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Tuesday, November 14, 2017

चाकू मारने के तर्क और भारतीय टीवी चैनलों पर बहस।

              शहर के मुख्य चौराहे पर एक आदमी ने दूसरे को चाकू घोंप दिया। लोगों ने उसे पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया। ये घटना शहर में चर्चा का विषय बन गयी। चाकू मारने वाला सत्ताधारी पार्टी से जुड़ा हुआ था और जिसे चाकू लगा वो एक आम आदमी था। लोगों को कारण समझ में नहीं आ रहा था।
                 थोड़ी देर बाद पुलिस ने प्रैस कॉन्फ्रेंस करके कहा की चाकू मारने वाले ने कहा है की उसने चाकू इसलिए मारा की सामने वाला बहुत मोटा हो गया था और मोटापे की वजह से उसको गंभीर बीमारियां होने का खतरा था। इसलिए उसने उसकी मदद करने के लिए उसे चाकू मारा ताकि उसका वजन कुछ कम हो सके। पुलिस ने ये भी कहा की पुलिस सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर अपनी जाँच करेगी। वह ये पता लगाने के लिए की इस तरह चाकू मारने से उसका कितना वजन कम हो सकता है, विशेषज्ञों की मदद भी लेगी।
                उसके बाद तीन दिन से लगातार टीवी पर इस मामले में चर्चा चल रही है की क्या वजन ज्यादा होना और मोटा होना सचमुच हानिकारक है। शहर के सभी हस्पतालों से एक एक डाक्टर सभी चैनलों पर बैठा है जो ये बताने के साथ की मोटापा कितना हानिकारक है और उसकी वजह से कितनी बीमारियां हो सकती हैं, ये भी बताता है की उसके हस्पताल में मोटापा दूर करने के लिए कौन कौन सी सुविधाएँ उपलब्ध हैं। 

Thursday, October 13, 2016

सेना को भी नही बख्सा, सबसे पहले के नारे ने

                     राजनीती में अपने को ज्यादा कुशल और तेजी से काम करने वाला दिखाना आम बात है। जब कोई आदमी या पार्टी खुद को दूसरों से ऊँचा दिखाने की कोशिश करती है तो या तो उसे अपनी उपलब्धियां बतानी पड़ती हैं या फिर अगर उसकी उपलब्धियां बहुत ही ओसत दर्जे की हैं या फिर नही के बराबर हैं, तो उसे दूसरों को छोटा दिखाना पड़ता है।
                      जब दूसरे को छोटा दिखाना होता है तो इस तरह की चीजें ढूंढी जाती हैं जो खुद के अनुकूल हों। इस क्रम में कई बार दूसरों को नीचा भी दिखाना पड़ता है। मौजूद सरकार अपने शुरू के दिनों से ही इस प्रोग्राम पर चल रही हैं। उसे मालूम है की जिस तरह के भारी भरकम वायदे करके वो सत्ता में आयी है उन्हें पूरा करना उसके बस से बाहर की बात है।
                      इसलिए उसने पहले दिन से ही " सबसे पहले " का राग अलापना शुरू कर दिया था। प्रधानमंत्री किसी देश की यात्रा पर जाते हैं तो सबसे पहले जाने वाले प्रधानमंत्री हैं, कोई समझौता करते हैं तो सबसे पहले करने वाले प्रधानमंत्री हैं, सेल्फी लेते हैं तो सबसे पहले लेने वाले प्रधानमंत्री हैं। इस होड़ में पूरा भांड मीडिया जोर जोर से चिल्लाकर सबसे पहले की रट लगाए रहता है।
                     अब इस रट में सेना को भी लपेट लिया गया है। जब सर्जिकल स्ट्राइक की खबर आयी तो ये खबरें भी आने लगी की इस तरह के सर्जिकल स्ट्राइक हमारी सेना पहले भी कई बार कर चुकी है। चूँकि दूसरे देश की सीमा में इस तरह की कार्यवाही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विरोध या आलोचना को आमन्त्रित कर सकती है और उस देश के साथ सम्बन्ध बिगड़ सकते हैं, इसलिए इस तरह की चीजों को सार्वजनिक नही किया जाता। दो देशो के बीच बहुत से ऐसे कूटनीतिक और रणनीतिक फैसले होते हैं जिन्हें आम लोगों के सामने नही लाया जाता। इसलिए पहले कभी इसके बारे में मीडिया को नही बताया गया। इस तरह की खबरें सार्वजनिक होने पर वहां के लोगों में गुस्सा फूट सकता है और सरकार पर बदले की कार्यवाही का दबाव बढ़ सकता है जैसा अब पाकिस्तान के साथ हो रहा है। पाकिस्तान के लाख इंकार करने के बावजूद वहां बदले की भावना बढ़ रही है और जो लोग पहले आतंकवादियों के खिलाफ थे वो भी इस कार्यवाही से  नाराज हैं। इस घटना को मीडिया में  उछालने से सेना को कोई मदद नही मिली केवल बीजेपी के गिरते  हुए  ग्राफ को  सम्भालने में मदद मिली। इसलिए जानकार लोग इसे राजनैतिक फैसला बता रहे हैं। पूर्व सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन ने भी इसे सेना की जरूरत के लिए नही बल्कि बीजेपी की जरूरत के लिए लिया हुआ फैसला बताया है।
                       लेकिन हमारा मुद्दा ये था की खुद को बड़ा दिखाने की होड़ में बीजेपी ने पहले किसी भी सर्जिकल स्ट्राइक से इंकार कर दिया। रक्षा मंत्री ने कहा की सेना ने पहले कभी भी सर्जिकल स्ट्राइक नही किया। अपने बड़बोलेपन में वो ये भी कह गए की मेरे आने के बाद सेना को अपनी ताकत का पता चला। विपक्ष को नीचा दिखने की होड़ में वो सेना को भी नीचा दिखा गए। अब अगर विपक्ष इस स्ट्राइक के नही होने की बात करता है तो उसे गद्दार और पाकिस्तान का समर्थक बताया जाता है और बीजेपी पिछले किसी स्ट्राइक से इंकार करती है तो भी देशभक्त बनी रहती है।
                       इस तरह हर मामले में सबसे पहले का नारा पता नही किस किस को बेइज्जत करेगा। यहां तक की उसने सेना को भी नही बख्सा।

Wednesday, October 5, 2016

राष्ट्रवादियों को केवल मरे हुए सैनिक पसन्द हैं।

     जब से सर्जिकल स्ट्राइक की खबरें आयी हैं, सारे भक्त राष्ट्रवाद की शराब पी कर उन्माद की अवस्था में पहुंच गए हैं। कोई शरीफ आदमी अगर इनको थोड़ा शांत रहने को कह देता है तो इन्हें उसमे नवाज शरीफ नजर आने लगता है। अपने कामकाज को लेकर निचले दर्जे पर पहुंच चुकी विश्वसनीयता को बहाल करने के लिए इस सरकार के पास इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नही बचा था। सरकार ने सर्जिकल स्ट्राइक के ढोल पीटे और उन राज्यों में प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री के सम्मान समारोह रख दिए, जिनमे निकट भविष्य में चुनाव हैं। अगर बीजेपी और सरकार के सारे बयानों और पोस्टरों को देखें तो ऐसा लगता है की सर्जिकल स्ट्राइक को सेना ने नही बल्कि बीजेपी कार्यकर्ताओं ने अंजाम दिया था।
                इस सर्जिकल स्ट्राइक से पाकिस्तान ने इंकार किया तो ये उसकी मजबूरी हो सकती है, लेकिन UNO के इंकार के मायने हैं। इसलिए लोगों ने सबूत पेश करने की मांग की। उन सबको भक्तों ने गद्दार घोषित कर दिया। सोशल मीडिया पर गालियां दी जाने लगी और सेना का मनोबल गिराने के इल्जाम लगाए जाने लगे।
                लेकिन असल में इन भक्तों और राष्ट्रवादियों को सैनिकों से कोई लेना देना नही है। एक तो उनके परिवार से शायद ही कोई सेना में हो, दूसरा उन्हें केवल मरे हुए सैनिक चाहियें ताकि उनके रोते हुए बच्चों और बिलखते माँ बाप की तस्वीरें दिखा कर देश में उन्माद पैदा किया जा सके। उनके टीवी चैंनल लगातार उन्हें दिखा कर खुद को देशभक्त भी साबित कर सकें,TRP भी बढ़ा सकें और उन्माद भी पैदा कर सकें।
                वरना एक साल से ज्यादा समय से जंतर मन्तर पर धरने पर बैठे भूतपूर्व सैनिक इनको दिखाई नही दिए। सारी उम्र देश की सेवा करके रिटायर हुए इन सैनिकों को वन रैंक-वन पेंशन कभी का दे दिया गया होता । इन पर कोई भक्त, कोई राष्ट्रवादी नही बोलता। दो महीने से ज्यादा हो गए जब हमारा एक विमान 29 सैनिकों के साथ लापता हो गया था, उसके लिए सरकार और भक्तों की आँख में एक आँसू नही दिखा। जो लोग आज पाकिस्तानियों को निकालने की धमकी दे रहे हैं ये वही लोग हैं जो कल बिहारियों और उत्तर भारतीयों को निकालने की धमकी देते थे। उससे पहले गुजरातियों और तमिलों को निकालने की धमकी देते थे। इनका राष्ट्रवाद अपने घर से आगे नही जाता। इनके लिए सब मोहरे हैं। एक बयान ने सलमान खान की क्या हालत कर दी। सारी जिन्दगी की मोदी भक्ति एक झटके में गद्दारी में बदल गयी।
               और इस उन्माद की आड़ लेकर सरकार ने क्या क्या नही किया। झारखण्ड से छत्तीसगढ़ तक गरीब आदिवासियों और किसानों को गोलियों से भून दिया ताकि उनकी जमीन पर कब्जा किया जा सके।
                   इस तरह का उन्मादी राष्ट्रवाद जनविरोधी होता है। वह अमरबेल की तरह जनता के लहू पर पनपता है और उसे ही नष्ट करता है। इस राष्ट्रवाद को उन्माद भड़काने वाली तस्वीरें चाहियें और वो तस्वीरें अगर लाशों की हों तो और अच्छा।

