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Friday, December 11, 2015

बीजेपी का दोहरा रुख, दोहरी बातें और दोहरा चरित्र

बीजेपी जब से सत्ता में आई है उसने अपनी पहले कही गयी कई बातों पर पलटी मारी है। जब तक ये बात केवल नारों और वायदों तक सिमित थी तब तक तो ठीक था और लोग केवल मजाक उड़ाकर चुप रह जाते थे। लेकिन जब ठीक इसी तरह का मामला कामकाज के दौरान भी सामने आने लगा तो उसका विरोध होने लगा। संसद का पिछला सत्र बीजेपी नेताओं के भृष्टाचार के मामले पर हंगामे की भेंट चढ़ गया और अब ये सत्र भी बिना कोई कामकाज किये समाप्ति की और है। बीजेपी के पलटी मारने के इतने उदाहरण सामने हैं की अब तो लोगों को उन पर आश्चर्य होना भी बंद हो गया है। जैसे -

पहले --- बीजेपी नेता पूरा सत्र हंगामे के द्वारा खत्म कर देते थे और कहते थे की संसद चलाना सरकार की जिम्मेदारी होती है और संसद का काम रोकना भी लोकतंत्र में विरोध का एक तरीका होता है।

अब -- बीजेपी नेता कहते हैं की संसद में काम रोकना देश के विकास को रोकने का प्रयास है और संसद चलाना सरकार और विपक्ष दोनों की बराबर की जिम्मेदारी होती है।

पहले -- जब भूमि बिल पर बीजेपी ने सरकार में आते ही पलटी मारी और इस पर जवाब में कहा की नई जरूरतों के अनुसार अपने विचारों में बदलाव करना कोई बुरी बात नही है।

अब -- GST बिल पर कांग्रेस द्वारा रक्खी गयी तीन मांगों पर वह कह रही है की ये मांगे तो कांग्रेस द्वारा पेश किये गए बिल में भी नही थी और अब कांग्रेस द्वारा अपने रुख में बदलाव लोगों के साथ धोखेबाजी है।

पहले -- कांग्रेस और विपक्ष के दूसरे नेताओं पर भृष्टाचार के आरोपों पर उसका कहना था की जब शिकायत मिली है तो जाँच करवाने में सरकार क्यों हिचक रही है। अगर कुछ गलत नही हुआ है तो अपने आप सामने आ जायेगा इसमें डरने की क्या बात है।

अब -- जब उसके नेताओं के भृष्टाचार की जाँच की मांग हो रही है तो उसका कहना है की अगर कोई पुख्ता सबूत विपक्ष के पास है तो उसे अदालत जाना चाहिए , केवल शिकायतों के आधार पर जाँच नही की जाएगी।

पहले -- जब पवन बंसल के भांजे किसी से पैसे लेते हुए पकड़े गए थे तो उसने कहा था की पवन बंसल को इस्तीफा देना चाहिए क्योंकि आखिर उनकी बिना पर ही तो उसके भांजे ने पैसा लिया होगा।

अब -- जब छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री का साला पैसे लेते हुए पकड़ा गया तो बीजेपी का कहना है की कोई मुख्यमंत्री अपने सभी रिश्तेदारों की जिम्मेदारी कैसे ले सकता है।

पहले -- जब UPA सरकार पाकिस्तान के साथ  रही थी तो उसने ये कह कर उसका विरोध किया की जब तक सीमा पर गोलीबारी और पाकिस्तान द्वारा आतंकवादियों का समर्थन बंद नही किया जाता कोई बात नही होनी चाहिए।

अब -- जब सरकार कश्मीर पर भी बात करने को तैयार हो गयी है तो उसका कहना है की आखिर रास्ता तो बातचीत से ही निकलेगा।

