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Thursday, September 10, 2015

लोकतंत्र की उलटी गिनती शुरू

            बीजेपी के मातृ संगठन आरएसएस का विश्वास कभी भी लोकतंत्र में नही रहा। इसलिए वो अपने सारे आदर्श राजतंत्र में ढूंढती है। यहां तक की जब नेपाल में राजतंत्र को खत्म करके लोकतंत्र की स्थापना हुई तो आरएसएस ने इस पर नाखुशी और चिंता जाहिर की थी। आरएसएस जिन तबकों का प्रतिनिधित्व करता है उनमे सामंती और साम्प्रदायिक तबकों का बहुमत है। इसलिए वो हमेशा लोकतान्त्रिक संस्थाओं के खिलफ रहता है और जब भी मौका मिलता है उन पर हमला करता है। वो अलग बात है की हमला करते वक्त वो कोई दूसरा बहाना बनाता है। वो समान सिविल कानून की बात करता है लेकिन हर आदमी को अपनी पसंद के अनुसार भोजन, पहनावा, भाषा और रहन सहन  की आजादी के खिलाफ है। उसके लिए समान कानून का मतलब है सब कुछ उसके अनुसार।
       हरियाणा का कानून -------
                                                   अभी-अभी हरियाणा की बीजेपी शासित सरकार ने स्थानीय संस्थाओं के चुनाव के लिए खड़े होने वाले उम्मीदवारों के लिए कुछ शर्तें लगा दी। जाहिर है की ये उनके लोकतान्त्रिक अधिकारों पर हमला था इसलिए कुछ लोगों ने उसे उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगाते हुए सरकार को नोटिस जारी कर दिया। सरकार को मालूम था की वो इसे न्यायालय में सही साबित नही कर पायेगी तो उसने इसका कानून विधानसभा में सारे विपक्ष के विरोध के बावजूद पास करवा दिया और रात को ही उसे राजयपाल से मंजूरी दिलवा कर सुबह चुनाव आयोग से चुनावों की घोषणा  करवा दी। ये सारा काम इतनी जल्दी में इस तरह प्लान किया गया की किसी को फिर से इसे न्यायालय में चुनौती देने का समय न मिले।
कानून का असर ---------------
                                               इस कानून में चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों पर न्यूनतम शिक्षा प्रमाणपत्र की शर्त लगा दी। हालाँकि इस तरह की शर्त साफ तौर पर एक बड़े तबके को चुने जाने से रोकने के लिए ही लगाई गयी है और खुल्ल्म खुल्ला उनके लोकतान्त्रिक अधिकारों के खिलाफ है। इस शर्त का असर ये हुआ की चुनाव लड़ने की इच्छुक सामान्य श्रेणी की 72 % और अनुसूचित जाती की 82 % महिलाये इससे बाहर हो गयी। इसी तरह बहुत से पुरुष उम्मीदवार भी चुनाव लड़ने के अयोग्य हो गए।
एक व्यक्ति-एक वोट का सिद्धांत ---------
                                                              पूरी दुनिया में हर आदमी को वोट देने का अधिकार हमेशा से नही था। पहले तो राजा की संतान ही राजा होती थी। उसके बाद जब इस व्यवस्था को पलट दिया गया तब उच्च स्थिति वाले तबकों ने आम जनता को वोट के अधिकार से वंचित रखने के लिए, वोट के अधिकार के लिए एक न्यूनतम सम्पत्ति होने, या फिर न्यनतम शिक्षा प्राप्त होने की शर्त लगा दी। इससे जनता का बहुमत वोट के अधिकार से बाहर हो गया और घूमफिर कर सत्ता फिर उच्च वर्ग के हाथ में रह गयी। अमेरिका में तो इस कानून के अनुसार अगर किसी आदमी की सम्पत्ति दो राज्यों में है तो वह दोनों जगह वोट का अधिकार रखता था। महिलाओं को वोट देने के अधिकार से वंचित रखा गया। आगे चल कर आम लोगों ने जब इस भेदभाव पूर्ण व्यवस्था का विरोध किया और इसके लिए संघर्ष किया तब कहीं जा कर एक व्यक्ति-एक वोट की  व्यवस्था को लागु करवाया। एक व्यक्ति-एक वोट का लागु होना लोकतंत्र के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ। अब हर आदमी की वोट की कीमत बराबर मानी  जाने लगी। मुकेश अम्बानी और उसका चपरासी, दोनों के वोट की कीमत एक जैसी हो गयी। उच्च वर्गों के लिए ये कोई आसानी से हजम होने वाली बात नही थी। इसी अधिकार के मुताबिक वोट देने के साथ साथ चुने जाने का अधिकार भी जुड़ा हुआ है।
बीजेपी और आरएसएस ------------
                                                      आरएसएस, जो वर्ण व्यवस्था में विश्वास रखती है ये बात कभी मान ही नही सकती की एक अछूत या एक महिला या फिर एक मजदूर चुनाव जीतकर शासन में बैठे। आज भी इस तरह के उदाहरण मिल जाते हैं जहां बड़ी जमीनो के मालिक अनुसूचित जाती के लिए आरक्षित सीट पर अपने यहां काम करने वाले मजदूर को चुनाव जितवाकर खुद उस पद का उपयोग करते रहते हैं। बराबरी की ये व्यवस्था आरएसएस और उसकी राजनैतिक पांख बीजेपी को कभी मंजूर नही हुई। लेकिन लोगों में इसकी स्वीकार्यता को देखते हुए उसकी हिम्मत उसे सीधे सीधे चुनौती देने की नही हुई। इसलिए उसने पिछले रस्ते से इस पर सीमाएं लगानी शुरू की। आज उसने चुने जाने के खिलाफ न्यूनतम शिक्षा की सीमा लगाई है बाद में इसे वोट देने तक भी बढ़ाया जा सकता है।
उलटी गिनती --------------
                                          सही मायने में ये लोकतंत्र की उलटी गिनती है। लोकतंत्र के प्रति बीजेपी की हिकारत उसके सभी कामों में नजर आती है। पार्लियामेंट में विपक्ष के खिलाफ उसका रुख, राज्य सभा के बारे में अरुण जेटली का बयान, प्रधानमंत्री का संसद में इतने बड़े गतिरोध के बावजूद सर्वदलीय मीटिंग में ना आना, संसद को बाईपास करके दूसरे तरीकों  से कानूनो को लागु करने की कोशिश करना इत्यादि ये सब लोकतंत्र के प्रति उसकी हिकारत को ही प्रकट करते हैं। आज हमारे देश में तानाशाही का खतरा सही मायने में तो 1975 से भी ज्यादा है। इसलिए लोकतंत्र की इस उलटी गिनती को रोका  जाना चाहिए।

Tuesday, July 28, 2015

Vyang -- No Politics Please !

गप्पी -- हम गाहे बगाहे ये बात सुनते रहते हैं की कृपया इस मुद्दे पर राजनीती ना करें। कल पंजाब के गुरदासपुर में आतंकवादी हमला हुआ। कई लोग मारे गए। पंजाब के मुख्यमंत्री बादल साहब का बयान आया की आतंकवादी सीमा पार से आये थे इसलिए ये राज्य का मामला नही है। संसद में विपक्ष ने जब इस पर गुप्तचर असफलता का आरोप  लगाया तो वेंकैया नायडू ने कहा की आतंकवाद के मुद्दे पर राजनीती नही की जानी  चाहिए। विपक्ष के लोगों को तो एक बार जैसे सांप सूंघ गया। ये बात उस पार्टी के नेता और खुद वो मंत्री कह रहे हैं जो लगभग सारी राजनीती इसी मुद्दे पर करते रहे हैं। पिछली  UPA सरकार का उन्होंने ये कह कह कर जीना हराम कर दिया था की ये सरकार देश की सुरक्षा के मामले पर असफल है।

                 इससे पहले जब भूमि बिल पर विपक्ष ने विरोध जताया था तब भी सरकार ने कहा था की विपक्ष को देश के विकास के सवाल पर राजनीती नही करनी चाहिए। सरकार बार बार विपक्ष को ये याद दिलाती है की भैया इन मामलों पर राजनीती मत करो। लेकिन विपक्ष है की मानता ही नही है। वह हमेशा गलत चीजों पर राजनीती करता है जैसे आतंकवाद, महंगाई, बेरोजगारी, भूमि बिल इत्यादि। अब अगर विपक्ष इन मामलों पर राजनीती करेगा तो देश का क्या होगा ?

