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Sunday, June 26, 2016

NSG से GST तक -- धमकाने की राजनीती के दुष्परिणाम

                    NSG की सदस्यता नहीं मिलने पर इतना हो-हल्ला पता नहीं क्यों हो रहा है। NSG की सदस्यता एक तकनीकी मुद्दा था जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी नाक का सवाल बना लिया। उसके बाद उनके भक्तों ने ये मान लिया था की इसमें अब कोई अड़चन नहीं डाल सकता, खासकर तब जब अमेरिका उनके साथ खड़ा हो। इसलिए मोदी भक्तों ने इसे इतना बड़ा मुद्दा बना दिया ताकि उसकी कामयाबी को राजनैतिक तौर पर भुनाया जा सके। लेकिन उल्टा हो गया। नाक कट गई। अब बीजेपी और उसकी सरकार इसे इस तरह पेश कर रही है जैसे ये केवल चीन द्वारा की गई धोखाधड़ी है। जबकि असलियत ये है की भारत की सदस्यता के ऊपर सवाल उठाने  वाले दूसरे नौ देश भी है और जिसमे वो देश भी शामिल हैं जो कल तक नरेंद्र मोदी के साथ फोटो खिंचवा थे, जैसे स्विट्जरलैंड। अब इसे केवल चीन  के विरोध का स्वरूप देना अपनी कूटनीतिक विफलता को छिपाने की कोशिश है।
                   जहां तक चीन का सवाल है तो हमे कुछ चीजें ध्यान में रखनी चाहियें।  पहली ये की 1962 के युद्ध के बाद भारत चीन  सीमा हमारी सबसे शान्त सीमा है। उस पर 50 साल में कभी एक गोली तक नहीं चली। उसके अलावा भारत चीन का व्यापार लगातार बढ़ रहा है। अमेरिका और वर्ल्ड बैंक जैसे संगठनों का मुकाबला करने के लिए चीन और भारत BRICS जैसे संगठनों का निर्माण कर रहे हैं और विकसित देशों के दबाव का सामना सफलता पूर्वक कर रहे हैं। लेकिन हमारे देश में कुछ अमेरिका समर्थक लगातार चीन को भारत का सबसे बड़ा दुश्मन पेश करते रहते हैं। उसे लगातार इस बात के लिए गालियां दी जाती हैं की उसके पाकिस्तान के साथ अच्छे रिश्ते हैं। लेकिन दूसरी तरफ हमारा चीन के प्रति क्या रुख है ? सालों से ढलाई लामा भारत में बैठकर चीन विरोधी कार्यवाहियां करता रहा है। एक तरफ भारत तिब्ब्त को चीन का हिस्सा मानता है और दूसरी तरफ भारत में तिब्ब्त की निर्वासित सरकार चलाने की इजाजत देता है। जापान, चीन का शत्रु देश है और अभी दक्षिण चीन सागर में चीन के दावे को लेकर उसके और जापान, फिलीपींस इत्यादि कई देशों का विरोध है। ठीक उसी समय जब हम चीन से NSG में समर्थन की मांग करते हैं, ठीक उसी समय हम जापान और अमेरिका के साथ मिलकर दक्षिण चीन सागर में युद्धाभ्यास करते हैं। आरएसएस और बीजेपी के सोशल मिडिया पर बैठे भक्त चीन को लगातार गालियां देते हैं और बीजेपी समर्थक टीवी चैनल चीन के खिलाफ लगातार कार्यक्रम प्रसारित करते हैं। उसके बाद हम चीन से सहयोग की उम्मीद करते हैं ये कितनी हास्यासपद बात है। बीजेपी ने विदेश निति और कूटनीति को क्या समझ रक्खा है ? क्या उसे लगता है की चीन उसके दबाव में आकर उसे समर्थन दे देगा।  जो देश अमेरिका के दबाव में नहीं आता उससे ये अपेक्षा करना हद दर्जे की मूर्खता ही मानी जाएगी।
                   ठीक इसी तरह की नीति GST के सवाल पर कांग्रेस के साथ अपनाई जाती है। जब भी संसद सत्र की शुरुआत होती है बीजेपी का कोई नेता गांधी  परिवार पर निजी हमला करता है। गाली गलौज करता है और समर्थन की मांग करता है। बीजेपी को लगता है की कांग्रेस उसके दबाव में आकर GST का समर्थन कर देगी। लेकिन क्या हुआ। बीजेपी ने कांग्रेस को गालियां देने के अलावा GST के लिए एक सर्वदलीय मीटिंग तक नहीं बुलाई।
                    अब भी सोशल मीडिया पर भक्त लोग चीनी वस्तुओं के बहिष्कार का कार्यक्रम चला रहे हैं और अरुण जेटली बीजिंग में चीन से निवेश की अपील कर रहे हैं। अजीब कन्फ्यूज संगठन है। कम से कम घर के अंदर तो सलाह कर लो की क्या करना है। अपनी मूर्खताओं से देश का कितना नुकशान और फजीहत करवाओगे। हर किसी को धमकाना न तो कूटनीति होती है और न ही राजनीती होती है, खासकर तब जब सामने वाला आपसे ताकतवर हो।

