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Thursday, July 16, 2015
Thursday, July 9, 2015
Vyang-- ग्रीस, हम और लोकतन्त्र
खबरी -- क्या ग्रीस के संकट का हम पर कोई असर होगा।
गप्पी -- सरकार कह रही है की नही होगा। बड़े बड़े अर्थशास्त्री कह रहे हैं की नही होगा। लेकिन मैं चाहता हूँ की असर हो और भारी असर हो। ठहरिये , मुझे देशद्रोही की संज्ञा देने से पहले मेरी पूरी बात सुन लीजिये। इस तरह का उतावलापन जो हम हर बात में दिखाते हैं अच्छा नही होता।
ग्रीस के लोगों और सरकार का कहना है की वहां का जनमत संग्रह लोकतन्त्र की लड़ाई है। अब हमारे यहां के लोगों को ये ही समझ नही आ रहा है की ये कर्जे की लड़ाई है और इसका लोकतन्त्र से क्या लेना देना है। पहले हम ग्रीस के लोगों की पूरी बात सुन लेते हैं। उनका कहना है की हम जब भी यूरोपियन यूनियन, IMF या वर्ल्ड बैंक से कर्जा लेते हैं वो हम पर शर्तें लगाता है की लौगों के वेतन में कटौती करो। पेंशन में कटौती करो। शिक्षा और स्वास्थ्य पर किये जाने वाले खर्चों में कटौती करो और वो टैक्स बढ़ाओ जो सीधे लोगों पर असर करते हैं जैसे सेल्स टैक्स। हमने ये सब किया। लोगों की खर्च करने की ताकत कम हो गयी। लोगों ने पेट पर पट्टी बांध ली। कारखानों का माल बिकना कम हो गया। उन्होंने कर्मचारियों की छंटनी की। बेरोजगारी और बढ़ गयी और स्थिति और खराब हो गयी। अब उनके अर्थशास्त्री चिल्ला रहे हैं की तुम्हारा उत्पादन क्यों नही बढ़ रहा है। हम कहते हैं की हमने तो वही किया है जो आपने करने को कहा था। अब इसका परिणाम खराब निकला, जो की निकलना ही था तो उसकी जिम्मेदारी तुम लो। वो कह रहे हैं की नही, रास्ता हम बताएंगे और जिम्मेदारी तुम्हारी होगी। अब पुराना कर्जा चुकाने के लिए नया कर्जा लो और बाकि चीजों में और कटौती करो। सारी चीजें जो सरकार की है चाहे हस्पताल हों, स्कूल हो या कारखाने हों सबको प्राइवेट को बेच दो। हम कह रहे हैं की वो तो आपके कहने पर हम पहले ही बेच चुके हैं। यहां तक की पानी तक का निजीकरण कर चुके हैं। अब उन्होंने हमारे सामने दो रास्ते छोड़े, या तो हम उनके करार पर दस्तखत करके भूखे मरें या बिना करार किये भूखे मरें।
ये स्थिति थी जिसमे हमने कहा की हम भूखे मरने वाले करार पर दस्तखत नही करेंगे। देश हमारा है, तो इसका फैसला हमे लेने दो की कर्ज के पैसे का उपयोग हम कैसे करें। अगर हम ये फैसला नही कर सकते की हमे स्कूल और हस्पताल सरकारी रखने हैं या प्राइवेट, हमे अपने लोगों को उतनी पेंशन तो देनी पड़ेगी की वो जिन्दा रह सकें ये तय नही कर सकते तो काहे का लोकतंत्र। हम सारी नीतियां तुम्हारे कहने से बनायेगे तो हमारे लोकतंत्र का क्या मतलब रह जायेगा। इसलिए हम कह रहे हैं की ये लोकतंत्र की लड़ाई है।
अब हम अपनी बात करते हैं। हमारे यहां दो तरह का लोकतंत्र है एक पार्टीतंत्र और दूसरा भीड़तंत्र। कुछ लोग केवल वो करते हैं जो पार्टी या पार्टी का कोई नेता कहता है। वो कहता है की अपने गाल पर थप्पड़ मारो तो हम पहले तो अपने गाल पर थप्पड़ मारते हैं और फिर ताली बजाते हैं नेता जी के सम्मान में। दूसरे लोग वो करते हैं जो भीड़ कहती है। भीड़ किसी शरीफ आदमी की तरफ ऊँगली करके चिल्ला देती है चोर,चोर। और हम उसे मारकर उसकी सेल्फ़ी फेसबुक पर डाल देते हैं जिस पर हमारे वो मित्र जो मारने में शामिल नही हो पाये थे, धड़ाधड़ लाइक करते हैं।
अब हम ग्रीस संकट के हम पर असर की बात करते हैं। ग्रीस से कहा गया की पब्लिक सैक्टर को बेच दो, हमने तो बिना कहे की सेल लगा रक्खी है। ग्रीस को कहा गया की शिक्षा पर कम खर्च करो, हमने तो पहले ही शिक्षा के बजट में कटौती कर दी है। ग्रीस को कहा गया की स्वास्थ्य सेवाओं को प्राइवेट के भरोसे छोड़ दो। हमने हालाँकि उसे पहले ही प्राइवेट के भरोसे छोड़ा हुआ था, लेकिन हमने फिर भी स्वास्थ्य के बजट में और कटौती कर दी। और ये सब हमने उनके सुझाव के अनुसार विकास के नाम पर ही किया। सो हमे कैसा खतरा। हम तो शर्तें पहले लागु करते हैं और कर्ज लेने बाद में जाते हैं। इसलिए हमारी रेटिंग लगातार बढ़ रही है। कुछ लोग ये एतराज करते हैं की ये लोकतंत्र नही है।
ये लोकतंत्र कैसे नही है ? क्या हमे लोगों ने नही चुना। वैसे हम आपको बता देते हैं की हम लोकतंत्र से ज्यादा राजतन्त्र में विश्वास रखते हैं। हमारे प्रधानमंत्री इसका उदाहरण हमेशा पेश करते रहते हैं। वो चुने हुए मुख्यमंत्रियों से मिलने से इंकार कर देते हैं ,क्या ये राजतन्त्र का उदाहरण नही है। इसलिए मैं चाहता हूँ की ग्रीस संकट का असर हो और लोग ये पूछें की पैसा कहां खर्च हो रहा है और कहां खर्च होना चाहिए। नीतियां कैसी हों ये लोग पूछें। लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं की ग्रीस का हम पर कोई असर नही होगा। मगर मैं इंतजार करूंगा क़यामत तक , खुदा करे की क़यामत हो और असर की खबर आये।
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