                     इसलिए मेरा सरकार को सुझाव है की वो संसद में एक बिल लेकर आये और उसमे तय कर दिया जाये की किन किन मुद्दों पर राजनीती की जा सकती है। और उन मुद्दों पर राजनीती करने के लिए संसद का एक विशेष सत्र हर साल बुलाया जाये। इसके अलावा बाकि जो भी संसद के सत्र हों उनमे विपक्ष को राजनीती करने पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए। इन सत्रों में विपक्ष का काम केवल हाथ ऊपर करना तय कर दिया जाये वो भी तब जब सरकार कहे।

                     राजनीती करने के लिए जो विशेष सत्र बुलाया जाये उसमे इस तरह का काम रक्खा जाये जैसे राजनीती पर चुटकुले सुनाना, होली खेलना और होली के गीत गाना जिनमे कुछ गालियों की भी छूट दी जा सकती है। संसद से वाकआउट करने और कार्यवाही रोकने जैसे प्रोग्राम भी केवल इसी सत्र में किये जा सकते हैं। कितना अच्छा लगेगा जब संसदीय कार्य मंत्री विपक्ष के किसी नेता पर कोई चुटकुला सुनाएंगे और विपक्ष उसका विरोध करते हुए वाकआउट करेगा। विपक्ष के वाकआऊट की तारीफ करते हुए सत्ता पक्ष के लोग तालियां बजायेंगे और प्रदर्शन की प्रशंसा करेंगे। संसद में एकदम राष्ट्रीय एकता का नजारा होगा।

                       बाकि सत्रों में इस पर रोक का बिल पास होने के बाद जो नियम बनाएं जाएँ उनमे कुछ इस तरह के हो सकते हैं।

        १. सत्र के दौरान विपक्ष के सदस्य मुंह पर कपड़ा लपेट कर आएंगे लेकिन वो काले रंग का नही होना चाहिए।

        २. सरकार किसी बिल पर जब हाथ उठाने के लिए कहेगी तब सभी सदस्यों को पार्टी से ऊपर उठकर हाथ उठाना होगा।

        ३. अचानक कोई घटना घटित होने पर अगर विपक्ष को लगता है की उसे सदन में उठाया जाये तो वो उसे लिखकर संसदीय कार्य मंत्री को देंगे और मंत्री उसकी भाषा कागज पर लिखकर देंगे। उसके अलावा कोई शब्द नही बोला जायेगा।

          ४. किसी मंत्री का कोई घोटाला सामने आता है तो उसे राष्ट्रीय कर्म माना  जायेगा और जब तक सरकार के अंदरुनी मतभेदों के कारण मंत्री को हटाने की नौबत नही आएगी विपक्ष तब तक इंतजार करेगा। ऐसा समय आने पर सरकार विपक्ष को सुचना देगी और विपक्ष उसका इस्तीफा मांग सकता है। इसके अलावा किसी भी मंत्री का इस्तीफा मांगना देशद्रोह माना जायेगा।

           ५.  प्रधानमंत्री से किसी भी मामले पर बयान देने को नही कहा जायेगा और प्रधानमंत्री केवल अपने विदेशी दौरों पर बयान देंगे। और इस पर पूरा देश प्रधानमंत्री के साथ है ये संदेश देने के लिए विपक्ष के सभी सदस्यों द्वारा मेज थपथपाना जरूरी होगा।

            ६. बजट पर विपक्ष के बहस करने पर पाबंदी रहेगी और केवल सत्ता पक्ष के लोग उस पर बोल सकते हैं।

            ७. देश की सभी संवैधानिक संस्थाए मंत्रियों के नीचे और इशारे पर काम करेंगी। संविधान को सरकार के अधीन माना जायेगा। अब तक जो सरकार को संविधान के अधीन माना जाता है वो गलत है और इस भूल का सुधार कर लिया जायेगा। 

            ८. उच्चतम न्यायालय के जजों की नियुक्ति प्रधानमंत्री करेंगे और उच्च न्यायालय के जजों की नियुक्ति का अधिकार मुख्यमंत्री का होगा। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री अगर चाहें तो अपने परिवार के सदस्यों की राय ले सकते हैं।

            ९. अगर कोई न्यायिक बैंच दो सदस्यों की है तो  अटार्नी जनरल को बैंच का तीसरा सदस्य माना जायेगा।

            १०. न्यायालय के सभी फैसले मंत्रिमंडल की छानबीन और अनुमति के अधीन रहेंगे। 

            ११.  चुनाव की घोषणा के बाद ही विपक्ष सरकार की आलोचना कर सकेगा। शेष समय सरकार की आलोचना पर पाबंदी रहेगी। 

             १२. किसानों और मजदूरों से संबन्धित किसी भी मांग को विकास विरोधी, अल्पसंख्यकों से संबंधित मांगो को तुष्टिकरण और महिलाओं से संबन्धित मांगों को संस्कृति विरोधी माना जायेगा। 

             १३. संविधान संशोधन बिल पर जो दो- तिहाई बहुमत का प्रावधान है उसे सदन की नही बल्कि सत्तापक्ष की सदस्यता का दो-तिहाई माना जायेगा।

             १४.  ये सभी नियम सरकार के स्थाईत्व को ध्यान में रखकर बनाये गए हैं इसके बावजूद देश के दुर्भाग्य से अगर भाजपा की सरकार चली जाती है तो ये नियम समाप्त मान लिए जायेंगे। 

 

खबरी -- उम्मीद करता हूँ की सरकार तुम्हारे सुझावों को प्रत्यक्ष रूप से भी लागु करेगी।

Friday, July 24, 2015

Vyang - शिक्षा भी अब धन्धा है।

गप्पी -- हम पिछले कई दिनों से मुनाफदेय धंधों की बात कर रहे हैं। इनमे एक  धंधा है शिक्षा। वैसे तो आदिकाल से शिक्षा एक धंधा रही है। गुरुकुलों के समय भी गुरु शिक्षा देने की एवज में गुरु दक्षिणा मांगता था। और ये गुरु का विशेषाधिकार था की वो गुरु दक्षिणा में कुछ भी मांग सकता था, एकलव्य का अंगूठा भी और द्रुपद का राज्य भी। गुरुओं की इस दादागिरी से छुटकारा पाने के लिए सरकार ने इस धंधे को अपने हाथ में ले लिया। और गुरुओं से बदला लेने के लिए उनकी हालत ऐसी कर दी की उन्हें न्यूनतम वेतन के लिए धरने देने पड़ते हैं। पहले जमाने में गुरुओं ने राजकुमारों से जो अनाप-शनाप दक्षिणा मांगी थी ये उसका फल है। 

                        उसके बाद धंधादारी और दुकानदार राज के मालिक हो गए तो उन्होंने इस धंधे की संभावनाओं को देखते हुए इसका निजीकरण कर दिया। अब सर्वत्र शिक्षा की दुकाने खुलने लगी। खोलने वाले की हैसियत के हिसाब से बिल्डिंग के चौथे माले पर स्कूल, बंद पड़ी फैक्ट्री में स्कूल, घर के दो कमरों में स्कूल से लेकर राष्ट्रपति भवन से भी बड़े बड़े स्कूल। जो स्कूल नही खोल पाये उन्होंने कोचिंग क्लासें खोल ली। लेकिन मुकाबला सरकारी स्कूलों से था जो कम फ़ीस लेकर अच्छा पढ़ा रहे थे। सरकार में बैठे दुकानदारों ने सरकारी स्कूलों का सत्यानाश करना शुरू कर दिया। जहां बिल्डिंग हैं वहां अध्यापक नही हैं, अध्यापक है वहां ब्लैकबोर्ड नही हैं। अंग्रेजी की एक कहावत है की अगर आप पड़ौसी के कुत्ते को मारना चाहते हो तो पंद्रह दिन पहले से उसे पागल कहना शुरू कर दो। उसके बाद उसे मारोगे तो कोई विरोध नही करेगा। इस कहावत को सरकार में बैठे दुकानदारों ने पूरे पब्लिक सैक्टर पर लागु कर दिया। सरकारी स्कूल कुछ घोषित रूप से और कुछ अघोषित रूप से बंद किये जाने लगे। 

                      अब ये धंधा खूब चमक रहा है। पहले तो दाखिला देने के लिए मोटे मोटे डोनेशन मांगो। फिर ऊँची ऊँची फ़ीस लो। फ़ीस बढ़ाने का सबसे बढ़िया तरीका ये है की उसे सत्र के बीच में बढ़ा दो ताकि छात्रों और अभिभावकों के पास कोई ऑप्सन नही हो। फिर फ़ीस तो एक बहाना है असली पैसा तो दूसरी चीजों से आता है। स्कूल की बस का मनमाना किराया वसूल करो। वर्दी एक खास दुकान से खरीदने के लिए कहो जो बाजार से दुगने दाम पर मिले। किताबें ऐसी लगाओ जो किसी ने कभी देखना तो दूर सुनी भी नही हों और स्कूल से ही खरीदने का नियम बनाओ। सत्र  के बीच में टूर प्रोग्राम तय करो। छुट्टियों में डान्स क्लास चलाओ। स्केटिंग से लेकर तैराकी तक जो जो चीजें आपको याद हों उन्हें एक्स्ट्रा गतिविधियों में शामिल कर लो। आजकल अभिभावकों में भी एक तबका ऐसा हो गया है जो चाहता है की उसका बच्चा सुपरमैन हो, वो आपका समर्थन करेगा। अब देखो एक स्कूल के नाम पर आपकी कितनी दुकाने चल रही हैं। स्टेशनरी की दुकान, कपड़े की दुकान, डांस सीखाने का धंधा और दूसरे दसियों धंधे। 

                स्कूल में पढ़े लिखे अध्यापक रखना बिलकुल जरूरी नही है। बल्कि मैं तो ये कहूँगा की अगर ट्रस्टी बारहवीं पास हैं तो अध्यापक दसवीं से ऊपर नही होने चाहियें वरना अनुशासन भंग होने का खतरा रहता है। अध्यापकों को चार हजार वेतन दीजिये और चौबीस हजार पर दस्तखत करवाइये। अध्यापक पर ये शर्त भी लगाइये की वो हजार रूपये महीने में रोज दो घंटे आपके रिश्तेदार की कोचिंग क्लास में भी पढ़ाए। 

