहा था की जब तक स्वतंत्र न्यायपालिका है किसी को डरने की जरूरत नही है। लेकिन अब उसी उच्चत्तम न्यायालय ने एक राज्य के बहुमत  लोगों को चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहरा दिया।
                 देश में गरीब और शोषित लोगों के खिलाफ एक अनदेखी का भाव बढ़ रहा है। विकास के नाम पर ऐसे प्रोजैक्टों को मंजूर किया जा रहा है जिनसे बहुत बड़े पैमाने पर आदिवासियों और दूसरे लोगों का विस्थापन होता है। और उनके पुनर्वास के लिए कोई पुख्त योजना नही होती है। सालों से इस तरह के उजड़े हुए लोग अब भी सड़क पर जीवन गुजारने को मजबूर हैं।
                  इस दौरान ऐसे मामलों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है जब  किसी उद्योग में हड़ताल होने पर न्यायालय तुरंत उस पर रोक लगा देता है। लेकिन देश में न्यूनतम वेतन लागु नही है ये न्यायालय की परेशानी नही है। जो लोग ये कहते हैं की न्यायालय भी वर्गीय शासन का हिस्सा होता है और निष्पक्ष न्यायालय जैसी कोई चीज वजूद में नही है क्या वो सही हैं ?
                     पिछले दिनों उपहार सिनेमा के फैसले के बाद जिन लोगों की ये धारणा बनी थी की पैसे वाले लोगों को सजा दिलाना मुश्किल होता जा रहा है आज सलमान खान के फैसले के बाद उनकी ये अवधारणा और मजबूत होगी।                  


Thursday, September 3, 2015

प्रति व्यक्ति आय के आंकड़े सही स्थिति नही बताते।

किसी भी जानकारी के लिए आंकड़े महत्त्वपूर्ण होते हैं। लेकिन आंकड़े अलग अलग तरह के लोगों को उनकी अलग अलग व्याख्या का मौका भी उपलब्ध करवाते हैं। आंकड़ों की व्याख्या करने वाले का इरादा समझे बिना उस व्याख्या को सही तरह से समझना मुश्किल होता है। सरकारें आंकड़ों का मकड़जाल फैला कर जनता को भर्मित करने का काम करती रही हैं। इस मायने में प्रति व्यक्ति आय के आंकड़े भी सही परिपेक्ष्य में समझने जरूरी होते हैं। प्रति व्यक्ति आय के आंकड़ों से किसी देश की कुल गरीबी या अमीरी का अनुमान तो लग सकता है, परन्तु उससे आम लोगों के जीवन स्तर को समझना इतना आसान नही है। इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण कारक  है उस देश में आय का बंटवारा किस तरह हुआ है। इसलिए प्रति व्यक्ति आय के आंकड़ों को असमानता के आंकड़ों के साथ मिलकर देखना जरूरी होता है। इसे एक छोटे से उदाहरण के द्वारा आसानी से समझा जा सकता है। 
                   एक गांव में कुल 200 लोग रहते हैं। उसमे एक कारखाना है जिसका एक आदमी मालिक है और बाकि 199 लोग उसमे नौकरी करते हैं। नौकरी करने वालों को महीना 500 रूपये वेतन मिलता है। और कारखाने का मालिक 5 लाख रुपया सालाना कमाता है तो उस गांव के प्रति व्यक्ति आय के आंकड़े इस प्रकार होंगे।              199 व्यक्ति x 6000 =  1194000 
                      एक व्यक्ति            =   500000 
                                    कुल       =    1694000 
                     प्रति व्यक्ति आय    =     1694000 / 200 = 8470 रूपये 
      इस तरह आंकड़ों में उस गांव की प्रति व्यक्ति आय 8470 रूपये होगी। 
       अब एक दूसरा उदाहरण लें। दूसरे गांव में भी 200 लोग रहते हैं। और वो सभी बाहर नौकरी करते हैं और उन्हें 700 रूपये महीना वेतन मिलता है। इस तरह उस गांव की प्रति व्यक्ति आय 12 x 700 = 8400 रूपये सालाना होगी। लेकिन उनकी प्रति व्यक्ति आय पहले गांव से 70 रूपये कम होने के बावजूद उनका रहन सहन पहले गांव से अच्छा होगा क्योंकि वहां आय का बंटवारा ज्यादा समान है। 
                    ठीक इसी तरह हमारे देश के प्रति व्यक्ति आय के आंकड़ों को समझने की जरूरत है। कभी जबकि बिहार में चुनाव नजदीक है तो आंकड़ों का गोलमाल बहुत चल रहा है। 
         प्रति व्यक्ति आय 2015 -------
                                                          हमारे देश के 2014 -15 के आंकड़े जीडीपी पैर कैपिटा के अनुसार 
            1262 . 64 $ यानि 78284 रूपये है ---- ( 1 $ = 62 Rs .)

     हमारे  देश का प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से दुनिया में 145 वां नंबर है और एशिया में 34 वां नंबर है। पूरी दुनिया की औसत प्रति व्यक्ति आय 10880 $ है और इस हिसाब से हमारी प्रति व्यक्ति आय दुनिया की औसत आय से 6 . 7 गुना कम है। बाकि विकसित देशों का हिसाब तो छोड़ ही दीजिये। 
                      लेकिन जब इसको आय वितरण के आंकड़ों के साथ मिलाकर देखा जाये तो स्थिति और भी ज्यादा भयावह हो जाती है। हमारे देश में आय और सम्पत्ति का बंटवारा बहुत ही असमान है। आंकड़ों के हिसाब से समझें तो हमारे देश में केवल 10 % लोग 74 % सम्पत्ति के मालिक हैं। अगर हम आय का वितरण भी इसी हिसाब से करें तो बाकि 90 % लोगों की प्रति व्यक्ति आय 24400 रूपये रह जाती है। अगर और 10 % ऊपर के लोग निकाल दिए जाएँ तो स्थिति हास्यास्पद हो जाती है। और जो पहले ये आंकड़े आये थे की भारत में 72 % लोग 20 रूपये रोज से कम पर गुजारा करते हैं तो स्थिति उसके आसपास ही बैठेगी। 
                      इस तरह हमारे देश के 60 % से ज्यादा लोग भयंकर गरीबी की हालत में जी रहे हैं। उनके लिए ना तो कोई रोजगार उपलब्ध है, ना ही असरकारक भोजन की सुरक्षा उपलब्ध है, ना स्वास्थ्य सेवाओं तक उनकी पहुंच है। और ये स्थिति निरंतर बिगड़ रही है। हर बार के आंकड़े सम्पत्ति के वितरण को और अमीरों के पक्ष में दिखाते हैं और ज्यादा से ज्यादा लोग भुखमरी के शिकार हो रहे हैं। इसलिए ये और भी जरूरी हो जाता है की गरीबों की मांगों का समर्थन किया जाये और उनके लिए सहायता के कार्यक्रमों को सही ढंग से लागु होने को सुनिश्चित किया जाये।

Sunday, August 30, 2015

आरक्षण विरोधियों के दिल से फिर गरीबों के लिए खून टपक रहा है !

peoples gathering

आरक्षण विरोधियों के दिल से फिर गरीबों के लिए खून टपक रहा है। जब जब आरक्षण की बात होती है तब तब आरक्षण विरोधियों के दिल से खून टपकने लगता है, कभी टेलेंट के नाम पर और कभी गरीबों के नाम पर। अपर क्लास के कुछ लोगों को कभी भी आरक्षण हजम नही हुआ। जहां भी उन्हें लगता है की उनका सामाजिक और आर्थिक आधिपत्य प्रभावित हो रहा है, उनके दिल से खून टपकने लगता है। मंडल आयोग ने जब OBC के लिए 27 % आरक्षण की सिफारिश की थी तब इसके विरोध में इन लोगों ने बहुत बड़े पैमाने पर उत्पात मचाया था। तब ये आरक्षण का विरोध कर रहे थे। और उस समय बहाना था मेरिट का। उस समय तरह तरह के कुतर्क सुनाई देते थे, जैसे 40 % नंबरों से दाखिला लेने वाले किसी डाक्टर से कौन अपना आपरेशन करवाना चाहेगा। क्या किसी ऐसे विमान चालक पर भरोसा किया जा सकता है जिसे कम नंबरों के बावजूद आरक्षण के कारण दाखिला मिला हो। इस तरह के बहुत से उदाहरण दिए जाते थे।
                        उसके बाद जब ये उस आरक्षण को लागु होने से नही रोक पाये तो उसे निष्प्रभावी करने का दूसरा तरीका निकाला। अब उन्होंने अपनी अपनी जातियों को आरक्षण की सूचि में डालने की मांग करनी शुरू कर दी। अब की बार उन्होंने गरीबी का बहाना बनाया। अब वो दोनों तरह के तर्क दे रहे हैं। जैसे या तो आरक्षण को खत्म कर दो, या फिर हमे भी दे दो। अगर हमे आरक्षण दे देते हो तो आरक्षण सही है वरना गलत है। अब उन्हें देश में आरक्षण मिली हुई जातियों में कोई अछूत और गरीब नजर नही आता।
                          
mass protest rally
लेकिन ये जो लोग सबको समानता की बात कर रहे हैं और कभी मेरिट तो कभी गरीबी का मुद्दा उठा रहे हैं उनमे कौन कौन लोग हैं ? इनमे बड़ी तादाद में वो लोग हैं जिनके नालायक बच्चे 40 % नंबर लेकर डोनेशन वाली सीटों पर डाक्टरी कर रहे हैं। इनमे से बहुत ऐसे लोग भी हैं जो दूसरों की तो छोडो अपनी जाती के गरीबों का इलाज किफायती रेट पर करने को तैयार नही हैं। इनमे बहुत से ऐसे लोग भी हैं जो देश में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण के लिए जिम्मेदार हैं। अभी मध्यप्रदेश के व्यापम घोटाले की जो खबरें आ रही हैं उनमे इन्ही लोगों के बच्चों की बड़ी तादाद है। ये लोग प्राइवेट स्कुल चलाते हैं और बिना डोनेशन के किसी को दाखिला नही देते, लेकिन जब आरक्षण की बात आती है तो इनके दिल से गरीबों के लिए खून टपकने लगता है।
                          जो लोग सबको समानता की बात करते हैं उन्होंने एकबार भी नही कहा की सारी प्राइवेट सीटों को सरकार अपने कोटे में शामिल करे। इन्होने कभी नही कहा की सभी सरकारी स्कूलों की सीटें दुगनी की जाएँ। सभी प्राइवेट स्कुल कालेजों को सरकारी सहायता देकर भारी फ़ीस से मुक्ति दिलाई जाये। इन्होने कभी नही कहा की चार-चार हजार की फिक्स पगार पर भर्तियां बंद हों। हमारे देश में तो प्राइवेट संस्थाओं में आरक्षण नही है। इन्होने कभी नही कहा की उनमे काम के हालत सुधार कर उन्हें सरकारी नौकरियों के जैसा ही आकर्षक बनाया जाये। ये ऐसा कभी नही कहेंगे क्योंकि ये सारे निजी संस्थान यही लोग तो चलाते हैं और अपनी जाति  के गरीब मजदूरों को न्यूनतम वेतन तक नही देते।
                       
  वैसे जो लोग सही में ऐसा समझते हैं की अब छुआछूत की कोई समस्या देश में बची नही है और सामाजिक तौर पर बराबरी आ गयी है, उनको इन जातियों में शादियां करनी चाहियें। हमारे देश में कानून है की किसी दलित और स्वर्ण की शादी होने के बाद उनके बच्चे किसी का भी उपनाम प्रयोग कर सकते हैं। इस तरह उन्हें अनुसूचित जाती के आरक्षण का लाभ अपने आप मिलने लगेगा और देश से जाति  प्रथा भी दूर हो जाएगी। लेकिन वो ऐसा तो कभी नही कर सकते।
                         
  असल समस्या कहीं और है। जो काम सरकारों को करना चाहिए था उन्होंने नही किया। जो लोग सबकी समानता की बात करते हैं उन्हें सबके लिए शिक्षा और रोजगार की मांग करनी चाहिए थी। सरकारी स्कूलों और कालेजों में सीटें बढ़ाने की मांग करनी चाहिए थी। सरकार में खाली पड़े पदों को भरने की मांग करनी चाहिए। परन्तु चूँकि ये सारे काम ऊँचे स्थान पर बैठे लोगों को रास नही आते इसलिए इनकी मांग भी नही होती। इसके साथ ही ऊँची जातियों में जो गरीब लोग हैं वो अपने आप को उपेक्षित महसूस ना करें इसलिए उनके लिए 10 % आरक्षण की मांग की जा सकती है। इस पर शायद ही समाज का कोई वर्ग या जाति  विरोध करे। जरूरत पड़े तो इसके लिए कानून में बदलाव भी किया जा सकता है। क्योंकि इस मांग पर लगभग आम सहमति है। परन्तु फिर वही बात आती है। जो लोग आरक्षण के आंदोलनों का नेतृत्व करते हैं उन्हें इसका कोई फायदा नही होगा। इसलिए ये मांग नही उठाई जाएगी। उन लोगों का तो अंतिम मकसद पूरे आरक्षण की प्रणाली को ही निष्प्रभावी बनाना है।

