Showing posts with label Vashundhra Raje. Show all posts
Showing posts with label Vashundhra Raje. Show all posts

Tuesday, February 9, 2016

Vyang -- क्या एक ही परिवार काम नही करने दे रहा ?

खबरी -- प्रधानमंत्री मोदी ने कहा  है की एक परिवार सरकार को काम नही करने दे रहा है।

गप्पी -- इससे एक बात तो साफ हो गयी की काम नही हो रहा है। अब तक विपक्ष ये आरोप लगाता था की कुछ काम नही हो रहा है। तब सरकार कहती थी की नही, बहुत काम हो रहा है। उसके बाद धीरे धीरे ऐसा कहने वाले लोगों की तादाद बढ़ती गयी जो कहते हैं की काम नही हो रहा है। आखिर में सरकार ने मान ही लिया की हाँ, काम नही हो रहा है। लेकिन उसने तुरंत ये भी जोड़ दिया की काम इसलिए नही हो रहा है की एक परिवार है जो सरकार को काम नही करने दे रहा है। सरकार तो बहुत काम करना चाहती है लेकिन क्या करे, मजबूर है। नरेंद्र मोदी और बीजेपी अब तक मनमोहन सिंह पर ये आरोप लगाते रहे थे की वो एक परिवार की मर्जी के खिलाफ कुछ भी नही कर सकते। उन्हें रबर स्टाम्प तक कह  दिया जाता था। अब देश को ये मालूम पड़ा की केवल मनमोहन सिंह नही, नरेंद्र मोदी भी उस परिवार की मर्जी के खिलाफ कुछ नही कर सकते, ऐसा खुद मोदी कह रहे हैं। इस परिवार की महिमा तो अपरम्पार है।
                 ऐसा नही है की मोदी जी ने ये बात ऐसे ही कह दी हो। उन्होंने इस बात के सबूत भी दिए हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया की जिस GST बिल को खुद उन्होंने 8 साल तक पास नही होने दिया, उसी बिल को अब ये परिवार पास नही होने दे रहा है। उन्हें इस पर गहरी नाराजगी है की संसद को रोकने का विशेषाधिकार तो केवल उनके पास है, कोई दूसरी पार्टी ऐसा कैसे कर सकती है। मुझे लगता है की अगर इसी तरह चलता रहा तो ऐसा ना हो की जनता उन्हें वापिस उसी भूमिका में  ला दे। तब वो खम ठोककर कह सकते हैं की हाँ, अब हम रोकेंगे संसद और बिलों को।
           क्यों रोकोगे भाई ?
           क्योंकि संसद और बिलों को रोकना लोकतंत्र का हिस्सा है, ये विपक्ष का अधिकार है।
          तो अब जो विपक्ष  कर रहा है वो क्या है ?
           वो देश विरोधी और विकास विरोधी काम है।
खैर, एक दूसरा तबका भी है जो एक दूसरे परिवार पर काम ना करने देने का आरोप  लगा रहा है। ये परिवार है संघ परिवार। सारे देश के लेखक और कलाकार कह रहे हैं की उनके काम करने का माहौल खत्म हो रहा है। दलितों से लेकर छात्रों तक और महिलाओं से लेकर किसानो तक सभी इस पर आरोप लगा रहे हैं। लेकिन बीजेपी और प्रधानमंत्री इसे मानने को तैयार नही हैं। अल्पसंख्यकों की तो ये हालत है की उन्होंने तो  शिकायत तक करना बंद कर दिया है। इस परिवार ने सरकार को कह दिया है की उसके दफ्तर में जो पुरानी, रंग उतरी हुई, खोखले सिर वाली जो मूर्तियां रखी हुई हैं उन्हें शिक्षा संस्थानों में ऊँची जगहों पर रख दिया जाये। अब स्मृति ईरानी जगह ढूंढ ढूंढ कर इन्हे विश्व विद्यालयों के शो केस में सजा रही हैं।
               कुछ परिवार और भी हैं जिनके बारे में लोग जानते हैं की देश में जो भी होता है और जो भी नही होता है, वो सब इनके कारण है। ये देश के शाश्वत परिवार हैं। कौन सरकार है और कौन विपक्ष है, इन्हे कुछ फर्क नही पड़ता है। इनमे अम्बानी परिवार है, अडानी परिवार है, टाटा-बिरला परिवार हैं और भी कई नाम हैं। लेकिन इनकी एक खाशियत है। ये हमेशा देश की गिरती हुई विकास दर को लेकर रोते रहते हैं। शोर मचाते रहते हैं। इनके कारण देश के बैंक डूबने के कगार पर पहुंच गए हैं। इनकी हालत बहुत ही खराब है। नौकरी की इंतजार करता हुआ युवा अपनी चिंता छोड़कर इनके लिए कैंडल मार्च निकालता रहता है। अपने माँ-बाप को गलियां देता रहता है। मुहल्ले के छोटे दुकानदार का लड़का सोशल मीडिया पर लिखता है रिटेल में FDI का विरोध करने वाले दुकानदार गद्दार हैं। मजदूर का लड़का कहता है की अगर श्रम कानूनों को नही बदला गया तो निवेश कैसे आएगा। किसान का लड़का कहता है की अगर खाद की सब्सिडी खत्म नही की गयी राजस्व घाटा कैसे कम होगा। देश का भविष्य इन युवाओं के हाथों में सुरक्षित है। और इस सारे रुदन के बीच इन परिवारों की सम्पत्ति बढ़ती जाती है।
                 इनके अलावा भी कुछ परिवार हैं जो हमारे लोकतंत्र की रीढ़ की हड्डी हैं। जैसे मुलायम सिंह का परिवार, शिवराज सिंह चौहान का परिवार, शुष्मा स्वराज का परिवार, लालू प्रशाद यादव का परिवार, रमन सिंह का परिवार आदि आदि। इनका काम होता रहता है। इनका विकास तेज गति से चलता है भले ही उसके किये संसद ना चले। इनका नाम लेना गुनाह है। आप लेकर देखिये, गेट पर सुब्रमणियम स्वामी डण्डा ( नोटिस ) लेकर बैठे हैं।
              अब कौन परिवार काम नही करने दे रहा इस पर अलग अलग राय हैं। इसलिए एक परिवार का रोना रोना गलत है।