                      धीरे धीरे विकास करिये और दूसरे माले पर दो कमरों में चलने वाले कॉलेज को डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा दिलवाइए और शिक्षा मंत्री के रिश्तेदारों को घर बैठे डिग्री भेज दीजिये । इस तरह की डिग्रियां उन लोगों को भी दी जा सकती हैं जो अच्छा पैसा दे सकते हैं लेकिन पढ़ने जैसे फिजूल कामों के लिए उनके पास समय नही है। सरकार शिक्षा में बराबरी का बहुत ख्याल रखती है। हमारे संविधान में जो समाजवाद का शब्द है उसे सही तरीके से यहां लागु किया गया है। स्कूलों में पढ़ने वालों और यूनिवर्सिटिओ के उपकुलपति, कुलपति, चेयरमैन, डायरेक्टर और यहां तक की शिक्षा मंत्री तक एक ही बौद्धिक स्तर के रक्खे गए हैं। अगर कोई इसका विरोध करता है तो उसे वामपन्थी करार दे दो जैसे वामपंथी होना कोई गाली हो या संविधान के खिलाफ हो। इस तरह धीरे धीरे सारी सरकारी सस्थाओं को या तो पागल कुत्ता बना दीजिये या बेच दीजिये। कुछ लोग ये मांग कर रहे हैं की सारे देश में शिक्षा का स्तर समान होना चाहिए। इसलिए सरकार इस मांग का आदर करते हुए सारी शिक्षा को निजी हाथों में देने की योजना पर काम कर रही है।  शिक्षा के क्षेत्र में जो सरकारी हस्तक्षेप है उसे खत्म करने के प्रयास किये जा रहे हैं। सो निजी स्कूलों को जो थोड़ा बहुत मुकाबला झेलना पड रहा है वो भी जल्दी ही खत्म हो जायेगा। इसलिए मैं तो कहता हूँ की ज्यादा सोचविचार करने की जरूरत नही है और इस धंधे में कूद पड़ो।

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Vyang - सबसे बढ़िया धन्धा - राजनीति

गप्पी --  कल हमने एक धन्धे के बारे में बात की। आज हम ऐसे ही दूसरे धन्धों के बारे में बात करेंगे जो कभी धन्धे नही माने जाते थे परन्तु आज के समय में भारी मुनाफा देने वाले धंधे हैं। 

राजनीति --- आज के समय में राजनीति सबसे ज्यादा मुनाफा देने वाला धन्धा है।  इस धन्धे की पहली खासियत ये है की वैसे तो हमारे देश में चपरासी तक की नौकरी के लिए न्यूनतम क्वालिफिकेशन निश्चित है लेकिन राजनीती के धंधे के लिए ऐसी कोई शर्त नही है। एक बिलकुल अंगुठाटेक आदमी ना केवल सांसद या विधायक हो सकता है बल्कि प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री भी हो सकता है। दसवीं तक पढ़ा लिखा आदमी शिक्षा मंत्री हो सकता  है और सारी  जिंदगी झाड़-फूंक करने वाला विज्ञानं और तकनीकी मंत्री हो सकता है। दूसरा फायदा इस धंधे का यह है की देश की जनता ने भी अब इसे पूर्णकालिक धंधा मान लिया है सो इसे धंधे की तरह करने में कोई नैतिक रुकावट नही है। वैसे मैं माफ़ी चाहता हूँ की राजनीती के धंधेबाजों से मैं नैतिकता की बात कर रहा हूँ। 

                     ये धंधा शुरू करने का सबसे अच्छा समय यही है। क्योंकि एक तो कुछ सालों के बाद ये धंधा बिलकुल पारिवारिक धंधा हो जाने वाला है और शायद नए लोगों को इसमें जगह नही मिले। इसलिए इसे जितना जल्दी शुरू कर लिया जाये उतना बेहतर है। दूसरा अभी बाकि दुकानों की छवि इतनी खराब है की नए दुकानदार को जमने में ज्यादा समय नही लगेगा। 

                     इस धंधे के लिए जो चीजें जरूरी हैं उनमे एक तो आपको किसी भेड़ - भेड़िये की खाल या गिरगिट की कला आनी चाहियें। आप को अभी-अभी तुरंत कही गयी बात को तुरंत इनकार करने का अभ्यास कर लेना चाहिए। आजकल मीडिआ वीडियो रिकॉर्डिंग कर लेता है इसलिए ये कहना की मीडिया ने मेरी बात को तोड़-मरोड़कर पेश किया है थोड़ा मुश्किल हो गया है लेकिन विद्वान राजनीतिज्ञों ने अब ये कहना शुरू कर दिया है की मीडिया ने मेरी बात को सही संदर्भ में पेश नही किया है। इस तरह किसी पढ़े-लिखे आदमी को सचिव रक्खा जाये तो बेहतर रहता है। वह आपके रोज-रोज के बयानों के अलावा भाषण भी लिख देगा। 

                 इस धंधे में सबसे महत्त्वपूर्ण बात ये है की आपकी जाती या धर्म के लोगों की तादाद आपके इलाके में कितनी है। अगर वह बहुमत लायक है तब तो चिंता की कोई बात ही नही है। आप तुरंत शोर मचाना शुरू कर सकते है की इस जाती या धर्म के साथ भारी अन्याय हो रहा है और अब सबको इकट्ठे हो जाने की जरूरत है। अगर आपकी जाती या धर्म के लोगों की तादाद कम है तो भी परेशान होने की जरूरत नही है। आप अपनी जाती को किसी दूसरे और नीचे के वर्ग में रखने का आंदोलन चला सकते हैं। आजकल आरक्षण के लिए एक सीढ़ी नीचे उतरने को हर जाती तैयार बैठी है। स्वर्ण जातियां बैकवर्ड में शामिल होने, बैकवर्ड जातियां अनुसूचित जाती में शामिल होने के आंदोलन चल रहे हैं। जिस वर्ग की जातियों के हाथ का छुआ हुआ ये लोग पानी नही पीते थे अब उस में शामिल होने के लिए सारा जोर लगा हुआ है। सो इस तरह का कोई बखेड़ा खड़ा किया जा सकता है। 

                        अगर आप इस ढांचे में भी फिट नही बैठते हैं तो दो चार सन्तों और पत्रकारों को पाल लीजिये। और खुद ही बयान देना शुरू कर दीजिये की नही ये खबर गलत है की मैं भाजपा या कांग्रेस में जा रहा हूँ। हर दूसरे दिन दल बदलने का खंडन कर दीजिये। महीने दो महीने में कोई ना कोई आपसे सम्पर्क जरूर करेगा और आपका काम हो जायेगा। उससे पहले हर हफ्ते राजधानी की यात्रा कीजिये और आसपड़ोस से लेकर पूरे मुहल्ले में बता दीजिये की भाई साब ( भाई साब मतलब कोई भी मंत्री का नाम ले दीजिये )ने बुलाया है। मंत्री का नाम केवल एक-दो बार ही लीजिये उसके बाद केवल भाई साब कहिये। राजधानी में सचिवालय जाकर कहीं बैठ जाइये और शाम को वापिस आ जाइये। वापिस आकर सबको बताइये की भाई साब ने क्या-क्या कहा। खाना ट्रेन में ही खा लीजिये और जब घर से कोई खाने के लिए बुलाने आये तो लोगों के बीच में ही कहिये की भाई साब ने इतना खिला दिया की दो दिन कुछ नही खाया जायेगा। थोड़े दिन में आप एक इलाके के नेता हो जायेंगे। 

     कुछ जरूरी चीजें हैं जिन्हे अच्छी तरह याद कर लीजिये। 

१.  राजनीती में देश का मतलब कभी भी अपने घर की चारदीवारी से बाहर नही होता। 

२.  राजनीती में हर कुकर्म ये कहकर किया जाता है की जनहित के लिए कर रहे हैं। 

३.  विपक्ष का हर नेता और हर पार्टी देशद्रोही होते हैं। 

४. भृष्टाचार जैसा शब्द केवल विपक्ष के लिए इस्तेमाल होता है। 

५. वायदा करने में कभी पीछे मत रहिये, चाँद को लाने और गंगा को वापिस भेजने का वायदा भी किया जा सकता है। 

६.  अपनी सारी विफलताओं का दोष विरोधियों के माथे मढ़िए। अगर एक बार गलती से मुंह से दो और दो पांच निकल जाये तो उसी पर अड़े रहिये। 

        बाकि हालात के हिसाब से कुछ दूसरे पाठ भी हैं लेकिन शुरुआत के लिए इतना काफी है। 

         बाकि कल -----------

Friday, July 17, 2015

Vyang -- हमारी प्रगतिशील शिक्षा व्यवस्था और छात्रों की गुंडागर्दी

गप्पी -- मुझे ये इसलिए लिखना पड रहा है क्योंकि सारे देश से छात्रों की गुण्डागर्दी के समाचार आ रहे हैं। पहला समाचार केरल से है जहां छात्र इस बात को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे की पढ़ाई शुरू होने के इतने दिन बाद भी स्कूलों में किताबें नही बांटी गयी जो सरकार को बांटनी थी। अब ये तो हद दर्जे की गुंडागर्दी है की सरकार को क्या करना चाहिए और क्या नही करना चाहिए ये भी छात्र बताएंगे। छात्रों को तो सरकार का धन्यवाद करना चाहिए की कम से कम स्कूल तो खुले हैं। अगर वो भी नही खुलते तो क्या कर लेते। जैसा की नियम है और कानून में प्रावधान है, गुंडों को सुधारने का काम पुलिस का होता है। सरकार ने संविधान के अनुसार कार्यवाही करते हुए इन गुंडा छात्रों को सुधारने का काम पुलिस को सौंप दिया। उसके बाद छात्रों की जो रक्तरंजित तस्वीरें सोशल मीडिया में छपी उन्हें देखकर मुझे विश्वास हो गया की छात्र सुधर गए होंगे। 