Friday, May 27, 2016

व्यंग -- सरकार के दो साल, शादी के गीतों में सच्चाई कहां होती है।

               मोदी सरकार को दो साल पूरे हो गए और उसके समारोह चल रहे हैं। इन समारोहों में भाषण हो रहे हैं।  भाषणों में कशीदे पढ़े जा हैं। पीठ थपथपाई जा रही हैं। एक दूसरे को गुलाल लगाए जा रहे हैं और मीडिया को इसमें शामिल करने के लिए करोड़ों के विज्ञापन बांटे जा रहे हैं।
                लेकिन एक लफड़ा है। विपक्ष के लोग सरकार के दावों को झूठा बता रहे हैं। और इस मामले में कुछ पत्रकार और आम लोग भी विपक्ष से मिल गये हैं। हमने उनको लाख समझाया की भाई शादी के गीतों में सच्चाई क्यों ढूंढ रहे हो ? शादी के गीतों में तो काने दूल्हे को भी हरियाला बन्ना बताया जाता है। दुल्हन को दादाजी के बागों की सैर करवाई जाती है भले ही दादा दूसरे के खेतों में मजदूरी करते मरा हो। लेकिन लोग हैं की मानते ही नहीं हैं। सरकार के हर बयान पर सवाल उठा देते हैं। कैसा देश हैं ? शादी, मेरा मतलब है की समारोह भी ख़ुशी से नहीं करने देता। दूसरों के समारोह में टांग अड़ाना ठीक नहीं होता।
               सुबह सुबह मेरे पड़ोसी आ गए। आते ही बोले, क्यों देश को मुर्ख बना रहे हो। दो साल में क्या काम कर दिया सरकार ने ?
               मुझसे सरकार हालत देखी नहीं गई। सो मैं तुरंत सरकार के बचाव में आ गया। मैंने कहा की दो  साल से भृष्टाचार मुक्त सरकार चल रही है।
               मेरे पड़ोसी की आँखे चौड़ी हो गई। तपाक से बोले, " अच्छा, तो ये व्यापम क्या है? छतीशगढ का चावल से लेकर नमक तक के घोटाले क्या हैं ? पनामा पेपर में मुख़्यमंत्री के लड़के का नाम आया है वो  क्या है ? वसुंधरा  के लड़के का घोटाला क्या है ? के जी बेसिन का घोटाला क्या है ? अनार पटेल का घोटाला क्या है ? "
                 मैंने उसे बिच में ही रोका। वर्ना पट्ठा इतने घोटाले याद किये था की अगर लोगों को याद रह जाएँ तो जमानत भी ना बचे। मैंने कहा, " ये सब बिजनेस ट्रांजेक्सन हैं। "
                 " बहुत अच्छे ! तो फिर घोटाले किसे कहते हैं ?" वो फ़ैल गया।
                  मैंने कहा, " देखो, घोटाले वो होते हैं जो विपक्ष के लोग करते हैं। विपक्ष के लोगों की बिजनेस ट्रांजेक्सन भी घोटालों के दायरे में आती हैं। उन पर जाँच बिठाई जा सकती है। एक जाँच खत्म हो जाये तो दूसरी बिठाई जा सकती है, तीसरी बिठाई जा सकती है। आखिर पांच साल ही तो निकालने होते हैं। वैसे भी तुम घोटालों के आरोप कैसे लगा सकते हो ? तुम्हारे पास क्या सबूत हैं ?"
                  " पहली नजर में दिख रहा है की घोटाला है। बाकि सबूत जाँच करने पर मिलेंगे। आखिर जाँच सबूत ढूंढने के लिए ही तो होती है। तुम जाँच क्यों नहीं करवा रहे ?" पड़ोसी ने ललकारते हुए कहा।
                 " सरकार के पास फालतू कामो के लिए टाइम नहीं है। तुम देश के विकास में रोड़े अटका रहे हो। दुनिया में देश की छवि खराब कर रहे हो। तुम देश विरोधी हो। " मैंने उसे धमका दिया।
                  " मैं तुम्हे देख लूंगा। " पड़ोसी ने कहा और चला गया /
                   मेरी पत्नी रसोई से दौड़ी हुई आई और बोली, "  ये तुम क्या कर रहे हो ? भला कोई पड़ोसी से इस तरह बात करता है ?"
                  " तुमने देखा नहीं की विपक्ष कैसे धमकी देने लगा है। ये लोग अलोकतांत्रिक हैं। इनसे सरकार बर्दाश्त नहीं हो रही। सरकार हमारी है, समारोह हमारा है, हम सरकार को कितनी ही अच्छी बताएं, ये कौन होते हैं हमारे उत्सव में खलल डालने वाले ?" मेरा स्वर ऊँचा हो गया।
                    मेरी पत्नी ने मुझे बाजू पकड़ कर झंझोड़ा। और बोली, "तुम्हारे बेटे की शादी नहीं है। "

Monday, April 11, 2016

समाज में विभाजन पैदा करना देशभक्ति कैसे है ?

                    इस बात पर तो कोई बहस नहीं है की एक विभाजित समाज कभी भी मजबूत राष्ट्र का आधार नहीं हो सकता। भारत एक बहुजातीय, बहुधार्मिक और उससे भी आगे बहुसांस्कृतिक समाज है। लेकिन हमारे कर्णधारों का प्रयास रहा की इस विविधता को ही भारत की एकता का आधार बनाया जाये। इसके लिए जरूरी था सभी को सम्मान और न्याय मिले। हर तरह की संस्कृति और विचारों को मानने वाले यहां अपने को सुरक्षित और सम्मानित महसूस करें। इसके लिए हमने हमेशा दो धर्मो और जातियों में एकता के सूत्र खोजे। चाहे भक्ति आंदोलन हो या सूफी मत हो, सबकी कोशिश हमेशा विभाजनकारी प्रतीकों के खिलाफ एकता के प्रतीक ढूढ़ने की रही। अंग्रेजो के खिलाफ लड़ते हुए लोगों ने कुछ मूल्यों की स्थापना की और वही मूल्य ना केवल आजादी का आधार बने बल्कि उन्ही मूल्यों को आधार बना कर एक मजबूत देश का निर्माण शुरू हुआ। इस तरह सदियों में ये देश एक मजबूत देश के रूप में उभरा।
                    लेकिन कुछ ताकतों को ये बात रास नहीं आई। उन्होंने हमेशा किसी ना किसी बहाने इसकी विविधताओं को विभाजन  में परिभासित करने की कोशिशें की। उन्होंने हमेशा विविध धर्म और संस्किर्तिओं को मानने वाले लोगों के बीच में टकराव पैदा करने की कोशिश की। धर्म इसमें मुख्य कारक रहा। अंग्रेजों ने इस बिभाजन को चौड़ा करने की सारी कोशिशें की। क्योंकि वो एक विदेशी सत्ता थी और उसे देश की एकता से खतरा था। इसलिए उसने फूट डालने और राज करने की नीति अपनाई।
                  लेकिन अब तो कोई विदेशी सत्ता नहीं है। फिर भी कुछ संगठन इस एकता को विभाजन में बदलने पर क्यों उतारू हैं। खासकर आरएसएस पुरे जोर शोर से इस बिभाजन को टकराव तक ले जाने की पूरी कोशिश कर रहा है। बीजेपी के सत्ता में आने के बाद, सरकार के सक्रिय सहयोग से उसकी ये कोशिशें खतरनाक मोड़ पर पहुंच गई हैं। आज विभिन्न धर्मों, जातियों, राज्यों और संस्कृतियों के बीच में जो भी विविधता है, आरएसएस उसे विभाजन के रूप में पेश कर रही है। देश में जितने भी टकराव के आधार हो सकते थे उन सबको सक्रिय कर दिया गया है। उसमे हिन्दू बनाम मुस्लिम है, हिन्दू बनाम ईसाई है, दलित बनाम स्वर्ण है, कश्मीरी बनाम गैर कश्मीरी है, आदिवासी बनाम गैर आदिवासी है, ऐसे सभी पक्षों को टकराव में धकेला जा रहा है।
                 इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण सवाल ये है की जो लोग समाज में विभाजन पैदा कर रहे हैं, समुदायों में फूट डाल रहे हैं वो देशभक्त कैसे हो सकते हैं।  समाज की दरारों को चौड़ा करना देशभक्ति है? हररोज नया बहाना ढूंढ कर कुछ लोगों को गद्दार घोषित करना और पुरे देश को इस तरह के सवालों पर तनाव में रखना आखिर देशभक्ति कैसे है ? अगर ये देशभक्ति है तो फिर गद्दारी की क्या परिभाषा होगी ? लोगों को इस बात को समझना होगा की समाज में विभाजन पैदा करने वाले लोग देशभक्त नहीं हैं बल्कि देश के दुश्मन हैं।

Friday, March 18, 2016

आरएसएस को " भारत विजय " के अभियान में एक-एक इंच जमीन के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।

