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Saturday, March 26, 2016

व्यंग ख़बरें -- ये क्या हो रहा है भक्तो।

                कल मुझे एक मित्र ने बताया की ललित मोदी का असली नाम लतीफ़ मोदी है और वो एक बांग्लादेशी मुस्लिम है। और विजय माल्या का असली नाम विजय मुल्ला है और वो एक अरबी मुस्लिम है। ये सारा षड्यंत्र एक हिन्दू राष्ट्र को बर्बाद करने के लिए मुस्लिम राष्ट्रों की तरफ से रचा गया है।
                 अनुपम खेर ने JNU में कहा की जेल से लोटा हुआ आदमी हीरो कैसे हो सकता है और उसे सम्मानित नहीं किया जाना चाहिए। बीजेपी ने उनके इस बयान का इतना बुरा माना की कल एक जेल से लोटे हुए आदमी ( अमित शाह ) ने दूसरे जेल से लोटे हुए आदमी ( श्रीसंत ) को केरल की राजधानी से बीजेपी का उम्मीदवार घोषित कर दिया।
                 उत्तराखंड में कांग्रेस के बागी विधायकों को बीजेपी ने ये भरोसा दिलाया की वहां की कांग्रेस सरकार को बदल दिया जायेगा। अगर किसी कारण सरकार नहीं बदल पाए तो राजयपाल को तो जरूर बदल दिया जायेगा।
                  दिल्ली में डा. नारंग की हत्या में शामिल लोगों को इसलिए बांग्लादेशी बताया जा रहा है की असम और बंगाल में चुनाव है। अगर पंजाब में चुनाव होता तो उनका संबंध खालिस्तानी उग्र्रवादियों से स्थापित कर दिया जाता।
                  असम में एक सभा में मोदीजी ने वहां के बीजेपी के CM उम्मीदवार सर्वानंद की तरफ इशारा करते हुए कहा की उनको आसाम भेजने से उनकी सरकार और देश को बहुत नुकशान हुआ है। असम के लोगों ने इस बयान को गम्भीरता से लेते हुए फैसला किया है की वो चुनाव के बाद उसे केंद्र में वापिस भेज देंगे और देश का नुकशान नहीं होने देंगे।

Friday, March 11, 2016

अनुपम खेर इरादतन झूठा है।

                  जब भी कोई साम्प्रदायिक अथवा जातीय इत्यादि संगठन अपने अनुयायिओं से सम्बोधित होता है तो उसकी थीम ये होती है की हमारे साथ अन्याय हो रहा है। इसी तरह इनके नेता भी व्यक्तिगत रूप से अन्याय का शिकार होने का राग अलापते हैं। वो जो उदाहरण देते हैं वो पहली नजर में उनकी बातों कि तस्दीक करते हैं लेकिन उनके असल कारण दूसरे होते हैं। उनके अनुयायिओं का एक तबका हमेशा उनकी इस साजिश का शिकार रहता है।
                   अनुपम खेर इस बात का बहुत ही चतुराई से उपयोग करते हैं। वो बहुत पहले से बीजेपी समर्थक कश्मीरी संगठन से जुड़े रहे हैं। लेकिन वो हमेशा  अपने आप को तठस्थ दिखाने की कोशिश करते हैं। वो इस बात को भी छिपा लेते हैं की उनकी पत्नी बीजेपी की सांसद हैं।
                    पिछले कुछ दिनों से वो बीजेपी और संघ की तरफ से इस सरकार पर सवाल उठाने वाले लेखकों, बुद्धिजीवियों और छात्रों के खिलाफ मोर्चा संभाले हुए हैं। जाहिर है जब ये लेखक, बुद्धिजीवी या छात्र सत्ता द्वारा भेदभाव जैसे मुद्दे उठाते हैं तो उनको काउन्टर करने के लिए उनके विरोधी भी ठीक वैसे ही मुद्दे उनके सामने खड़े करने की कोशिश करते हैं। इसी क्रम में उन्हें झूठ का सहारा लेना पड़ता है।
                    अनुपम खेर ने इसी शृंखला में पहले ये आरोप लगाया था की पाकिस्तान सरकार ने उन्हें साहित्य सम्मेलन में भाग लेने के लिए वीजा नही दिया। वो दिखाना चाहते थे की देखो मैं भी मोदीजी की तरह भेदभाव का शिकार हूँ और साथ में महत्त्वपूर्ण आदमी भी हूँ। बाद में जब पाकिस्तान उच्चायुक्त ने  ये बताया की अनुपम खेर ने वीजा के लिए आवेदन ही नही किया है तो वो चुप रह गए। इसी क्रम में अब उन्होंने JNU पर ये आरोप लगाया है की JNU ने उनकी फिल्म दिखने से इंकार कर दिया और वो असहनशीलता के शिकार हैं। अब उस पर JNU से बयान आया है की अनुपम खेर झूठ बोल रहे हैं। और चूँकि मौजूदा सैमेस्टर की बुकिंग पूरी हो चुकी थी और उसने अगले सैमेस्टर के लिए आवेदन ही नही किया।
                 ये सारी घटनाएँ ये दिखाती हैं की अनुपम खेर कोई गलती से तथ्यों को नही तोड़ मरोड़ रहे हैं बल्कि वो इरादतन ऐसा कर रहे हैं ताकि अपनी सरकार और संस्थाओं के पापों को काउन्टर किया जा सके।