                        इस तरह की पलटियां तो आप चाहे लगातार दो महीने लिखते रहें पूरी नही होंगी।

Thursday, August 20, 2015

Vyang -- एक दूरदर्शी नेता के अति-दूरदर्शी भाषण

गप्पी -- स्वतन्त्रता दिवस की पूर्ण संध्या पर महामहिम राष्ट्रपति ने देश को सम्बोधित किया। उनके भाषण के तुरंत बाद मोदीजी ने ट्वीट करके कह दिया की भाषण दूरदर्शी नही था। मोदीजी को मालूम था की ये एक भाषण था, अभिभाषण नही था। अभिभाषण वो होता है जो सरकार लिख कर देती है और राष्ट्रपति महोदय केवल पढ़ देते हैं। जैसे संसद सत्र के शुरू में होता है। सो मोदीजी ने इसे अदूरदर्शी करार दे दिया।
                       वैसे मुझे भी ये दूरदर्शी नही लगा। कारण एकदम साफ है। राष्ट्रपति भवन से संसद भवन की दूरी है ही कितनी। राष्ट्रपति महोदय राष्ट्रपति भवन में खड़े होकर संसद भवन की तरफ देख रहे थे। उन्हें संसद में बना हुआ अखाडा  दिखाई दे रहा था। जो इतने निकट की चीज देखता हो उसे दूरदर्शी कैसे मान लिया जाये।
                        अगले दिन लालकिले से प्रधानमंत्री का भाषण था। मेरे एक पड़ौसी सुबह सुबह नहा-धोकर मेरे पास आकर बैठ गए। सबकी तरह उन्हें और मुझे भी प्रधानमंत्री के दूरदर्शी भाषण का इंतजार था। भाषण शुरू हुआ। उसमे प्रधानमंत्री ने एक सचमुच दूरदर्शी भाषण दिया। उन्होंने अपने भाषण में कहा की जातिवाद और साम्प्रदायिकता को बर्दाश्त नही किया जा सकता। तब भी प्रधानमंत्री ने अपने आसपास बैठे बाबाओं और साध्विओं को नही देखा जो लगातार जहर उगल रहे हैं। इनमे उनके साथी सांसद भी शामिल हैं। लेकिन वो लोग इतने निकट हैं की दूरदर्शी प्रधानमंत्री को दिखाई नही दिए। ठीक उसी तरह जैसे उन्हें संसद नही दिखाई दे रही थी और UAE दिखाई दे रहा था।
                          कई लोग उनसे वन रैंक-वन पेंशन पर किसी घोषणा की उम्मीद कर रहे थे। उनके नजदीक में ही कई दिनों से पूर्व सैनिक प्रदर्शन कर रहे थे। लेकिन पूर्व सैनिकों से यही गलती हो गयी। उन्हें दूरदर्शी प्रधानमंत्री के इतने नजदीक प्रदर्शन नही करना चाहिए था। इतनी नजदीक की चीजें उन्हें कहां दिखाई देती हैं। हमारे यहां एक पुरानी कहावत है की पहाड़ पर जलती हुई आग तो दिखाई देती है पर पैरों के नीचे जलती हुई आग दिखाई नही देती। इसलिए मेरा एक छोटा सा सुझाव है पूर्व सैनिकों को की यदि वो चाहते हैं की प्रधानमंत्री को उनकी समस्या दिखाई दे तो उनको अमेरिका के मैडिसन स्कवेयर में प्रदर्शन करना चाहिए। वो उन्हें जरूर दिखाई देगा।
                        उसके बाद प्रधानमंत्री सीधे भृष्टाचार पर आये। उन्होंने कहा की पंद्रह महीने के शासन में उनकी सरकार पर एक पैसे के भृष्टाचार का आरोप नही है। मेरे पड़ौसी को तो ये सुनते की हंसी का ऐसा दौरा पड़ा की वो पेट पकड़ कर सोफे से नीचे लुढ़क गए। हमने बड़ी मुश्किल से उन्हें इसी हालत में घर पहुंचाया। वहां भी वो बिस्तर पर पेट पकड़ कर दोहरे हुए जा रहे थे। उनकी हालत में जब कोई सुधार नही हुआ तो मैं उन्हें वैसे ही छोड़कर वापिस आ गया। मुझे समझ नही आया की इसमें प्रधानमंत्री ने कौनसी गलत बात कह दी। उन्हें अगर शुषमा स्वराज, शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे नही दिखाई दे रहे थे तो इसमें उनका क्या कसूर है। उन्हें नजदीक की चीजें कहां दिखाई देती हैं। एक दूरदर्शी प्रधानमंत्री को तो केवल दूर की चीजें ही दिखाई देंगी न।
                       उसके बाद प्रधानमंत्री अपने वायदों पर आ गए। उन्होंने कहा की हमने अपने सभी वायदे पूरे कर दिए। मैंने सोचा की अच्छा हुआ मेरे पड़ौसी पहले ही चले गए वरना पड़ोस में उलाहना हो जाता। ये बात सुनकर उनका जो हाल हुआ होता उसके बाद मैं उसके घर वालों को क्या जवाब देता। अब प्रधानमंत्री ने जो भी वायदे किये थे वो केवल पंद्रह महीने पहले ही तो किये थे। इतने नजदीक के वायदे उन्हें कैसे दिखाई देते। लोग है की इस तकनीकी समस्या को समझ ही नही पा रहे हैं। एक इतने दूरदर्शी नेता जिन्हे पंद्रह महीनो में अपना देश ही नही दिखाई दिया और बाकि दुनिया के नक्शे पर जितने देश हैं सब दिखाई दे रहे हैं उनसे इतने नजदीक के वायदों को देखने की उम्मीद करना कहां तक सही है। उन्हें दस दिन पहले पीडीपी के बारे में क्या कहा था और बाद में क्या कहा, दस दिन पहले एनसीपी के बारे में क्या कहा था और सीटें कम पड़ते ही क्या कहने लगे, और तो और वो हररोज परिवार वाद को कोसते हैं लेकिन अपने पास बैठे प्रकाश सिंह बादल, उद्धव ठाकरे, रामबिलास पासवान, रमन सिंह इत्यादि का परिवारवाद कभी दिखाई दिया। नही ना। तो इसमें उनका कोई दोष नही है। वो इतने दूरदर्शी हैं की उनको नजदीक की चीजें दिखाई नही देती। 
                       शाम को मैं अपने पड़ौसी का हालचाल जानने उसके घर गया। पहले तो वो मुझे देखते ही बहुत देर तक हँसा फिर थोड़ा संयत होकर बोला भाई साब क्या मोदीजी ने कोई और चुलकुला सुनाया। मुझे तो मालूम ही नही था की मोदीजी की सेंस ऑफ ह्यूमर इतनी अच्छी है। अब मैं क्या जवाब देता। 
खबरी -- ये बात तो ठीक है लेकिन जब लोग आपके भाषणो को चुटकुला समझना शुरू कर दें तो आपको सावधान हो जाना चाहिए।

Wednesday, August 5, 2015

Vyang -- शुषमा जी का नया ज्ञान बोध, कौन ललित मोदी ?

