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Wednesday, November 7, 2018

हमारी नई पार्टी का चुनावी घोषणा पत्र

देश के हालात और दुर्दशा से चिंतित होकर हमने एक नई राजनैतिक पार्टी बनाने का निर्णय किया है।  उसके लिए हमने बहुत सोच विचार कर एक घोषणा पत्र तैयार किया है जो आपके सामने प्रस्तुत है। वैसे तो मोदी सरकार ने आखरी छह महीनो में कुछ तेजी दिखाई है और योगी जी ने भी उसमे सहयोग दिया है, लेकिन संत समाज और महा राष्ट्रवादी लोग उससे संतुष्ट नहीं हैं। इसलिए हमने इस काम को जरूरी समझा। हमारे घोषणा पत्र के मुख्य बिंदु निम्न प्रकार से हैं।
१. हमारी पार्टी का नाम " राष्ट्रवादी सनातनवादी पुरातनवादी आर्यवर्तीय पार्टी " होगा।
२. हम हर महीने कम से कम पांच जगहों का नाम बदलेंगे।
३. हम हर प्रदेश में विश्व की सबसे ऊँची प्रतिमा स्थापित करेंगे। इसकी घोषणा प्रदेश अनुसार चुनावों के समय       की जाएगी।
४. बहुमत की आस्था के अनुसार काम को संविधान के दिशा निर्देशक सिद्धांतों में शामिल किया जायेगा।
५. हमने महसूस किया है की पिछले पांच साल में किये गए सभी प्रयासों के बावजूद कुछ संस्थाओं में एकाध           दुष्ट आत्माएँ  अभी भी मौजूद हैं जो समय समय पर सरकार के कामकाज में टांग अड़ाती हैं। इसलिए सभी       ऐसी संस्थाओं जैसे, चुनाव आयोग, रिज़र्व बैंक, मानवाधिकार आयोग, सुचना आयोग इत्यादि का                     संवैधानिक दर्जा समाप्त कर दिया जायेगा।
६. सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति करने वाले कोलेजियम में कोई जज नहीं होगा।
७.  इज आफ डूइंग बिजनेस को बढ़ावा देने के लिए सभी सरकारी स्कूलों और हस्पतालों को बंद कर दिया               जायेगा ताकि नए बिजनेस के अवसर खुल सकें।
८. सरकारी नौकरियों पर पूर्णतया पाबंदी लगाई जाएगी ताकि प्रतिमाओं और धार्मिक आयोजनों के लिए धन        उपलब्ध  हो सके।
९. अगली दिवाली पर अयोध्या में तीन करोड़ दीप जलाए जायेंगे और उसके लिए धन GST पर नया सेस                 लगाकर उगाहा जायेगा।
१०. एक सीमा से ज्यादा पढ़ने लिखने को देशद्रोह घोषित किया जायेगा।
११. भारत रत्न सहित सभी पदम् पुरस्कारों की घोषणा करने वाली समिति में केवल तीन सदस्य होंगे जो संघ,        अखिल भारतीय अखाडा परिषद और गीता प्रेस द्वारा नामित किये जायेंगे।
१२. डार्विन इत्यादि के सिद्धांतों को सेलेबस से हटाया जायेगा।  ये हमारी भावनाओं को आहत करते हैं।
१३. महिलाओं का प्रवेश केवल मंदिरों से ही नहीं, बल्कि संसद और विधानसभाओं में भी प्रतिबंधित किया                 जायेगा।
१४. सभी कृषि विश्वविद्यालयों को गौशालाओं में परिवर्तित किया जायेगा।
१५. सभी सरकारी पदों पर नियुक्तियां वर्ण व्यवस्था के हिसाब से की जाएँगी। 

सभी राष्ट्रवादी नागरिकों से सहयोग की अपील है।


Thursday, November 26, 2015

संविधान दिवस, बाबा साहेब अम्बेडकर और राजनाथ सिंह

आज संसद में बाबा साहेब अम्बेडकर की 125वीं जयंती पर संविधान दिवस मनाये जाने के अवसर पर संसद में इस विषय पर बोलते हुए गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा की भारत में कई बार और बार-बार अपमान सहन करने के बावजूद बाबा साहेब ने कभी देश छोड़ने की बात नही की। राजनाथ सिंह के दिमाग में उस समय भी आमिर खान छाये हुए थे।
            लेकिन राजनाथ सिंह ने  एक बात नही बताई की ब्राह्मण वादी हिंदू धर्म से अपमानित होकर और ये समझ लेने के बाद की हिन्दू धर्म में रहते हुए किसी भी दलित वर्ग के व्यक्ति के लिए बराबरी का सम्मान प्राप्त करना सम्भव नही है। और इसी कारण से बाबा साहेब अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म को त्याग कर बौद्ध धर्म अपना लिया था और समग्र दलित समाज से हिन्दू धर्म का त्याग करने की सलाह दी थी। ये ब्राह्मण वादी हिन्दू धर्म की असहिष्णुता ही थी जिसने बाबा साहेब अम्बेडकर को हिन्दू धर्म छोड़ने के लिए मजबूर किया। ये  वही लोग थे जो बाकि किसी को इस देश का नागरिक मानने को भी तैयार नही थे और आज भी वही लोग हैं जो बाकि किसी को देशभक्त मानना तो दूर, उनको इस देश का नागरिक होने का दर्जा भी देने को तैयार नही हैं।
             जब असहिष्णुता की बात होती है तो सभी असहिष्णु तत्व इस बात को इस तरह प्रचारित करते हैं जैसे ये पुरे देश के और खासकर सभी हिन्दुओं के असहिष्णु होने की बात हो। इस मामले पर पुरस्कार लौटाने वाले ज्यादातर लोग हिन्दू ही हैं। और इस असहनशीलता का शिकार होकर जान खो देने वाले दाभोलकर, कलबुर्गी और गोविन्द पंसारे तीनो हिन्दू ही थे। ये लड़ाई हिन्दू और गैर हिन्दू की नही है और ना ही भारतीय और गैर भारतीय की है। ये लड़ाई समाज को बाँटने वाले और देश को एक धर्म आधारित राज्य में बदल देने की कोशिश करने वालों और उसका विरोध करने वालों के बीच है। लेकिन इसमें दुर्भाग्य की बात ये है की इसमें ऐसे लोग भी जो हमेशा से सहिष्णु रहे हैं और इस तरह के विवाद के खिलाफ हैं वो भी दुष्प्रचार के शिकार हो जाते हैं।

Wednesday, September 30, 2015

राजनीती और धरम के समाचारों पर एक टिप्पणी

खबरी -- केजरीवाल द्वारा बुलाये गए मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश हिस्सा नही लेंगे। 

गप्पी -- लेकिन ये तो कहा ही गया था की सम्मेलन गैर बीजेपी मुख्यमंत्रियों का है।

खबरी -- साध्वी प्राची ने मांग की है की हिन्दुओं के धार्मिक स्थलों में मुस्लिमों के प्रवेश पर पाबंदी लगाई जाये। 