Monday, January 25, 2016

Vyang -- गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर दिल्ली में टहलना

                 आज गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या है। इस दिन महामहिम राष्ट्रपति महोदय राष्ट्र के नाम सन्देश देते हैं। ये राष्ट्र कौन है और कहां रहता है ये मुझे कभी पता नही रहा। सो ये सोचकर की ये अपना काम नही है मैं महामहिम का सम्बोधन छोड़कर दिल्ली में टहलने निकल पड़ा।
                   अभी कुछ ही दूर चला था की एक आदमी मुझे मिला। उसने मुझसे पूछा की कहां जा रहा हूँ तो मैंने बता दिया की दिल्ली घूमने का विचार है यूं ही टहलते टहलते। तो उसने उत्सुकता से कहा की भैया अगर यमुना जी की तरफ जाओ तो वहां एक नजर डाल लेना और गणतंत्र दिख जाये तो मुझे फोन कर देना।
                    लेकिन गणतंत्र यमुना जी के किनारे क्योँ मिलेगा ? मैंने पूछा।
                 अब क्या बताएं भईया। गणतंत्र दिवस से ठीक दो दिन पहले केंद्र कैबिनेट ने अरुणाचल प्रदेश में चुनी हुई राज्य सरकार को बर्खास्त करके राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर दी। उस समय से गणतंत्र को लग रहा है की इन लोगों के हाथों से मरने से तो अच्छा है की आत्महत्या ही कर लूँ। और घर छोड़कर चला गया। अब मेरा दिल बहुत घबरा रहा है।
                  तो तुम पुलिस में रिपोर्ट क्यों नही करते ? मैंने पूछा।
               उसने एक खिसियानी सी हंसी हंसी और बोला की गया था भैय्या , लेकिन दरोगा ने कहा की तुम्हे दिखाई नही देता की 26 जनवरी के लिए कितनी तैयारियां करनी पड़ रही हैं। ऐसे समय में हम देश की सुरक्षा को छोड़कर इन ऐरे-गैरों को ढूंढते फिरें ? चलो भागो।
              ठीक है मैं ध्यान रखूँगा, मैंने कहा और पहले यमुना जी के घाट पर ही जा पंहुंचा।
             वहां घाट से कुछ दुरी पर कुछ मजदूर यमुना जी के किनारे पर पड़ा कचरा साफ कर रहे थे। एक बड़ी सी गाड़ी के पास एक मोटा सा आदमी शानदार कपड़े पहने खड़ा हुआ था। गाड़ी के अंदर डैशबोर्ड पर छोटा सा लेकिन खूबसूरत नया तिरंगा लगा हुआ था। मैंने उस झण्डे को ध्यान से देखने की कोशिश की तो उसने मुझे टोका।
                क्या देख रहे हो भाई साहब ? कल गणतंत्र दिवस है। इस दिन हमारे देश को आजादी मिली थी। सो हर देश भक्त को अपनी गाड़ी पर तिरंगा लगाना चाहिए। मैं तो हर साल लगाता हूँ।
                  और जिसके पास गाड़ी ना हो वो क्या करें अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए ? उन मजदूरों की तरह के लोग। मैंने सफाई करते मजदूरों कि तरफ इशारा किया।
                  वो हँसा , उनको तो ये भी पता नही होगा की कल गणतंत्र दिवस है। ये तो देश पर बोझ हैं बोझ। वैसे भी इनके झण्डा लगाने ना लगाने से क्या फर्क पड़ता है ? उसने हाथ में पकड़ी हुई लिम्का की बोतल खत्म की और यमुना में उछाल दी। फिर उसने मेरी तरफ देख कर पूछा की तुम यहां क्या कर रहे हो ?
                कुछ नही , किसी ने मुझे कहा था की गणतंत्र आत्महत्या करने निकला है सो मैं उसे यमुना जी के किनारे ढूंढने की कोशिश करूँ।