Thursday, April 21, 2016

व्यंग -- भारतीय टीवी चैनल और जनजीवन के सवाल

                   ढम '''''''ढम '''''''''धाम ढम '''''''' दं दांव '''''''''''''  ढम
 चौराहे पर खड़ा ढोल वाला पुरे जोर शोर से ढोल पीट रहा था। कुछ लोग भी जमा हो गए थे। वो मुनादी करने वाले की तरह बोल रहा था। सुनिए, भाइयो और बहनो , सबसे पहले हम आपको देंगे सारी जरूरी खबरें। सभी तरह की खबरें चाहे वो राजनीती की हो, खेल के मैदान की हो, सिनेमा की हो या सिनेमा वालों की हो, राष्ट्रिय हो या अंतर्राष्ट्रीय हो, सबसे पहले हमसे जानिए। साथ ही हम आपको बताएंगे की आपकी समस्याओं का हल क्या है। इतना ही नहीं ये भी हम ही आपको बताएंगे की आपकी समस्या क्या है और क्यों है। इसके लिए हमारे पास है विषय से संबंधित विशेषज्ञों का पैनल। जिसमे हर समस्या पर पुरे तोर पर विश्लेषण  किया जायेगा ,इसलिए भाइयो और बहनो कहीं मत जाइये और देखते रहिये " कब तक " .ये प्रोग्राम हम यहीं इसी चौराहे पर आपके बीच में पेश करेंगे देश के हर चौराहे की तरह। धम''''''''''  ढम'''''''''''  ढम'''''''''  ढम''''  .
               आज के इस कार्यक्रम में हमारे साथ जो मेहमान हैं मैं उनका परिचय आपसे करवा दूँ। हमारे साथ हैं सत्ताधारी पार्टी के प्रतिनिधि मिस्टर ऊल और विपक्षी पार्टी के प्रतिनिधि मिस्टर जलूल। इसके साथ ही हमारे साथ दो विशेषज्ञ भी मौजूद हैं जो निष्पक्ष होकर अपनी राय रखेंगे।  इसके साथ ही मैं हमारे आज के विषय के बारे में भी बता देना चाहता हूँ। हमारे हर विषय की तरह आज का विषय भी आपके जीवन से सीधे जुड़ा हुआ है और वो विषय है " क्या चाँद में लगा दाग गहरा हो रहा है। " अब एंकर ने ढोल बजाना कुछ देर के लिए बंद कर दिया था और उसे बाजू में रख लिया था ताकि जरूरत पड़ने पर तुरंत उठाया जा सके।
                   सबसे पहले मैं सरकारी पार्टी के प्रवक्ता श्री ऊल साहब से पूछना चाहूंगा की इस बात में कितनी सच्चाई है और इसमें सरकार कितनी जिम्मेदार है ? एंकर ने कहकर एक टेपरिकार्डर का बटन दबा दिया।
                  मि. ऊल ने बोलना शुरू किया। " देखिये इस बात में कोई सच्चाई नहीं है। सबसे पहले तो मैं ये कहना चाहूंगा की जब चाँद में दाग लगा था तब किसकी सरकार थी ? इसलिए हमे ये दाग  विरासत में मिला है। और इस पर विपक्षी पार्टी को तो सवाल करने का हक ही नहीं है। हमारी सरकार दाग को समाप्त करने का पूरा प्रयास कर रही है और ये बात गलत है की दाग गहरा हो रहा है। "
                    उसके बाद एंकर ने कहा की अब मैं विपक्ष के प्रवक्ता मि. जलूल से इस बारे में पूछना चाहूंगा। उसके बाद उसने दुसरे टेपरिकार्डर का बटन दबाया।
                मि. जलूल ने बोलना शुरू किया। " देखिये सरकार गलतबयानी कर रही है। ये दाग हमारे समय में नहीं लगा था। और लगा भी होगा तो इतना हल्का था की किसी का ध्यान ही इस पर नहीं जाता था। ये तो सरकार के कुकर्मो का फल है। और सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती है। हमारी मांग है की इसकी स्वतंत्र जाँच होनी चाहिए। इसलिए ये मामला एक संसदीय कमेटी को सौंपा जाये , ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। "
                     उसके बाद एंकर ने फिर ढोल उठाया और लगभग दस मिनट  तक उसे पीट पीट कर साबुन और चॉकलेट इत्यादि बेचता रहा। उसके बाद उसने ढोल फिर बाजू में रख दिया। उसने कहा की हम इस विषय के जानकार श्री चन्द्र प्रशाद जी से जानना चाहेंगे की आखिर सच्चाई क्या है ? फिर उसने एक और टेपरिकार्डर का बटन दबाया।
                     चन्द्र प्रशाद जी जो अब तक खाली बैठे थे और अपनी बारी आने  इंतजार कर रहे थे। उन्होंने बारी आने पर जेब से रुमाल निकाला, फिर सामने रखा पानी पिया और रुमाल से मुंह साफ करके उसे वापिस जेब में रखा। उसके बाद वो बोले। " देखिये जहां तक दाग की बात है उसके लिए सरकार और विपक्ष दोनों बराबर जिम्मेदार हैं। पहले हमे ये देखना होगा की आखिर दाग दीखता किस तरह का है। खासकर अमेरिका से कैसा दिखाई देता है।  अमेरिकी नजरिया हमारे लिए बहुत मायने रखता है। अगर अमेरिका में  कुछ खास दिखाई नहीं देता है तो फिर इस पर ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है। पिछले दिनों मेरी अमेरिकी विदेश सचिव से मुलाकात हुई थी तब तो उन्होंने ये मुद्दा नहीं उठाया था। अब हो सकता है की पाकिस्तान ने उनके कान भरें हों। हमे इस दाग को अंतर्राष्ट्रीय नजरिए से देखना होगा। "
                      उसके बाद एंकर ने फिर ढोल उठाया और जोर जोर से पीटकर फिर कई चीजें बेचीं। क्रिकेट के मैच की जानकारी दी और शाम को प्रसारित होने वाले सास बहु के नाटक में आज क्या होने वाला है इसकी एक झलक बताई। उसके बाद उसने अपना ढोल फिर बाजू में रख लिया। फिर उन्होंने एक और टेपरिकार्डर  दबाते हुए दूसरे विशेषज्ञ की तरफ देखते हुए कहा की मि. चंद्रम आपका इस पर क्या कहना है ?
                      मि. चंद्रम जैसे भरे बैठे थे। उन्होंने तुरंत और जोर जोर से बोलना शुरू किया। " मैं कहता हूँ की ये चीन की साजिश है। उसने नई तकनीक विकसित करके इस दाग को गहरा किया है। वो आहिस्ता आहिस्ता इसे गहरा करता रहेगा और एक दिन भारत में चाँद की रौशनी आनी  बंद हो जाएगी। 1962 में नेहरू ने जो गलती की थी देश उसका परिणाम भुगत रहा है। अगर 1962 में सरदार पटेल हमारे प्रधानमंत्री होते तो आज हमे ये दिन नहीं देखना पड़ता। " उसका दम फूल गया था।
               '  लेकिन 1962 में सरदार पटेल प्रधानमंत्री कैसे हो सकते थे ?" एंकर ने पूछा।
               "  क्यों नहीं हो सकते थे ? अगर महात्मा गांधी टांग नहीं अड़ाते तो जरूर हो सकते थे।"  मि. चंद्रम  ने कहा।
                 "  लेकिन जहाँ तक हमारी जानकारी है सरदार पटेल और महात्मा गांधी, दोनों का निधन 1962 से पहले हो चूका था।" एंकर ने फिर कहा।
               "  ये कांग्रेस और कम्युनिष्टों द्वारा फैलाई गई अफवाह है। मैं केंद्र सरकार से इससे संबंधित फाइलें सार्वजनिक करने की मांग करता हूँ।"  मि. चंद्रम ने जैसे चैलेंज किया।
                       उसके बाद सरकारी प्रवक्ता ने कुछ कहने की कोशिश की। वो कह रहा था की वो इस बारे में सरकार से बात करेगा ताकि सच्चाई सामने आ सके। साथ ही विपक्ष के प्रवक्ता ने भी कुछ कहने की कोशिश की। दोनों विशेषज्ञ भी साथ साथ बोल रहे थे। प्रोग्राम खत्म होने में पांच मिनट बाकि थी इसलिए एंकर पांच मिनट पूरी होने का इंतजार करता रहा फिर सारे टेपरिकार्डर बंद करके फिर ढोल पीट पीट कर सामान बेचने लगा।
                       ये हमारा राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया था जो लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहलाता है। जो जनता से जुड़े मुद्दे उठाकर जनतंत्र को समृद्ध कर रहा है।

Tuesday, April 19, 2016

व्यंग -- महत्त्वपूर्ण केसों की जाँच टीवी चैनलों को दे दो।

                कई सालों से हम सुनते आ रहे हैं की अदालतों पर काम का बोझ बहुत बढ़ गया है। इसी तरह सीबीआई वगैरा जाँच एजंसियों पर भी बहुत बोझ बढ़ गया है। सरकार चिंतित है। सर्वोच्च न्यायालय चिंतित है। कभी कभी राजनैतिक पार्टियां भी चिंतित होती हैं खासकर जब विपक्ष में होती हैं। हालात कई बार ऐसी हो जाती है की जैसे सारा देश एक साथ चिंतित हो गया हो। पुराने केसों की तादाद लगभग 40 लाख हो गई है। इनका निपटारा कैसे हो इस पर मैराथन मीटिंगे होती हैं। बड़े बड़े सेमिनार होते हैं। न्यायाधीशों और सरकार की सयुंक्त मीटिंग होती हैं, बड़े बड़े विशेषज्ञ बैठते हैं की ऐसा क्या किया जाये की न्याय में देरी ना हो। बाद में वही तुच्छ कारण सामने आता है की जजों की संख्या कम है और इसे बढ़ाना चाहिए। इंतजार कर रहे लोगों के मुंह से निकलता है धत्त तेरी। ये तो किसी बच्चे से पूछ लेते तो वो भी बता देता। हम तो समझ रहे थे  दूसरा ऐसा मामला निकलेगा जो किसी के ध्यान में ही ना आया हो। उसके बाद मुख्य न्यायाधीश महोदय प्रधानमंत्री को पत्र लिखेंगे और प्रधानमंत्री मुख्य न्यायाधीश महोदय को पत्र लिखेंगे। हालाँकि मीटिंग में दोनों ही शामिल थे।
                     लेकिन मुझे अब इसका इलाज मिल गया है। इस इलाज से अदालतों का बोझ तो कम होगा ही होगा, जाँच एजंसियों का बोझ भी कम हो जायेगा। बाद में कोई अपील वगैरा का झंझट भी नहीं होगा। यानि एक तीर से पांच-छः निशाने लगाए जा सकते हैं। इसका इलाज ये है की देश में जो भी महत्त्वपूर्ण घटना घटे और जो भी केस महत्त्वपूर्ण लगे उसे जाँच एजेंसी को देने की बजाए टीवी चैनलों को सौंप दिया जाये। ज्यादा से ज्यादा दो या तीन दिन लगेंगे और केस खत्म हो जायेगा। जाँच भी हो जाएगी, मुकदमा भी हो जायेगा और फैसला भी हो जायेगा। इतना त्वरित परिणाम तो दुनिया की कोई भी एजेंसी नहीं दे सकती।
                      टीवी चैनलों को केस सौंपने के कई फायदे हो जायेंगे। पहला तो यही फायदा है की टीवी चैनल अब भी ऐसे केसों की समानांतर कार्यवाही तो चलाते ही हैं सो केवल उन्हें क़ानूनी दर्जा देने भर की जरूरत है। टीवी चैनल वो सारे सबूत दो या तीन दिन में ढूंढ लेते हैं जिन्हे ढूढ़ने में सीबीआई या NIA जैसी एजंसियों को सालों लग जाते हैं। जब तक अदालत तक कार्यवाही पहुंचती है उससे तो बहुत पहले टीवी चैनल अपना फैसला सुना चुके होते हैं। और देश का एक तबका उसे स्वीकार भी कर चुका होता है फिर चाहे अदालत का फैसला जो भी हो और जैसा भी हो।
                     इस तेजी का एक महत्त्वपूर्ण कारण है। जाँच एजंसियां पहले सबूत ढूढ़ती हैं फिर उसे अदालत के सामने रखती हैं। फिर अदालत उनकी जाँच पड़ताल करती है और ज्यादातर उन सबूतों को ख़ारिज कर देती हैं। टीवी चैनल ऐसा नहीं करते। वो पहले ये तय करते हैं की दोषी किसे ठहराना है फिर ये तय होने के बाद वो उसके हिसाब से सबूत इकट्ठा करते हैं। उन सबूतों के लिए वो जी तोड़ मेहनत करते हैं। अगर ऐसे सबूत नहीं मिलते तो वो अपनी तकनीकी टीम की सहायता से फर्जी विडिओ वगैरा बनवा लेते हैं। फर्जी गवाहों के बयान जो की उनके अनुसार चस्मदीद होते हैं टीवी पर तब तक चलाते हैं जब तक लोगों को वो जुबानी याद नहीं हो जाते। फिर भी काम ना चले तो टीवी चैनल पर लोगों से पोल करवा लेते हैं। अब बताओ की उसके बाद क्या कमी रह सकती है।
                  इसमें सरकार को भी घबराने की कोई जरूरत नहीं है। जिस तरह सीबीआई, ED और NIA जैसी संस्थाएं सरकार के कहे अनुसार काम करती हैं उसी तरह कई टीवी चैनल भी सरकार के हिसाब से ही काम करते हैं। अफसरों को इसके लिए वेतन मिलता है और टीवी चैनलों को विज्ञापन। जो अधिकारी बहुत अच्छा काम करता है उसे तरक्की मिलती है, रिटायर होने के बाद दूसरे संवैधानिक पदों पर नियुक्ति मिलती है तो टीवी चैनलों के मालिकों और पत्रकारों को राज्य सभा की सीट मिलती है और पदम पुरस्कार मिलते हैं। दोनों में होड़ लगी रहती है वफादारी की। मुझे ये नहीं पता की इनमे कोनसी नस्ल ज्यादा वफादार है। जीभ की लम्बाई तो एक जैसी ही है।
                    इसलिए देश की अदालतों पर बढ़ते हुए बोझ को कम करने के लिए सरकार को मेरे सुझाव पर गम्भीरता पूर्वक विचार करना चाहिए।