Thursday, August 20, 2015

Vyang -- एक दूरदर्शी नेता के अति-दूरदर्शी भाषण

गप्पी -- स्वतन्त्रता दिवस की पूर्ण संध्या पर महामहिम राष्ट्रपति ने देश को सम्बोधित किया। उनके भाषण के तुरंत बाद मोदीजी ने ट्वीट करके कह दिया की भाषण दूरदर्शी नही था। मोदीजी को मालूम था की ये एक भाषण था, अभिभाषण नही था। अभिभाषण वो होता है जो सरकार लिख कर देती है और राष्ट्रपति महोदय केवल पढ़ देते हैं। जैसे संसद सत्र के शुरू में होता है। सो मोदीजी ने इसे अदूरदर्शी करार दे दिया।
                       वैसे मुझे भी ये दूरदर्शी नही लगा। कारण एकदम साफ है। राष्ट्रपति भवन से संसद भवन की दूरी है ही कितनी। राष्ट्रपति महोदय राष्ट्रपति भवन में खड़े होकर संसद भवन की तरफ देख रहे थे। उन्हें संसद में बना हुआ अखाडा  दिखाई दे रहा था। जो इतने निकट की चीज देखता हो उसे दूरदर्शी कैसे मान लिया जाये।
                        अगले दिन लालकिले से प्रधानमंत्री का भाषण था। मेरे एक पड़ौसी सुबह सुबह नहा-धोकर मेरे पास आकर बैठ गए। सबकी तरह उन्हें और मुझे भी प्रधानमंत्री के दूरदर्शी भाषण का इंतजार था। भाषण शुरू हुआ। उसमे प्रधानमंत्री ने एक सचमुच दूरदर्शी भाषण दिया। उन्होंने अपने भाषण में कहा की जातिवाद और साम्प्रदायिकता को बर्दाश्त नही किया जा सकता। तब भी प्रधानमंत्री ने अपने आसपास बैठे बाबाओं और साध्विओं को नही देखा जो लगातार जहर उगल रहे हैं। इनमे उनके साथी सांसद भी शामिल हैं। लेकिन वो लोग इतने निकट हैं की दूरदर्शी प्रधानमंत्री को दिखाई नही दिए। ठीक उसी तरह जैसे उन्हें संसद नही दिखाई दे रही थी और UAE दिखाई दे रहा था।
                          कई लोग उनसे वन रैंक-वन पेंशन पर किसी घोषणा की उम्मीद कर रहे थे। उनके नजदीक में ही कई दिनों से पूर्व सैनिक प्रदर्शन कर रहे थे। लेकिन पूर्व सैनिकों से यही गलती हो गयी। उन्हें दूरदर्शी प्रधानमंत्री के इतने नजदीक प्रदर्शन नही करना चाहिए था। इतनी नजदीक की चीजें उन्हें कहां दिखाई देती हैं। हमारे यहां एक पुरानी कहावत है की पहाड़ पर जलती हुई आग तो दिखाई देती है पर पैरों के नीचे जलती हुई आग दिखाई नही देती। इसलिए मेरा एक छोटा सा सुझाव है पूर्व सैनिकों को की यदि वो चाहते हैं की प्रधानमंत्री को उनकी समस्या दिखाई दे तो उनको अमेरिका के मैडिसन स्कवेयर में प्रदर्शन करना चाहिए। वो उन्हें जरूर दिखाई देगा।
