Friday, January 17, 2020

हिटलर युग के किस्से

 सरकार बदलने के बाद एक मशहूर लेखिका ने सरकार के समर्थन में लिखने का व्यवसाय चुना। जो भी कोई सरकार की आलोचना करता तो वह अपने लेख में उसको झिड़क देती। एक समय लोगों ने कहा की तानाशाही बढ़ रही है और असहिष्णुता का वातावरण है तो उसने ऐसा कहने वालों को जोरदार फटकार लगाई और मौजूदा निजाम को इतिहास का सबसे सहनशील और लोकतान्त्रिक निजाम बताया। इस लेखिका का एक बेटा विदेश में रहता था। एक दिन उसने इस निजाम पर एक सख्त टिप्पणी कर दी। निजाम ने तुरंत उसकी नागरिकता वापिस ले ली और उसे दुश्मन देश का नागरिक घोषित कर दिया। घबराई हुई लेखिका ने उन सब लोगों को फोन करके मदद मांगी जो रोज उसे फोन करके उसके लेखों पर बधाई देते थे और तारीफ करते थे। लेकिन किसी ने भी उसका फोन नहीं उठाया।
                    जब उसने इसका कारण पता किया तो मालूम हुआ की जिस तरह उसने इस निजाम के समर्थन में लिखने का व्यवसाय चुना था उसी तरह उन लोगों ने भी सरकार के समर्थन में लिखने वालों की तारीफ करने का व्यवसाय चुना था।
                        ये किस्सा आप हिटलर युग के किस्सों पर छपी हुई किताब के अगले संस्करण में पढ़ सकते हैं। 

Saturday, January 11, 2020

नागरिकता कानून CAA पर कौन गुमराह कर रहा है ?

 सरकार के नागरिकता कानून संशोधन बिल पास करने के बाद पुरे देश में लाखों लोग सड़कों पर हैं। इसके खिलाफ बड़े बड़े प्रदर्शन हो रहे हैं। इन प्रदर्शनों की अगुवाई देश के जाने माने विश्व विद्यालयों के छात्र कर रहे हैं। उनके समर्थन में प्रोफेसर और दूसरा बुद्धिजीवी तबका भी जुड़ रहा है। देश के गणमान्य व्यक्तियों , जिनमे कलाकार और वैज्ञानिक शामिल हैं इस कानून का विरोध किया है। देश की कई राज्य सरकारों और राजनैतिक पार्टियों ने इसे वापिस लेने की मांग की है। इन पार्टियों में केंद्र सरकार में शामिल घटक दल भी शामिल हैं। इसके साथ ही इसके खिलाफ उच्चतम न्यायालय में साथ से ज्यादा अर्जियां दाखिल हुई हैं। इसलिए केवल ये कह देना की इसका विरोध करने वाले देश द्रोही हैं या उनको कोई जानकारी नहीं है बहुत ही हास्यास्पद होगा।
                    इसका विरोध करने वालों का मुख्य रूप से ये कहना है की ये कानून चूँकि कुछ धर्मों को इसमें शामिल करता है और एक धर्म को छोड़ देता है इसलिए ये संविधान की मूल भावना के ही खिलाफ है जिसमे स्पष्ट रूप से कहा गया है की धर्म और जाती के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता। इसका विरोध करने वालों में दूसरा तबका वो है जो इसे असम समझौते के खिलाफ मानता है। इसके अलावा भी एक बड़ा तबका इसका विरोध ये कहकर कर रहा है की इस कानून का उद्देश्य वो है ही नहीं जो सरकार कह रही है। बल्कि इसका उद्देश्य देश में साम्प्रदायिक धुर्वीकरण पैदा करके हिन्दू राष्ट्र बनाने के संघ परिवार के एजेंडे को पूरा करना हैं।
                     इस पर सरकार का बहुत जोर देकर ये कहना है की इसका मकसद पाकिस्तान, बांग्ला देश और अफगानिस्तान में धर्म के आधार पर सताये जाने वाले लोगों को सरक्षण प्रदान करना है और इस कानून के द्वारा केवल नागरिकता देने का प्रावधान है और इससे किसी की भी नागरिकता छीनने का कोई प्रावधान नहीं है। सरकार और बीजेपी का ये भी आरोप है की विपक्षी पार्टियां इस कानून की गलत व्याख्या करके लोगों को गुमराह कर रही हैं। इसलिए इस कानून पर दोनों तरफ के दावों की सही से पड़ताल करना जरुरी है।
                      सबसे पहले सरकार का ये दावा की ये कानून बिना किसी दूसरे उद्देश्य के पाकिस्तान, बांग्ला देश और अफगानिस्तान में धर्म के आधार पर सताये जाने वाले लोगों को सरक्षण प्रदान करना है, प्रथम दृष्टि से सही नहीं लगता। क्योंकि अगर सरकार इस कानून में कुछ धर्मो का उल्लेख किये बिना ये कानून बनाती तो भी वो लोग जिनके बारे में सरकार दावा कर रही है तो इसमें शामिल ही होते। उनको तब भी इसके आधार पर नागरिकता दी जा सकती थी। उस पर किसको विवाद था। ऐसा तो है नहीं की इसके बाद वो बाहर हो जाते। इस पर सरकार का तर्क है की तब इन देशों से आने वाले घुसपैठिये इसका फायदा उठा सकते थे। ये तर्क तो और भी गलत है। क्योंकि कोई भी कानून किसी को उसके आधार पर आवेदन का अधिकार देता है अपने आप नागरिकता नहीं देता। अगर कोई व्यक्ति इसका दुरूपयोग करने की कोशिश भी करे तो भी उसको अदालत में अपनी पात्रता सिद्ध करनी होती है और सरकारी एजेंसियों के पास उसके विरोध का पर्याप्त अवसर होता है। इसलिए तब भी इसके दुरूपयोग की कोई संभावना नहीं थी।
                        सरकार का दूसरा तर्क ये है की इससे किसी की नागरिकता छीनी नहीं जा सकती। इस तर्क को थोड़ा घुमाकर पेश किया जा रहा है। इसका विरोध करने वालों का तर्क है की इसको NRC के साथ जोड़कर पहले से देश में रह रहे मुस्लिमो को संदेहास्पद करार दिया जा सकता है और चूँकि मुस्लिम इस कानून के दायरे में नहीं आते हैं सो उन्हें नागरिकता देने से इंकार किया जा सकता है। पहले से रह रहे मुस्लिमों को संदेहास्पद करार देकर उन्हें नागरिकता विहीन कर देना ही नागरिकता छीनना है। जाहिर है की ये तर्क की ये कानून नागरिकता छीनने के लिए नहीं है अपने आप में गुमराह करने वाला है। इस पर सरकार का ये तर्क की अभी तो NRC का कोई जिक्र ही नहीं है। लेकिन इसका जिक्र तो सरकार खुद संसद के अंदर और बाहर कई बार कर चुकी है और असम में कर भी चुकी है जहाँ उससे बाहर रह गए 19 लाख लोगों में से 5 लाख मुस्लिम इससे सीधे प्रभावित होंगे। उसके बाद विरोध करने वाले लोग सरकार से ये मांग कर रहे हैं की अगर इसको NRC के साथ नहीं जोड़ा जायेगा और सरकार की मंशा साफ है तो सरकार संसद का सत्र बुलाकर स्पष्ट घोषणा करके इस भरम को समाप्त कर सकती हैं। लेकिन सरकार ऐसा नहीं कर रही।
                        इसलिए इसका विरोध करने वालों का ये तर्क प्रभावी हो जाता है की सरकार की मंशा इससे किसी को नागरिकता देने की होती तो वो तो वो तब भी दे सकती थी जब इसमें धर्मों के नाम का उल्लेख न हो , और सरकार की असल मंशा एक धरम के लोगों की बड़ी संख्या को संदेहास्पद घोषित करके उन्हें नागरिकता विहीन कर देने और देश में बड़े पैमाने पर साम्प्रदायिक धुर्वीकरण करके हिन्दू राष्ट्र की तरफ आगे बढ़ने की है। 