गप्पी -- जबकि जरूरत तो इस बात की है भगवा कपड़ों की आड़ में राजनीती से जुड़े और समाज में नफरत फ़ैलाने वाले लोगों के सभी धरमो के स्थलों में प्रवेश पर पाबंदी लगाई जाये। धार्मिक स्थलों में आदमी आदमी के बीच भेदभाव तो धर्म की असली भावना के ही खिलाफ है। गुरु नानक देव जी ने कहा है,
                 " अव्वल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत दे सब बन्दे। 
                   एक नूर ते सब जग उपजया, कौन भले कौन मन्दे। "

Monday, September 21, 2015

महिलाओं सहित सभी दबे-कुचले लोगों का विरोधी है आरएसएस

हिन्दू धर्म की जिस सनातन परम्परा में आरएसएस विश्वास करता है उसमे सभी के लिए बराबरी का बाकायदा विरोध किया गया है। उसमे कुछ जातिओं को उच्च पायदान पर बिठाया गया है और बाकियों को उनकी सेवा में लगाया गया है। यही हाल महिलाओं का है। महिलाओं को अपनी जातिगत स्थिति का शिकार तो होना ही पड़ता है साथ ही साथ महिला होने का शिकार भी बनना पड़ता है। परन्तु लोकतंत्र और एक आदमी-एक वोट की मजबूरी ने आरएसएस को खुलकर कुछ बातें कहने से रोका हुआ है। फिर भी ये बातें उसके पदाधिकारियों के ब्यानो और आरएसएस के कार्यक्रमों से सामने आ जाती है। मोदी सरकार आने के बाद आरएसएस को लगने लगा है की अब सत्ता पर उसका पक्का कब्जा हो चूका है और वो आने वाले समय में इसे किसी ना किसी बहाने बनाये रख सकती है। इसलिए उसकी ये छिपी हुई इच्छाएं और एजेंडा सामने आने लगा है।
               कुछ दिन पहले खुद मोहन भागवत ने ये बात कहि है की हिन्दू धर्म में महिलाओं की बराबरी की बात नही कहि गयी है, बल्कि एकता की बात कहि गयी है। सभी विचारक पहले ये आरोप लगाते रहे हैं की आरएसएस महिला विरोधी संगठन है। इसके जवाब में आरएसएस हमेशा ये रुख अपनाती रही है की हम तो महिलाओं की पूजा करते हैं। और  में महिलाओं को देवी का स्थान दिया गया है। और वो बराबरी के सवाल पर साफ बच कर निकल जाता है। अब चूँकि उसकी सरकार केंद्र में है और उसी संविधान की शपथ लेकर शासन कर रही है जिसमे महिलाओं को बराबरी का दर्जा हासिल है तो उसे कुछ मामलों पर अपनी स्थिति थोड़ी बहुत साफ करनी पद रही है। संसद में महिला आरक्षण का बिल सालों से लटका हुआ है जिसे बीजेपी किसी भी कीमत पर पास नही करवाना चाहती। क्योंकि पार्टी में इस पर मतभेदों को छोड़ भी दिया जाये तो भी ये आरएसएस के सिद्धांतों के खिलाफ बैठता है। आरएसएस जिस उच्च जाती, और पुरुष प्रधान समाज का हिमायती है उसमे महिलाओं को बराबरी के अधिकार की बात कैसे की जा सकती है। इसलिए मोहन भागवत ने इस मामले पर अपनी स्थिति साफ कर दी है की हिन्दू धर्म न्हिलाओं की बराबरी की बात नही करता। अब हो सकता है उसके बीजेपी के कुछ नेता कहीं डैमेज कंट्रोल के लिए फिर महिलाओं की पूजा करने के उदाहरण दें। लेकिन पूजा तो हिंदू धर्म बंदरों, सांपों और गायों की भी करता है। इसके अलावा भी बहुत से जानवरों की पूजा करता है।  जानवरों की ही क्यों, पत्थरों की भी करता है। तो महिलाओं को भी क्या आरएसएस इन जानवरों और पत्थरों की श्रेणी में गिनती है। सही कहा जाये तो बिलकुल इसी श्रेणी में गिनती है। बाकि के सारे प्रोग्राम और नारे केवल दिखावटी चीजें हैं और समस्या को उलझाये रखने के साधन हैं। बीजेपी सरकार व्यवहार में ऐसा कोई भी फैसला नही लेगी जिसमे महिलाओं को बराबरी की हैसियत हासिल हो। हाँ, बेटी बचाओ जैसे नारे जरूर लगाती रहेगी।
                      दूसरा तबका दलितों और पिछड़ों का है। हिन्दू धर्म उनके बारे में क्या क्या कहता है ये तो सबको मालूम है। लेकिन उनकी संख्या और वोट की ताकत आरएसएस को व्ही सब बातें कहने से रोकती हैं जो हिन्दू धर्म ग्रंथों में कहि गयी हैं। उससे उनके मन में गहरे तक बैठी हुई उन बातों को खत्म तो नही किया जा सकता। दलितों, आदिवासियों और समाज के निचले वर्ग के लिए आरएसएस की भावनाएं व्ही हैं जो महाभारत में द्रोणाचार्य की थी। द्रोणाचार्य ने आदिवासी एकलव्य को शिष्य बनाने से तो इंकार किया ही था लेकिन जब वो खुद अपने प्रयासों से धनुर्विद्या सिख गया और द्रोण शिष्य अर्जुन से बेहतर धनुर्धारी हो गया तो गुरुदक्षिणा की दुहाई दे कर उसका अंगूठा भी कटवा दिया। उससे पहले जब रामायण में राम ब्राह्मणो के एक ग्रुप के कहने पर तपस्वी शूद्र शम्बूक का सर काट लेते हैं। रामायण में दलितों और महिलाओं पर अत्याचार के प्रसंग भरे पड़े हैं। वहां जब किसी दलित या आदिवासी का बखान भी किया गया है तो वो भी एक आदर्श सेवक की तरह किया गया है। अगर दलित या आदिवासी सेविकाई से बाहर पैर रखने की कोशिश करता है तो वो तब के ऋषियों को भी बर्दास्त नही होता था और अब आरएसएस को भी नही होता। इसलिए आहिस्ता आहिस्ता दिल की बातें जुबान पर आ रही हैं। मोहन भागवत का आरक्षण की समीक्षा करने का बयान इसी दलित विरोध का हिस्सा है। उससे पहले आरएसएस के प्रमुख पदाधिकारी अम.जी. वैद्य आरक्षण को खत्म करने की मांग कर चुके हैं। अब इस पर तरह तरह के तर्क दिए जायेंगे। आरएसएस जानती है की दलित और पिछड़ी राजनीती के कई सूरमा अब बीजेपी के सामने दण्डवत हैं और उनमे अपने निजी स्वार्थों के आगे अब समाज की लाभ हानि कोई मायने नही रखती। आरएसएस का एजेंडा आजादी के पहले से एक उच्च वर्गीय हिन्दू राज की स्थापना रहा है। इसलिए उस समय के आरएसएस के संघ चालक गोलवलकर ने हिन्दुओं को आजादी की लड़ाई से दूर रहने का आह्वान किया था।
                      इसलिए आने वाले समय में आरएसएस और बीजेपी अपने इस एजेंडे को लागु करने या आगे बढ़ाने की हरसम्भव कोशिश करेगी। समाज में ऐसा माहोल बनाया जायेगा जिसमे इन बातों का विरोध करने वालों को देशद्रोही घोषित किया जायेगा और समर्थन करने वालों को तठस्थ बुद्धिजीवी और महान विचारक की उपाधि दी जाएगी।