Friday, August 28, 2015

क्या ये भारतीय मजदूर आंदोलन का सक्रांति-काल है।


bannar of all india strike sfi-dyfi photo of a procession
2 सितंबर को होने वाली अखिल भारतीय हड़ताल की जिस तरह से तैयारियां हो रही हैं और जो खबरें आ रही हैं, उससे ये साफ हो गया है की ये भारत की अब तक की सबसे व्यापक हड़ताल होगी। इस तरह की व्यापक एकता इससे पहले भारतीय मजदूर आंदोलन में इससे पहले कभी नही देखी गयी। असल बात तो ये है की पिछले 25 सालों से भारत का मजदूर आंदोलन एक ऐसे मोड़ पर आकर खड़ा हो गया था जिससे आगे बढ़ने का रास्ता मिलना तो दूर की बात, अपने अस्तित्व की लड़ाई ही लड़ रहा था।
                1980 के दशक में जब भारी आर्थिक संकट के बाद विकासशील देशों को IMF और विश्व बैंक के पास सहायता के लिए जाना पड़ा तो उस सहायता पैकेज के साथ कुछ शर्तें भी नत्थी हो कर आई। इन शर्तों में निजीकरण की शर्त प्रमुख रूप से शामिल थी। सभी सरकारों ने सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों के निजीकरण का सिलसिला शुरू किया। इसके साथ ही श्रम कानूनो में छूट दी जाने लगी।
      
man holding play card saying imf-trapping countries in debt
   उसके बाद 1991 में आर्थिक सुधारों का दौर आया। इसमें निजीकरण के साथ ही वैश्वीकरण और उदारीकरण भी शामिल था। सरकार ने आर्थिक पुनर्संगठन के साथ ही SAP ( Structural Adjustment Programme ) शुरू किया। इसमें सभी तरह के उद्योगों के मैनेजमेंट बोर्ड में निजी क्षेत्र के लोगों को भरा जाने लगा। इस प्रोग्राम ने बड़े पैमाने पर बेरोजगारी में बढ़ौतरी की। साथ की रोजगार के क्षेत्र में स्थाई श्रमिकों की जगह ठेकेदारी प्रथा, अस्थाई मजदूर और पार्ट टाइम मजदूरों की संख्या बढ़ने लगी। बड़े पैमाने पर काम का आउटसोर्सिंग किया जाने लगा। इससे पब्लिक सैक्टर के उद्योगों में ट्रेड यूनियनों पर अस्तित्व का संकट आकर खड़ा हो गया।
                   इसके बाद उद्योगों में ट्रेड यूनियनों की बारगेनिंग पावर ( मोलभाव की ताकत ) घटने लगी। इसका प्रभाव ये हुआ की मजदूरों का विश्वास ट्रेड यूनियनों पर कम होने लगा। दूसरी तरफ उदारीकरण के समर्थक देश के नौजवानो  सब्जबाग दिखा रहे थे। उन्हें विकास के झूठे माडल दिखाए  जाने लगे। एक दौर ऐसा भी था जब आईटी क्षेत्र और मार्केटिंग के क्षेत्र में नौजवानो को काम भी मिला। इन क्षेत्रों में भले ही कोई श्रम कानून लागु नही थे लेकिन वेतन का स्तर ऊँचा था। नई पीढ़ी को उसमे ही रास्ता नजर आने लगा। लेकिन इसका बहुत जल्दी ही अंत दिखाई देने लगा। जिस बड़े पैमाने पर नए बेरोजगार कतारों में शामिल हो रहे थे, और जिस बड़े पैमाने पर लोगों को नौकरियां जा रही थी उससे संकट बढ़ने लगा।
                 
wemans procession of citu
उससे निपटने के लिए वामपन्थी ट्रेड यूनियनों की पहल पर NCC ( National Compagain Committee ) की स्थापना हुई। लेकिन सभी बड़ी ट्रेड यूनियनों के इस साझा मंच से भारतीय मजदूर संघ और इंटुक अलग रह गयी। उन्हें अभी तक सरकारों के आश्वासन पर भरोसा था। साथ ही शासन में रहने वाली दोनों बड़ी पार्टियां कांग्रेस और बीजेपी का उन पर सांगठनिक प्रभाव भी था। इस दौरान उदारीकरण की नीतियों के विरोध में कई हड़तालें और आंदोलन हुए। लेकिन हर बार कभी इंटुक और कभी भारतीय मजदूर संघ उससे अलग रहे। वामपन्थी ट्रेड यूनियनें इस अभियान को जारी रखे रही। एक समय ऐसा आया की इंटुक और भारतीय मजदूर संघ से संबंधित यूनियनों के मजदूरों ने अपनी एफिलिएशन से अलग जाकर वामपंथी आंदोलनों में शिरकत की। उसके बाद इन यूनियन के नेताओं में पुनर्विचार का दौर शुरू हुआ। साथ ही अब तक सरकार के सभी आश्वासनों और दावों की हवा निकल चुकी थी। पितृ पार्टियों से मजदूर संगठनो के मतभेद गहराने लगे। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के वित्त मंत्री यशवन्त सिन्हा और भारतीय मजदूर संघ के नेता दत्तोपंत ठेंगडी का विवाद सबको मालूम है।
                 
dharna of labour at railway track
  अब तक सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग एक महागठबंधन का निर्माण कर चुके थे। इस गठबंधन में भारतीय मजदूर संघ और इंटुक दोनों से संबंधित यूनियन भी शामिल थी। इस महागठबंधन की कार्यवाहियां कई जगह विजयी हस्तक्षेप करने में कामयाब रही। अब मजदूर संगठनो ने असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की लामबंदी शुरू की। कई ऐसे क्षेत्र जिनमे आंगनवाड़ी में काम करने वाली महिलाओं से लेकर निर्माण मजदूरों तक,  बड़ी संख्या में मजदूर लामबंद हुए। संगठित क्षेत्र में यूनियनों को जो नुकशान उठाना पड़ा था उसकी भरपाई इससे हो गयी। मजदूर संगठनो की कतारें बढ़ने लगी और उनका प्रतिरोध भी बढ़ने लगा।   एकता के कारण मजदूरों का विश्वास इन संगठनो पर बढ़ा और उनमे नए होंसले का संचार हुआ।
                     
communist party logo of hansiya and hatouda
  इसके बाद आई ये 2 सितंबर की अखिल भारतीय हड़ताल। केन्द्रीय मजदूर संगठनो की भागीदारी के मामले में इस हड़ताल को अब तक के सबसे व्यापक संगठनो का समर्थन प्राप्त है। इसके साथ ही विभिन्न छात्र और नौजवान संगठनो से लेकर, किसानो और महिलाओं के संगठनो तक ने इस हड़ताल में शामिल होने की घोषणाएँ की हैं। संगठनो के मामले में इतना व्यापक समर्थन इससे पहले कभी देखने को नही मिला। जाहिर है की ये शायद अब तक की सबसे बड़ी हड़ताल साबित हो। इस हड़ताल को सभी केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के अलावा सभी पब्लिक सैक्टर के उद्योगों के संगठनो के साथ साथ बीमा और बैंक जैसे वित्तीय क्षेत्रों की सभी यूनियन भी शामिल हैं। इस हड़ताल को राज्य सरकारों की बिजली और यातायात जैसी लगभग सभी यूनियनों का समर्थन भी प्राप्त है।
                   
            इसलिए हो सकता है की ये हड़ताल भारतीय मजदूर आंदोलन का नया सक्रांति-काल साबित हो।
                             

Wednesday, August 26, 2015

क्या ये देश गुलामों की मण्डी है ?

 
Slave auction in virginia

गप्पी --  जैसे कोई ठेले पर आलू बेचता है उसी तरह बहुत दिन से हमारी सरकार एक रट लगाए हुए है। पूरी दुनिया में घूम घूम कर हमारे प्रधानमंत्री कह रहे हैं सस्ती लेबर ले लो, जवान लेबर ले लो। बिना किसी कानून के ले लो। भाईओ इतनी सस्ती लेबर आपको दुनिया में कहीं नही मिलेगी। हमारी लेबर एकदम जवान लेबर है। आपको पूरी दुनिया में इतनी जवान और इतनी बड़ी संख्या में लेबर कहीं नही मिलेगी। आप हमारे यहां आइये। यहां अपना कारखाना लगाइये और हमारी सस्ती और जवान लेबर का फायदा उठाइये।
                   अगर आपको फिर भी कोई तकलीफ है तो हमे बताइये। यहां आकर बताइये या वहीं बता दीजिये, मैं तो आपके यहां ही रहता हूँ। ऐसा नही है हमे आपकी तकलीफें मालूम नहीं हैं। हमे सब मालूम हैं। आपको सारी लेबर ठेके पर चाहिए।  कोई बात नही हम अपने कानून बदल देंगे। आप जितनी चाहिए उतनी लेबर ठेके पर रख सकते हैं। आपको उनका कोई रिकार्ड नही रखना है? मत रखिए, आपको किसने कहा है ? हम कानून बदल रहे हैं जिसमे रिकार्ड रखने की जरूरत ही नही रहेगी। और बताइये, आपको अप्रेन्टिस के नाम पर और कम वेतन में मजदूर चाहियें, कोई बात नही। हम कानून को बदल कर अप्रेन्टिस रखने की सीमा और समय बढ़ाकर अनिश्चित काल कर देते हैं। आपको यूनियन नही चाहिए, उसका भी हल है। हम जो नया कानून बना रहे हैं उसके बाद कोई यूनियन बनाना तो दूर, कोई यूनियन का नाम भी नही ले पायेगा। और बताइये, आपको 12 घंटे काम करवाना है तो हम ओवरटाइम का कानून बदल देते हैं। आप कितनी  ही देर काम करवाइये।
                   हमे आपकी सारी समस्याएं मालूम हैं। आपको लड़कियों से रात को काम करवाना पड़  सकता है, हम आपके कहने से पहले ही कानून में लड़कियों की रात की शिफ्ट पर लगी पाबंदी हटा देते हैं। जिन लोगों को उनकी सुरक्षा की चिंता है उनके लिए हम बेटी बचाओ अभियान चला रहे हैं। अब तो आपको हम भरोसा हुआ या नही। हम लेबर को सस्ता रखने के लिए मनरेगा जैसे कार्यक्रम बंद कर देने वाले हैं। आप यहां अपने मित्रों से पूछ सकते हैं की हमने इस पर काम भी शुरू कर दिया है। और घबराइये मत, इसका कोई दोष आप पर नही आएगा। हम ये सारे काम श्रम सुधारों के नाम पर कर रहे हैं। हमने अब तक जिन चीजों का भी सत्यानाश किया है सुधार का नाम लेकर ही किया है। इसलिए आप आइये और हमारे जवान और सस्ते मजदूर ले लीजिये।
                   मुझे लगा की मैं पुराने बसरे के बाजार में खड़ा हूँ। जहां गुलामों की बोलियाँ लग रही हैं। लीजिये साहब ये लीजिये एकदम मजबूत और जवान गुलाम जो पहाड़ भी तोड़ सकता है और एकदम कम कीमत पर। फिर दूसरी तरफ से आवाज आती है ये लीजिये मेहरबान एकदम सख्तजान गुलाम, आप इसको काट कर भी देख सकते हैं। इसकी रगों में लहू नही लोहा बहता है। और एकदम मुफ्त के भाव पर। काबुल, बसरा और बगदाद की मंडियां दिखाई दे रही हैं। मुझे दिखाई देता है की समुद्री जहाज भर भर कर गिरमिटिया मजदूर विदेश ले जाए जा रहे हैं। मुझे पसीना आता है
                  पहले के समय में जब तक गुलाम को कोई खरीद नही लेता था तब तक उसे जिन्दा रखने और खिलाने पिलाने की जिम्मेदारी उसके मालिक की होती थी। लेकिन आज के  गुलाम को तो ये जिम्मेदारी भी खुद ही उठानी पड़ती है। जब मार्क्स ने इसे उजरती गुलामी कहा था तब बहुत हो-हल्ला मचा था। लेकिन आज इस बात का कोई जवाब नही है। एक मजदूर के पास केवल एक ही आजादी थी, की वह किसकी गुलामी करना चाहेगा लेकिन अब तो उसके अवसर भी नही बचे। सरकार चार-चार हजार के फिक्स वेतन पर भर्तियां कर रही है और प्रधानमंत्री लालकिले से श्रम के सम्मान की बात करते हैं। क्या हमारा नौजवान इतना भी नही समझता ? मैंने बहुत पहले एक कवि की कुछ पंक्तियाँ पढ़ी थी जो मुझे पसंद नही आई थी। एक मजदूर के घर बच्चे के पैदा होने पर वो कहता है ,--
                         ये नन्हा,
                         जो भोला-भाला है। 
                          कुछ नही है,
                          सरमाये का निवाला है। 
                          बड़ा होगा तो,
                          कारखाने के काम आएगा। 
                          मुनाफे की भट्टी में,
                          झौंक दिया जायेगा। 
        ये तो मनुष्य के गरिमापूर्ण जीवन की गाथा नही है। जिस तरह की बोलियाँ लगाई जा रही हैं, वो तो उनके मानव होने के अधिकार पर ही प्रश्न चिन्ह लगाती हैं। बहुत ही सहज तरीके से इस देश को गुलामों की मण्डी में बदला जा रहा है। इसे कौन स्वीकार करेगा। 

