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Tuesday, October 25, 2016

मुल्ला नसीरूदीन और भारतीय राजनीति

           
                मुल्ला नसीरूदीन की एक पुरानी कहानी है जो आज के राजनैतिक हालात पर एकदम फिट बैठती है। बात इस तरह है की मुल्ला नसीरूदीन अपने पडौस के राज्य में व्यापार करने जाते थे। एक बार उस राज्य के राजा ने दूसरे राज्यों से आने वाले कुछ सामान पर प्रतिबन्ध लगा दिया। और उस प्रतिबन्ध को लागु करने के लिए बड़ी मात्रा में सैनिको को राज्य के दरवाजे पर तैनात कर दिया। सैनिक पूरी ईमानदारी और मेहनत से बाहर से आने वाले व्यापारियों की तलाशी लेते की कहीं कोई प्रतिबन्धित वस्तु तो लेकर नही जा रहा। उन्हें मुल्ला नसीरूदीन पर पूरा शक था इसलिए उसके साथ वो अतिरिक्त सतर्कता से पेश आते। मुल्ला नसीरूदीन हररोज अपने गधों पर घास के बड़े बड़े गटठर लाद कर आते। सैनिक उनके गटठर खोल कर पूरी सतर्कता से तलाशी लेते लेकिन उन्हें कुछ नही मिलता। इस तरह काफी समय बीत गया। इस दौरान व्यापार से मुल्ला नसीरूदीन ने काफी पैसा कमाया। सैनिक हैरान थे। वो अच्छी तरह तलाशी लेते थे लेकिन उसकी घास में उन्हें कभी कुछ नही मिला। वो सोच रहे थे की आखिर मुल्ला नसीरूदीन इतना पैसा कैसे बना रहे हैं।
                   एक दिन वहां के दरोगा ने मुल्ला नसीरूदीन को कोई भी कार्यवाही ना करने और उन्हें आने जाने की पूरी छूट देने का भरोसा दिलाते हुए उससे पूछा की वो घास के गटठर में क्या छुपा कर ले जाते हैं ?
                   मुल्ला ने हंसते हुए बताया की वो घास का नही बल्कि गधों का व्यापार करते हैं। सैनिक घास की तलाशी में लगे रहते हैं और वो हररोज अपने साथ लाये गए गधे बेच कर वापिस आ जाता है।
                      यही हाल हमारी राजनीति का हो गया है। पूंजीपति वर्ग अपने गधे बेच रहा है और हम घास की तलाशी में लगे हुए हैं। सरकार ने सरकारी कम्पनियां बेच दी, किसानों और आदिवासियों की जमीने पूजीपतियों को थमा दी, रक्षा सौदों में दलाली को क़ानूनी कर दिया, बैंको का पैसा धन्ना सेठों को देकर माफ़ कर दिया और हम बीफ पर, तीन तलाक पर, सर्जिकल स्ट्राइक पर, समान सिविल कोड पर और राम मन्दिर पर बहस कर रहे हैं। हमे ये दिखाई ही नही देता की इन सब की आड़ में पूंजीपति वर्ग अपने गधे बेच रहा है और आराम से है।