Friday, September 11, 2015

हमारी सरकार गरीबों की सरकार है---ये रहा हमारा प्लान

हमें ये बात बार बार दोहरानी पड़ती है क्योंकि अभी तक गरीब इस बात पर भरोसा ही नही करते। परन्तु हम जो कहते हैं वो करते हैं ये हमारा रिकार्ड रहा है। इसलिए जब हमने कह दिया की हमारी सरकार गरीबों की सरकार है तो गरीबों को हम पर भरोसा करना चाहिए। हम उन्हें ताकत देना चाहते हैं। कुछ लोगों को ये हजम नही हो रहा की कैसे एक चायवाला प्रधानमंत्री बन गया। लेकिन हम हर कीमत पर गरीबों को ताकत देकर रहेंगे। ऐसा मैंने अपनी लगभग हर रैली में कहा है। आज मैं अपना प्लान लोगों के सामने रखूंगा ताकि उन्हें हमारी ईमानदारी और वायदों पर भरोसा हो सके। गरीबों को ताकत देने का हमारा प्लान इस प्रकार है।
ताकत का मतलब है संख्या -------- 
                                                          हम ये मान कर चलते हैं की किसी भी तबके की ताकत उसकी संख्या पर निर्भर करती है। हमारा दल आरएसएस का हिस्सा है इसलिए हम हिन्दुओं के हितों का खास ख्याल रखते हैं। कुछ लोग तो यहां तक भी कहते हैं की हम केवल हिन्दुओं के हितों का ही ख्याल रखते हैं। कुछ लोग ये भी कहते हैं की हम केवल हिन्दू हित की बात करते हैं और असलियत में हम केवल कुछ उच्च जाती के हिन्दुओं का ही ख्याल रखते हैं। पर ये सच नही है। इस देश में लाखों हिन्दू किसानो ने आत्महत्या कर ली पर हमने कुछ नही किया, लाखों हिन्दू नौजवान रोजगार के लिए धक्के खा रहे हैं लेकिन हमने कुछ नही किया और हजारों हिन्दू भुखमरी से मर रहे हैं पर हमारे कानो पर जूं भी नही रेंगी। ये सब आरोप हैं। हमने इस पर जो जो किया वो मैं आपके सामने रखता हूँ। जैसे ही हिन्दुओं की संख्या 80 % से 1 % नीचे आई हमने कितनी हाय तौबा मचाई आपने देखा ही होगा। हमने हिन्दुओं की जनसंख्या बढ़ाने के लिए हेल्पलाइन तक शुरू करने की बात कही । हम मानते हैं की भले ही हिन्दू कितनी ही बुरी हालत में रहें लेकिन उनकी संख्या नही घटनी चाहिए। यही समझ हमारी गरीबों के प्रति है। हमारा हर कदम गरीबों की संख्या बढ़ाने पर लगा हुआ है। हमारी सरकार आने के बाद बेरोजगारी का प्रतिशत 9 से बढ़कर 17 हो गया इस पर किसी ने ध्यान दिया। इससे गरीबों की संख्या में कितनी बढ़ौतरी हुई होगी और गरीबों की ताकत में कितनी बढ़ौतरी हुई होगी ये देखा किसी ने। हमने गरीबों की संख्या में कमी करने वाले पहले से चले आ रहे मनरेगा जैसे कार्यक्रमों का क्या हाल कर दिया ये देखा किसी ने। हम गरीबों को ताकत दे रहे हैं बिलकुल हिन्दुओं की तर्ज पर, और ये हमारे विरोधियों से बर्दाश्त नही होता।
                           हम गरीबों को ताकत देने के लिए जो प्रयास करते हैं उसका ढिंढोरा नही पीटते। हमारे हर कार्यक्रम को अगर आप ध्यान से देखोगे तो हर कार्यक्रम में गरीबों को ताकत देने और उनकी संख्या बढ़ाने पर हमारा जोर रहा है। हम जब उद्योगपतियों की मीटिंग बुलाते हैं तो उनको भी इसके लिए प्रेरित करते हैं की वो गरीबों की संख्या बढ़ाने और उन्हें ताकत देने के काम में सरकार का सहयोग करें। हालाँकि हम ये भी जानते हैं की उद्योग जगत इस पर पहले से ही बहुत योगदान कर रहा है।
                          हमने प्याज जैसी चीज 90 रूपये किलो बिकवा दी कोई अनुमान कर सकता था ? जब हम दाल 150 रूपये किलो बिकवाते हैं तो उसके पीछे भी हमारा उद्देश्य गरीबों को ताकत देने का ही होता है। और हम ये ताकत देते रहेंगे। हमारी सरकार अपने मिशन से पीछे नही हटेगी। जो लोग इसमें अड़ंगा डाल रहे हैं उन्हें हम कामयाब नही होने देंगे। हम इस देश के सभी हिन्दुओं और सभी गरीबों को ताकत दे कर रहेंगे। बल्कि सही तरीके से कहा जाये तो हम हिन्दुओं और गरीबों के बीच का फासला ही मिटा देंगे। हमारी सलाह के अनुसार अगर हिन्दू अपनी आबादी बढ़ाने जैसे काम करते रहेंगे तो ये फासला बहुत जल्दी मिट जायेगा।
                           अभी हमने देश के पूर्वी हिस्से पर फोकस किया है। मैंने कहा है की जब तक पूर्वी भारत का विकास नही होगा बाकि देश का विकास नही हो सकता। ऐसा इसलिए कहा है क्योंकि पूर्वी हिस्से में गरीबों की तादाद पहले ही ज्यादा है और उसके कारण भी हमारे से पहले ही मौजूद हैं। वहां गरीबों की संख्या और ताकत को बढ़ाना बाकि देश की अपेक्षा ज्यादा आसान है। इसलिए गरीबों को ताकत देने का हमारा मिशन बिहार अब पुरे जोर शोर से शुरू होने वाला है। हमारी हर हिन्दू और हर गरीब से ये विनती है की वो विरोधियों की बात पर ध्यान ना दें। ये सरकार आपको ताकत दे कर रहेगी।

Tuesday, September 1, 2015

हिन्दुओं की आबादी का दुष्प्रचार

खबरी --जो लोग हिन्दुओं की आबादी घटने का दुष्प्रचार कर रहे हैं उनका इस आबादी में क्या योगदान है जैसे -
१. मोहन भागवत 
२. प्रवीण तोगड़िया 
३. नरेंद्र मोदी 
४. बाबा रामदेव 
५. अटल बिहारी वाजपेई 
६  साक्षी महाराज 
७. योगी आदित्यनाथ 
८. उमा भारती 
९. साध्वी प्राची   इत्यादि। 