Thursday, December 3, 2015

Vyang -- दाऊद की सम्पत्ती और भक्तों की परीक्षा

पिछले दिनों ये खबर अख़बार में पढ़ी की मुंबई में सरकार दाऊद की  संपत्ति की नीलामी करने वाली है। इस खबर में ये भी लिखा था की सरकार कई बार इस सम्पत्ति की नीलामी की कोशिश कर चुकी है लेकिन कोई बोली लगाने को तैयार ही नही है। और पहले दिल्ली के दो लोगों ने दाऊद की एक संपत्ति की बोली लगाकर खरीद की थी उन्हें अब तक उसका कब्जा नही मिला है।
                   मुझे लगता है की ये खबर झूठी है और भारत को बदनाम करने के लिए छापी गयी है। इसमें भारत विरोध की बू साफ नजर आ रही है। जिन लोगों ने ये खबर छापी है उनको हमारे देश के बारे में कुछ भी जानकारी नही है।
                    हमारे यहां इस तरह के देश भक्तों की बहुत बड़ी तादाद है जो लोगों को हर रोज पाकिस्तान भेजते रहते हैं। ये लोग हर रोज दावा करते हैं की बस अभी कुछ दिन की ही बात है जब हमारी सरकार दाऊद को घसीट कर भारत लाने  वाली है। हमारे प्रधानमंत्री जिस देश में भी जाते हैं, वहां की सरकार को दाऊद की सम्पत्ति जब्त करने का आग्रह करना नही भूलते। फिर ऐसा कैसे हो सकता है की कोई दाऊद की सम्पत्ति की बोली लगाने से डर महसूस करे और वो भी मुंबई में।
                     मुंबई वो शहर है जहां केवल पाकिस्तान का नाम लेने पर मुंह काला किया जा सकता है। वहां की पार्टी अपने झंडे में शेर का फोटो लगाती है। वहां दाऊद की तो बात छोडो पाकिस्तान के किर्केटर और कलाकार नही घुस सकते और अख़बार कहता है की वहां दाऊद की सम्पत्ति की नीलामी नही हो पा रही।
                     लोगों को और अख़बार को शायद मालूम नही है की हमारे देश में वायु सेना, थल सेना, नौ-सेना के आलावा राष्ट्र सेना और हिन्दू सेना भी है। ये दोनों सेना हर रोज किसी कलाकार की फिल्म पर बैन लगा देते हैं और फिर सिनेमा हाल में तोड़फोड़ कर देते हैं। फिर किसी का सर काटने की धमकी दे देते हैं और मुस्कुराते हुए फोटो खिंचवाते हैं। इन लोगों को मलाल है की 1971 के युद्ध के समय वो नही थे वरना पाकिस्तान का नामोनिशान मिट जाता। और उनके शहर में कोई ये कहे की दाऊद की सम्पत्ति की बोली नही लग रही तो ये कैसे हो सकता है। इसलिए मैं मानता हूँ की ये खबर झूठ है
                     इस खबर के झूठे होने का दूसरा प्रमाण ये है देश की दोनों बड़ी राष्ट्रवादी पार्टियां वहां सरकार में हैं। दोनों में कौन ज्यादा राष्ट्रवादी है ये अभी साबित नही हुआ है लेकिन ये साबित हो चूका है कि इनके आलावा और कोई राष्ट्रवादी नही है। आप अगर सोशल मिडिया से थोड़ा बहुत संबंध रखते हैं तो आपको इनके भक्तों की एक पूरी ब्रिगेड वहां मिल जाएगी जो आपको साबित कर देगी की इनके आलावा ना तो कोई बहादुर है और ना ही कोई देशभक्त है। ऐसी पार्टियों के रहते मुंबई में दाऊद की सम्पत्ति का होना ही अपने आप में शर्म की बात है और उसका कोई खरीददार ना मिलना तो डूब मरने की बात है। मैं तो कहता हूँ की हे ( देश ) भक्तो उठो और साबित कर दो की तुम्हारे सामने दाऊद की की ओकात नही है।
                      लेकिन फिर मुझे याद आता है की जो लोग जवाहरलाल नेहरू को इस बात के लिए गालियां देते थे की 1947 में अगर उसने सेना को इजाजत दे दी होती तो पूरा कश्मीर भारत का होता। बाद में जब वो लोग खुद सरकार में आये तो कारगिल युद्ध में LOC पार करने की हिम्मत भी नही जुटा पाये।
                       इसलिए मुझे इन राष्ट्रवादी सेनाओं के राष्ट्रवाद पर शक होता है लेकिन उनकी हिम्मत पर मुझे कोई शक नही है। क्योंकि हिम्मत वाला आदमी इस तरह के टुच्चे काम नही करता जिस तरह के काम ये लोग करते हैं। किसी भी साधारण आदमी को गिरोह बना कर पीट देना और मिडिया में गाली गलोच कर देना हिम्मत की निशानी नही होती।  
                          इसलिए मैं इनका आह्वान करता हूँ, की हे राष्ट्र सेना और हिन्दू सेना के वीरो उठो, और दाऊद की सम्पत्तिओं पर कब्जा कर लो। और उसके बाद ललकार कर कहो की हाँ, हमने किया है कब्जा और दाऊद और उसके गुर्गों में अगर हिम्मत है तो हमारा कुछ बिगाड़ कर दिखाए।                   

 भक्तों की परीक्षा 

Sunday, October 18, 2015

NEWS -- प्रधानमंत्री की नाराजगी पर मीडिया झूठ बोल रहा है ?

खबरी -- क्या वाकई में प्रधानमंत्री बीफ पर आये बयानों से नाराज हैं ?

गप्पी -- मुझे लगता है की मीडिया बेवजह इस बात को प्रचारित कर रहा है। क्योंकि --
क्या प्रधानमंत्रीजी का कोई बयान आया है ?
नही।
क्या प्रधानमंत्रीजी ने कोई ट्वीट किया है ?
नही।
क्या बीजेपी का कोई बयान आया है ?
नही।
क्या बुलाये गए नेताओं ने ऐसा कहा है ?
नही।
क्या प्रधानमंत्रीजी या अमित शाह ने कोई सार्वजनिक लताड़ लगाई है ?
नही।
तो फिर मीडिया को कैसे पता ?

Wednesday, October 7, 2015

राष्ट्र्वाद, मानवाधिकार और धर्म, सब बातें हैं बातों का क्या।

ये कुछ ऐसे शब्द हैं जो किताबों  दिए गए और जिनका उच्चारण कुछ लोग करते रहते हैं लेकिन इनका कोई व्यवहारिक मूल्य है मुझे इसमें शक है। ऐसा नही है की बिना पढ़े लिखे लोगों को ही इनका मतलब नही मालूम, बल्कि मुझे तो लगता है की ज्यादा पढ़े लिखे लोगों को तो इनका मतलब सचमुच नही मालूम।
                अभी दादरी की घटना हुई, इससे पहले भी इस तरह की घटनाएँ होती रही हैं। लोग इस पर तरह तरह की चालबाजी पूर्ण बातें करते हैं। परन्तु मुझे शायद ही कोई ऐसा आदमी मिला हो ( पूरी जिंदगी में पांच दस को छोड़कर ) जिनके जीवन में इन शब्दों का व्यवहारिक महत्त्व है। बड़े हिस्से के लोग और देश अपने अपने स्वार्थ से संचालित होते हैं। उन्हें केवल अपने हित दिखाई देते हैं बाकि चीजों से उन्हें कुछ लेना देना नही होता। अगर कानून नाम की संस्था, भले ही वो कितनी ही कमजोर क्यों ना हो, अस्तित्व में नही होती तो आज भी वो सारी चीजें चालू रहती चाहे वो सती प्रथा हो या दास प्रथा। इसे केवल कानून ने रोका।
                हमे ये लगता है की लोगों का जीवन स्तर ऊपर उठेगा और लोग थोड़ा पढ़ लिख लेंगे तो इन चीजों को समझना शुरू करेंगे या उनमे मानवीय मूल्यों के प्रति संवेदना पैदा होगी। लेकिन जब धरातल पर इसका विश्लेषण करते हैं तो बात एकदम उलटी दिखाई देती है। सबसे ज्यादा पढ़े लिखे और सबसे ज्यादा आय वाले लोगों में लिंग अनुपात सबसे कम है। क्यों है, क्योंकि इन्होने तकनीक का इस्तेमाल करके लड़कियों को गर्भ में ही मार दिया। ये मानवीय मूल्यों पर बात करते हैं। नही, इनको केवल अपने वित्तीय स्वार्थ दिखाई देते हैं। लोग भाईचारे की बात करते हैं लेकिन उन्हें अगर ये लगता है की पड़ौस के कुछ लोगों की हत्या करके उनकी जान पहचान सीधे मंत्री से हो सकती है और उनको इसका फायदा मिल सकता है तो वो दंगों में भाग लेने के लिए तैयार हैं। गुजरात के दंगों में सीसी टीवी फुटेज में लोग महंगी गाड़ियां लेकर दुकानो को लूटते पाये गए। जब इनके बच्चे इन हत्याओं और दंगों के अपराध में जेल चले जाते हैं तो इनको भाईचारा याद आता है और ये राग अलापते हैं की पुरानी बातें भूल जाओ। इसका मतलब है की हमारे बच्चों को आजाद करवा दो। ये भाईचारा अपनी जरूरत की उपज है किसी संवेदना की उपज नही है।
                     सोशल मीडिया पर भी हम ऐसे बहुत से लोगों को देखते हैं जो पढ़े लिखे हैं और राष्ट्र्वाद के नारे लगाते हैं। और उनके काम और बातें देश को सौ टुकड़ों में बाँटने वाली होती हैं। उनका बस चले तो वो दस बीस करोड़ लोगों का कत्ल एक ही दिन में करवा दें। उनके लिए देश का मतलब कभी भी अपने फायदे से आगे नही जाता। वो किसी पार्टी के वेतनभोगी हो सकते हैं, किसी मंत्री या सांसद से जान पहचान के प्यासे हो सकते हैं या व्यापार में उनसे जुड़े हो सकते हैं। बढ़े हिस्से के लोग केवल अपनी जरूरतों के हिसाब से राष्ट्रवादी होते हैं।
                  विकसित और पश्चिमी देशों में मानवीय मूल्यों और लोकतंत्र की बहुत चर्चा होती है। ये लोग अपने आपको बहुत ऊँचे नैतिक धरातल पर रखते हैं। लेकिन इराक और लीबिया में इन्होने क्या किया। लोगों का एक अनुमान है की इराक में अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते केवल दवाइयों के बगैर मरने वाले बच्चों की तादाद दस लाख थी। अब ये वही सब काम सीरिया और यमन में कर रहे हैं। ये कौनसे मानवीय मूल्य हैं, कौनसा लोकतंत्र है। अगर कोई देश तुम्हारे साथ है, तुम्हारी कम्पनियों को लूटने की इजाजत दे रहा है तो सब ठीक है भले ही उसमे राजतंत्र हो या फौजी तानाशाही। लेकिन अगर कोई तुम्हे ये इजाजत नही देता तो वह सरकार अवैध है।
                  अगर कोई आदमी किसी मसले पर कोई बात रखता है और वो आपके खिलाफ है, फिर भले ही उसकी कोई बात कितनी ही सही क्यों न हो आप उसे दूसरा रूप देकर मुद्दा बना देते हैं। दादरी की घटना पर ओवैसी ने वहां का दौरा करने पर एक भी बात गलत नही कही ( किसी को एतराज हो तो वो विडिओ देख सकता है ) लेकिन वो गद्दार हो गया और जहर उगलने वाले संगीत सोम, साध्वी प्राची और योगी आदित्यनाथ देश भक्त हो गए। लोगों को क्या हासिल हुआ। गुजरात दंगों के बाद बहुत से हिन्दुओं को सजा हुई और उनके परिवार बर्बाद हो गए। नरेंद्र मोदी 12 साल मुख्यमंत्री रहे और अब प्रधानमंत्री बन गए। परन्तु ये लोग अपना जीवन बर्बाद कर गए। जो लोग दंगों में भाग लेकर सजा से बच भी गए, उनको भी क्या हासिल हुआ। उन्होंने जिन लोगों को मार डाला उनसे उनकी क्या सीधी दुश्मनी थी। लेकिन अपने स्वार्थों के पुरे होने की उम्मीद में ये लोग साम्प्रदायिक ताकतों के हाथों का हथियार बन गए। मुजफ्फर नगर के दंगों के बाद संगीत सोम और संजीव बालियान तो विधायक और मंत्री हो गए, इनके कुछ नजदीकी लोगों को भी राज का फायदा हो गया होगा लेकिन जेलों में बंद सैंकड़ो लोगों को क्या मिला, केवल जेलयात्री का सम्मान। मानो आजादी की लड़ाई में जेल गए थे।
                  इसलिए इन बातों से कुछ होगा, ये मुझे नही लगता। इन लोगों को केवल  कानून को सख्ती से लागु करके रोका जा सकता है।  भीड़ का कुछ नही बिगड़ता ये बात इनके दिल से निकल जानी चाहिए। जिन जिन लोगों की सजाएं दंगों में भाग लेने के कारण हुई उनका प्रचार होना चाहिए। बात फिर वहीं आ जाती है। ये काम टीवी मीडिया तो करेगा नही, क्योंकि उसको तो अपने हित देखने हैं फिर चाहे सारा देश जल जाये उसके ऑफिस को छोड़कर। अभी हाल का उदाहरण है। बिहार चुनाव में मीडिया हर नेता से पूछ रहा था की तुम विकास पर क्यों नही लड़ते। ऐसा मुंह बनाते थे एंकर जैसे विकास के बिना बहुत दुखी हों। जैसे ही बीफ का मुद्दा हाथ लगा उनके चेहरे चमक गए। अब दूसरा सवाल ही नही पूछते हैं। एक हफ्ते से बीफ छाया हुआ है और इलेक्सन तक छाया रहेगा। खुद वो और उनको पैसे देने वाली पार्टी दोनों चाहते थे की मुद्दा विकास से हट जाये और हट गया।
                   इसलिए मेरा ये कहना है की दंगों में भाग लेने वालों को सजा हो ये सुनिश्चित करो। केवल यही काम है जो लोगों को इससे दूर रख सकता है। बाकि की तो सारी बातें बस बातें ही हैं।