                         दूसरी खबर हरियाणा से आई जहां नर्सिंग की छात्राएं कोर्स पास करने के बाद डिग्री की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रही थी। बोलो, अब लड़के तो लड़के, लड़कियां भी प्रदर्शन कर रही हैं। समाज का नैतिक स्तर कहां पहुंच गया है। हरियाणा में पहले ही बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान बड़े जोर शोर से चल रहा है। वहां #SelfieWithDaughter का अभियान भी बहुत जोर शोर से चल रहा है और पूरे देश में चर्चा में भी है। अब अगर वहां बेटियां पढ़ने के बाद डिग्री जैसी तुच्छ चीज के लिए प्रदर्शन पर उत्तर आएँगी तो ये तो साफ साफ गुंडागर्दी हुई और इससे राज्य की छवि खराब होगी। जाहिर है की पूरे देश में एक ही संविधान लागु है और आपको मालूम ही है की उसमे गुंडों को सुधारने का काम पुलिस को सौंपा गया है। सो हरियाणा की सरकार ने भी संविधान का सम्मान करते हुए ये काम पुलिस को दे दिया। बाद में वहां की छत्राओं की तस्वीरें भी बहुत उत्साहवर्धक थी की हमारी पुलिस अपना काम कितना बखूबी करती है और हम हैं की हमेशा पुलिस को कोसते रहते हैं। अब मेरी हरियाणा की उन बेटियों के माँ बाप को सलाह है की वो चाहें तो खून टपकती हुई बेटियों की selfie पोस्ट कर सकते हैं। सरकार बेटियों को बचाने और पढाने के लिए कटिबद्ध है और उसने कल ही फ़िल्मी हीरोइन परिणीति चोपड़ा को इस अभियान की ब्राण्ड अम्बेसडर बनाया है। 

                             तीसरी खबर गुजरात से है जहां एक सरकारी सहायता प्राप्त लॉ कालेज की सीटें 300 कम करके इतनी ही सीटें प्राइवेट कालेजों को दे दी हैं। अब इस पर हल्ला हो रहा है। कोई बड़ा आंदोलन नही हो रहा क्योंकि इस तरह छोटी बातों पर आंदोलन की परम्परा गुजरात में खत्म हो गयी है। यहां आंदोलन करने के लिए दूसरे महत्त्वपूर्ण मुद्दे हैं जैसे सड़क के बीच में आने वाले मंदिरों और मजारों को हटाने के मुद्दे। खैर, मेरा केवल ये कहना है की गुजरात की पहचान व्यवसाय से है और अगर सरकार शिक्षा के व्यवसाय को बढ़ावा नही देगी तो गुजरात इस क्षेत्र में पिछड़ सकता है। और अगर वो इस क्षेत्र में पिछड़ गया तो गुजरात की तो पहचान ही खत्म हो जाएगी। आखिर इसी माहौल के कारण तो हमारे उद्योगपति गुजरात में निवेश करने के लिए टूट पड़ते हैं। ऐसा भी नही है की सरकार शिक्षा के गिरते स्तर से चिंतित नही है। खुद मुख्यमंत्री ने इस पर चिंता व्यक्त की है ठीक उसी तरह जैसे हमारी सरकारें महंगाई और दूसरे मुद्दों पर चिंता व्यक्त करते रहते हैं। उन्होंने गुजरात में शिक्षा का स्तर उपर उठाने के लिए प्रयास भी किये हैं. कुछ लोगों का मानना है की चार-चार हजार की फिक्स पगार पर अध्यापकों की नियुक्ति करोगे तो शिक्षा का स्तर तो गिरेगा ही। लेकिन सरकार इससे सहमत नही है। इस साल दसवीं और बारहवीं की परीक्षा में गुजरात में रिकार्ड तोड़ बच्चों को फेल कर दिया गया। सरकार का कहना है की ऐसा उसने शिक्षा का स्तर ऊँचा उठाने के लिए किया। वैसे भी जब ये बच्चे शिक्षा पूरी करके नौकरी के लिए आवेदन करते हैं तो वहां की परीक्षा में फेल हो जाते हैं। इसलिए सरकार ने केवल उन बच्चों को पास करने का फैसला किया है जो बिना स्कूलों, अध्यापकों और बिना किसी सहायता से इधर उधर से अपने खुद के प्रयासों से पढ़कर पास हो सकें। इससे भविष्य में नौकरी के लिए ली जाने वाली परीक्षाओं में उनके पास होने की सम्भावना बढ़ जाएगी। और सरकार इस के लिए लगातार प्रयास  करेगी की बच्चों को स्कूलों में कम से कम पढ़ाया जाये ताकि वो अपने पैरों पर खड़े हो सकें। 

                      इन  सारी खबरों को देखने के बाद मुझे तो पूरा यकीन हो गया है की हमारी शिक्षा व्यवस्था प्रगति कर रही है। और जरूरत इस पर और ज्यादा बजट खर्च करने की नही है, बल्कि छात्रों की गुंडागर्दी रोकने की है। इसलिए सरकार को चाहिए की वो अगले बजट में शिक्षा के लिए रखे गए पैसे का एक हिस्सा पुलिस पर खर्च करने का प्रावधान भी रक्खे। 

 

खबरी -- सरकार कर ही रही है थोड़ा तो भरोसा रक्खो।

Thursday, July 16, 2015

नीतिओं के अनुसार योजनाएं या योजना के अनुसार नीतियां

गप्पी -- पहले हमारे देश में एक योजना आयोग होता था। सरकार का दावा था की ये आयोग विकास के लिए योजनाएं बनाता है। इसी आयोग के अनुसार देश में विकास के काम हुए। असली काम कितना हुआ इस पर बहस हो सकती है लेकिन स्कूल के बच्चों को योजनाएं जरूर याद करनी पड़ती थी। पहली योजना, दूसरी योजना इत्यादि। ये किस साल से शुरू हुई और उनमे क्या काम हुआ। अब सरकार का कहना है की ये आयोग एकदम बेकार की चीज थी, और उसे भंग कर दिया गया। अब सरकार नीतियां बनाएगी, इसलिए नीति आयोग बना दिया। 

                      सुबह सुबह मेरे पड़ौसी मेरे पास आकर बैठ गए और पूछने लगे की भाई ये बताओ की क्या बिना नीति के योजनाएं बन सकती हैं? जब सरकार कोई योजना बनती होगी तो उसके पीछे कोई नीति तो होती होगी या नही ? मैं इसका जवाब देने ही वाला था की उसने दूसरा सवाल पूछ लिया की भाई ये बताओ अगर तुम नीति बनाओगे और उसको लागु करने के लिए योजना नही बनाओगे तो उसका क्या फायदा होगा ? एक बार मुझे लगा की इसको मोन्टेक सिंह आहलुवालिया या अरविन्द पनगढिया के पास भेज दूँ और कह दूँ की जो लोग योजनाएं और नीतियां बनाते हैं सीधा उनसे ही क्यों नही पूछ लेते। लेकिन संबंध खराब होने के भय  से मैं ऐसा नही कर पाया। 

                    मैं बोलना शुरू करता इससे पहले ही उसने कहा की मुझे तो लगता है की हमेशा से इस देश में एक ही योजना रही है और वो है जनता को बेवकूफ बनाने की। और ये हर सरकार की साझा नीति रही है चाहे सरकार किसी भी पार्टी की क्यों ना हो। 1971 में श्रीमती इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाने की योजना बनाई लेकिन गरीबी की जगह इंदिरा जी हट गयी। बाद में जनता पार्टी ने सम्पूर्ण क्रान्ति की योजना बनाई लेकिन दो साल में पार्टी में ही क्रान्ति हो गयी। बाद में वाजपेयी जी ने देश को चमकाने की योजना बनाई लेकिन उस पर इतनी गर्द चढ़ गयी की अब वाजपेयीजी को कुछ याद नही आ रहा। अब तुम्ही बताओ की ये सब बेवकूफ बनाने की योजनाएं थी की नही ?

                    मैं बताना ही चाहता था की वो फिर बोले, अब ये सरकार कह रही थी की कालाधन देश में वापिस आये ये हमारी नीति है। लोगों के लिए अच्छे दिन आएं ये भी हमारी नीति है। लेकिन ये कैसे होगा इसकी कोई योजना हमारे पास नही है। हमने योजना आयोग भंग कर दिया है। और ये कब तक हो जायेगा इस पर हम पहले सोचते थे की 100 दिन में हो जायेगा लेकिन वेंकय्या नायडू जी ने हमे समझाया की नौ महीने से पहले तो बच्चा भी नही हो सकता तो हमने इसको बढ़ा कर एक साल कर दिया। बाद में प्रधानमन्त्री जी ने कहा की देश को गड्ढे से बाहर निकालने के लिये कम से कम पांच साल चाहियें तो हमने इसका समय पांच साल कर दिया। अब जब अध्यक्ष जी ने 25 साल की बात की तो पार्टी ने सोचा की ये कुछ ज्यादा नही हो जायेगा तो हमने तुरंत खण्डन कर दिया। अब हमने इसके लिए नीति तो बना ली है लेकिन योजना आयोग के अभाव में हम इसको लागु कैसे करें। अब तुम बताओ की ये बेवकूफ बनाने की नीति है या नही ?