Tuesday, October 22, 2019

हरियाणा विधानसभा चुनाव एग्जिट पोल - साजिश है या गलती है ?

           इसमें दोनों संभावनाएं हैं।
एक तरफ देश का एक बड़ा वर्ग ये मानता है की EVM को हैक करके नतीजों को बदला जाता है। उसके हिसाब से पहले भाजपा के नेता सीटों की संख्या का प्रचार करते हैं, फिर मीडिया अपने ओपिनियन पोल और एग्जिट पोल के जरिये उसे वैधता प्रदान करता है और उसके बाद EVM में पहले से फिक्स किये गए नतीजे घोषित कर दिए जाते हैं। इन नतीजों पर कोई सवाल खड़ा न करे इसलिए एग्जिट पोल का उपयोग किया जाता है।
            इस स्थिति का सबसे खराब पहलु ये है की खुद चुनाव आयोग का रवैया इस पर ऐसा रहा है जो भरोसा पैदा करने की बजाय शक पैदा करता है। VVPAT की पर्चियों का मिलान EVM से किया जाये तो इस पर एक हद तक भरोसा पैदा हो सकता था लेकिन केवल भाजपा को छोड़ कर बाकि सभी दलों की न्यूनतम 25 % मशीनो की पर्चियों के मिलान की बात भी चुनाव आयोग ने ठुकरा दी। और इसके लिए बहुत ही लचर तर्क दिया गया की इसमें समय बहुत लगेगा। पहले तो सभी चुनाव बैलेट पेपर से होते थे और उनके रुझान दोपहर तक आने शुरू हो जाते थे और अगले दिन तक सभी नतीजे घोषित हो जाते थे। फिर केवल 25 % मशीनो के मिलान पर आयोग ने कहा की इसमें पांच दिन की देरी होगी जो की हास्यास्पद है। आयोग का ये रुख EVM पर लोगों का भरोसा कम करता है। इसके बाद आयोग ने EVM  पर सवाल उठाने वालों के खिलाफ धाक धमकी का सहारा लिया। सुप्रीम कोर्ट ने भी आयोग को कोई भरोसे लायक निर्देश देने में कोताही की। जबकि होना ये चाहिए था की चुनाव आयोग सभी राजनैतिक दलों के साथ सलाह मशविरा करके कोई रास्ता निकालता ताकि लोगों का भरोसा चुनाव प्रणाली पर बना रहे।
              इसलिए लोग इन एग्जिट पोल को एक साजिश की तरह देखते हैं।
               दूसरी तरफ वो लोग हैं जो EVM में किसी तरह की टैम्परिंग की संभावना को ख़ारिज करते हैं। लेकिन एग्जिट पोल के नतीजों पर हैरान हैं। मेरी हरियाणा चुनाव से सीधे जुड़े बहुत से लोगों से चुनाव से पहले और बाद में राजनैतिक हालात पर चर्चा हुई। इसमें लगभग आधे लोगों का मानना है की भाजपा हरियाणा में हार रही है , और बाकी आधे लोगों का मानना है की भाजपा की सरकार बन सकती है लेकिन बहुमत से नहीं। 90 % लोगों का मानना है की हरियाणा में हंग असेम्ब्ली की संभावना ज्यादा है। लेकिन एग्जिट पोल के नतीजों से वो भी हैरान हैं। एक बार अगर ये मान लिया जाये की एग्जिट पोल के नतीजे किसी साजिश का हिस्सा नहीं है तो फिर क्या ये गणितीय भूल है ?
                 ऐसा हो सकता है। ये किस तरह हो सकता है इसे इस तरह समझिये। मान लो पुरे हरियाणा के स्तर पर कोई एग्जिट पोल के लिए सैंपल इकट्ठे करता है और उसके सैंपलों का परिणाम इस प्रकार आता है - भाजपा 40 %, कांग्रेस 32 % और जजपा 28 % . तो तिकोने मुकाबले में भाजपा की दोनों पार्टियों से 8 से लेकर 12 % तक की बढ़त है। इतनी बड़ी बढ़त के दम पर 75 सीटें लेना बहुत ही आसान है और कोई भी स्टैटिटिक्स का जानकर इससे यही नतीजा निकालेगा।
                  लेकिन अगर धरातल पर सीट बाई सीट कांग्रेस और जजपा की बढ़त अलग अलग है जैसे जिस सीट पर जजपा मजबूत है वहां उसका वोट प्रतिशत 42 -43 % हो जाता है और जहाँ कांग्रेस मजबूत हैं वहां उसका वोट प्रतिशत 40 % को पार कर लेता है और बाकि सीटों पर इन दोनों पार्टियों का वोट प्रतिशत कम रहता है तो भाजपा आराम से हार सकती है। लोग भी यही कह रहे हैं। लोगों का कहना है की जहाँ कांग्रेस का उम्मीदवार मजबूत था वहां भाजपा विरोधी वोटों का धुर्वीकरण उसके पक्ष में हो गया और जहाँ जजपा मजबूत थी वहां उसके पक्ष में। इस तरह के हालात में पुरे प्रदेश के पैमाने पर गिना गया वोट प्रतिशत हमेशा गलत नतीजे देगा। कोई भी सफ़ॉलोजिस्ट बिना एक एक सीट के अलग सर्वे के सही नतीजे नहीं निकाल सकता। इसलिए एग्जिट पोल के नतीजे और असल नतीजे अलग अलग हो सकते हैं। 