Tuesday, August 25, 2015

धर्म आधारित जनसंख्या के आंकड़े - संघ का झूठ बेनकाब

             आरएसएस लम्बे समय से ये प्रचार करता रहा है की जिस तेजी से मुस्लिमों की जनसंख्या बढ़ रही है उसके कारण बहुत जल्दी देश में हिन्दू अल्पसंख्यक हो जायेंगे। कम पढ़े लिखे और संघ पर भरोसा करने वाले बहुत से लोग भी इस पर विश्वास करने लगे थे। अपने इस तर्क के पीछे संघ मुस्लिमों की चार शादियां करने की छूट को भी तर्क के रूप में इस्तेमाल करता रहा है। अब 2011 की जनगणना के धर्म आधारित आंकड़े जारी कर दिए गए हैं। आदत के अनुसार संघ के लोग इनकी व्याख्या भी अपने हिसाब से तोड़ मरोड़ कर कर रहे हैं। लेकिन चिल्ला चिल्ला कर आवाज देती हुई सच्चाई को छिपाना मुश्किल हो रहा है। कुछ समाचर पत्रों ने भी इस खबर को छापते वक्त ये हेडलाइन लगाई है की देश की जनसंख्या में मुस्लिमो हा हिस्सा बढ़ा है। खबर को इस तरह पेश करना अर्धसत्य होता है और अर्धसत्य बहुत बार झूठ से भी ज्यादा खतरनाक होता है। 2011 की जनगणना के जो आंकड़े सामने आये हैं और उनसे जो तथ्य उभर कर आये हैं वो इस प्रकार हैं। 
ये आंकड़े तीन तथ्यों पर देखे जाने चाहियें। 

                                                           हिन्दू                      मुस्लिम 
1991      कुल जनसंख्या                   --------------           --------------

2001                       ''                         85. 29     Cr.           14 . 20  Cr.

2011                       ''                         96 . 63     Cr.           17 . 22  Cr.

2001     जनसंख्या में हिस्सेदारी      80 . 5     %               13 . 4  %

2011                            ''                     79 . 8     %              14 . 2   %

1991     जनसंख्या वृद्धिदर                25 . 1     %              34 . 5   %

2001                          ''                       20 . 3     %              29 . 5   %

2011                          ''                       16 . 8     %              24 . 5    %

             उपरोक्त आंकड़ों से दो बातें साफ होती हैं। पहली ये की 2001 से 2011 के बीच हिन्दुओं की जनसंख्या में कुल मिलकर 11 करोड़ 34 लाख की बढ़ौतरी हुई। और मुस्लिमों की जनसंख्या में 3 करोड़ 2 लाख की बढ़ौतरी हुई। 
          दूसरी बात जो इसमें सामने आई वो ये है की 1991 से 2001 के बीच हिन्दुओं की जनसंख्या बढ़ौतरी की दर में 4.8 % और 2001 से 2011 के बीच 3.5 % की गिरावट आई। लेकिन मुस्लिमों की जनसंख्या बढ़ौतरी की दर में यही गिरावट 1991 से 2001 के दौरान 5 % और 2001 से 2011 के बीच में भी 5 % की दर से आई। इसका मतलब ये होता है की मुस्लिमों की जनसंख्या बढ़ौतरी की दर में गिरावट हिन्दुओं की अपेक्षा ज्यादा तेजी से आई है। 
            तीसरी महत्त्वपूर्ण बात ये है की जिन समुदायों का हिस्सा 80 -17 हो तो छोटा समुदाय कभी भी बहुसंख्यक नहीं हो सकता है। क्योंकि उनकी कुल जनसंख्या बढ़ौतरी असल में 11 करोड़ 34 लाख और 3 करोड़ 2 लाख ही होगी। अगर इसमें कुछ फर्क भी आता है तो भी हिंदुओं जी जनसंख्या बढ़ौतरी मुस्लिमों से करीब 8 करोड़ प्रति दशक ज्यादा ही रहेगी। 
                इसलिए मेरी लोगों से गुजारिश है की दूसरों के बहकावे में आने की बजाए आंकड़ों का विश्लेषण करना सीखें।

Sunday, July 12, 2015

Vyang -- गंगा की गन्दगी और व्यापम घोटाला

गप्पी -- गंगा को हमारे देश की सबसे पवित्र नदी माना जाता है। इसको पाप-विमोचनी, मोक्ष-दायिनी कहा गया है। मुझे लगता है की यही प्रशंसा उसे भारी पड़ी है। देश में जितने भी पाप करने वाले लोग हैं वे एक अंतराल के बाद गंगा में पाप धोने जाते है। अपने सभी पूर्वजों को मोक्ष दिलाने के लिए भी सारा देश अस्थियां लेकर गंगा में विसर्जित करने जाता है। और गंगा का ये हाल हो गया की उसको साफ करने का स्पेशल प्रोग्राम चलना पड रहा है। और गंगा है की साफ होने का नाम ही नही लेती। हजारों करोड़ रूपये खर्च हो गए और आगे होने वाले हैं लेकिन परिणाम नही आ रहा। 

                       दूसरा सवाल ये है की जब गंगा को हम इतना पवित्र मानते हैं तो उसे गन्दा क्यों करते हैं। इसका जवाब हमारी परम्परा में है। हम अपनी सारी  पवित्र चीजों को गन्दा करते हैं फिर चाहे वो नदी हो ,पहाड़ हों, तीर्थस्थान हों , पार्क हों, शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थाएं हों। गंदगी हमारी सांस्कृतिक धरोहर है सो इसे हम कैसे छोड़ सकते हैं। जब तक हमारे आसपास गन्दगी ना हो हमे अजीब अजीब लगता है। हमे लगता है की हम दूसरे देश में हैं। घर जैसा महसूस ही नही होता। इसलिए हम पहला काम गन्दगी फ़ैलाने का ही करते हैं। 

                        इसलिए हमे केवल गंगा को साफ करने का अभियान नही चलाना पड़ता बल्कि सारे देश में स्वच्छता अभियान चलाना पड़ता है। अगर हम ये देखें की गंगा में गन्दगी फ़ैलाने वाले लोगों में कौन कौन शामिल हैं तो मालूम पड़ेगा की पाप धोने वाले लोगों के अलावा और भी बहुत से लोग हैं जो ये काम करते हैं। इनमे गंगा के किनारे बसे हुए शहरों की म्युनिसिपल कमेटियां भी शामिल हैं जो सारे शहर की गन्दगी गंगा में डाल देती हैं। इसके अलावा वो सारे उद्योग जो गंगा के किनारे स्थित हैं अपनी गन्दगी गंगा में डाल देते हैं। सोचते होंगे इससे गंदगी के निकाल के साथ पाप भी धुल जायेंगे। 

                         दूसरी तरफ हमारी सरकार है जो शहरों और उद्योगों की गन्दगी की उपयुक्त सफाई का प्रबन्ध करने की बजाए केवल प्रतिबंध लगाने में विश्वास रखती है। आज ये चीज गंगा में डालने पर प्रतिबंध लगा दिया, कल दूसरी चीज गंगा में डालने पर। अब सवाल ये है की वो इस गंदगी को लेकर कहां जाएँ। जब तक वैकल्पिक व्यवस्था नही होगी तब तक या तो वो गन्दगी घुमाफिरा कर गंगा में गिरेगी या फिर वो उद्योग बंद हो जायेंगे। लेकिन सरकारों को इन चीजों से कभी सरोकार ही नही रहा। उसको केवल एक काम ही करना आता है और वो हैं प्रतिबंध लगाना। सरकार ने गंदगी से लेकर कालेधन तक, और रेप से लेकर टैक्स चोरी तक, हर चीज पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। 