गप्पी -- शुषमा जी अब तक कह रही थी की उन्होंने ललित मोदी की मदद मानवीय आधार पर की थी। उनके इस पर कई ट्वीट हैं। अब उन्होंने संसद में कह दिया है की मैंने ललित मोदी की कोई मदद नही की। मुझे पूरी उम्मीद है की कुछ दिन बाद शुषमा जी ये कह सकती हैं की - ललित मोदी ! कौन ललित मोदी ?

           शुषमा जी को ये ज्ञान बोध अभी अभी हुआ है। जैसे उन्हें ये ज्ञान बोध भी अभी अभी हुआ है की संसद की कार्यवाही को रोकना ठीक नही है। हमे ही नही पूरे देश को याद है जब शुषमा जी संसद में गरज गरज कर कह रही थी की,

                              तू इधर उधर की बात न कर , ये बता काफिला क्यों लुटा ,

                              मुझे रहजनों से गिला नही ,  तेरी रहबरी पर सवाल है। 

                शायद शुषमा जी इसका मतलब भी भूल गयी होंगी। वो एक परफेक्ट भारतीय महिला हैं। उन्होंने सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए अपने बाल कटवाने की घोषणा की थी। एक विदेशी महिला को रोकने के लिए। परन्तु देश ने सोनियाजी को जीता दिया उनके मुकाबले में। ये तो भला हो खुद सोनियाजी का जिन्होंने प्रधानमंत्री ना बनने की घोषणा कर दी और शुषमा जी के बाल, बाल-बाल बच गए। 

                      लेकिन देश को शुषमा जी का नया बयान रास नही आ रहा है। अभी थोड़े दिन हुए हैं ना इसलिए, कुछ दिन बाद लोग ये भूल जायेंगे। शुषमा जी ने शुरू दिन से ललित मोदी प्रकरण पर जो सफाई दी है उस पर मुझे एक कहावत याद आ रही है। 

                      एक आदमी पर अदालत में किसी से मारपीट का मुकदमा चल रहा था।  जज ने उससे पूछा की उसे अपनी सफाई में क्या कहना है।  उस आदमी ने कहा की उसे अपनी सफाई में तीन बातें कहनी हैं। 

              पहली - ये  की वो उस दिन घटनास्थल पर था ही नही। 

               दूसरी -- अगर अदालत चाहे तो वो अपनी कलकत्ता वाली मौसी या चेन्नई वाले मामा को अदालत में पेश कर सकता है जो इस बात की गवाही देंगे की वो उसदिन उनके पास था। 

               और तीसरी -- ये की पहले थप्पड़ उसने मारा था। 

        शुषमा जी कह सकती हैं की ये कहावत सिर के बल खड़ी थी और उसने उसे सीधा खड़ा कर दिया। 

       शुषमा जी और उनके सहयोगियों को ये भी नया नया ज्ञान बोध हुआ है की सरकार के कामकाज में केवल कानून को देखा जाता है नैतिकता को नही। वरना पिछले दस साल के उनके भाषण निकाल कर देख लो उनमे नैतिकता पर इतना जोर दिया गया है जितना किताबों में भी नही मिलता। 

               मैं तो कहता हूँ शुषमा जी, अगर संसद में इस मामले पर चर्चा हो और उसमे स्वराज कौशल या बांसुरी कौशल का नाम आये तो कह देना की कौन स्वराज कौशल, कौन बांसुरी कौशल। बाद में इस पर कह देना की जब वो संसद में आती हैं तो सारे रिश्ते-नाते बाहर छोड़ कर आती हैं। और उन्हें देश सेवा में ये छोटी छोटी बातें याद नही रहती। इस पर तालियां बजाने के लिए आपके साथी संसद सदस्य और सोशल मीडिया में बैठे भाड़े के लोग तो हैं ही। 

                      वैसे एक लिस्ट बना लीजिये की आपको क्या-क्या याद रखना है और क्या-क्या भूलना है। वरना कुछ लोगों की बुरी आदत है की पहले कहि गयी बातों को नई बातों को मिला कर देखते हैं। और उनमे ऐसा बहुत कुछ है जो आपने उस समय की सरकार को शर्मिन्दा करने के लिए कहा था। और उन्ही बातों को लोग आपको शर्मिन्दा करने के लिए इस्तेमाल कर सकते  हैं। वैसे मैं तो कहता हूँ की इतने झगड़े में पड़ने की क्या जरूरत है ? साफ साफ कह दीजिये की हमने करना था कर दिया। कर लो जो करना है। साथ में वाजपेयी जी की तरह कह दीजिये की अगर विपक्ष को एतराज है तो अविश्वास प्रस्ताव लाये। जाहिर है की बहुमत के आगे अविश्वास प्रस्ताव की क्या ओकात है। बस आप तो एक चीज का ध्यान रखिये, ये बात गलती से लोगों को मत कह देना। वरना इस देश की जनता ऐसा हांल कर सकती है की खुद आपको भी विश्वास ना हो। 

