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Monday, August 3, 2015

Vyang -- सरकार ( केवल ) चर्चा को तैयार है।

गप्पी -- संसद में कामकाज बंद है। सरकार कहती है की वो चर्चा के लिए तैयार है और विपक्ष चर्चा नही कर रहा है। विपक्ष कहता है की सरकार केवल चर्चा करना चाहती है कार्यवाही नही करना चाहती। दोनों पक्ष आमने सामने हैं। सदन में एक अध्यक्ष होता है जिसकी हालत घर  के उस बूढ़े जैसी है जिसकी इज्जत करने का दावा तो सभी करते हैं लेकिन उसकी सुनता कोई नही है। संसद की कार्यवाही इस तरह शुरू होती है। 

                 अध्यक्ष सदन में अपने आसन पर आकर बैठता है। विपक्ष के चार पांच सदस्य खड़े हो जाते हैं और कहते हैं की उन्होंने कार्यस्थगन का नोटिस दिया है। सत्ता पक्ष के चार पांच लोग खड़े हो जाते हैं और प्रस्ताव का विरोध करते हैं। अध्यक्ष प्रस्ताव को ख़ारिज कर देता है। सदन में हो हल्ला होता है और सदन के अध्यक्ष घोषणा करते हैं की कार्यस्थगन क्या पूरा सदन ही दोपहर तक स्थगित किया जाता है। हमारे यहां ये रिवाज है की कार्य को स्थगित करने की बजाय पूरा सदन ही स्थगित कर दिया जाता है। 

                  गांव से कुछ लोग मंत्रीजी से मिलने संसद भवन पहुंचते हैं। 11 बजने वाले हैं, सदन की कार्यवाही शुरू होने वाली है। मंत्रीजी गांव वालों को कहता है की मैं अभी आया पंद्रह मिनट में। तुम तब तक संसद की कैंटीन में सब्सिडी वाला नाश्ता करो। सदन की कार्यवाही शुरू होती है। मंत्री खड़ा होकर कहता है की सरकार चाहती है की सदन चले। मुझे मालूम है की मंत्री झूठ बोल रहा है। वो गांव वालों को पंद्रह मिनट का समय देकर आया है। पहले इस तरह का मजाक लोग हमारी किर्केट टीम के लिए करते थे की बैट्समैन चाय वाले को चाय बनाने की बोलकर बैटिंग करने जाता था और जब तक चाय बनती थी वापिस आ जाता था। 

                 मान लो कार्यवाही चले भी और चर्चा हो तो ऐसी होगी,

विपक्ष -- तुमने घोटाला किया है। 

सरकार -- हमने घोटाला नही किया है। 

विपक्ष --  तो जो शुषमा जी ने किया वो क्या था ?

सरकार -- उसे घोटाला नही मदद कहते हैं। 

विपक्ष -- तुमने एक अपराधी की मदद क्यों की ?

सरकार -- मदद हमारी परम्परा है हम उसमे भेदभाव नही करते। 

विपक्ष -- तो इस्तीफा भी तो परम्परा है। 

सरकार -- हम कांग्रेस की परम्परा को नही मानते। 

विपक्ष -- इस्तीफा दो। 

सरकार -- नही देंगे। 

                                    चर्चा समाप्त। 

           मैं तो कहता हूँ की गलती विपक्ष की है। उसे मंत्रियों का इस्तीफा चाहिए था तो प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांगना चाहिए था। क्योंकि हमारे यहां ऐसा ही होता है। 

                   विपक्ष कहता है की चर्चा करो। 

                    सरकार कहती है की चर्चा नही हो सकती। 

                  विपक्ष कहता है की मंत्री इस्तीफा दे। 

                    सरकार कहती है की चर्चा करो। 

                  विपक्ष कहता है की प्रधानमंत्री इस्तीफा दे। 

                     सरकार कहती है संबंधित मंत्री इस्तीफा देंगे। 

सो विपक्ष से चूक हो गयी। आजलक तो बच्चे भी इतने समझदार हो गए हैं की सौ रूपये चाहिए होते हैं तो पांच सौ मांगते हैं। अब विपक्ष हो हल्ला कर रहा है। सरकार सदस्यों को निलंबित करने का प्रस्ताव रख रही है। एक समय आएगा की पूरा विपक्ष निलंबित हो जायेगा। केवल सरकार के लोग बचेंगे। फिर चर्चा  होगी। लेकिन ऐसी चर्चा तो पार्टी की मीटिंग में भी हो सकती थी। संसद की क्या जरूरत थी। 

                       लेकिन बिल तो केवल संसद में ही पास हो सकते हैं। उसके बाद बिल पास होंगे। सरकार कहेगी इस बार संसद में 42 बिल पास हुए।  सारे बिल पूरे विचार-विमर्श और चर्चा बे बाद पास हुए। टीवी चैनल बताएंगे की इस बार रिकार्ड कामकाज हुआ। जनता संतुष्ट होगी की संसद पर हो रहा खर्चा बेकार नही गया। 

 

खबरी -- देश को ये बताया जा रहा है की संसद का काम केवल उसके खर्चे के हिसाब से बिल पास करना है।