Thursday, June 23, 2016

Vyang -- Ease of doing Business और भारत की बढ़ती रैंकिंग

                    वैसे तो भारत की रैंकिंग बहुत सी चीजों में बढ़ रही है जैसे सबसे ज्यादा भूखों में, कुपोषितों में, अंधों में ( दोनों तरह के अंधों में, आँख के भी और अक्ल के भी ) , अनपढ़ों में इत्यादि इत्यादि। लेकिन इन पर बात करना कोई पसंद नहीं करता। सरकार तो बिलकुल नहीं करती। लेकिन एक रैंकिंग ऐसी है जिस पर रोज बयान आते हैं, टीवी चैनलों में कार्यक्रम होते हैं और एक दूसरे की पीठ थपथपाई जाती है वो  Ease of  doing Business  की रैंकिंग। इसका मतलब होता है की अब भारत में व्यापार करना आसान हो गया है।
                   जब हम किसी चीज के आसान होने की बात करते हैं तो उसका मतलब ये होता है की अब उसके नियम कायदे या तो आसान हो गए हैं या फिर हटा लिए गए हैं। भारत में कई चीजें पहले भी आसान रही हैं। जैसे राजनीती करना। इस पर कोई नियम कायदा लागु नहीं होता है। आप किसी भी तरह राजनीती कर सकते हैं। जिन चीजों पर राजनीती करना संविधान के अनुसार नहीं है आप उन पर भी राजनीती कर सकते हैं। आप जाति के नाम पर, धर्म के नाम पर, इलाके के नाम पर और परिवार के नाम पर भी राजनीती कर सकते हैं। आप वोट खरीद सकते हैं, लूट सकते हैं, डालने देने से मना कर सकते हैं। आप किसी भी तरह  की राजनीती कर सकते हैं। आप चाहें तो दंगे करवा कर वोट ले सकते हैं और आप चाहें तो सरकारी खर्चे पर लैपटॉप बाँट कर भी वोट ले सकते हैं। यानि हमारे देश में Ease of doing Politics पहले से है।
                  लेकिन लोगों का मानना है की  Ease of  doing Business भी बहुत पहले से है। भारत में व्यापार करने में किस चीज की मुस्किल है? यहां तो बहुत पहले से सारी सुविधाएँ मौजूद हैं। आप कोई फैकट्री चलाते हैं तो आपके लिए कतई जरूरी नहीं है की आप मजदूरों के नाम रजिस्टर में लिखें। आप उनको न्यूनतम मजदूरी दें ऐसा भी कोई कानून ( प्रभावशाली ) नहीं हैं। काम के घंटे भी तय नहीं हैं। आप टैक्स देते हैं या नहीं देते हैं ये भी आपकी मर्जी पर छोड़ा हुआ है। आप बैंकों से कर्ज लेकर वापिस करना चाहें तो आपकी मर्जी वर्ना आप को इसके लिए संवैधानिक सुरक्षा हासिल है। लोग पूछ रहे हैं की आखिर वो कौनसी सुविधा थी जो पहले हासिल नहीं थी और अब दे दी गई है। यहां तो आप बोर्ड आश्रम का लगा सकते हैं और नूडल्स बेच सकते हैं।
                 मुझे तो लगता है की इसके लिए या तो रैंकिंग अब शुरू की गई है या फिर वर्ल्ड बैंक ने हमारे देश पर ध्यान ही नहीं दिया था। सबसे पहले जब ललित मोदी सैंकड़ों करोड़ लेकर यहां से निकल गए तो वर्ल्ड बैंक ने हमारी रैंकिग बढ़ाई। जब विजय माल्या हजारों करोड़ लेकर निकल गए तो हमारी रैंकिंग में तेजी से सुधार हुआ। अब जब भी कोई ऐसी खबर आती है तो हमारी रैंकिंग सुधर जाती है। इसके लिए सरकार ललित मोदी और विजय माल्या  की शुक्रगुजार है।
                    लेकिन कुछ और काम भी हैं जिन्हे करने में बहुत मुश्किलें आ रही हैं। सरकार से गुजारिश है की इन चीजों के लिए भी कुछ कर दे। हमारे देश में खेती करना आसान नहीं है, मजदूरी करना आसान नहीं है, पढ़ना आसान नहीं है, नौकरी मिलना और करना आसान नहीं है, इलाज करवाना आसान नहीं है और सम्मान से जीना तो लगभग असम्भव सा ही है। मैंने कुछ चीजें बताई हैं वर्ना तो अब कुछ कहना भी आसान नही है।

Tuesday, April 5, 2016

रामदेव, योग, व्यापार और राजनीती

खबरी -- रामदेव के सर काटने वाले बयान का क्या महत्त्व है ?

गप्पी -- रामदेव के होंसले से तो पूरा देश वाकिफ है सो उस पर तो कुछ कहने की जरूरत नहीं है। लेकिन योग के बारे में अब तक रामदेव  कुछ दूसरे लोग अब तक जो कहते रहे हैं जैसे योग से मानसिक संतुलन ठीक रहता है, गुस्से पर काबू रहता है और मनुष्य प्रकृति के नजदीक रहता है, वो सारी बातें हवा हो गई। रामदेव का बयान एक टुच्चे किस्म के गुंडे और घटिया किस्म के राजनितिक चमचे के ज्यादा नजदीक है।