 

खबरी -- सही बात है। विपक्ष की सौ सुनार की के सामने एक लुहार वाली कर देनी चाहिए।

Monday, August 3, 2015

Vyang -- सरकार ( केवल ) चर्चा को तैयार है।

गप्पी -- संसद में कामकाज बंद है। सरकार कहती है की वो चर्चा के लिए तैयार है और विपक्ष चर्चा नही कर रहा है। विपक्ष कहता है की सरकार केवल चर्चा करना चाहती है कार्यवाही नही करना चाहती। दोनों पक्ष आमने सामने हैं। सदन में एक अध्यक्ष होता है जिसकी हालत घर  के उस बूढ़े जैसी है जिसकी इज्जत करने का दावा तो सभी करते हैं लेकिन उसकी सुनता कोई नही है। संसद की कार्यवाही इस तरह शुरू होती है। 

                 अध्यक्ष सदन में अपने आसन पर आकर बैठता है। विपक्ष के चार पांच सदस्य खड़े हो जाते हैं और कहते हैं की उन्होंने कार्यस्थगन का नोटिस दिया है। सत्ता पक्ष के चार पांच लोग खड़े हो जाते हैं और प्रस्ताव का विरोध करते हैं। अध्यक्ष प्रस्ताव को ख़ारिज कर देता है। सदन में हो हल्ला होता है और सदन के अध्यक्ष घोषणा करते हैं की कार्यस्थगन क्या पूरा सदन ही दोपहर तक स्थगित किया जाता है। हमारे यहां ये रिवाज है की कार्य को स्थगित करने की बजाय पूरा सदन ही स्थगित कर दिया जाता है। 

                  गांव से कुछ लोग मंत्रीजी से मिलने संसद भवन पहुंचते हैं। 11 बजने वाले हैं, सदन की कार्यवाही शुरू होने वाली है। मंत्रीजी गांव वालों को कहता है की मैं अभी आया पंद्रह मिनट में। तुम तब तक संसद की कैंटीन में सब्सिडी वाला नाश्ता करो। सदन की कार्यवाही शुरू होती है। मंत्री खड़ा होकर कहता है की सरकार चाहती है की सदन चले। मुझे मालूम है की मंत्री झूठ बोल रहा है। वो गांव वालों को पंद्रह मिनट का समय देकर आया है। पहले इस तरह का मजाक लोग हमारी किर्केट टीम के लिए करते थे की बैट्समैन चाय वाले को चाय बनाने की बोलकर बैटिंग करने जाता था और जब तक चाय बनती थी वापिस आ जाता था। 

                 मान लो कार्यवाही चले भी और चर्चा हो तो ऐसी होगी,

विपक्ष -- तुमने घोटाला किया है। 

सरकार -- हमने घोटाला नही किया है। 

विपक्ष --  तो जो शुषमा जी ने किया वो क्या था ?

सरकार -- उसे घोटाला नही मदद कहते हैं। 

विपक्ष -- तुमने एक अपराधी की मदद क्यों की ?

सरकार -- मदद हमारी परम्परा है हम उसमे भेदभाव नही करते। 

विपक्ष -- तो इस्तीफा भी तो परम्परा है। 

सरकार -- हम कांग्रेस की परम्परा को नही मानते। 

विपक्ष -- इस्तीफा दो। 

सरकार -- नही देंगे। 

                                    चर्चा समाप्त। 

           मैं तो कहता हूँ की गलती विपक्ष की है। उसे मंत्रियों का इस्तीफा चाहिए था तो प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांगना चाहिए था। क्योंकि हमारे यहां ऐसा ही होता है। 

                   विपक्ष कहता है की चर्चा करो। 

                    सरकार कहती है की चर्चा नही हो सकती। 

                  विपक्ष कहता है की मंत्री इस्तीफा दे। 

                    सरकार कहती है की चर्चा करो। 

                  विपक्ष कहता है की प्रधानमंत्री इस्तीफा दे। 

                     सरकार कहती है संबंधित मंत्री इस्तीफा देंगे। 

सो विपक्ष से चूक हो गयी। आजलक तो बच्चे भी इतने समझदार हो गए हैं की सौ रूपये चाहिए होते हैं तो पांच सौ मांगते हैं। अब विपक्ष हो हल्ला कर रहा है। सरकार सदस्यों को निलंबित करने का प्रस्ताव रख रही है। एक समय आएगा की पूरा विपक्ष निलंबित हो जायेगा। केवल सरकार के लोग बचेंगे। फिर चर्चा  होगी। लेकिन ऐसी चर्चा तो पार्टी की मीटिंग में भी हो सकती थी। संसद की क्या जरूरत थी। 

                       लेकिन बिल तो केवल संसद में ही पास हो सकते हैं। उसके बाद बिल पास होंगे। सरकार कहेगी इस बार संसद में 42 बिल पास हुए।  सारे बिल पूरे विचार-विमर्श और चर्चा बे बाद पास हुए। टीवी चैनल बताएंगे की इस बार रिकार्ड कामकाज हुआ। जनता संतुष्ट होगी की संसद पर हो रहा खर्चा बेकार नही गया। 

 

खबरी -- देश को ये बताया जा रहा है की संसद का काम केवल उसके खर्चे के हिसाब से बिल पास करना है।

Sunday, July 26, 2015

Vyang -- मोदीजी की " मन की बात ", मजा आ गया !