खबरी -- उन्हें फैज अहमद फैज के इन शब्दों को भी याद रखना चाहिए,--
                          यूँ ही उलझती रही है हमेशा जुल्म से खल्क ,
                          न  उनकी  रस्म नई है  न अपनी  रीत नई। 
                          यूँ  ही  खिलाये  हैं  हमने आग  में   फूल ,
                           न उनकी हार नई है   न अपनी जीत नई।

Tuesday, August 25, 2015

धर्म आधारित जनसंख्या के आंकड़े - संघ का झूठ बेनकाब

             आरएसएस लम्बे समय से ये प्रचार करता रहा है की जिस तेजी से मुस्लिमों की जनसंख्या बढ़ रही है उसके कारण बहुत जल्दी देश में हिन्दू अल्पसंख्यक हो जायेंगे। कम पढ़े लिखे और संघ पर भरोसा करने वाले बहुत से लोग भी इस पर विश्वास करने लगे थे। अपने इस तर्क के पीछे संघ मुस्लिमों की चार शादियां करने की छूट को भी तर्क के रूप में इस्तेमाल करता रहा है। अब 2011 की जनगणना के धर्म आधारित आंकड़े जारी कर दिए गए हैं। आदत के अनुसार संघ के लोग इनकी व्याख्या भी अपने हिसाब से तोड़ मरोड़ कर कर रहे हैं। लेकिन चिल्ला चिल्ला कर आवाज देती हुई सच्चाई को छिपाना मुश्किल हो रहा है। कुछ समाचर पत्रों ने भी इस खबर को छापते वक्त ये हेडलाइन लगाई है की देश की जनसंख्या में मुस्लिमो हा हिस्सा बढ़ा है। खबर को इस तरह पेश करना अर्धसत्य होता है और अर्धसत्य बहुत बार झूठ से भी ज्यादा खतरनाक होता है। 2011 की जनगणना के जो आंकड़े सामने आये हैं और उनसे जो तथ्य उभर कर आये हैं वो इस प्रकार हैं। 
ये आंकड़े तीन तथ्यों पर देखे जाने चाहियें। 

                                                           हिन्दू                      मुस्लिम 
1991      कुल जनसंख्या                   --------------           --------------

2001                       ''                         85. 29     Cr.           14 . 20  Cr.

2011                       ''                         96 . 63     Cr.           17 . 22  Cr.

2001     जनसंख्या में हिस्सेदारी      80 . 5     %               13 . 4  %

2011                            ''                     79 . 8     %              14 . 2   %

1991     जनसंख्या वृद्धिदर                25 . 1     %              34 . 5   %

2001                          ''                       20 . 3     %              29 . 5   %

2011                          ''                       16 . 8     %              24 . 5    %

             उपरोक्त आंकड़ों से दो बातें साफ होती हैं। पहली ये की 2001 से 2011 के बीच हिन्दुओं की जनसंख्या में कुल मिलकर 11 करोड़ 34 लाख की बढ़ौतरी हुई। और मुस्लिमों की जनसंख्या में 3 करोड़ 2 लाख की बढ़ौतरी हुई। 
          दूसरी बात जो इसमें सामने आई वो ये है की 1991 से 2001 के बीच हिन्दुओं की जनसंख्या बढ़ौतरी की दर में 4.8 % और 2001 से 2011 के बीच 3.5 % की गिरावट आई। लेकिन मुस्लिमों की जनसंख्या बढ़ौतरी की दर में यही गिरावट 1991 से 2001 के दौरान 5 % और 2001 से 2011 के बीच में भी 5 % की दर से आई। इसका मतलब ये होता है की मुस्लिमों की जनसंख्या बढ़ौतरी की दर में गिरावट हिन्दुओं की अपेक्षा ज्यादा तेजी से आई है। 
            तीसरी महत्त्वपूर्ण बात ये है की जिन समुदायों का हिस्सा 80 -17 हो तो छोटा समुदाय कभी भी बहुसंख्यक नहीं हो सकता है। क्योंकि उनकी कुल जनसंख्या बढ़ौतरी असल में 11 करोड़ 34 लाख और 3 करोड़ 2 लाख ही होगी। अगर इसमें कुछ फर्क भी आता है तो भी हिंदुओं जी जनसंख्या बढ़ौतरी मुस्लिमों से करीब 8 करोड़ प्रति दशक ज्यादा ही रहेगी। 
                इसलिए मेरी लोगों से गुजारिश है की दूसरों के बहकावे में आने की बजाए आंकड़ों का विश्लेषण करना सीखें।

अवसर - जो हमने खो दिया। ( The opportunity that we have lost.)

आर्थिक क्षेत्र में हर राष्ट्र और समुदाय के सामने कुछ अवसर आते हैं। इन अवसरों का निर्माण कब और किन कारणों से होता है ये उस समय की परिस्थितियों पर निभर करता है। हमारा देश पिछले कुछ समय में एक सर्विस इकोनॉमी बनकर उभरा है। इसके पीछे जो प्रमुख कारण माना जाता है वो हमारे देश की जवान जनसंख्या को माना जाता है। कहा जाता है की इतनी बड़ी तादाद में नौजवान लेबर दुनिया में किसी देश के पास उपलब्ध नही है। कुछ लोगों को ये शर्म की बात लगती है तो कुछ लोगों को ये अवसर लगता है। पिछले कुछ सालों में कम्प्यूटर के क्षेत्र में जो हमारे युवा इंजीनियर बाजार में आये और हमारी कम्प्यूटर सेवा उपलब्ध करवाने वाली कम्पनियों ने पूरी दुनिया में इस कारोबार पर जो कब्जा करने की कोशिश की और उसके बाद विश्व की बड़ी कम्पनियों ने इस क्षेत्र में हमारे अपेक्षाकृत सस्ते श्रम का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया, उससे इस क्षेत्र में हमे नंबर एक पर मान लिया गया। लेकिन सर्विस इकोनॉमी आधारभूत रूप से एक परजीवी इकोनॉमी की तरह होती है। इसकी बढ़ौतरी उत्पादन के क्षेत्र की कम्पनियों की बढ़ौतरी पर सीधे रूप में निर्भर करती है। जैसे ही विकसित देशों में मंदी का दौर आया, हमे ये समझ में आ गया की केवल सर्विस बेचने के सहारे काम चलने वाला नही है। फिर हमारा ध्यान मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की तरफ गया। पिछले कुछ सालों में इस क्षेत्र पर चीन का दबदबा है। उसके सस्ते उत्पादों का मुकाबला दुनिया का कोई भी देश नही कर पा रहा है। लेकिन उसमे भी अब मंदी के लक्षण दिखाई दे रहे हैं।
                   उत्पादन क्षेत्र की मंदी ने पूरी दुनिया में धातु बाजार में मांग ना होने के चलते भारी गिरावट पैदा की। उसके साथ ही उसने सबसे ज्यादा मंदी कच्चे तेल की कीमतों में पैदा की। कभी 140 $ बैरल के भाव से बिकने वाला तेल कुल 40 $ प्रति बैरल से भी नीचे आ गया। इन दोनों क्षेत्रो में हम भारी मात्रा में आयात करते हैं। हमारा आयात बिल एकदम नीचे आ गया। हमारी अर्थव्यवस्था को मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में आगे बढ़ाने के लिए ये हमारे लिए एक स्वर्णिम अवसर था। किसी भी देश के उत्पादन को दूसरे देशों के मुकाबले सस्ता बनाने के लिए उसमे खर्च के जो जो कारक होते हैं उनमे मुख्य तौर पर एक होता है सस्ती श्रम शक्ति, और दूसरा होता है सस्ती ऊर्जा। विश्व बाजार में गिरते हुए तेल के दामों ने हमे ये अवसर उपलब्ध करवाया था। पूरी दुनिया में तेल की मांग कम होने के कारण तेल कंपनियां दबाव में हैं। अब उनके साथ कम कीमत पर लम्बी अवधि के करार करना पहले से ज्यादा आसान हैं। हमारी सरकार उनके साथ कम कीमत के करार करके और घरेलू बाजार में तेल की कीमतें आधी करके उद्योगों की उत्पादन लागत घटा सकती थी। इसके साथ ही वो उद्योगों को भी लम्बी अवधि तक कम कीमतों का भरोसा दे सकती थी। उससे जो उद्योग अभी कोयले या बिजली का उपयोग ईंधन के रूप में करते हैं, वो तेल या गैस पर शिफ्ट हो सकते थे। इससे हमारे उद्योगों का ऊर्जा बिल तो कम होता ही, माल ढुलाई के क्षेत्र में भी क्रांति हो सकती थी। रेल का माल ढुलाई भाड़ा कम हो सकता था। सड़क परिवहन का माल भाड़ा कम हो सकता था। गैस आधारित बिजली कारखानों का खर्च कम होने से बिजली के रेट कम हो सकते थे। और हमारी सस्ती शर्म शक्ति के साथ मिलकर ये हमारे उत्पादन की लागत को इतना कम कर सकते थे की हमारा माल अंतर्राष्ट्रीय बाजार में एक चुनौती बनकर उभर सकता था। 
                स्टील उत्पादन जैसे क्षेत्र में, जिसमे हम पहले ही बहुत आगे तो हैं लेकिन कीमतों के मामले में चीन की चुनौती का मुकाबला नही कर पा रहे हैं। चीन हमारे यहां से कच्चा लोहा आयात करता है। अगर ऊर्जा की कीमतें कम होती, जो स्टील उत्पादन में बहुत बड़ा कारक होती है, तो कच्चे माल की उपलब्धता और हमारी सस्ती लेबर के साथ मिलकर इस क्षेत्र में हमे चुनौती विहीन बना सकते थे। 
                   लेकिन अफ़सोस, हमारी सरका ने अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की गिरती हुई कीमतों का उपयोग अपनी टैक्स कलेक्शन बढ़ाने के लिए किया। और मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र को केवल " मेक इन इंडिया " जैसी घोषणाओं के भरोसे छोड़ दिया। हमारी सरकार पूरी दुनिया के उद्योगपतियों को हमारे यहां उद्योग लगाने के लिए आमंत्रित कर रही है, वो भी केवल सस्ती लेबर का नारा देकर। इसके लिए हम सभी तरह के श्रम कानूनों में छूट देने, या यों कहें की खत्म करने को तैयार हैं। अगर हमारे लोगों के पास पैसे ही नही होंगे तो उनकी खरीदने की शक्ति भी नही होगी। इससे उद्योगों का माल नही बिकेगा। और मंदी का एक साईकिल शुरू हो जायेगा। केवल निर्यात पर निर्भरता हमे आज के चीन जैसी स्थिति में पहुंचा सकते हैं। 
                  ये वो अवसर था जो हमारे देश की कायापलट कर सकता था और लेकिन हमारी सरकार ने उसे तात्कालिक टैक्स कलेक्शन के लिए इस्तेमाल करके बर्बाद कर दिया।
                   