                  मैंने फिर बोलने की कोशिश की लेकिन उन्होंने फिर कहना शुरू किया, अब लोगों को ऐसा लगता है की सरकार अंदर खाने हमारी जमीन लेने की योजना बना रही है। प्रधानमन्त्री कह रहे हैं की जमीन के बिना गावों में स्कूल कैसे बनेगे, लोग कहते हैं की जिन गावों में स्कूल हैं उनमे अध्यापक नही हैं इसलिए पहले स्कूलों में अध्यापक भेजो। सरकार कहती है की बजट नही है। लोग कहते हैं की नए स्कूलों में भी अध्यापक तो चाहिए ही होंगे तो सरकार कहती है की पहले स्कूल बनने दो, अध्यापकों की बाद में सोचेंगे। अब तुम ही बताओ की ये बेवकूफ बनाने की बात हुई या नही। इतना कह कर वो उठ कर चले गए। 

                        मैं सोच रहा हूँ की वो मुझसे पूछने आये थे की बताने आये थे। 

खबरी -- अगर तुम्हे लगता है की तुम इसका जवाब दे सकते हो तो अब दे दो, ये सवाल तो सारा देश पूछ रहा है।

                   

Sunday, July 12, 2015

Vyang -- ज्योतिष के लिए अध्यादेश लाओ

गप्पी -- हमारे देश में आजकल विज्ञानं का बहुत बोलबाला है। आपको ये जानकर बहुत ख़ुशी होगी की हमारे यहां सबसे बड़ा विज्ञानं ज्योतिष को माना जाता है। और ज्योतिष में भी जो हिस्सा खगोल शास्त्र से संबंध रखता है और जिसमे ग्रहों की आकाश में स्थिति और गति की गणना की जाती है उसे नही, बल्कि उस ज्योतिष को माना जाता है जो आदमी और राशि अनुसार फल बताता है। कोई भी ज्योतिषी अपने को आइंस्टीन से दो दर्जे ऊपर समझता है। बाकि के विज्ञानों की हालत तो यह है की भौतिकी का विद्यार्थी ज्योतिषी से ज्यादा नंबर लाने का उपाय पूछता है। कुछ लोग इसे गलती से अंध विश्वास कहते हैं जबकि यह अन्धविश्वास नही है बल्कि पूर्ण विश्वास है। मशीन के सही संचालन के लिए सर्विस के शैड्यूल की जगह प्रशाद का शैड्यूल बनाया जाता है। कुछ लोग इसे नशा भी कहते हैं। लोग इसके आदी हो जाते हैं।सुबह अख़बार में सबसे पहले राशिफल देखते हैं बाद में मुख्य खबरें पढ़ते हैं। अगर अख़बार के राशिफल में उस दिन कोई बुरी खबर मिलने का योग लिखा हो तो बाकि का अख़बार नही पढ़ते। कोई कोई मजबूत दिल के लोग भी होते हैं जो उस दिन कोई बुरी खबर मिलने का योग लिखा हो तो  पहले श्रद्धांजलि वाला पेज पढ़ लेते हैं और अपने उन सभी रिश्तेदारों की फोटो चेहरा याद कर करके ढूंढते हैं जिनके टपकने का उन्हें अंदेशा होता है।

                 नशे पर मुझे याद आया की एक मशहूर ज्योतिषी हैं हमारे देश में। जिनके ग्राहकों में बड़े बड़े फ़िल्मी सितारे और राजनीतिज्ञ हैं। उनका नाम है बेजान दारूवाला। ज्योतिष भी नशा ही होता है ये इनके नाम से ही पता चल जाता है। इनके पुरखे कभी दारू का धंधा करते होंगे, ये भी धंधा तो नशे का ही करते है लेकिन उत्पाद बदल लिया है। इनका नशा धड़ल्ले से बिकता है और इतनी ऊँची कीमत पर बिकता है की आम आदमी तो उसका एक पैग नही खरीद सकता। लेकिन मुझे एक बात नही समझ में आई, की ये अपनी दारू को बेजान क्यों कहते हैं। लोग तो इनकी दारू को बहुत जानदार मानते हैं। किसी किसी को तो एक बार पी हुई महीनो नही उतरती। लेकिन ये उसे बेजान कहते हैं। हो सकता है अपनी चीज की क्वालिटी ये ज्यादा बेहतर जानते हों। इनका दारू बेचने का तरीका भी गजब का है। सामान खुद बेचते हैं और नाम गणेश जी का लेते हैं। कुछ भी कहेंगे लेकिन गणेश जी कहते हैं ये जोड़कर कहेंगे। अपनी जिम्मेदारी भी खत्म और सामने वाले पर बोझ भी पड  जाये। अब कोई ये तो कह नही सकता की गणेश जी ने गलत कहा था। अपना नाम ही नही लेते।

                 ज्योतिष को हमारे जीवन में इतने गहरे तक घुसा दिया गया है की उसके निकले मुहूर्त के बिना कोई काम नही हो सकता। हमारे एक पड़ौसी परेशान थे की उन्हें लड़की की शादी दिल्ली से जाकर मुंबई करनी पड रही थी। कारण था उस दिन दिल्ली में उनके बजट के हिसाब से कोई जगह नही मिल रही थी। मैंने कहा की दो-चार दिन बाद कर लो तो बोले मुहूर्त नही है। सारा देश उन दस दिनों में शादी करना चाहता है जिनमे मुहूर्त बताया गया होता है। उस दिन शादी के लिए न जगह मिलती है न खाना बनाने वाला , न बैंड बाजा। बाकि सारा साल सब कुछ खाली रहता है। अब तो ज्योतिषियों की हिम्मत इतनी हो गयी है की बच्चा पैदा होते ही कह देते हैं की सही समय पर नही हुआ। माँ बाप पर भारी रहेगा। उपाय में लाख रूपये का खर्चा बता देते हैं। डाक्टर कह रहा है की बच्चा सही समय पर हुआ है और कोई समस्या नही है लेकिन माँ बाप मानने को तैयार नही हैं। वो एकबार भगवान की मूर्ति की तरफ नाराजगी से देखते हैं की तुम भी कैसे कैसे काम करते हो, कम से कम सही समय का तो ध्यान रक्खा होता। तुम्हे नही मालूम था तो किसी ज्योतिषी से पूछ लेते। हमारे सिर ये फालतू की समस्या डालने की क्या जरूरत थी। गलती तुम करते हो और भुगतनी हमे पड़ेगी। 

                                          इस धंधे के बाकि व्यापारी भी छाती थोक कर धन्धा करते हैं। अख़बारों के विज्ञापन पढ़ लीजिये।     " सब जगह से निराश , 101 % गारण्टी के साथ काम करवाएं। मेरा किया कोई काट नही सकता। बाबा मूसा बंगाली -- महाकाली उपासक " इतनी गारंटी तो कोलगेट भी नही देती। मैं कहता हूँ की इन पर सर्विस टैक्स क्यों नही लागु किया जाता। वरना सरकार को बैठे बिठाये बड़ी आमदनी का जरिया हो जाता।

                   लेकिन कई बार ऐसा भी होता है की ज्योतिषी मुहूर्त देख कर पुल का उद्धघाट्न तय करता है। नेताजी नारियल फोड़ कर घर नही पहुँचते और पुल गिर जाता है। लड़का लड़की दोनों के माँ बाप अच्छी तरह शुभ मुहूर्त देखकर शादी करते हैं और छह महीने में नौबत तलाक की आ जाती है। जिस बच्चे को वो बिलकुल सही समय और योग के अनुसार पैदा हुआ बताते हैं वही ऐसे ऐसे कुकर्म करता है की माँ बाप को मुंह छिपाना मुश्किल हो जाता है। पर इसकी जिम्मेदारी लेने को कोई तैयार नही है। ज्योतिषी फ़ीस लेकर भविष्य बताता है और मुसीबत का उपाय करता है लेकिन परिणाम उल्टा निकलता है। कानून के हिसाब से तो यह ग्राहक सुरक्षा अदालत का मामला बनता है। सरकार को चाहिए की वो ज्योतिष को व्यापार घोषित कर दे ताकि लोग अदालत जा सकें। 

                       पिछले दिनों ये खबर आई थी की कुछ विश्वविधालय ज्योतिष का डिग्री प्रोग्राम शुरू कर रहे हैं। मैं कहता हूँ की देश धन्य हो जायेगा। एक तो इससे विज्ञानं के क्षेत्र में हमारी स्थिति सुधरेगी और हम योग दिवस की तरह ज्योतिष के नोबल पुरुस्कार की मांग कर सकते हैं। इससे कम से कम एक नोबल पुरुस्कार हर साल हमारे लिए पक्का हो जायेगा। दूसरा सरकार के सभी सरकारी विभाग एक स्थाई ज्योतिषी रख सकेंगे जो यह बता सकेगा की किस इमारत का फीता कौनसे मंत्री से कटवाना शुभ रहेगा। सरकार तय कर सकेगी की कौनसी सड़क किस मुहूर्त में शुरू की जाये। जिस दिन राहुकाल हो उस दिन दफ्तर में छुट्टी रक्खी जा सकती है। दफ्तर खुलने का समय बाकायदा चौघड़िया देखकर तय किया जा सकता है। साथ ही संविधान में जो साइंटिफिक टेम्परामेन्ट को बढ़ावा देने जैसी उल-जलूल बातें लिखी गयी हैं उन्हें घोषित रूप से खत्म किया जा सकेगा और उसके लिए सरकार को इतने लचर बहाने बनाने की जरूरत नही पड़ेगी जैसे वो अब बना रही है। इसलिए विश्व महत्त्व के इस काम पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है और संसद के मानसून सत्र में इसके लिए प्रस्ताव लाया जा सकता है। बल्कि मैं तो कहता हूँ की उतना इंतजार करने की भी जरूरत नही है, इसके लिए एक अध्यादेश लाया जा सकता है। वैसे भी सरकार इस महीने कोई अध्यादेश नही लाई है और उसकी छवि खराब हो रही है। 

 

खबरी -- उम्मीद रखनी चाहिए की सरकार अच्छा सा मुहूर्त देखकर अध्यादेश जरूर लाएगी।

              
               

Thursday, July 9, 2015

Vyang-- ग्रीस, हम और लोकतन्त्र

खबरी -- क्या ग्रीस के संकट का हम पर कोई असर होगा। 


गप्पी -- सरकार कह रही है की नही होगा। बड़े बड़े अर्थशास्त्री कह रहे हैं की नही होगा। लेकिन मैं चाहता हूँ की असर हो और भारी असर हो। ठहरिये , मुझे देशद्रोही की संज्ञा देने से पहले मेरी पूरी बात सुन लीजिये। इस तरह का उतावलापन जो हम हर बात में दिखाते हैं अच्छा नही होता। 