Sunday, September 20, 2015

हिंदी न्यूज चैनल और डेंगू का सवाल

कोई आदमी अगर भारत में नही रहता है और डेंगू के ऊपर भारतीय टीवी के हिंदी न्यूज चैनल के कार्यक्रम देखता है तो उसे डेंगू के बारे में जो कुछ समझ में आएगा वो इस प्रकार होगा।
१. भारत में केवल दिल्ली ही एक ऐसा राज्य और शहर है जहां डेंगू की बीमारी है।
२. दिल्ली में डेंगू ने महामारी का रूप ले लिया है और लोग मक्खियों की तरह मर रहे हैं।
३. दिल्ली में डेंगू की फलने की वजह मच्छर की बजाय केजरीवाल सरकार है।
४. जब दिल्ली में डेंगू की महामारी फ़ैल रही थी तब केजरीवाल सरकार को छोड़कर बाकि सब, यानि असली सरकार LG साहब , भाजपा शासित महानगर पालिका और केंद्र सरकार सब जी तोड़ मेहनत कर रहे थे।
५. दिल्ली में सरकारी हस्पतालों की हालत पहले बहुत अच्छी थी जो केजरीवाल के आने के बाद खराब हो गयी।
६. स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण के लिए केजरीवाल सरकार जिम्मेदार है।
७. केजरीवाल सरकार ने ऐसा इंजेक्शन क्यों नही बनाया जो वो सभी प्राइवेट हस्पतालों को लगा दे और वो मुनाफा कमाना बंद करके जनसेवा में लग जाये।
८. केजरीवाल सरकार दिल्ली में प्राइवेट हस्पतालों का कानून बदल सकती थी भले ही उसे चपरासी नियुक्त करने का अधिकार ना हो।
९. दिल्ली में केजरीवाल का रहना कांग्रेस और बीजेपी के लिए डेंगू से ज्यादा खतरनाक है।
१०. अगर केंद्र सरकार स्वास्थ्य के बजट में कटौती करती है तो उसका कोई प्रभाव स्वास्थ्य सेवाओं पर नही पड़ता।
११. बीजेपी,  कांग्रेस, केन्द्र सरकार  और मीडिया का काम केवल टीवी चैनलों में बैठकर केजरीवाल को गालियां देने से पूरा हो जाता है।
१२. देश के बाकि राज्यों में डेंगू का कोई मरीज नही है, अव्वल तो वहां डेंगू के मच्छर ही नही हैं, क्योंकि ये सारे मच्छर मीडिया से पूछकर ही प्रदेशों में जाते हैं।
                      

Thursday, September 17, 2015

Vyang - बिजनेस फ्रेंडली राज्य बनाने पर सुझाव

पिछले दिनों वर्ल्ड बैंक ने एक लिस्ट जारी की है जिसमे भारत में सबसे आसानी से बिजनेस किये जाने वाले राज्यों की सूचि जारी की है। मुझे बड़ा दुःख हुआ जब मैंने देखा की हमारे राज्य का नंबर तो झारखण्ड, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे पिछड़े हुए राज्यों के भी बाद आता है। सो मैंने इन सभी राज्यों में मिलने वाली सुविधाओं और सहूलियतों का गहन अध्धयन करने के बाद कुछ सुझाव तैयार किये हैं जिन्हे अपनाकर दूसरे राज्य भी इस सूची में अपना नंबर सुधार सकते हैं। ये सारे सुझाव एकदम मुफ्त में और बिना मांगे दिए जा रहे हैं और मैं उम्मीद करता हूँ की इन्हे अपनाने वाले राज्य मेरी सेवाओं का सम्मान करेंगे।
सिंगल विंडो स्कीम ------- 
                                       जब कोई आदमी किसी राज्य में बिजनेस शुरू करना चाहता है तो उसे अलग अलग कई विभागों से मंजूरी लेनी पड़ती है। सभी विभागों के अधिकारी काम करने के लिए सीधे सीधे पैसे लेने की बजाय दलालों की मार्फत पैसे लेते हैं। उन सभी अधिकारीयों के दलालों को ढूंढना काफी मुस्किल भी होता है और इसमें समय भी बहुत लगता है। इसलिए सरकार को एक सिंगल विंडो स्कीम पेश करनी चाहिए जिसमे एक ही दलाल सभी विभागों के अधिकारीयों का पैसा ले ले और बाद में अधिकारी और विभाग की हैसियत के हिसाब से बंटवारा कर दे। विकसित राज्यों में इन दलालों को सचिवालय के बाहर बैठने के लिए जगह दी गयी है जिससे इन्हे ढूंढने में कोई दिक्क़त नही हो। इस अनुभव का फायदा दूसरे राज्यों द्वारा भी उठाया जा सकता है।
खनन उद्योग माफिया के भरोसे --------
                                                          सरकार को ये पता लगाने के लिए की कहां  कहां खनन किया जा सकता है और कैसे किया जा सकता है बहुत खर्चा करना पड़ता है। फिर भी अधिकारीयों के भरोसे ये काम ठीक से नही हो पाता है। इसलिए इसमें निजी क्षेत्र की भूमिका को बढ़ावा दिया जाना चाहिए और पुरे खनन क्षेत्र को माफिया के भरोसे छोड़ देना चाहिए। ये साबित हो चूका है की माफिया खनन का विकास ज्यादा तेजी से करता है। सभी बिजनेस फ्रेंडली राज्यों ने खनन को माफिया के ही भरोसे छोड़ा हुआ है। अधिकारीयों का काम केवल उनसे पैसे लेकर ऊपर  तक पहुंचाना होता है। इससे सरकार का समय भी बचता है और नए नए क्षेत्रों में खनन का विकास भी तेजी से होता है।
व्हिसल ब्लोवरों पर लगाम --------
                                                   हर राज्य में कुछ विकास विरोधी लोग होते हैं जो सरकार और बिजनेस मैन के काम में अड़ंगा लगाते रहते हैं और अपने आप को व्हिसल ब्लोवर कहते हैं। विकास के हित में इन पर लगाम लगाई जानी बहुत जरूरी है। उनमे से दो-तीन को मार दिया जाये तो बाकि को धमकाना आसान हो जायेगा। हर विकास शील राज्य ने यही तरीका अपनाया है। उसके बाद ये समस्या धीरे धीरे कम हो जाती है। पुलिस को आदेश दिए जाएँ की अगर कोई व्हिसल ब्लोवर धमकी की शिकायत लेकर पुलिस के पास आये तो उसी पर ब्लैकमेल का मुकदमा बना दिया जाये।
श्रम विभाग को नया काम --------
                                                किसी भी राज्य में उद्योग के विकास के लिए ये जरूरी है की मजदूर कानूनो को संविधान के बाहर मान लिया जाये। हर बिजनेसमैन को ये छूट दी जाये की वो कितनी ही देर काम करवाये और कितना ही वेतन दे। इसके लिए सबसे अच्छा तरीका ये है की राज्य में ठेकेदारी प्रथा को बढ़ावा दिया जाये और मजदूर कानूनों को बदलने का झंझट लेने की बजाए उन पर ध्यान ना देने का रास्ता अपनाया जाये। यूनियनों पर प्रतिबंध लगा दिया जाये और श्रम विभाग का काम केवल ठेकेदारों का पता लगाकर उनसे पैसे इक्क्ठे करने तक सिमित कर दिया जाये। वैसे ज्यादा विकसित राज्यों में तो ये काम उद्योगपतियों के जिम्मे ही है की वो हर महीने ठेकेदारों के भुगतान में से पैसे काटकर विभाग में जमा करा दे। अब जब उनको प्रोविडेंट फंड और ईएसआई जमा करवाने से छुटकारा मिल गया है तो वो इतना काम तो राज्य की भलाई में कर ही सकते हैं।
टैक्स सुधारों को लागु करना ------
                                                   टैक्स सुधारों का मुद्दा इसमें काफी मायने रखता है। सरकार को पिछले दरवाजे से जो टैक्स आता है उसकी प्रगति पर कड़ी नजर रखी जानी चाहिए। बाकि खजाने में कितना टैक्स आता है उस की ज्यादा चिंता नही करनी चाहिए। उसमे अगर कमी आती है तो पट्रोल और डीजल पर टैक्स बढ़ाकर पूरा किया जा सकता है। पिछले दरवाजे से टैक्स देने वाले व्यापारियों को बही खातेचैक करवाने से छूट दी जाये। इससे जो सफेद धन को काला करने की प्रकिर्या है उसमे तेजी आएगी। इन टैक्स सुधारों को लागु करना बिजनेस फ्रेंडली राज्य बनाने के लिए बहुत जरूरी है।
विकास के प्रचार में तेजी -----
                                               इस उपलब्धि के लिए जो काम सबसे जरूरी है वो ये की विकास के प्रचार में तेजी लाई जाये। चाहे आदिवासियों के विस्थापन का सवाल हो, चाहे किसानो की जमीन छीनने का काम हो या पर्यावरण का सवाल हो, इनका विरोध करने वाले हर आदमी और संस्था को विकास विरोधी और बाद में देशद्रोही घोषित कर दिया जाये। उनके लाइसेंस रद्द कर दिए जाएँ और मीडिया हाउसों को इसकी खबरों पर बैन लगाने के आदेश दिए जाएँ। इन लोगों पर हमला इतना तेज किया जाये की जब तक लोगों को सच्चाई समझ में आये तब तक काम पूरा हो चुका हो।
                    ये कुछ सुझाव बहुत छानबीन और विचार करने के बाद तैयार किये गए हैं और राज्य इनसे लाभ उठा सकते हैं।

Sunday, September 13, 2015

ओपिनियन पोल (Opinion Polls ) का उपयोग भर्मित करने के लिए किया जाता है

जैसे ही चुनाव का मौसम आता है उसके साथ ही ओपिनियन पोल का मौसम भी आ जाता है। टीवी चैनलों से लेकर अख़बारों तक सभी जगह ओपिनियन पोल छाये रहते हैं। दो अलग अलग टीवी चैनलों के ओपिनियन पोल के रिजल्ट  में जमीन आसमान का अंतर हो सकता है। इसलिए इन ओपिनियन पोल पर  विवाद भी बहुत होता है।ओपिनियन पोल की कोई तकनीक हो सकती है लेकिन इस तकनीक का उपयोग केवल लोगों को भर्मित करने के लिए किया जाता है। चुनाव में बड़ी पैसे वाली पार्टियां अपने ओपिनियन पोल करवाती हैं और अपनी मर्जी के नतीजे टीवी पर दिखाए जाते हैं। इन पार्टियों को चूँकि कॉर्पोरेट का समर्थन होता है इसलिए मीडिया इसमें उनकी सहायता करता है।
                         जिस तरह ओपिनियन पोल करने की एक तकनीक होती है उसी तरह लोगों को भर्मित करने की भी तकनीक होती है और टीवी चैनल, ओपिनियन पोल करने वाली कंपनियां और कॉर्पोरेट समर्थित राजनैतिक पार्टिया इसी तकनीक का प्रयोग करती हैं।और ऐसा केवल भारत में हो ऐसा भी नही है। इसका इस्तेमाल पूरी दुनिया में होता है।
                        थोड़े दिन पहले ग्रीस में जनमत संग्रह हुआ था। वहां केवल दो ही तरह के वोट थे एक समर्थन करने वाले और दूसरे विरोध करने वाले। सभी ओपिनियन पोल करने वाली संस्थाएं यूरोपियन संघ का समर्थन करने वाले लोगों का बहुमत दिखाती थी। अंतिम दिन भी वो समर्थन करने वालों का वोट 1 % ज्यादा दिखा रही थी। नतीजा आया तो विरोध करने वाली वोटों का प्रतिशत 67 था। क्या दो तिहाई का अंतर और वो भी सीधे मुकाबले में, ओपिनियन पोल करने वालों को पता नही चला ? पता तो था लेकिन उनका काम तो लोगों को भर्मित करने का था जो वो अंतिम समय तक करते रहे।
                       दूसरा नजदीक का उदाहरण दिल्ली विधानसभा चुनाव का है। सभी ओपिनियन पोल बीजेपी को आगे दिखा रहे थे लेकिन नतीजे क्या आये सबको मालूम है।
                      कुछ दिन पहले एक स्टिंग ऑपरेशन आया था जिसमे इन ओपिनियन पोल करने वाली संस्थाओं को बाकायदा पैसे लेकर उस पार्टी के समर्थन में नतीजे देने की बात करते हुए दिखाया गया था। परन्तु टीवी चैनलों ने उस बात को दबा दिया क्योंकि उससे ना केवल ओपिनियन पोल करने वाली संस्थाओं की, बल्कि टीवी चैनलों की पोल भी खुलती थी। कॉरपोरेट मीडिया केवल पैसे लेकर ये काम करता हो ऐसा भी नही है। कॉर्पोरेट सेक्टर अपनी पसंददीदा पार्टियों को हमेशा दौड़ में आगे दिखाता है ताकि दूसरी पार्टियों के कार्यकर्ता हताश हो जाएँ। वोटरों का भी एक हिस्सा उसी को वोट देना पसंद करता है जो आगे होती हैं। उसका फायदा उठाने के लिए ये सारा खेल रचा जाता है।
                       इस काम को करने के लिए जो तरीका अपनाया जाता है वो इस प्रकार का होता है। जैसे दो दिन पहले आजतक पर एक ओपिनियन पोल आया है। उसमे बीजेपी को नितीश गठबंधन से 2 % ज्यादा वोट मिलता दिखाया गया है। इसके लिए उसे लोकसभा चुनाव में बीजेपी को मिले वोटों में 19 % की बढ़ौतरी दिखानी पड़ी। पुरे देश में लोकसभा चुनाव के बाद जो भी विधानसभा चुनाव हुए हैं उनमे बीजेपी को मिलने वाले वोटों की संख्या में लोकसभा चुनाव के मुकाबले 10 से 12 % की गिरावट आई है। लोकसभा चुनाव में बीजेपी की लोकपिरयता अपने शिखर पर थी। उसके बावजूद ये ओपिनियन पोल उसमे 19 % की बढ़ौतरी दिखा रहा है।
                     जहां भी कॉर्पोरेट की सबसे पसंद दीदा पार्टी पीछे होती है ये ओपिनियन पोल उसे 1 या 2 % आगे दिखाते हैं। फिर कभी उसमे 2 % की बढ़ौतरी दिखा देते हैं और कभी 1 % की गिरावट दिखा देते हैं। दूसरा काम वो ये करते हैं की कॉर्पोरेट की धुर विरोधी वामपंथी पार्टियों जैसी पार्टी का ऑप्शन ही अपने पोल में नही रखते ताकि मतदाताओं को ये संदेश दिया जा सके की वो तो दौड़ में ही नही है। आखरी दिन तक भी  पार्टी की स्थिति नही सुधरती है तो अंतिम दिन उसे एकदम बराबर या 1 % पीछे दिखा देते हैं ताकि थोड़ी बहुत फेश सेविंग हो सके। बाद में जब रिजल्ट एकदम उसके उल्ट आता है तो शेयर बाजार की तरह उसकी दूसरी व्याख्या कर देते हैं।
                   इसलिए सचेत मतदाता को इन भर्मित करने वाले ओपिनियन पोल को देखकर राय बनाने से बचना चाहिए।