Sunday, December 13, 2015

Opinion -- राष्ट्र प्रेम V/s राष्ट्रवाद

राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर ने कहा है की राष्ट्रीयता और युद्ध एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं। राष्ट्रीयता से उनका मतलब राष्ट्रवाद है। अति राष्ट्रवाद अमानवीय और खतरनाक होता है। यही राष्ट्रवाद दो देशों के बीच युद्ध की स्थिति पैदा करता है। यही राष्ट्रवाद एक ही देश के दो समुदायों के बीच संघर्ष और दुश्मनी भी पैदा करता है। एक बात जो सबसे महत्त्वपूर्ण है वो ये की ये राष्ट्रवाद किसी भी देश के लोगों का किसी भी रूप में भला नही करता। राष्ट्रवाद कभी भी राष्ट्रप्रेम नही होता बल्कि एक सीमा के बाद तो ये दोनों एक दूसरे के विरोधी होते हैं।
                  जो लोग दिमागी रूप से इस राष्ट्रवाद के शिकार होते हैं वो अनजाने में ही देश को नुकशान पहुंचाते रहते हैं।
              मशहूर लेखक चार्ल्स द गाल ने भी कहा है की, " अगर किसी के मन में अपने लोगों के प्रति प्रेम होता है तो ये राष्ट्र प्रेम होता है और अपने लोगों को छोड़कर बाकि लोगों के प्रति नफरत होती है तो ये राष्ट्रवाद होता है। "
               एक और मशहूर लेखक जार्ज ऑरवेल ने भी लिखा है की, " देश भक्ति और राष्ट्रवाद एक दूसरे के विरोधी चीजें हैं। देश भक्ति का मतलब किसी स्थान विशेष और जीवन शैली को सर्वश्रेष्ठ समझने वाली भावना होती है लेकिन इस भावना का व्यक्ति अपनी भावना किसी पर थोपता नही है, जबकि राष्ट्रवाद की भावना रखने वाला आदमी दूसरों पर अपने विचारों को थोपता है और चाहता है की इसे ही बाकि लोग स्वीकार करें। "
                 अगर मामला दो देशों के बीच का होता है तो एक देशभक्त दूसरे देशों और स्थानो के देशभक्तों का सम्मान करता है लेकिन  राष्ट्रवादी उनके प्रति नफरत का भाव रखता है। जब ये राष्ट्रवाद उग्र रूप धारण करता है तो युद्ध को जन्म देता है।
                  इसमें सबसे दिलचस्प बात ये होती है की खुद को राष्ट्रवादी समझने वाला व्यक्ति अपने ही देश के कानूनों का सम्मान नही करता। वह करों और भुगतानों से संंबंधित कानूनो का उलंघन करता है। टैक्सों की चोरी को अपना अधिकार समझता है और इन्हे राष्ट्रवाद की परिभाषा से बाहर समझता है। वो सभी तरह के गैरकानूनी काम करते हुए भी अपने आप को राष्ट्रवादी समझता रह सकता है। जबकि एक देशभक्त देश के कानूनों का सम्मान करता है और किसी भी ऐसे काम से बचता है जिससे देश को नुकसान हो सकता हो।
                  किसी भी देश की सरकार और उसमे रहने वाले अलग अलग समूहों के बीच नीतियों और कार्यक्रमों को लेकर मतभेद हो सकते हैं। किसी भी देश के लोग बहुत बार अपनी ही देश की सरकार के खिलाफ आंदोलन करते हैं। सरकार और जनता की समझ में बड़ा फर्क हो सकता है। जैसे हमारे ही देश में कई मामलों पर सरकार और लोगों के बीच मतभेद हैं। आदिवासियों के इलाकों में बड़े उद्योगों और खदानों को लेकर सरकार और लोगों के बीच मतभेद हैं। कई जगहों पर ये मतभेद टकराव का रूप भी ले लेते हैं। सरकार इन मतभेदों को कुचलने के लिए दमन का सहारा लेती है। विरोध करने वाले समूहों पर देश विरोधी गतिविधियों का आरोप लगाती है। लेकिन इसका ये मतलब कतई नही होता की ये जन समूह असल में देश विरोधी हैं। भूमि के सवाल पर किसानो और सरकार के बीच संघर्ष होता है। सरकार किसानो पर देश का विकास रोकने का आरोप लगाती है तो इसका ये मतलब भी कतई नही होता की ये किसान विकास विरोधी हैं। लेकिन एक राष्ट्रवादी बिना सोचे विचारे वही भाषा बोलता है जो सरकार बोलती है। और वो इन सब लोगों को देश द्रोही मानता है।
                    सबसे हास्यास्पद स्थिति तो तब पैदा होती है जब सरकार अपनी नीति पर पलटी मारती है। तब बेचारे इन राष्ट्रवादियों को भी पलटी मारनी पड़ती है।
                  इसलिए राष्ट्रवाद और देशभक्ति को एक ही चीज समझने की भूल नही करनी चाहिए।
                  