                आरएसएस को कभी ऐसा लगता था की अगर केंद्र में उसकी पूर्ण बहुमत की सरकार आ जाये तो वो बहुत आसानी से " भारत विजय " कर सकता है। यहां भारत विजय से मतलब है देश के लोगों द्वारा देश, देशभक्ति, लोकतंत्र, धर्म और राष्ट्र के बारे में जो संघ का विचार है उसे देश की जनता द्वारा स्वीकार कर लिया जाना है । इसलिए उसने सरकार के में  आते ही अपने एजेंडे को लागु करना शुरू कर दिया। जिन संस्थाओं और मूल्यों को लोकतंत्र की रीढ़ माना जाता है और जो संघ की समझदारी के खिलाफ बैठती हैं, उन सब पर उसने हमला किया। भारत की विविधता पूर्ण संस्कृति, उसके बहुधर्मी समाज और अनेक भाषा भाषी होने की हकीकत संघ की राष्ट्र की  अवधारणा के खिलाफ होती है। इसलिए हमारी संस्थाओं की पूरी कार्यप्रणाली अब तक इसी विचार के तहत थी। इसमें सबसे बड़ा योगदान हमारे विश्वविद्यालयों का था जो ना केवल इस अवधारणा के साथ खड़े हैं, बल्कि इस पर निरंतर शोध के जरिये इसे और ज्यादा समृद्ध भी करते हैं। वहां पढ़ने वाले छात्र और पढ़ाने वाले प्रोफेसर इस पर लगातार काम कर रहे हैं। इसके साथ ही वो ऐसे समाजशास्त्री भी हैं जो राष्ट्र और समाज के बारे में संघ की समझ का तर्कपूर्ण तरीके से विरोध करते हैं। संघ को मालूम है की जब तक हमारे विश्विद्यालय संघ की विचारधारा को स्वीकार नही करते तब तक उसका भारत विजय सपना पूरा नही हो सकता।
                 इसलिए उसने सबसे पहला हमला यहीं से शुरू किया। हमारे सिनेमा और टीवी से जुड़े और विश्व में अपनी प्रतिष्ठा रखने वाला FTII उनका पहला निशाना बना। संघ को मालूम है की उसकी विचारधारा में ना तो इतनी शक्ति है और ना ही उसे किसी स्वीकार्य शोध का समर्थन प्राप्त है की वो बहस के स्तर पर उसका मुकाबला कर सके। इसलिए उसने उसे बौद्धिक चुनौती देने की बजाए उसे नष्ट करना ही  बेहतर ऑप्सन लगा। इसलिए उसने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में इस तरह के बदलाव  किये की निरंतर शोध की यह प्रक्रिया ही समाप्त हो जाये। उसने पीएचडी करने वाले छात्रों की स्कॉलरशिप समाप्त कर दी। उसने दूसरे विश्व स्तरीय संस्थानों की फ़ीस में इतनी बढ़ोतरी कर दी की दलितों, गरीबों और दूर दराज से आने वाले छात्र उसमे दाखिला ही ना ले सकें। साथ ही उसने विश्विद्यालयों के उपकुलपति से लेकर दूसरे तमाम महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर दूसरे दर्जे के लोगों की नियुक्तिया करनी शुरू कर दी जो सिर झुकाकर संघ के आदेशों का पालन करते रहें।
                 इसके साथ ही उसने दबाव में ना आने वाले लेखकों और बुद्धिजीवियों को डराने धमकाने और यहां तक की उन पर शारीरिक हमलों तक की शुरुआत कर दी। विरोधी बुद्धिजीवियों पर झूठे मुकदमे बनवाने शुरू कर दिए और उनके संगठनो पर पाबंदियां लगानी शुरू  कर दी। उनके लोगों ने इन कार्यों का विरोध करने वाले लोगों पर अदालतों तक में हमले किये और खुलेआम दुबारा ऐसा करने की धमकियां दी।
                   लेकिन क्या हुआ ? संघ को इस बात पर बड़ा आश्चर्य हो रहा होगा की लोगों ने डरकर समर्पण करने की बजाय उसके विरोध में खड़े होने और लड़ने का फैसला किया। FTII से लेकर चाहे वो JNU हो या इलाहबाद यूनिवर्सिटी, हैदराबाद यूनिवर्सिटी हो या IIT मद्रास, हर जगह उनका पुरजोर विरोध हुआ। और जहां से उन्होंने लड़ाई शुरू की थी वो एक जगह से भी उसे जीत कर आगे नही बढ़ पाये। सरकार ने अपने सारे मुखौटे उतार फेंके लेकिन इस लड़ाई को जीत नही पाये। हाँ, इसका एक उल्टा असर जरूर हुआ। अब तक जो दलित छात्र संगठन दक्षिण की इक्का दुक्का संस्थानों में थी उसने अखिल भारतीय स्वरूप ले लिया। वामपंथ, जो 2009 के चुनावों के बाद मीडिया में अपनी जगह खो चूका था उसे दुबारा हासिल करने में कामयाब रहा। और इन सब में जो सबसे बड़ी बात हुई वो ये की दलितों, वामपंथियों और अल्पसंख्यकों के बीच बड़े  पैमाने पर एक साझा समझ विकसित हुई। लोगों में साथी और विरोधी की तर्कपूर्ण पहचान करने की समझ बढ़ी।
                  इसलिए जो संघ अब तक ये समझता था की एक सिमित  हमले के बाद लोग समर्पण कर देंगे उसे एक एक इंच जमीन के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। उसे रस्ते में आने वाला हर सर कलम करना पड़ रहा है। उसके बावजूद अबतक तो उसे ये भी नही पता की वो आगे बढ़ा है या पीछे हटा है। पूरी सरकार की निष्पक्षता और सभी संस्थाओं की स्वायतत्ता को खोकर भी वो कुछ हासिल नही  पाया।