खबरी -- मोदीजी ने अभी जो "मन की बात" की है उस पर तुम्हारा क्या कहना है ?


गप्पी -- क्या  कहना है ? अरे ! मैं कहता हूँ की मजा आ गया। जिस दिन से इस बात का जिक्र हो रहा था की मोदीजी मन की बात करने वाले हैं उसी दिन से कोहराम मचा हुआ था। सारा मीडिया कयास लगा रहा था। लोग इंतजार में घड़ी देख रहे थे। विपक्ष के लोगों की दिल की धड़कन तेज हो रही थी। सबको लगता था की मोदीजी अब तो कम से कम भृष्टाचार के आरोपों पर बोलेंगे। देखते हैं क्या कहते हैं। सुषमाजी और वसुंधराजी की सफाई किस तरह देंगे। ललित मोदी पर क्या कहेंगे। पर सब धरे रह गए। मोदीजी ने एक शब्द नही बोला। अब बोलो क्या बोलते हो। सबके चेहरे उतरे हुए थे। कुछ हाथ में नही आया। कुछ लोगों का अनुमान था की संसद न चलने पर विपक्ष को कोसेगे , आरोप लगाएंगे की विपक्ष देश की तरक्की में अड़ंगा डाल  रहा है। पर नही बोले। कुछ लोगों में तो शर्तें लगी हुई थी। एक कह रहा था की ये बोलेंगे, दूसरा कह रहा था की नही, ये बोलेंगे। दोनों हार गए। मैं  तो कहता हूँ की क्रिकेट पर सट्टा लगाने वाले अगर इस बात पर सट्टा लगाएं की प्रधानमंत्री मन की बात में किस बात पर बोलेंगे तो ज्यादा बड़ा काम हो सकता है। प्रधानमंत्री का मन समझना भरतीय टीम के स्कोर के अनुमान से ज्यादा कठिन है।

                       मैं कहता हूँ की मजा आ गया। प्रधानमंत्री जी आपके मन को कौन समझ सकता है। लोग इसे ना तो चुनाओं के पहले समझ पाये और ना बाद में। इस बात को आपने साबित कर दिया की आप किसी के हाथ आने वाले नही हैं। देश में एक से एक बड़ा मसला पड़ा है। चर्चाएं चल रही हैं। लेकिन आप बोले सड़क दुर्घटनाओं पर। विपक्ष के लोगों को छोडो, मीडिया और खुद बीजेपी के लोग तक अनुमान नही लगा पाये। आपकी कपैसिटी पर जिन लोगों को संदेह था शायद अब दूर हो गया हो। आपकी महिमा उनको समझ में आ गयी हो। इतने जलते हुए सवालों के बीच से आप यों साफ निकल गए की देखते ही बनता था।

                                परन्तु आपकी एक बात मुझे समझ में नही आई। आपने पंद्रह अगस्त के भाषण के लिए लोगों से सुझाव क्यों मांगे। मैं कहता हूँ की ये आपने ठीक नही किया। लोग तो भरे बैठे हैं। पता नही क्या-क्या सुझाव भेज देंगे। आपके पास कौनसा मुद्दों का अकाल पड़ा है जो आप उनसे पूछ रहे हैं। इस देश के लोगों की सोच बहुत छोटी है। ये अब तक बेरोजगारी, महंगाई जैसे तुच्छ चीजों और मुद्दों से ऊपर नही उठ पाये हैं। सो इनसे कुछ मत पूछा करो। इन बेवकूफों को तो ये भी नही पता की चुनाव से पहले के और चुनाव के बाद के, दोनों मुद्दे अलग अलग होते हैं।

                                मैं तो कहता हूँ की आपने इतने देशों की यात्रायें की हैं। पंद्रह अगस्त पर आप उन यात्राओं के अनुभव सुना सकते हैं। एकदम नई बात हो जाएगी। अगर कोई भारी भरकम मुद्दा चाहिए जैसे विज्ञानं वगैरा से संबंधित तो आप कैपलर नाम के उस ग्रह पर बोल सकते हैं जिसे नासा ने अभी अभी खोजने का दावा  किया है। आप इस पर अपना दावा भी ठोंक सकते हैं की हमारा है। आप कह सकते हैं की यह ग्रह उन हाथियों से बना है जो महाभारत के युद्ध में भीम ने फेंके थे। जब से आपने गणेश के सर पर भरतीय वैद्यों द्वारा सर्जरी  से हाथी का सिर जोड़ने की बात कही है वैज्ञानिक लोग आपको गंभीरता से नही लेते। सो इस पर कोई विवाद खड़ा नही होगा और आपको अमरीका का समर्थक कहने वालों को बोलती भी बंद हो जाएगी । पंद्रह अगस्त देखने आई भीड़ इस पर तालियां जरूर बजाएगी। लेकिन लोगों से सुझाव मत मांगीये। ये पता नही क्या कह देंगे।

Vyang -- लो बदल दिया नाम, सारे मसले हल

खबरी -- सुना है मध्यप्रदेश सरकार ने व्यापम का नाम बदल दिया ?