                  ये सब गए गुजरे लोग हैं जो आत्महत्या करके देश को बदनाम करते हैं। अब किसानो को ही देख लो, कायर कहीं के। काम धंधा तो करते नही हैं और निकल पड़ते हैं आत्महत्या करने के लिए, ताकि टीवी में नाम आ जाये। लेकिन इससे देश की कितनी बदनामी होती है इसका अंदाजा भी है उनको।  उसने गहरी नाराजगी प्रकट की।
                   तो आपका मतलब है किसान टीवी में नाम आने के लिए आत्महत्या करते हैं ? मैंने आश्चर्य से बाहर आने की कोशिश की।
                   वरना क्या वजह है ? आप नही करते, मैं नही करता। अगर कोई दूसरा कारण होता तो आप और हम भी करते। खैर, उधर ढूंढो ! उसने कुछ भिखारियों के टोले की तरफ इशारा किया।
                  मेरा मन किया की मैं भी आत्महत्या कर ही लूँ। परन्तु मैं वहां से निकल गया। आगे एक पान वाले की दुकान पर खड़ा हो गया। उसकी दुकान के टीवी में पद्म पुरस्कार मिलने वालों के नाम की घोषणा हो रही थी। उसमे नाम बोले जा रहे थे, अनुपम खेर, मधुर भंडारकर, मालिनी वगैरा वगैरा। मुझे लगा ये पद्म पुरस्कारों की बजाए सहिष्णुता के मामले पर निकाले गए सरकारी जलूस में भाग लेने वालों की कमेंट्री की जा रही है। तभी एक आदमी ने कहा की इसमें बाबा रामदेव का नाम क्यों नही है ?
                वहां खड़े एक दूसरे आदमी ने उसका जवाब देते हुए कहा की बाबा रामदेव को नोबल पुरस्कार की लिस्ट में रखा गया है। नोबल पुरस्कार मिलने के बाद उनको सीधा भारत रतन दिया जायेगा।
                प्रश्न करने वाला संतुष्ट नजर आया। उसके बाद मुलायम सिंह यादव का माफीनामा आया बाबरी मस्जिद तोड़ने के दौरान हुई कार्यवाही में कारसेवकों की मौत पर अफ़सोस व्यक्त करते हुए।
                मुझे लगा मुलायम सिंह थोड़ा लेट हो गए वरना पद्म पुरस्कारों की लिस्ट में उनका भी नाम हो सकता था। उसके बाद फ़्रांसिसी राष्ट्रपति होलांदे और प्रधानमंत्री मोदी की चंडीगढ़ के रॉक गार्डन में उतारी गयी कुछ फोटो दिखाई गयी। फोटो ठीक उसी अंदाज में थी जिसमे युवा जोड़े अजीबोगरीब पोज बनाकर और लड़की लड़के के पीछे खड़ी होकर कन्धे पर हाथ रखकर उतरवाते हैं। मुझे शर्म आई और मैं दूसरी तरफ देखने लगा। टीवी देखते वक्त मुझे दिन में करीब बीस बार ऐसा करना पड़ता है जब कोई घर की महिला सदस्य या अगली पीढ़ी के लोग साथ बैठें हों।
                  उसके बाद खबर दी गयी की अगले पांच राज्यों में होने वाले चुनावो में भी हार की जिम्मेदारी लेने के लिए अमित शाह को ही चुना गया है। किस्मत अपनी अपनी।
                  उसके बाद नेताजी से जुडी हुई फाइलों में शामिल एक पत्र का नमूना दिखाया गया जिसमे जवाहरलाल नेहरू द्वारा नेताजी सुभाष चन्द्र बॉस को युद्ध अपराधी कहने का जिक्र था। उस पत्र में जितनी भाषाई और तथ्यगत गलतियां हैं उतनी गलतियां तो दसवीं तक पढ़ा लिखा कोई आदमी भी नही करता। और ये पत्र उस जवाहरलाल नेहरू के नाम से दिखाया जा रहा है जिसकी लिखी हुई किताबें अंग्रेजी और विश्व साहित्य में क्लासिक का दर्जा रखती हैं। मुझे लगा नेहरू आज जिन्दा होते तो जरूर आत्महत्या कर लेते।
                मेरी बर्दाश्त की हद आ गयी थी सो मैं घर की तरफ लौट पड़ा।