Monday, October 21, 2019

व्यंग - रहिये पानीदार अब पाकिस्तान के पानी से।

               बहुत पहले रहीम ने कहा था ,
रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून,
पानी गए न ऊबरै, माटी, मानुस, चून।
लेकिन लोगों में पानी नहीं बचा। जिन लोगों पर पानी का इंतजाम करने का जिम्मा था, उनमे तो बिलकुल ही नहीं बचा। इसलिए सब जगह पानी की लिए त्राहिमाम मचा हुआ है।
इसी बीच प्रधानमंत्री ने घोषणा कर दी की पाकिस्तान से पानी लाएंगे। मीडिया ने नदियां बहा दी जिससे कुछ जगहों में दुबारा बाढ़ आ गयी। बिना मौसम की बाढ़। लोगों को समझ नहीं आ रहा। अरे भाई ये प्रधानमंत्री और मीडिया की लाई हुई बाढ़ है जो कभी भी आ सकती है।
लोग उत्साहित हैं। अब पानी आएगा भले ही पाकिस्तान से आये। एक बूढ़े आदमी ने तो अपने लड़कों को बुलाकर साफ साफ कह दिया की उनके मुंह में गंगाजल की जगह पाकिस्तान का पानी डाला जाये। पहले दो पानी मशहूर थे, एक गंगाजल और दूसरा आबे जमजम। अब तीसरा भी मशहूर हो गया , पाकिस्तान का पानी। किसी भी चीज की कीमत उसके उत्पादन पर होने वाली मेहनत और जोखिम पर आधारित होती है, इस हिसाब से हिंदुस्तान में सबसे कीमती पानी पाकिस्तान का पानी ही हो सकता है।
तो ये पानी मिलेगा कहाँ ?
इसे आप अमेज़ॉन या फ्लिपकार्ट से खरीद सकते हैं। होम डिलीवरी की सुविधा के साथ। अगर आपको भुगतान की परेशानी है तो किस्तें भी बनवा सकते हैं। इससे व्यापार के नए अवसर पैदा होंगे। नए रोजगार पैदा होंगे। अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का कितना आसान रास्ता निकल आया। फालतू में अभिजीत बैनर्जी को नोबल पकड़ा दिया जबकि उसका असली हकदार तो कोई और था।
लेकिन ये पानी आएगा कैसे ? बातचीत से ? शटअप। जब तक आतंकवाद बंद नहीं होता तुम  बातचीत का सोच भी कैसे सकते हो ? जब तक पाकिस्तान से ज्यादा बड़ा इमोशनल मुद्दा दूसरा नहीं मिल जाता बातचीत की कोई संभावना नहीं है। मतलब इसकी कोई संभावना ही नहीं है।
फिर कैसे आएगा पानी ? आएगा और जरूर आएगा। प्रधानमंत्री इसे उसी तरह लाएंगे जैसे प्रोमेथियस स्वर्ग से अग्नि लेकर आया था। प्रधानमंत्री अपने देश के लोगों के लिए कुछ भी कर सकते हैं ट्रम्प के लिए चुनाव प्रचार तक। लेकिन इसमें दो समस्या हैं। पहली ये की कैमरामैन कैसे जायेगा ? अगर कैमरामैन नहीं जायेगा तो प्रधानमंत्री भी नहीं जायेंगे। प्रधानमंत्री तो बिना कैमरामैन के बीच से कचरा तक नहीं उठाते फिर पाकिस्तान से पानी लाने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। दूसरी समस्या ये है की किसी ने उन्हें बता दिया की प्रोमेथियस को दी गयी सजा के तौर पर जब गिद्ध उनका मांस नोच रहा था तो लोग हंस रहे थे। कितने नाशुक्रे लोग हैं, अच्छा है की हमने लोगों के लिए कुछ नहीं किया वरना ये हम पर भी हँसते। अब तो हम इन पर हँसते हैं।
तो फिर कैसे आएगा पानी ?
प्रधानमंत्री की अध्यक्ष्ता में कैबिनेट की मीटिंग में इस पर चर्चा हुई।
सर समस्या ये नहीं है की पानी कैसे आएगा, समस्या ये है की पानी हरियाणा में कैसे आएगा ? क्योंकि पाकिस्तान और हरियाणा के बीच में पंजाब पड़ता है जो पानी को हरियाणा जाने नहीं देगा। पहले भी अकाली एक नहर को रेत से भर चुके हैं।
सर हमे अकालियों को साफ साफ कह देना चाहिए की पानी को हरियाणा जाने दें।
हूँ, लेकिन जब तक अकाली हमारे सहयोगी हैं तब तक प्रकाश सिंह बादल नेल्सन मंडेला हैं, जिस दिन वो हमसे अलग होंगे उस दिन वो भी वैसा ही लुटेरा परिवार हो जायेंगे जैसे बाकि राज्यों में हुआ। लेकिन तब तक कोई दूसरा रास्ता निकालो।
अब अमित शाह ने बोलना शुरू किया तो बाकि लोग पहले ही उनके समर्थन में सर हिलाने लगे।  अमित शाह ने कहा की पंजाब और हरियाणा दोनों को मिलाकर एक केंद्र शासित प्रदेश घोषित कर दो। मैं उससे पहले सबको उठवा लेता हूँ। मीडिया को आदेश दे देते हैं की पाकिस्तान पंजाब में ड्रोन भेज रहा था और हमारे पास पक्की खुफ़िआ सूचना है की वो इन  ड्रोन में परमाणु बम भेजने वाला था।
नहीं, अभी कश्मीर का मामला भी नहीं सुलझा है और मुझे महीने में बीस दिन विदेश में रहना होता है, वहां बहुत मुश्किल होती है।
तभी किसी ने याद दिलाया की हरियाणा का चुनाव तो निपट चुका है अब इस पर माथा पच्ची करने की क्या जरूरत है।
और हम फिर बेपानी रह गए।