गप्पी -- ये बहुत अच्छा किया। बहुत बदनामी हो रही थी। वैसे तो शैक्सपीयर ने कहा था की नाम में क्या रक्खा है। परन्तु अब समय बदल गया है। अब नाम में बहुत कुछ रक्खा है। कुछ नाम दूसरी चीजों के पर्याय हो जाते हैं। जैसे कोलगेट टूथपेस्ट का पर्याय हो गया। डालडा वनस्पति घी का पर्याय हो गया। लोग नाम किसी चीज का लेते हैं और मगज में छवि किसी दूसरी चीज की होती है। जैसे बोफोर्स का नाम आते ही घोटाला याद आने लगता था। उसी तरह व्यापम की हालत हो गयी थी। व्यापम का नाम आते ही श्मशान याद आने लगता था। रात को कोई व्यापम का जिक्र कर देता तो डर के मारे रोंगटे खड़े हो जाते थे। दहशत होने लगती थी। 

                  नाम बदलने के पीछे सरकार की दूसरी मजबूरियां भी रही होंगी। जहां व्यापम का दफ्तर है उस सड़क से लोगों ने डर के मारे आना जाना बंद कर दिया होगा। और एक सड़क बेकार हो गयी होगी। दूसरा जब कोई नई नौकरी या दाखिला निकलता होगा तो बहुत से बच्चे डर के मारे फार्म ही नही भरते होंगे। घर में छोटी मोटी  कहासुनी होने पर संतान व्यापम का फार्म भर देने की धमकी देती होगी। व्यापम का नाम आते ही पता नही किस किस का चेहरा आँखों के आगे घूम जाता होगा। मुझे तो लगता है की कर्मचारियों ने व्यापम में काम करने से इंकार कर दिया होगा परन्तु सरकार ये बात दबा गयी होगी। सो उसने इस मसले का हल निकाल दिया। उसने व्यापम का नाम बदल दिया। अब अगर कोई संसद में या बाहर व्यापम घोटाले का मामला उठाएगा तो बीजेपी और शिवराज सिंह कह सकते हैं, ' कौनसा व्यापम ? हमारे यहां तो कोई व्यापम है नही। आपके यहां है क्या। " सामने वाला चुप हो जायेगा। 

                     दूसरा राजनीती में नाम बदलने का उतना ही महत्त्व है जितना पार्टी बदलने का। महाराष्ट्र के चुनाओं में बीजेपी ने एनसीपी का नाम बदल कर नैशनल करप्ट पार्टी रख दिया। चुनाव खत्म हो गए। कुछ सीटें कम पड़ी तो शिवसेना ने आँख दिखानी शुरू कर दी। शरद पवार ने समर्थन की पेशकश की तो मोदीजी ने एनसीपी का नाम बदल कर " नैशनल कॉपरेटिव पार्टी " कर दिया। उसी तरह जम्मू-कश्मीर के चुनाव में बीजेपी ने पीडीपी का नाम बदल कर " बाप-बेटी कश्मीर लूटो पार्टी " रख दिया। लोगों ने फिर धोखा दे दिया। बीजेपी ने पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बना ली और पीडीपी का नाम बदल कर " कश्मीर विकास पार्टी "  रख दिया। 

                     अब बिहार में चुनाव आ रहे हैं तो ना जाने कितने नए नाम सुनने को मिलेंगे। शुरुआत भी हो गयी। मोदीजी ने RJD का नाम बदल कर " रोजाना जंगलराज का डर " पार्टी रख दिया। लालूजी कहाँ कम थे उन्होंने बीजेपी का  नाम बदल कर " बेशर्म और झूठी पार्टी " रख दिया। मोदीजी ने नितीश पर मांझी को हटाने को लेकर " महादलित का अपमान " करार दे दिया। बिहार के कई लोग कह रहे हैं की ये बीजेपी ही थी जिसने मांझी को कहीं का नही छोड़ा। 

                          उसी तरह नाम ही नही वायदे और नारे भी बदल रहे हैं। लोकसभा चुनाव में मोदीजी ने नारा दिया था, " कालाधन वापिस लाओ ' वायदा किया था सबको 15 -15 लाख देंगे। सारे युवाओं को रोजगार देंगे। अब नया नारा है " 24 घंटे बिजली देंगे " नया वायदा है की बिहार के लोगों को बिहार में ही काम देंगे। मोदीजी सोच रहे होंगे ये कोई दूसरे लोग हैं और लोकसभा चुनाव में दूसरे लोग थे। भूल गए होंगे, काम का दबाव रहता है। मोदीजी कह रहे हैं की बिहार को 50000 करोड़ से ज्यादा देंगे। नितीश कह रहे हैं की दे दो कौन रोक रहा है ? मोदीजी कह रहे हैं की सही समय पर इसकी घोषणा करेंगे। लोग हंस रहे हैं की नया जुमला है। 

