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Wednesday, September 23, 2015

Vyang -- आए दिन बिहार के ( Aaye Din Bihar Ke )

बिहार सुंदरी का स्वयंबर हो रहा है। पुरे देश से महारथी अपने पुरे जोश के साथ, मूछों को खिजाब लगाकर बिहार पहुंच रहे हैं। बिहार सुंदरी को लुभाने के लिए अलग अलग तोहफे और वायदों की भरमार लगी हुई है। मुझे महाभारत में द्रोपदी का स्वयंबर याद आ रहा है। उसमे ही आधा महाभारत तो हो गया था। इसमें भी आधा तो जरूर होगा। कुछ विशेषज्ञ तो पुरे महाभारत की उम्मीद कर रहे हैं। 
                           लोकतंत्र की सुंदरी वरमाला लिए बिहार के आँगन में खड़ी है। 
 ऊपर मछली घूम रही है। नीचे बड़े बड़े धनुर्धारी लक्ष्यवेध को तैयार खड़े हैं। एक बार फिर महारथी कर्ण अपने धनुष के साथ मौजूद हैं। पिछला घटनाक्रम उन्हें याद है इसलिए इस बार अर्जुन को सबक सिखाने की पूरी तैयारी है। धनुष लेकर आगे बढ़ते हैं। तभी पीछे से आवाज आती है, " पहला अवसर मेरा है। " अर्जुन व्यवस्था का प्रश्न उठाते हैं। दादी सफेद हो गयी है। पूरा परिवार साथ में मौजूद है लेकिन कृष्ण नही दिखाई दे रहे। 
        " क्योंकि मैं सूत पुत्र हूँ इसलिए ?" कर्ण मुस्कुराते हैं। क्योंकि कर्ण जानते हैं की समय बदल चूका है। अब सूत पुत्र होना अयोग्यता का नही बल्कि योग्यता का परिचायक माना जाता है। और कर्ण इस बात को दोहराने का कोई मौका नही छोड़ते। 
         " नही, सूत पुत्र तो मैं भी हूँ। गुजरात में हमारी जाती को सूत मन जाता है। और उससे भी आगे की बात ये है की मैंने तो चाय भी बेचीं है। सो एक गरीब के पुत्र को पहला अवसर मिलना ही चाहिए। " अर्जुन ने प्रतिवाद किया। 
           " लेकिन इससे ये पूछा जाये की ये स्वयंबर में किसके लिए भाग ले रहे हैं। खुद तो ये शादी कर नही सकते। और जिस तरह पिछली बार हुआ था की इनकी माता ने तुम्हे पांच-पांच पतियों की पत्नी बना दिया था। इस बार तो 20-25 दावेदार हैं। इसलिए इन्हे तो मौका ही नही मिलना चाहिए। इनसे कहा जाये की ये पहले दूल्हे का नाम बताये। " कर्ण ने ठीक वहां चोट की जो सबसे कमजोर जगह थी। 
            " लेकिन ये कर्ण तो विश्वास घाती है। मैंने इसे अंगदेश का राजा बनाया। ये सोचकर की ये पिछली बार की तरह मेरा साथ देगा। लेकिन इसने पाला बदल लिया। ऐसे विश्वास घाती को तो तुम किसी भी तरह नही चुन सकती। " अर्जुन ने अगला पासा फेंका। 
             " तुमने मुझे अंगदेश का राजा बनने में मेरी सहायता की लेकिन तुमने पिछली बार इस एक अहसान की कितनी बड़ी कीमत वसूल की थी मुझे याद है। तुमने मुझे मेरे ही भाइयों के खिलाफ लड़ने के लिए मजबूर किया। उस समय तुम दुर्योधन के रूप में थे। इस बार तो तुमने मुझे अंगदेश के राज्य से हटाने का पूरा प्रयास किया लेकिन वो तो अच्छा हुआ यादव मेरी मदद को आ गए। सो अब तुम्हारा कोई अहसान बचता नही है। इस बार यादव पिछली बार की तरह तुम्हारे साथ नही मेरे साथ हैं। " कर्ण ने हिसाब चुकता किया। 
              अब अर्जुन के पास दूसरा कोई बहाना बचता नही था सो उसने एकाएक कुछ याद करते हुए कहा ," हम तुम्हारे लिए लाखों करोड़ के गहने और दूसरी सामग्री लेकर आये हैं। अगर तुम हमारा वरण करोगी तो हम तुम्हे सोने से लाद देंगे। " अर्जुन के साथ आए राज्य के लेखाकार ने तुरंत एक सूची सामने कर दी। 
               " इन पर भरोसा मत करना द्रोपदी। ये जो लिस्ट लेकर आये हैं उसमे तुम्हारे पुश्तैनी गहनो को भी शामिल कर लिया है। ये वो गहने हैं जो सालों पहले तुम्हे उपहार में देने की घोषणा की जा चुकी है लेकिन दिए नही गए थे। इन पर तुम्हारा पूरा अधिकार है। ये धोखेबाजी अब नही चलेगी। " कर्ण ने सख्ती से इसका विरोध किया। 
                   लोकतंत्र की सुंदरी परेशान है। सभी तरफ से दावे किये जा रहे हैं। लेकिन कोई मछली पर निशाना नही लगा रहा। सारा फैसला बातों से ही करना चाहते हैं। उसने सिर ऊपर उठाया और घोषणा की। आप लोग इधर उधर की बातें मत करिये और मछली पर निशाना लगाइये। इसमें पहले पीछे का कोई सवाल नही है। अब हमारी समझ में सब आ चूका है। सबको मौका मिलेगा और जरूरी हुआ तो इसके कई दौर भी हो सकते हैं। हमने टेनिस में फैसले के लिए पांच-पांच दौर भी देखे हैं। हमने आयोग बनाया है और वो पूरी प्रतियोगिता संचालित करेगा। और ये मत समझना की इस प्रतियोगिता में तुम दोनों ही हो। बाहर और भी लोग है जो प्रतियोगिता में भाग लेने आये हैं। हो सकता है की उनमे एकलव्य भी हो। 
                       एकलव्य का नाम सुनकर अर्जुन और कर्ण दोनों के माथे पर पसीने की बुँदे छलछला आई। 

खबरी -- मुझे साठ के दशक की एक फिल्म याद आ रही है " आये दिन बहार के " और उसके एक गाने को यों भी गाया जा सकता है। " ये वादे जब तलक हकीकत बने, इंतजार, इंतजार, इंतजार करो "

             
        

Tuesday, September 22, 2015

Vyang -- दिल्ली पर हमले के लिए डेंगू के मच्छरों की मीटिंग


 डेंगू के मच्छरों की एक गुप्त मीटिंग दिल्ली के एक पॉस इलाके की पानी की खाली टंकी में हो रही थी। सुरक्षा का  पूरा ध्यान रक्खा गया था। यहां मीटिंग करने के पहले इस जगह की कई दिन रेकी की गयी थी और जब पूरा विश्वास हो गया तभी ये जगह फाइनल की गयी थी। इस मीटिंग में मच्छरों के एक बड़े केंद्रीय नेता पहुंच रहे थे। इस नेता  ने पूरा एक सत्र संसद भवन में गुजारा था।उसने अलग अलग पार्टियों के नेताओं का खून पीकर इंसान की फितरत को ठीक तरीके से समझा था और वही आज अपने अनुभव बाँटने यहां पहुंचे थे। सही समय पर मीटिंग शुरू हुई।
नेताजी ने बात शुरू की। " हम लोग मिलकर डेंगू का अगला बड़ा हमला दिल्ली पर ही करेंगे। क्योंकि सुरक्षा की दृष्टि से भी ये ज्यादा ठीक रहेगा। दूसरा फायदा ये होगा की दिल्ली पर हमला होने से हमे मीडिया कवरेज भी भरपूर मिलेगी। मैंने इतने दिन में ये अच्छी तरह जान लिया है की हमारे मीडिया के लोग दिल्ली से बाहर निकलने में बिलकुल दिलचस्पी नही रखते। वो ज्यादातर मुख्य समाचार यहीं बैठे बैठे बनाते हैं। फिर चाहे वो समाचार डेंगू का हो या सनी लिओन का। दूसरा फायदा ये है की यहां सरकार के तीनो विभाग आपस में इतनी बुरी तरह से लड़ रहे हैं की वो हमारे खिलाफ कोई असरदार फैसला ले ही नही सकते। सरकारें वैसे भी काम करने में कम ही विश्वास रखती हैं और यहां तो ये हालत है की अगर केजरीवाल कुछ करना चाहेंगे तो केंद्र की सरकार नही करने देगी और MCD कुछ करना चाहे तो केजरीवाल नही करने देंगे।
                    दूसरा कारण ये है की दिल्ली के स्वास्थ्य पर प्राइवेट हस्पतालों का कब्जा है। डेंगू के मरीज को आठ-दस दिन रखना  पड़ता है और उसमे कोई ओपरेसन वगैरा होता नही है तो बिल भी बहुत ज्यादा नही बन सकता। इसलिए ये हस्पताल इन मरीजों को रखेंगे नही। उन्हें तो ऐसे मरीज चाहियें जो चार-पांच दिन में चार-पांच लाख का बिल देकर बाहर हो जाएँ।
                      अगली बात ये है की इस बार डेंगू का हमला पॉस इलाकों में भी पूरी ताकत से होना चाहिए। क्योंकि इन इलाकों के लोग खुद कोई काम करने में विश्वास नही रखते। इस बार MCD उनके यहां मच्छर मारने आएगी नही और वो खुद मार सकते नही। इसलिए इन इलाकों को भी टारगेट किया जाये इससे मीडिया में भी अच्छी सुर्खियां बनेगी।
                      अब किसी को कोई सवाल पूछना हो तो पूछ सकता है। " ये कहकर उसने अपनी बात समाप्त की।
                लेकिन मरने वाले तो सभी आदमी ही होंगे। इसलिए सभी लोग कैसे इकट्ठे नही होंगे ? -- एक जवान मच्छर ने पूछा।
               नेताजी एकबार जोर से हँसे। फिर बोले ," तुम इन आदमियों को नही जानते। तुमने आदमियों के मुंह से ही ये बात हजारों बार सुनी होगी की आदमी ईश्वर की सबसे बढ़िया कृति है। फिर भी  आदमी भूख से मरते हैं , कपड़े नही हैं, घर नही हैं।  किसी दूसरे जानवर को आज तक भूखे सोते देखा है ? दुनिया के सभी प्राणियों में केवल आदमी ही है जो भूखा सोता है। और इसका कारण कोई दूसरा प्राणी नही है, खुद आदमी ही हैं जिन्होंने ऐसे हालात पैदा किये हैं की करोड़ों दूसरे आदमियों को भूखा सोना पड़ता है। मैं तो कहता हूँ की आदमी ने खुद को प्रकृति की सबसे निकृष्ट कृति बना लिया है। सो तुम उनकी एकता की बात मत करो और आराम से हमले की तैयारी करो। "
                लेकिन राजधानी पर हमले से बहुत जोर से बात मीडिया में आएगी और  वो तुरंत हमे मार डालेंगे। ----एक दूसरे मच्छर ने आशंका जताई।
               " कुछ नही होगा। हफ्तों तक वो एक दूसरे पर आरोप लगाते रहेंगे। बात ब्यायालय तक जाएगी। वो  नोटिस जारी करेगा। आरोप प्रत्यारोप का दौर जारी रहेगा और तब तक हमारा स्वाभाविक मरने का समय यानि सर्दी आ जाएगी। वो आरोप लगाते हुए जनता की अदालत में जाने की बात करेंगे और जनता बिस्तर पर पड़ी होगी। "  नेता जी ने मुस्कुराते हुए कहा।
                        और अगले दिन मच्छरों ने दिल्ली पर हमला कर दिया। और आदमी सचमुष वैसा ही कर रहे हैं जैसा मच्छरों के नेता ने कहा था।

Friday, September 18, 2015

Vyang -- " मन की बात " पर रोक क्यों लगाई जाये ?

खबरी -- चुनाव आयोग ने " मन की बात " पर रोक लगाने से इंकार कर दिया।

गप्पी -- असल में ये मांग ही गलत थी। चुनाव आयोग ने एकदम सही फैसला किया है। विपक्षी दलों का कहना था की प्रधानमंत्री की " मन की बात " से बिहार चुनाव में मतदाताओं पर असर पड़ेगा। लेकिन ये बात तथ्यों से परे है।
              मुझे नही लगता की " मन की बात " का कोई प्रभाव मतदाताओं पर पड़ता है। मतदाताओं पर केवल मुद्दे की बात का प्रभाव पड़ता है। और प्रधानमंत्रीजी का तो ये रिकार्ड रहा है की उन्होंने कभी मुद्दे की बात ही नही की। बल्कि अब तो ये भी साफ हो गया है की लोग जिन बातों को मुद्दे की बात समझ रहे थे वो भी मुद्दे की बात नही थी। अब इस बात का शक जताना की प्रधानमंत्री अपनी " मन की बात " में मुद्दे की बात कर सकते हैं ये विपक्षी दलों की गलत धारना है। इस बात के समर्थन में मैं और भी हजारों सबूत पेश कर सकता हूँ।
                जैसे संसद के पुरे सत्र के दौरान विपक्षी दलों ने अपनी सारी कोशिशें कर ली, लेकिन क्या वो प्रधानमंत्री से मुद्दे की बात पर एक शब्द बुलवा पाये। प्रधानमंत्री ने ना तो मुद्दे की बात की और ना ही मुद्दे पर बात की। फिर भी प्रधानमंत्री पर इस बात का शक करना तो चुनावी रणनीति ही माना जायेगा।
                   दूसरा चुनाव से पहले प्रधानमंत्रीजी ने जो जो बातें कहि थी आज इतने दिन के बाद भी उनमे से किसी में कोई मुद्दा निकला। सारे देश की जनता ने बारीक़ से बारीक़ छलनी लेकर सारी बातों को कई कई बार छान लिया की एकाध मुद्दा निकल ही जाये, लेकिन नही निकला।
                     एक और सबूत है जिसके बाद तो आपको मानना ही पड़ेगा की विपक्ष की मांग गलत थी। और यही सबसे महत्त्वपूर्ण बात है। जिन मुद्दों पर प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी काम कर रही है क्या उनका जिक्र उन्होंने कभी किया। मैं तो कहता हूँ की पुरे विपक्ष ने उन पर वो बात कहने के लिए दबाव डाला, जो वो कर रहे हैं लेकिन उन्होंने नही माना। दूसरी बात ये है की प्रधानमंत्री जी जिस संगठन यानि आरएसएस से आये हैं, उसका तो इतिहास रहा है की उसने उन बातों को कभी नही माना जिनके लिए वो सारी जिंदगी काम करता रहा। और जिन बातों का जिक्र वो अपनी बातों में करते रहे हैं उनको कभी उस तरह लागु नही किया। जैसे वो बात राष्ट्रवाद और देशभक्ति की करेंगे और काम देश तोड़ने के करेंगे। एकता के नाम पर उनके द्वारा किये गए किसी भी काम में अगर कुछ नही था तो बस एकता ही नही थी। वो देश की सुरक्षा के लिए कार्यक्रम घोषित करेंगे और देश जलने लगेगा। प्रधानमंत्री लोकतंत्र और कांग्रेस मुक्त भारत दोनों की बात एक साथ करते हैं। वो सहकारी संघवाद ( Cooperative Federalism ) की बात और नीतीश मुक्त बिहार की बात एक साथ करेंगे। अब कोई ये तो नही कह सकता की प्रधानमंत्री को इन बातों के मायने नही मालूम होंगे, बाकी तो फिर नियत की बात ही बचती है।  