Tuesday, October 1, 2019

डरावने आंकड़े आ रहे हैं अर्थ व्यवस्था के।

            पिछले कई क़्वार्टर से अर्थ व्यवस्था बैक गियर में जा रही है। अब ये स्पष्ट हो चूका है की ये गिरावट किसी क़्वार्टर की किसी खास वजह से नहीं है बल्कि एक लगातार जारी ढलान की तरफ और ढांचागत कारणों से है। अब तो इसको लगभग सरकार ने भी मान लिया है भले ही दबी जुबान में सही। लेकिन सरकार और उसके कुछ खास लोगों को अब भी उम्मीद है की ये अपने आप ठीक हो जाएगी। इसके लिए सरकार ने कुछ कदमो की घोषणा भी की लेकिन जानकारों का मानना है की सरकार के कदमो से कॉरपोरेट सैक्टर को आर्थिक लाभ तो मिलेगा लेकिन इन कदमो से बाजार में मांग पैदा नहीं होगी और लिहाजा अर्थ व्यवस्था में कोई सुधार नहीं होगा।
              जानकारों का मानना है की अर्थ व्यवस्था में मंदी लोगों की क्रय शक्ति कम होने के चलते मांग में आयी गिरावट की वजह से है और जिस पर इन कदमो का कोई असर होने वाला नहीं है। फिर भी एक आशावादी तबके को सुधार की उम्मीद है और वो इसका इंतजार कर रहे हैं।
                 लेकिन जब भी अर्थ व्यवस्था से संबंधित कोई भी आंकड़ा सामने आता है तो उसमे बीमारी के बढ़ने के संकेत हैं न की घटने के। अब इस क्रम में जो ताज़ा आंकड़े आये हैं वो तो बहुत ही डरावने हैं। 30 सितम्बर 2019 को जारी आंकड़ों के अनुसार अर्थ व्यवस्था की हालत निम्न अनुसार है।

१. देश का फिस्कल डेफिसिट 5538.40 B  डॉलर हो गया जो पिछले महीने से करीब 62 B डॉलर ज्यादा है।

२. भारत का चालू खाता घाटा -14.30 B डॉलर हो गया जो  पहले -4.60  B  डॉलर था।

३.  भारत का चालू खाता घाटा जीडीपी के -2.00 % हो गया जो पहले -0.70 % था।

४.  भारत का भुगतान संतुलन -46.20  B  डॉलर हो गया जो पिछली अवधी में। 35.20  B  डॉलर था।

५.  सबसे भयानक बात ये की भारत का इंफ्रास्ट्रक्चर आउटपुट -0.5 % हो गया जो 52 महीने का निचला स्तर है और जो पिछली अवधि में 2.7 % था।