                ग्रीस के लोगों और सरकार का कहना है की वहां का जनमत संग्रह लोकतन्त्र की लड़ाई है। अब हमारे यहां के लोगों को ये ही समझ नही आ रहा है की ये कर्जे की लड़ाई है और इसका लोकतन्त्र से क्या लेना देना है। पहले हम ग्रीस के लोगों की पूरी बात सुन लेते हैं। उनका कहना है की हम जब भी यूरोपियन यूनियन, IMF या वर्ल्ड बैंक से कर्जा लेते हैं वो हम पर शर्तें लगाता है की लौगों के वेतन में कटौती करो। पेंशन में कटौती करो। शिक्षा और स्वास्थ्य पर किये जाने वाले खर्चों में कटौती करो और वो टैक्स बढ़ाओ जो सीधे लोगों पर असर करते हैं जैसे सेल्स टैक्स। हमने ये सब किया। लोगों की खर्च करने की ताकत कम हो गयी। लोगों ने पेट पर पट्टी बांध ली। कारखानों का माल बिकना कम हो गया। उन्होंने कर्मचारियों की छंटनी की। बेरोजगारी और बढ़ गयी और स्थिति और खराब हो गयी। अब उनके अर्थशास्त्री चिल्ला रहे हैं की तुम्हारा उत्पादन क्यों नही बढ़ रहा है। हम कहते हैं की हमने तो वही किया है जो आपने करने को कहा था। अब इसका परिणाम खराब निकला, जो की निकलना ही था तो उसकी जिम्मेदारी तुम लो। वो कह रहे हैं की नही, रास्ता हम बताएंगे और जिम्मेदारी तुम्हारी होगी। अब पुराना कर्जा चुकाने के लिए नया कर्जा लो और बाकि चीजों में और कटौती करो। सारी चीजें जो सरकार की है चाहे हस्पताल हों, स्कूल हो या कारखाने हों सबको प्राइवेट को बेच दो। हम कह रहे हैं की वो तो आपके कहने पर हम पहले ही बेच चुके हैं। यहां तक की पानी तक का निजीकरण कर चुके हैं। अब उन्होंने हमारे सामने दो रास्ते छोड़े, या तो हम उनके करार पर दस्तखत करके भूखे मरें या बिना करार किये भूखे मरें। 

                      ये स्थिति थी जिसमे हमने कहा की हम भूखे मरने वाले करार पर दस्तखत नही करेंगे। देश हमारा है, तो इसका फैसला हमे लेने दो की कर्ज के पैसे का उपयोग हम कैसे करें। अगर हम ये फैसला नही कर सकते की हमे स्कूल और हस्पताल सरकारी रखने हैं या प्राइवेट, हमे अपने लोगों को उतनी पेंशन तो देनी पड़ेगी की वो जिन्दा रह सकें ये तय नही कर सकते तो काहे का लोकतंत्र। हम सारी  नीतियां तुम्हारे कहने से बनायेगे तो हमारे लोकतंत्र का क्या मतलब रह जायेगा। इसलिए हम कह रहे हैं की ये लोकतंत्र की लड़ाई है। 

                     अब हम अपनी बात करते हैं। हमारे यहां दो तरह का लोकतंत्र है एक पार्टीतंत्र और दूसरा भीड़तंत्र। कुछ लोग केवल वो करते हैं जो पार्टी या पार्टी का कोई नेता कहता है। वो कहता है की अपने गाल पर थप्पड़ मारो तो हम पहले तो अपने गाल पर थप्पड़ मारते हैं और फिर ताली बजाते हैं नेता जी के सम्मान में। दूसरे लोग वो करते हैं जो भीड़ कहती है। भीड़ किसी शरीफ आदमी की तरफ ऊँगली करके चिल्ला देती है चोर,चोर। और हम उसे मारकर उसकी सेल्फ़ी फेसबुक पर डाल देते हैं जिस पर हमारे वो मित्र जो मारने में शामिल नही हो पाये थे, धड़ाधड़ लाइक करते हैं। 

                  अब हम ग्रीस संकट के हम पर असर की बात करते हैं। ग्रीस से कहा गया की पब्लिक सैक्टर को बेच दो, हमने तो बिना कहे की सेल लगा रक्खी है। ग्रीस को कहा गया की शिक्षा पर कम खर्च करो, हमने तो पहले ही शिक्षा के बजट में कटौती कर दी है। ग्रीस को कहा गया की स्वास्थ्य सेवाओं को प्राइवेट के भरोसे छोड़ दो। हमने हालाँकि उसे पहले ही प्राइवेट के भरोसे छोड़ा हुआ था, लेकिन हमने फिर भी स्वास्थ्य के बजट में और कटौती कर दी। और ये सब हमने उनके सुझाव के अनुसार विकास के नाम पर ही किया। सो हमे कैसा खतरा। हम तो शर्तें पहले लागु करते हैं और कर्ज लेने बाद में जाते हैं। इसलिए हमारी रेटिंग लगातार बढ़ रही है। कुछ लोग ये एतराज करते हैं की ये लोकतंत्र नही है। 

                    ये लोकतंत्र कैसे नही है ? क्या हमे लोगों ने नही चुना। वैसे हम आपको बता देते हैं की हम लोकतंत्र से ज्यादा राजतन्त्र में विश्वास रखते हैं। हमारे प्रधानमंत्री इसका उदाहरण हमेशा पेश करते रहते हैं। वो चुने हुए मुख्यमंत्रियों से मिलने से इंकार कर देते हैं ,क्या ये राजतन्त्र का उदाहरण नही है। इसलिए मैं चाहता हूँ की ग्रीस संकट का  असर हो और लोग ये पूछें की पैसा कहां खर्च हो रहा है और कहां खर्च होना चाहिए। नीतियां कैसी हों ये लोग पूछें। लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं की ग्रीस का हम पर कोई असर नही होगा। मगर मैं इंतजार करूंगा क़यामत तक , खुदा करे की क़यामत हो और असर की खबर आये।

Vyang--शिवराज सिंह हाजिर हों।


गप्पी -- मध्यप्रदेश आजकल खबरों में है। खबरों में व्यापम घोटाले की वजह से है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह पर आरोप लग रहे हैं और वो इनकार कर रहे हैं हमेशा की तरह। ये तय किया गया की एक जनअदालत लगा ली जाए जिसमे शिवराज सिंह से कुछ सवाल पूछे जाएँ।

          अदालत लगी हुई है। आवाज लगाई जाती है, शिवराज सिंह हाजिर हों।

           शिवराज सिंह अदालत में हाजिर होते हैं तो जनता का वकील उनसे सवाल पूछता है।

वकील -- क्या आप जनता के सवालों का जवाब देने के लिए तैयार है ?

शिवराज सिंह -- मैं जनता के प्रति जवाबदेह नही हूँ। वैसे तो मैं किसी के प्रति भी जवाबदेह नही हूँ। परन्तु जनता के प्रति जवाबदेह होने का तो सवाल ही पैदा नही होता। हमारी पार्टी में इसका रिवाज ही नही है।

वकील -- लेकिन आप जनता के चुने हुए नुमाइन्दे हैं। आप जनता के प्रति जवाबदेही से इनकार कैसे कर सकते हैं ?

शिवराज सिंह -- मुझे मुख्यमंत्री जनता ने नही बनाया, पार्टी ने बनाया है। इसलिए मैं जनता के प्रति नही पार्टी के प्रति जवाबदेह हूँ। जनता को अपना भरम निकाल देना चाहिए।

वकील -- लेकिन आपको विधायक तो जनता ने ही चुना है।

शिवराज सिंह -- आपने मुझे यहां मुख्यमंत्री की हैसियत से बुलाया है। इसलिए बात भी उसी हिसाब से कीजिये। मैं यहां विधायक की हैसियत से नही आया। हूँ, जनता।

वकील -- क्या आप व्यापम घोटाले की नैतिक जिम्मेदारी लेते हैं। 

शिवराज सिंह -- आप हमसे नैतिकता की बात कैसे कर सकते हैं ? आपको मालूम होना चाहिए की हम राजनीती में हैं। 

वकील -- तो आप किस चीज की जिम्मेदारी लेते हैं। 

शिवराज सिंह -- हम केवल मध्यप्रदेश की जिम्मेदारी लेते हैं। मध्यप्रदेश का विकास हमारी जिद है, हमारा पैशन है। 

वकील -- लेकिन इतना बड़ा घोटाला हुआ है। 

शिवराज सिंह -- ये मध्यप्रदेश को बदनाम करने की साजिश है ये स्टैण्ड हमने कल ही तय किया है। अब आपको हररोज ये सुनने को मिलेगा की ये मध्यप्रदेश को बदनाम करने की साजिश है। बिलकुल गुजरात की तरह। ये कांग्रेस की साजिश है। 

वकील -- क्या आप कहना चाहते हैं की घोटाला नही हुआ ? तो फिर आप कैसे कहते हैं की इस घोटाले का पर्दाफाश आपने किया था। 

शिवराज सिंह -- हाँ, हम मानते हैं की घोटाला हुआ है इसीलिए तो हम जाँच करा रहे हैं। आखिर सबसे ज्यादा नुकशान तो हमारा ही हुआ है। 

वकील -- वो कैसे ?