Thursday, March 17, 2016

Vyang -- राजनीती का दूसरा पाठ -- गंगा गए तो गंगाराम, जमना गए तो जमनादास।

                 भक्तो- आज राजनीती का दूसरा पाठ सिखाया जायेगा। वैसे तो तुम इतने काबिल हो की बिना सिखाये भी तुम ऐसा ही करते हो। वरना संघ की पाठशाला में दाखिला ही नही मिलता। भक्तो, राजनीती में कभी भी अपनी जबान पर स्थिर नही होना चाहिए। ये मुहावरा याद रखो की जुबान तो होती ही पलटी मारने के लिए है। जो व्यक्ति जुबान नही बदल सकता वह राजनीती के काबिल नही है। और बाकि किसी राजनीती के काबिल हो या ना हो, संघ की राजनीती के तो बिलकुल काबिल नही है। इसलिए हमेशा एक बात याद रखो की गंगा गए तो गंगाराम और जमना गए तो जमनादास। जगह और लोग देखकर अपने सुर बदल दो। जैसे-
                 अभी केंद्र में हमारी सरकार है , पंजाब में भी हमारी सरकार है और हरियाणा में भी हमारी सरकार है। हरियाणा और पंजाब का पानी पर विवाद है। लेकिन एक अच्छे नेता की तरह जब हम पंजाब में जाते हैं तो कहते हैं की हरियाणा को एक बून्द पानी नही देंगे। जब हम हरियाणा में जाते हैं तो कहते हैं की पानी पर हरियाणा का हक है और लेकर रहेंगे। हमने पंजाब के लोगों को दिखाने के लिए विधानसभा में प्रस्ताव पास करवा दिया और अब हरियाणा की हमारी सरकार को कहा है की वो कोर्ट में जाये। मामला केंद्र में पहुंचेगा तो हम कहेंगे की ये संवेदनशील मुद्दा है और इस पर दोनों पक्षों को सयम बरतना चाहिए। साथ ही ये भी कहेंगे की ये विवाद कांग्रेस की देंन है। अगर उसने ये विवाद पहले ही निपटा दिया होता तो हमे ये झंझट नही झेलना पड़ता।
              दूसरा उदाहरण देखो। हमने हरियाणा में जाटों को आरक्षण देने का वायदा किया। उसके बाद हमेशा की तरह मुंहढ़ँककर सो गए। जब वहां आंदोलन शुरू हुआ तो सारे प्रशासन और पुलिस  लेकर गंगास्नान को निकल गए। पीछे से हमारे नेता  कार्यकर्ता जाटों को सहयोग करते रहे आरक्षण के लिए। और दूसरे नेता कार्यकर्ता गैर जाटों को भड़काते रहे आरक्षण के खिलाफ। जब हालात ज्यादा खराब हो गए तो इसे विपक्ष की साजिश करार दे दिया। अब भी हम जाटों को पुरे आरक्षण का वादा कर रहे हैं और गैर जाटों को पूरा मुआवजा देने का वादा कर रहे हैं। आहिस्ता आहिस्ता दोनों हमे अपने अपने पक्ष में समझेंगे।
                इसलिए मौका देखकर रंग बदलने की आदत डालो। इसके लिए गिरगिट के मांस के लड्डू खाए जा सकते हैं उससे रंग बदलने की गति बढ़ेगी।
                 इस पर एक छात्र ने पूछा , " गुरूजी, गिरगिट तो जहां जाता है, वहां जाकर रंग बदलता है। लेकिन हमे तो जहां जाना होता है वहां रंग बदलकर जाना होता है। "
                  " अति उत्तम ! वत्स, क्या काम करते हो। " गुरूजी प्रभावित हुए।
                  " जी गुरूजी , मेरी चाय की दुकान है। " शिष्य ने कहा।
                  " तुम में प्रधानमंत्री के पद तक जाने की योग्यता दिखाई दे रही है। " इसी तरह मेहनत करते रहो।
                 अब मैं इस बात को और सरल करूंगा ताकि मंदबुद्धि विद्यार्थी भी इसे समझ सकें। हम JNU में जिन चीजों को देशद्रोह बता रहे हैं उन्हें कश्मीर में नही बता रहे। बल्कि वहां तो हम उन्हें देशहित में बता रहे हैं। जिन चीजों को हम विपक्ष में रहते हुए लोकतंत्र का हिस्सा बताते थे उन्हें सरकार में आने के बाद देश और विकास विरोधी बता रहे हैं। ऐसे असंख्य उदाहरण हैं। तेजस्वी विद्यार्थी उन्हें देख पाएंगे।
                     ये राजनीती का बेशकीमती गुण है। इसे पहले बताये गए वायदा करके भूल जाने के गुण के साथ  मिलाकर प्रयोग किया जाये तो ये रामबाण है। दुनिया का कोई भी मतदाता इसके प्रहार से बच नही सकता। ये जी जनता होती है, ये बड़ी ही वाहियात किस्म की चीज होती है। इस पर बिलकुल भरोसा मत करो। उसे हमेशा उसके अनुरूप रंग दिखलाते रहो। यही एक कामयाब राजनेता की पहचान है। ऐसा कोनसा काम ( पाप ) है जिसका हम विपक्ष में रहते विरोध करते थे और सत्ता में आने के बाद हमने नही किया ? कुछ लोग इसे धोखाधड़ी और वादा खिलाफी कहते हैं लेकिन हम इसे राजनीती कहते हैं।
                             अगला पाठ  कल।

Monday, March 14, 2016

Vyang -- शर्म उन्हें मगर नही आती।

                 भक्तो, याद करो कुछ डायलॉग। जिन पर तुम पीटते थे तालियां। बेसुमार। आँखों में चमक लिए। तुम्हारा चेहरा खिल उठता था। याद करो।
                 भाइयो और बहनो ,
                 हमारे देश के दो मछुआरों का खून करके इटली के दो सैनिक अपने देश वापिस चले गए।
                 क्या हमारे मछुआरों के खून की कोई कीमत नही।
                 इटली किसका मायका है ?
                 किसने उन्हें इटली भेजा।
                 क्या उन्हें वापिस  जाना चाहिए ?
                 क्या उन्हें सजा नही मिलनी चाहिए ?
                         ( अब वो दोनों कहां हैं ? और किसके कारण हैं ? )
                 भाइओ और बहनो ,
                ये जो चोर लुटेरों का धन जो विदेशी बैंको में जमा है वो वापिस आना चाहिए की नही ?
                 ये धन देश के विकास में लगना चाहिए की नही ?
                 अगर ये धन में आ जाता है तो हर गरीब आदमी को बैठे बिठाये 15 -20 लाख रूपये तो वैसे ही मिल जाएंगे बिना कुछ किये।
                 अगर मेरी सरकार बनती है तो 100 दिन में अगर ये काला धन वापिस ना आ जाये तो आप मुझे फांसी पर लटका देना।
                         ( क्या कालाधन आया ? क्या कोई फांसी चढ़ा ? )
                 भाइयो , बहनो -
                 ये जो पाकिस्तान हर रोज सीमा पर गोलीबारी कर रहा है वो इसलिए की हमारी सरकार कमजोर है। जरूरत है उससे आँख से आँख मिलाकर बात करने की।
                  मैं लवलेटर लिखने में विश्वास नही रखता।
                          ( बंद हो गयी गोलीबारी ? )
                  भाइयो, और बहनो,
                 ये जो हमारे देश का नौजवान है उसको काम मिलना चाहिए की नही ?
                 ये जो नौजवान पढ़ लिख कर बेकार घूम रहे हैं इनको नौकरी मिलनी चाहिए की नही ?
                   मेरी सरकार आती है तो हर साल दो करोड़ नोजवानो को नौकरियां दी जाएँगी।
                           ( कितने नोजवानो को नौकरियां मिली ? )
                 भाइयो, बहनो,
                   हमारे देश का किसान आत्महत्या कर रहा है उसका कारण है उनको फसलों का सही दाम  नही मिलना। अगर हमारी सरकार आती है तो हम  सुनिश्चित करेंगे की किसान को उसकी लागत से 50 % ज्यादा दाम मिलें। इसके बिना किसानो की हालत नही सुधर सकती।
                            ( फसलों की MSP कितनी बढ़ी ? )
               