            इसका सीधा सा मतलब ये है की औद्योगिक उत्पादन तेजी से गिर रहा है , भुगतान संतुलन बिगड़ रहा है और घाटा बढ़ रहा है। इसका सीधा असर ये होता है की सरकार इ हस्तक्षेप करने की क्षमता घट जाती है और सुधार की उम्मीद फीकी होती चली जाती है। 

Monday, September 30, 2019

Howdy Modi इवेंट की स्पॉन्सर Tellurian से Petronet के समझौते पर उठे सवाल।

 Tellurian वो कम्पनी है जो अमेरिका में मोदी जी के इवेंट की स्पॉन्सर थी। ये कम्पनी अमेरिका में LNG गैस के क्षेत्र में कारोबार करती है। इसकी लम्बे समय से भारत में LNG क्षेत्र में कारोबार करने वाली पेट्रोनेट से गैस खरीद और उत्पादन में करार के लिए बातचीत चल रही थी। लेकिन भारत में LNG की कम मांग और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते कम्पीटिशन के कारण पेट्रोनेट इसमें ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखा रही थी। साथ ही कुछ शर्तों पर भी सहमति नहीं हो पा रही थी।
               लेकिन मोदी जी के इवेंट के स्पॉन्सर करने के बाद दोनों कम्पनियों ने करार पर दस्तखत कर दिए जिसके अनुसार  पेट्रोनेट अमेरिका में 2. 5 बिलियन डॉलर का निवेश करेगी। अभी अमेरिकी चुनाव में राष्ट्रपति ट्रम्प को वहां निवेश की बहुत जरूरत है ताकि अमेरिकी युवाओं को रोजगार मिल सके। इस समझौते पर दस्तखत होते ही भारतीय शेयर बाजार में पेट्रोनेट का शेयर 7 % गिरा। क्योंकि बाजार इसे घाटे का सौदा मान रहा है। ऐसे समय में जब भारत को खुद अपने यहां निवेश की सख्त जरूरत है तो ऐसे समय में उल्टा निवेश देकर आने की बात किसी को गले नहीं उतर रही।
               मोदी जी के इवेंट को एक विदेशी कम्पनी स्पॉन्सर करती है, फिर उसी कम्पनी से व्यापारिक करार होता है और भक्त इसे सेलिब्रेट कर रहे हैं। 

Friday, November 30, 2018

मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनाव के बाद तनाव में क्यों है भाजपा।

मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में वोट डालने का काम खत्म हो चुका है। अब सभी को 11 दिसंबर का इंतजार है। लेकिन चुनाव की समाप्ति के बाद भाजपा के नेता तनाव में दिख रहे हैं। कुछ दिन पहले तक जिन राज्यों को भाजपा के लिए आसान माना जा रहा था, वहां स्थिति बदल चुकी है। कुछ संकेत भाजपा नेताओं को लगातार परेशान कर रहे हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस के खेमे में शान्ति और निश्चिन्तता दिखाई दे रही है। इसकी एक झलक कांग्रेस नेता कमलनाथ के उस जवाब में भी दिखाई देती है। जब उनसे चुनाव के बाद अपना आकलन बताने को कहा गया तो उनका जवाब था, " दो चीजें एकदम आसानी से निपट गयी, एक चुनाव और दूसरी भाजपा। "
                वैसे भाजपा के तनाव की कुछ ख़ास वजहें भी हैं। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ दोनों प्रदेशों में भाजपा 15 साल की एंटी-इंकम्बैंसी से मुकाबिल थी जो किसी के लिए भी चिंता का कारण हो सकती हैं। लेकिन दोनों प्रदेशों में कांग्रेस ने कोई मुख्यमंत्री का चेहरा प्रस्तुत नहीं किया था जिसे भाजपा  अपने लिए फायदे का सौदा मान रही थी। दूसरा उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के प्रचार पर बहुत भरोसा था। लेकिन इस बार कांग्रेस ने मोदीजी को कोई मौका दिया। मोदीजी ने हमेशा की तरह,  मेरी माँ को गाली दी , जैसे वाक्यों में प्रचार को लपेटने की कोशिश जरूर की लेकिन इस बार वो कामयाब नहीं हुए। मोदीजी के जिस करिश्मे का भाजपा को भरोसा था वो इस बार गायब था।
                भाजपा नेताओं की चिंता का दूसरा कारण इस बार किसानो और बेरोजगारी के सवालों का इलेक्शन पर हावी होना था। इस बार हिंदुत्व और गाय जैसे मुद्दों की जगह किसानो की समस्याएं केंद्र में थी। कांग्रेस के कर्जमाफी के वायदे के बाद जिस तरह किसानो ने चुनाव से पहले फसल बेचना बंद कर दिया वो अपने आप में हैरान कर देने वाला है।  जब किसान मंडी में अपनी फसल बेचता है तो फसल की कीमत उसके बैंक खाते में जमा होती है। बैंक इस में से अपनी राशी काट लेता है। इसलिए किसान अपनी फसल लेकर मंडी में ही नहीं जा रहे। वो राज्य में कांग्रेस की सरकार बनने और कर्जमाफी का  इंतजार कर रहे हैं।
               इसके अलावा जो सबसे बड़ा कारण भाजपा नेताओं को चिंता में डाले हुए है वो है 2019  मोदीजी को होने वाली मुश्किल के अनुमान का। असल में चुनाव वाले तीनो भाजपा शासित राज्यों में भाजपा राजस्थान को पहले ही कमजोर मान कर चल रही है। इन तीनो राज्यों में कांग्रेस ने किसी को भी मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित नहीं किया है। अगर इनमे नतीजे भाजपा के खिलाफ आ जाते हैं तो 2019 के चुनाव में उसके सबसे बड़े मुद्दे की हवा निकल जाएगी। ये मुद्दा है मोदी के सामने कौन? लोग ये मान लेंगे की चुनाव जीतने के लिए चेहरा कोई अनिवार्य शर्त नहीं है। यही है भाजपा की चिंता का सबसे बड़ा कारण। 