                        कांग्रेस आरोप लगा रही है की सरकार हमारी योजनाओं का नाम बदल बदल कर वहीं  योजनाएं लागु कर रही हैं। मैं कहता हूँ की योजनाएं ही क्यों, सरकार तो हर वह काम कर रही है जो कांग्रेस करती थी। परन्तु सरकार के मंत्री इस बात के सख्त खिलाफ हैं। राजनाथसिंह कहते हैं की हमारा कोई मंत्री आरोप लगने पर UPA सरकार की तरह इस्तीफा नही देगा। बोलो फर्क हुआ की नही। अरुण जेटली जी कहते हैं की पहले हम कहते थे की संसद को चलाने की जिम्मेदारी सरकार की होती है अब हम विपक्ष से संसद चलाने की मांग को लेकर धरना दे रहे हैं। बोलो फर्क है की नही। शुष्मा जी पहले कहती थी मंत्री के पद पर रहते निष्पक्ष जाँच सम्भव ही नही है, अब कहती हैं की बिना आरोप सिद्ध हुए इस्तीफा कैसे ? बोलो फर्क हुआ की नही 

                सो राजनीती में नाम, वायदे, नारे और बयान बदलने का अपना महत्त्व है।

Monday, June 22, 2015

हरी अनन्त, हरी कथा अनन्ता - आधुनिक महाभारत की कथा

गप्पी -- जिस तरह हरी ने इस संसार की रचना की, समय समय पर अवतार लेकर धर्म की रक्षा की, असंख्य लीलाएँ की और लोगों को संदेश दिए, उससे हरी कथा अनन्त हो गयी है। उसी तरह एक संसार की रचना और की गयी जिसे आईपीएल का संसार कहा जाता है। इस संसार के रचयिता ललित प्रभु हैं। इनकी कथा भी उतनी ही अनन्त है। जैसे जैसे इसका संसार लोगो के सामने दृष्टिगोचर हो रहा है इसका अनन्त स्वरूप सामने आ रहा है। कहते हैं की भगवान के हजारों नाम हैं उनमे एक नाम ललित भी है। इसमें एक महाभारत की शुरुआत हो गयी है। परन्तु इसके पात्र बदल गए हैं। किसी को समझ नही आ रहा है की कौन किसकी तरफ है।

                        इस युद्ध के महान धनुर्धर नरेन्द्र युद्ध के मैदान के बीचों बीच खड़े हैं। पहली महाभारत की तरह इस बार वो युद्ध से भागते नही हैं। परन्तु उन्हें समझ नही आ रहा है की वध किसका करना है। दुश्मन के खेमे से आवाज आ रही है की उसे अपने ही पक्ष के योद्धाओं में से कुछ का वध कर देना चाहिए। वो प्रभु  की तरफ देखते हैं। प्रभु  अपना विराट रूप दिखाते हैं। ये रूप इतना विराट है की धरती के दोनों छोरों तक फैला हुआ है। इसमें उन्हें सुषमा स्वराज का सिर दिखाई देता है अपने पूरे परिवार के साथ, वसुन्धरा राजे का सिर भी है अपने पुत्र के साथ, शशि थरूर का सर भी है , शरद पवार और प्रफुल्ल पटेल का सर भी है। महाराष्ट्र के पुलिस कमिशनर राकेश मरिया का सिर भी है। और भी न जाने कितने सिर हैं जिनकी शक्लें अभी साफ नही हैं। अर्जुन, मेरा मतलब है की नरेन्द्र असमंजस में हैं। प्रभु  धीरे धीरे मुस्कुरा रहे हैं और कह रहे हैं की वत्स," देख लो और पहचान लो, कौन दुश्मन है और कौन साथी ," नरेंद्र हक्के बक्के खड़े हैं। धीरे से पूछते है की प्रभु क्या मुझे भी आपकी तरह रण छोड़ कर भागना पड़ेगा।

                      परन्तु ये आधुनिक युग के प्रभु हैं। इन्हे मालूम था की कानून नाम के जरासंघ से वो हार सकते हैं। इसलिए युद्ध शुरू होने से पहले ही निकल लिए। अब लन्दन नाम की नई द्वारका में बैठकर ताल ठोँक रहे हैं की मैं जरासंघ से डरता नही हूँ। कंस के द्वारपालों को रिश्वत दे कर भाग निकले और अब वेनीश और मलेशिया में गोपियों के साथ रास रचा रहे हैं।

                          प्रभु  उपदेश देते हैं की मित्र अपने पिता देवेन्द्र से बात करके दो एक मेनका मंगवा लो और दुश्मन पक्ष के कुछ योद्धाओं को भेज दो। नरेन्द्र निराशा से कहते हैं की प्रभु सीबीआई नाम की मेनका को दुश्मन के दो बड़े योद्धाओं शंकर सिंह वाघेला और वीरभद्र सिंह के पास भेज चुके हैं। उसने अपने जाल में उनको फंसा भी लिया है परन्तु दुश्मन खेमा फिर भी मजबूत नजर आ रहा है। हमने जिन दो मोर्चो पर महिला योद्धाओं को लगा रक्खा है उनके बारे में अब कुछ साथी कहते हैं की ये कमजोर कड़ी हैं इन्हे बदल दो, वरना युद्ध हारने  का खतरा है। हमने उनको बदलने का सोचा ही था की उन्होंने संदेश भेज दिया की अगर उन्हें बदला गया तो वो अपनी सेना साथ में लेकर चली जाएँगी।

                       इसलिए हे प्रभु बहुत कन्फ्यूजन है , उचित मार्गदर्शन दीजिये।

प्रभु फिर मुस्कुराते हैं और कहते हैं की," हे संघेय ! तुमने मेरे साथ ठीक नही किया। तुम्हारे नियुक्त किये हुए पुजारी मेरा सारा चढ़ावा खा गए। जबकि तुमने वादा  किया था की न खाऊंगा और न खाने दूंगा।"