Friday, March 11, 2016

अनुपम खेर इरादतन झूठा है।

                  जब भी कोई साम्प्रदायिक अथवा जातीय इत्यादि संगठन अपने अनुयायिओं से सम्बोधित होता है तो उसकी थीम ये होती है की हमारे साथ अन्याय हो रहा है। इसी तरह इनके नेता भी व्यक्तिगत रूप से अन्याय का शिकार होने का राग अलापते हैं। वो जो उदाहरण देते हैं वो पहली नजर में उनकी बातों कि तस्दीक करते हैं लेकिन उनके असल कारण दूसरे होते हैं। उनके अनुयायिओं का एक तबका हमेशा उनकी इस साजिश का शिकार रहता है।
                   अनुपम खेर इस बात का बहुत ही चतुराई से उपयोग करते हैं। वो बहुत पहले से बीजेपी समर्थक कश्मीरी संगठन से जुड़े रहे हैं। लेकिन वो हमेशा  अपने आप को तठस्थ दिखाने की कोशिश करते हैं। वो इस बात को भी छिपा लेते हैं की उनकी पत्नी बीजेपी की सांसद हैं।
                    पिछले कुछ दिनों से वो बीजेपी और संघ की तरफ से इस सरकार पर सवाल उठाने वाले लेखकों, बुद्धिजीवियों और छात्रों के खिलाफ मोर्चा संभाले हुए हैं। जाहिर है जब ये लेखक, बुद्धिजीवी या छात्र सत्ता द्वारा भेदभाव जैसे मुद्दे उठाते हैं तो उनको काउन्टर करने के लिए उनके विरोधी भी ठीक वैसे ही मुद्दे उनके सामने खड़े करने की कोशिश करते हैं। इसी क्रम में उन्हें झूठ का सहारा लेना पड़ता है।
                    अनुपम खेर ने इसी शृंखला में पहले ये आरोप लगाया था की पाकिस्तान सरकार ने उन्हें साहित्य सम्मेलन में भाग लेने के लिए वीजा नही दिया। वो दिखाना चाहते थे की देखो मैं भी मोदीजी की तरह भेदभाव का शिकार हूँ और साथ में महत्त्वपूर्ण आदमी भी हूँ। बाद में जब पाकिस्तान उच्चायुक्त ने  ये बताया की अनुपम खेर ने वीजा के लिए आवेदन ही नही किया है तो वो चुप रह गए। इसी क्रम में अब उन्होंने JNU पर ये आरोप लगाया है की JNU ने उनकी फिल्म दिखने से इंकार कर दिया और वो असहनशीलता के शिकार हैं। अब उस पर JNU से बयान आया है की अनुपम खेर झूठ बोल रहे हैं। और चूँकि मौजूदा सैमेस्टर की बुकिंग पूरी हो चुकी थी और उसने अगले सैमेस्टर के लिए आवेदन ही नही किया।
                 ये सारी घटनाएँ ये दिखाती हैं की अनुपम खेर कोई गलती से तथ्यों को नही तोड़ मरोड़ रहे हैं बल्कि वो इरादतन ऐसा कर रहे हैं ताकि अपनी सरकार और संस्थाओं के पापों को काउन्टर किया जा सके।

Sunday, March 6, 2016

आरएसएस और बीजेपी के देशविरोधी षड्यंत्र

            
  आम लोग कई चीजों पर एकदम निर्णायक नतीजे पर नही पहुंच सकते और इस पर पहुंचने के लिए वो मीडिया द्वारा फैलाई गयी अफवाहों के शिकार हो जाते हैं। पिछले दो साल में जब से ये सरकार सत्ता में आई है इस पर आरएसएस का एजेंडा लागु करने के आरोप लगते रहे हैं। इस दौरान कुछ बड़ी घटनाएँ भी हुई हैं जिनके बारे में भी एक पक्ष का आरोप है की वो कोई अकस्मात घटी हुई घटनाएँ नही हैं, बल्कि एक सोची समझी साजिश के तहत बाकायदा प्लान करके की गयी वारदातें हैं। इन घटनाओं की प्लानिंग का आरोप बीजेपी और आरएसएस के लोगों पर है और मीडिया के एक हिस्से की इसमें साझेदारी है। बीजेपी हमेशा इससे इंकार तो करती रही है लेकिन उसने उन सवालों का जवाब कभी नही दिया जो उस पर उठाये गए। इन घटनाओं में से कुछ का विश्लेषण इस प्रकार है। --
 १.       बिहार चुनाव से पहले दादरी की घटना हुई। इसमें गाय मारने के आरोप में एक व्यक्ति अख़लाक़ की हत्या कर दी गयी। इस घटना में मुख्य आरोपी बीजेपी नेता के पुत्र निकले। असल बात ये है की जिस गाय को मारने के आरोप में भीड़ को भड़का कर ये घटना अंजाम दी गयी वो गाय मरने जैसी कोई घटना वहां हुई ही नही थी। एक झूठी कहानी गढ़कर एक समुदाय के खिलाफ भावनाएं भड़काई  गयी। फिर उसके बाद क्या हुआ ? बीजेपी और आरएसएस के सारे नेता पूरी बहस को इस मुद्दे पर ले आये की गाय को मारना सही है या गलत। पूरी बहस उस चीज पर हो रही थी जो असल में घटनास्थल पर मौजूद ही नही थी। मीडिया का एक हिस्सा पुरे जोर शोर से इसका प्रचार कर रहा था। सोशल मीडिआ में बैठे भाड़े के लोग इसे हवा दे रहे थे। और बीजेपी के सबसे बड़े नेता इस पर चुप्पी साधे  हुए थे यानि उनका मौन समर्थन इस पूरी मुहीम को हासिल था।
२.         अब JNU की घटना को देखिये। छात्रों का एक समूह एक प्रोग्राम का आयोजन करता है जिसका कोई संबंध ना वहां की चुनी हुई स्टूडेंट यूनियन से था  और ना  उसके वामपंथी अध्यक्ष से था। बीजेपी का छात्र संगठन ABVP उस प्रोग्राम से ठीक 15 मिनट पहले वाइस चांसलर से मिलकर उसकी अनुमति रद्द करवा देता है। ABVP के नेता पहले से ही इसकी तैयारी के तहत एक बदनाम न्यूज चैनल के लोगों को वहां बिना अनुमति के बुला कर रखते हैं। उसके बाद प्रोग्राम करने वाले छात्रों और ABVP के सदस्यों में झगड़ा होता है। छात्रसंघ अध्यक्ष उसमे बीच बचाव की कोशिश करता है। इतने में मुंह पर कपड़ा बांधे हुए कुछ लोग देश विरोधी नारे लगाते हैं और निकल भी जाते हैं। बात खत्म हो जाती है। उसके बाद पूरी घटना के विडिओ को छेड़छाड़ करके उसमे बाहर से नारे डाले  जाते हैं। इस काम का आरोप HRD मंत्री स्मृति ईरानी की सहयोगी शिल्पी तिवारी पर आता है। उसके बाद वही न्यूज चैनल उस बदले गए विडिओ को पूरा दिन टीवी पर दिखाता है और पूरी JNU को देशद्रोह के अड्डे में तब्दील कर देता है। उसके बाद बीजेपी के सांसद महेश गिरी देशद्रोह का मामला दर्ज करवाते हैं और पुलिस सरकार के इशारे पर छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लेते हैं। उसके बाद पूरी बीजेपी और आरएसएस लगातार वामपंथ पर देशद्रोह में शामिल होने का राग अलापते हैं। इसके बाद जो चीजें सामने आई वो इस प्रकार हैं।
                १. मीडिया के कुछ चैनलों द्वारा दिखाए गए विडिओ फर्जी थे।
                २. कन्हैया ने इस तरह का कोई नारा नही लगाया इसका कोई विडिओ सबूत पुलिस के पास नही    है।
                ३. मुंह ढंककर नारे लगाने वाला एक भी आदमी पकड़ा नही गया। और शायद ही कभी पकड़ा जाये।
         लेकिन हो क्या रहा है। इस पूरी घटना को इस तरह पेश किया जा रहा है जैसे बीजेपी को छोड़कर सभी विपक्षी पार्टियां, चाहे वो कांग्रेस हो, वामपंथी हों या जनता दल हो सब देशद्रोही हैं। अभी अभी बीजेपी के नेता अरुण झुठली ने भारतीय जनता युवा मोर्चा के कार्यक्रम में कहा की कन्हैया भारत के टुकड़े करने के नारे लगा रहे थे और दूसरी तरफ इनकी पुलिस अदालत में कह रही है की उसके पास कोई इसकी कोई विडिओ फुटेज नही है। ये व्ही अरुण झुठली हैं जो दिल्ली चुनाव में एक हाथ में माइक पकड़कर कह रहे थे की आम आदमी पार्टी रंगे हाथ पकड़ी गयी और दूसरे हाथ से उच्च न्यायालय के उस एफिडेविट पर साइन कर रहे थे जिसमे लिखा था की आम आदमी पार्टी के खातों में कोई गड़बड़ी नही पाई गयी।
               अब दूसरा सवाल ये उठता है की क्या ये कोई अलग अलग घटी हुई आकस्मिक घटनाएँ हैं। नही ये बाकायदा एक विचारधारा के आधार पर देश में एक साम्प्रदायिक विभाजन पैदा करने और उसे बनाये रखने की सोची समझी रणनीति है। इस रणनीति में मीडिया का एक हिस्सा जिसके मालिक बीजेपी के नजदीकी उद्योगपति हैं उसकी मदद करता है। इसमें सोशल मीडिया में बैठा एक भाड़े का तबका और कुछ लम्पट किस्म के लोग योगदान करते रहते हैं। देश में ऐसे लोग जिनकी सोचने और समझने की शक्ति कमजोर है वो इस बहाव में बह जाते हैं।