Monday, August 24, 2015

कॉर्पोरेट का इरादा केवल लूट करने का है।

            एक बात बहुत ही हास्यास्पद लगती है, और इसका कोई दूसरा लॉजिक कभी भी मेरी समझ में नही आया। प्राईवेट कंपनियां और कॉर्पोरेट जगत हमेशा पब्लिक सेक्टर के उद्योगों के निजीकरण की मांग करता है। इसके लिए वो तरह तरह के तर्क-कुतर्क करता है। परन्तु क्या हमारे देश में नए उद्योग लगाने पर पाबंदी है। जब कोई भी उद्योगपति नया उद्योग लगा सकता है तो उसे पब्लिक सेक्टर के उद्योग ही क्यों चाहिए ?
             लेकिन उसे पब्लिक सेक्टर के उद्योग ही चाहियें। क्योंकि ये उद्योग उसे कोडियों के भाव चाहियें। जनता के पैसे से बनाई गयी और जनता के पसीने से सींची गयी कंपनियां चाहियें मुफ्त के भाव। जब भी किसी सरकारी उद्योग का निजीकरण किया जाता है तो उसकी सही कीमत निकालने का नाटक किया जाता है। उसके लिए विशेषज्ञों की टीम बनाई जाती है। इस टीम में निजी रेटिंग एजेंसियों के लोग होते हैं जो उसकी कीमत इतनी कम लगाते हैं की वो उसकी सही कीमत के आसपास भी नही बैठती। इस सारे फर्जीवाड़े को बड़े शानदार ढंग से अंजाम दे दिया जाता है। सरकार और कम्पनी खरीदने वालों के बयान आते हैं की पूरी कीमत दी गयी है। अब साबित करते रहो की कीमत पूरी नही है। जब सरकार खुद चोर के साथ मिली हुई हो तो चोरी साबित करना बहुत मुश्किल होता है। सेंटूर होटल जैसे उदाहरण हमारे सामने हैं। 
                दूसरा कारण जो पब्लिक सेक्टर की कम्पनियों को खरीदने के लिए होता है वो है उस क्षेत्र से सरकारी प्रतियोगिता का समाप्त हो जाना और एकाधिकार कायम करना। पहले हमारे देश में एक MRTP एक्ट होता था जो किसी भी क्षेत्र में एकाधिकार को रोकने के लिए कदम उठाता था। अब उसे भी खत्म कर दिया गया। रेशा बनाने वाली इकलोती पब्लिक सेक्टर की कम्पनी IPCL को उसके ही प्रतिद्वंदी रिलायंस को बेच दिया गया। अब इस क्षेत्र में रिलायंस का लगभग एकाधिकार है। जो दूसरे छोटे खिलाडी हैं भी तो उन्हें हर मामले में रिलायंस का अनुकरण करना पड़ता है। 
                भारतीय कॉर्पोरेट सेक्टर लगभग हमेशा ही करों में हेराफेरी और कानून कायदों के दुरूपयोग के भरोसे रहा है। वह ईमानदारी से कोई उद्यम स्थापित करने और चलाने के बजाय सरकारी सम्पत्ति के लूट पर नजरें गड़ाए रहता है। इस निजी क्षेत्र को पब्लिक सेक्टर से ज्यादा कुशल और ज्यादा योग्य माना जाता है। लेकिन आज यही सेक्टर है जो थोड़ी सी प्रतिकूल बाजार अवस्था होते ही बैंकों के लोन की पेमेंट नही कर रहा है। लाखों के टैक्स बाकि के केसों को अदालती प्रावधानों का दुरूपयोग करके लटकाए हुए है। और इसमें उसे सरकार का पूरा सहयोग हासिल है। करीब 250000 कारखाने बंद कर चूका है और अब भी ज्यादा कुशल कहलाता है। अगर ये सेक्टर इतना ही कुशल है और पूरी कीमत देकर पब्लिक प्रॉपर्टी को खरीदना चाहता है तो उसे नए उद्योग लगाने चाहियें, इससे देश में निवेश भी बढ़ेगा और रोजगार और उत्पादन भी बढ़ेगा।

Sunday, August 23, 2015

Vyang -- अब बिल्ली करेगी आपके दूध की रखवाली।

खबरी -- ये " पेमेन्ट बैंक " क्या बला है ?

गप्पी -- पिछले दिनों की कुछ बहुत ही महत्त्वपूर्ण खबरों पर एक नजर डालिये। एक खबर आई की देश के टैक्स का दो लाख सत्रह हजार करोड़ रुपया केवल सत्रह लोगों पर बकाया है। धन्य हो। ऐसे लोगों की तो पूजा होनी चाहिए। हालाँकि सरकार ऐसे लोगों की पूजा कर भी रही है। इनमे से कई लोग प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं में सम्मानित प्रतिनिधियों की तरह शामिल रहते हैं। उनका सम्मान होता है और उनकी अय्यासी का खर्चा इस देश की गरीब जनता उठाती है। 
                       दूसरी महत्त्वपूर्ण खबर ये आई की देश के सरकारी बैंको का छः लाख करोड़ रुपया लगभग डूब गया है। ये लगभग शब्द जो है उसकी खोज जोर का धक्का आहिस्ता से लगने के लिए की गयी थी। वरना लगभग का कोई मतलब नही है। असली खबर ये है की छः लाख करोड़ रुपया डूब चूका है। ये कौन बेचारे भाई हैं जो बैंको से लोन लेकर उसे चूका नही पाये। इनमे कई तो ऊपर वाले सत्रह लोगों में ही हैं। जो बाकि बचे वो इनके भाई बंधु , घर परिवार वाले और इन जैसे ही कुछ दूसरे महानुभाव हैं। बेचारा आम आदमी तो बैंक का सौ रुपया नही चुका पाये तो उसके खिलाफ FIR हो जाती है। बैंक की उगाही करने वाली जीप उनका खेतों तक पीछा करती है। और तब तक करती रहती है जब तक या तो वो पैसा दे दे या आत्महत्या कर ले। 
                       ऊपर के दोनों कुकर्मों के लिए हमारा निजी क्षेत्र जिम्मेदार है। जिसके सम्मान में सारा देश दुहरा हुआ रहता है। जिससे कोई सवाल नही पूछता। जिस का अपना मीडिया है, अपने एक्सपर्ट हैं, अपनी सरकार है और अपने नासमझ समर्थक हैं। ये व्ही निजी क्षेत्र है जिसे सारी आर्थिक बिमारियों का इलाज बताया जाता है। अब इसके लिए सरकार ने एक बहुत ही बढ़िया स्कीम बनाई है। 
                        हमारे रिजर्व बैंक ने इन्हे "पेमेंट बैंक" के नाम से बैंक खोलने की अनुमति दे दी है। ये बेचारे कुछ दिनों से बहुत परेशानी में थे। उद्योगों में मंदी का माहौल चल रहा है। बैंकों का जो पैसा खाया जा सकता था खा चुके हैं। टैक्स का जो पैसा हजम हो सकता था कर चुके हैं। बैंकों से नया लोन लेने के लिए भी कोई बहाना चाहिए भले ही कितना ही कमजोर क्यों न हो। अब इस बेचारे निजी क्षेत्र का विकास रुक गया। इसके बच्चे दो लाख रूपये रोज के किराये की होटलों में कैसे रुकेंगे। पत्नी की सालगिरह पर हवाईजहाज कैसे गिफ्ट में दिया जायेगा ? हजार-हजार करोड़ के मकान कैसे बनेंगे। उनकी इस परेशानी को देखते हुए सरकार ने इन्हे ही सीधे सीधे बैंक खोलने का परोक्ष अधिकार दे दिया। लो भाई, खुद पैसा इकट्ठा करो और खुद हजम करो। किस्से पैसा इकट्ठा करो ? अरे भई आम लोगों से, जो दूर के गांव में रहते हैं, दूसरी जगहों पर जाकर मजदूरी करते हैं और जहां कोई बैंक अपनी शाखा नही खोलना चाहता। ये सारा काम आपके मोबाईल पर कर देंगे। आपको ना बैंक जाने की जरूरत पड़ेगी और ना खाता खुलवाने के लिए सबूत देने की जरूरत पड़ेगी। अपनी छोटी छोटी  बचतों को इन बिल्लियों की रखवाली में रखिये और मलाई आने का इंतजार कीजिये। 
                         देश के ये बेचारे गरीब उद्योगपति हर रोज पैसा मांगने बैंक में जाएँ ये इनके सम्मान के खिलाफ है। बैंको में जो पैसा होता है वो भी जनता का ही होता है। ये बैंकों का पैसा खाते  रहते हैं फिर सरकार जनता के बजट में से पूंजी के नाम पर और पैसा डालती रहती है ये फिर खा लेते हैं। अब इस झंझट से छुटकारा मिल जायेगा सरकार को भी और इन बेचारी कम्पनियों को भी। आम जनता का पैसा ही खाना है तो भाई सीधे खाओ ना, सरकार को बीच में क्यों डालते हो।

Wednesday, August 19, 2015

GST बिल अलोकतांत्रिक,संघीय प्रणाली के खिलाफ और अमीरों और बड़ी कम्पनियों के फायदे में है।

मैंने GST बिल पर कुछ दिन पहले लिखे अपने लेख में इस बिल के महंगाई बढ़ाने वाले और लघु उद्योग पर इस बिल के दुष्प्रभावों पर रौशनी डालने का प्रयास किया था। मेरा ये लेख इसी ब्लॉग में "GST बिल घोर जनविरोधी, भयंकर महंगाई बढ़ाने वाला और लघु उद्योगों की मौत का फरमान है" 
के नाम से उपलब्ध है। इस लेख में मैंने इस बिल के कुछ व्यवहारिक पहलुओं पर लिखने की कोशिश की थी। उसी दिन शाम को NDTV पर एक टीवी बहस में देश के जाने माने अर्थशास्त्री प्रो अरुण कुमार ने उन सवालों की पुष्टि की। उसके बाद GST के सवाल पर कई तरह की टीवी बहसें भी हुई और कुछ राजनितिक पार्टियों के बयान भी आये। इसी क्रम में एक बहुत ही जानकारी पूर्ण लेख पीपुल्स डेमोक्रेसी में छपा है। ये लेख भी देश के जाने माने अर्थशास्त्री और केरल योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे श्री प्रभात पटनायक ने लिखा है। ये लेख "The Debate on GST" के नाम से छपा है। इस लेख में आदरणीय प्रभात पटनायक साहब ने इस बिल के सैद्धांतिक पहलुओं को उजागर किया है। इस लेख से मेरे द्वारा उठाये गए कुछ सवलों की पुष्टि भी होती है। इस लेख में मुख्य तौर पर दो सवालों को उठाया गया है। 

१. अलोकतांत्रिक प्रणाली लाने की कोशिश 

           अपने लेख में उन्होंने ये महत्त्वपूर्ण सवाल उठाया है की इस बिल के बाद जो टैक्स प्रणाली लागु होगी वो लोगों के जनतांत्रिक अधिकारों को और उनकी  चुनाव करने के विकल्पों को सिमित करेगा। इसको ठीक तरह से इस प्रकार समझा जा सकता है। अब तक लोगों के पास अलग राजनैतिक और आर्थिक विचारधारा वाली पार्टियों को चुनने का विकल्प है। इस प्रणाली के बाद राज्य में सरकार में आने वाली किसी भी पार्टी के लिए ये असम्भव हो जायेगा की वो किसी भी जरूरत मंद तबके को किसी भी तरह की टैक्स छूट देकर राहत दे सके। अब तक राज्य सरकारें अपनी आर्थिक  और राजनैतिक नीतियों के अनुसार टैक्स की दरें तय करती हैं। जिनमे जीवन के लिए जरूरी वस्तुओं पर ये दर कम रखी जाती है और कुछ विलासिता की वस्तुओं पर टैक्स लगाकर उस नुकशान की भरपाई कर ली जाती है। GST की प्रणाली लागु होने के बाद सभी वस्तुओं पर सभी राज्यों में एक समान कर होगा और राज्य सरकार चाहे भी तो इसमें कोई बदलाव नही कर सकती। एक तरफ ये रोक राज्य सरकार के अधिकारों को बाधित करता है तो दूसरी तरफ लोगों के अपनी मर्जी का विकल्प चुनने के अधिकार को भी बाधित करता है। लोग चाहें किसी को भी चुने टैक्स की दर में कोई परिवर्तन नही हो सकता। 

२. अमीरों को राहत देने की प्रणाली 

           दूसरा महत्त्व पूर्ण सवाल जो इसमें उठाया गया है वो ये है की GST लागु होने के बाद टैक्स की दरों में एक समानता (uniformity ) आ जाएगी। जिससे अमीरों द्वारा खरीदे जाने वाले विलासिता के  सामान पर टैक्स की दर जो अभी ज्यादा हैं वो कम हो जाएगी, और गरीबों के जीवन जरूरत की चीजों पर अभी जो कम दर है वो बढ़ जाएगी। इसलिए ये बिल गरीबों के हितों के खिलाफ और अमीरों के हितों के अनुसार होगा। इस तरह की (uniformity ) अंतिम तौर पर गरीबों के खिलाफ ही होगी। 
                         इस लेख में कुछ दूसरी महत्त्वपूर्ण बातें भी हैं। लेकिन मैं केवल उन्ही पहलुओं को उठा रहा हूँ जो इस लेख के लिए जरूरी हैं। 

लघु उद्योगों के खिलाफ और बड़ी कम्पनियों के फायदे में ---

                    जिस  (uniformity ) का जिक्र श्री प्रभात पटनायक साहब जरूरत और विलासिता की वस्तुओं के संदर्भ में कर रहे हैं उसी (uniformity ) की बात मैं लघु उद्योग और बड़े उद्योगों के संदर्भ में कर रहा हूँ। GST की नई टैक्स प्रणाली लागु होने के बाद लघु उद्योगों को मिलने वाली छूट केवल कागजों में रह जाएगी और उसका कोई व्यवहारिक मतलब नही रह जायेगा। इसकी पूरी तफ्सील मैंने अपने पिछले लेख में दी है। ये बिल लघु उद्योग को बर्बाद करने के बड़े उद्योग के षड्यंत्र का हिस्सा है जिसे समझने की जरूरत है। 
            

Tuesday, August 18, 2015

Vyang -- क्या ये जिन्दा कौम के लक्षण हैं ?