Saturday, October 10, 2015

Vyang -- गाय को राष्ट्रिय पशु घोषित करने के बाद के काम

बीजेपी और आरएसएस ने गाय को राष्ट्रिय पशु घोषित करने की मांग की है। वैसे तो इस मांग में ही इस समस्या का हल है। आरएसएस और बीजेपी अगर ये मान लेती हैं की गाय एक पशु है, फिर तो कोई समस्या ही नही बचती। समस्या तब खड़ी होती है जब वो इसे पशु मानने की बजाय माता कहने लगते हैं। समस्या ये है की बहुत से लोग गाय को माता नही मानते। ये उनका अधिकार है। आप किसी के सोचने के तरीके पर कोई पाबंदी तो लगा नही सकते। ठीक उसी तरह जो लोग गाय को माता मानते हैं उनका भी ये अधिकार है आप उन पर भी पाबंदी नही लगा सकते। अगर कोई आदमी गाय को माता मानता है, और गाय ही क्यों , वो किसी भी जानवर को माता मानता है तो उसे इसका अधिकार है आप उसे रोक नही सकते। रोक तो आप उसे भी नही सकते जो सगी माता को माता नही मानते हैं। इनमे से बहुत से ऐसे भी हैं जो सगी माँ को माँ नही मानते लेकिन गाय को माता मानते हैं। उसका एक बड़ा कारण ये है की गाय एक सुविधा युक्त माता है। उस पर ये आग्रह नही होता की आप इस माता को अपने साथ रखें। आप पड़ोसी की गाय को भी माता मान सकते हैं और माता मानने  के बाद आप पर कोई नैतिक या भौतिक जिम्मेदारी नही आती। जिन लोगों ने कभी अपनी सगी माता को माता नही माना, गाय को माता मानने से उनका अपराध बोध कुछ कम हो सकता है। अब ऐसी हालत में गाय को राष्ट्रिय पशु घोषित करने की मांग हो रही है। मैंने इस पर विचार करने की कोशिश की है की अगर गाय को राष्ट्रिय पशु घोषित कर दिया जाता है तो उसके बाद और क्या क्या करना पड़ेगा।
                   जो लोग गाय पालते हैं वो उसे दूध के लिए पालते हैं। उससे बैल भी मिलते हैं लेकिन अब इस दौर में बैलों की जरूरत कम हो गयी है। गाय हर रोज बीस से पच्चीस किलो चारा खाती है। इसलिए जो लोग गाय को दूध के लिए पालते हैं वो ये देखते हैं की कहीं चारे की कीमत दूध की कीमत से ज्यादा  ना हो जाये। इसलिए जब गाय बूढी होकर दूध देना बंद कर देती है तब किसान उसे बेच देते हैं। अब जब काम के लायक ना रहने के कारण कुछ लोग अपने सगे माँ या बाप को भी साथ रखने को तैयार नही हैं, और ये एक बड़ी सामाजिक समस्या के रूप में हमारे सामने है, और हम इसका कोई पुख्ता हल नही निकाल पाये हैं उस हालात में सरकार किसानो को इस बात के लिए मजबूर तो नही कर सकती की वो बेकार हो चुके गाय या बैल को अपने घर में रखे। उस हालत में सरकार को ये काम करने पड़ेंगे।
                 १. सरकार को गाय की पहचान के लिए एक आधार कार्ड की स्कीम बनानी होगी ताकि ये पहचान हो सके की ये गाय किसकी है।
                  २. जिस तरह बूढ़े लोगों को राहत देने के लिए सरकार बुढ़ापा पेंशन देती है, उसी तरह उसे बूढ़े और नाकारा हो चुके गाय और बैलों के लिए भी बुढ़ापा पेंशन देनी होगी ताकि उनके चारे का खर्चा निकल सके।
                  ३. बहुत से किसान ऐसे भी हैं जिनके पास दो पशुओं को रखने की जगह ही नही होती है इसलिए सरकार को उनके लिए लाखों की तादाद में गौशालाएं और बैलो के लिए ओल्ड एज होम बनाने पड़ेंगे। जाहिर है की ये काम कोई PPP मॉडल से तो हो नही सकता, इसलिए सरकार को इसके लिए अपने बजट में प्रावधान करना होगा। और इनकी संख्या को देखते हुए हमारे पुरे बजट में ये अकेला काम भी हो सकेगा या नही इसमें शक है , वरना इसके लिए वर्ल्ड बैंक से लोन लेना होगा।
                  ४. इस कानून के पालन के लिए विशेष निगरानी दस्तों की स्थापना करनी पड़ेगी और कुछ विशेष अदालतों का गठन भी करना पड़ेगा।
                 अगर सरकार ये सब काम कर सकती हो तो उसे गाय को राष्ट्रिय पशु घोषित करने की सोचनी चाहिए, वरना जो लोग आरएसएस की शाखाओं में बैठकर और सुबह एक रोटी गाय को खिलाकर अपना कर्तव्य पूरा समझ लेते हैं उन्हें कहा जाये की वो एक एक गाय पालकर दिखाएँ।
                   इसका दूसरा हल ये है की जो भी लोग भगवा कपड़े पहन कर समाज पर बोझ बने हुए हैं उनके लिए दो-चार गाय पालना अनिवार्य कर दिया जाये।     