Tuesday, November 24, 2015

Comment -- आमिर खान का बयान, कश्मीर और भक्तगण

देश में बढ़ती हुई असहिष्णुता के खिलाफ आमिर खान द्वारा दिए गए बयान पर जो प्रतिक्रियाएं आ रही हैं वो अपेक्षित थी। आमिर खान ने ये बयान रामनाथ गोयनका अवार्ड दिए जाने के समय हुए समारोह में दिया और उस वक्त सरकार के कुछ बड़े मंत्री और नेता, जैसे की अरुण जेटली, रविशंकर प्रशाद और संबित पात्रा वहां मौजूद थे। जाहिर है की इस पर प्रतिक्रियाएं भी आनी ही थी। लेकिन इन प्रतिक्रियाओं में एक अजीब किस्म की झल्लाहट झलक रही थी।
               इस पर प्रतिक्रिया करते हुए अनुपम खेर ने कहा की अतुल्य भारत कब से असहनशील हो गया ? संघी कलाकारों  यही मुसीबत है की वो अपने आप को ही भारत समझते हैं। आमिर खान का बयान ना तो भारत के खिलाफ था और ना ही हिन्दुओं के खिलाफ था। ये बयान केवल और केवल उन संघी गुंडा गिरोहों के खिलाफ था जो देश का माहौल बिगाड़ने  कोशिश कर रहे हैं। लेकिन हमेशा की तरह संघ से जुड़े लोग विशाल हिन्दू बहुमत  पीछे छिपने  कोशिश करते हैं और ऐसा माहोल बनाने की कोशिश करते हैं जैसे वो सारे हिन्दू समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं। अगर ऐसा होता तो  आपका बिहार में ये हाल होता ? एक दूसरे प्रवक्ता हैं अशोक पंडित, जो हर जगह घुसने  कोशिश करते हैं और बहस पर कब्जा करने की कोशिश करते हैं, और जिनके बारे में संघ के ही एक दूसरे प्रशंसक पहलाज निहलानी ने आज ही फर्जीवाड़ा करने का आरोप लगाया है उन्होंने भी ऐसी ही हिंदू प्रतिनिधि की मुद्रा अपनाई है। एक बयान परेश रावल का भी आया है जिसमे उसने कहा है की किसी भी देशभक्त को मुसीबत के समय अपनी मातृभूमि को छोड़कर नही भागना चाहिए। उन्होंने ये बयान शायद कश्मीर के संदर्भ में अशोक पंडित और अनुपम खेर के लिए दिया है जो मुसीबत के समय कश्मीर से भाग गए अब हररोज टीवी  कश्मीर-कश्मीर चिल्लाते रहते हैं। मैं कश्मीर और कश्मीरी पंडितों से जुड़े कुछ सवाल इनसे पूछना चाहता हूँ।
१.  क्या कश्मीर में अब एक भी पंडित नही रहता ? और अगर अब भी कश्मीर में पंडित रहते हैं तो वो क्यों भाग आये ?
२.  अब तो कश्मीर में और केंद्र में दोनों जगह आपकी सरकार है, फिर आप वापिस क्यों नही जा रहे ?
३.   अगर अब भी कश्मीर में हालत सामान्य नही है तो आपकी सरकार क्या कर रही है ?
४.   अगर आपको लगता है की कश्मीर के हालात पर सरकार का ज्यादा काबू नही है तो आप पिछली सरकार को क्यों कोसते थे ? क्या उसके पीछे राजनितिक कारण थे ?
५.   आपकी सरकार कश्मीर में लहराते ISIS के झंडों और उन्हें लहराने वालों पर कार्यवाही नही कर पा रही है या करना नही चाहती ?
६.   अगर आपकी सरकार कार्यवाही कर नही पा रही है तो उसका कारण बताइये। और अगर करना नही चाहती तो उसका कारण बताइये। अब ये मत कहना की ये राष्ट्रिय सुरक्षा का मामला है और इस पर बहस नही की जा सकती क्योंकि इस मांग पर आपने हजारों टीवी कार्यक्रम किये हैं।
७.   आपकी सरकार के आने के बाद आपने शरणार्थी कैम्पों में रहने वाले कश्मीरी पंडितों के लिए कौन-कौन सी नई सुविधाएँ लागु की हैं ?
           अगर आपके पास इन सब सवालों का कोई पुख्ता जवाब नही है और अगर आप इन पंडितों को घाटी में वापिस नही बसा पा रहे हैं तो टीवी बहसों में भौकना बंद कीजिये।
                      मेरा एक सवाल और सलाह भक्तों के लिए भी है। वो अपने आप को इस देश और इस देश के हिन्दुओं का ठेकेदार ना समझें। अभी इसका ठेका उन्हें नही मिला है। इस देश में रहने वाला हर नागरिक अपनी समस्याओं और परेशानियों पर अपनी राय रखने का अधिकार रखता है और सरकार से उस पर जवाब और कार्यवाही की उम्मीद भी रखता है और ये अधिकार उसे देश के संविधान ने दिया है। और ये उस संविधान ने दिया है जिसे बनाने में और लागु करने में आपके पूर्वजों की कोई भूमिका नही थी।