शिवराज सिंह --  देखिए पूरी बात ध्यान से सुनिए। वरना आप कभी भी इस घोटाले की गंभीरता और हमारा नुकशान समझ नही पाएंगे। पहले कांग्रेस का राज था। दाखिलों और भर्तिओं की कोई सही प्रणाली नही थी। पर्चियों पर भर्ती हो जाती थी। हमने व्यापम की स्थापना की। आप नाम से ही समझ सकते हैं की हमारी योजना कितनी व्यापक थी। हमने सारी नौकरियों के रेट तय किये। दाखिलों के रेट तय किये। MBBS का 35 लाख और MD का एक करोड़। इसी तरह इंजीनियरिंग के रेट तय किये। फिर सभी नौकरियों के रेट तय किये। MBBS का झूठा पेपर देने के पैसे तय हुए। दलाली की दरें तय की। हमारे पास नई नौकरियां नही थी तो हमने 10 -15 साल से नौकरी कर रहे अध्यापकों को पेपर दिलवा कर 24000 अध्यापकों को बर्खास्त किया और उनकी जगह नई भर्तियां की। हम सोच रहे थे की इस तरह लगाये हुए अध्यापकों के पढाये हुए बच्चे तो भविष्य में पेपर पास ही नही कर पाएंगे और हमारा धन्धा बढ़ेगा। इस तरह की पूरी योजना बनाने और लागु करने में कितनी मेहनत होती है आप समझ सकते हैं। लेकिन अब हिसाब मिलाता हूँ तो हिसाब ही नही मिल रहा। जितनी नौकरियाँ दी गयी, दाखिले किये गए उसके हिसाब से जितना पैसा आना चाहिए था नही आया। घोटाला हो गया। इसलिए मैंने जाँच शुरू की। मेरी तो सारी मेहनत पानी में चली गयी। 

वकील -- लेकिन आपने अभी जो सीबीआई की जाँच की मांग की है तो लोग कहते हैं की रपट पड़े तो हर-गंगा। 

शिवराज सिंह -- जिन लोगों ने मेरे साथ ये घोटाला किया वो ही विपक्ष से मिल गए। कहते हैं की हमारा नाम आया है तो तुम्हारा भी आना चाहिए। कलियुग है। मैं अगर नही कहता तो भी सीबीआई जाँच तो होनी ही थी। इसलिए मैंने भी कह दिया। 

वकील -- सुना है की आपकी पार्टी के अंदर भी आपसे इस्तीफा मांगने वाले बढ़ रहे हैं क्या आपको इस्तीफा देना पड़ेगा ?

शिवराज सिंह -- सब ऊपर वाले की मर्जी पर निर्भर करता है। हम तो उसके हाथ की कठपुतलियां हैं। वैसे मैं उनको हमेशा अपना बड़ा भाई कहता रहा हूँ। लेकिन हर मुख्यमंत्री वशुन्धरा राजे की तरह ताकतवर तो नही होता न। 

                 तभी जनता में से आवाज आई की ये शिवराज सिंह नकली है। ये असली शिवराज सिंह नही है। 

अदालत ने पूछा की क्या तुम असली शिवराज सिंह नही हो ?

लेकिन मेरे सारे जवाब असली हैं आपको आम खाने से मतलब होना चाहिए। 

अदालत ने इस बात की जाँच होने तक की ये शिवराज सिंह असली है या नकली कार्यवाही स्थगित कर दी। 

 

खबरी -- लगे हाथ ये भी सीबीआई को दे देते।

Thursday, July 2, 2015

महिला सुरक्षा के लिए नारे लगाइये

खबरी -- क्या तुम समझते हो की #SelfieWithDaughter महिला सुरक्षा में कुछ योगदान करेगी ?


गप्पी -- हमारा भारत देश महान है। हमे इस बात का बड़ा गर्व है की हम ऋषियों की संतान हैं। पता नही ऐसी ऐसी चीजे कहाँ से ढूढ़ कर लाते  हैं। हमने दुनिया में कुछ बड़े कीर्तिमान स्थापित किये हैं। इसमें एक ये भी है। क्या कभी किसी ने सोचा की महिला सुरक्षा के नाम पर ये जो इस तरह के अभियान चलाए जा रहे हैं उनका मतलब क्या है। ये #SelfieWithDaughter का जो अभियान है उसका मतलब क्या है। ये अभियान बेटियों की सुरक्षा के लिए चलाया जा रहा है। पर सुरक्षा किससे ? उसके खुद के माँ बाप से ! उसके अपने माँ बाप उसे पैदा होने से पहले ही गर्भ में ही ना मार दें इसलिए। वाह ! कितने महान हैं हम और हमारी संस्कृति। जब कोई हमारे देश में महिलाओं की दयनीय स्थिति की तरफ ध्यान दिलाने की कोशिश करता है तो हम एक स्वर में चिल्लाते हैं। ये हम पर आरोप है, हमारी महान संस्कृति को बदनाम करने की साजिश है। बिना पढ़े  लिखे और बिना अक्ल के लोगों का गिरोह टूट पड़ता है उस पर। लेकिन बन्धु , सच्चाई तो यही है।

                     जब हम महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव का सवाल उठाते हैं तो उसका उदगम तो हमारे घर से होता है। हमने कभी भी इस भेदभाव के खिलाफ ईमानदारी से काम नही किया। केवल नारे लगाये की हमारे ग्रन्थों में लिखा है की हमारे यहां नारी की पूजा होती है। हमने ओरतों को देवी का दर्जा दिया है। लेकिन केवल नारे लगा देने से कभी समस्याएं हल हुई है। हम समस्या की आँख में आँख डालने को तैयार नही हैं। महान जो हैं।

                 हमने गावों में पहले इस बात को बहुत बार सुना था की दूध पीने से लड़कियों को मूंछे आ जाती हैं। लड़कियों को दूध ना देने का कितना बढ़िया इलाज निकाला था हमने। और लोग हैं की हमारी काबिलियत पर शक करते रहते हैं। हम हमेशा समस्या से ध्यान हटाने के लिए नारे लगाते हैं। और #SelfieWithDaughter भी नारा है। अगर हमे काम ही करना होता तो क्या महिला आरक्षण बिल सालों से लटका रहता। किसी की भी सरकार रही हो सबने इस पर आम सहमति ना होने का बहाना किया। जैसे संसद में सारे काम आम सहमति के द्वारा ही होते हों। क्या लैंड बिल पर आम सहमति है। क्या बीमा बिल पर आम सहमति थी। नही थी। सो बहाने मत बनाओ। या तो सच का सामना करो या इस तरह के नाटक करना बंद करो।

                  अब हमे लड़कियां नही चाहियें। लड़कियों को पालते हैं तो ऐसा लगता है जैसे किसी की बेगार कर रहे हों। हमे तो बस बहुएँ चाहियें। बहुएँ भी ऐसी की शादी करके आएं तो इतना दहेज लाएं की घर भर जाए। सुबह चार बजे उठकर रात को ग्यारह बजे तक पूरे परिवार की सेवा करें। नजर ऊपर ना उठाएँ। शराब पीकर कभी पिट जाएं तो भी चुप रहें। केवल बेटों को जन्म दें। अब ये कोई बड़ी मांग तो है नही। कोई उनसे ये पूछ ले की भाई लड़कियां नही होंगी तो बहुएं कहाँ से आएंगी तो कहेंगे की बहुएँ तो दूसरे के घर से आती हैं उसका हमारे यहां बेटियों के होने से क्या संबंध है। 

                   अब सरकार नारे लगा रही है की बेटी बचाओ। हम भी लगा रहे हैं। दूसरों से कह रहे हैं की तुम अपनी बेटी बचाओ वरना हमारे यहां बहुएँ कहाँ से आएंगी । कैसे बचाओ , ये तो सरकार बताएगी। बेटियों के लिए शिक्षा मुफ्त होगी ? नही होगी। उसके लिए इस गरीब देश के पास साधन कहाँ हैं। विज्ञापनों के लिए हैं। उन्हें रोजगार में प्राथमिकता मिलेगी ? क्यों मिलेगी ? ये तो हुई बेटियों की बात। अब बाकि महिलाओं की बात करते हैं। 

                      हम रोज बयान देते हैं की बलात्कार की सजा मौत होनी चाहिए। फिर भी लोगों को क्यों लगता है की हम महिला सुरक्षा के लिए गम्भीर नही हैं। इसीलिए तो लगता है भैया की आप गंभीर नही हैं। क्योंकि फांसी की सजा भी नारा है। अगर नारा नही होता तो महिलाओं के संगठन इसका विरोध क्यों करते। अब कोई महिला संगठनो को तो महिला विरोधी नही कह सकता। उनका कहना है की बलात्कार के केसों में खुद महिला मुख्य गवाह होती है। अगर खून और बलात्कार दोनों की सजा फांसी हो जाएगी तो कोई बलात्कारी लड़की को जिन्दा क्यों छोड़ेगा। बलात्कार के लिए फांसी की सजा का मतलब होगा पीड़ित लड़कियों की हत्या सुनिश्चित करना। महिला संगठन चाहते हैं की इसके लिए मुकदमा दर्ज करने और जाँच के लिए निश्चित नियम बनाये जाएँ। और जो पुलिस ऑफिसर इन नियमो का उल्लंघन करे उसके खिलाफ गुनाह में शामिल होने का केस  दर्ज किया जाये। 

                        छोडो यार कहाँ का पचड़ा ले बैठे। अभी तो एकबार अभियान हो गया। बाद में चुनाव आएगा  तब देखेंगे। यहां इन चीजों को कौन पूछता है। ये तो नारी की पूजा करने वाला  देश है। यहां नारी के लिए कुछ और करने की जरूरत ही कहाँ है।

                  

Monday, June 29, 2015

विज्ञानं का भविष्य बहुत उज्ज्वल है हनुमान जी की कृपा से

गप्पी -- मुझे अपने पड़ौसी के साथ सुबह सुबह बाहर जाना था। मैं उनके घर पहुंचा तो वे घर के बाहर ही मेरा इंतजार कर रहे थे। उनके साथ उनका सुपुत्र भी था जो आठवीं क्लास में पढ़ता है। पड़ौसी ने बताया की आज उसका विज्ञानं का पेपर है सो उसे भी लगे हाथ स्कूल छोड़ देते हैं। अच्छी बात है, मैंने कहा। हम तीनो साथ में चले। थोड़ी दूर चलने पर सड़क के किनारे हनुमान जी का मंदिर आया। मेरे पड़ौसी ने लड़के से कहा की बेटा जाओ मंदिर में जाकर हनुमान जी को प्रणाम करो और प्रशाद  भी ले लो। साथ ही ये भी बोल देना की हनुमान जी अगर नंबर अच्छे आये तो ग्यारह रूपये का प्रशाद भी चढ़ाएंगे। बेटा अंदर चला गया। विज्ञानं के पेपर में लड़का अब हनुमान जी के भरोसे था।

      मैंने पड़ौसी से पूछा," क्या तुम्हे लगता है की हनुमान जी ने विज्ञानं पढ़ा  होगा ?"