Vyang -- बिजनेस, नैतिकता और राजनीती

जैसा की हमने पहले बताया था की हमारे मुहल्ले में एक करियाने के दुकानदार हैं और जो अपने आप को बीजेपी के अघोषित प्रवक्ता बताते हैं। हम कई बार उनकी राय जानने की कोशिश करते हैं। और वो बड़े धड़ल्ले से दुनिया के सभी मामलों पर अपना मत देते हैं। अब बिहार चुनाव पर कुछ घटनाएँ जो पिछले दिनों घटी, हमने उन पर उनकी राय जानने की कोशिश की।
          दुआ सलाम के बाद हमने उससे पूछा , " भाई साब ये खबर आई है की आपके तेज तर्रार हिंदूवादी नेता संगीत सोम उत्तर प्रदेश की मशहूर अल-दुआ नाम की बीफ सप्लाई करने वाली कम्पनी के हिस्सेदार रहे हैं, इस पर आपका क्या कहना है। "
            उन्होंने एक दम शान्ति से जवाब दिया ," देखिये लोगों को और खासकर विपक्षी पार्टियों को बिजनेस पर राजनीती नही करनी चाहिए। किसी कम्पनी में हिस्सेदारी  अपना निजी मामला है। किसी के निजी मामलों में दखल देना अच्छी बात नही है। "
            हमे इस जवाब की उम्मीद नही थी। सो कुछ देर हम सदमे की स्थिति में रहे। फिर अपने आप को संभाल कर बोले , " लेकिन अखलाक का परिवार क्या खाता है ये उसका निजी मामला नही था ? और व्यापार में अपनाये जाने वाले तरीके कब से निजी मामला हो गए ?"
              उसने फिर शान्ति से जवाब दिया, " व्यापार में केवल ये पूछा जाना चाहिए की क्या उसके पास लाइसेंस है या नही, अगर है तो बात खत्म हो जानी चाहिए। जहाँ तक अख़लाक़ की बात है वो एक हिन्दू देश में क्या खाता है ये उसका निजी मामला नही है। उसे क्या खाना चाहिए ये हम बताएंगे। इन दोनों मामलों को आपस में मिलाओ मत। अख़लाक़ का बीफ खाना गंभीर मामला है और लाइसेंस लेकर बीफ का निर्यात करना कानून के अनुसार सही है। "
              हमे समझ नही आ रहा था की हम उसके साथ बहस कैसे करें। हमने कहा , " अभी अख़बार में एक लेख आया है की विश्व हिन्दू परिषद के पूर्व अध्यक्ष विष्णु हरी डालमिया का परिवार दूसरे विश्व युद्ध के समय अंग्रेज सेना को गौ-मांस सप्लाई करता था। ऐसे परिवार के सदष्य को विश्व हिन्दू परिषद का अध्यक्ष कैसे बना दिया ?"
               उसने हमे ऐसे देखा जैसे हम पागल हो गए हों। फिर बोला, " आपने फिर बिजनेस की बात की। मैं आपको पहले ही बता चूका हूँ की बिजनेस के मामलों में राजनीती नही करनी चाहिए। और आपने ये ध्यान दिया की डालमिया परिवार ने हिन्दू धर्म की कितनी सेवा की। उन्होंने सारा गौ-मांस अंग्रेजों को खिला दिया और अपने देश के लोगों को धर्म भृष्ट होने से  बचा लिया। मैं फिर आपको कहता हूँ की बिजनेस को राजनीती या नैतिकता से मत जोड़ो। बिजनेस और नैतिकता दोनों विरोधी चीजें हैं। इस तरह तो आप ये पूछोगे की कोई बिजनेसमैन राजनेता पूरा टैक्स देता है या नही। अब टैक्स का राजनीती से क्या लेना देना है ?"
                 " आपका मतलब ये है की कोई आदमी कानून के अनुसार टैक्स ना देकर भी अच्छा राजनेता हो सकता है ? " हमने पूछा।
                 उसने फिर शान्ति से जवाब दिया, " हो सकता है का क्या मतलब है ? होते ही हैं। रोज इनकम टैक्स की रेड होती हैं, लोगों के पास काला धन मिलता है तो कोई पार्टी उसको पार्टी से निकालती है क्या ? बिजनेस, नैतिकता और राजनीती ये अलग अलग चीजें हैं। जब तक तुम इस बात को ठीक से नही समझोगे तब तक राजनीती को नही समझ सकते। "
                "  आपके हिसाब से ये जितने अपराधी आपकी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं उसमे कोई बुराई नही है। " हमने पूछा।
                " उनके आपराधिक मामलों पर कानून अपना काम करेगा और कर रहा है। उन पर कानून के अनुसार चुनाव लड़ने पर कोई रोक तो है नही। फिर उनके चुनाव लड़ने पर सवाल क्यों उठा रहे हो ?" उसने एतराज किया।
                  " आपकी पार्टी पर ये आरोप है की आपने अपनी सरकार होने का फायदा उठाकर अमित शाह के मामले में सुप्रीम कोर्ट में अपील नही की, जिससे वो बच गए। " हमने कहा।
                     वो फिर हमारी नासमझी पर थोड़ा सा मुस्कुराया फिर बोला , " क्या किसी मुसीबत में फंसे भारतीय की मदद करना अपराध है। हमने तो मानवीय कारणों से ललित मोदी तक की मदद की थी। फिर वही कानून का सवाल आता है। कानून में कहां लिखा है की हर मामले की सुप्रीम कोर्ट में अपील की जाएगी। देश की अदालतों पर वैसे ही मुकदमों की संख्या का बहुत भार है जिससे लोगों को न्याय मिलने में देरी हो रही है , हम चाहते हैं की अदालतें दूसरे मामलों पर ध्यान दें ताकि लोगों को जल्दी न्याय मिल सके। क्या लोगों को जल्दी न्याय मिले आपको इस पर एतराज है। " फिर उसने रास्ते पर जाते हुए दो-तीन लोगों को रोक कर ऊँची आवाज में पूछा , " क्यों भाइयो, देश के लोगों को जल्दी न्याय मिलना चाहिए की नही ?" जाने वाले लोगों ने कहा की जरूर मिलना चाहिए।
                        फिर उसने हमारी तरफ देख कर कहा, " देखो जनता भी अमित शाह के मामले में अपील न करने का समर्थन करती है। "
                 सचमुच हमारी समझ में कुछ नही आया और हम बेवकूफों की तरह आगे चले गए।