Sunday, August 30, 2015

हिन्दी न्यूज़ चैनल और इन्द्राणी मुखर्जी

indrani mukherji photo with drink

हिन्दी न्यूज़ चैनलों का पिछले कई दिन से बुरा हाल है। जबसे ये शीना हत्याकांड यानी  इन्द्राणी मुखर्जी का मामला सामने आया है हिंदी न्यूज़ चैनलों ने इस पर इतनी खोज की हैं जितने में दूसरा अमेरिका खोजा जा सकता था। रोज हर चैनल पर कोई न कोई सनसनीखेज खबर होती है। इन  सनसनीखेज ख़बरों का अंदाज भी उतना ही सनसनीखेज होता है। 
                   एक चैनल सुबह से एक प्रोग्राम की जानकारी दे रहा था। आज दोपहर 12 बजे से एक बजे तक देखिये इन्द्राणी मुखर्जी के बारे में एक सनसनीखेज खुलासा। जिसे देख कर आपको पसीना आ जायेगा। आप दांतों तले ऊँगली दबा लेंगे। लोग बेसब्री से कार्यक्रम का इन्जार कर रहे थे। ठीक समय पर दो एंकर हाजिर हुए एक सिरे पे एक महिला और दूसरे सिरे पर एक पुरुष। उन्होंने शीना हत्याकांड और  इन्द्राणी मुखर्जी पर बोलना शुरू किया। लोग खुलासे का इन्जार करते रहेऔर वो उन सारी  बातों को दोहराते रहे जो वो पिछले पांच दिन से कह रहे थे। खुलासे का जिक्र केवल ब्रेक से पहले आता की ब्रेक के बाद देखिये वो सनसनीखेज खुलासा।
इस तरह 55 मिनट गुजर गए। अब एंकर खुलासे पर आये। उसने कहा की आज मुंबई पुलिस के खास सूत्रों के हवाले से सबसे पहले हमारे चैनल को ये खबर दी गयी है  की जब  इन्द्राणी मुखर्जी ने तीसरी शादी की उससे पहले उसकी दो शादियां हो चुकी थी। 
                       एक रिक्शा वाला जो सवारी ढोना छोड़ कर एक घंटे से टीवी के सामने खड़ा था उसके मुंह से एक भद्दी गाली निकली। 
                     एक दूसरे चैनल का दिनभर का प्रोग्राम इस प्रकार था। 
सुबह 9 से 10 तक देखिये शीना हत्याकांड पर विशेष रिपोर्ट। 
सुबह 10 से 11 बजे तक देखिये कैसे इन्द्राणी मुखर्जी ने तीन तीन शादियां की। 
सुबह 11 बजे से 12 बजे तक इस बात पर खास चर्चा की इन्द्राणी मुखर्जी का पति  ही उसकी बेटी का सगा बाप था। 
दोपहर 12 बजे से 1 बजे तक देखिये हमारा विशेष कार्यक्रम जिसमे हम उस होटल वाले का एक इंटरव्यू दिखाएंगे जिसकी दुकान का बना हुआ सैंडविच इन्द्राणी मुखर्जी ने आज खाया। 
दोपहर 1 बजे से 2 बजे तक इस बात पर चर्चा की जाएगी की इस मामले की जाँच ACP  प्रद्युम्न को दे दी जानी चहिए। 
दोपहर 2 बजे से 3 बजे तक इस बात पर चर्चा होगी की शीना की मौत एक हत्या है। 
दोपहर ३बजे से ४ बजे तक हमारे खास मेहमान होंगे डा. भोसले, जो इस बात की जानकारी देंगे की लम्बे समय तक जोर से गला दबाने पर आदमी मर जाता है। 
दोपहर बाद 4 बजे से 5 बजे तक इस खुलासे पर चर्चा होगी जिसमे इन्द्राणी मुखर्जी के बाप ने कहा था की वो  इन्द्राणी मुखर्जी की बेटी का नाना लगता है। 
शाम 5 बजे से 6 बजे तक  मिलवायेंगे उस ब्यूटी पार्लर की मालकिन से जहां इन्द्राणी मुखर्जी रेगुलर जाती थी। 
और अंत में शाम 6 बजे से सात बजे तक आपको दिखाएंगे एक चर्चा की कैसे मीडिया लोकतंत्र का चौथा खम्बा है।
                

Tuesday, August 25, 2015

धर्म आधारित जनसंख्या के आंकड़े - संघ का झूठ बेनकाब

             आरएसएस लम्बे समय से ये प्रचार करता रहा है की जिस तेजी से मुस्लिमों की जनसंख्या बढ़ रही है उसके कारण बहुत जल्दी देश में हिन्दू अल्पसंख्यक हो जायेंगे। कम पढ़े लिखे और संघ पर भरोसा करने वाले बहुत से लोग भी इस पर विश्वास करने लगे थे। अपने इस तर्क के पीछे संघ मुस्लिमों की चार शादियां करने की छूट को भी तर्क के रूप में इस्तेमाल करता रहा है। अब 2011 की जनगणना के धर्म आधारित आंकड़े जारी कर दिए गए हैं। आदत के अनुसार संघ के लोग इनकी व्याख्या भी अपने हिसाब से तोड़ मरोड़ कर कर रहे हैं। लेकिन चिल्ला चिल्ला कर आवाज देती हुई सच्चाई को छिपाना मुश्किल हो रहा है। कुछ समाचर पत्रों ने भी इस खबर को छापते वक्त ये हेडलाइन लगाई है की देश की जनसंख्या में मुस्लिमो हा हिस्सा बढ़ा है। खबर को इस तरह पेश करना अर्धसत्य होता है और अर्धसत्य बहुत बार झूठ से भी ज्यादा खतरनाक होता है। 2011 की जनगणना के जो आंकड़े सामने आये हैं और उनसे जो तथ्य उभर कर आये हैं वो इस प्रकार हैं। 
ये आंकड़े तीन तथ्यों पर देखे जाने चाहियें। 

                                                           हिन्दू                      मुस्लिम 
1991      कुल जनसंख्या                   --------------           --------------

2001                       ''                         85. 29     Cr.           14 . 20  Cr.

2011                       ''                         96 . 63     Cr.           17 . 22  Cr.

2001     जनसंख्या में हिस्सेदारी      80 . 5     %               13 . 4  %

2011                            ''                     79 . 8     %              14 . 2   %

1991     जनसंख्या वृद्धिदर                25 . 1     %              34 . 5   %

2001                          ''                       20 . 3     %              29 . 5   %

2011                          ''                       16 . 8     %              24 . 5    %

             उपरोक्त आंकड़ों से दो बातें साफ होती हैं। पहली ये की 2001 से 2011 के बीच हिन्दुओं की जनसंख्या में कुल मिलकर 11 करोड़ 34 लाख की बढ़ौतरी हुई। और मुस्लिमों की जनसंख्या में 3 करोड़ 2 लाख की बढ़ौतरी हुई। 
          दूसरी बात जो इसमें सामने आई वो ये है की 1991 से 2001 के बीच हिन्दुओं की जनसंख्या बढ़ौतरी की दर में 4.8 % और 2001 से 2011 के बीच 3.5 % की गिरावट आई। लेकिन मुस्लिमों की जनसंख्या बढ़ौतरी की दर में यही गिरावट 1991 से 2001 के दौरान 5 % और 2001 से 2011 के बीच में भी 5 % की दर से आई। इसका मतलब ये होता है की मुस्लिमों की जनसंख्या बढ़ौतरी की दर में गिरावट हिन्दुओं की अपेक्षा ज्यादा तेजी से आई है। 
            तीसरी महत्त्वपूर्ण बात ये है की जिन समुदायों का हिस्सा 80 -17 हो तो छोटा समुदाय कभी भी बहुसंख्यक नहीं हो सकता है। क्योंकि उनकी कुल जनसंख्या बढ़ौतरी असल में 11 करोड़ 34 लाख और 3 करोड़ 2 लाख ही होगी। अगर इसमें कुछ फर्क भी आता है तो भी हिंदुओं जी जनसंख्या बढ़ौतरी मुस्लिमों से करीब 8 करोड़ प्रति दशक ज्यादा ही रहेगी। 
                इसलिए मेरी लोगों से गुजारिश है की दूसरों के बहकावे में आने की बजाए आंकड़ों का विश्लेषण करना सीखें।

Friday, August 14, 2015

Vyang -- संसद की कार्यवाही कैसी होनी चाहिए ?