                        उसके बाद प्रधानमंत्री सीधे भृष्टाचार पर आये। उन्होंने कहा की पंद्रह महीने के शासन में उनकी सरकार पर एक पैसे के भृष्टाचार का आरोप नही है। मेरे पड़ौसी को तो ये सुनते की हंसी का ऐसा दौरा पड़ा की वो पेट पकड़ कर सोफे से नीचे लुढ़क गए। हमने बड़ी मुश्किल से उन्हें इसी हालत में घर पहुंचाया। वहां भी वो बिस्तर पर पेट पकड़ कर दोहरे हुए जा रहे थे। उनकी हालत में जब कोई सुधार नही हुआ तो मैं उन्हें वैसे ही छोड़कर वापिस आ गया। मुझे समझ नही आया की इसमें प्रधानमंत्री ने कौनसी गलत बात कह दी। उन्हें अगर शुषमा स्वराज, शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे नही दिखाई दे रहे थे तो इसमें उनका क्या कसूर है। उन्हें नजदीक की चीजें कहां दिखाई देती हैं। एक दूरदर्शी प्रधानमंत्री को तो केवल दूर की चीजें ही दिखाई देंगी न।
                       उसके बाद प्रधानमंत्री अपने वायदों पर आ गए। उन्होंने कहा की हमने अपने सभी वायदे पूरे कर दिए। मैंने सोचा की अच्छा हुआ मेरे पड़ौसी पहले ही चले गए वरना पड़ोस में उलाहना हो जाता। ये बात सुनकर उनका जो हाल हुआ होता उसके बाद मैं उसके घर वालों को क्या जवाब देता। अब प्रधानमंत्री ने जो भी वायदे किये थे वो केवल पंद्रह महीने पहले ही तो किये थे। इतने नजदीक के वायदे उन्हें कैसे दिखाई देते। लोग है की इस तकनीकी समस्या को समझ ही नही पा रहे हैं। एक इतने दूरदर्शी नेता जिन्हे पंद्रह महीनो में अपना देश ही नही दिखाई दिया और बाकि दुनिया के नक्शे पर जितने देश हैं सब दिखाई दे रहे हैं उनसे इतने नजदीक के वायदों को देखने की उम्मीद करना कहां तक सही है। उन्हें दस दिन पहले पीडीपी के बारे में क्या कहा था और बाद में क्या कहा, दस दिन पहले एनसीपी के बारे में क्या कहा था और सीटें कम पड़ते ही क्या कहने लगे, और तो और वो हररोज परिवार वाद को कोसते हैं लेकिन अपने पास बैठे प्रकाश सिंह बादल, उद्धव ठाकरे, रामबिलास पासवान, रमन सिंह इत्यादि का परिवारवाद कभी दिखाई दिया। नही ना। तो इसमें उनका कोई दोष नही है। वो इतने दूरदर्शी हैं की उनको नजदीक की चीजें दिखाई नही देती। 
                       शाम को मैं अपने पड़ौसी का हालचाल जानने उसके घर गया। पहले तो वो मुझे देखते ही बहुत देर तक हँसा फिर थोड़ा संयत होकर बोला भाई साब क्या मोदीजी ने कोई और चुलकुला सुनाया। मुझे तो मालूम ही नही था की मोदीजी की सेंस ऑफ ह्यूमर इतनी अच्छी है। अब मैं क्या जवाब देता। 
खबरी -- ये बात तो ठीक है लेकिन जब लोग आपके भाषणो को चुटकुला समझना शुरू कर दें तो आपको सावधान हो जाना चाहिए।