                    अब एक दूसरी समस्या खड़ी हो गयी है। मध्यप्रदेश के एक बीजेपी नेता ने कहा है की मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उतने ही पवित्र हैं जितनी गंगा है। मुझे अब तक समझ में नही आया की ये बयान शिवराज सिंह के समर्थन में है की विरोध में। कुछ लोग कह रहे हैं की समर्थन में है और इसमें वो गंगा की आध्यत्मिक पवित्रता की बात कर रहे हैं। दूसरा पक्ष कहता है की विरोध में है क्योंकि मंत्री को मालूम है की गंगा ही सबसे प्रदूषित नदी है। और व्यापम की गंदगी कोई गंगा में गिरने वाली गंदगी से कम थोड़े ना है, बल्कि उससे ज्यादा ही व्यापक है। और की मंत्री ने ये बयान इस संभावना को ध्यान में रखकर दिया है की व्यापम की सफाई में भी उतना ही समय लगने वाला है जितना गंगा की सफाई में लगने वाला है। अब वाराणसी और इलाहबाद से चुनाव लड़ने वाले भाजपा के नेता मुरली मनोहर जोशी तो कहते हैं की जिस तरह सरकार गंगा की सफाई कर रही है उससे तो गंगा सौ साल में भी साफ नही हो सकती। उसी तरह मध्यप्रदेश के कुछ लोग कह रहे हैं की जिस तरह से व्यापम की जाँच हो रही है उस हिसाब से तो ये सौ साल में भी पूरी नही हो सकती। गजब का साम्य है दोनों में। दूसरी जो बात उन्होंने कही की बीजेपी को व्यापम घोटाले का कोई अफ़सोस नही है। ये बात कहने की कोई जरूरत नही थी। देश की जनता ये बात पहले से ही जानती है की सरकारों को घोटालों के अफ़सोस कभी नही रहे। आप कांग्रेस से पूछ लीजिये की क्या उसे 2G या कोयला घोटाले का कोई अफ़सोस है तो कहेगी बिलकुल नही। आप तृणमूल कांग्रेस से पूछ लीजिये की क्या उसे श्रद्धा चिट फण्ड घोटाले का कोई अफ़सोस है तो कहेगी की अफ़सोस किस बात का, बल्कि हमे तो गर्व है।

                     मेरे पड़ौसी को इस बात पर बहुत एतराज है की अब नेताओं की गन्दगी भी गंगा में डाली जा रही है। उनका कहना है की इससे तो गंगा की सफाई की रही सही सम्भावना भी खत्म हो जाएगी। उसका कहना है की कम से कम गंगा को तो राजनीति से दूर रक्खो , क्योंकि गंगा की स्वीकार्यता सभी धर्मों से परे है। हर धर्म और सम्प्रदाय के लोग गंगा को जीवन दायिनी मानते हैं। इसका एक उदाहरण मैं नीचे दे रहा हूँ जिसमे गंगा के किनारे रहने वाला एक मुसलमान शायर गंगा को सम्बोधित करते हुए कहता है ,

                                        बहुत नमाजें पढ़ी हैं हमने,

                                                              अ गंगा तेरे पानी में वजू करके। 

खबरी -- शायद हमारा यही सामूहिक जज्बा ही गंगा को बचा ले जाये। 


 

Sunday, July 5, 2015

Vyang -----बड़ा धार्मिक दिखने का मुकाबला

 

खबरी -- लोगों में धार्मिक होने की जैसे हौड़ लगी हुई है।


गप्पी -- ये हौड़ धार्मिक होने की नही है। धार्मिक दिखने की है। होने और दिखने में फर्क होता है। दिखने के लिए होना जरूरी शर्त नही है। उसी तरह जैसे होने के लिए दिखना जरूरी शर्त नही है। धार्मिक होने और दिखने में उतना ही फर्क है जितना आसाराम बापू और विवेकानन्द में है। आजकल विज्ञापन का जमाना है। हर चीज की मार्केटिंग हो रही है। व्यक्ति समाज में खुद की भी मार्केटिंग करता है। धर्म और व्यक्ति दोनों ब्राण्ड हो गए हैं।

                     विज्ञापन में किसी वस्तु के बारे में जो बातें कही गयी होती हैं जरूरी नही है की वो चीजें उसमे हों। बल्कि यों कहिये वे चीजें उसमे होती नही हैं। इसके क़ानूनी पचड़े से बचने के लिए विज्ञापन कम्पनी उसमे नीचे छोटे छोटे अक्षरों में सूचना लिख देती हैं। लेकिन धार्मिक दिखने के मुकाबले वाले लोग ऐसा नही करते बल्कि उल्टा जोर जोर से उसके होने का झूठा दावा करते हैं। 

                  कई बार ये लोग ऐसी हरकतें करते हैं की समझ से बाहर की बात हो जाती है। मेरे दो पड़ौसी हैं जो एक ही टाइम पर छत पर जाते हैं सूर्य को पानी देने। एक दिन एक आदमी ने देखा की दूसरे का पानी लाल रंग का है। उसने उससे पूछा की पानी लाल क्यों है। पहले ने जवाब दिया की पानी देने के बाद सूर्य महाराज को तिलक भी तो करना होता है इसलिए पानी में सिंदूर से तिलक किया हुआ है इसलिए पानी लाल दीखता है। पहले आदमी में काटो तो खून नही। इसका मतलब है तुम सूर्य के मुझसे बड़े भगत हो,  देख लूँगा तुम्हे, ऐसा मन ही मन बड़बड़ाता हुआ वो नीचे आ गया। चार पांच दिन वो अलग से पानी देने गया। छठे दिन वो उसके साथ ही पहुंचा। आज उसके पानी में सिंदूर तो था ही थोड़े से चावल और शककर के दाने  भी थे। अब पूछने की बारी पहले की थी। 

         " वो क्या है की हमारे यहां देवताओं को तिलक चावल के बिना नही करते। और तिलक करने के बाद मीठा मुंह तो करवाना ही होता है। अब जिनको ये नही मालूम तो नही मालूम। " दूसरे आदमी ने जवाब देकर पांच दिन से रोक कर रखी हुई भड़ास निकाल ली। 

               दूसरा आदमी  एक हफ्ते उसके साथ पानी देने नही गया। 

   एक हफ्ते बाद पहला आदमी पानी देने गया तो उसके पानी  में सिंदूर, चावल,शक़्क़र के साथ लाल रंग का धागा भी था जिसे मौली कहते हैं। 

                   दूसरे आदमी ने देखा और कुढ़ कर नीचे आ गया। 

           अगले हफ्ते उसके पानी के साथ बाकि की सारी चीजें तो थी ही साथ में जलती हुई अगरबत्ती भी थी। 

           अगले हफ्ते पहला आदमी अगरबत्ती के साथ दीपक भी लिए था। 

   दो महीने में ये हाल हो गया की दोनों पानी के लोटे के साथ सामान से भरी हुई एक थाली भी लेकर छत पर जाने लगे। 

                     ये बड़ा धार्मिक दिखने का मुकाबला था। 

       हमारी सोसायटी में एक आदमी ने सुंदर कांड का प्रोग्राम रखा। सोसायटी के कई लोगो को बुलाया। सबको प्रशाद देकर विदा किया। अगले शनिवार को दूसरे आदमी ने सुंदर कांड का प्रोग्राम रखा। बाकि सारी चीजें तो वैसी ही थी लेकिन उसने लाऊड स्पीकर और जोड़ दिया। पूरी रात सोसायटी शोर से परेशान रही। सुबह मैंने उससे पूछा की भाई साब आपने लाऊड स्पीकर क्यों रक्खा। 