Friday, October 9, 2015

प्रधानमंत्री जी का भाषण और मुद्दे

एक भक्त -- प्रधानमंत्री जी आज खूब बोले।
आम आदमी -- किस पर, महंगाई पर ?
भक्त -- नही लेकिन……।
आदमी -- तो भृष्टाचार पर ?
भक्त -- नही वो मेरा मतलब।।।।।।।।।।।।।।।।।।
आदमी -- तो फिर काले धन पर बोले होंगे ?
भक्त --     वो बिहार में -------
आदमी -- ओह, तो युवाओं के रोजगार पर बोले होंगे ?
भक्त --    नही लेकिन  वो --------- .
आदमी --  तो क्या देश में सूखे के हालत पर बोले ?
भक्त  --   उस पर नही , वो तो -------
आदमी --  तो क्या किसानो की आत्महत्याओं पर बोले ?
भक्त  --  नही यार -------
आदमी -- तो फिर किस पर बोले ?
भक्त  --   वो बीफ पर।
 आदमी --   बीफ पर क्या बोले ?
भक्त   --   बोले, मेरा मतलब है उन्होंने कहा की बीफ नही खाना चाहिए , मेरा मतलब है हिन्दुओं को नही खाना चाहिए , उनका मतलब था यदुवंशियों को नही खाना चाहिए  और पुरे देश में किसी को नही खाना चाहिए लेकिन गोवा में चलेगा और जम्मू कश्मीर में जो सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया है उसका स्वागत करते हैं लेकिन किसी विधायक को नही खाना चाहिए और की ये की मतलब है बीफ का निर्यात किया जा सकता है लेकिन गायों को नही मारना चाहिए , लेकिन सरकार बीफ निर्यात पर सब्सिडी देगी वो सही है लेकिन बकरीद पर बकरों को नही मारना चाहिए और की बकरीद के बिना बकरे मारे जा सकते हैं और की सरकार चाहती है की सब मिलजुल कर रहें और कहीं दंगा या हत्या होती है तो उसे भूलकर आगे बढ़ना चाहिए और की ---पता नही।

Sunday, October 4, 2015

दंगों के मामले में न्याय को अंतिम अंजाम तक पहुँचाओ

दंगों के मामले में कुछ चीजें बहुत साफ हैं और बार बार यही चीजें दंगों का कारण बनती हैं। इसलिए जब तक इन चीजों को नही रोका जायेगा, दंगों को रोकना  नामुमकिन है। लोगों की समझ में परिवर्तन लाने में समय लगेगा और फिर भी लोग उन्हें प्रभावित करने के लिए नए तरीके निकालते रहेंगे। इसलिए ये कुछ चीजें हैं जो दंगों पर रोक लगा सकती हैं। और इन्हे किया जाना चाहिए। किसी भी सभ्य समाज का आधार उस समाज में स्थापित कानून के राज का स्तर ही हो सकता है।

१.  दंगों के बारे में ये बात बार बार सामने आई है की वो प्रायोजित होते हैं। कोई ना कोई होता है जो दंगे को प्रायोजित करता है। इनमे मुख्य रूप से राजनीतिज्ञ होते हैं या फिर राजनीती से जुड़े दूसरे संगठन होते हैं। कुछ अपने आप को धार्मिक कहने वाले संगठन भी ये काम करते हैं लेकिन इन संगठनो को भी किसी ना किसी राजनितिक संगठन का समर्थन प्राप्त होता है। इसलिए ये जरूरी है की दंगों की जाँच करते समय उन संगठनो को ना केवल बेनकाब किया जाये, बल्कि जिम्मेदार लोगों पर मुकदमे बना कर उन्हें सजा दिलाई जाये। अब तक ये लोग जाँच के दायरे से बाहर रहते हैं और अगले दंगे की तैयारी करते रहते हैं।