गप्पी -- हमारे देश में इस समय एक बड़ी बहस चल रही है। ये बहस है संसद की कार्यवाही को लेकर। इस बहस में पूरा देश शामिल है। जिस आदमी को ये नही मालूम की सोसायटी में रस्ते पर कूड़ा नही डालना चाहिए वो भी इस पर सुझाव दे रहा है की संसद की कार्यवाही कैसी होनी चाहिए। वो लोग जिन्हे ये नही समझ में आता की बाइक पर हेलमेट लगाना क्यों जरूरी है बता रहे हैं की देश की बहुत बदनामी हो गयी। हालत हास्यास्पद हो गयी है। मैं एक ट्रैन में जा रहा था जिसमे पंद्रह-बीस नौजवान भी यात्रा कर रहे थे। सबके सब पीछे कमर पर बैग लटकाये हुए थे और मोबाईल पर गेम खेल रहे थे। लेकिन सबके सब संसद की कार्यवाही ना चलने पर दुखी भी थे और गुस्से में भी थे। वो पुरे विपक्ष को कोस रहे थे। कार्पोरेट मीडिया का तिलस्मी प्रभाव पूरे जोर पर था। बहस बहुत देर चलती रही। अचानक एक जवान ने कहा " यार ये जो राज्य सभा है ये कौनसे राज्य की है। सारी  प्रॉब्लम तो इसी में है। "
         " पता नही यार। रोज तो एक राज्य बनता है। परन्तु मेरे ख्याल से तेलंगाना की होगी, वो ही बना है लास्ट में। " दूसरे ने कहा
        " लेकिन कुछ भी हो, मैं तो कहता हूँ की ये होनी ही नही चाहिए। " दूसरे ने कहा।
        " मैं तो कहता हूँ की ऐसा कानून बना देना चाहिए की कम से कम बीस बिल तो पास करना जरूरी होगा। वरना किसी भी सांसद को कोई वेतन नही मिलेगा। " दूसरे ने जोर देकर कहा।
         " बिलकुल सही बात है। काम नही तो वेतन नही। " लगभग सभी सहमत थे।
         " मैं बताता हूँ इसका परमानेंट इलाज। संसद में ठेका सिस्टम लागु कर देना चाहिए। एक बिल पास करने का दस हजार। वरना कोई पैसा नही। फिर देखो कैसे पास नही होते बिल। " एक नौजवान ने अतिरिक्त उत्साह से कहा। बाकि सबने इस पर तालियाँ बजाई।
           हमारे देश का भविष्य लोकतंत्र को ठेके पर देने पर विचार कर रहा था।
          मैं ट्रेन से उतर कर आगे गया तो रस्ते में एक मिल के खण्डहर आते हैं। ये मिल सालों पहले बंद हो चुकी है यहां शहर के कुछ आवारा लड़के जुआ इत्यादि खेलते हैं। आज वो सब बैठे हुए थे। खेल नही रहे थे। मैं वहां से गुजरा तो उनमे से एक ने मुझे आवाज दी। मैं रुका।
          " अंकल ये संसद क्यों नही चल रही ? इस तरह तो देश का सत्यानाश हो जायेगा। " एक लड़के ने कहा।
          मैं आश्वस्त हो गया भारतीय लोकतंत्र के भविष्य के प्रति। अब कोई खतरा नही है। पहले हम इस लोकतंत्र की रक्षा की उम्मीद छात्रों, बुद्धिजीवियों, मजदूरों , किसानो और जनसंगठनों से करते थे। अब इसकी जिम्मेदारी जुआरियों ने उठा ली है।
             घर आया तो टीवी पर खबर चल रही थी की देश के उद्योगपतियों ने हस्ताक्षर अभियान चलाकर सांसदों से संसद की कार्यवाही चलने देने की मांग की है। मैं पुछना चाहता था की क्या इनमे वो उद्योगपति भी शामिल हैं जो बैंको का चार लाख करोड़ रुपया खा कर बैठे हैं। या वो उद्योगपति जो उन पर बकाया लाखों करोड़ रुपया टैक्स बाप का माल समझ कर हड़प कर गए।  वो भी शामिल हैं क्या, जो लोग देश के बैंको को फेल होने के कगार पर पहुंचाने के लिए जिम्मेदार हैं। उनको  देशभक्ति का दौरा पड़ा है।
            आगे खबर आई की मशहूर रेल इंजीनियर श्रीधरन ने उच्चतम न्यायालय में याचिका देर करके मांग की है की उच्चतम न्यायालय संसद की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने के लिए हस्तक्षेप करे। मुझे लगा की श्रीधरन संसद और मेट्रो रेल में फर्क नही कर पा रहे हैं। उन्हें पहले भरतीय रेल को सुचारू रूप से चलाने पर ध्यान देना चाहिए और संसद को सांसदों के भरोसे छोड़ देना चाहिए।
              मुझे लगा की देश का कॉर्पोरेट मीडिया और उसके विशेषज्ञ जैसी कार्यवाही चाहते हैं वो इस तरह की होगी।
                सदन के अध्यक्ष सदन में प्रवेश करते हैं। सभी सांसद खड़े हो जाते हैं। अध्यक्ष बैठ जाते हैं तो सभी बैठ जाते हैं। अध्यक्ष पिछले दिन हुई दुर्घटना के मृतकों को श्रद्धांजलि का प्रस्ताव पढ़ते हैं फिर पूरा सदन खड़े होकर मौन धारण करता है। उसके बाद विपक्ष के चार पांच सदस्य खड़े होकर कहते हैं की उन्होंने कार्यस्थगन प्रस्ताव का नोटिस दिया है। अध्यक्ष कहते हैं की उन्हें नोटिस मिले हैं लेकिन वो उनको ख़ारिज करते हैं। विपक्ष के सदस्य अध्यक्ष का धन्यवाद करके वापिस बैठ जाते हैं। फिर संसदीय कार्य मंत्री खड़े होकर कहते हैं की सरकार का विचार है की कई दिन से विपक्ष के सदस्यों को बोलने का मौका नही दिया गया इसलिए आज का प्रस्ताव मान लिया जाये।
               अध्यक्ष प्रस्ताव स्वीकार कर लेते हैं।
                विपक्ष के नेता कहते हैं की अख़बारों में खबर छपी है की सरकार द्वारा विदेशी कम्पनी को दिए गए ठेके में भृष्टाचार हुआ है। और उसमे सत्ताधारी पार्टी के एक राज्य के मुख्यमंत्री का बेटा और वित्तमंत्री की बेटी दोनों शामिल हैं।
                  अध्यक्ष कहते हैं की अख़बार में छपी खबर के हिसाब से आरोप नही लगाये जा सकते।
                  विपक्ष के नेता माफ़ी मांगते हैं और कहते हैं की अगर जाँच हो जाये तो क्या हर्ज है ?
                  अध्यक्ष कहते हैं की सदन में किसी मुख्यमंत्री का नाम नही लिया जा सकता।
                  विपक्ष के नेता फिर माफ़ी मांगते हैं और कहते हैं की वित्तमंत्री की बेटी उसी कम्पनी में काम करती है जिस कम्पनी को ठेका दिया गया है।
                  वित्त मंत्री खड़े होकर कहते हैं की जिन लोगों ने ठेके के कागज पर दस्तखत किये हैं उनमे उनकी बेटी शामिल नही है इसलिए सरकार सारे आरोपों को ख़ारिज करती है। सत्तापक्ष के लोग जोर जोर से मेज थपथपाते हैं। सरकार जाँच करवाने के लिए भी तैयार है लेकिन विपक्ष उसके लिए वो सारे सबूत लेकर आये। अगर विपक्ष सबूत लेकर आता है तो सरकार उन सबूतों की जाँच करवाने के लिए तैयार है। चर्चा समाप्त हो जाती है।
                    उसके बाद सरकार ताजमहल को बेचने का बिल पेश करती है
                    विपक्ष के लोग कहते हैं की ताजमहल नही बेचा जा सकता।
                    मंत्री कहते हैं की सरकार कुछ भी कर सकती है। और कि तुम चुनाव हार गए हो इसलिए तुम्हे बोलने का कोई अधिकार नही है।
                      बिल पास हो जाता है।
 कॉर्पोरेट मीडिया खबर देता है की आज सदन में 105 % काम हुआ। और जो खर्च संसद पर हुआ उसका पूरा उपयोग हुआ।
                           पूरा देश इस पर संतोष व्यक्त करता है।

Tuesday, August 4, 2015

Vyang -- राजनैतिक पार्टियों में लोकतंत्र का डीएनए

खबरी -- ये कैसे मालूम हो की किसी पार्टी में लोकतंत्र का डीएनए है या नही ?


गप्पी -- सवाल बहुत मुश्किल है। अभी तक कोई जाँच सामने नही आई है जो ये बता सके की इस पार्टी में लोकतंत्र का डीएनए है या नही। अभी तक केवल कुछ मान्य सिद्धान्त हैं जो ये समझाने का प्रयास करते हैं की किसी पार्टी की लोकतंत्र के बारे में क्या राय है। अब हमारे देश में ही ले लो। यहां विज्ञापनी लोकतंत्र चल रहा है। जो पार्टी विज्ञापन पर 100 करोड़ महीना खर्च करती है वो 20 करोड़ खर्च करने वाले को अलोकतांत्रिक बता रही है। जो पार्टियां विज्ञापन पर खर्च करने की हैसियत नही रखती उनको समझ नही आ रहा है की वो लोकतंत्र पर अपनी बात कहें कैसे। 

 

खबरी -- लेकिन बीजेपी ने कहा है की चूँकि कांग्रेस के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष सोनिया और राहुल हैं इसलिए इस पार्टी के डीएनए में ही लोकतंत्र नही है। 


गप्पी -- लेकिन सोनिया और राहुल कांग्रेस के इन पदों पर कांग्रेस की मर्जी से हैं। अगर उनके परिवार की वजह से बीजेपी ऐसा कह रही है तो उसे ये भी बताना चाहिए की सीधे राजघराने से आई हुई वशुन्धरा राजे कैसे लोकतान्त्रिक हैं। ऐसे और भी बहुत से लोग हैं बीजेपी और दूसरी पार्टियों में। बीजेपी के सहयोगियों में से एक बाला साहेब ठाकरे तो बड़े गर्व से कहते थे की महाराष्ट्र की सरकार का रिमोट उनके पास है। और हमने बीजेपी नेता प्रमोद महाजन को इस पर तालियां बजाते देखा है। मठों और अखाड़ों के साधु संसद के सदस्य हैं, वो कौनसे लोकतान्त्रिक मूल्यों से मठों के अध्यक्ष बने थे। 


खबरी -- लेकिन जो लोग पारिवारिक पृष्ठभूमि से नही आते उनमे कुछ तो लोकतान्त्रिक मूल्य दूसरों से ज्यादा होते होंगे ?


गप्पी -- हिटलर और मुसोलिनी किसी पारिवारिक पृष्ठभूमि से नही आये थे लेकिन उनके लोकतंत्र को पूरी दुनिया ने भुगता है। दुनिया में ऐसे ऐसे हत्यारे शासक रहे हैं जिनका नाम सुन कर रूह काँप जाती है लेकिन उनकी कोई पारिवारिक पृष्ठभूमि नही रही। सो ये मापदण्ड पूर्णतया सही नही लगता। संसदीय लोकतंत्र की शुरुआत करने वाले ब्रिटेन में आज भी महारानी संवैधानिक मुखिया है। 


खबरी -- लेकिन किसी शासन में आम लोगों की हिस्सेदारी से तो वहां के लोकतंत्र की स्थिति का पता चलता होगा ?


गप्पी -- ये एक सही मापदण्ड हो सकता था। लेकिन अब हमारे देश में ही लो। यहां लोगों की हिस्सेदारी केवल वोट देने तक सिमित रह गयी है। चुनाव लड़ने को इतना महंगा कर दिया गया है की 95 % जनता उससे बाहर हो गयी है। उसके बाद अगर कुछ लोग बच जाते हैं तो चुनाव का वातावरण धर्म और जाती के नाम पर इतना दूषित कर दिया जाता है की सही चुनाव सम्भव ही नही रहता। उसके बाद चुनी हुई संसद और विधान सभाओं में सत्ताधारी पक्ष बहुमत का प्रयोग करके विपक्ष को लगभग अस्तित्वहीन कर देता है। बिना विपक्ष की मौजूदगी के बिल पास कर लिए जाते हैं। मुझे नही लगता इसमें स्वस्थ लोकतंत्र के कोई लक्षण हैं। 


खबरी -- तो इस देश में बचे खुचे लोकतंत्र को बचाने का कोई रास्ता है या नही ?


गप्पी -- एक रास्ता है लेकिन वो लागु नही हो सकता। संसद में कानून बना कर 90 % सीटें उन लोगों के लिए आरक्षित कर दी जाएँ जिनकी सालाना आमदनी दो लाख से कम हो। सारे राजघराने, सारे मठाधीश, सारे भूतपूर्व नेताओं के रिश्तेदार, सारे कॉर्पोरेट के महारथी और सारे माफिया तत्व 10% में रह जायेंगे। 


खबरी -- इसका कानून तो नही बन सकता, लेकिन लोग चाहें तो इसे अपने स्तर पर लागु कर सकते हैं।

Monday, August 3, 2015

Vyang -- सरकार ( केवल ) चर्चा को तैयार है।

गप्पी -- संसद में कामकाज बंद है। सरकार कहती है की वो चर्चा के लिए तैयार है और विपक्ष चर्चा नही कर रहा है। विपक्ष कहता है की सरकार केवल चर्चा करना चाहती है कार्यवाही नही करना चाहती। दोनों पक्ष आमने सामने हैं। सदन में एक अध्यक्ष होता है जिसकी हालत घर  के उस बूढ़े जैसी है जिसकी इज्जत करने का दावा तो सभी करते हैं लेकिन उसकी सुनता कोई नही है। संसद की कार्यवाही इस तरह शुरू होती है। 

                 अध्यक्ष सदन में अपने आसन पर आकर बैठता है। विपक्ष के चार पांच सदस्य खड़े हो जाते हैं और कहते हैं की उन्होंने कार्यस्थगन का नोटिस दिया है। सत्ता पक्ष के चार पांच लोग खड़े हो जाते हैं और प्रस्ताव का विरोध करते हैं। अध्यक्ष प्रस्ताव को ख़ारिज कर देता है। सदन में हो हल्ला होता है और सदन के अध्यक्ष घोषणा करते हैं की कार्यस्थगन क्या पूरा सदन ही दोपहर तक स्थगित किया जाता है। हमारे यहां ये रिवाज है की कार्य को स्थगित करने की बजाय पूरा सदन ही स्थगित कर दिया जाता है। 

                  गांव से कुछ लोग मंत्रीजी से मिलने संसद भवन पहुंचते हैं। 11 बजने वाले हैं, सदन की कार्यवाही शुरू होने वाली है। मंत्रीजी गांव वालों को कहता है की मैं अभी आया पंद्रह मिनट में। तुम तब तक संसद की कैंटीन में सब्सिडी वाला नाश्ता करो। सदन की कार्यवाही शुरू होती है। मंत्री खड़ा होकर कहता है की सरकार चाहती है की सदन चले। मुझे मालूम है की मंत्री झूठ बोल रहा है। वो गांव वालों को पंद्रह मिनट का समय देकर आया है। पहले इस तरह का मजाक लोग हमारी किर्केट टीम के लिए करते थे की बैट्समैन चाय वाले को चाय बनाने की बोलकर बैटिंग करने जाता था और जब तक चाय बनती थी वापिस आ जाता था। 

                 मान लो कार्यवाही चले भी और चर्चा हो तो ऐसी होगी,

विपक्ष -- तुमने घोटाला किया है। 

सरकार -- हमने घोटाला नही किया है। 

विपक्ष --  तो जो शुषमा जी ने किया वो क्या था ?