गप्पी -- डा. राममनोहर लोहिया की ये बात लाखों बार दोहराई गयी है की जिन्दा कौमे पांच साल इंतजार नही करती। किस चीज का इंतजार, ये लोहिया जी ने भी खुल कर नही बताया सो में भी क्यों बताऊँ। वैसे कुछ लोगों का विचार है की ये राजनितिक बदलाव और चुनाव के इंतजार के बारे में कहि गयी थी। मुझे ऐसा लगता है की ये राशन या रेलवे बुकिंग की लाइन देखकर भी कहि हो सकती है। लेकिन मेरे पड़ौसी ने इस पर एतराज करते हुए कहा की लोहिया जी ने जिन्दा कौम की बात की है और जिन्दा कौमें कभी लाइन में लगती हैं ? वे अपने सारे काम लाइन तोड़कर कर लेते हैं। फिर भी ना हो तो पिछले दरवाजे से कर लेते हैं। पिछला दरवाजा जिन्दा कौमों के लिए ही बनाया गया है। बाकि कोई तो वहां झांक भी नही सकता।
                   लेकिन हम पिछले 68 साल से इंतजार कर रहे हैं और खुद को जिन्दा भी मानते हैं। ये हमारी संस्कृति है। लोग ये भी कहते हैं की हमारी 5000 साल पुरानी संस्कृति छुआछूत खत्म होने का इंतजार कर रही है और जिन्दा भी है । जहां तक हमारा सवाल है हम 68 साल से इंतजार कर रहे हैं की अब तो आजादी हम तक पहुंचे थोड़ी तो रौशनी हमारे दिमागों तक भी पहुंचे। और हम जिन्दा भी हैं, जबकि लोहियाजी पांच साल इंतजार करने वालों को भी जिन्दा नही मानते थे।
                         हमारे घर के खली कमरे में स्कुल के कुछ बच्चे कभी कभी पढ़ने आ जाते थे। एक दिन उन्होंने मुझसे कहा की अँकल ये बताइये, अगर हमारे देश के लोग भगत सिंह को  फांसी देने के इतने ही खिलाफ थे तो उन्होंने उन्हें फांसी क्यों देने दी ? मैंने कहा की लोग विरोध कर रहे थे इसलिए अंग्रेजों ने उसे और उसके साथियों राजगुरु और सुखदेव को एक दिन पहले ही फांसी दे दी। उन्होंने कहा, लेकिन वो तो बहुत दिन से जेल में बंद थे और फांसी का दिन भी तय किया हुआ था तब हमारे लोगों ने क्यों नही कहा की नही हम फांसी नही देने देंगे। मैंने कहा लोग विरोध तो कर रहे थे पर अंग्रेज ऐसे क्यों मानने लगे। मानते क्यों नही ? सारे लोग इकट्ठे होकर कह देते तो मानना ही पड़ता वरना सब कुछ बंद हो जाता। सारी दुकाने, रेल, बस, सड़क, गांव, शहर, स्कुल, कालेज, दफ्तर, कचहरी आदि सब कुछ। फिर क्या करते अंग्रेज ? लोग अंग्रेजों को कह देते की तुम जाओ हमे तुम पसन्द नही हो। अँकल, जरूर सारे लोगों ने जोर देकर नही कहा होगा। मेरे पास कोई जवाब नही था। मैं सोच रहा था की अगर सारे इकट्ठे होकर कहें तो हिमालय रास्ता छोड़ दे, अंग्रेजों की क्या ओकात थी। लेकिन ताज्जुब की बात है की हम तब भी जिन्दा कौम थे और अब भी जिन्दा कौम हैं। जी हाँ. मैं अब की बात कर रहा हूँ। जब भोपाल गैस दुर्घटना हुई तो हम ही थे जो उनको बचा रहे थे, उनके केस लड़ रहे थे। उस दुर्घटना की दोषी यूनियन कार्बाइड का सारा माल वैसे ही बिकता रहा। हमारे नेता उसे दूसरे नाम से चलने की इजाजत देते रहे और उनकी सभी तरह की मदद करके फिर सत्ता पर कब्जा करते रहे, चुनाव जीतते रहे। वो कम्पनी तो अब भी करोड़ों कमा रही है और भोपाल गैस हादसे के पीड़ित उनके अपने ही देश में मुआवजे का इंतजार करते करते स्वर्ग सिधार गए और हम अब भी जिन्दा कौम हैं।
                      मुझे नरसिम्हाराव की सरकार याद है। उस समय उसे इतिहास की सबसे भृष्ट सरकार कहा जाता था। उच्चतम न्यायालय में कई केस थे। लोग चबूतरों पर बैठकर घंटों बहस करते और जोर देकर कहते की उच्चतम न्यायालय को सबको फांसी दे देनी चाहिए। कभी किसी की जमानत होने की खबर आ जाती तो लोग न्यायालय को कोसते। पुरे देश में उन मंत्रियों और सरकार के खिलाफ माहौल था। चुनाव हुए, कल्पनाथ राय समेत सभी आरोपी मंत्री चुनाव जीत गए। जो लोग उन्हें फांसी देने की मांग कर रहे थे उनके खिलाफ वोट नही दे पाये। उस समय भी हम जिन्दा कौम थे।
                        कोई आदमी नर संहारों का आरोपी है। बच्चो और महिलाओं तक की हत्या के आरोप हैं उस पर। लेकिन हम उसके समर्थन में रैली निकाल सकते हैं केवल इसलिए की वो हमारी जाति  का है। हजार साल पहले किसी ने हमारे पूर्वजों पर जुल्म किये थे। उसके बदले में हम आज अपने पड़ौसी और उसके परिवार की हत्या कर देते हैं महज इसलिए की उनका धर्म एक है। मरने वाला उसका नाम भी ठीक से नही जानता, लेकिन हम फिर भी जिन्दा कौम होने का दावा करते हैं।
                        जिस दिन कोई नेता कहेगा उस दिन हम सेना के नाम पर गीत गाएंगे, जिस दिन सरकार चाहेगी अमर जवान ज्योति पर फूल चढ़ाएगी, और जिस दिन सरकार चाहेगी पूर्व सैनिकों पर लाठियां बरसाएगी और हम उसका समर्थन करते रहेंगे। अगर आज डा. लोहिया होते तो मैं उनसे जरूर पूछता की जिन्दा कौम के क्या लक्षण होते हैं, जरा खुलासा कर दीजिये वरना बहुत मुश्किल होने वाली है। लेकिन वो नही हैं और इसका फायदा लोग उठा रहे हैं। ऐसे ऐसे लोग जिन्दा होने का दावा करने लगे हैं जो पैदा होने से पहले ही मर चुके थे।
खबरी -- हमारी पूरी कौम में चन्द लोग ही जिन्दा हैं।

Monday, August 17, 2015

Vyang -- जो सुरक्षा कारणों से खदेड़ दिए गए।


गुप्पी -- स्वतन्त्रता दिवस समारोह की पूर्व संध्या। जंतर मंतर पर बैठे भूतपूर्व सैनिकों को दिल्ली पुलिस ने खदेड़ दिया। इसका जो कारण बताया गया वो ये था की स्वतन्त्रता दिवस समारोह के लिए सुरक्षा पट्टी बनाई गयी है। बहुत खूब, दिल खुश हो गया। प्रधानमंत्री के पंद्रह अगस्त के भाषण के बाद सोशल मीडिया पर एक फोटो वाइरल हुआ जिसमे प्रधानमंत्री बिना बुलेट प्रुफ कांच के भाषण दे रहे थे। पर ये किसी ने नही बताया की उनकी सुरक्षा के लिए जंतर मंतर से पूर्व सैनिकों को खदेड़ा गया था।
                         ये लोग कौन थे ? ये वो लोग थे जिन्होंने तीन बार पाकिस्तान की सेना को खदेड़ा था। आज उनको दिल्ली पुलिस ने खदेड़ दिया। जिन लोगों को देश के पहरेदार माना जाता है और जिनके भरोसे देश की सीमाएं हैं वो अचानक सुरक्षा को खतरा हो गए। जिन लोगों ने सीमा पर खरोंच नही आने दी वो फ़टे कपड़ों और टपकते खून के साथ खदेड़ दिए गए। जिस भारत माता की तस्वीर को बीजेपी अपने राष्ट्रवाद को साबित करने के लिए बगल में लिए घूमती है अगर एक बार उसकी तरफ देख लेती तो शायद उसके आँसू दिखाई दे जाते।
                  मुझे अच्छी तरह याद है बीजेपी के चुनाव प्रचार को शुरू करने वाली पहली रैली जो रेवाड़ी में हुई थी और जिसे अब के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सम्बोधित किया था। उस रैली को पूर्व सैनिकों का सम्मेलन कहा गया था और जनरल वी के सिंह इसी रैली में भाजपा में शामिल हुए थे। उस समय स्टेज पर देश भक्ति के गीत गाने वाला एक गवैया जोश में दुहरा हुआ जा रहा था। पूरा माहौल देशभक्ति से सराबोर था। उसमे मोदी जी ने अपने सारे वायदे जो बीजेपी पूर्व सैनिकों के लिए करती रही है, एक बार फिर दुहराये थे। मुझे नही पता की वो रैली मोदीजी को याद है या नही। मुझे नही पता की वो रैली जनरल वी के सिंह को भी याद है की नही, लेकिन मुझे एक बात की उम्मीद थी की पूर्व सैनिकों के साथ जंतर मंतर की घटना के बाद शायद जनरल वी के सिंह या सेना से आये हुए राज्य वर्धन सिंह राठौर जैसे दूसरे कुछ लोग इस्तीफा दे दें। लेकिन गलत उम्मीद और गलत लोगों से की गयी उम्मीद का जो हांल होना चाहिए वो इस उम्मीद का भी हो गया।
                   मुझे ये तो नही मालूम की वन रैंक वन पैन्शन के वायदे की हाल में क्या पोज़िशन है और उससे कितना लाभ हानि होगी लेकिन जो व्यवहार पूर्व सैनिकों के साथ हुआ उसे ना तो भुलाया जा सकता है और ना ही बर्दास्त किया जा सकता है। जो भाजपा राष्ट्रवादी साबित होने की कोशिश में हमेशा सेना के प्रतीकों का इस्तेमाल करती रही है उससे हमेशा ये सवाल पूछा जाता रहेगा। ये सवाल वन रैंक वन पैन्शन के लागु होने से खत्म नही हो जायेगा।

Saturday, August 15, 2015

Vyang -- लोकतन्त्र बचाने के लिए " शट अप इंडिया " कार्यक्रम

गप्पी -- शोर मच रहा है की भारत का लोकतन्त्र खतरे में है। पहले भी एक बार ये शोर मचा था 1975 में। उसके बाद रह रह कर आवाजें आती रहती हैं की लोकतंत्र खतरे में है। लेकिन इस बार सचमुच खतरे में है। कारण ये है की जब सत्ता पक्ष चिल्लाना शुरू कर दे की लोकतंत्र खतरे में है तो लोगों को समझ जाना चाहिए  लोकतंत्र सचमुच खतरे में है।
               मेरे पड़ौसी कह रहे थे की भाई पुरानी कहावत है की जब चोर का पीछा करती हुई भीड़ चोर-चोर चिल्लाती हुई भाग रही हो तो चालक चोर खुद भी चिल्लाना शुरू कर देता है चोर-चोर। इससे क्या होता है की रस्ते में मिलने वाले लोग उसे भी पकड़ने वालों में मान लेते हैं। और सरकार वही कर रही है। सरकार के कामों पर जब देश ये चिल्लाना शुरू करता है की लोकतंत्र खतरे में है तो चालक सरकार भी चिल्लाना शुरू कर देती है की लोकतंत्र खतरे में है। इससे लोगों को ये अंदेशा तो होता है की लोकतंत्र को खतरा है पर वो ये नही समझ पाते की खतरा किससे है।
                 लोकतंत्र में दो पक्ष होते हैं , एक सत्ता पक्ष और दूसरा विपक्ष। जहां लोकतंत्र नही होता वहां भी दो पक्ष होते हैं एक राज करने वाला और दूसरा आम जनता। जो सत्ता पक्ष होता है जाहिर है की सारे अधिकार और काम करने की जिम्मेदारी उसी की होती है। जो विपक्ष होता है उसका काम सरकार के कामों पर निगाह रखना और अगर कोई काम सही नही लगे तो उसका विरोध करना होता है। जब सरकार विपक्ष के विरोध को नजरअंदाज करके काम करना शुरू करती है और बातचीत की प्रकिर्या को एकतरफा बना देती है तो विपक्ष चिल्लाता है की लोकतंत्र खतरे में है।
                    लेकिन ज्यादा गंभीर मामला तब होता है जब सरकार खुद ये चिल्लाना शुरू कर देती है की लोकतंत्र खतरे में है। इसका मतलब होता है शट -अप। सरकार विपक्ष को और विरोध करने वाले लोगों को कहती है शट-अप। यानि अगर तुम्हे बोलना है तो केवल समर्थन में बोलो वरना चुप रहो। जब सरकार विपक्ष के खिलाफ प्रदर्शन करती है तो उसका मतलब भी शट-अप होता है। जब सरकार विपक्ष को और विरोध करने वाले लोगों को शट-अप कहना शुरू कर दे तब मान लेना चाहिए की लोकतंत्र सचमुच खतरे में है। जब सरकार विपक्ष पर राज्य सभा में बहुमत के प्रयोग को दुरूपयोग का आरोप लगाती है और धमकी देती है की वो सयुंक्त सत्र बुला कर बिल पास करवा लेगी तो ये तो निश्चित रूप से बहुमत का दुरूपयोग है।
                   हमारे प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त के भाषण में देश के लिए दो प्रोग्रामो की घोषणा की, एक  "स्टार्ट-अप इंडिया " और एक "स्टैंड-अप इंडिया " . उससे पहले दिन उन्होंने NDA की मीटिंग में एक और प्रोग्राम की घोषणा की "शट-अप इंडिया " . जब प्रधानमंत्री विपक्ष के साथ मीटिंग करके मामलों का हल निकालने की बजाय, विपक्ष के सवालों का उत्तर दिए बिना, संसद में ना आकर सरकारी पक्ष को ये आदेश देते हैं की पुरे देश में जाकर लोगों से कहो की वो विपक्ष को चुप रहने के लिए कहे वरना देश के  "उद्योगपतियों " का विकास नही होगा तो हमे सचमुच मान लेना चाहिए की लोकतंत्र खतरे में है।
                   अब NDA और बीजेपी के सारे लोग विपक्ष के लोगों के संसदीय क्षेत्र में जाकर लोगों से कहेंगे, बेवकूफो, तुमने ये संसद में किसको भेज दिया। जिसको ये भी मालूम नही की विपक्ष का काम सरकार का समर्थन करना होता है। तुम लोगों में इतनी भी अक्ल नही है। चलो, अब अपने सांसद को बोलो की वो जुबान बंद रखे वरना लोकतंत्र खतरे में पड़ जायेगा। उसके बाद लोग उस सांसद से जाकर कहेंगे की भैया काहे ऐसा कर रहे हो ? लोकतंत्र को खतरे में काहे डाल रहे हो। ऐसा करो की या तो संसद में ही मत जाओ या मुंह पर पट्टी बांध कर जाओ। लोकतंत्र की रक्षा के लिए ये जरूरी है की विपक्ष संसद में मुंह पर पट्टी बांध कर बैठे।