Wednesday, November 7, 2018

हमारी नई पार्टी का चुनावी घोषणा पत्र

देश के हालात और दुर्दशा से चिंतित होकर हमने एक नई राजनैतिक पार्टी बनाने का निर्णय किया है।  उसके लिए हमने बहुत सोच विचार कर एक घोषणा पत्र तैयार किया है जो आपके सामने प्रस्तुत है। वैसे तो मोदी सरकार ने आखरी छह महीनो में कुछ तेजी दिखाई है और योगी जी ने भी उसमे सहयोग दिया है, लेकिन संत समाज और महा राष्ट्रवादी लोग उससे संतुष्ट नहीं हैं। इसलिए हमने इस काम को जरूरी समझा। हमारे घोषणा पत्र के मुख्य बिंदु निम्न प्रकार से हैं।
१. हमारी पार्टी का नाम " राष्ट्रवादी सनातनवादी पुरातनवादी आर्यवर्तीय पार्टी " होगा।
२. हम हर महीने कम से कम पांच जगहों का नाम बदलेंगे।
३. हम हर प्रदेश में विश्व की सबसे ऊँची प्रतिमा स्थापित करेंगे। इसकी घोषणा प्रदेश अनुसार चुनावों के समय       की जाएगी।
४. बहुमत की आस्था के अनुसार काम को संविधान के दिशा निर्देशक सिद्धांतों में शामिल किया जायेगा।
५. हमने महसूस किया है की पिछले पांच साल में किये गए सभी प्रयासों के बावजूद कुछ संस्थाओं में एकाध           दुष्ट आत्माएँ  अभी भी मौजूद हैं जो समय समय पर सरकार के कामकाज में टांग अड़ाती हैं। इसलिए सभी       ऐसी संस्थाओं जैसे, चुनाव आयोग, रिज़र्व बैंक, मानवाधिकार आयोग, सुचना आयोग इत्यादि का                     संवैधानिक दर्जा समाप्त कर दिया जायेगा।
६. सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति करने वाले कोलेजियम में कोई जज नहीं होगा।
७.  इज आफ डूइंग बिजनेस को बढ़ावा देने के लिए सभी सरकारी स्कूलों और हस्पतालों को बंद कर दिया               जायेगा ताकि नए बिजनेस के अवसर खुल सकें।
८. सरकारी नौकरियों पर पूर्णतया पाबंदी लगाई जाएगी ताकि प्रतिमाओं और धार्मिक आयोजनों के लिए धन        उपलब्ध  हो सके।
९. अगली दिवाली पर अयोध्या में तीन करोड़ दीप जलाए जायेंगे और उसके लिए धन GST पर नया सेस                 लगाकर उगाहा जायेगा।
१०. एक सीमा से ज्यादा पढ़ने लिखने को देशद्रोह घोषित किया जायेगा।
११. भारत रत्न सहित सभी पदम् पुरस्कारों की घोषणा करने वाली समिति में केवल तीन सदस्य होंगे जो संघ,        अखिल भारतीय अखाडा परिषद और गीता प्रेस द्वारा नामित किये जायेंगे।
१२. डार्विन इत्यादि के सिद्धांतों को सेलेबस से हटाया जायेगा।  ये हमारी भावनाओं को आहत करते हैं।
१३. महिलाओं का प्रवेश केवल मंदिरों से ही नहीं, बल्कि संसद और विधानसभाओं में भी प्रतिबंधित किया                 जायेगा।
१४. सभी कृषि विश्वविद्यालयों को गौशालाओं में परिवर्तित किया जायेगा।
१५. सभी सरकारी पदों पर नियुक्तियां वर्ण व्यवस्था के हिसाब से की जाएँगी। 