Sunday, July 26, 2015

Vyang -- मोदीजी की " मन की बात ", मजा आ गया !

खबरी -- मोदीजी ने अभी जो "मन की बात" की है उस पर तुम्हारा क्या कहना है ?


गप्पी -- क्या  कहना है ? अरे ! मैं कहता हूँ की मजा आ गया। जिस दिन से इस बात का जिक्र हो रहा था की मोदीजी मन की बात करने वाले हैं उसी दिन से कोहराम मचा हुआ था। सारा मीडिया कयास लगा रहा था। लोग इंतजार में घड़ी देख रहे थे। विपक्ष के लोगों की दिल की धड़कन तेज हो रही थी। सबको लगता था की मोदीजी अब तो कम से कम भृष्टाचार के आरोपों पर बोलेंगे। देखते हैं क्या कहते हैं। सुषमाजी और वसुंधराजी की सफाई किस तरह देंगे। ललित मोदी पर क्या कहेंगे। पर सब धरे रह गए। मोदीजी ने एक शब्द नही बोला। अब बोलो क्या बोलते हो। सबके चेहरे उतरे हुए थे। कुछ हाथ में नही आया। कुछ लोगों का अनुमान था की संसद न चलने पर विपक्ष को कोसेगे , आरोप लगाएंगे की विपक्ष देश की तरक्की में अड़ंगा डाल  रहा है। पर नही बोले। कुछ लोगों में तो शर्तें लगी हुई थी। एक कह रहा था की ये बोलेंगे, दूसरा कह रहा था की नही, ये बोलेंगे। दोनों हार गए। मैं  तो कहता हूँ की क्रिकेट पर सट्टा लगाने वाले अगर इस बात पर सट्टा लगाएं की प्रधानमंत्री मन की बात में किस बात पर बोलेंगे तो ज्यादा बड़ा काम हो सकता है। प्रधानमंत्री का मन समझना भरतीय टीम के स्कोर के अनुमान से ज्यादा कठिन है।

                       मैं कहता हूँ की मजा आ गया। प्रधानमंत्री जी आपके मन को कौन समझ सकता है। लोग इसे ना तो चुनाओं के पहले समझ पाये और ना बाद में। इस बात को आपने साबित कर दिया की आप किसी के हाथ आने वाले नही हैं। देश में एक से एक बड़ा मसला पड़ा है। चर्चाएं चल रही हैं। लेकिन आप बोले सड़क दुर्घटनाओं पर। विपक्ष के लोगों को छोडो, मीडिया और खुद बीजेपी के लोग तक अनुमान नही लगा पाये। आपकी कपैसिटी पर जिन लोगों को संदेह था शायद अब दूर हो गया हो। आपकी महिमा उनको समझ में आ गयी हो। इतने जलते हुए सवालों के बीच से आप यों साफ निकल गए की देखते ही बनता था।