Friday, August 14, 2015

Vyang -- संसद की कार्यवाही कैसी होनी चाहिए ?

गप्पी -- हमारे देश में इस समय एक बड़ी बहस चल रही है। ये बहस है संसद की कार्यवाही को लेकर। इस बहस में पूरा देश शामिल है। जिस आदमी को ये नही मालूम की सोसायटी में रस्ते पर कूड़ा नही डालना चाहिए वो भी इस पर सुझाव दे रहा है की संसद की कार्यवाही कैसी होनी चाहिए। वो लोग जिन्हे ये नही समझ में आता की बाइक पर हेलमेट लगाना क्यों जरूरी है बता रहे हैं की देश की बहुत बदनामी हो गयी। हालत हास्यास्पद हो गयी है। मैं एक ट्रैन में जा रहा था जिसमे पंद्रह-बीस नौजवान भी यात्रा कर रहे थे। सबके सब पीछे कमर पर बैग लटकाये हुए थे और मोबाईल पर गेम खेल रहे थे। लेकिन सबके सब संसद की कार्यवाही ना चलने पर दुखी भी थे और गुस्से में भी थे। वो पुरे विपक्ष को कोस रहे थे। कार्पोरेट मीडिया का तिलस्मी प्रभाव पूरे जोर पर था। बहस बहुत देर चलती रही। अचानक एक जवान ने कहा " यार ये जो राज्य सभा है ये कौनसे राज्य की है। सारी  प्रॉब्लम तो इसी में है। "
         " पता नही यार। रोज तो एक राज्य बनता है। परन्तु मेरे ख्याल से तेलंगाना की होगी, वो ही बना है लास्ट में। " दूसरे ने कहा
        " लेकिन कुछ भी हो, मैं तो कहता हूँ की ये होनी ही नही चाहिए। " दूसरे ने कहा।
        " मैं तो कहता हूँ की ऐसा कानून बना देना चाहिए की कम से कम बीस बिल तो पास करना जरूरी होगा। वरना किसी भी सांसद को कोई वेतन नही मिलेगा। " दूसरे ने जोर देकर कहा।
         " बिलकुल सही बात है। काम नही तो वेतन नही। " लगभग सभी सहमत थे।
         " मैं बताता हूँ इसका परमानेंट इलाज। संसद में ठेका सिस्टम लागु कर देना चाहिए। एक बिल पास करने का दस हजार। वरना कोई पैसा नही। फिर देखो कैसे पास नही होते बिल। " एक नौजवान ने अतिरिक्त उत्साह से कहा। बाकि सबने इस पर तालियाँ बजाई।
           हमारे देश का भविष्य लोकतंत्र को ठेके पर देने पर विचार कर रहा था।
          मैं ट्रेन से उतर कर आगे गया तो रस्ते में एक मिल के खण्डहर आते हैं। ये मिल सालों पहले बंद हो चुकी है यहां शहर के कुछ आवारा लड़के जुआ इत्यादि खेलते हैं। आज वो सब बैठे हुए थे। खेल नही रहे थे। मैं वहां से गुजरा तो उनमे से एक ने मुझे आवाज दी। मैं रुका।
          " अंकल ये संसद क्यों नही चल रही ? इस तरह तो देश का सत्यानाश हो जायेगा। " एक लड़के ने कहा।
          मैं आश्वस्त हो गया भारतीय लोकतंत्र के भविष्य के प्रति। अब कोई खतरा नही है। पहले हम इस लोकतंत्र की रक्षा की उम्मीद छात्रों, बुद्धिजीवियों, मजदूरों , किसानो और जनसंगठनों से करते थे। अब इसकी जिम्मेदारी जुआरियों ने उठा ली है।
             घर आया तो टीवी पर खबर चल रही थी की देश के उद्योगपतियों ने हस्ताक्षर अभियान चलाकर सांसदों से संसद की कार्यवाही चलने देने की मांग की है। मैं पुछना चाहता था की क्या इनमे वो उद्योगपति भी शामिल हैं जो बैंको का चार लाख करोड़ रुपया खा कर बैठे हैं। या वो उद्योगपति जो उन पर बकाया लाखों करोड़ रुपया टैक्स बाप का माल समझ कर हड़प कर गए।  वो भी शामिल हैं क्या, जो लोग देश के बैंको को फेल होने के कगार पर पहुंचाने के लिए जिम्मेदार हैं। उनको  देशभक्ति का दौरा पड़ा है।
            आगे खबर आई की मशहूर रेल इंजीनियर श्रीधरन ने उच्चतम न्यायालय में याचिका देर करके मांग की है की उच्चतम न्यायालय संसद की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने के लिए हस्तक्षेप करे। मुझे लगा की श्रीधरन संसद और मेट्रो रेल में फर्क नही कर पा रहे हैं। उन्हें पहले भरतीय रेल को सुचारू रूप से चलाने पर ध्यान देना चाहिए और संसद को सांसदों के भरोसे छोड़ देना चाहिए।
              मुझे लगा की देश का कॉर्पोरेट मीडिया और उसके विशेषज्ञ जैसी कार्यवाही चाहते हैं वो इस तरह की होगी।
                सदन के अध्यक्ष सदन में प्रवेश करते हैं। सभी सांसद खड़े हो जाते हैं। अध्यक्ष बैठ जाते हैं तो सभी बैठ जाते हैं। अध्यक्ष पिछले दिन हुई दुर्घटना के मृतकों को श्रद्धांजलि का प्रस्ताव पढ़ते हैं फिर पूरा सदन खड़े होकर मौन धारण करता है। उसके बाद विपक्ष के चार पांच सदस्य खड़े होकर कहते हैं की उन्होंने कार्यस्थगन प्रस्ताव का नोटिस दिया है। अध्यक्ष कहते हैं की उन्हें नोटिस मिले हैं लेकिन वो उनको ख़ारिज करते हैं। विपक्ष के सदस्य अध्यक्ष का धन्यवाद करके वापिस बैठ जाते हैं। फिर संसदीय कार्य मंत्री खड़े होकर कहते हैं की सरकार का विचार है की कई दिन से विपक्ष के सदस्यों को बोलने का मौका नही दिया गया इसलिए आज का प्रस्ताव मान लिया जाये।
               अध्यक्ष प्रस्ताव स्वीकार कर लेते हैं।
                विपक्ष के नेता कहते हैं की अख़बारों में खबर छपी है की सरकार द्वारा विदेशी कम्पनी को दिए गए ठेके में भृष्टाचार हुआ है। और उसमे सत्ताधारी पार्टी के एक राज्य के मुख्यमंत्री का बेटा और वित्तमंत्री की बेटी दोनों शामिल हैं।
                  अध्यक्ष कहते हैं की अख़बार में छपी खबर के हिसाब से आरोप नही लगाये जा सकते।
                  विपक्ष के नेता माफ़ी मांगते हैं और कहते हैं की अगर जाँच हो जाये तो क्या हर्ज है ?
                  अध्यक्ष कहते हैं की सदन में किसी मुख्यमंत्री का नाम नही लिया जा सकता।
                  विपक्ष के नेता फिर माफ़ी मांगते हैं और कहते हैं की वित्तमंत्री की बेटी उसी कम्पनी में काम करती है जिस कम्पनी को ठेका दिया गया है।
                  वित्त मंत्री खड़े होकर कहते हैं की जिन लोगों ने ठेके के कागज पर दस्तखत किये हैं उनमे उनकी बेटी शामिल नही है इसलिए सरकार सारे आरोपों को ख़ारिज करती है। सत्तापक्ष के लोग जोर जोर से मेज थपथपाते हैं। सरकार जाँच करवाने के लिए भी तैयार है लेकिन विपक्ष उसके लिए वो सारे सबूत लेकर आये। अगर विपक्ष सबूत लेकर आता है तो सरकार उन सबूतों की जाँच करवाने के लिए तैयार है। चर्चा समाप्त हो जाती है।
                    उसके बाद सरकार ताजमहल को बेचने का बिल पेश करती है
                    विपक्ष के लोग कहते हैं की ताजमहल नही बेचा जा सकता।
                    मंत्री कहते हैं की सरकार कुछ भी कर सकती है। और कि तुम चुनाव हार गए हो इसलिए तुम्हे बोलने का कोई अधिकार नही है।
                      बिल पास हो जाता है।
 कॉर्पोरेट मीडिया खबर देता है की आज सदन में 105 % काम हुआ। और जो खर्च संसद पर हुआ उसका पूरा उपयोग हुआ।
                           पूरा देश इस पर संतोष व्यक्त करता है।

Wednesday, August 12, 2015

Vyang -- अल्बर्ट पिन्टो को रोना क्यों आता है ?