                " देखो भाई साब, प्रोग्राम किआ जाये तो थोड़ा ढंग से किया जाए। सुंदर कांड रखते हो तो थोड़ा खर्चा करने की भी हिम्मत रखो। पूरी सोसायटी के कान में भगवान का नाम पड गया। " उसने आसपास के आदमियों को भी सुनाकर कहा। 

                  " लेकिन भाई साब, लोगों को परेशानी भी हुई। सारी रात लाऊड स्पीकर बजाना क्या अच्छी बात है। आप सभ्य आदमी हैं। " मैंने कहा। 

                 वो गुस्से से कांपने लगा। " सभ्य होगा तू, तेरा बाप। तेरी हिम्मत कैसे हुई मुझे सभ्य कहने की। जुबान संभालकर बात किया करो। "

               मैं वापिस आ गया। 

              एक पैसे वाला आदमी जागरण रखवाता है। बड़ी भीड़ होती है। दूसरे आदमी ने जागरण में फ़िल्मी हीरो और हीरोइन को बुलवा लिया। वो बड़ा भगत था। 

              शहर में एक बड़े नामी कथावाचक का प्रोग्राम हुआ। शहर के बड़े बड़े लोग कथा सुनने जाते। ये कथावाचक भी अपने नाम के आगे सन्त लिखते हैं। एक दिन एक पैसे वाले बड़े सेठ ने उन्हें घर बुला लिया। साथ में उसने अपने सारे विरोधिओं और मिलने वालों को भी न्योता भेज दिया। सभी आये। सबके भोजन के बाद भरे हुए हाल में सन्त ने कहा की " मैं कभी किसी के घर जाता नही हूँ। भई सन्तों को गृहस्थियों से जरा दूर ही रहना चाहिए। लेकिन इन भाई साब के साथ प्रेम का व्यवहार है, बहुत धार्मिक विचारों और संस्कारों वाला परिवार है इसलिए इंकार नही कर सका। "

                लाखों का खर्चा वसूल हो गया। ये बड़े धार्मिक हो गए। 

आजकल तो लोग एक दूसरे से सतसंग में जाने के बारे में इस तरह पूछते हैं जैसे क्लब के बारे में पूछ रहे हों। ये सतसंग नए जमाने के क्लब हैं। जो काम लोग पहले क्लबों में साधते थे अब सतसंग में साधते हैं। एक पुराने फ़िल्मी गाने की लाइने इस स्थिति को बखूबी बयान करती हैं। 

                             देवा हो देवा गणपति देवा ,

                                                  तुमसे बढ़कर कौन। 

                            और तुम्हारे भक्त जनो में ,

                                                    हमसे बढ़कर कौन।

Tuesday, June 30, 2015

गाय के खेत चर जाने को नुकसान नही मानना चाहिए

गप्पी -- ये बात मैं गाँव में भी सुनता था बचपन में। गाय हमारे देश में बहुत ऊँचा स्थान रखती है। हमारे देश में हजार आदमी मर जाएँ कोई फर्क नही पड़ता, लेकिन एक गाय मर जाये तो दंगे हो जाते है। घर जल जाते हैं। कुछ लोग तो बस यही  काम करते हैं।

                      लेकिन ये ऊपर वाली बात की, गाय अगर खेत चर जाये तो पुण्य ही होता है, ये बात बहुत बार कही और सुनी गयी है। लेकिन मुझे याद नही आता ये बात कहने वालों में एक भी आदमी ऐसा था जिसके पास खेत हो। ये बात कहने वाले बहुत से लोगों के पास अलबत्ता गाय जरूर थी। या फिर वो लोग थे जिनका गाय से रिश्ता बस सुबह सुबह रोटी खिलाने तक सिमित था।

                           अब तीन तरह के लोग हो गए। एक वो जिनके पास गाय थी पर खेत नही थे। दूसरे वो जिनके पास खेत थे भले ही गाय हो ना हो। और तीसरे वो जिनके पास ना गाय थी और ना खेत थे। अब जिन लोगों के पास गाय थी और खेत नही थे वो ये बात बड़ी जोर शोर से कहते थे। वो ये भी कहते थे की गाय तो सबकी माता होती है। लेकिन जब दूध निकालने का समय होता था तो गाय केवल उनकी माता रह जाती थी। कोई दूसरा उसके नजदीक भी नही जा सकता था। और लोगों को अपनी ही माता का दूध खरीदना पड़ता था।

                 अब गाय के साथ बछड़े भी होते हैं। और जाहिर है की जब गाय दूसरे का खेत चरती है तो बछड़े भी उसके साथ चरते हैं। अब माँ वाले रिश्ते से बछड़ा हमारा भाई हुआ। बछड़ा बड़ा होकर बैल बनता है और खेत में काम करता है। लेकिन वो उस खेत में काम नही करता जिसे उसने मुफ्त में चरा होता है बल्कि उस खेत में करता है जिसमे गाय का मालिक करने को कहता है। लेकिन कुछ गाय बड़ी भाग्यशाली होती हैं। उनका बछड़ा बड़ा होकर बैल नही बनता बल्कि सांड बनता है।ये रिश्ते वाला भाई नही बल्कि "भाई " होता है। सांड बनने से एक तो उसे सारी जिंदगी के लिए काम ना करने छूट मिल जाती है और दूसरे उसे किसी का भी खेत चरने का लाइसेंस मिल जाता है।

                     आजकल जो गाय और बछड़े हमारा खेत चर रहे हैं वो कहते हैं की उनके पास खेत चरने का लाइसेंस है। वो ये भी कहते हैं की ये लाइसेंस उन्हें हमने दिया है। इसलिए हमे कम से कम पांच साल तो इस खेत चरने पर एतराज नही करना चाहिए। फिर भी अगर कोई एतराज कर ही देता है तो आसपास से जोर की आवाज आती है अरे अरे क्या कर रहे हो ? गोमाता के ऊपर आरोप लगा रहे हो। शास्त्रों का इतना ज्ञान भी नही हैं। थोड़ी शर्म करो अधर्मिओं। तुम्हारे खेत में गौमाता ने मुंह मार लिया तो समझो तुम तो धन्य हो गए।

                       मैं ध्यान से देख रहा हूँ की इनमे से भी किसी के पास खेत नही है केवल गाय हैं। ये अपनी गाय का दूध निकालते वक़्त सारे दरवाजे बंद कर लेते हैं। ये लोग खुद दूध पीते  है और दूसरों को गाय का पेशाब पीने की सलाह देते हैं। ये लोग गाय के पेशाब में जितने गुण बताते हैं उतने तो दूध में भी नही होते। जो लोग अंदर की बात जानते हैं उनका  कहना है की ये गाय अमेरिकन जर्सी गायों से भी ज्यादा दूध देती हैं। खेत वालों से ये बात छिपाई जाती है।