     " क्या सुबह सुबह मजाक करते हो भाई साब, भला हनुमान जी को विज्ञानं पढ़ने  की क्या जरूरत है वो तो देवता हैं उन्हें तो सबकुछ मालूम है। "

     " लेकिन उन्हें सीताजी का पता तो नही मालूम था। वो उसे ढूंढने लंका तक गए। सब कुछ मालूम था तो वहीं क्यों बता दिया खड़े खड़े। " मैंने पूछा।

     " देवताओं के बारे में ऐसी बातें नही करते वो नाराज हो जायेंगे। " पड़ौसी के चेहरे पर सचमुच घबराहट के भाव थे।

       तब तक बेटा काम निपटा कर आ गया और हम आगे चल पड़े।

       "बेटा क्या तुम्हे मालूम है की आदमी कैसे बना >"

      " मुझे कैसे मालूम होगा अंकल ! मुझे तो अभी आदमी बनने में देर है। आप पापाजी से पूछ लीजिये। " लड़के ने जवाब दिया।

      देर क्या मुझे तो इस बात में ही शक है की तुम्हारे पापा तुम्हे कभी आदमी बनने देंगे। मैंने मन ही मन सोचा। मैंने दुबारा कोशिश की ," बेटा मेरा मतलब था की पृथ्वी पर मनुष्य कैसे पैदा हुआ ?"

      " अंकल वो तो पापाजी कहते हैं की ब्रह्मा जी ने मनुष्य की रचना की। उधर स्कूल के टीचर कहते हैं की आदमी बन्दर से बना। " लड़के ने जवाब दिया।

         मुझे कुछ आशा बंधी।

    तभी मेरे पड़ौसी बोले ," टीचर और किताबों का क्या है जी  कुछ भी लिख देते है। लेकिन हमने तो अपने लड़के को अच्छे संस्कार दिए हैं। उसे सारी बातें बताते हैं।"

        मुझे लगा मौजूदा शिक्षा मंत्री मेरे पड़ौसी से प्रभावित होकर सारे देश को अच्छे संस्कार देने की कोशिश कर रही हैं।

           " लेकिन बेटा अगर परीक्षा में ये सवाल आया तो तुम क्या लिखोगे ?" मैंने फिर पूछा।

          " अंकल, वो तो पापाजी ने कहा है की जो टीचर ने बताया है वही लिख देना वरना ये अल्पबुद्धि टीचर नंबर नही देंगे। " लड़के ने जवाब दिया।

           " अच्छा बेटा ये बताओ की रॉकेट की खोज सबसे पहले कहाँ हुई थी ?" मैंने दूसरा सवाल पूछा।

           " हमारे यहां हुई थी महाभारत काल में। " बेटे की जगह बाप ने जवाब दिया।

    अब मेरी हिम्मत  जवाब दे चुकी थी।

         मैंने सीधा बाप से सवाल किया। " हमारे देश में विज्ञानं का क्या भविष्य है ?"

      " एकदम उज्ज्वल है हनुमान जी की कृपा से। " बाप ने पूरे इत्मीनान से जवाब दिया।

      मैंने उसे धमकाते हुए गुस्से से कहा," बच्चा स्कूल से कुछ पढ़ कर आता है और तुम दूसरा कुछ पढ़ा देते हो उसे घर पर। "

          " अब शास्त्रों में जो लिखा है वही पढाते है हम तो। स्कूल की किताबों का क्या है जी हर तीन साल में  बदल जाती है। शास्त्र थोड़ा ना बदलते हैं। " बाप पूरी तरह समझा हुआ था।

           "लेकिन शास्त्रों में तो ये भी लिखा है की धरती चपटी है गोल नही है और सूर्य उसके चारों तरफ चककर लगाता है। " मैंने कहा।

           " अब वो तो सबको दीखता है कोई माने या न माने। " उसने जवाब दिया।

         तभी उस लड़के का विज्ञानं का अध्यापक वहां से गुजरा। हमें और लड़के को देखकर रुक गया। बड़ी आत्मीयता से हमारे पास आया। थैले से निकाल कर प्रशाद हमे देता हुआ बोला," शहर के बड़े हनुमान मन्दिर गया था। बस किसी तरह स्कूल का रिजल्ट अच्छा आ जाए। "

           अब मुझे पूरा विश्वास हो गया की हमारे देश में विज्ञानं का भविष्य बहुत अच्छा है हनुमान जी की कृपा से। 

 

खबरी -- ऐसी शिक्षा का कोई मूल्य नही जो आपके विचारों को ऊपर नही उठा सके।

Saturday, June 20, 2015

हम आगे तो बढ़ रहे हैं भले ही पीछे की तरफ

 गप्पी -- मैं शिक्षा के क्षेत्र की बात कर रहा हूँ। इसमें बहुत तेजी से तरक्की हो रही है। जैसा सरकार चाहती थी वैसी ही हो रही है। हमारे प्रधानमन्त्री डिजिटल इंडिया की बात करते थे। अभी अभी जो AIPMT की परीक्षा रद्द की गयी है उसके बारे में कहा गया है की उसमे एक चिप के द्वारा जो परीक्षा देने वाले के अंडरवियर में लगाई गयी थी, के द्वारा नकल की जा रही थी। किसी ने फोन करके इसकी सूचना पुलिस को दे दी और पुलिस ने छापा मारकर इस स्कैंडल को पकड़ लिया। परन्तु इससे ये बात तो साबित होती ही है की हम डिजिटल इंडिया की तरफ बढ़ रहे हैं। 

                   दूसरी महत्वपूर्ण बात जो शिक्षा के क्षेत्र हो रही है वो सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयास हैं जो शिक्षा के क्षेत्र में बहुत ही दूरगामी भूमिका निभा सकते हैं। हम शिक्षा के क्षेत्र में हमारी 5000 साल पुरानी संस्कृति की तरफ बढ़ रहे हैं। इसकी शुरुआत तब हुई जब हमारे प्रधानमन्त्री ने एक बारहवीं पास सांसद को इस क्षेत्र का मंत्री बना दिया। उसको ये जिम्मेदारी दी गयी है की वो विश्वविद्यालयों के कुलपति और उपकुलपति नियुक्त करें। ऐसा करने से पहले वो उनकी योग्यता की जाँच जरूर करेंगी। लेकिन कोई कह रहा था की किसी कुँए की गहराई मापने लिए डंडे की लम्बाई कुँए से ज्यादा होनी चाहिए। खैर ये पुरानी और दकियानूसी बात है। उन्होंने इस क्षेत्र में काम भी करना शुरू कर दिया है। पूना फिल्म इंस्टिट्यूट में गजेन्द्र चौहान को चेयरमैन नियुक्त कर दिया गया है। उनकी कुल योग्यता ये है की वो पिछले बहुत सालों से भाजपा से जुड़े रहे हैं। इस पर वहां हड़ताल हो गयी। वहां के छात्र कह रहे हैं की जिस पद पर कभी गिरीश कर्नाड , श्याम बेनेगल , अडूर गोपालकृष्णन जैसे ख्याति प्राप्त लोग रहे हो वहां सरकार ऐसी नियुक्ति कैसे कर सकती है। सरकार का कहना है की उनका तीस साल का फिल्म इन्डस्ट्री का अनुभव है। अब लोगों को ये बात समझ नही आ रही की क्या तीस साल सब्जी की रेहड़ी लगाने से कोई व्यक्ति बागवानी अनुसंधान का निदेशक होने की योग्यता प्राप्त कर सकता है। उसके बाकी निदेशक भी इसी तरह की योग्यताओं के अनुसार नियुक्त किये गए हैं। 

                     इससे पहले इतिहास अनुसंधान से जुडी एक पत्रिका का निदेशक मण्डल भंग कर दिया गया, जिसमे रोमिला थापर जैसे अंतरराष्ट्रीय श्रेणी के लोग थे। बाकि संस्थाओं के लिए भी योग्य लोगों की तलाश चल रही है। 

                     मैं कल्पना करता हूँ की मान लीजिये किसी विज्ञानं एवं तकनीकी संस्थान के निदेशक के पद के लिए इन्टरव्यू चल रहा हो तो उसका दृश्य कैसा होगा। साक्षात्कार चल रहा है। सामने बैठे उम्मीदवार से प्रसन्न पूछा जाता है, " आपकी विज्ञानं के क्षेत्र की जानकारी को अपडेट करने के लिए आप क्या करते हैं ?"

             " मैं उसके लिए पिछले तीस साल से "कल्याण" पढ़ रहा हूँ। " उम्मीदवार जवाब देता है। 

 " आपके विचारों का श्रोत क्या है और आप विज्ञानं के इतिहास के बारें में क्या जानते हैं ?" दूसरा प्रश्न पूछा जाता है। 

              " मैं मानता हूँ की विज्ञानं का उदय और अन्त हमारे वेदों में ही है। जो तरक्की हमने अस्त्र-शस्त्रों के क्षेेत्र में महाभारत काल में कर ली थी उसके बाद हमे और कुछ करने की जरूरत नही है। जहां तक विचारों का सवाल है तो गुरु जी ने जो "बंच ऑफ़ थॉट्स " लिखा था मैं नही समझता की उससे बाहर विचारों  अस्तित्व है। "

उम्मीदवार ने जवाब दिया। 

              इन्टरव्यू कमेटी के सदस्यों के चेहरे पर सन्तोष के साथ मुस्कान उभरी। उन्होंने बाकि बचे लोगों को वापिस भेज दिया। उपयुक्त उम्मीदवार मिल चूका था। 

 

खबरी -- हे भगवान इस देश का भविष्य अब केवल तुम्हारे हाथों  में है, इसे अपने अनुयायिओं से बचाइये।