२. दंगों में हिस्सा लेने वाले लोगों में एक समझ ये बनी हुई है की भीड़ का कुछ नही बिगड़ता। भीड़ में किस किस पर केस बनेगा और बनेगा तो साबित नही होगा। इस विचार से प्रभावित लोगों को दंगों के लिए आसानी से इस्तेमाल किया जाता है। गुजरात दंगों के बाद कुछ मानवाधिकार संगठनो और कार्यकर्ताओं, वकीलों और उच्चतम न्यायालय के सक्रिय हस्तक्षेप के बाद कई केसों में भाग लेने वाले लोगों को सजा हुई। जिसके बाद बहुत से लोगों के मन से ये बात निकल गयी। जब तक दंगों में भाग लेने वाले ज्यादातर लोगों को अदालत के सामने लाकर सजा नही दिलवाई जाएगी तब तक दंगों को रोकना मुश्किल है। एक बार ये संदेश चला जाये की दंगों में भाग लेने वाले को सजा होगी तो दंगे करने वाले संगठनो को लोग मिलने मुश्किल हो जायेंगे।

३. दंगों में शामिल लोगों को सजा से बचाने में हमारे देश की पुलिस का एक हिस्सा, जिसमे खुद साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह होते हैं वो महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उसके साथ ही अगर किसी राज्य में उन्ही लोगों की सरकार है जिन पर दंगों के आरोप हैं तब सरकार में बैठे लोगों का दबाव भी जाँच को किसी निष्कर्ष तक नही पहुचने देता। गुजरात दंगों के मामले में यही चीज थी। सरकार नही चाहती थी की दंगों में भाग लेने वाले लोगों को सजा हो। इसलिए ये भी जरूरी है की उन लोगों को भी सजा दिलवाई जाये जो जाँच को प्रभावित कर रहे थे। उन पुलिस अधिकारीयों को भी सजा दिलवाई जाये जिन्होंने जाँच को जानबूझकर किसी निर्णय तक नही पहुंचने दिया। जब तक इन लोगों को सजा नही मिलेगी दंगों के लिए सामग्री उपलब्ध रहेगी।

४. दंगों का हर मामला विशेष अदालतों में रोजाना सुनवाई के आधार पर चलाया जाये। जितना जल्दी दंगों के मामलों में फैसला होगा उतना ही इसका प्रभाव समाज पर पड़ेगा। जो लोग दंगे करवाकर चुनाव जीत लेते हैं उन्हें इसका फायदा नही उठाने दिया जाये। जिन लोगों पर दंगों के मामले में केस चल रहे हैं वो यदि किसी दूसरी जगह जाकर जहरीला भाषण देते हैं तो उनकी जमानत तुरंत रद्द की जाये और फैसला होने तक उन्हें जेल में रखा जाये। कानून द्वारा दिए गए नागरिक अधिकारों के दुरूपयोग की इजाजत नही दी जानी चाहिए।

            एक बार दंगों की जाँच और न्याय को अपने अंतिम अंजाम तक पहुचने दो, उसके बाद दंगों के लिए लोग मिलने मुस्किल हो जायेंगे। लोगों का विश्वास न्यायिक मशीनरी पर बढ़ेगा और दंगों में बड़े पैमाने पर कमी आएगी।

Wednesday, September 30, 2015

The meet ban politics creating polarization

This is in the line what BJP want. When the people of this country realize this. A report on this publish in The Hindu by Samita Gupta. She said, "The murder of Mohammad Akhlaq in Dadri, on the edge of the national capital, by a violent Hindu mob on Wednesday should come as no surprise to those who have been closely following the ground level politics in western Uttar Pradesh and the meat/beef bans imposed by BJP-ruled States during the recent Jain festival of Paryushan."
Read the full story at --http://www.thehindu.com/news/national/politics-of-meat-ban-creating-polarisation/article7708079.ece?homepage=true

राजनीती और धरम के समाचारों पर एक टिप्पणी

खबरी -- केजरीवाल द्वारा बुलाये गए मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश हिस्सा नही लेंगे। 

गप्पी -- लेकिन ये तो कहा ही गया था की सम्मेलन गैर बीजेपी मुख्यमंत्रियों का है।

खबरी -- साध्वी प्राची ने मांग की है की हिन्दुओं के धार्मिक स्थलों में मुस्लिमों के प्रवेश पर पाबंदी लगाई जाये। 

गप्पी -- जबकि जरूरत तो इस बात की है भगवा कपड़ों की आड़ में राजनीती से जुड़े और समाज में नफरत फ़ैलाने वाले लोगों के सभी धरमो के स्थलों में प्रवेश पर पाबंदी लगाई जाये। धार्मिक स्थलों में आदमी आदमी के बीच भेदभाव तो धर्म की असली भावना के ही खिलाफ है। गुरु नानक देव जी ने कहा है,
                 " अव्वल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत दे सब बन्दे। 
                   एक नूर ते सब जग उपजया, कौन भले कौन मन्दे। "

Monday, September 14, 2015

साधना( Spiritual practice) और तपस्या का संबंध तो केवल " स्वयं " " Self " से होता है।