                       इसलिए चुनाव आयोग का फैसला एकदम सही है। और विपक्ष को इस बात पर प्रधानमंत्री पर आरोप लगाने बंद कर देने चाहियें।

Thursday, September 17, 2015

Vyang - बिजनेस फ्रेंडली राज्य बनाने पर सुझाव

पिछले दिनों वर्ल्ड बैंक ने एक लिस्ट जारी की है जिसमे भारत में सबसे आसानी से बिजनेस किये जाने वाले राज्यों की सूचि जारी की है। मुझे बड़ा दुःख हुआ जब मैंने देखा की हमारे राज्य का नंबर तो झारखण्ड, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे पिछड़े हुए राज्यों के भी बाद आता है। सो मैंने इन सभी राज्यों में मिलने वाली सुविधाओं और सहूलियतों का गहन अध्धयन करने के बाद कुछ सुझाव तैयार किये हैं जिन्हे अपनाकर दूसरे राज्य भी इस सूची में अपना नंबर सुधार सकते हैं। ये सारे सुझाव एकदम मुफ्त में और बिना मांगे दिए जा रहे हैं और मैं उम्मीद करता हूँ की इन्हे अपनाने वाले राज्य मेरी सेवाओं का सम्मान करेंगे।
सिंगल विंडो स्कीम ------- 
                                       जब कोई आदमी किसी राज्य में बिजनेस शुरू करना चाहता है तो उसे अलग अलग कई विभागों से मंजूरी लेनी पड़ती है। सभी विभागों के अधिकारी काम करने के लिए सीधे सीधे पैसे लेने की बजाय दलालों की मार्फत पैसे लेते हैं। उन सभी अधिकारीयों के दलालों को ढूंढना काफी मुस्किल भी होता है और इसमें समय भी बहुत लगता है। इसलिए सरकार को एक सिंगल विंडो स्कीम पेश करनी चाहिए जिसमे एक ही दलाल सभी विभागों के अधिकारीयों का पैसा ले ले और बाद में अधिकारी और विभाग की हैसियत के हिसाब से बंटवारा कर दे। विकसित राज्यों में इन दलालों को सचिवालय के बाहर बैठने के लिए जगह दी गयी है जिससे इन्हे ढूंढने में कोई दिक्क़त नही हो। इस अनुभव का फायदा दूसरे राज्यों द्वारा भी उठाया जा सकता है।
खनन उद्योग माफिया के भरोसे --------
                                                          सरकार को ये पता लगाने के लिए की कहां  कहां खनन किया जा सकता है और कैसे किया जा सकता है बहुत खर्चा करना पड़ता है। फिर भी अधिकारीयों के भरोसे ये काम ठीक से नही हो पाता है। इसलिए इसमें निजी क्षेत्र की भूमिका को बढ़ावा दिया जाना चाहिए और पुरे खनन क्षेत्र को माफिया के भरोसे छोड़ देना चाहिए। ये साबित हो चूका है की माफिया खनन का विकास ज्यादा तेजी से करता है। सभी बिजनेस फ्रेंडली राज्यों ने खनन को माफिया के ही भरोसे छोड़ा हुआ है। अधिकारीयों का काम केवल उनसे पैसे लेकर ऊपर  तक पहुंचाना होता है। इससे सरकार का समय भी बचता है और नए नए क्षेत्रों में खनन का विकास भी तेजी से होता है।
व्हिसल ब्लोवरों पर लगाम --------
                                                   हर राज्य में कुछ विकास विरोधी लोग होते हैं जो सरकार और बिजनेस मैन के काम में अड़ंगा लगाते रहते हैं और अपने आप को व्हिसल ब्लोवर कहते हैं। विकास के हित में इन पर लगाम लगाई जानी बहुत जरूरी है। उनमे से दो-तीन को मार दिया जाये तो बाकि को धमकाना आसान हो जायेगा। हर विकास शील राज्य ने यही तरीका अपनाया है। उसके बाद ये समस्या धीरे धीरे कम हो जाती है। पुलिस को आदेश दिए जाएँ की अगर कोई व्हिसल ब्लोवर धमकी की शिकायत लेकर पुलिस के पास आये तो उसी पर ब्लैकमेल का मुकदमा बना दिया जाये।
श्रम विभाग को नया काम --------
                                                किसी भी राज्य में उद्योग के विकास के लिए ये जरूरी है की मजदूर कानूनो को संविधान के बाहर मान लिया जाये। हर बिजनेसमैन को ये छूट दी जाये की वो कितनी ही देर काम करवाये और कितना ही वेतन दे। इसके लिए सबसे अच्छा तरीका ये है की राज्य में ठेकेदारी प्रथा को बढ़ावा दिया जाये और मजदूर कानूनों को बदलने का झंझट लेने की बजाए उन पर ध्यान ना देने का रास्ता अपनाया जाये। यूनियनों पर प्रतिबंध लगा दिया जाये और श्रम विभाग का काम केवल ठेकेदारों का पता लगाकर उनसे पैसे इक्क्ठे करने तक सिमित कर दिया जाये। वैसे ज्यादा विकसित राज्यों में तो ये काम उद्योगपतियों के जिम्मे ही है की वो हर महीने ठेकेदारों के भुगतान में से पैसे काटकर विभाग में जमा करा दे। अब जब उनको प्रोविडेंट फंड और ईएसआई जमा करवाने से छुटकारा मिल गया है तो वो इतना काम तो राज्य की भलाई में कर ही सकते हैं।
टैक्स सुधारों को लागु करना ------
                                                   टैक्स सुधारों का मुद्दा इसमें काफी मायने रखता है। सरकार को पिछले दरवाजे से जो टैक्स आता है उसकी प्रगति पर कड़ी नजर रखी जानी चाहिए। बाकि खजाने में कितना टैक्स आता है उस की ज्यादा चिंता नही करनी चाहिए। उसमे अगर कमी आती है तो पट्रोल और डीजल पर टैक्स बढ़ाकर पूरा किया जा सकता है। पिछले दरवाजे से टैक्स देने वाले व्यापारियों को बही खातेचैक करवाने से छूट दी जाये। इससे जो सफेद धन को काला करने की प्रकिर्या है उसमे तेजी आएगी। इन टैक्स सुधारों को लागु करना बिजनेस फ्रेंडली राज्य बनाने के लिए बहुत जरूरी है।
विकास के प्रचार में तेजी -----
                                               इस उपलब्धि के लिए जो काम सबसे जरूरी है वो ये की विकास के प्रचार में तेजी लाई जाये। चाहे आदिवासियों के विस्थापन का सवाल हो, चाहे किसानो की जमीन छीनने का काम हो या पर्यावरण का सवाल हो, इनका विरोध करने वाले हर आदमी और संस्था को विकास विरोधी और बाद में देशद्रोही घोषित कर दिया जाये। उनके लाइसेंस रद्द कर दिए जाएँ और मीडिया हाउसों को इसकी खबरों पर बैन लगाने के आदेश दिए जाएँ। इन लोगों पर हमला इतना तेज किया जाये की जब तक लोगों को सच्चाई समझ में आये तब तक काम पूरा हो चुका हो।
                    ये कुछ सुझाव बहुत छानबीन और विचार करने के बाद तैयार किये गए हैं और राज्य इनसे लाभ उठा सकते हैं।

Monday, September 7, 2015

रिमोट से संचालित लोकतंत्र की सेल

आज के सभी बड़े अख़बारों में डैमोक्रेसी की सेल की खबरें छपी थी। शहर के एक प्रमुख मॉल में डैमोक्रेसी की सेल लगी हुई थी और वह भारी डिस्काउंट पर मिल रही थी। हमने भी डैमोक्रेसी के बारे में बहुत सुना था और उससे हमे भी इच्छा हुई की एक डैमोक्रेसी हम भी ले आये तो अच्छा रहेगा। हम घर से निकलने ही वाले थे की हमारी पत्नी ने कहा की अगर रँग वगैरा अच्छा हो तो एक डैमोक्रेसी उसके लिए भी ले आये। लेकिन उससे पहले दुकानदार से ये पक्का कर लें की अगर पसंद नही आई तो वापिस देंगे। पता नही मेरी पत्नी डैमोक्रेसी को क्या समझ रही थी। परन्तु समस्या ये थी की ठीक ठीक हमे भी मालूम नही था की ये कैसी होती है। थोड़ी देर में हम बाजार में पहुंच गए। बहुत लोग आये हुए थे। सबमे एक अजीब सी ख़ुशी थी। काउन्टर पर खड़ा हुआ एक आदमी सबसे बात कर रहा था। मैंने भी जाकर आहिस्ता से डरते डरते कहा की भाई साब अगर आप ठीक समझें तो हमारे लायक भी एक डेमोक्रेसी दिखा दीजिये।
               सेल्समैन उत्साह में था। तुरंत बोला, " अरे आप लायक की क्या बात करते हैं, हमारे पास तो डेमोक्रेसी के इतने डिजाइन हैं की आपको कोई न कोई तो जरूर पसंद आएगा। हमारे पास दस तरह की तो इम्पोर्टिड डेमोक्रेसी है। ये देखिये अमेरिकी डिजाइन, इसमें आपको बहुत ही ज्यादा फैसलिटी मिलेगी। और हमारे पास तो रिमोट वाली डेमोक्रेसी के भी कई डिजाइन हैं। "
                  रिमोट वाली डेमोक्रेसी ? मैंने आश्चर्य प्रकट किया।
              बिलकुल! और ये डेमोक्रेसी तो हम कई साल से बेच रहे हैं। कोई शिकायत नही है। बस आपको इसका रिमोट हर रोज चार्ज करना पड़ेगा वरना वो काम नही करेगा। हमने ये डेमोक्रेसी बाला साहेब ठाकरे को बेचीं थी, जब तक वो रहे वो इसको रोज चार्ज करते रहे। उनके जाने के बाद ठीक से चार्ज  नही हुआ तो प्रॉब्लम हो गयी।
                क्या कोई भारतीय पीस नही है ? मैंने पूछा।
             हैं, हैं क्यों नही, ये जातीय डेमोक्रेसी है। दूसरी जो आजकल बहुत चल रही है वो रिमोट वाली सनातन डेमोक्रेसी है जो हमने अभी अभी आरएसएस को बेचीं थी। हमने उसका डेमो भी दिया था अभी संघ मुख्यालय में। हर बटन पर सरकार नाच रही थी। खुद भागवत जी ने इसकी तारीफ की है आपने अख़बारों में तो पढ़ा ही होगा। सेल्समैन ने पूरी जानकारी दी।
               दूसरा कोई मॉडल ? मैंने और जानकारी चाही।
        एक मॉडल और था रिमोट वाला जो हमने 10 जनपथ को बेचा था। ठीक काम कर रहा था लेकिन पता नही क्या हुआ कम्पनी ने उसे वापिस ले लिया। सेल्समैन ने निराशा प्रकट की।
               कोई एकदम नया माडल, अच्छे रिमोट के साथ ? मैंने उसके साथ साथ  चलते हुए कहा।
               है लेकिन बहुत महंगा है। अभी अमित शाह लेकर गए हैं। इसका रिमोट दूसरे लोगों पर भी काम करता है। उसे हम सीबीआई डेमोक्रेसी  कहते हैं। उसका डेमो हमने मुलायम सिंह पर दिया था एकदम कामयाब रहा। सेल्समैन ने मेरी हालत पर नजर डाली।
               तभी एक दूसरा ग्राहक आया। सेल्समैन ने उससे पूछा, " कहां से आये हो भाई ?"
                " बिहार से। "
               " अरे, आओ आओ, बिहार के लिए तो हमने स्पेशल स्कीम निकाली है। " सेल्समैन मुझे छोड़कर उसकी तरफ लपका।
                " ये देखो, ये जो डेमोक्रेसी हम बिहार में बेच रहे हैं उसके साथ एक स्पेशल गिफ्ट पैकेज भी दिया जा रहा है। शर्त बस ये है की आपको डेमोक्रेसी अभी खरीदनी पड़ेगी और गिफ्ट पैकेज आपको चुनाव के बाद भेजा जायेगा। " सेल्समैन ने उसे एक पीस दिखाते हुए कहा।
               " लेकिन इस गिफ्ट पैकेज में क्या है ?" उसने पूछा।
              " देखिये ये तो सरपाईज है। इसमें कुछ भी निकल सकता है, हो सकता है 15 लाख निकल जाएँ। " सेल्समैन ने कहा।
              लेकिन बिहारी भी पक्का बिहारी था, उसको बिना देखे भरोसा नही हो रहा था। उसने कहा की पहले पैकेज खोल कर दिखाओ तभी डेमोक्रेसी लेंगे। और वह चला गया।
              " तो तुम दिखा क्यों नही देते ? इस तरह तो तुम्हारा एक भी पीस नही बिकेगा। " मैंने सेल्समैन से कहा।
              " कैसे दिखा दूँ साहब, इसमें प्रधानमंत्री के विदेशी दौरों की कैसेट हो सकती है, योग सिखाने वाली किताब हो सकती है, प्रधानमंत्री द्वारा ली गयी सैलफ़ियों का संग्रह हो सकता है। और---" सेल्समैन बीच में ही रुक गया।
             "और " मैंने पूछा।
            " जुमला भी हो सकता है। " सेल्समैन वापिस मुड़ गया।