Friday, February 26, 2016

क्या ये दूसरा शम्बूक वध ( हत्या ) है ?

            
  हैदराबाद विश्वविद्यालय में रोहित वेमुला की संस्थाकीय हत्या के बाद JNU की घटनाओं पर बीजेपी और आरएसएस का रुख ठीक उसी तरह है जिस तरह शम्बूक नामक शूद्र की ज्ञान प्राप्ति से घबराये हुए अयोध्या के ब्राह्मणो का था। रामायण में इस बात का जिक्र है की शम्बूक की ज्ञान प्राप्ति को रोकने के लिए उस समय अयोध्या के ब्राह्मणो के पास कोई उचित तर्क नही था। इसलिए उन्होंने एक ब्राह्मण के बालक की असामयिक मृत्यु को उसके साथ जोड़ दिया। और उस समय के राजा राम को उस नितान्त असंगत आधार पर भी शम्बूक की हत्या करने में कोई हिचक नही हुई। समाज में ऊपरी पायदान पर बैठा वर्ग हमेशा अपनी स्थिति के खो जाने की आशंका से भयभीत रहता है। और वो हमेशा इस स्थिति को बनाये रखने में कुतर्को और षड्यंत्रों का सहारा लेता रहा है। चाहे द्रोणाचार्य द्वारा एकलव्य का अंगूठा काटने की घटना हो या मौजूदा समय में उच्च शिक्षा में दलितों के प्रवेश को रोकने के लिए की गयी तिकड़में हों।
                JNU में छात्रवृति बंद करने के पीछे भी यही कारण था। उच्च शिक्षा से छात्रवृति बंद करना सीधे सीधे गरीब छात्रों को उच्च शिक्षा से वंचित किये जाने का मामला है जिनमे से बड़ा हिस्सा दलितों से आता है। इस निर्णय के विरोध में JNU छात्र यूनियन के अध्यक्ष कन्हैया के नेतृत्व में छात्रों का संघर्ष और OCCUPAI  UGC  जैसे प्रोग्राम सामने आये। इन सब पर सरकार ने जो दमन चक्र चलाया उसके बाद सरकार इस  स्थिति में ही नही है की वो इससे इंकार कर सके।
                 उसके बाद संसद में और टीवी चैनलों पर बीजेपी और आरएसएस के प्रवक्ता इस बहस को दुर्गा और महिसासुर तक ले गए। इसे यहां तक लेकर जाना आरएसएस और बीजेपी के उस प्लान का ही हिस्सा है जो देश में एक साम्प्रदायिक और जातीय विभाजन खड़ा करने की कोशिश करता हैं। संसद की ये परम्परा रही है की किसी भी वर्ग समूह द्वारा किसी भी देवी देवता और ऐतिहासिक महापुरुषों के बारे में की गयी आपत्तिजनक टिप्पणी का मुद्दा यदि उठाया जाता है तो उन शब्दों का प्रयोग ज्यों का त्यों नही किया जाता जिन पर आपत्ति होती है। क्योंकि इससे किसी दूसरे समुदाय की भावनाएं आहत हो सकती हैं। लेकिन बीजेपी ने स्मृति ईरानी के नेतृत्त्व में ठीक उन्ही शब्दों का प्रयोग किया और पहले घटी हुई किसी घटना जिसमे बीजेपी के  मौजूदा सांसद उदित राज मुख्य वक्ता थे, उसके लिए राहुल गांधी को जवाब देने के लिए कहा। बीजेपी एक बार अपने सांसद उदित राज से तो पूछ लेती की उसका इस बारे में क्या विचार है। लेकिन उसने इसका राजनैतिक प्रयोग किया।
                 भारतीय समाज में देवी देवताओं और पूजा पध्दतियों के बारे में इतनी विविधतायें हैं जिनको आरएसएस और बीजेपी एक रूप देने की विफल कोशिश करती रही हैं। कुछ समुदाय महिसासुर और रावण की पूजा करते हैं। बिहार में जरासंध का जन्मदिन मनाया जाता है और उसमे बीजेपी के नेता शामिल होते हैं। धर्म की मान्यताएं हमेशा अकादमिक बहस का मुद्दा रही हैं। जिन्हे हम समाज सुधारक कहते है उन्होंने क्या किया था ? पहले चली आ रही मान्यताओं पर हमला करके उनके जन विरोधी चरित्र को उजागर किया था और उन्हें बदलने के लिए लोगों को तैयार किया था। इस तरह तो सबको देशद्रोही घोषित किया जा सकता है। बीजेपी के प्रवक्ता का ये कहना की हमे महिसासुर की पूजा से एतराज नही है बल्कि दुर्गा के चित्रण में प्रयोग शब्दों पर आपत्ति है। लेकिन ये आपत्ति तो कुछ लोगों द्वारा महिसासुर और रावण के चित्रण में प्रयोग शब्दों पर भी हो सकती है। क्या संबित पात्रा इस बात की गारंटी लेंगे की की आगे से चाहे रामलीला हो या कोई दूसरा प्रवचन, उसमे इनके लिए उस तरह का चित्रण नही किया जायेगा। इसलिए लोगों और विभिन्न समूहों द्वारा सदियों से अपनाये गए रीती रिवाजों पर अकादमिक बहस तो हो सकती है, लेकिन इनका राजनैतिक इस्तेमाल देश को बहुत महंगा पड़ सकता है।
                अब आते हैं रोहित वेमुला की मौत पर। इस बात के पर्याप्त सबूत हैं की ABVP के कहने पर बीजेपी सरकार के मंत्रियों ने उन पर कार्यवाही के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन पर दबाव बनाया और उन्हें विश्वविद्यालय से बाहर निकलवाया। हो सकता है ये चीजें अदालत में साबित ना हों। अदालत में बहुत सी चीजें साबित नही होती, इसका मतलब ये नही होता की सच्चाई बदल जाएगी। रोहित एक होनहार रिसर्च स्कालर था और उस वर्ग से आता था जो रामराज से आज तक शिक्षा का अधिकारी स्वीकार नही किया गया है। ये साफ तोर पर दूसरी बार शम्बूक की हत्या है।