                           अब हमारी सरकार ने हमारे राजनैतिक जीवन में गाय का कितना महत्त्व है ये साबित करने के लिए गौमांस पर प्रतिबन्ध लगा दिआ। सामाजिक जीवन में गाय का महत्त्व तो सबको मालूम ही था सरकार को छोड़ कर। गाय का कत्ल करने पर भी प्रतिबंध लगा दिया। अलबत्ता कोई गौशाला वाला सारा चंदा खुद खा जाये और गाय भूख से मर जाये उस पर प्रतिबन्ध नही है। उस पर प्रतिबन्ध लगाने से वो लोग भी फंस सकते थे जो केवल दूध पीते है। हमारी सरकार दूरदर्शी है सो इस तरह का फैसला कैसे ले सकती थी। हाँ तो हम गौमांस पर प्रतिबन्ध की बात कर रहे थे। कुछ लोगों  ने इस बात पर एतराज किया की सदियों से गौमांस हमारा भोजन है तो उनको कह दिया गया की वो पाकिस्तान चले जाएँ। हमने गाय के मांस के निर्यात पर प्रतिबन्ध नही लगाया है इसलिए आप कृपया पाकिस्तान चले जाइए हम वहां गौमांस भेज देंगे आप खा लीजिये। ये सलाह देने के लिए सरकार ने कुछ लोगों की टीम बनाई हुई है और उन्हें भगवा ड्रेस कोड दिया गया है। लोगों को आइन्दा ध्यान रखना चाहिए की इस भगवा ड्रेस वाले लोग सरकार के आदमी हैं। लोगों की सुविधा के लिए ये व्यवस्था की गयी है। वैसे दो तीन लोग ऐसे भी हैं जो बिना भगवा कपड़े के भी लगातार रट लगाये रहते हैं की हमने कभी गौमांस नही खाया। कोई उनसे पूछता भी नही है फिर भी वो इस बात रट लगाये हुए है। या की वो असली राष्ट्रवादी हैं। मैंने किसी से पूछा की ये लोग ड्रेस में  क्यों नही हैं तो उसने बताया की इनके जिम्मे कुछ ऐसे काम भी हैं जहां भगवा ड्रेस पहनना मना है जैसे इफ्तार पार्टिओं का आयोजन करना। उसने ये भी बताया की चिन्ता मत करो भगवा कपड़े ये भी पहने हुए हैं लेकिन दूसरे कपड़ों के नीचे।

                           कुछ लोगों ने मांग की है की गाय को हमारा राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाये। अभी हमारा राष्ट्रीय पशु शेर है जो वैसे भी हमारे कर्मों के साथ मेल नही खाता। मैं कहता हूँ की गाय और शेर दोनों को राष्ट्रीय पशु रखा जाए तो क्या परेशानी है। वैसे भी सारे कामों में हमारी नीति दोगली ही होती है। दूसरा इससे हमे हमारी सही पहचान मिलेगी। घर में शेर और बाहर गाय। 

                            एक दूसरी तरह की गाय होती है जिसे नीलगाय कहा जाता है। इनके झुण्ड के झुण्ड होते हैं और पूरे खेत के खेत साफ कर देतें हैं। इनका झुण्ड जब खेत में घुसता है तो एक दो आदमी की तो हिम्मत नही होती इन्हे निकालने की। ये उस पर हमला कर देती हैं। तो लोगों ने तय किया की वो इक्क्ठे होकर इन्हे निकालेंगे। अब गाँव के लोग समूह बनाते हैं और इनके झुण्ड  भगा देते हैं। 

                       इसलिए मैं ये पूछना चाहता हूँ की ये जो पहली किस्म की जो गाय हैं उन्हें भी लोग इक्क्ठे हो कर क्यों नही निकाल देते। 

 

खबरी -- लेकिन इसके लिए उन्हें माँ बेटे की रिश्ते से बाहर आना पड़ेगा।

Sunday, June 21, 2015

बन गया वर्ल्ड रिकार्ड, चलो अब काम करो।

खबरी -- सुना है योग दिवस पर कई वर्ल्ड रिकार्ड बन गए। 


गप्पी -- इसी लिए तो सारा देश लगा हुआ था। वरना योग की किसको पड़ी है। हम वर्ल्ड रिकार्डों से बहुत प्रेम करते हैं। और जहां भीड़ इक्क्ठी करने से वर्ल्ड रिकार्ड बन सकता हो वहां तो हम टूट पड़ते है। ये हमारा राष्ट्रीय चरित्र है। हमे महान होने में नही, महान दिखने में बहुत मजा आता है, सन्तोष मिलता है गर्व होता है। लेकिन अगर कोई जरा सा छेड़ दे तो सारी  असलियत सामने आ जाती है। 

                कुछ वर्ल्ड रिकार्ड ऐसे भी हैं जो हमारे नाम पर अपने आप बनते जाते हैं। हम उन पर भी गर्व महसूस करते हैं। दुनिया में सबसे ज्यादा कुपोषित बच्चों का रिकार्ड , सबसे ज्यादा भूखों का रिकार्ड, सबसे ज्यादा अनपढ़ों का रिकार्ड और शायद सबसे ज्यादा अनैतिक होने का रिकार्ड भी। कुछ रिकार्ड ऐसे भी हैं जिनको कभी भी कोई चुनौती नही हैं। ये हमेशा हमारे ही नाम पर रहने वाले हैं। जैसे दहेज के लिए बहुओं को जलाने का रिकार्ड, स्त्री भ्रूण हत्या का रिकार्ड। 

                  हम अपनी महानता का ढिंढोरा भी खूब पीटते हैं। हमारी क्रिकेट टीम बंगलादेश गयी तो हमने अपनी महानता के विज्ञापन अख़बारों में दिए। " बाप बाप होता है बेटा बेटा होता है " .क्रिकेट के विशेषज्ञ टीवी चैनलों पर हमारी महानता का प्रचार कर रहे थे। पर बेटा बताई जाने वाली बांग्लादेश की टीम ने हमें ऐन फादर्स डे के दिन पीट दिया। जब हारने  लगे तो हमारी सारी महानता खुल कर सामने आ गयी। मिस्टर कूल कहलाने वाले धोनी को धक्का मारते  हुए सबने देखा। हमारी टीम के सदस्यों को गाली  गलौच करते हुए भी सबने देखा। इसे खेल की भाषा में हारते हुए रोना कहते हैं। हम जीत नही पाये कोई बात नही लेकिन सम्मान से हार भी नही पाये। ये हमारा राष्ट्रीय चरित्र है। 

                   लेकिन हमने विश्व रिकार्ड तो बना लिया। आगे का क्या होगा। हम इस बात पर गर्व करते हुए की हमने विश्व को जीरो दिया गणित में जीरो हो गए। हम इस बात पर गर्व करते रहे की हमने दुनिया को सभ्यता सिखाई, सारी असभ्यता के रिकार्ड बनाते चले गए। महिलाओं के खिलाफ हिंसा, दलितों के खिलाफ भेदभाव शायद असभ्यता नही माना जाता। क्योंकि इसके उदाहरण तो राम राज्य में भी मिलते हैं। शम्बूक की हत्या और सीता का त्याग इसके क्लासिक उदाहरण हैं। इस तरह के काम करने के बावजूद अगर राम मर्यादा पुरुषोत्तम कहला सकते हैं तो हमने क्या गुनाह किया है। हमारी संस्कृति में पूर्ण पुरुषोत्तम होने के लिए चोरी और बेईमानी का शामिल होना पूर्व  शर्त है। इसीलिए कृष्ण को पूर्ण पुरुषोत्तम कहा गया है। हम गुरु हो कर शिष्य का अँगूठा काट सकते है हमारा अधिकार है। हम धर्मराज होते हुए पत्नी को जुए में हार सकते हैं। इन छोटी छोटी घटनाओं से हमारी महानता पर पहले भी फर्क नही पड़ता था अब भी नही पड़ता। 