Sunday, August 30, 2015

हिन्दी न्यूज़ चैनल और इन्द्राणी मुखर्जी

indrani mukherji photo with drink

हिन्दी न्यूज़ चैनलों का पिछले कई दिन से बुरा हाल है। जबसे ये शीना हत्याकांड यानी  इन्द्राणी मुखर्जी का मामला सामने आया है हिंदी न्यूज़ चैनलों ने इस पर इतनी खोज की हैं जितने में दूसरा अमेरिका खोजा जा सकता था। रोज हर चैनल पर कोई न कोई सनसनीखेज खबर होती है। इन  सनसनीखेज ख़बरों का अंदाज भी उतना ही सनसनीखेज होता है। 
                   एक चैनल सुबह से एक प्रोग्राम की जानकारी दे रहा था। आज दोपहर 12 बजे से एक बजे तक देखिये इन्द्राणी मुखर्जी के बारे में एक सनसनीखेज खुलासा। जिसे देख कर आपको पसीना आ जायेगा। आप दांतों तले ऊँगली दबा लेंगे। लोग बेसब्री से कार्यक्रम का इन्जार कर रहे थे। ठीक समय पर दो एंकर हाजिर हुए एक सिरे पे एक महिला और दूसरे सिरे पर एक पुरुष। उन्होंने शीना हत्याकांड और  इन्द्राणी मुखर्जी पर बोलना शुरू किया। लोग खुलासे का इन्जार करते रहेऔर वो उन सारी  बातों को दोहराते रहे जो वो पिछले पांच दिन से कह रहे थे। खुलासे का जिक्र केवल ब्रेक से पहले आता की ब्रेक के बाद देखिये वो सनसनीखेज खुलासा।
इस तरह 55 मिनट गुजर गए। अब एंकर खुलासे पर आये। उसने कहा की आज मुंबई पुलिस के खास सूत्रों के हवाले से सबसे पहले हमारे चैनल को ये खबर दी गयी है  की जब  इन्द्राणी मुखर्जी ने तीसरी शादी की उससे पहले उसकी दो शादियां हो चुकी थी। 
                       एक रिक्शा वाला जो सवारी ढोना छोड़ कर एक घंटे से टीवी के सामने खड़ा था उसके मुंह से एक भद्दी गाली निकली। 
                     एक दूसरे चैनल का दिनभर का प्रोग्राम इस प्रकार था। 
सुबह 9 से 10 तक देखिये शीना हत्याकांड पर विशेष रिपोर्ट। 
सुबह 10 से 11 बजे तक देखिये कैसे इन्द्राणी मुखर्जी ने तीन तीन शादियां की। 
सुबह 11 बजे से 12 बजे तक इस बात पर खास चर्चा की इन्द्राणी मुखर्जी का पति  ही उसकी बेटी का सगा बाप था। 
दोपहर 12 बजे से 1 बजे तक देखिये हमारा विशेष कार्यक्रम जिसमे हम उस होटल वाले का एक इंटरव्यू दिखाएंगे जिसकी दुकान का बना हुआ सैंडविच इन्द्राणी मुखर्जी ने आज खाया। 
दोपहर 1 बजे से 2 बजे तक इस बात पर चर्चा की जाएगी की इस मामले की जाँच ACP  प्रद्युम्न को दे दी जानी चहिए। 
दोपहर 2 बजे से 3 बजे तक इस बात पर चर्चा होगी की शीना की मौत एक हत्या है। 
दोपहर ३बजे से ४ बजे तक हमारे खास मेहमान होंगे डा. भोसले, जो इस बात की जानकारी देंगे की लम्बे समय तक जोर से गला दबाने पर आदमी मर जाता है। 
दोपहर बाद 4 बजे से 5 बजे तक इस खुलासे पर चर्चा होगी जिसमे इन्द्राणी मुखर्जी के बाप ने कहा था की वो  इन्द्राणी मुखर्जी की बेटी का नाना लगता है। 
शाम 5 बजे से 6 बजे तक  मिलवायेंगे उस ब्यूटी पार्लर की मालकिन से जहां इन्द्राणी मुखर्जी रेगुलर जाती थी। 
और अंत में शाम 6 बजे से सात बजे तक आपको दिखाएंगे एक चर्चा की कैसे मीडिया लोकतंत्र का चौथा खम्बा है।
                

Thursday, August 27, 2015

सिद्धान्त रूप से सहमत है सरकार

2 सितंबर को होने वाली अखिल भारतीय मजदूर हड़ताल को टालने के लिए, मजदूर यूनियनों के प्रतिनिधियों से हुई बातचीत में सरकार ने कहा की वो यूनियनों के 12 मांगों के मांग पत्र में से 8 मांगों पर सिद्धान्त रूप से सहमत है इसलिए मजदूर यूनियनों को हड़ताल वापिस ले लेनी चाहिए। जाहिर है की यूनियन के प्रतिनिधियों ने इससे इंकार कर दिया। यूनियनों के प्रतिनिधियों ने कहा की " सैद्धांतिक सहमति " का क्या मतलब होता है। सरकार ने तो ये नही बताया लेकिन मैं बता देता हूँ। निचे वो मुद्दे दिए गए हैं जिन पर सरकार सिद्धांत रूप में सहमत है। 
१. देश में भृष्टाचार नही होना चाहिए। और अगर किसी मंत्री पर भृष्टाचार का आरोप लगता है तो उसे इस्तीफा देकर जाँच का सामना करना चाहिए। 
२. देश में वन रैंक - वन पेंशन का नियम लागु होना चाहिए। 
३. महंगाई नही बढ़नी चाहिए। 
४. कला धन वापिस लाना चाहिए और विदेशों में पैसा जमा करवाने वाले खता धारकों के नाम सार्वजनिक कर देने चाहियें। 
५. विकास की योजनाओं में राज्य सरकारों की सलाह का आदर करना चाहिए। 
६. दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलना चाहिए। 
७. पाकिस्तान को सबक सिखाना चाहिए। 
८. श्रम का सम्मान होना चाहिए। 
९. सभी युवाओं को रोजगार मिलना चाहिए। 

                      क्यों भाइयो होना चाहिए की नही होना चाहिए ?

Wednesday, August 26, 2015

क्या ये देश गुलामों की मण्डी है ?

 
Slave auction in virginia

गप्पी --  जैसे कोई ठेले पर आलू बेचता है उसी तरह बहुत दिन से हमारी सरकार एक रट लगाए हुए है। पूरी दुनिया में घूम घूम कर हमारे प्रधानमंत्री कह रहे हैं सस्ती लेबर ले लो, जवान लेबर ले लो। बिना किसी कानून के ले लो। भाईओ इतनी सस्ती लेबर आपको दुनिया में कहीं नही मिलेगी। हमारी लेबर एकदम जवान लेबर है। आपको पूरी दुनिया में इतनी जवान और इतनी बड़ी संख्या में लेबर कहीं नही मिलेगी। आप हमारे यहां आइये। यहां अपना कारखाना लगाइये और हमारी सस्ती और जवान लेबर का फायदा उठाइये।
                   अगर आपको फिर भी कोई तकलीफ है तो हमे बताइये। यहां आकर बताइये या वहीं बता दीजिये, मैं तो आपके यहां ही रहता हूँ। ऐसा नही है हमे आपकी तकलीफें मालूम नहीं हैं। हमे सब मालूम हैं। आपको सारी लेबर ठेके पर चाहिए।  कोई बात नही हम अपने कानून बदल देंगे। आप जितनी चाहिए उतनी लेबर ठेके पर रख सकते हैं। आपको उनका कोई रिकार्ड नही रखना है? मत रखिए, आपको किसने कहा है ? हम कानून बदल रहे हैं जिसमे रिकार्ड रखने की जरूरत ही नही रहेगी। और बताइये, आपको अप्रेन्टिस के नाम पर और कम वेतन में मजदूर चाहियें, कोई बात नही। हम कानून को बदल कर अप्रेन्टिस रखने की सीमा और समय बढ़ाकर अनिश्चित काल कर देते हैं। आपको यूनियन नही चाहिए, उसका भी हल है। हम जो नया कानून बना रहे हैं उसके बाद कोई यूनियन बनाना तो दूर, कोई यूनियन का नाम भी नही ले पायेगा। और बताइये, आपको 12 घंटे काम करवाना है तो हम ओवरटाइम का कानून बदल देते हैं। आप कितनी  ही देर काम करवाइये।
                   हमे आपकी सारी समस्याएं मालूम हैं। आपको लड़कियों से रात को काम करवाना पड़  सकता है, हम आपके कहने से पहले ही कानून में लड़कियों की रात की शिफ्ट पर लगी पाबंदी हटा देते हैं। जिन लोगों को उनकी सुरक्षा की चिंता है उनके लिए हम बेटी बचाओ अभियान चला रहे हैं। अब तो आपको हम भरोसा हुआ या नही। हम लेबर को सस्ता रखने के लिए मनरेगा जैसे कार्यक्रम बंद कर देने वाले हैं। आप यहां अपने मित्रों से पूछ सकते हैं की हमने इस पर काम भी शुरू कर दिया है। और घबराइये मत, इसका कोई दोष आप पर नही आएगा। हम ये सारे काम श्रम सुधारों के नाम पर कर रहे हैं। हमने अब तक जिन चीजों का भी सत्यानाश किया है सुधार का नाम लेकर ही किया है। इसलिए आप आइये और हमारे जवान और सस्ते मजदूर ले लीजिये।
                   मुझे लगा की मैं पुराने बसरे के बाजार में खड़ा हूँ। जहां गुलामों की बोलियाँ लग रही हैं। लीजिये साहब ये लीजिये एकदम मजबूत और जवान गुलाम जो पहाड़ भी तोड़ सकता है और एकदम कम कीमत पर। फिर दूसरी तरफ से आवाज आती है ये लीजिये मेहरबान एकदम सख्तजान गुलाम, आप इसको काट कर भी देख सकते हैं। इसकी रगों में लहू नही लोहा बहता है। और एकदम मुफ्त के भाव पर। काबुल, बसरा और बगदाद की मंडियां दिखाई दे रही हैं। मुझे दिखाई देता है की समुद्री जहाज भर भर कर गिरमिटिया मजदूर विदेश ले जाए जा रहे हैं। मुझे पसीना आता है
                  पहले के समय में जब तक गुलाम को कोई खरीद नही लेता था तब तक उसे जिन्दा रखने और खिलाने पिलाने की जिम्मेदारी उसके मालिक की होती थी। लेकिन आज के  गुलाम को तो ये जिम्मेदारी भी खुद ही उठानी पड़ती है। जब मार्क्स ने इसे उजरती गुलामी कहा था तब बहुत हो-हल्ला मचा था। लेकिन आज इस बात का कोई जवाब नही है। एक मजदूर के पास केवल एक ही आजादी थी, की वह किसकी गुलामी करना चाहेगा लेकिन अब तो उसके अवसर भी नही बचे। सरकार चार-चार हजार के फिक्स वेतन पर भर्तियां कर रही है और प्रधानमंत्री लालकिले से श्रम के सम्मान की बात करते हैं। क्या हमारा नौजवान इतना भी नही समझता ? मैंने बहुत पहले एक कवि की कुछ पंक्तियाँ पढ़ी थी जो मुझे पसंद नही आई थी। एक मजदूर के घर बच्चे के पैदा होने पर वो कहता है ,--
                         ये नन्हा,
                         जो भोला-भाला है। 
                          कुछ नही है,
                          सरमाये का निवाला है। 
                          बड़ा होगा तो,
                          कारखाने के काम आएगा। 
                          मुनाफे की भट्टी में,
                          झौंक दिया जायेगा। 
        ये तो मनुष्य के गरिमापूर्ण जीवन की गाथा नही है। जिस तरह की बोलियाँ लगाई जा रही हैं, वो तो उनके मानव होने के अधिकार पर ही प्रश्न चिन्ह लगाती हैं। बहुत ही सहज तरीके से इस देश को गुलामों की मण्डी में बदला जा रहा है। इसे कौन स्वीकार करेगा। 

खबरी -- उन्हें फैज अहमद फैज के इन शब्दों को भी याद रखना चाहिए,--
                          यूँ ही उलझती रही है हमेशा जुल्म से खल्क ,
                          न  उनकी  रस्म नई है  न अपनी  रीत नई। 
                          यूँ  ही  खिलाये  हैं  हमने आग  में   फूल ,
                           न उनकी हार नई है   न अपनी जीत नई।

Sunday, August 23, 2015

Vyang -- अब बिल्ली करेगी आपके दूध की रखवाली।

खबरी -- ये " पेमेन्ट बैंक " क्या बला है ?