             नरेंद्र मुश्किल की मुद्रा में कहते हैं की हे प्रभु, आपने वचन के अनुसार अपनी पूरी यादव सेना तो दुश्मन को दे दी और खुद मेरी तरफ आने की बजाए द्वारका निकल गए। अब मेरे रथ का सारथी नही मिल रहा है। हमारे पक्ष में जिस एकमात्र योद्धा को रथयात्रा का अनुभव था हमने बब्रुवाहन की तरह उनका सिर युद्ध की शुरुआत में  उनके ही हाथों कटवा दिया था कुल की रक्षा के लिए। अब उनका कटा हुआ सिर भी अंट शंट बोलता रहता है। हमारे मराठा नरेश शल्य की भूमिका में आ गए हैं। लड़ भी हमारी तरफ से रहे हैं और गालियां भी हमे ही दे रहे हैं। अभिमन्यु अब दूध पिता बच्चा नही रहा। वो अब मगध नरेश है। हमने जिस चक्रव्यूह का निर्माण उसको  मारने  के लिए किया था उसमे वो भीम को साथ में लेकर घुस गए हैं। हमने दुशासन और जयद्रथ को भेजा तो है परन्तु वहां से खबर आ रही है की वो आपस में लड़ रहे हैं। इसलिए बहुत मुश्किल समय है प्रभु, अगर इस समय में उचित मार्गदर्शन नही मिला तो आपका ये मित्र और भक्त युद्ध हार सकता है। ऊपर  से आप अपने विराट रूप में जब राजीव शुक्ला का चेहरा दिखाते हैं तो साथ में अरुण जेटली का भी दिखा देतें हैं। अब हमारे पास कोई शकुनि भी नही है और हम केवल सुब्रमणियम स्वामी के भरोसे हैं। इसलिए हे माधव हमारी गलतियों को क्षमा करके इस मुसीबत से निकालिये।

           लड़ाई जारी है। भगवान के विराट रूप में और किस किस के सिर लगे हैं ये धीरे धीरे साफ हो रहे हैं। ये युद्ध कौरवों और पांडवों के बीच नही है। लोगों को लग रहा है की दोनों तरफ कौरव हैं। दोनों खेमे केवल एक दूसरे पर ही हमला नही कर रहे हैं बल्कि अपने पक्ष के योद्धाओं पर भी हमले हो रहे हैं। एक ही चीज एक जैसी है की प्रभु तब भी बिना हथियार उठाये सबको मार रहे थे और अब भी बिना हथियार उठाये संहार कर रहे हैं। हे प्रभु तेरी लीला अनन्त है। 

खबरी -- ये युद्ध भी अट्ठारह दिन में खत्म हो जायेगा क्या ?

Sunday, June 14, 2015

मानवीय आधार के बदलते तर्क

खबरी -- विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा है की उन्होंने ललित मोदी की मदद मानवीय आधार पर की थी। 


गप्पी --  बीजेपी और आरएसएस के मानवीय आधार के तर्क सुविधा के अनुसार बदल जाते हैं। जब कोई मानव अधिकार संगठन किसी झूठी मुठभेड़ का मामला उठाता है भले ही उसमे मरने वालों में सारे निर्दोष लोग हों तो ये लोग हल्ला मचाते हैं की इन संगठनो को केवल उग्रवादियों के मानव अधिकार क्यों दिखाई देते हैं। क्या अब ये लोग बताएंगे की बीजेपी के नेताओं को मानवीय आधार पर मदद करने के लिए सारे घोटालेबाज ही क्यों मिलते हैं। 

               क्या ये सही नही है की श्रीमती सुषमा स्वराज की बेटी ललित मोदी की वकील हैं। सारे घोटालेबाजों को नेताओं के रिश्तेदार वकील ही क्यों मिलते हैं। क्या ये भी सही नही है की सुषमा स्वराज के पति स्वराज कौशल ने अपनी भतीजी का दाखिला ब्रिटेन के कालेज में करवाने के लिए ललित मोदी की सहायता ली थी। इस पर सुषमा स्वराज ने कहा है की उसका दाखिला 2013 में हुआ था और उस समय वो मंत्री नही थी। जब नरेंद्र तोमर ने जाली डिग्री ली थी क्या वो मंत्री थे। 

                 आपकी बेटी ललित मोदी की वकील हैं और आपकी भतीजी का दाखिला ललित मोदी करवाते हैं क्या अब भी इसे "लाभों की अदला बदली - Conflict Of Interest " का मामला न माना जाये।

                  या फिर आप मनुस्मृति (स्मृति ईरानी नही ) के हिसाब से न्याय में विश्वास रखते हैं की अगर कोई अछूत ब्राह्मण को गाली  दे तो उसकी जुबान काट दी जाय और अगर कोई ब्राह्मण अछूत की हत्या कर दे तो उसे कुत्ते की हत्या के बराबर दण्ड दिया जाये। कोई दूसरी पार्टी का नेता अगर भ्रष्टाचार  करे तो फांसी चढ़ा दो और बीजेपी का कोई नेता भ्रष्टाचार करे तो उसे देश हित  में माना जाये।