सरकार -- उसे घोटाला नही मदद कहते हैं। 

विपक्ष -- तुमने एक अपराधी की मदद क्यों की ?

सरकार -- मदद हमारी परम्परा है हम उसमे भेदभाव नही करते। 

विपक्ष -- तो इस्तीफा भी तो परम्परा है। 

सरकार -- हम कांग्रेस की परम्परा को नही मानते। 

विपक्ष -- इस्तीफा दो। 

सरकार -- नही देंगे। 

                                    चर्चा समाप्त। 

           मैं तो कहता हूँ की गलती विपक्ष की है। उसे मंत्रियों का इस्तीफा चाहिए था तो प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांगना चाहिए था। क्योंकि हमारे यहां ऐसा ही होता है। 

                   विपक्ष कहता है की चर्चा करो। 

                    सरकार कहती है की चर्चा नही हो सकती। 

                  विपक्ष कहता है की मंत्री इस्तीफा दे। 

                    सरकार कहती है की चर्चा करो। 

                  विपक्ष कहता है की प्रधानमंत्री इस्तीफा दे। 

                     सरकार कहती है संबंधित मंत्री इस्तीफा देंगे। 

सो विपक्ष से चूक हो गयी। आजलक तो बच्चे भी इतने समझदार हो गए हैं की सौ रूपये चाहिए होते हैं तो पांच सौ मांगते हैं। अब विपक्ष हो हल्ला कर रहा है। सरकार सदस्यों को निलंबित करने का प्रस्ताव रख रही है। एक समय आएगा की पूरा विपक्ष निलंबित हो जायेगा। केवल सरकार के लोग बचेंगे। फिर चर्चा  होगी। लेकिन ऐसी चर्चा तो पार्टी की मीटिंग में भी हो सकती थी। संसद की क्या जरूरत थी। 

                       लेकिन बिल तो केवल संसद में ही पास हो सकते हैं। उसके बाद बिल पास होंगे। सरकार कहेगी इस बार संसद में 42 बिल पास हुए।  सारे बिल पूरे विचार-विमर्श और चर्चा बे बाद पास हुए। टीवी चैनल बताएंगे की इस बार रिकार्ड कामकाज हुआ। जनता संतुष्ट होगी की संसद पर हो रहा खर्चा बेकार नही गया। 

 

खबरी -- देश को ये बताया जा रहा है की संसद का काम केवल उसके खर्चे के हिसाब से बिल पास करना है।

Sunday, August 2, 2015

Vyang -- मानवाधिकार आयोग में फेरबदल

गप्पी -- सरकार  के प्रवक्ता ने एक प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन किया जिसमे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में आमूल-चूल परिवर्तन की बात की गयी। सरकारी प्रवक्ता ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष के पद पर नई नियुक्ति का एलान किया। उन्होंने नई नियुक्ति का एलान करते हुए कहा की देश में कई आयोगों के कामकाज पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है। इसलिए सरकार ने सबसे पहले मानवाधिकार आयोग को " सुधारने " का फैसला किया है। अब तक आयोग सरकार को चिट्ठी लिखने, रिपोर्ट मांगने और सरकार के कामो में अड़ंगा डालने के अलावा कोई ढंग का काम नही कर पाया है। इसलिए सरकार ने इसमें परिवर्तन का फैसला लिया है। इसलिए सरकार राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद पर स्वामी विचारानन्द की नियुक्ति की घोषणा करती है। स्वामी जी ने परम्परा के अनुसार कई साल गुरुकुल में रहकर शास्त्रों और पुराणो का अध्ययन किया है। स्वामीजी हमारी 5000 साल पुरानी भारतीय संस्कृति के विद्वान रहे हैं। इसलिए सरकार ये उम्मीद करती है की आयोग के काम और तरीके में फर्क दिखाई देगा। अब आप अपने सवाल पूछ सकते हैं। 

           पत्रकार ------ लेकिन अब तक तो ये परम्परा रही है की राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय के रिटायर मुख्य न्यायाधीश को बनाया जाता है ?

            प्रवक्ता ------- ये एक गलत परम्परा थी जिसे बिना विचार किये लागु किया गया था। जो मुख्य न्यायाधीश उच्चतम  न्यायालय जैसी सर्वाधिकार प्राप्त संस्था में रहते हुए मानवाधिकारों की रक्षा नही कर पाया उससे सरकार आगे क्या उम्मीद करेगी। इसलिए ये पद किसी विद्वान को देने का फैसला किया गया है। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए हम राज्य पालों के पद सुरक्षित रखने की योजना बना रहे हैं। 

           पत्रकार ----- लेकिन मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष को कानून और संविधान की गहन जानकारी होनी चाहिए इसलिए इस पद पर न्यायाधीश की नियुक्ति की जाती है। 

            प्रवक्ता ------ यही जानकारी समस्या की जड़ है। जब कोई आदमी किसी पुलिस अधिकारी द्वारा उसके मानवाधिकारों के हनन की शिकायत लेकर आता है तो आयोग को वो बात पता करने में तीन महीने लगते हैं जो सरकार को पहले दिन मालूम होती है। अव्वल तो पुलिस अधिकारी ने वो काम सरकार के कहने पर ही किया होगा, और अगर उसने किसी दूसरी प्रेरणा से भी ऐसा किया होगा तो वो तुरंत सरकार को बता देता है। इसलिए आयोग उस बात के लिए सरकार को तीन महीने बाद चिट्ठी लिखे ये बात समझ में नही आती। 

            पत्रकार ---  तो सरकार अब इस तरीके में क्या बदलाव लाने  जा रही है ?

           प्रवक्ता ----- इसका जवाब खुद स्वामीजी ही देंगे। ये कहकर उन्होंने माइक स्वामीजी को दे दिया। स्वामीजी 50-55 की उमर के स्वस्थ आदमी थे। उनकी दाढ़ी करीने से छँटी हुई थी जो उनके छँटे होने का आभास दे रही थी। स्वामीजी ने माइक पकड़कर दो मिनट के लिए आँखे बंद की और होठों में कुछ बड़बड़ाया। उसके बाद आँखे खोलकर उन्होंने फ़रमाया, " जब हमारे देश का संविधान बना तो उसमे कुछ आधारभूत गलतियां हो गयी। संविधान बनाने वाली सभा में कोई भी भारतीय संस्कृति को गहराई से जानने वाला विद्वान शामिल नही था वरना ऐसा नही होता। उसमे मौलिक अधिकारों के नाम का एक अध्याय जोड़ दिया गया। जबकि कोई भी अधिकार मौलिक नही होता। नागरिकों के अधिकार राजा की मर्जी के अधीन होते हैं। हमारे शास्त्रों में राजा को भगवान का प्रतिनिधि माना  गया है। यहां तक की राम की स्तुति भी राजा राम कहकर की जाती है। सारी समस्याएँ यहीं से शुरू होती हैं। आयोग अब ये देखेगा की जो काम राजाज्ञा से किया गया होगा उसकी शिकायत नही की जा सकेगी। राजा के अधिकारों को चुनौती नही दी जा सकती ये हमारी परम्परा है। हमारे यहां तो सबसे अच्छा न्याय का उदाहरण उसको माना जाता है जिसमे राजा को मृत्युदंड होने पर उसकी सोने की मूर्ति को फांसी पर लटकाया गया था। और ये हर बात पर शिकायत करना हमारी संस्कृति नही है। हमारे यहां तो कहा गया है,-

                                  सीताराम, सीताराम, सीताराम कहिये,

                                  जेहि विधि राखे राम, तेहि विधि रहिये। 

  उसी तरह हमारे शास्त्रों में राजा के सेवकों को देवता का दर्जा दिया गया है। क्योंकि उनके बिना राज्य का कामकाज असम्भव है। इसलिए भविष्य में किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ भी कोई शिकायत नही सुनी जाएगी। तुमने वो नया भजन तो सुना होगा। 

                                    दुनिया चले ना श्रीराम के बिना,

                                    रामजी चले ना हनुमान के बिना। 

        पत्रकार -- तो फिर आयोग का काम क्या रह जायेगा। वो क्या काम करेगा ?

       स्वामीजी ----- आयोग जगह जगह सेमिनार और प्रवचन आयोजित करेगा, जिसमे हमारी सदियों पुरानी संस्कृति की तरफ लौटने का आवाहन किया जायेगा। लोगों को समझाया जायेगा की जिन्हे वो अबतक अधिकार समझते रहे हैं वो एक तकनीकी भूल थी। 


खबरी -- तुम्हे हमेशा इस तरह के बुरे सपने ही क्यों आते हैं ?

Friday, July 31, 2015

Vyang -- नेताजी द्वारा पार्टी कार्यकर्ताओं की क्लास

गप्पी -- सरकारी पार्टी के दफ्तर में आज खास चहल पहल थी। राजधानी से एक बड़े नेता पार्टी कार्यकर्ताओं की मीटिंग करने आ रहे थे। इसमें वो तात्कालिक मुद्दों पर आम जनता और विरोधियों को कैसे जवाब दिया जाये ये क्लास लेने वाले थे। नेताजी के सचिव ने पूरे दफ्तर में घूम कर मुआयना किया और फिर नेता जी से कहा, " चाय नाश्ते का इन्तजाम नजर नही आ रहा है। "

          नेताजी ने उसकी तरफ नाराजगी भरी नजरों से देखते हुए कहा, " जब पार्टी सत्ता में होती है तब कार्यकर्ताओं को इकट्ठा करने के लिए नाश्ते की जरूरत नही होती। तुम्हे इतना भी नही मालूम ? "

          सचिव को इत्मीनान हो गया। तय समय पर पूरा हाल खचाखच भर गया। और नेताजी ने अपना स्थान ग्रहण किया। दो चार ओपचारिक बातों के बाद नेताजी सीधे मुददे पर आ गए। 

           " जब पार्टी सत्ता में होती है तो लोग तरह तरह के सवाल आप लोगों से करते हैं। उनका जवाब कैसे दिया जाये और आप लोगों को कोई परेशानी वाली स्थिति में नही पड़ना पड़े उसके लिए आज की मीटिंग और क्लास का आयोजन किया गया है। हर कार्यकर्ता किसी भी तरह का सवाल पूछ सकता है। लेकिन इस बात को ध्यान में रखना चाहिए की चाहे हम सड़क पर हों, मुहल्ले में हों या संसद में हों, हमारा मकसद सामने वाले को सन्तुष्ट करना नही बल्कि चुप कराना होता है। इस एक नीति वाक्य को ध्यान में रखोगे तो कोई परेशानी नही आएगी। "

एक कार्यकर्ता ने खड़े होकर पूछा," आजकल लोग कुछ मंत्रियों के भृष्टाचार पर बहुत सवाल पूछ रहे हैं। "

   " बहुत अच्छा सवाल है। इसका जवाब बहुत सीधा और आसान है। अपने मंत्रियों के बारे में जवाब देने के  बजाए विपक्ष के मंत्रियों के भृष्टाचार गिनाना शुरू कर दो। हमारे नेता संसद में जो कर रहे हैं उससे ही तुम्हे समझ जाना चाहिए था। "

 " लेकिन लोग हमे हमारे वायदे की याद दिलाना शुरू कर देते हैं की भृष्टाचार बर्दाश्त नही किया जायेगा। " एक दूसरे कार्यकर्ता ने पूछा। 

   " उन्हें ये बताओ की हम विपक्ष के मंत्रियों का कोई भी भृष्टाचार बर्दाश्त नही करेंगे। कई पुराने मामलों पर सीबीआई को FIR दर्ज करने को कह दिया गया है। और सरकार अपना वायदा जरूर पूरा करेगी। "

    " लेकिन अपने मंत्रियों के भृष्टाचार पर क्या कहें ?" एक दूसरे कार्यकर्ता ने पूछा। 

    " उसके लिए सामने वाले को कहो  की ये कहना ही गलत है की हमारा कोई मंत्री भृष्टाचार कर सकता है। विपक्ष फालतू में मानवीय आधार पर या पारिवारिक संबंधों  किये गए कामों पर सवाल उठा रहे हैं। लोगों को ये बताओ की उन्हें ये मानकर चलना चाहिए की हमारा कोई मंत्री भृष्टाचार नही कर सकता। "

   " कई लोग हमारे विकास के वायदे पर भी सवाल उठा रहे हैं, कालेधन पर सवाल कर रहे हैं। " एक कार्यकर्ता ने पूछा। 

   " उन्हें कहो की विकास हो रहा है इसके लिए उन्हें मूडीज की रेटिंग दिखाओ। और अगर कहीं विकास नही भी हो रहा है तो उसके लिए विपक्ष जिम्मेदार है। "

   " कुछ लोग कहते हैं की हस्पतालों में ना डाक्टर हैं और ना दवाइयाँ हैं इसमें विपक्ष क्या करेगा ?" एक कार्यकर्ता ने हैरानी जताई। 

    " यही तो फर्क है तुममे और हममे। अरे अगर विपक्ष भूमि बिल पास नही होने देगा तो दवाइयों के कारखाने कहां लगेंगे और मैडीकल कॉलेज कहां खुलेंगे। बोलो इसके लिए विपक्ष जिम्मेदार हुआ की नही। " नेताजी ने गर्व से चारों तरफ देखा। 

 कार्यकर्ता ---    " लोग कह रहे हैं की अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल इतना सस्ता हो गया है फिर भी रेल या बस के किराये क्यों नही घट रहे हैं।? " 

 नेताजी -----    " उन्हें बताओ की रेल और बस के किराये कम करने के लिए उनका विस्तार करना जरूरी है। और उसके लिए जमीन चाहिए जो विपक्ष भूमि बिल को रोककर लेने नही दे रहा। "

कार्यकर्ता ----- " चौबीस घंटे और सस्ती बिजली के वायदे पर क्या कहें ? "

नेताजी -------- " चौबीस घंटे और सस्ती बिजली के लिए बिजली के नए और बड़े कारखाने लगाने की जरूरत है। जो भूमि बिल को रोककर विपक्ष करने नही दे रहा। "

कार्यकर्ता ------ " लोग फिल्म इंस्टिट्यूट में गजेन्द्र चौहान को चेयरमैन बनाने की योग्यता पर सवाल कर रहे हैं। "

नेताजी --   " लोगों को बताओ की  उसे गजेन्द्र चौहान की नजरों से ना देखें बल्कि युधिष्ठिर के रूप में देखे। किसी संस्था का चेयरमैन सरकार युधिष्ठिर से बेहतर कहां से लाये। ये लोगों का दृष्टि दोष है। विपक्ष किसी कौरव को चेयरमैन बनाना चाहता है। "

कार्यकर्ता -- " लोग लोकतंत्र की परम्पराओं की बात करते है उस पर क्या तर्क दें ?"