गप्पी -- पिछले दिनों की कुछ बहुत ही महत्त्वपूर्ण खबरों पर एक नजर डालिये। एक खबर आई की देश के टैक्स का दो लाख सत्रह हजार करोड़ रुपया केवल सत्रह लोगों पर बकाया है। धन्य हो। ऐसे लोगों की तो पूजा होनी चाहिए। हालाँकि सरकार ऐसे लोगों की पूजा कर भी रही है। इनमे से कई लोग प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं में सम्मानित प्रतिनिधियों की तरह शामिल रहते हैं। उनका सम्मान होता है और उनकी अय्यासी का खर्चा इस देश की गरीब जनता उठाती है। 
                       दूसरी महत्त्वपूर्ण खबर ये आई की देश के सरकारी बैंको का छः लाख करोड़ रुपया लगभग डूब गया है। ये लगभग शब्द जो है उसकी खोज जोर का धक्का आहिस्ता से लगने के लिए की गयी थी। वरना लगभग का कोई मतलब नही है। असली खबर ये है की छः लाख करोड़ रुपया डूब चूका है। ये कौन बेचारे भाई हैं जो बैंको से लोन लेकर उसे चूका नही पाये। इनमे कई तो ऊपर वाले सत्रह लोगों में ही हैं। जो बाकि बचे वो इनके भाई बंधु , घर परिवार वाले और इन जैसे ही कुछ दूसरे महानुभाव हैं। बेचारा आम आदमी तो बैंक का सौ रुपया नही चुका पाये तो उसके खिलाफ FIR हो जाती है। बैंक की उगाही करने वाली जीप उनका खेतों तक पीछा करती है। और तब तक करती रहती है जब तक या तो वो पैसा दे दे या आत्महत्या कर ले। 
                       ऊपर के दोनों कुकर्मों के लिए हमारा निजी क्षेत्र जिम्मेदार है। जिसके सम्मान में सारा देश दुहरा हुआ रहता है। जिससे कोई सवाल नही पूछता। जिस का अपना मीडिया है, अपने एक्सपर्ट हैं, अपनी सरकार है और अपने नासमझ समर्थक हैं। ये व्ही निजी क्षेत्र है जिसे सारी आर्थिक बिमारियों का इलाज बताया जाता है। अब इसके लिए सरकार ने एक बहुत ही बढ़िया स्कीम बनाई है। 
                        हमारे रिजर्व बैंक ने इन्हे "पेमेंट बैंक" के नाम से बैंक खोलने की अनुमति दे दी है। ये बेचारे कुछ दिनों से बहुत परेशानी में थे। उद्योगों में मंदी का माहौल चल रहा है। बैंकों का जो पैसा खाया जा सकता था खा चुके हैं। टैक्स का जो पैसा हजम हो सकता था कर चुके हैं। बैंकों से नया लोन लेने के लिए भी कोई बहाना चाहिए भले ही कितना ही कमजोर क्यों न हो। अब इस बेचारे निजी क्षेत्र का विकास रुक गया। इसके बच्चे दो लाख रूपये रोज के किराये की होटलों में कैसे रुकेंगे। पत्नी की सालगिरह पर हवाईजहाज कैसे गिफ्ट में दिया जायेगा ? हजार-हजार करोड़ के मकान कैसे बनेंगे। उनकी इस परेशानी को देखते हुए सरकार ने इन्हे ही सीधे सीधे बैंक खोलने का परोक्ष अधिकार दे दिया। लो भाई, खुद पैसा इकट्ठा करो और खुद हजम करो। किस्से पैसा इकट्ठा करो ? अरे भई आम लोगों से, जो दूर के गांव में रहते हैं, दूसरी जगहों पर जाकर मजदूरी करते हैं और जहां कोई बैंक अपनी शाखा नही खोलना चाहता। ये सारा काम आपके मोबाईल पर कर देंगे। आपको ना बैंक जाने की जरूरत पड़ेगी और ना खाता खुलवाने के लिए सबूत देने की जरूरत पड़ेगी। अपनी छोटी छोटी  बचतों को इन बिल्लियों की रखवाली में रखिये और मलाई आने का इंतजार कीजिये। 
                         देश के ये बेचारे गरीब उद्योगपति हर रोज पैसा मांगने बैंक में जाएँ ये इनके सम्मान के खिलाफ है। बैंको में जो पैसा होता है वो भी जनता का ही होता है। ये बैंकों का पैसा खाते  रहते हैं फिर सरकार जनता के बजट में से पूंजी के नाम पर और पैसा डालती रहती है ये फिर खा लेते हैं। अब इस झंझट से छुटकारा मिल जायेगा सरकार को भी और इन बेचारी कम्पनियों को भी। आम जनता का पैसा ही खाना है तो भाई सीधे खाओ ना, सरकार को बीच में क्यों डालते हो।

Thursday, August 20, 2015

Vyang -- एक दूरदर्शी नेता के अति-दूरदर्शी भाषण

गप्पी -- स्वतन्त्रता दिवस की पूर्ण संध्या पर महामहिम राष्ट्रपति ने देश को सम्बोधित किया। उनके भाषण के तुरंत बाद मोदीजी ने ट्वीट करके कह दिया की भाषण दूरदर्शी नही था। मोदीजी को मालूम था की ये एक भाषण था, अभिभाषण नही था। अभिभाषण वो होता है जो सरकार लिख कर देती है और राष्ट्रपति महोदय केवल पढ़ देते हैं। जैसे संसद सत्र के शुरू में होता है। सो मोदीजी ने इसे अदूरदर्शी करार दे दिया।
                       वैसे मुझे भी ये दूरदर्शी नही लगा। कारण एकदम साफ है। राष्ट्रपति भवन से संसद भवन की दूरी है ही कितनी। राष्ट्रपति महोदय राष्ट्रपति भवन में खड़े होकर संसद भवन की तरफ देख रहे थे। उन्हें संसद में बना हुआ अखाडा  दिखाई दे रहा था। जो इतने निकट की चीज देखता हो उसे दूरदर्शी कैसे मान लिया जाये।
                        अगले दिन लालकिले से प्रधानमंत्री का भाषण था। मेरे एक पड़ौसी सुबह सुबह नहा-धोकर मेरे पास आकर बैठ गए। सबकी तरह उन्हें और मुझे भी प्रधानमंत्री के दूरदर्शी भाषण का इंतजार था। भाषण शुरू हुआ। उसमे प्रधानमंत्री ने एक सचमुच दूरदर्शी भाषण दिया। उन्होंने अपने भाषण में कहा की जातिवाद और साम्प्रदायिकता को बर्दाश्त नही किया जा सकता। तब भी प्रधानमंत्री ने अपने आसपास बैठे बाबाओं और साध्विओं को नही देखा जो लगातार जहर उगल रहे हैं। इनमे उनके साथी सांसद भी शामिल हैं। लेकिन वो लोग इतने निकट हैं की दूरदर्शी प्रधानमंत्री को दिखाई नही दिए। ठीक उसी तरह जैसे उन्हें संसद नही दिखाई दे रही थी और UAE दिखाई दे रहा था।
                          कई लोग उनसे वन रैंक-वन पेंशन पर किसी घोषणा की उम्मीद कर रहे थे। उनके नजदीक में ही कई दिनों से पूर्व सैनिक प्रदर्शन कर रहे थे। लेकिन पूर्व सैनिकों से यही गलती हो गयी। उन्हें दूरदर्शी प्रधानमंत्री के इतने नजदीक प्रदर्शन नही करना चाहिए था। इतनी नजदीक की चीजें उन्हें कहां दिखाई देती हैं। हमारे यहां एक पुरानी कहावत है की पहाड़ पर जलती हुई आग तो दिखाई देती है पर पैरों के नीचे जलती हुई आग दिखाई नही देती। इसलिए मेरा एक छोटा सा सुझाव है पूर्व सैनिकों को की यदि वो चाहते हैं की प्रधानमंत्री को उनकी समस्या दिखाई दे तो उनको अमेरिका के मैडिसन स्कवेयर में प्रदर्शन करना चाहिए। वो उन्हें जरूर दिखाई देगा।
                        उसके बाद प्रधानमंत्री सीधे भृष्टाचार पर आये। उन्होंने कहा की पंद्रह महीने के शासन में उनकी सरकार पर एक पैसे के भृष्टाचार का आरोप नही है। मेरे पड़ौसी को तो ये सुनते की हंसी का ऐसा दौरा पड़ा की वो पेट पकड़ कर सोफे से नीचे लुढ़क गए। हमने बड़ी मुश्किल से उन्हें इसी हालत में घर पहुंचाया। वहां भी वो बिस्तर पर पेट पकड़ कर दोहरे हुए जा रहे थे। उनकी हालत में जब कोई सुधार नही हुआ तो मैं उन्हें वैसे ही छोड़कर वापिस आ गया। मुझे समझ नही आया की इसमें प्रधानमंत्री ने कौनसी गलत बात कह दी। उन्हें अगर शुषमा स्वराज, शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे नही दिखाई दे रहे थे तो इसमें उनका क्या कसूर है। उन्हें नजदीक की चीजें कहां दिखाई देती हैं। एक दूरदर्शी प्रधानमंत्री को तो केवल दूर की चीजें ही दिखाई देंगी न।
                       उसके बाद प्रधानमंत्री अपने वायदों पर आ गए। उन्होंने कहा की हमने अपने सभी वायदे पूरे कर दिए। मैंने सोचा की अच्छा हुआ मेरे पड़ौसी पहले ही चले गए वरना पड़ोस में उलाहना हो जाता। ये बात सुनकर उनका जो हाल हुआ होता उसके बाद मैं उसके घर वालों को क्या जवाब देता। अब प्रधानमंत्री ने जो भी वायदे किये थे वो केवल पंद्रह महीने पहले ही तो किये थे। इतने नजदीक के वायदे उन्हें कैसे दिखाई देते। लोग है की इस तकनीकी समस्या को समझ ही नही पा रहे हैं। एक इतने दूरदर्शी नेता जिन्हे पंद्रह महीनो में अपना देश ही नही दिखाई दिया और बाकि दुनिया के नक्शे पर जितने देश हैं सब दिखाई दे रहे हैं उनसे इतने नजदीक के वायदों को देखने की उम्मीद करना कहां तक सही है। उन्हें दस दिन पहले पीडीपी के बारे में क्या कहा था और बाद में क्या कहा, दस दिन पहले एनसीपी के बारे में क्या कहा था और सीटें कम पड़ते ही क्या कहने लगे, और तो और वो हररोज परिवार वाद को कोसते हैं लेकिन अपने पास बैठे प्रकाश सिंह बादल, उद्धव ठाकरे, रामबिलास पासवान, रमन सिंह इत्यादि का परिवारवाद कभी दिखाई दिया। नही ना। तो इसमें उनका कोई दोष नही है। वो इतने दूरदर्शी हैं की उनको नजदीक की चीजें दिखाई नही देती। 
                       शाम को मैं अपने पड़ौसी का हालचाल जानने उसके घर गया। पहले तो वो मुझे देखते ही बहुत देर तक हँसा फिर थोड़ा संयत होकर बोला भाई साब क्या मोदीजी ने कोई और चुलकुला सुनाया। मुझे तो मालूम ही नही था की मोदीजी की सेंस ऑफ ह्यूमर इतनी अच्छी है। अब मैं क्या जवाब देता। 
खबरी -- ये बात तो ठीक है लेकिन जब लोग आपके भाषणो को चुटकुला समझना शुरू कर दें तो आपको सावधान हो जाना चाहिए।

Sunday, August 16, 2015

Vyang -- भाई साब की छोटी होती प्रतिमा की कहानी

गप्पी -- दूसरे हजारों लाखों घरों की तरह हमारा घर भी एक किसान परिवार की सभी परेशानियों को अपने में समेटे था। कम जमीन, बढ़ता कर्ज, जवान बच्चों की बेरोजगारी और दिन रात काम करती कुपोषण की शिकार महिलाएं। इस सब का साइड इफेक्ट भी था, झगड़ा, अवसाद और बेबसी में एक दूसरे पर दोषारोपण। ऐसे में अचानक बड़े भाई साब ने घोषणा कर दी की अगर घर का लेनदेन उन्हें सौंप दिया जाये तो सारी समस्या हल हो सकती है। उन्होंने सारी समस्या की जड़ पिताजी की मिस-मैनेजमेंट को ठहरा दिया। साथ ही उन्होंने ये भी कहा की वो ये कामकाज तभी संभालेंगे जब उन्हें इसके लिए पूरा सम्मान मिले। परेशान घर वालों ने लेनदेन भाई साब को दे देने का फैसला कर लिया। उनके सम्मान के लिए घर वालों ने तय किया की भाई साब के रहते ही उनकी एक सात फुट की प्रतिमा घर के आँगन में स्थापित कर दी जाये। प्रतिमा सात फुट की इसलिए रखी गयी क्योंकि भाई साब को हमेशा अपना कद सात फुट का लगता था। हमारे घर में किसी का भी कद साढ़े पांच फुट से ज्यादा नही था, भाई साब का भी नही। लेकिन भाई साब को आदत थी बात बात पर ये कहने की, " है कोई माई का लाल गांव में मेरे जैसा सात फुट का जवान " . शुरू शुरू में घर वालों ने भाई साब को समझाने की कोशिश भी की थी उनके कद के बारे में, लेकिन भाई साब नही माने। अब घरवालों को भी आदत हो गयी थी। सो घर वालों ने लेनदेन भाई साब को सौंप दिया और आँगन में भाई साब की सात फुट की प्रतिमा स्थापित कर दी। प्रतिमा की प्रतिष्ठा और भाई साब के स्वभाव को देखते हुए उसे अच्छा कुरता पाजामा, बढ़िया जैकेट और रंगीन साफा भी पहना दिया।
                             भाई साब सारे कामकाज की निगरानी करते। अबकी बार अच्छी फसल होने की उम्मीद थी। भाई साब फसल का सारा श्रेय खुद को दे रहे थे और एक दिन आंधी और बरसात ने फसल बरबाद कर दी। लेनदारों का दबाव बढ़ गया। तो भाई साब ने घर पर रहना कम कर दिया। बेरोजगार बच्चों की नौकरी अब भी दूर की बात थी। घर में आशा का वातावरण फिर तनाव में बदलने लगा। अब भाई साब ने घरवालों के सवालों का जवाब देना बंद कर दिया। एक दिन घरवालों ने देखा की आँगन में खड़ी भाई साब की प्रतिमा का कद साढ़े पांच फुट का हो गया है ठीक भाई साब के ओरिजिनल कद के बराबर।
                           अब भाई साब ने शहर में कमरा लेकर रहना शुरू कर दिया अकेले। घर वाले पूछते तो जवाब मिलता की सब घर की हालत सुधारने के लिए ही कर रहे हैं। लेकिन घर की हालत ज्यों की त्यों थी। भाभी का आधा दिन काम में और आधा रोने में जाता। इसी तरह अम्मा का आधा दिन काम में और आधा भाभी को चुप कराने में जाता। घर वालों ने एक दो बार शहर जाकर भाई साब को मिलने की कोशिश की। लेकिन वहाँ भाई साब ने फुटकर काम के लिए जिस आदमी को रखा हुआ था व्ही मिलता। एक दिन उसने चिढ़कर घरवालों को कह दिया की उसने इतना निर्लज्ज परिवार नही देखा। उसके अनुसार भाई साब सुबह चार बजे से रात को बारह बजे तक घर की हालत सुधारने के लिए काम करते हैं। क्या करते हैं ये वो भी नही बता पाया। वापिस आकर घर वालों ने देखा की भाई साब की प्रतिमा और छोटी हो कर पांच फुट की रह गयी है।
                          लेनदारों का दबाव बढ़ा तो एक दिन पिताजी ने गले में रस्सा डाल लिया। वो तो एक पड़ौसी ने एन वक्त पर देख लिया और अनहोनी होने से बच गयी। पिताजी देश के दूसरे किसानो से ज्यादा भाग्यशाली निकले। भाई साब को पता चला तो बहुत चिल्लाये। उन्होंने कहा की ये तो कायरता की हद है। भाई साब ने इस बात पर भी शक जाहिर किया की पिताजी ने लेनदारों से परेशान होकर आत्महत्या की कोशिश की थी। उन्होंने कहा की जरूर अम्मा से झगड़ा हुआ होगा।
                           अब भाई साब की प्रतिमा केवल दो फुट की रह गयी थी। भाई साब हररोज बड़े लड़के की नौकरी तुरंत लगने की बात कर रहे थे लेकिन कुछ हो नही रहा था। अब भाई साब से इस पर पूछा जाता तो वो चिल्ला कर जवाब देने लगे। अब वो अपने कामो के बारे में जवाब नही देते थे। जब भी उनसे कोई सवाल पूछा जाता तो वो उसके उत्तर में कहते की पिताजी ने क्या कर लिया था। आहिस्ता आहिस्ता घर वालों ने उनसे पूछना बंद कर दिया। एक दिन घर वाले अंदर बैठ कर हालात पर विचार कर रहे थे की बहन का सात साल का लड़का दौड़ता हुआ घर में घुसा और अम्मा से बोला नानी-नानी मैं इस गुड्डे से खेल लूँ ? घर वालों ने देखा कि उसके हाथ में भाई साब की प्रतिमा थी जो छोटी होकर छः इंच की रह गयी थी।
 