गप्पी -- अब अल्बर्ट पिन्टो को गुस्सा नही आता , रोना आता है। बेचारगी में किसी को गुस्सा नही आता रोना ही आता है। अल्बर्ट पिन्टो 30 साल का नौजवान है। उसने बी-टेक किया है कम्प्यूटर साइंस में। कभी उसे इस बात का गर्व होता था अब मलाल होता है। आदमी को जिंदगी में बहुत सी चीजों पर मलाल होता है। परन्तु दिक्क्त ये है की जब तक उसे पता चलता है की अमुक चीज पर उसे मलाल होने वाला है और कुछ होने का समय ही नही होता। जब उसे बी-टेक पर मलाल होने का पता लगा, वो बी-टेक कर चूका था। और बी-टेक करने के जुर्माने के रूप में एक लाख का कर्जा भी हो चुका था। उसने बहुत दिन इंतजार किया की ये मलाल मिट जाये, यानि उसे कोई नौकरी मिल जाये परन्तु इस देश के बहुमत के नौजवानो की तरह उसका मलाल मिट नही पाया। दो तीन साल गुजर जाने के बाद पता चला की अब तो कर्जे का ब्याज चुकाने के लिए भी कुछ नही बचा है तो उसने कॉल सेंटर में नौकरी कर ली। 10000 की फिक्स पगार। कुल मिलाकर 120  लोग। जिंदगी मलाल के साथ साथ आगे बढ़ने लगी।
                         कुछ दिन पहले ही ये खबर आई की सरकार श्रम कानूनो में सुधार कर रही है। उसे आशा बंधी, अब कुछ होगा। ये सरकार और प्रधानमंत्री उसके और उस जैसे नौजवानो के लिए कुछ जरूर करेंगे। उन्होंने वादा किया था। और चाहे कुछ भी हो ये "आदमी" अपने वादे का पक्का है। उसने भी चुनाव के दौरान रैलियों में उसके लिए नारे लगाये थे। सोशल मीडिया पर विपक्षियों को गलियां दी थी। अब जाकर उसका दिन आया है। अब सरकार श्रम कानूनो में सुधार करने जा रही है। सरकार का कहना है की इससे रोजगार बढ़ेगा। मजदूरों की कमाई बढ़ेगी। उसे उम्मीद है।
                        लेकिन ये क्या हो रहा है। उसके कॉल सेंटर के मालिक भी खुश हैं और इसका समर्थन कर रहे हैं। उनको तो घबराना चाहिए। लेकिन वो तो मांग कर रहे हैं की इसे जल्दी लागु किया जाये। विपक्ष की पार्टियां और मजदूरों के संगठन इसका विरोध कर रहे हैं। उसे कुछ समझ में नही आ रहा है। सब कुछ उलझा उलझा लग रहा है।
                        आज प्रधानमंत्री इस मुद्दे पर टीवी में कुछ कहने वाले हैं। बिलकुल "मन की बात" की तरह। टीवी पर आने वाले कार्यक्रम से आधा घंटा पहले ही वह सोफे पर बैठ गया है। घर वाले सीरियल देखना चाहते हैं लेकिन वो सबको डांट देता है। सही समय पर प्रधानमंत्री टीवी पर रूबरू होते हैं। मित्रो, हम इस देश में अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे कुछ श्रम कानूनो में बदलाव करना चाहते हैं। हम चाहते हैं की इस देश में श्रम के बाजार में बढ़ौतरी हो। सब नौजवानो को काम मिले जिससे वो अपने और अपने माँ-बाप के सपनो को पूरा कर सकें। हम ओवर टाइम के कानूनो में बदलाव करना चाहते हैं। दुगना ओवर-टाइम की शर्त गलत शर्त है। क्या किसी मजदूर को इसका हक नही है की वो अपने मालिक के सामने खड़ा होकर अपनी मजदूरी तय कर सके। मैं कहता हूँ की उसको इसका पूरा हक है। क्या उसे हक नही है की वो ये कह सके की वो कितनी देर तक ओवर-टाइम करना चाहता है। मैं कहता हूँ की पूरा हक है। हर मजदूर, हर नौजवान को इस बात का हक है की नही की वो मालिक की आँखों में आँखे डालकर कह सके की वो इतनी देर ओवर-टाइम करेगा और उसके लिए इतनी मजदूरी लेगा। अगर वो नौकरी छोड़ना चाहता है तो उसे इसका पूरा हक है। वो किसी का बंधुआ मजदूर नही है। फिर उस पर एक महीने के नोटिस का प्रतिबंध क्यों है। हम इस प्रतिबंध को समाप्त कर रहे हैं। ये कानून पास होने के बाद हर नौजवान गर्व से अपने नौकरी दाताओं को कह सकेगा की उसे क्या चाहिए।
            उसे शरीर में झुरझुरी महसूस हुई। उसे एक नए माहौल का अहसास हुआ। आत्म सम्मान के अतिरेक में उसे रात को देर से नींद आई।
             टीवी पर संसद का सीधा प्रसारण हो रहा था। सरकार बिल पेश करने की कोशिश कर रही थी। परन्तु विपक्ष उसे हंगामा करके रोक रहा था। उसके मन में जितनी गलियां याद थी वो सारी की सारी विपक्ष को दे चूका था। आखिर सरकार बिल को पेश करने और बिना बहस के पास कराने में कामयाब हो गयी। उसने चैन की साँस ली। एक अजीब सा संतोष उसके चेहरे पर झलक रहा था।
             अगले दिन ड्यूटी के दौरान उसका आत्म विश्वास बढ़ा हुआ था। शाम को ड्यूटी खत्म होने के समय उसे मैनेजर के कार्यालय में बुलाया गया। वहां बाकि के 25-30 लोग भी मौजूद थे। मैनेजर ने कहा की कल से ड्यूटी 12 घंटे की होगी। और ओवर-टाइम भी सिंगल रेट से दिया जायेगा।
                  उसने आगे बढ़कर कहा की पहले दुगना ओवर-टाइम मिलता था। हम तो अब उस पर भी काम करने को तैयार नही हैं। आपको हमारे साथ बात करके रेट तय करना होगा। मैनेजर और उसके साथ बैठे दो-तीन लोग जोर से हँसे। " लगता है भाषण सुन कर आया है समझ कर नही। "
                     " ठीक है, अब दुगने ओवर-टाइम का कानून तो है नही। अब हम सिंगल से ज्यादा नही देंगे। जिसको मंजूर नही हो वो कैश काउन्टर पर जाकर अपना हिसाब ले ले। "
                       आप इस तरह बिना नोटिस दिए अचानक कैसे नौकरी से निकाल सकते हो। उसने अधिकार से कहा।
                        " तुम्हे मालूम नही की एक महीने का नोटिस पीरियड खत्म कर दिया गया है। " मैनेजर ने मुस्कुराते हुए कहा।
                       वह बाहर निकल आया। उसे प्रधानमंत्री का भाषण याद आ रहा था, " क्या किसी नौजवान को हक नही की -----------" और उसे रोना आ गया।

GST बिल घोर जनविरोधी, भयंकर महंगाई बढ़ाने वाला और लघु उद्योगों की मौत का फरमान है।

गप्पी  -- सरकार ने कल राज्य सभा में GST बिल पेश कर दिया। लोकसभा इसे पहले ही पास कर चुकी है। राज्य सभा में इसे पेश करते वक्त कांग्रेस ने भारी हंगामा किया। परन्तु ये हंगामा इस बिल पर किसी सैद्धान्तिक विरोध के कारण नही था बल्कि सरकार और विपक्ष के बीच कुछ मंत्रियों के इस्तीफे को लेकर चल रही खींचतान के कारण था। मुझे इस बात पर आश्चर्य है की इतने जनविरोधी बिल का उस तरह विरोध क्यों नही हो रहा जिस तरह भूमि बिल का हुआ। क्या राजनैतिक पार्टियां इस बिल के जनविरोधी चरित्र  समझने में नाकाम रही या फिर सभी पार्टियां इसकी सहयोगी हैं। हमारा पूरा कॉर्पोरेट क्षेत्र और सभी बड़ी कंपनियां क्यों इसको लागु करने के लिए इतना जोर डाल रही हैं। 

     GST बिल क्या है --

                                   बहुत पहले सरकार ने वैट लागु किया था। तब सरकार ने दावा किया था की वैट के लागु होने के बाद वस्तुओं की कीमतें घटेंगी। और बाकि सारे टैक्स जिसमे CST भी शामिल था, खत्म हो जायेंगे। लेकिन आज क्या स्थिति है। CST जारी है और वैट के बाद कीमतें बढ़ी हैं। ठीक वही तर्क सरकार इस बार भी दे रही है। ये आश्वासन देने वाला वही है जिसने अपने पहले दिए गए आश्वासनों को पूरा नही किया। लेकिन सवाल ये है की इस GST बिल से क्या बदल जाने वाला है। इसमें कौन कौन से प्रावधान हैं जो कीमतों और उत्पादन करने वालों की स्थिति को प्रभावित करेंगे।
१. GST की दर लगभग 20 से 26 % के बीच रहेगी। इसमें एक्साइज ड्यूटी और वैट समेत सभी कर शामिल होंगे। अभी सर्विस टैक्स की दर 14 % है  जो इसके लागु होने के बाद बढ़ जाएगी। जिन वस्तुओं पर अभी 10 % एक्साइज ड्यूटी लगती है और उसके बाद वैट लगता है वो सब इसमें शामिल हो जायेगा।
२. अभी देश में बहुत सी ऐसी चीजें हैं जिन पर एक्साइज ड्यूटी नही लगती है। परन्तु इस बिल के बाद चूँकि एक्साइज ड्यूटी GST में पहले ही शामिल है सो सभी चीजों पर लगेगी। ये एक्साइज ड्यूटी का सर्वीकरण होगा।
३. जिन चीजों पर अभी एक्साइज ड्यूटी लगती है वो उत्पादक पर लगती है। उसके बाद उस पर कोई गणना नही होती है। परन्तु GST लागु होने बाद इसकी गणना हर स्तर पर होगी जैसे अभी वैट की होती है। इसलिए उसका क्षेत्र और रकम बढ़ जाएगी।
४. सरकार एक मजाक कर रही है और कह रही है की इसमें सारे टैक्स जिसमे एक्साइज ड्यूटी, वैट , लक्जरी टैक्स, मनोरंजन कर और सर्विस टैक्स शामिल होंगे इसलिए कीमतें घटेंगी। परन्तु असलियत ये है की जिस पर सर्विस टैक्स लागु है उस पर वैट लागु नही है, जिस पर मनोरंजन कर लागु है उस पर दूसरे टैक्स पहले ही लागु नही हैं।
 GST का महंगाई पर असर ------ ऊपर के हिसाब से ये बात तो भूल ही जानी चाहिए की इससे कीमतें कम हो जाएँगी। इससे भयंकर रूप से महंगाई बढ़ेगी और लोगों की कमर टूट जाएगी। आप एक ऐसी व्यवस्था में प्रवेश करने जा रहे हैं जिसमे अगर आप घर चलाने में 20000 रूपये खर्च कर रहे हैं तो उसमे से 5000 रूपये तो केवल टैक्स होगा। जो हालत अभी पट्रोल और डीजल की है व्ही हालत बाकि चीजों की हो जाएगी। 
लघु उद्योग मर जायेगा --- यही है वो असली मकसद जो इसको लाने के लिए जवाबदार है। अभी हमारे कुल ओद्योगिक उत्पादन में लघु और घरेलू उद्योग का हिस्सा 35 % है। अपनी सारी कोशिशों के बावजूद बड़ी कंपनियां इसको छीनने में असफल हो चुकी हैं। इस हिस्से पर उनकी नजर पहले से है। सरकार इस पर बहुत से तर्क दे कर ये साबित करना चाहती है की GST बिल में लघु उद्योग के लिए सारे प्रावधान रखे गए हैं। हमे एकबार उन प्रावधानों की असलियत जानने की जरूरत है।
१. सरकार का कहना है की घरेलू और लघु उद्योगों के लिए इसमें डेढ़ करोड़ तक के व्यापार की छूट दी गई  है। और ये काफी है। परन्तु ये छूट केवल छलावा है। और इस छूट का कोई भी लाभ लघु और घरेलू उद्योगों को नही होगा। क्योंकि लघु उद्योग जिन दुकानदारों  व्यापारियों के द्वारा अपना मॉल बाजार में बेचता है उनकी छूट की सीमा केवल दस लाख ही है। इसलिए उस पर टैक्स तो लगेगा ही। अगर दुकानदार किसी भी लघु उद्योग से मॉल खरीदता है और वो उद्योग टैक्स छूट की सीमा में आता है तो दुकानदार को मॉल बेचते वक्त वो सारा टैक्स खुद जमा करवाना पड़ेगा। इसलिए इस छूट का कोई मतलब नही रह जाता है।
२. जो लघु उद्योग अपना मॉल सीधे उन उद्योगों को बेचते हैं जो इस सीमा से बाहर हैं तो उन्हें GST जमा करवाना ही पड़ेगा। क्योंकि दुकानदारों की तरह ही उस मॉल की छूट का लाभ बड़े उद्योगों को नही मिलेगा।
३. लघु उद्योग जो कच्चा मॉल बाजार से खरीदेंगे, उस पर GST लग कर ही आएगा और उन्हें वो ऊँचे भाव पर तो मिलेगा ही, दूसरे GST की रजिस्ट्रेशन के बिना उस टैक्स का उन्हें मॉल बेचते वक्त कोई फायदा नही होगा।
४. अभी तक जो लघु उद्योग एक्साइज ड्यूटी से बाहर थे वो सब पिछले दरवाजे से उसमे शामिल कर दिए गए हैं। इसलिए अब छोटे और बड़े उद्योग की लागत बराबर हो जाएगी और लघु उद्योग को जो इस रूप में सरंक्षण प्राप्त था जो खत्म हो जायेगा। यही वो मुख्य कारण है जिसके लिए बड़ी कंपनियां और कार्पोरेट क्षेत्र इसके लिए जान देने को उतारू है। अब तक बड़े और छोटे उद्योगों की मॉल की कीमत में जो फर्क था वो समाप्त हो जायेगा और उसके साथ ही वो उद्योग प्रतियोगिता नही कर पाने के कारण समाप्त हो जायेंगे। आज ओद्योगिक उत्पादन में लघु उद्योगों का जो हिस्सा है वो बड़ी कम्पनियों को मिल जायेगा। सरकार के केवल एक कदम से वो काम सम्भव हो जायेगा जो बड़ी कम्पनियां अपनी सारी कोशिशों के बाद भी नही कर पाई।
                ये GST बिल लघु उद्योगों के लिए मौत की घंटी है।और लघु और घरेलू उद्योग ही वह क्षेत्र है जो देश को खेती के बाद सबसे ज्यादा रोजगार मुहैया करवाता है। जिसको इस बात में अब भी शक है वो GST लागु होने के दो साल के बाद आंकड़े देख ले।
          जीडीपी में बढ़ौतरी का तर्क -------- सरकार तर्क दे रही है की GST लागु होने के बाद हमारी जीडीपी में 2% तक की बढ़ौतरी हो सकती है। कैसे ? कोई टैक्स प्रणाली बदलने से जीडीपी कैसे बढ़ जाएगी। सरकार परोक्ष रूप से मेरी बात को स्वीकार कर रही है। अब तक जो उत्पादन लघु और छोटे उद्योग करते थे उनमे से बहुत सा उत्पादन जीडीपी की गणना में नही आता था। जब ये हिस्सा बड़े उद्योगों को ट्रांसफर हो जायेगा तो इसकी गणना होने लगेगी। इससे उत्पादन समान रहने पर भी जीडीपी के आंकड़े बढ़े हुए दिखाई देंगे। ये एक तरह का सरकार का कबूलनामा है।
   कांग्रेस का विरोध ----- कांग्रेस ने ही सबसे पहले इस बिल को पेश किया था। उसका इस बिल पर कोई सैद्धान्तिक विरोध नही है। उसका विरोध वैसा ही है जैसा उस समय बीजेपी का था। कांग्रेस ने पूरा देश कॉर्पोरेट के लिए लुटा दिया। अब बीजेपी केवल इस लूट को और तेज करना चाहती है।
    वामपन्थी पार्टियां और GST बिल ----- इस तरह के जनविरोधी कदमों का विरोध करने का काम उसके बाद वामपंथियों के हिस्से में आता है। परन्तु दुर्भाग्य की बात है की वामपंथी भी इस बिल का विरोध उस तरह नही कर रहे हैं जिस तरह करना चाहिए। जिस तरह भूमि बिल का विरोध किया और सरकार को अपने कदम वापिस खेंचने पर मजबूर किया।