सभी राष्ट्रवादी नागरिकों से सहयोग की अपील है।


Tuesday, March 20, 2018

इराक में अपहृत भारतीय कामगारों की हत्या और विपक्ष पर राजनीती के आरोप


आज विदेश मंत्री शुष्मा स्वराज ने संसद में ये घोषणा कर दी की चार साल पहले इराक के मोसुल में लापता हुए 39  भारतीय नागरिक मर चुके हैं। ये एक ऐसी घोषणा थी जिसका बहुत से लोगों को पहले से ही अनुमान था। लेकिन अब तक सरकार ये कहती रही थी वो पुख्ता सबूत के अभाव में इन नागरिकों के मारे जाने की पुष्टि नहीं करेगी।
ये लोग मुख्यतया पंजाब से और बाकी शेष भारत के वो गरीब मजदूर थे जो अपने परिवार का पेट पालने के लिए अनजान और खतरनाक जगहों में जाकर मजदूरी करते हैं। इनके द्वारा अपने खून पसीने से कमाई गयी विदेशी मुद्रा सरकार के आंकड़ों की चमक बढ़ाती है। इन सबको विदेश में काम करते हुए जिन विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है उसकी हजारों कहानिया हैं। विपरीत हालत में फंसे देशवासियों की मदद करना सरकारों की नैतिक और क़ानूनी जिम्मेदारी होती है। ये सभी मजदूर एक सरकारी कम्पनी के प्रोजक्ट में काम कर रहे थे और उसी दौरान अमेरिका द्वारा जन्मित, पालित और पोषित ISIS द्वारा उनका अपहरण कर लिया गया और हत्या कर दी गयी।
आज संसद में विदेश मंत्री की घोषणा के बाद जब विपक्ष ने इस पर सरकार से कुछ सवाल पूछे तो सरकार के कुछ मंत्रियों ने विपक्ष पर राजनीति करने का आरोप लगाया। विपक्ष द्वारा ये पूछने पर की सरकार को इनकी मौत की पुष्टि करने में चार साल क्यों लगे, उस पर राजनीति करने का आरोप लगाया गया। पिछले चार साल से इनके परिवार कितनी बुरी हालत में होंगे, कितना मानसिक तनाव झेल रहे होंगे और किन आर्थिक हालात से गुजर रहे होंगे, इस पर सवाल पूछना राजनीति है जो नहीं करनी चाहिए। अगर सरकार समयसर इनकी मृत्यु की घोषणा कर देती या उस पर केवल आशंका ही जाहिर कर देती तो इन गरीबों के परिवार को क़ानूनी तौर पर भी कुछ मुआवजा मिल जाता। लेकिन ये सवाल पूछना तो राजनीति है। अगर विपक्ष किसानो की फसल के भाव और उनकी आत्महत्या पर सवाल पूछ लेता है तो जवाब मिलता है की किसानो पर राजनीति मत करो। अगर विपक्ष छात्रों की फ़ीस और स्कूलों की हालत पर सवाल पूछ लेता है तो जवाब मिलता है की छात्रों पर राजनीति मत करो। अगर विपक्ष सीमा पर रोज मारे जा रहे जवानो पर सवाल पूछ लेता है तो जवाब मिलता है की राष्ट्रिय सुरक्षा के मामले पर राजनीती मत करो। यानि अब राजनीति करने के लिए केवल गाय और गोबर, हिन्दू मुसलमान ही बचे हैं।
सरकार ने कहा है की बिना पुख्ता सबूत के वो किसी की मौत हो जाने की घोषणा नहीं कर सकती , तो पिछले दिनों वायुसेना का एक विमान लापता हुआ था जिसमे हमारे बहुत से सैनिक सवार थे। एक समय के बाद जब उसका कोई पता नहीं चला तो सरकार में उन सैनिकों के मारे जाने की घोषणा कर दी। क्या सरकार बता सकती है की उनकी मृत्यु का कौनसा पुख्ता सबूत उसके पास है ? इस तरह की घटनाएँ बहुत बार होती हैं और उसमे से बहुत सी ऐसी भी होती है जो सरकार के नियंत्रण से बाहर होती हैं। लेकिन उनका सही विश्लेषण करके प्रभावित परिवारों को सहायता पहुंचाना सरकार का काम होता है। और अगर सरकार इसमें असफल होती है और विपक्ष इस पर सवाल पूछता है तो वो उसका काम होता है। इस पर राजनीति करने का आरोप लगाना अत्यंत गैरजिम्मेदार और दुर्भाग्यपूर्ण है।