Saturday, August 15, 2015

Vyang -- लोकतन्त्र बचाने के लिए " शट अप इंडिया " कार्यक्रम

गप्पी -- शोर मच रहा है की भारत का लोकतन्त्र खतरे में है। पहले भी एक बार ये शोर मचा था 1975 में। उसके बाद रह रह कर आवाजें आती रहती हैं की लोकतंत्र खतरे में है। लेकिन इस बार सचमुच खतरे में है। कारण ये है की जब सत्ता पक्ष चिल्लाना शुरू कर दे की लोकतंत्र खतरे में है तो लोगों को समझ जाना चाहिए  लोकतंत्र सचमुच खतरे में है।
               मेरे पड़ौसी कह रहे थे की भाई पुरानी कहावत है की जब चोर का पीछा करती हुई भीड़ चोर-चोर चिल्लाती हुई भाग रही हो तो चालक चोर खुद भी चिल्लाना शुरू कर देता है चोर-चोर। इससे क्या होता है की रस्ते में मिलने वाले लोग उसे भी पकड़ने वालों में मान लेते हैं। और सरकार वही कर रही है। सरकार के कामों पर जब देश ये चिल्लाना शुरू करता है की लोकतंत्र खतरे में है तो चालक सरकार भी चिल्लाना शुरू कर देती है की लोकतंत्र खतरे में है। इससे लोगों को ये अंदेशा तो होता है की लोकतंत्र को खतरा है पर वो ये नही समझ पाते की खतरा किससे है।
                 लोकतंत्र में दो पक्ष होते हैं , एक सत्ता पक्ष और दूसरा विपक्ष। जहां लोकतंत्र नही होता वहां भी दो पक्ष होते हैं एक राज करने वाला और दूसरा आम जनता। जो सत्ता पक्ष होता है जाहिर है की सारे अधिकार और काम करने की जिम्मेदारी उसी की होती है। जो विपक्ष होता है उसका काम सरकार के कामों पर निगाह रखना और अगर कोई काम सही नही लगे तो उसका विरोध करना होता है। जब सरकार विपक्ष के विरोध को नजरअंदाज करके काम करना शुरू करती है और बातचीत की प्रकिर्या को एकतरफा बना देती है तो विपक्ष चिल्लाता है की लोकतंत्र खतरे में है।
                    लेकिन ज्यादा गंभीर मामला तब होता है जब सरकार खुद ये चिल्लाना शुरू कर देती है की लोकतंत्र खतरे में है। इसका मतलब होता है शट -अप। सरकार विपक्ष को और विरोध करने वाले लोगों को कहती है शट-अप। यानि अगर तुम्हे बोलना है तो केवल समर्थन में बोलो वरना चुप रहो। जब सरकार विपक्ष के खिलाफ प्रदर्शन करती है तो उसका मतलब भी शट-अप होता है। जब सरकार विपक्ष को और विरोध करने वाले लोगों को शट-अप कहना शुरू कर दे तब मान लेना चाहिए की लोकतंत्र सचमुच खतरे में है। जब सरकार विपक्ष पर राज्य सभा में बहुमत के प्रयोग को दुरूपयोग का आरोप लगाती है और धमकी देती है की वो सयुंक्त सत्र बुला कर बिल पास करवा लेगी तो ये तो निश्चित रूप से बहुमत का दुरूपयोग है।
                   हमारे प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त के भाषण में देश के लिए दो प्रोग्रामो की घोषणा की, एक  "स्टार्ट-अप इंडिया " और एक "स्टैंड-अप इंडिया " . उससे पहले दिन उन्होंने NDA की मीटिंग में एक और प्रोग्राम की घोषणा की "शट-अप इंडिया " . जब प्रधानमंत्री विपक्ष के साथ मीटिंग करके मामलों का हल निकालने की बजाय, विपक्ष के सवालों का उत्तर दिए बिना, संसद में ना आकर सरकारी पक्ष को ये आदेश देते हैं की पुरे देश में जाकर लोगों से कहो की वो विपक्ष को चुप रहने के लिए कहे वरना देश के  "उद्योगपतियों " का विकास नही होगा तो हमे सचमुच मान लेना चाहिए की लोकतंत्र खतरे में है।
                   अब NDA और बीजेपी के सारे लोग विपक्ष के लोगों के संसदीय क्षेत्र में जाकर लोगों से कहेंगे, बेवकूफो, तुमने ये संसद में किसको भेज दिया। जिसको ये भी मालूम नही की विपक्ष का काम सरकार का समर्थन करना होता है। तुम लोगों में इतनी भी अक्ल नही है। चलो, अब अपने सांसद को बोलो की वो जुबान बंद रखे वरना लोकतंत्र खतरे में पड़ जायेगा। उसके बाद लोग उस सांसद से जाकर कहेंगे की भैया काहे ऐसा कर रहे हो ? लोकतंत्र को खतरे में काहे डाल रहे हो। ऐसा करो की या तो संसद में ही मत जाओ या मुंह पर पट्टी बांध कर जाओ। लोकतंत्र की रक्षा के लिए ये जरूरी है की विपक्ष संसद में मुंह पर पट्टी बांध कर बैठे।

Friday, August 14, 2015

Vyang -- संसद की कार्यवाही कैसी होनी चाहिए ?

गप्पी -- हमारे देश में इस समय एक बड़ी बहस चल रही है। ये बहस है संसद की कार्यवाही को लेकर। इस बहस में पूरा देश शामिल है। जिस आदमी को ये नही मालूम की सोसायटी में रस्ते पर कूड़ा नही डालना चाहिए वो भी इस पर सुझाव दे रहा है की संसद की कार्यवाही कैसी होनी चाहिए। वो लोग जिन्हे ये नही समझ में आता की बाइक पर हेलमेट लगाना क्यों जरूरी है बता रहे हैं की देश की बहुत बदनामी हो गयी। हालत हास्यास्पद हो गयी है। मैं एक ट्रैन में जा रहा था जिसमे पंद्रह-बीस नौजवान भी यात्रा कर रहे थे। सबके सब पीछे कमर पर बैग लटकाये हुए थे और मोबाईल पर गेम खेल रहे थे। लेकिन सबके सब संसद की कार्यवाही ना चलने पर दुखी भी थे और गुस्से में भी थे। वो पुरे विपक्ष को कोस रहे थे। कार्पोरेट मीडिया का तिलस्मी प्रभाव पूरे जोर पर था। बहस बहुत देर चलती रही। अचानक एक जवान ने कहा " यार ये जो राज्य सभा है ये कौनसे राज्य की है। सारी  प्रॉब्लम तो इसी में है। "
         " पता नही यार। रोज तो एक राज्य बनता है। परन्तु मेरे ख्याल से तेलंगाना की होगी, वो ही बना है लास्ट में। " दूसरे ने कहा
        " लेकिन कुछ भी हो, मैं तो कहता हूँ की ये होनी ही नही चाहिए। " दूसरे ने कहा।
        " मैं तो कहता हूँ की ऐसा कानून बना देना चाहिए की कम से कम बीस बिल तो पास करना जरूरी होगा। वरना किसी भी सांसद को कोई वेतन नही मिलेगा। " दूसरे ने जोर देकर कहा।
         " बिलकुल सही बात है। काम नही तो वेतन नही। " लगभग सभी सहमत थे।
         " मैं बताता हूँ इसका परमानेंट इलाज। संसद में ठेका सिस्टम लागु कर देना चाहिए। एक बिल पास करने का दस हजार। वरना कोई पैसा नही। फिर देखो कैसे पास नही होते बिल। " एक नौजवान ने अतिरिक्त उत्साह से कहा। बाकि सबने इस पर तालियाँ बजाई।
           हमारे देश का भविष्य लोकतंत्र को ठेके पर देने पर विचार कर रहा था।
          मैं ट्रेन से उतर कर आगे गया तो रस्ते में एक मिल के खण्डहर आते हैं। ये मिल सालों पहले बंद हो चुकी है यहां शहर के कुछ आवारा लड़के जुआ इत्यादि खेलते हैं। आज वो सब बैठे हुए थे। खेल नही रहे थे। मैं वहां से गुजरा तो उनमे से एक ने मुझे आवाज दी। मैं रुका।
          " अंकल ये संसद क्यों नही चल रही ? इस तरह तो देश का सत्यानाश हो जायेगा। " एक लड़के ने कहा।
          मैं आश्वस्त हो गया भारतीय लोकतंत्र के भविष्य के प्रति। अब कोई खतरा नही है। पहले हम इस लोकतंत्र की रक्षा की उम्मीद छात्रों, बुद्धिजीवियों, मजदूरों , किसानो और जनसंगठनों से करते थे। अब इसकी जिम्मेदारी जुआरियों ने उठा ली है।
             घर आया तो टीवी पर खबर चल रही थी की देश के उद्योगपतियों ने हस्ताक्षर अभियान चलाकर सांसदों से संसद की कार्यवाही चलने देने की मांग की है। मैं पुछना चाहता था की क्या इनमे वो उद्योगपति भी शामिल हैं जो बैंको का चार लाख करोड़ रुपया खा कर बैठे हैं। या वो उद्योगपति जो उन पर बकाया लाखों करोड़ रुपया टैक्स बाप का माल समझ कर हड़प कर गए।  वो भी शामिल हैं क्या, जो लोग देश के बैंको को फेल होने के कगार पर पहुंचाने के लिए जिम्मेदार हैं। उनको  देशभक्ति का दौरा पड़ा है।
            आगे खबर आई की मशहूर रेल इंजीनियर श्रीधरन ने उच्चतम न्यायालय में याचिका देर करके मांग की है की उच्चतम न्यायालय संसद की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने के लिए हस्तक्षेप करे। मुझे लगा की श्रीधरन संसद और मेट्रो रेल में फर्क नही कर पा रहे हैं। उन्हें पहले भरतीय रेल को सुचारू रूप से चलाने पर ध्यान देना चाहिए और संसद को सांसदों के भरोसे छोड़ देना चाहिए।
              मुझे लगा की देश का कॉर्पोरेट मीडिया और उसके विशेषज्ञ जैसी कार्यवाही चाहते हैं वो इस तरह की होगी।
                सदन के अध्यक्ष सदन में प्रवेश करते हैं। सभी सांसद खड़े हो जाते हैं। अध्यक्ष बैठ जाते हैं तो सभी बैठ जाते हैं। अध्यक्ष पिछले दिन हुई दुर्घटना के मृतकों को श्रद्धांजलि का प्रस्ताव पढ़ते हैं फिर पूरा सदन खड़े होकर मौन धारण करता है। उसके बाद विपक्ष के चार पांच सदस्य खड़े होकर कहते हैं की उन्होंने कार्यस्थगन प्रस्ताव का नोटिस दिया है। अध्यक्ष कहते हैं की उन्हें नोटिस मिले हैं लेकिन वो उनको ख़ारिज करते हैं। विपक्ष के सदस्य अध्यक्ष का धन्यवाद करके वापिस बैठ जाते हैं। फिर संसदीय कार्य मंत्री खड़े होकर कहते हैं की सरकार का विचार है की कई दिन से विपक्ष के सदस्यों को बोलने का मौका नही दिया गया इसलिए आज का प्रस्ताव मान लिया जाये।
               अध्यक्ष प्रस्ताव स्वीकार कर लेते हैं।
                विपक्ष के नेता कहते हैं की अख़बारों में खबर छपी है की सरकार द्वारा विदेशी कम्पनी को दिए गए ठेके में भृष्टाचार हुआ है। और उसमे सत्ताधारी पार्टी के एक राज्य के मुख्यमंत्री का बेटा और वित्तमंत्री की बेटी दोनों शामिल हैं।
                  अध्यक्ष कहते हैं की अख़बार में छपी खबर के हिसाब से आरोप नही लगाये जा सकते।
                  विपक्ष के नेता माफ़ी मांगते हैं और कहते हैं की अगर जाँच हो जाये तो क्या हर्ज है ?
                  अध्यक्ष कहते हैं की सदन में किसी मुख्यमंत्री का नाम नही लिया जा सकता।
                  विपक्ष के नेता फिर माफ़ी मांगते हैं और कहते हैं की वित्तमंत्री की बेटी उसी कम्पनी में काम करती है जिस कम्पनी को ठेका दिया गया है।
                  वित्त मंत्री खड़े होकर कहते हैं की जिन लोगों ने ठेके के कागज पर दस्तखत किये हैं उनमे उनकी बेटी शामिल नही है इसलिए सरकार सारे आरोपों को ख़ारिज करती है। सत्तापक्ष के लोग जोर जोर से मेज थपथपाते हैं। सरकार जाँच करवाने के लिए भी तैयार है लेकिन विपक्ष उसके लिए वो सारे सबूत लेकर आये। अगर विपक्ष सबूत लेकर आता है तो सरकार उन सबूतों की जाँच करवाने के लिए तैयार है। चर्चा समाप्त हो जाती है।
                    उसके बाद सरकार ताजमहल को बेचने का बिल पेश करती है
                    विपक्ष के लोग कहते हैं की ताजमहल नही बेचा जा सकता।
                    मंत्री कहते हैं की सरकार कुछ भी कर सकती है। और कि तुम चुनाव हार गए हो इसलिए तुम्हे बोलने का कोई अधिकार नही है।
                      बिल पास हो जाता है।
 कॉर्पोरेट मीडिया खबर देता है की आज सदन में 105 % काम हुआ। और जो खर्च संसद पर हुआ उसका पूरा उपयोग हुआ।
                           पूरा देश इस पर संतोष व्यक्त करता है।

Wednesday, August 12, 2015

Vyang -- अल्बर्ट पिन्टो को रोना क्यों आता है ?