न्याय और व्यवस्था को विफल करने की कोशिश

            
  पिछले लगभग दो सालो से जब से ये सरकार सत्ता में आई है तब से नई तरह बहस, नए तरह के कुतर्क और नए तरह के हथकंडे सामने आ रहे हैं। केवल बहस के स्तर पर ही नही बल्कि कार्यवाही के स्तर पर भी नए हथकंडो का सहारा लिया जा रहा है।
               बीजेपी के लोग चाहे वो सरकार में रहें या विपक्ष में वो हमेशा इन हथकंडों का सहारा लेते है। कुतर्कों से बहस करते हैं और तकनीकी कुप्रयासों से  न्यायायिक और प्रशासनिक व्यवस्था को विफल करते हैं। ये तरीका हमने गुजरात में अच्छी तरह से देखा था। जब 2002 की ट्रेन का डब्बा जलाने की घटना के बाद गुजरात में सरकार प्रायोजित हिंसा का ताण्डव हुआ और उस पर जब बीजेपी नेताओं से सवाल पूछे गए तो उन्होंने उसे उसी तरह की स्वाभाविक पर्तिकिर्या बताया जैसे अब दिल्ली में वकीलों के हमले को बताया। जब दबाव बढ़ता तब बीजेपी के नेता हल्के स्वरों में हिंसा की निंदा करते और जब कार्यवाही की बात आती तो हमलावरों के साथ खड़े हो जाते। हिंसा पर सवाल उठाने वालों पर सामने से सवाल किया जाता की क्या गीधरा की घटना सही थी ? पूरा देश उसकी निंदा करता रहा लेकिन बीजेपी और आरएसएस उसे अपने कुकर्मो और हमलावरों के समर्थन में  इस्तेमाल करती रही। अब जब JNU और हैदराबाद विश्विद्यालय का  सवाल उठाया जाता है तो उसी तरह सामने से सवाल दागा जाता है की क्या देश के खिलाफ नारे लगाना सही है ? आप लाख जवाब देते रहिये और निंदा करते रहिये लेकिन उसे कौन सुनने वाला है।
               दिल्ली पुलिस की कार्यवाही पर जब संसद में पूछा गया तो गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा की पुलिस ने कानून के अनुसार काम किया है। पुलिस उच्चत्तम न्यायालय के स्पष्ट आदेशों के बावजूद हमलावरों को क्यों सहयोग कर रही थी इसका जवाब उन्होंने नही दिया। बीजेपी के सभी वक्ताओं ने पूरी बहस को तकनीकी मामलों में उलझाने की पूरी कोशिश की। कन्हैया की जमानत के मामले में दिल्ली पुलिस ने जिस तरह सरकार के साथ साथ अपनी पोजीशन बदली उसके लिए उसने कहा की नए तथ्य सामने आये हैं। लेकिन जो लोग मुंह ढंककर नारे लगा रहे थे उन पर पुलिस ने कुछ नही कहा। गोधरा में भी यही हुआ था। असली गुनहगार कभी नही पकड़े जायेंगे। नकली विडिओ फुटेज बनाने वालों पर कार्यवाही पर व्ही जवाब की जाँच चल रही है। वकीलों के असली विडिओ पर कार्यवाही पर व्ही जवाब की जाँच चल रही है।
               लेकिन इस बार एक फर्क है। देश गुजरात से बहुत बड़ा है। पूरा देश हिंदुत्व की प्रयोगशाला में बदल जायेगा ये खुशफहमी ही है। धीरे धीरे बीजेपी और आरएसएस की कार्यप्रणाली और उद्देश्य दोनों सामने आ रही हैं। लोग इसे समझने लगे हैं। भले ही उनकी संख्या अभी कम है और उन्माद का असर है लेकिन पर्दाफाश होकर रहेगा।