                       खैर अब हमने विश्व रिकार्ड बना ही लिया है तो अब इस देश का सामान्य जन ये अपेक्षा करता है की अब थोड़ा काम भी कर लिया जाये। उन चीजों पर ध्यान दिया जाये जो महान होने के लिए नही लेकिन जीने के लिए जरूरी होती हैं।

Saturday, June 20, 2015

एक बार फिर भ्रम आसन को तैयार देश

खबरी -- योग क्या क्या (नही) कर सकता है।


गप्पी -- हमारा देश योगियों का देश है। यहां बड़े बड़े योगी हुए हैं। लोगों ने हजारों साल तपस्याएँ की हैं। हमारे देश में हमेशा योगी और योगिराज बड़ी संख्या में रहे हैं।ये साधु बाबा और योगियों को अगर अलग बसा दिआ जाये तो एक दूसरा आस्ट्रेलिया बस जाये। समाज को गाली देने और उसी समाज पर पलने वाले ये परोपजीवी इतनी बड़ी संख्या में में दुनिया में और कही नही मिलेंगे। लेकिन हमारा देश फिर भी भूखा नंगा ही रहा। सालों पहले भी हमारी समस्या भूख , गरीबी और बेरोजगारी थी और आज भी वही है। आंकड़े कहते हैं की दुनिया के सबसे ज्यादा अन्धे हमारे भारत में हैं। योग दिवस पर हम इसका प्रदर्शन पूरी दुनिया के सामने करेंगे। हम पूरे देश में हर उमर के और हर प्रकार के शरीर के लोगों के लिए एक ही तरह के योगासन करेंगे। एक दोनों पैरों पर भी मुश्किल से खड़ा होने वाला आदमी एक पैर पर खड़ा होने की कोशिश करेगा। जिसे कमर दर्द की शिकायत है और डाक्टर ने बैड पर आराम करने को कहा है वो चक्रासन करेगा। जो आसन कुछ लोग मोटा होने के लिए करेंगे, वही आसन कुछ लोग पतला होने के लिए भी करेंगे। 21 जून को एक ही दिन में हम योग का मजाक बना कर रख देंगे।हमारी जो समस्याएं हैं वो योग दिवस बाद भी रहने वाली हैं। फिर क्यों सारा देश इसके पीछे पागलों की तरह लगा हुआ है। 

                   हमारे देश में झूठी प्रशंसा के भूखों की कमी नही है। कभी नही रही। देवता भी झूठी प्रशंसा से प्रसन्न होते थे।

Thursday, June 4, 2015

और अब सोमनाथ के घेराबंदी

खबरी -- आज की ताजा खबर क्या है ?

गप्पी -- कल टीवी पर खबर सुनी की सोमनाथ ट्रस्ट ने सोमनाथ मंदिर में गैर हिन्दुओं के प्रवेश पर रोक लगा दी। अब अगर कोई गैर हिन्दू मंदिर में जाना चाहे तो उसे मैनजमेंट से पहले अनुमति लेनी होगी और मंदिर में जाने का मकसद बताना होगा। मान लो कोई आतंकवादी मकसद वाले खाने में ये लिख दे की वो मंदिर को उड़ाना चाहता है तो मैनजमेंट उसको अनुमति नही देगी। लेकिन साहब मुझे ये खबर पढ़कर मजा आ गया अब भगवान सोमनाथ यानि शंकर को किस किस से मिलना है ये ट्रस्ट तय करेगी। बड़ा भगवान बना फिरता था 

              सोमनाथ मंदिर की जो ट्रस्ट है उसमे नरेंद्र मोदी , लाल कृष्ण आडवाणी और गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल शामिल हैं। अब केशुभाई और आडवाणी जी का तो बीजेपी में ये हाल है की कोई नेता इनसे मिलना भी चाहे तो उसे पार्टी हाई कमान से पहले अनुमति लेनी होती है और मकसद भी बताना होता है। ये दोनों नेता कहते होंगे देखो सोमनाथ तुमने हमारा ये हाल कर दिया तो हमने भी तुम्हारा यही हाल  कर दिया। अब तुम्हारे जो भूत-प्रेत , राक्षस , चुड़ैल तुमसे मिलने की कोशिश करेंगे उन्हें हिन्दू होने का प्रमाण पत्र साथ में रखना होगा। मुझे तो लगता है की ट्रस्ट ने आपको भी कहा होगा की आप यूँ फालतू में हर आदमी से मिलना बंद कीजिये , आप भगवान हैं और हर भगवान की एक रेपुटेसन होती है। मुझे तो ये भी लगता है की अब गैर हिन्दुओं के बाद अगला नंबर दलितों का आने वाला है। 

               लोग आपको भोले शंकर कहते हैं।  कहते हैं की आपको महादेव इसलिए कहा गया की आपने तपस्या करने वाले को वरदान देते समय उसकी जाती, धर्म नही पूछा और असुरों को भी वरदान दिए।  देवताओं ने कई बार इसकी शिकायत ब्रह्मा जी से की परन्तु ब्रह्मा जी ने कह दिया मामला उनके बस  से बाहर है। लेकिन अब समय बदल गया  है भोलेनाथ, अब यहां ब्रह्मा जी की नही नरेन्द्र मोदी जी की चलती है। इसलिए आप अपनी ओकात में रहेंगे तो अच्छा रहेगा वरना आपको भी मार्गदर्शक मंडल में भेजने में कितनी देर लगती है। वैसे भी आपके ज्योतिर्लिंग की ज्योति अब अपने ही ट्रस्ट के लोगों के दिमाग रौशन करने लायक नही बची।

                  कुछ लोग कह रहे हैं की सोमनाथ का मंदिर सरकार के खर्चे पर बना था और उस समय के राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रशाद ने इसका उदघाटन किया था।

डॉ. राजेन्द्र प्रशाद को लगा होगा की वो राष्ट्रीय गौरव और साम्प्रदायिक एकता का पुनर्निर्माण कर रहे है। परन्तु समय के साथ लोग इस निर्माण को भी राष्ट्रीय शर्म में बदल सकते है इसका उन्हें अनुमान नही रहा होगा। 

                   वैसे जब कोई खबर आती है की मुंबई में किसी ने इसलिए मकान भाड़े पर देने से मना कर दिया की सामने वाला मुस्लिम था या नौकरी देने से मना कर दिया ये कहकर की वो केवल हिन्दुओं को नौकरी पर रखते हैं तो सफाई में ये कहा जाता है की ये केवल एक कर्मचरी की भूल थी और  की यह  केवल किरायेदार और दलाल का झगड़ा है तो इनकी मासूमियत पर मर मिटने को जी चाहता है। ये  कोई इक्का दुक्का भूल नही हैं बल्कि हिन्दू राष्ट्र के सपने की बड़ी साजिश का हिस्सा हैं। लेकिन तुम  कितने ही सोमनाथो की घेराबंदी कर लो ये सपना कभी पूरा नही होगा।