गप्पी -- अब अल्बर्ट पिन्टो को गुस्सा नही आता , रोना आता है। बेचारगी में किसी को गुस्सा नही आता रोना ही आता है। अल्बर्ट पिन्टो 30 साल का नौजवान है। उसने बी-टेक किया है कम्प्यूटर साइंस में। कभी उसे इस बात का गर्व होता था अब मलाल होता है। आदमी को जिंदगी में बहुत सी चीजों पर मलाल होता है। परन्तु दिक्क्त ये है की जब तक उसे पता चलता है की अमुक चीज पर उसे मलाल होने वाला है और कुछ होने का समय ही नही होता। जब उसे बी-टेक पर मलाल होने का पता लगा, वो बी-टेक कर चूका था। और बी-टेक करने के जुर्माने के रूप में एक लाख का कर्जा भी हो चुका था। उसने बहुत दिन इंतजार किया की ये मलाल मिट जाये, यानि उसे कोई नौकरी मिल जाये परन्तु इस देश के बहुमत के नौजवानो की तरह उसका मलाल मिट नही पाया। दो तीन साल गुजर जाने के बाद पता चला की अब तो कर्जे का ब्याज चुकाने के लिए भी कुछ नही बचा है तो उसने कॉल सेंटर में नौकरी कर ली। 10000 की फिक्स पगार। कुल मिलाकर 120  लोग। जिंदगी मलाल के साथ साथ आगे बढ़ने लगी।
                         कुछ दिन पहले ही ये खबर आई की सरकार श्रम कानूनो में सुधार कर रही है। उसे आशा बंधी, अब कुछ होगा। ये सरकार और प्रधानमंत्री उसके और उस जैसे नौजवानो के लिए कुछ जरूर करेंगे। उन्होंने वादा किया था। और चाहे कुछ भी हो ये "आदमी" अपने वादे का पक्का है। उसने भी चुनाव के दौरान रैलियों में उसके लिए नारे लगाये थे। सोशल मीडिया पर विपक्षियों को गलियां दी थी। अब जाकर उसका दिन आया है। अब सरकार श्रम कानूनो में सुधार करने जा रही है। सरकार का कहना है की इससे रोजगार बढ़ेगा। मजदूरों की कमाई बढ़ेगी। उसे उम्मीद है।
                        लेकिन ये क्या हो रहा है। उसके कॉल सेंटर के मालिक भी खुश हैं और इसका समर्थन कर रहे हैं। उनको तो घबराना चाहिए। लेकिन वो तो मांग कर रहे हैं की इसे जल्दी लागु किया जाये। विपक्ष की पार्टियां और मजदूरों के संगठन इसका विरोध कर रहे हैं। उसे कुछ समझ में नही आ रहा है। सब कुछ उलझा उलझा लग रहा है।
                        आज प्रधानमंत्री इस मुद्दे पर टीवी में कुछ कहने वाले हैं। बिलकुल "मन की बात" की तरह। टीवी पर आने वाले कार्यक्रम से आधा घंटा पहले ही वह सोफे पर बैठ गया है। घर वाले सीरियल देखना चाहते हैं लेकिन वो सबको डांट देता है। सही समय पर प्रधानमंत्री टीवी पर रूबरू होते हैं। मित्रो, हम इस देश में अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे कुछ श्रम कानूनो में बदलाव करना चाहते हैं। हम चाहते हैं की इस देश में श्रम के बाजार में बढ़ौतरी हो। सब नौजवानो को काम मिले जिससे वो अपने और अपने माँ-बाप के सपनो को पूरा कर सकें। हम ओवर टाइम के कानूनो में बदलाव करना चाहते हैं। दुगना ओवर-टाइम की शर्त गलत शर्त है। क्या किसी मजदूर को इसका हक नही है की वो अपने मालिक के सामने खड़ा होकर अपनी मजदूरी तय कर सके। मैं कहता हूँ की उसको इसका पूरा हक है। क्या उसे हक नही है की वो ये कह सके की वो कितनी देर तक ओवर-टाइम करना चाहता है। मैं कहता हूँ की पूरा हक है। हर मजदूर, हर नौजवान को इस बात का हक है की नही की वो मालिक की आँखों में आँखे डालकर कह सके की वो इतनी देर ओवर-टाइम करेगा और उसके लिए इतनी मजदूरी लेगा। अगर वो नौकरी छोड़ना चाहता है तो उसे इसका पूरा हक है। वो किसी का बंधुआ मजदूर नही है। फिर उस पर एक महीने के नोटिस का प्रतिबंध क्यों है। हम इस प्रतिबंध को समाप्त कर रहे हैं। ये कानून पास होने के बाद हर नौजवान गर्व से अपने नौकरी दाताओं को कह सकेगा की उसे क्या चाहिए।
            उसे शरीर में झुरझुरी महसूस हुई। उसे एक नए माहौल का अहसास हुआ। आत्म सम्मान के अतिरेक में उसे रात को देर से नींद आई।
             टीवी पर संसद का सीधा प्रसारण हो रहा था। सरकार बिल पेश करने की कोशिश कर रही थी। परन्तु विपक्ष उसे हंगामा करके रोक रहा था। उसके मन में जितनी गलियां याद थी वो सारी की सारी विपक्ष को दे चूका था। आखिर सरकार बिल को पेश करने और बिना बहस के पास कराने में कामयाब हो गयी। उसने चैन की साँस ली। एक अजीब सा संतोष उसके चेहरे पर झलक रहा था।
             अगले दिन ड्यूटी के दौरान उसका आत्म विश्वास बढ़ा हुआ था। शाम को ड्यूटी खत्म होने के समय उसे मैनेजर के कार्यालय में बुलाया गया। वहां बाकि के 25-30 लोग भी मौजूद थे। मैनेजर ने कहा की कल से ड्यूटी 12 घंटे की होगी। और ओवर-टाइम भी सिंगल रेट से दिया जायेगा।
                  उसने आगे बढ़कर कहा की पहले दुगना ओवर-टाइम मिलता था। हम तो अब उस पर भी काम करने को तैयार नही हैं। आपको हमारे साथ बात करके रेट तय करना होगा। मैनेजर और उसके साथ बैठे दो-तीन लोग जोर से हँसे। " लगता है भाषण सुन कर आया है समझ कर नही। "
                     " ठीक है, अब दुगने ओवर-टाइम का कानून तो है नही। अब हम सिंगल से ज्यादा नही देंगे। जिसको मंजूर नही हो वो कैश काउन्टर पर जाकर अपना हिसाब ले ले। "
                       आप इस तरह बिना नोटिस दिए अचानक कैसे नौकरी से निकाल सकते हो। उसने अधिकार से कहा।
                        " तुम्हे मालूम नही की एक महीने का नोटिस पीरियड खत्म कर दिया गया है। " मैनेजर ने मुस्कुराते हुए कहा।
                       वह बाहर निकल आया। उसे प्रधानमंत्री का भाषण याद आ रहा था, " क्या किसी नौजवान को हक नही की -----------" और उसे रोना आ गया।

Tuesday, August 11, 2015

Vyang -- इस बार अर्थशास्त्र का नोबल पुरुस्कार हमारी सरकार को मिलना चाहिए।

गप्पी -- मैं ये बात पूरी जिम्मेदारी और होशोहवास में कह रहा हूँ। पूरी दुनिया में अब तक अथशास्त्र के क्षेत्र में जितनी खोजें हुई हैं ये अकेली खोज उन सब पर भारी है। इस खोज से पूरी दुनिया की गरीबी मिटाई जा सकती है। पूरी दुनिया में पूंजी की जो कमी है वो दूर की जा सकती है। बताओ आपने कभी इससे ज्यादा क्रन्तिकारी खोज के बारे में सुना है। और सबसे बड़ी बात ये है की कई विपक्षी दल भी इस खोज से सहमत हैं। कृपया धर्य रखिये, मैं इस खोज के बारे में बताने ही जा रहा हूँ। अगर इस पर मैं पहले कही गयी बातें नही कहता तो इसकी महान स्थिति को समझने में अापसे गलती हो सकती थी। या फिर आप इसे यों ही ध्यान से निकाल सकते थे। इसलिए पहले मैंने इसके महत्त्व को रखांकित किया और बाद में इसकी तफ्सील बता रहा हूँ। परन्तु मेरी पाठकों से विनती है की वो इसको जरा ध्यान पूर्वक पढ़ें।
                 हमारी सरकार ने संसद में एक बिल पेश किया है जिसे GST बिल कहते हैं। वैसे तो ये बिल टैक्स लगाने और इकट्ठा करने से संबंधित है। और इसको टैक्स क्षेत्र में किये जाने वाला अब तक का सबसे बड़ा सुधार कहा गया है। परन्तु इस बिल के बारे में जो कुछ सरकार की तरफ से और मीडिया में कहा गया है और जो जानकारी दी गयी है उसमे इसकी महानता छिपी हुई है। जैसे,--
    १. इस बिल से ग्राहकों को सस्ता सामान मिलेगा।
    २. इस बिल से उद्योगों को फायदा होगा और उनकी लागत घटेगी।
    ३. इस बिल से सरकार की आमदनी बढ़ेगी।
    ४. इस बिल से राज्य सरकारों की टैक्स की उगाही बढ़ेगी।
                                आया कुछ समझ में ?
              अगर किसी चीज से सरकार की टैक्स उगाही बढ़ती है तो जाहिर है की ये पैसा सामान खरीदने वाले की जेब से जाता है। लेकिन सरकार कह रही है की खरीददार को सामान सस्ता मिलेगा। अगर ग्राहक को सामान सस्ता मिलता है और सरकार को टैक्स ज्यादा मिलता है तो बीच का पैसा कहां से आएगा। जाहिर है की हवा से पैदा होगा। और अगर कोई सरकार हवा से पैसा पैदा कर दे तो उसे नोबल पुरुस्कार मिलना चाहिए की नही। अब तक दुनिया में ऐसे हवा से पैसा पैदा करने की कोई खोज नही हुई है। इसलिए इस क्रन्तिकारी खोज को पूरी दुनिया में लागु करके गरीबी मिटाई जा सकती है। पूंजी की कमी को दूर किया जा सकता है।
                 मीडिया में बैठे हुए एक्सपर्ट इस पर घंटों बहस करते हैं और सिद्ध करते हैं की हाँ, ऐसा ही होने वाला है। इससे देश की जीडीपी में दो प्रतिशत तक बढ़ौतरी हो सकती है। मुझे अब तक ये समझ में नही आया की टैक्स उगाही का सिस्टम बदल देने से पुरे देश की जीडीपी कैसे बढ़ जाएगी। टैक्स उगाही का जीडीपी से क्या लेना देना है। लोग सामान अपनी हैसियत के मुताबिक खरीदते हैं। उसमे दस प्रतिशत की बजाए बीस प्रतिशत टैक्स लगना शुरू हो जाये तो जीडीपी कैसे बढ़ जाएगी। एक ही चीज है जिससे जीडीपी बढ़ सकती है। वो है उत्पादन करने वाले उद्योगों में बदलाव आना। इस सिस्टम के हिसाब से अपना सामान बनाने और उसे बाजार में बेचने के लिए जितनी तरह की लाइसेंस की श्रृंखला चाहिए वो छोटे उद्योगों के लिए सम्भव नही है। इसलिए उनके उत्पादन का स्थान बड़ी कंपनियां ले लेंगी। छोटे उद्योगों का हमारे ओद्योगिक उत्पादन में जो बड़ा हिस्सा है, बड़ी कम्पनियों की आँखे उस पर लगी हुई हैं। इसलिए उनका इतना दबाव है इसे लागु करने का। बड़े उद्योगों को फायदा करवाने के लिए प्रतिबद्ध सरकार पहले छोटे उद्योगों के मरने का रास्ता साफ करेगी और बाद में उस पर संसद में आंसू बहाएगी किसानो की तरह। जो विपक्षी दल आज इसको समर्थन कर रहे हैं कल वो छोटे उद्योगों की मौत पर दहाड़ें मार मार कर रोयेंगे और सरकार को कोसेंगे।
                    परन्तु अगर ये सब नही होगा और व्ही सब होगा जो सरकार कह रही है तो सरकार निश्चित रूप से नोबल पुरुस्कार की अधिकारी है।

Monday, August 10, 2015

Vyang -- सरकार के सारे अनुमान हमेशा छोटे या बड़े क्यों होते है ?