जैन धर्म के साधना पर्व पर्युषण पर पुरे देश में एक अप्रिय विवाद खड़ा हो गया है। ये विवाद एक राजनैतिक पार्टी बीजेपी द्वारा अपने क्षुद्र हितों को साधने के लिए इसे विवाद में घसीटे जाने के चलते हुआ है। जैन समुदाय देश का एक छोटा और समृद्ध समुदाय है। हर साल इस पर्व के दौरान महाराष्ट्र में बूचड़खानों पर दो दिन की बंदी रहती थी। हालाँकि व्यापर और खानपान नागरिक अधिकारों का मसला है, उसके बावजूद राज्य के लोग जैन समुदाय की भावनाओं का आदर करते हुए ये बंदी रखते थे। इस बार बीजेपी ने कमिश्नर से मिलकर इसको बढ़ाकर चार दिन और मुंबई के एक  इलाके में आठ दिन कर दिया। जिस पर विवाद शुरू हो गया। इस विवाद में कई भड़काने वाली बातें कहि गयी और आखिर मुंबई उच्च न्यायालय ने इसे बिलकुल समाप्त करने का फैसला सुना दिया।
               सवाल ये उठता है की क्या बीजेपी ने एक छोटे समुदाय को बेवजह विवाद में नही घसीट दिया। इससे साथ में रहने वाले समुदायों के बीच में बिना वजह की कड़वाहट पैदा हुई। उसके इस काम में बीजेपी से संबंध रखने वाले जैन समुदाय के कुछ लोगों और मीडिया में नजर आने की लालसा रखने वाले कुछ साधुओं ने भी भूमिका निभाई। और आखिर में हुआ क्या, चौबे जी गए थे छब्बे जी बनने, दुबे जी होकर आ गए। लेकिन इस विवाद का असर दूरगामी रहेगा।
                दूसरा सवाल ये उठता है की साधना और तपस्या तो नितांत व्यक्तिगत मामला होता है। दूसरा कोई क्या करता है इसका कोई संबंध उससे नही होता। अलग अलग धर्मों को मानने वाले लोग इसके लिए अलग अलग तरीके अपनाते हैं। हर धर्म और मनुस्य का अपना तरीका होता है और कोई भी किसी द्वारा अपनाये गए तरीके को गलत नही ठहरा सकता। कबीर जी ( Kabir ) ने इस पर एकदम साफ बात कहि है।
               कबीरा तेरी झोंपड़ी गल कटियन के पास ,
               जिसकी करनी वे भरे, तू क्यूँ भया उदास।
         जैन धर्म के तीर्थंकरों ने भी इसके बारे में  साफ साफ कहा है। जैन धर्म जिस दर्शन में विश्वास करता है वो अनेकान्त दर्शन है। उसमे तो दुनिया के सारे विवादों पर मिटटी डालने की कोशिश की गयी है। उसमे कहा गया है की, " सत्य का कोई एक रूप नही हो सकता। जो मनुष्य जहां खड़ा होता है उसे वैसा ही सत्य दिखाई पड़ता है। इसलिए केवल अपने सत्य को मनवाने का आग्रह हिंसा है और असत्य है। " ये पूरी दुनिया के विवादों को खत्म करने का नुस्खा है लेकिन आज खुद उसके कुछ अनुयायी ही इसको भूल गए हैं।
                ऐसा केवल जैन धर्म में हो ऐसा नही है। सभी धर्मो में अपनी बातों को दूसरों से जबरदस्ती मनवाने की कोशिश हो रही है। धर्म में कहि गयी बातों की गलत व्याख्याएं की जा रही हैं। दूसरे धर्मो के लोगों को अधर्मी ठहराया जा रहा है। बड़े बड़े समारोह करके दूसरे धर्मो के विरुद्ध एलान किये जा रहे हैं। अपने नाम के आगे संत लगाने वाले जाने कितने लोग दूसरे धर्म पर विष वमन करते हैं,  और दंगों की भाषा बोलते हैं। धर्म के नाम पर राजनैतिक पार्टियां बन रही हैं, संगठन बन रहे हैं और लोगों को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा किया जा रहा है।
                     इस्लाम के नाम पर बना ISIS तो बाकायदा इसके लिए युद्ध कर रहा है। और उसका ये युद्ध इस्लाम को मानने वाले लोगों के ही खिलाफ है। धर्म के नाम पर इसने रमजान  जैसे पवित्र महीने में छोटे छोटे बच्चों को इसलिए फांसी लगा दी की उन्होंने खाना खा लिया था। अगर ये धर्म है तो किसके लिए है। ये ना तो लोगों के लिए हो सकता है और ना ईश्वर के लिए हो सकता है।
                      इसलिए धर्म में बढ़ते वैरभाव और उसके राजनीती में घालमेल को रोकना आज और ज्यादा जरूरी हो गया है। मानवता की रक्षा करनी है तो धर्म के नाम पर राजनीती और अपनी बात को सही ठहराने की मंशा को रोकना ही होगा।