Friday, December 25, 2015

Vyang -- गंगा और बीजेपी में क्या क्या समान है।

                       ये बहुत पते का सवाल है। पहली बात ये है और यहीं से शुरू भी होती है की जो भी गंगा के भक्त हैं वो ये मानते हैं की कोई कितना ही पापी क्यों ना हो, गंगा स्नान करने से उसके सारे पाप धुल जाते हैं। पाप की क़्वालिटी भले ही कैसी भी हो , आदमी चाहे खूनी हो, बलात्कारी हो, चोर हो या डकैत हो , इस बात से कोई फर्क नही पड़ता। गंगा माँ सबके पाप धो देती है और आदमी को फिर से पाप करने लायक कर देती है।
                         उसी तरह बीजेपी के भी जो भक्त हैं वो ये मान कर चलते हैं की कोई किसी भी पार्टी का कितना ही बड़ा घोटालेबाज हो, देशद्रोही हो, विदेशों में कालाधन जमा कराने वाला हो, या कितना ही बड़ा टैक्स चोर हो, अगर वह बीजेपी में शामिल हो जाता है तो तुरंत शुद्ध हो जाता है। उसके सारे कुकर्म सतकर्मो में बदल जाते हैं। और वो जब तक बीजेपी में रहता है तब तक उसे पाप छू भी नही सकता।
                         जिस तरह गंगा पाप-विमोचिनी है उसी तरह बीजेपी घोटाले-विमोचिनी है।
                         इससे एक तकनीकी स्थिति भी पैदा होती है। आदमी जब तक गंगा में खड़ा रहता है तब तक तो उसमे पाप लगने की कोई संभावना ही नही होती है। उसी तरह जब तक आदमी बीजेपी का सदस्य रहता है उस पर कोई आरोप लग ही नही सकता है। इसी तकनीकी पहलू को विपक्ष समझ नही पा रहा है और आये दिन किसी बीजेपी नेता के खिलाफ कोई आरोप लगा देता है। बेचारे बीजेपी के प्रवक्ताओं को बार-बार टीवी चैनलों पर आकर ये बात समझानी पड़ती है की भाई चूँकि वो बीजेपी का सदस्य है इसलिए उसकी जाँच नही हो सकती। लेकिन फिर कोई नेता आकर नया आरोप लगा देता है। हद तो तब हो गयी जब बीजेपी  कीर्ति आजाद ने अरुण जेटली पर भृष्टाचार का आरोप लगा दिया। अब बीजेपी ने उसे निलंबित करके ये याद दिलाया है की उसे बीजेपी और दूसरी पार्टियों में फर्क करना चाहिए। क्या कीर्ति आजाद भूल गए की बीजेपी "पार्टी विद ड डिफरेंस " है। जब तक आदमी बीजेपी में है उस को कोई आरोप छू भी नही सकता। बिलकुल गंगा माँ की तरह।
                        लेकिन एक बात बीजेपी को समझ नही आ रही। गंगा का पानी भी इतना गन्दा हो चूका है की वो पीने के लायक तो क्या, नहाने के लायक भी नही बचा है। धीरे धीरे लोग बीजेपी के बारे में भी यही मानने लगे हैं। अब गंगा का पानी इतना खराब कैसे हो गया की उसकी सफाई के लिए अलग से कार्यक्रम बनाने की जरूरत पड़ गयी। लेकिन गंगा सफाई के अभियान के बारे में मुरली मनोहर जोशी ने कहा था की इस तरह तो गंगा पचास साल में भी साफ नही हो सकती। अब मुरली मनोहर जोशी यही बात बीजेपी के बारे में कह रहे हैं और आडवाणी और यशवंत सिन्हा उनकी हाँ में हाँ मिला रहे हैं।
                         मैंने मेरे पड़ोसी से इस पर बातचीत करके गंगा के और बीजेपी के प्रदूषित होने के कारण जानने की कोशिश की। उसने कहा की गंगा के गंदे होने का एक कारण उसके ही भक्तों द्वारा उसमे डाले जाने वाले फूल और पूजा सामग्री है। इससे एक तो ये बात भी पता चलती है की ज्यादा भक्ति और पूजा सामग्री भी प्रदूषण का कारण होती है। अब बीजेपी में भी इस तरह की भक्ति बढ़ रही है और उसको प्रदूषित कर रही है। दूसरा बड़ा कारण जो गंगा को प्रदूषित कर रहा है वो है उद्योगों का कचरा बड़ी मात्रा में उसमे गिर रहा है। उसी तरह बीजेपी में उद्योगपतियों का कचरा गिर रहा है। जब तक इसको नही रोका जायेगा तब तक इनकी सफाई नही हो सकती। अपनी बात को जारी रखते हुए मेरे पड़ोसी ने कहा की गंगा में लोग बहुत सी लाश बहा देते हैं। पता नही कितनी लाशें गंगा में तैरती रहती हैं। उसी तरह बीजेपी में भी पता नही कितने सिद्धांतों की लाशें तैर रही हैं।
                        उसके बाद वो राजकपूर की तरह भावुक हो गए और बोले। गंगा पापियों के पाप धोते धोते गंदी हो गयी है। जो पाप लोगों के शरीर से उतरते हैं आखिर वो गंगा के पानी में ही तो जमा होते हैं। उसी तरह बीजेपी ने अपने घोटालेबाजों के जो घोटाले धोये हैं उससे बीजेपी भी गंदी हो गयी है।
                         उनकी आँखे नम हो आई। उन्होंने कहा की गंगा की तरह बीजेपी के लिए भी एक सफाई अभियान की जरूरत है। उसके बाद वो उठकर धीरे धीरे बाहर चले गए।

Friday, December 11, 2015

बीजेपी का दोहरा रुख, दोहरी बातें और दोहरा चरित्र

बीजेपी जब से सत्ता में आई है उसने अपनी पहले कही गयी कई बातों पर पलटी मारी है। जब तक ये बात केवल नारों और वायदों तक सिमित थी तब तक तो ठीक था और लोग केवल मजाक उड़ाकर चुप रह जाते थे। लेकिन जब ठीक इसी तरह का मामला कामकाज के दौरान भी सामने आने लगा तो उसका विरोध होने लगा। संसद का पिछला सत्र बीजेपी नेताओं के भृष्टाचार के मामले पर हंगामे की भेंट चढ़ गया और अब ये सत्र भी बिना कोई कामकाज किये समाप्ति की और है। बीजेपी के पलटी मारने के इतने उदाहरण सामने हैं की अब तो लोगों को उन पर आश्चर्य होना भी बंद हो गया है। जैसे -

पहले --- बीजेपी नेता पूरा सत्र हंगामे के द्वारा खत्म कर देते थे और कहते थे की संसद चलाना सरकार की जिम्मेदारी होती है और संसद का काम रोकना भी लोकतंत्र में विरोध का एक तरीका होता है।

अब -- बीजेपी नेता कहते हैं की संसद में काम रोकना देश के विकास को रोकने का प्रयास है और संसद चलाना सरकार और विपक्ष दोनों की बराबर की जिम्मेदारी होती है।

पहले -- जब भूमि बिल पर बीजेपी ने सरकार में आते ही पलटी मारी और इस पर जवाब में कहा की नई जरूरतों के अनुसार अपने विचारों में बदलाव करना कोई बुरी बात नही है।

अब -- GST बिल पर कांग्रेस द्वारा रक्खी गयी तीन मांगों पर वह कह रही है की ये मांगे तो कांग्रेस द्वारा पेश किये गए बिल में भी नही थी और अब कांग्रेस द्वारा अपने रुख में बदलाव लोगों के साथ धोखेबाजी है।

पहले -- कांग्रेस और विपक्ष के दूसरे नेताओं पर भृष्टाचार के आरोपों पर उसका कहना था की जब शिकायत मिली है तो जाँच करवाने में सरकार क्यों हिचक रही है। अगर कुछ गलत नही हुआ है तो अपने आप सामने आ जायेगा इसमें डरने की क्या बात है।

अब -- जब उसके नेताओं के भृष्टाचार की जाँच की मांग हो रही है तो उसका कहना है की अगर कोई पुख्ता सबूत विपक्ष के पास है तो उसे अदालत जाना चाहिए , केवल शिकायतों के आधार पर जाँच नही की जाएगी।

पहले -- जब पवन बंसल के भांजे किसी से पैसे लेते हुए पकड़े गए थे तो उसने कहा था की पवन बंसल को इस्तीफा देना चाहिए क्योंकि आखिर उनकी बिना पर ही तो उसके भांजे ने पैसा लिया होगा।

अब -- जब छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री का साला पैसे लेते हुए पकड़ा गया तो बीजेपी का कहना है की कोई मुख्यमंत्री अपने सभी रिश्तेदारों की जिम्मेदारी कैसे ले सकता है।

पहले -- जब UPA सरकार पाकिस्तान के साथ  रही थी तो उसने ये कह कर उसका विरोध किया की जब तक सीमा पर गोलीबारी और पाकिस्तान द्वारा आतंकवादियों का समर्थन बंद नही किया जाता कोई बात नही होनी चाहिए।

अब -- जब सरकार कश्मीर पर भी बात करने को तैयार हो गयी है तो उसका कहना है की आखिर रास्ता तो बातचीत से ही निकलेगा।

                        इस तरह की पलटियां तो आप चाहे लगातार दो महीने लिखते रहें पूरी नही होंगी।