गप्पी -- आज सुबह देवघर में वैद्यनाथ मंदिर में भगदड़ मच गयी और करीब ग्यारह आदमियों के मरने की खबर आई। बहुत से लोग घायल भी हुए। राज्य सरकार से जब हादसे पर पूछा गया तो उसका जवाब था की अनुमान से ज्यादा भीड़ होने के कारण हादसा हुआ। इससे पहले भी मंदिरों और मेलों में भगदड़ मचने और लोगों के मरने की खबरें आती रही हैं। इन सब में कुछ बातें समान है। एक तो सरकार के बयान, जो हमेशा एक जैसे होते हैं। दूसरे भगदड़ मचने का कारण लगभग हमेशा पुलिस का लाठीचार्ज होता है। हमेशा पुलिस कहती है की वो लाइन लगवा रही थी। तीसरी ये की हमारे देश के लोग अब तक ये भी नही सीख पाये की लाइन कैसे लगाई जाती है। उसके बाद की समान चीजों में शोक प्रकट करना, घायलों को सांत्वना देना और मुआवजे की घोषणा करना इत्यादि है।
                  थोड़ी सी बारिश होती है और पूरा शहर पानी पानी हो जाता है। सारी व्यवस्था फेल हो जाती है। लोग डूब जाते हैं। सरकार से पूछो तो कहेगी की अनुमान से ज्यादा बारिश होने कारण ऐसा हुआ।
                    किसी भी काम पर, दुर्घटना पर सरकार से पूछो तो उसका जवाब हमेशा यही होता है की अनुमान से ज्यादा भीड़ या बारिश होने से ऐसा हो गया। मुझे ये समझ नही आता की ऐसे छोटे अनुमान लगाने को आपको किसने कहा था। क्या संविधान में ऐसा कोई प्रावधान है। फिर एक बार की बात नही है। आपके अनुमान तो साल में पांच बार छोटे पड़ते हैं। तो सरकार ये अनुमान लगाने का काम किसी दूसरे को क्यों नही दे देती। जैसे अमेरिका को, मेरा मतलब है अमेरिका की किसी एजेंसी को। क्योंकि हम अमेरिका के अलावा तो किसी पर भरोसा करते नही हैं। जब जब हम पर मुसीबत आई है हमने हमेशा अमेरिका से गुहार लगाई है भले ही वह मुसीबत अमेरिका की ही पैदा की हुई क्यों ना हो।
                      संसद में वित्त मंत्री बजट पेश करते हैं। वह संसद को बताते हैं की इस साल इतने लाख करोड़ टैक्स की उगाही होने का अनुमान है। विपक्ष कहता है की सरकार का अनुमान गलत है। अर्थव्यवस्था में मंदी  है और सरकार के कदमों से मंदी और बढ़ेगी। इसलिए टैक्स की उगाही के सरकारी अनुमान गलत हैं। सरकार नही मानती। वह अपने दावों पर अडिग है। होना भी चाहिए। हमारे यहां मजबूत सरकार उसी को माना जाता है जो अपने गलत दावों पर अडिग रहे। अगले साल वही वित्त मंत्री दुसरा बजट पेश करते हुए कहता है की दुनिया में मंदी के कारण टैक्स की उगाही कम हुई इसलिए हमें स्कूली बच्चों के दोपहर भोजन में कटौती करनी पड़ी।
                         देश में किसान आत्महत्या करते हैं। सरकार कहती है की हमने किसानो की आत्महत्या रोकने के लिए पूरे इन्तजाम किये हैं। आत्महत्याएं होती रहती हैं। सरकार आंकड़े जारी करके कहती है की इस साल आत्महत्याओं में केवल 15 % की बढ़ौतरी हुई है जबकि पिछले साल 18 % दर से बढ़ौतरी हुई थी। इसलिए सरकार द्वारा उठाये गए कदमों का असर नजर आ रहा है। अगले साल बढ़ौतरी का आंकड़ा बढ़ कर 20 % हो जाता है। सरकार कहती है इतने भयानक सूखे का अनुमान नही था।
                       पुलिस या सेना के लिए भर्ती हो रही है। नौजवानो का हजूम उमड़ता है और भगदड़ में कई नौजवान मारे जाते हैं। बाकि नौजवान शहर को लूटने निकल पड़ते हैं। सरकार कहती है की इतनी भीड़ का अनुमान नही था। कोई पूछे की भई क्यों नही था। जब देश में चपरासी की 100 पदों की भर्ती की परीक्षा होती है तो तीन लाख नौजवान अप्लाई करते हैं। जिनमे इंजीनियर से लेकर MBA तक होते हैं। तो आपको सेना की भर्ती में भीड़ का अनुमान क्यों नही था ? लेकिन सरकार इसका जवाब नही देती। सरकार जवाब देने के लिए नही होती, गलत अनुमान लगाने के लिए होती है।
                      कभी कभी लोग ज्यादा शोर मचाते हैं तो जाँच बिठा दी जाती है। अगर शोर थम जाता है तो उसका जाँच अधिकारी ही नियुक्त नही किया जाता। मान लो कोई जाँच सही तरीके से हो भी गयी तो पता चलता है की सरकार ने जिस अधिकारी को मेले का प्रबंध करने की जिम्मेदारी दी थी वो पिछले दस सालों से भेड़ व ऊन विकास निगम को चला रहा था। सरकार को लगा की मेले में आने वाले लोगों और भेड़ों में कोई ज्यादा फर्क नही होता इसलिए उसको जिम्मेदारी दे दी। लेकिन सरकार का अनुमान गलत हो गया।
                 तो फिर इन दुर्घटनाओं को कैसे रोका जाये। क्योंकि सरकार तो कभी सही अनुमान लगाएगी नही।

खबरी -- मैं तो यही दुआ कर सकता हूँ की सरकार ने लोगों के सब्र का जो अनुमान लगाया है कम से कम वो तो सही हो।

Saturday, August 8, 2015

Vyang -- एक कुली से वाद-विवाद

गप्पी -- मुझे अपनी ये रेल यात्रा भी याद रहेगी। और वो भी एक कुली से वाद-विवाद के कारण। मैं अपने चार बैग के साथ रेलवे स्टेशन पहुंचा। वहां से मुझे पुल पार करके दूसरे प्लेटफार्म पर जाना था जो मैं एकसाथ चार बैग उठाकर नही जा सकता था। मुझे एक कुली की जरूरत थी जो मुझसे थोड़ी दूर मेरे बुलाने का इंतजार कर रहा था। मैंने उसे इशारा किया। वो आराम से चलकर मेरे पास आया और बोला, कहिये साहब, कहाँ जाना है ?
        दो नंबर पर।  मैंने कहा।
       सामान गाड़ी में भी रखवाना है या केवल प्लेटफार्म पर छोड़ना है ?
       गाड़ी में तो रखवाना ही पड़ेगा, वरना इतना सामान लेकर मैं गाड़ी में चढूंगा कैसे ?
       कोई बात नही, सामान गाड़ी में ही क्यों आपकी सीट के नीचे व्यवस्थित तरीके से रख देंगे। आप आराम से चढ़ना।
        कितना पैसा लोगे ? मैंने पहले तय करना ठीक समझा।
         दौ सौ रूपये दे देना। उसने एकदम आराम से कहा जैसे टिकट का रेट बता रहा हो।
         दौ सौ !!!!!!!! मैंने आश्चर्य व्यक्त किया। केवल एक ही प्लेटफार्म आगे तो है ?
         इसीलिए दौ सौ होते हैं, वरना हर प्लेटफार्म के हिसाब से बीस रूपये बढ़ जायेंगे।
         ये तो जनरल डिब्बे का दिल्ली तक का किराया होता है जो तुम मुझसे एक प्लेटफार्म पार करवाने का मांग रहे हो। इतनी तो कलेक्टर की तनखा भी नही होती।  मैंने अपने सारे तर्क एकसाथ झोँक दिए।
         जनरल डिब्बे में 70 सीटों पर 400 यात्री सफर करते हैं सो रेलवे का हिसाब तो बराबर हो जाता है। और जहां तक कलेक्टर का सवाल है उसे चार बैग उठाकर नही चलना पड़ता। अगर उसे भी चार बैग उठाकर चलना पड़ता तो वह भी इस तनखा में काम करने से इनकार कर देता। उसने एकदम सहज भाव से जवाब दिया।
           उससे तो अच्छा है की मैं खुद दो बार में ले जाऊँ। मैंने आखरी तरीका अपनाया।
          नही, वो अच्छा नही है। आप दो बैग लेकर ऊपर जायेंगे और जब तक वापिस आएंगे आपको यहां वाले दो बैग गायब मिलेंगे। जब आप यहां से चीख-चिल्लाकर वापिस जायेंगे तो वहां वाले दोनों बैग भी गायब मिलेंगे। इस तरह दौ सौ बचाने के चककर में आपके चारों बैग चोरी हो जायेंगे। उसने फिर पूरे आराम से कहा।
           ये तो सरासर धोखाधड़ी है। एकदम दादागिरी। मुझे गुस्सा आया।
           नही ये धोखाधड़ी नही है। धोखाधड़ी वो है जब एक डॉक्टर वो टेस्ट लिखता है जिसकी जरूरत नही होती। या फिर वो दवाई देता है जिसकी मरीज को कोई जरूरत नही होती। और दादागिरी वो होती है जब स्कूल का हैड मास्टर आपको बच्चे की यूनिफॉर्म उसी दुकान से खरीदने को बाध्य करता है जिसका रेट स्कूल का कमीशन मिलाकर बाजार से दुगना होता है। उसने फिर बिना किसी परेशानी के जवाब दिया।
            तुम्हे पता है की डाक्टर बनने के लिए कितना खर्चा करना पड़ता है ? तुम अपने काम की तुलना डॉक्टर से कर रहे हो। मैंने असहमति में सिर झटका।
             आपको क्या लगता है की रेलवे में कुली का काम लेना MBBS में एडमिशन से आसान है ?
            एक डॉक्टर को पढ़ाई पूरी करने में 20 साल लगते हैं। मैंने हँसते हुए एतराज किया।
            मुझे भी MBA करने में बीस साल लगे हैं। उसने जैसे बम फोड़ा।
            तुम MBA हो !!!! फिर कुली का काम क्यों कर रहे हो। कोई अच्छा काम क्यों नही करते? मैंने आश्चर्य प्रकट किया।
             ये भी अच्छा काम है। इसमें क्या खराबी है। फिर अच्छा काम किसको कहते हैं ? बड़े बड़े लोग जिनको समाज में बहुत इज्जत मिलती है ड्रग्स का धंधा करते हैं, सैक्स रैकेट चलाते हैं, मंदिर चलाते हैं, निजी गौशालाएँ चलाते हैं। अगर आपने मधुर भंडारकर की फिल्म " ट्रैफिक सिगनल " देखी  हो तो मालूम पड़ेगा की भीख मांगना की कितना बड़ा धन्धा है। उन सबसे ये धन्धा मुझे लाख गुना अच्छा लगता है। उसने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
             अब मेरे पास कोई तर्क नही बचा था सो मैंने उससे कहा, ठीक है ले चलो।
             उसने एक लड़के को आवाज दी और उससे कहा की साहब को दो नंबर पर गाड़ी में बिठा देना। इनका सामान ठीक से सीट के नीचे रखवा देना और साहब को पानी या चाय वगैरा की जरूरत हो तो वो भी लाकर दे देना।
         तभी एक बूढी और भारी शरीर की महिला ने स्टेशन में प्रवेश किया। उसके पास सामान के नाम पर कुछ था नही लेकिन वो अपनी छड़ी के सहारे बड़ी मुश्किल से चल पा रही थी। उस कुली ने उससे पूछा, माताजी कहां जाना है ?
            पांच नंबर पर जाना है बेटा। पता नही वहाँ पहुँचते पहुँचते गाड़ी ना निकल जाये। महिला ने हांफते हुए जवाब दिया।
            दो मिनट रुको माताजी, उसने एक दूसरे लड़के को आवाज लगाई। जाओ व्हीलचेयर लेकर आओ और माताजी को पांच नंबर पर छोड़ दो।
             कितने पैसे लोगे बेटा ? महिला ने पूछा।
            व्हीलचेयर का बीस रुपया दे देना माताजी।
             मैं हैरान था। मैंने उसकी तरफ देखा तो उसने हँसकर कहा , आपने कुछ दुकान वालों को गौशाला का दानपात्र रखे देखा होगा, ये हमारा दान पात्र है। और वो आगे चला गया।

खबरी -- इस पर कहने के लिए मेरे पास कोई शब्द नही हैं।      

          

Friday, August 7, 2015

Vyang -- जनसंख्या नियंत्रण का काम रेलवे मंत्रालय को।

गप्पी -- लोग अब तक यही समझते थे की जो मंत्रालय जिस विभाग से संबंधित है वो केवल उसका ही काम करता है। ऐसा संविधान में नही लिखा है ये सरकार का मानना है। इसलिए किसी भी विभाग को कोई भी काम दिया जा सकता है। वैसे जो विभाग जिस काम के लिए बनाया गया है उसका काम तो वो करता ही है। जैसे मैंने सूरत की ट्रैफिक जाम की समस्या पर अपने पड़ौसी से पूछा की वो कौनसे दो मुख्य कारण मानते हैं ट्रैफिक जाम के लिए। तो उसने कहा की पहला तो ट्रैफिक पुलिस और दूसरा महानगर पालिका। उसने कहा की और किसी विभाग को तो अधिकार ही नही है ट्रैफिक जाम करने का।