Tuesday, August 11, 2015

Vyang -- इस बार अर्थशास्त्र का नोबल पुरुस्कार हमारी सरकार को मिलना चाहिए।

गप्पी -- मैं ये बात पूरी जिम्मेदारी और होशोहवास में कह रहा हूँ। पूरी दुनिया में अब तक अथशास्त्र के क्षेत्र में जितनी खोजें हुई हैं ये अकेली खोज उन सब पर भारी है। इस खोज से पूरी दुनिया की गरीबी मिटाई जा सकती है। पूरी दुनिया में पूंजी की जो कमी है वो दूर की जा सकती है। बताओ आपने कभी इससे ज्यादा क्रन्तिकारी खोज के बारे में सुना है। और सबसे बड़ी बात ये है की कई विपक्षी दल भी इस खोज से सहमत हैं। कृपया धर्य रखिये, मैं इस खोज के बारे में बताने ही जा रहा हूँ। अगर इस पर मैं पहले कही गयी बातें नही कहता तो इसकी महान स्थिति को समझने में अापसे गलती हो सकती थी। या फिर आप इसे यों ही ध्यान से निकाल सकते थे। इसलिए पहले मैंने इसके महत्त्व को रखांकित किया और बाद में इसकी तफ्सील बता रहा हूँ। परन्तु मेरी पाठकों से विनती है की वो इसको जरा ध्यान पूर्वक पढ़ें।
                 हमारी सरकार ने संसद में एक बिल पेश किया है जिसे GST बिल कहते हैं। वैसे तो ये बिल टैक्स लगाने और इकट्ठा करने से संबंधित है। और इसको टैक्स क्षेत्र में किये जाने वाला अब तक का सबसे बड़ा सुधार कहा गया है। परन्तु इस बिल के बारे में जो कुछ सरकार की तरफ से और मीडिया में कहा गया है और जो जानकारी दी गयी है उसमे इसकी महानता छिपी हुई है। जैसे,--
    १. इस बिल से ग्राहकों को सस्ता सामान मिलेगा।
    २. इस बिल से उद्योगों को फायदा होगा और उनकी लागत घटेगी।
    ३. इस बिल से सरकार की आमदनी बढ़ेगी।
    ४. इस बिल से राज्य सरकारों की टैक्स की उगाही बढ़ेगी।
                                आया कुछ समझ में ?
              अगर किसी चीज से सरकार की टैक्स उगाही बढ़ती है तो जाहिर है की ये पैसा सामान खरीदने वाले की जेब से जाता है। लेकिन सरकार कह रही है की खरीददार को सामान सस्ता मिलेगा। अगर ग्राहक को सामान सस्ता मिलता है और सरकार को टैक्स ज्यादा मिलता है तो बीच का पैसा कहां से आएगा। जाहिर है की हवा से पैदा होगा। और अगर कोई सरकार हवा से पैसा पैदा कर दे तो उसे नोबल पुरुस्कार मिलना चाहिए की नही। अब तक दुनिया में ऐसे हवा से पैसा पैदा करने की कोई खोज नही हुई है। इसलिए इस क्रन्तिकारी खोज को पूरी दुनिया में लागु करके गरीबी मिटाई जा सकती है। पूंजी की कमी को दूर किया जा सकता है।
                 मीडिया में बैठे हुए एक्सपर्ट इस पर घंटों बहस करते हैं और सिद्ध करते हैं की हाँ, ऐसा ही होने वाला है। इससे देश की जीडीपी में दो प्रतिशत तक बढ़ौतरी हो सकती है। मुझे अब तक ये समझ में नही आया की टैक्स उगाही का सिस्टम बदल देने से पुरे देश की जीडीपी कैसे बढ़ जाएगी। टैक्स उगाही का जीडीपी से क्या लेना देना है। लोग सामान अपनी हैसियत के मुताबिक खरीदते हैं। उसमे दस प्रतिशत की बजाए बीस प्रतिशत टैक्स लगना शुरू हो जाये तो जीडीपी कैसे बढ़ जाएगी। एक ही चीज है जिससे जीडीपी बढ़ सकती है। वो है उत्पादन करने वाले उद्योगों में बदलाव आना। इस सिस्टम के हिसाब से अपना सामान बनाने और उसे बाजार में बेचने के लिए जितनी तरह की लाइसेंस की श्रृंखला चाहिए वो छोटे उद्योगों के लिए सम्भव नही है। इसलिए उनके उत्पादन का स्थान बड़ी कंपनियां ले लेंगी। छोटे उद्योगों का हमारे ओद्योगिक उत्पादन में जो बड़ा हिस्सा है, बड़ी कम्पनियों की आँखे उस पर लगी हुई हैं। इसलिए उनका इतना दबाव है इसे लागु करने का। बड़े उद्योगों को फायदा करवाने के लिए प्रतिबद्ध सरकार पहले छोटे उद्योगों के मरने का रास्ता साफ करेगी और बाद में उस पर संसद में आंसू बहाएगी किसानो की तरह। जो विपक्षी दल आज इसको समर्थन कर रहे हैं कल वो छोटे उद्योगों की मौत पर दहाड़ें मार मार कर रोयेंगे और सरकार को कोसेंगे।
                    परन्तु अगर ये सब नही होगा और व्ही सब होगा जो सरकार कह रही है तो सरकार निश्चित रूप से नोबल पुरुस्कार की अधिकारी है।

Monday, August 10, 2015

Vyang -- सरकार के सारे अनुमान हमेशा छोटे या बड़े क्यों होते है ?

गप्पी -- आज सुबह देवघर में वैद्यनाथ मंदिर में भगदड़ मच गयी और करीब ग्यारह आदमियों के मरने की खबर आई। बहुत से लोग घायल भी हुए। राज्य सरकार से जब हादसे पर पूछा गया तो उसका जवाब था की अनुमान से ज्यादा भीड़ होने के कारण हादसा हुआ। इससे पहले भी मंदिरों और मेलों में भगदड़ मचने और लोगों के मरने की खबरें आती रही हैं। इन सब में कुछ बातें समान है। एक तो सरकार के बयान, जो हमेशा एक जैसे होते हैं। दूसरे भगदड़ मचने का कारण लगभग हमेशा पुलिस का लाठीचार्ज होता है। हमेशा पुलिस कहती है की वो लाइन लगवा रही थी। तीसरी ये की हमारे देश के लोग अब तक ये भी नही सीख पाये की लाइन कैसे लगाई जाती है। उसके बाद की समान चीजों में शोक प्रकट करना, घायलों को सांत्वना देना और मुआवजे की घोषणा करना इत्यादि है।
                  थोड़ी सी बारिश होती है और पूरा शहर पानी पानी हो जाता है। सारी व्यवस्था फेल हो जाती है। लोग डूब जाते हैं। सरकार से पूछो तो कहेगी की अनुमान से ज्यादा बारिश होने कारण ऐसा हुआ।
                    किसी भी काम पर, दुर्घटना पर सरकार से पूछो तो उसका जवाब हमेशा यही होता है की अनुमान से ज्यादा भीड़ या बारिश होने से ऐसा हो गया। मुझे ये समझ नही आता की ऐसे छोटे अनुमान लगाने को आपको किसने कहा था। क्या संविधान में ऐसा कोई प्रावधान है। फिर एक बार की बात नही है। आपके अनुमान तो साल में पांच बार छोटे पड़ते हैं। तो सरकार ये अनुमान लगाने का काम किसी दूसरे को क्यों नही दे देती। जैसे अमेरिका को, मेरा मतलब है अमेरिका की किसी एजेंसी को। क्योंकि हम अमेरिका के अलावा तो किसी पर भरोसा करते नही हैं। जब जब हम पर मुसीबत आई है हमने हमेशा अमेरिका से गुहार लगाई है भले ही वह मुसीबत अमेरिका की ही पैदा की हुई क्यों ना हो।
                      संसद में वित्त मंत्री बजट पेश करते हैं। वह संसद को बताते हैं की इस साल इतने लाख करोड़ टैक्स की उगाही होने का अनुमान है। विपक्ष कहता है की सरकार का अनुमान गलत है। अर्थव्यवस्था में मंदी  है और सरकार के कदमों से मंदी और बढ़ेगी। इसलिए टैक्स की उगाही के सरकारी अनुमान गलत हैं। सरकार नही मानती। वह अपने दावों पर अडिग है। होना भी चाहिए। हमारे यहां मजबूत सरकार उसी को माना जाता है जो अपने गलत दावों पर अडिग रहे। अगले साल वही वित्त मंत्री दुसरा बजट पेश करते हुए कहता है की दुनिया में मंदी के कारण टैक्स की उगाही कम हुई इसलिए हमें स्कूली बच्चों के दोपहर भोजन में कटौती करनी पड़ी।
                         देश में किसान आत्महत्या करते हैं। सरकार कहती है की हमने किसानो की आत्महत्या रोकने के लिए पूरे इन्तजाम किये हैं। आत्महत्याएं होती रहती हैं। सरकार आंकड़े जारी करके कहती है की इस साल आत्महत्याओं में केवल 15 % की बढ़ौतरी हुई है जबकि पिछले साल 18 % दर से बढ़ौतरी हुई थी। इसलिए सरकार द्वारा उठाये गए कदमों का असर नजर आ रहा है। अगले साल बढ़ौतरी का आंकड़ा बढ़ कर 20 % हो जाता है। सरकार कहती है इतने भयानक सूखे का अनुमान नही था।
                       पुलिस या सेना के लिए भर्ती हो रही है। नौजवानो का हजूम उमड़ता है और भगदड़ में कई नौजवान मारे जाते हैं। बाकि नौजवान शहर को लूटने निकल पड़ते हैं। सरकार कहती है की इतनी भीड़ का अनुमान नही था। कोई पूछे की भई क्यों नही था। जब देश में चपरासी की 100 पदों की भर्ती की परीक्षा होती है तो तीन लाख नौजवान अप्लाई करते हैं। जिनमे इंजीनियर से लेकर MBA तक होते हैं। तो आपको सेना की भर्ती में भीड़ का अनुमान क्यों नही था ? लेकिन सरकार इसका जवाब नही देती। सरकार जवाब देने के लिए नही होती, गलत अनुमान लगाने के लिए होती है।
                      कभी कभी लोग ज्यादा शोर मचाते हैं तो जाँच बिठा दी जाती है। अगर शोर थम जाता है तो उसका जाँच अधिकारी ही नियुक्त नही किया जाता। मान लो कोई जाँच सही तरीके से हो भी गयी तो पता चलता है की सरकार ने जिस अधिकारी को मेले का प्रबंध करने की जिम्मेदारी दी थी वो पिछले दस सालों से भेड़ व ऊन विकास निगम को चला रहा था। सरकार को लगा की मेले में आने वाले लोगों और भेड़ों में कोई ज्यादा फर्क नही होता इसलिए उसको जिम्मेदारी दे दी। लेकिन सरकार का अनुमान गलत हो गया।
                 तो फिर इन दुर्घटनाओं को कैसे रोका जाये। क्योंकि सरकार तो कभी सही अनुमान लगाएगी नही।

खबरी -- मैं तो यही दुआ कर सकता हूँ की सरकार ने लोगों के सब्र का जो अनुमान लगाया है कम से कम वो तो सही हो।