                                परन्तु आपकी एक बात मुझे समझ में नही आई। आपने पंद्रह अगस्त के भाषण के लिए लोगों से सुझाव क्यों मांगे। मैं कहता हूँ की ये आपने ठीक नही किया। लोग तो भरे बैठे हैं। पता नही क्या-क्या सुझाव भेज देंगे। आपके पास कौनसा मुद्दों का अकाल पड़ा है जो आप उनसे पूछ रहे हैं। इस देश के लोगों की सोच बहुत छोटी है। ये अब तक बेरोजगारी, महंगाई जैसे तुच्छ चीजों और मुद्दों से ऊपर नही उठ पाये हैं। सो इनसे कुछ मत पूछा करो। इन बेवकूफों को तो ये भी नही पता की चुनाव से पहले के और चुनाव के बाद के, दोनों मुद्दे अलग अलग होते हैं।

                                मैं तो कहता हूँ की आपने इतने देशों की यात्रायें की हैं। पंद्रह अगस्त पर आप उन यात्राओं के अनुभव सुना सकते हैं। एकदम नई बात हो जाएगी। अगर कोई भारी भरकम मुद्दा चाहिए जैसे विज्ञानं वगैरा से संबंधित तो आप कैपलर नाम के उस ग्रह पर बोल सकते हैं जिसे नासा ने अभी अभी खोजने का दावा  किया है। आप इस पर अपना दावा भी ठोंक सकते हैं की हमारा है। आप कह सकते हैं की यह ग्रह उन हाथियों से बना है जो महाभारत के युद्ध में भीम ने फेंके थे। जब से आपने गणेश के सर पर भरतीय वैद्यों द्वारा सर्जरी  से हाथी का सिर जोड़ने की बात कही है वैज्ञानिक लोग आपको गंभीरता से नही लेते। सो इस पर कोई विवाद खड़ा नही होगा और आपको अमरीका का समर्थक कहने वालों को बोलती भी बंद हो जाएगी । पंद्रह अगस्त देखने आई भीड़ इस पर तालियां जरूर बजाएगी। लेकिन लोगों से सुझाव मत मांगीये। ये पता नही क्या कह देंगे।

Friday, July 3, 2015

मुख्यमंत्री हस्पताल में हेमामालिनी से मिली

खबरी -- खबर आई है की राजस्थान की मुख्यमंत्री हेमामालिनी और घायलों से मिलने हस्पताल गयी। 


गप्पी -- " घायल " वसुन्धरा राजे को सहानुभूति और समर्थन की बहुत जरूरत है।

Saturday, June 27, 2015

आज की ताज़ा खबरों का बुलेटिन

खबरी -- कांग्रेस ने मांग की है की प्रधानमन्त्री मोदी " राजे धर्म " छोड़ें और " राज धर्म " निभाएं। 

गप्पी -- मोदीजी ने " राज धर्म " वाजपेयी जी के कहने से नही निभाया तो कांग्रेस किस खेत की मूली है। 

खबरी -- खबर आई है की वशुन्धरा जी और ललित मोदी में कारोबारी रिश्ते हैं। 

गप्पी -- घोटालेबाजों और राजनेताओं में हमेशा से "कारोबारी" रिश्ते रहे हैं। 

खबरी --  खबर है की आईपीएल (सीजन आठ ) में भी मैच फिक्सिंग के आरोप लगे हैं। 

गप्पी -- मैं तो खामख्वाह परेशान था की ये सर्कस फेल न हो जाये। 

खबरी -- बीजेपी का जो MLA वीडियो में मोदीजी की आलोचना करते हुए पाया गया था उसे नोटिस दे दिया गया है। 

गप्पी -- माना बीजेपी लोकतान्त्रिक पार्टी है, लेकिन ऐसा लोकतन्त्र भी किस काम का की कोई मोदीजी की ही आलोचना करने लगे। 

खबरी -- न्यूजीलैंड से भारतीय उच्चायुक्त को वापिस बुला लिया गया है, उनकी पत्नी पर घरेलू नौकर से बदसलूकी का आरोप है। 

गप्पी -- अब उनसे कहा जायेगा की वो भारत में रहकर नौकरों से बदसलूकी करें।