            मैंने आश्चर्य व्यक्त किया तो उसने समझाया।

   देखो, जो ट्रैफिक पुलिस हम सड़कों पर देखते हैं और समझते हैं की ट्रैफिक को ठीक करने के लिए है दरअसल वो उसके लिए नही है। जो पांच ट्रैफिक कांस्टेबल और दस ट्रैफिक ब्रिगेड के जवान किसी चौराहे पर ड्यूटी दे रहे होते है उनमे से सात लोग चौराहे से पहले पैसे इकट्ठे करते है और सात चौराहे के आगे। चौराहे पर केवल एक आदमी होता है जो इसलिए खड़ा किया जाता है की अगर कोई पहली टीम को धोखा देकर निकलने की कोशिश करे तो वो आगे वाली को खबरदार कर दे। जब चौराहे पर जाम लग जाता है तो हमारी समझदार जनता दूसरी तीसरी लाइन लगा कर दोनों तरफ आमने सामने हो जाती है। कोई निकल नही सकता। तब एक जवान आता है और जो सबसे गलत तरीके से ट्रैफिक रोके हुए हैं उनको सबसे पहले निकलता है। इसलिए हर आदमी गलत जगह जाकर खड़ा होने की कोशिश करता है ताकि उसे पहले निकाल दिया जाये।

           दूसरे, महानगर पालिका के लोग हैं जो वन वे सड़क के दोनों तरफ एक साथ गड्डा खोदते हैं। अगर किसी कारण से एक ही गड्डा खोदना पड़ता है तो उसके बाजू में ट्रक पार्क करके घर चले जाते हैं। उन्हें मालूम है की सड़क उनकी है और बाकि के जो लोग सड़क पर चलते हैं वो उनकी दयाभावना का फायदा उठा कर चलते हैं। शहर में कम से कम सौ जगह ऐसी होती हैं जहां हर तीन महीने में खुदाई की जाती है और दो महीने चलती है। अब तो लोग घर से निकलते ही पूछ लेते हैं की फलां जगह खुदाई तो नही चल रही है वरना दूसरा रास्ता लें। कभी कभी कोई बोर्ड इस्तेमाल करना भी होता है जिस पर लिखा होता है की आगे काम चालू है, तो उसको उस जगह रखा जाता है की वाहन वाले को उसे देखने के बाद कम से कम एक किलोमीटर वापिस आना पड़े।

         मेरे पड़ौसी का मानना है की अगर ट्रैफिक पुलिस और महानगर पालिका को भंग कर दिया जाये तो सूरत की ट्रैफिक समस्या हल हो सकती है।

             खैर, हम तो रेलवे की बात कर रहे थे। सो उसे जनसंख्या नियंत्रण का काम भी दे दिया गया है। यह काम उसे यों ही नही दिया गया है बल्कि बाकायदा उसकी योग्यता को ध्यान में रखकर दिया गया है। रेलवे  ने इस काम के लिए कुछ कार्य योजना तय की हैं। जो इस प्रकार हैं।

        १. सीधी कार्य योजना, जिसे लोग तकनीकी भाषा में दुर्घटना कहते हैं।

        २. रेल में खाने की क्वालिटी ऐसी रखना जिससे आदमी धीरे-धीरे करके लेकिन निश्चित रूप से मर जाये।

        ३. रेल का किराया इतना रखना जिससे कमजोर दिल के आदमियों को भगवान से मिलने के लिए ज्यादा इंतजार ना करना पड़े।

        ४. रेल के डिब्बों में इतनी भीड़ रखना की घरवाले यात्री का श्राद्ध करके ही रेल में बिठाने आएं। ये जो एक एक आदमी को बीस बीस लोग बैठाने आते हैं वो इसीलिए आते हैं की उनको मालूम है की आखरी बार मिल रहे हैं।

        ५. रेल में टिकट चैकर और रेलवे पुलिस के जवानो को भी ट्रेनिंग दी गयी है और वो भी बीच बीच में यात्रियों  को चलती ट्रेन से फेंक कर इसमें योगदान करते हैं।

         ६. जैसे ही ट्रेन स्टेशन पर पहुंचती है, पानी की लाइन बंद कर दी जाती है ताकि गर्मी और प्यास को भी अपनी भूमिका निभाने का मौका मिल सके।

        ७.रेलवे स्टेशनों पर इतनी गंदगी रखी जाती है की यात्रियों की तरह ही हजारों बीमारियां भी शहर में रोज प्रवेश करती हैं। 

          ८. इस कार्ययोजना को तेज करने के लिए एक विशेष सेल बनाया जा रहा है।

Wednesday, August 5, 2015

Vyang -- शुषमा जी का नया ज्ञान बोध, कौन ललित मोदी ?

गप्पी -- शुषमा जी अब तक कह रही थी की उन्होंने ललित मोदी की मदद मानवीय आधार पर की थी। उनके इस पर कई ट्वीट हैं। अब उन्होंने संसद में कह दिया है की मैंने ललित मोदी की कोई मदद नही की। मुझे पूरी उम्मीद है की कुछ दिन बाद शुषमा जी ये कह सकती हैं की - ललित मोदी ! कौन ललित मोदी ?

           शुषमा जी को ये ज्ञान बोध अभी अभी हुआ है। जैसे उन्हें ये ज्ञान बोध भी अभी अभी हुआ है की संसद की कार्यवाही को रोकना ठीक नही है। हमे ही नही पूरे देश को याद है जब शुषमा जी संसद में गरज गरज कर कह रही थी की,

                              तू इधर उधर की बात न कर , ये बता काफिला क्यों लुटा ,

                              मुझे रहजनों से गिला नही ,  तेरी रहबरी पर सवाल है। 

                शायद शुषमा जी इसका मतलब भी भूल गयी होंगी। वो एक परफेक्ट भारतीय महिला हैं। उन्होंने सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए अपने बाल कटवाने की घोषणा की थी। एक विदेशी महिला को रोकने के लिए। परन्तु देश ने सोनियाजी को जीता दिया उनके मुकाबले में। ये तो भला हो खुद सोनियाजी का जिन्होंने प्रधानमंत्री ना बनने की घोषणा कर दी और शुषमा जी के बाल, बाल-बाल बच गए। 

                      लेकिन देश को शुषमा जी का नया बयान रास नही आ रहा है। अभी थोड़े दिन हुए हैं ना इसलिए, कुछ दिन बाद लोग ये भूल जायेंगे। शुषमा जी ने शुरू दिन से ललित मोदी प्रकरण पर जो सफाई दी है उस पर मुझे एक कहावत याद आ रही है। 

                      एक आदमी पर अदालत में किसी से मारपीट का मुकदमा चल रहा था।  जज ने उससे पूछा की उसे अपनी सफाई में क्या कहना है।  उस आदमी ने कहा की उसे अपनी सफाई में तीन बातें कहनी हैं। 

              पहली - ये  की वो उस दिन घटनास्थल पर था ही नही। 

               दूसरी -- अगर अदालत चाहे तो वो अपनी कलकत्ता वाली मौसी या चेन्नई वाले मामा को अदालत में पेश कर सकता है जो इस बात की गवाही देंगे की वो उसदिन उनके पास था। 

               और तीसरी -- ये की पहले थप्पड़ उसने मारा था। 

        शुषमा जी कह सकती हैं की ये कहावत सिर के बल खड़ी थी और उसने उसे सीधा खड़ा कर दिया। 

       शुषमा जी और उनके सहयोगियों को ये भी नया नया ज्ञान बोध हुआ है की सरकार के कामकाज में केवल कानून को देखा जाता है नैतिकता को नही। वरना पिछले दस साल के उनके भाषण निकाल कर देख लो उनमे नैतिकता पर इतना जोर दिया गया है जितना किताबों में भी नही मिलता। 

               मैं तो कहता हूँ शुषमा जी, अगर संसद में इस मामले पर चर्चा हो और उसमे स्वराज कौशल या बांसुरी कौशल का नाम आये तो कह देना की कौन स्वराज कौशल, कौन बांसुरी कौशल। बाद में इस पर कह देना की जब वो संसद में आती हैं तो सारे रिश्ते-नाते बाहर छोड़ कर आती हैं। और उन्हें देश सेवा में ये छोटी छोटी बातें याद नही रहती। इस पर तालियां बजाने के लिए आपके साथी संसद सदस्य और सोशल मीडिया में बैठे भाड़े के लोग तो हैं ही। 

                      वैसे एक लिस्ट बना लीजिये की आपको क्या-क्या याद रखना है और क्या-क्या भूलना है। वरना कुछ लोगों की बुरी आदत है की पहले कहि गयी बातों को नई बातों को मिला कर देखते हैं। और उनमे ऐसा बहुत कुछ है जो आपने उस समय की सरकार को शर्मिन्दा करने के लिए कहा था। और उन्ही बातों को लोग आपको शर्मिन्दा करने के लिए इस्तेमाल कर सकते  हैं। वैसे मैं तो कहता हूँ की इतने झगड़े में पड़ने की क्या जरूरत है ? साफ साफ कह दीजिये की हमने करना था कर दिया। कर लो जो करना है। साथ में वाजपेयी जी की तरह कह दीजिये की अगर विपक्ष को एतराज है तो अविश्वास प्रस्ताव लाये। जाहिर है की बहुमत के आगे अविश्वास प्रस्ताव की क्या ओकात है। बस आप तो एक चीज का ध्यान रखिये, ये बात गलती से लोगों को मत कह देना। वरना इस देश की जनता ऐसा हांल कर सकती है की खुद आपको भी विश्वास ना हो। 

 

खबरी -- सही बात है। विपक्ष की सौ सुनार की के सामने एक लुहार वाली कर देनी चाहिए।

Vyang -- रेल हादसा और कुछ अंदर की बातें

गप्पी -- एक और बड़ा रेल हादसा हो गया। सरकार ने कुछ रटी रटाई बातें की, पुरानी लिस्ट के कुछ काम दोहराये। जैसे -

        प्रधानमंत्री ने हादसे पर दुःख जताया। 

        रेल मंत्री ने हादसे पर दुःख जताया। 

        रेल हादसे की जाँच सुरक्षा आयुक्त से करवाने की घोषणा की। 

        रिपोर्ट  और जाँच से पहले ही घटना का कारण प्राकृतिक आपदा बता दिया। 

        मुआवजे की घोषणा की। 

        कुछ गाड़ियों के रुट बदले, कुछ रद्द की। 

        हेल्पलाइन नंबर जारी किये। 

ये हर हादसे के बाद किये जाने वाले कामो की तय लिस्ट है जो कम्प्यूटर में सेव है। हर हादसे के बाद इसे जारी कर दिया जाता है। हमे एक बड़ा रेल अधिकारी कैंटीन में मिल गया। उससे जो प्राइवेट बातें हुई उसके कुछ अंश यहां दे रहा हूँ। 

        मैं --- रेल मंत्री ने छानबीन से पहले ही कह दिया की दुर्घटना प्राकृतिक आपदा के कारण हुई। 

        अधिकारी --- रेल मंत्रालय कभी भी किसी दुर्घटना की जिम्मेदारी नही लेता। विभिन्न दुर्घटनाओ के लिए हमारे पास तय कारणों की लिस्ट मौजूद है। उसे चाहे छानबीन से पहले पूछ लो चाहे बाद में। जैसे, मानवीय भूल के कारण , तकनीकी गड़बड़ी के कारण, तोड़फोड़ की कार्यवाही के कारण, बिना फाटक के रोड पर किसी वाहन के गलती से आ जाने के कारण और प्राकृतिक आपदा के कारण। 

        मैं -- रेलवे लाइन के नीचे से पानी निकल गया, इतनी बारिश और बाढ़ का मौसम था तो क्या रेलवे को अतिरिक्त सावधानी नही बरतनी चाहिए थी। क्या रेल मंत्री सुरेश प्रभु  को इसकी जिम्मेदारी नही लेनी चाहिए ?

        अधिकारी --  दुर्घटना की जिम्मेदारी नीचे वाले प्रभु की नही ऊपर वाले प्रभु की है। 

         मैं -- जो दो लाख रूपये मुआवजा घोषित किया गया है, क्या आपको नही लगता वो नाकाफी है। 

       अधिकारी --- अब रेल दुर्घटना में मरने वालों का मुआवजा विमान दुर्घटना में मरने वालों के बराबर तो नही हो सकता। वैसे रेलवे इस बात पर विचार कर रहा है की अलग अलग श्रेणी के हिसाब से अलग अलग मुआवजा रक्खा जाये। फर्स्ट क्लास का तो किराया भी विमान के बराबर हो गया है। 

          मैं -- तो जो यात्री जनरल बोगी में सफर करते हैं उनका क्या होगा ?

          अधिकारी --- जनरल डब्बे में जनरल यानि आम लोग सफर करते हैं। उनका मुआवजा घटाकर 50000 किया जा सकता है। वो सस्ती जाने हैं। इसीलिए तो हम जनरल डिब्बे ट्रेन के आगे और पीछे लगाते हैं ताकि दुर्घटना की स्थिति में पहला नंबर उनका आये। आखिर उनका टिकट का रेट ही कितना होता है। 

           मैं -- क्या अब मरने वाले का मुआवजा टिकट के रेट से तय होगा ?

          अधिकारी -- देखिये अब पहले जैसी धांधली नही चल सकती। अब रेल मंत्री चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं। उन्हें सारा हिसाब आता है। कुछ दिन में वो रेल की कायापलट कर देंगे। 

            मैं -- लेकिन रेल मंत्रालय कोई ठोस काम क्यों नही करता ?

           अधिकारी -- कैसे नही करता ? हमने अभी-अभी तत्काल टिकटों का समय बदला है। अगले तीन महीनो में  हम ये समय दुबारा बदल देंगे। ऐसा हम हर तीन महीने बाद करने वाले हैं। हमने रेल टिकिट कैंसिल करवाने पर वापिस मिलने वाले पैसे को घटाकर वहां पहुंचा दिया है की कोई टिकट कैंसिल करवाये या न करवाये कोई फर्क नही पड़ता। अगर टिकिट कैंसिल करवाने के कारण रेलवे को जो आमदनी हुई है उसके आंकड़े जारी कर दिए जाएँ तो वो जातिगत जनगणना के आंकड़ों से ज्यादा विस्फोटक हो सकते हैं। 

              मैं -- लेकिन सुरक्षा के सवाल ---

             अधिकारी ---- रेल की आमदनी, रेल मंत्री और सरकार तीनो पूरी तरह सुरक्षित हैं।