नेताजी -----" तुम लोगों को समझ लेना चाहिए की हमारे लिए भीड़तंत्र ही लोकतंत्र है। और जहां तक तर्क का सवाल है तो सामने वाले को चुप करने के लिए कभी भी तर्क पर भरोसा मत करो, कुतर्क पर करो। सामने वाला कुतर्क से जल्दी चुप होता है। आज के लिए इतना काफी है। बाकि लोगों से हमारी सोशल मीडिया की टीम निपट लेगी। "


खबरी -- बहुत खूब !

Thursday, July 30, 2015

Vyang -- वोट कैसे नही दोगे तुम !

गप्पी -- इस देश के मतदाताओं को बड़ा घमण्ड था। कभी भी और किसी को भी कह देते थे जाओ हम वोट नही देंगे। कई बार तो ऐसा होता था विकास कार्यों की अनदेखी के विरोध में पूरा गांव चुनाव का बहिष्कार कर देता था। ये भी एक लोकतांत्रिक तरीका था अपना विरोध प्रकट करने का। मुहल्ले का छोटा से छोटा आदमी इंकार कर देता था वोट देने से। लोगों को जब सभी पार्टियां और उम्मीदवार किसी काम के नही लगते थे तो वो वोट देने नही जाते थे । जब उसे चुनाव में खड़े लोगों से कोई उम्मीद नजर नही आती थी तो वो वोट देने नही जाता था। एक लोकतान्त्रिक देश के नागरिक होने की हैसियत से हमे ये अधिकार प्राप्त था की हम जिसे चाहें वोट दें और ना चाहें तो किसी को भी वोट ना दें। जब चुनावों में लोगों के वोट डालने की संख्या कम हो जाती है तो अब तक तो उसका विश्लेषण करने वाले कहते थे की राजनितिक पार्टियां लोगों को वोट के लिए आकर्षित करने में विफल रही हैं। यही बात थी जो कुछ पार्टियों को अच्छी नही लगी। इस देश का अदना सा वोटर उसकी गलती निकाल रहा है, उसकी इतनी हिम्मत। सो कानून बना दिया की वोट देना जरूरी है। अगर नही दोगे तो सजा होगी। एक आम वोटर की इतनी हिम्मत की वो वोट देने से इंकार करे। ये नही हो सकता। सरकार ऐसे गैरजिम्मेदार वोटरों को सीधा करेगी। आखिर लोकतंत्र है। 

                        परन्तु मेरे पड़ौसी पूछ रहे थे की जो पार्टियां झूठे वायदे करके वोट ले लेती हैं और बाद में वायदों को जुमला कह देती हैं क्या उनके खिलाफ भी कोई कानून है। वोट देने और चुनाव जीत जाने के बाद लोगों को मालूम पड़ता है की गलत आदमी चुना गया तो क्या उसे वापिस लाने  का कोई कानून है ? जिन लोगों पर अपराधी मामले चल रहे हैं क्या उन्हें चुनाव लड़ने से रोकने का कोई कानून है ? नही है। हो भी नही सकता। ये सारी मांगे नेताओं और पार्टियों के खिलाफ हैं। और हमारे नेता तो लोकतंत्र के राजा हैं तो भला उनके खिलाफ कोई कानून कैसे बन सकता है। 

                        लेकिन कुछ कानून हैं। चुनाव में पैसा खर्च करने की सीमा तय है। कोई भी उम्मीदवार उससे ज्यादा पैसा खर्च नही कर सकता। परन्तु इस कानून का क्या हुआ ? सभी को मालूम है की उम्मीदवार करोड़ों रुपया खर्च करते हैं। कोई पकड़ा भी जाता है तो उसे पार्टी का खर्च बता दिया जाता है। क्या किसी को याद है की कोई उम्मीदवार ज्यादा खर्च करने के लिए चुनाव के अयोग्य घोषित हुआ हो ? फिर लोकतंत्र के राजाओं के खिलाफ बात की जा रही है। जो कभी नही हो सकता। सरकार पांच साल में एकबार चुनाव सुधारों पर मीटिंग का नाटक करती है और बिना किसी नतीजे के समाप्त कर देती है। क्योंकि सरकार समझती है की इस देश के मतदाता अव्वल दरजे के मुर्ख हैं। 

                        सो इन मुर्ख मतदाताओं को सीधा करने का केवल एक ही रास्ता है और वो है कानून। सो कानून बना दिया है की वोट तो भई डालनी ही पड़ेगी वरना सजा भुगतने को तैयार हो जाओ। एक आदमी कह रहा था की भाई अब तो इस मत का भी बटन है की इनमे से कोई नही, फिर क्या एतराज है। अगर आपको कोई भी उम्मीदवार पसंद नही आता है तो आप वो बटन दबा सकते हैं। मुझे हंसी आई। इस बटन का मतलब है खराब से खराब उम्मीदवार भी ये कहेगा लो, मेरी बात छोडो इन्हे तो कोई भी पसंद नही है। वो कहेगा अरे, लोग ही बेकार हैं। अब भगवान राम तो चुनाव लड़ने आने से रहे। दुबारा चुनाव होगा फिर क्या होगा ? तब कोई बाहर से आएगा चुनाव लड़ने ? फिर सारा कसूर जनता का साबित हो जायेगा। 

                       सो इस देश के भोले मतदाताओ, अब ये कानून बन गया की वोट तो तुम्हे देना ही पड़ेगा। दूसरा ये तरीका बन गया और स्थिति पैदा कर दी की कोई भला मनुष्य चुनाव नही लड़ सकता क्योंकि उसके पास इतना पैसा ही नही होगा खर्च करने को। टीवी चैनल पैसा लेकर एक पार्टी की हवा होने के ओपिनियन पोल पेश करेंगे। लाखों के खर्च से खबरों से ज्यादा के विज्ञापन दिखाए जायेंगे। पैसा लेकर खबरें दिखाई जाएँगी। इवेंट मैनेजमेंट कम्पनियां चुनाव प्रचार और प्रबंध करेंगी। सोशल मीडिया पर पैसे लेकर बैठे हुए लोग लगातार झूठ और गालियों का दौर चलाएंगे। सभी छोटी और सही आवाजें नक्कारखाने में खो जाएँगी। और ऐसे माहोल में अगर कोई मतदाता कानो पर हाथ रखकर घर के अंदर बैठना चाहेगा तो उसे सजा हो जाएगी। धन्य है हमारा लोकतंत्र, जो लगभग लोक के खिलाफ हो गया है। आखिर लोग कब इस तानाशाही के खिलाफ वोट देंगे। 


खबरी -- क्या गुजरात सरकार का अनिवार्य मतदान का कानून अलोकतांत्रिक है ?

Sunday, July 26, 2015

Vyang -- मोदीजी की " मन की बात ", मजा आ गया !

खबरी -- मोदीजी ने अभी जो "मन की बात" की है उस पर तुम्हारा क्या कहना है ?


गप्पी -- क्या  कहना है ? अरे ! मैं कहता हूँ की मजा आ गया। जिस दिन से इस बात का जिक्र हो रहा था की मोदीजी मन की बात करने वाले हैं उसी दिन से कोहराम मचा हुआ था। सारा मीडिया कयास लगा रहा था। लोग इंतजार में घड़ी देख रहे थे। विपक्ष के लोगों की दिल की धड़कन तेज हो रही थी। सबको लगता था की मोदीजी अब तो कम से कम भृष्टाचार के आरोपों पर बोलेंगे। देखते हैं क्या कहते हैं। सुषमाजी और वसुंधराजी की सफाई किस तरह देंगे। ललित मोदी पर क्या कहेंगे। पर सब धरे रह गए। मोदीजी ने एक शब्द नही बोला। अब बोलो क्या बोलते हो। सबके चेहरे उतरे हुए थे। कुछ हाथ में नही आया। कुछ लोगों का अनुमान था की संसद न चलने पर विपक्ष को कोसेगे , आरोप लगाएंगे की विपक्ष देश की तरक्की में अड़ंगा डाल  रहा है। पर नही बोले। कुछ लोगों में तो शर्तें लगी हुई थी। एक कह रहा था की ये बोलेंगे, दूसरा कह रहा था की नही, ये बोलेंगे। दोनों हार गए। मैं  तो कहता हूँ की क्रिकेट पर सट्टा लगाने वाले अगर इस बात पर सट्टा लगाएं की प्रधानमंत्री मन की बात में किस बात पर बोलेंगे तो ज्यादा बड़ा काम हो सकता है। प्रधानमंत्री का मन समझना भरतीय टीम के स्कोर के अनुमान से ज्यादा कठिन है।

                       मैं कहता हूँ की मजा आ गया। प्रधानमंत्री जी आपके मन को कौन समझ सकता है। लोग इसे ना तो चुनाओं के पहले समझ पाये और ना बाद में। इस बात को आपने साबित कर दिया की आप किसी के हाथ आने वाले नही हैं। देश में एक से एक बड़ा मसला पड़ा है। चर्चाएं चल रही हैं। लेकिन आप बोले सड़क दुर्घटनाओं पर। विपक्ष के लोगों को छोडो, मीडिया और खुद बीजेपी के लोग तक अनुमान नही लगा पाये। आपकी कपैसिटी पर जिन लोगों को संदेह था शायद अब दूर हो गया हो। आपकी महिमा उनको समझ में आ गयी हो। इतने जलते हुए सवालों के बीच से आप यों साफ निकल गए की देखते ही बनता था।

                                परन्तु आपकी एक बात मुझे समझ में नही आई। आपने पंद्रह अगस्त के भाषण के लिए लोगों से सुझाव क्यों मांगे। मैं कहता हूँ की ये आपने ठीक नही किया। लोग तो भरे बैठे हैं। पता नही क्या-क्या सुझाव भेज देंगे। आपके पास कौनसा मुद्दों का अकाल पड़ा है जो आप उनसे पूछ रहे हैं। इस देश के लोगों की सोच बहुत छोटी है। ये अब तक बेरोजगारी, महंगाई जैसे तुच्छ चीजों और मुद्दों से ऊपर नही उठ पाये हैं। सो इनसे कुछ मत पूछा करो। इन बेवकूफों को तो ये भी नही पता की चुनाव से पहले के और चुनाव के बाद के, दोनों मुद्दे अलग अलग होते हैं।

                                मैं तो कहता हूँ की आपने इतने देशों की यात्रायें की हैं। पंद्रह अगस्त पर आप उन यात्राओं के अनुभव सुना सकते हैं। एकदम नई बात हो जाएगी। अगर कोई भारी भरकम मुद्दा चाहिए जैसे विज्ञानं वगैरा से संबंधित तो आप कैपलर नाम के उस ग्रह पर बोल सकते हैं जिसे नासा ने अभी अभी खोजने का दावा  किया है। आप इस पर अपना दावा भी ठोंक सकते हैं की हमारा है। आप कह सकते हैं की यह ग्रह उन हाथियों से बना है जो महाभारत के युद्ध में भीम ने फेंके थे। जब से आपने गणेश के सर पर भरतीय वैद्यों द्वारा सर्जरी  से हाथी का सिर जोड़ने की बात कही है वैज्ञानिक लोग आपको गंभीरता से नही लेते। सो इस पर कोई विवाद खड़ा नही होगा और आपको अमरीका का समर्थक कहने वालों को बोलती भी बंद हो जाएगी । पंद्रह अगस्त देखने आई भीड़ इस पर तालियां जरूर बजाएगी। लेकिन लोगों से सुझाव मत मांगीये। ये पता नही क्या कह देंगे।