Sunday, March 11, 2018

व्यंग -- शशि थरूर की मोदीजी के साथ मुलाकात।

   मोदीजी अपने ऑफिस में बैठे फाइल देख रहे हैं। अचानक एक सचिव अंदर आते हैं।
सचिव -- सर , श्रीमान शशि थरूर ने आपसे मिलने का समय माँगा है।
मोदीजी -- किसने ? शशि थरूर ने ? क्यों क्या काम है ? देखो उनका जो भी काम है उसे कर दो। उसे यहां बुलाने की जरूरत नहीं है। किसी भी हालत में उसे यहां नहीं बुलाना।
सचिव -- सर, वो आपसे केवल दस मिनट का समय चाहते हैं।
मोदीजी -- दस मिनट ! क्या मतलब है तुम्हारा ? उसे तो एक मिनट भी नहीं लगेगा। वो कुछ न कुछ ऐसा बोल देगा की हफ्तों लग जायेंगे डिक्शनरी में उसका मतलब ढूढ़ते हुए। मैं कहता हूँ की उससे सेटिंग करो। तुम ऐसा करो किसी गुजराती सचिव को भेजो। वो सैटिंग कर लेगा।
सचिव बाहर चला जाता है। थोड़ी देर बाद एक गुजराती आईएएस अंदर आता है।
मोदीजी - देखो तुम शशि थरूर से बात करो। किसी भी हालत में उससे सेटिंग करो। वो अंदर नहीं आना चाहिए। अगर वो अरनब गोस्वामी वाले केस के बारे में आया हो तो अरनब को फोन करके बोल दो की माफ़ी मांग ले। अगर सुनंदा वाला मामला हो तो उससे कहो की 50 करोड़ की गर्ल फ्रैंड वाली बात तो मैंने मजाक में कही थी। जो भी हो उससे सेटिंग करो।
सचिव बाहर चला जाता है।
मोदीजी परेशानी से फ्लू बदल रहे हैं। अचानक अमित मालवीय से फोन लगाते हैं। हैल्लो अमित, नेट पर जितनी भी इंग्लिश की डिक्शनरियां उपलब्ध हैं सब डाउन लोड कर लो। और तुम्हारे पास जितने भी तेज तर्रार लोग हैं उन्हें तैयार रखो। यहां से तुम्हे जो भी इंग्लिश का शब्द भेजा जाये उसका मतलब जानकर वापिस भेजो। इसमें कोई गलती नहीं होनी चाहिए।
अमित मालवीय - ठीक है सर, लेकिन बात क्या है ?
मोदीजी -- एक बड़ा संकट आ पड़ा है। वो शशि थरूर मिलने आ रहा है। हालाँकि मैंने बाहर की बाहर सेटिंग की जिम्मेदारी लगा दी है, फिर भी अगर सेटिंग नहीं हुई तो वो क्या बोलेगा ये पता लगाने के लिए सारी डिक्शनरियां चाहियेंगी।
अमित मालवीय घबराये हुए -- लेकिन उसके शब्द तो कई बार डिक्शनरी में भी नहीं होते हैं।
मोदीजी -- कुछ भी करो, गूगल करो। मेरे भाषण लिखने के लिए तथ्य चैक करने के लिए भी तो गूगल करते होंगे।
अमित मालवीय -सर, आपके भाषणों में तथ्य कहां होते हैं ? अगर आपके भाषणों में हमने तथ्य लिखने शुरू कर दिए तो बेडा गर्क हो जायेगा और आप केवल माफ़ी मांगते रह जाओगे। हमने तो तीन तीन शब्दों के समूहों का रजिस्टर बनाया हुआ है जैसे भय, भूख और भृष्टाचार ,, चाल, चेहरा और चरित्र ,, नीरव माल्या और चोक्सी।
मोदीजी -- ये नीरव माल्या और चोक्सी किसने लिखा है ?
अमित मालवीय -- सॉरी सर, लगता है विपक्ष का कोई आदमी घुस आया है। मैं चैक करवा लेता हूँ।
मोदीजी - ठीक है, लेकिन अपनी टीम को तैयार रखो।
तभी गुजराती आईएएस अंदर आता है।
मोदीजी एकदम लपकने के अंदाज में -- क्या हुआ बात बनी ?
आईएएस -- नहीं सर, उसने कहा की वो बर्किना फासो को लेकर आपसे मिलना चाहते हैं।
मोदीजी -- बकरी ना फासो , ओह! तो ये कोई बकरी के दूध की डिश है। लेकिन इसके बारे में क्या बात करनी है ? उससे कहो की मैं बकरी का दूध इस्तेमाल नहीं करता। चूँकि गाँधी जी बकरी का दूध पीते थे इसलिए संघ का कोई भी आदमी बकरी के दूध का इस्तेमाल नहीं करता। यहां तक की हमने तो बकरी को मुसलमान घोषित कर दिया है।
आईएएस -सर बकरी ना फासो नहीं, बर्किना फासो।  और ये कोई डिश नहीं है देश है।
मोदीजी - बर $$$ बर्की ,,,,,, ये कैसा देश है ? क्या मैं कभी वहां गया हूँ ? और अगर नहीं गया हूँ तो अब तक मुझे बताया क्यों नहीं। ये छूट कैसे गया ? मैं शासन के मामले में इस तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं कर सकता। इसकी जिम्मेदारी तय करो।
आईएएस -- सर शशि थरूर का क्या करें ?
मोदीजी एकदम रुआँसे होकर -- करना क्या है बुला लो। और तीन चार अंग्रेजी जानने वाले ,मेरा मतलब है अच्छी अंग्रेजी जानने वाले लोगों को पहले यहां मेरे ऑफिस में बिठा दो।
आईएएस -- सर आप तो जानते ही हैं की आपने पूरा पीएमओ गुजरातियों से भर दिया है और उनकी अंग्रेजी कैसी होती है ये भी आप जानते हैं। आप कहें तो वैंकया जी के ऑफिस से कुछ साऊथ के लोगों को बुलवा लूँ ?
मोदीजी -- अब इतना समय नहीं है। कोई उत्तर भारतीय अफसर तो होगा। वैसे दो तीन लोगों को को भेज दो।
            (सारी तैयारी पूरी करने के बाद शशि थरूर को आने के लिए कहा जाता है। )
शशि थरूर दफ्तर में प्रवेश करते हैं और मोदीजी की तरफ मुस्कुरा कर कहते हैं - Nagalkk Sugam Aano ?
मोदीजी -- नागाल्क ? हो गया लोचा। फिर अपने ऑफिस में बैठे ऑफिसर्स की तरफ देखते हैं। तीनो अफसर न की मुद्रा में सिर हिला देते हैं। लैपटॉप में अमित मालवीय की तरफ देखते हैं। अमित मालवीय भी बोलते हैं की किसी डिक्शनरी में ये शब्द मिल नहीं रहा। मोदीजी चेहरे से पसीना पोंछते हुए शशि थरूर से कहते हैं -- शशि थरूर साहब क्या आप हिंदी में बात नहीं कर सकते ? देखिये हिंदी हमारी मातृ भाषा और राष्ट्र भाषा है। और आपको ये विदेशियों की भाषा में बात करने की क्या जरूरत है ?
शशि थरूर -- हिंदी हमारी मातृ भाषा नहीं है, और राष्ट्र भाषा भी नहीं है। और मुझे हिंदी अच्छी तरह नहीं आती है। मैं हिंदी में बात करके मणिशंकर अय्यर नहीं बनना चाहता। वो लो लेवल और नीच के चककर में फंस गया था।
मोदीजी -- नहीं नहीं, वो तो चुनाव का समय था। अब ऐसी कोई बात नहीं होगी।
शशि थरूर -- ये भी चुनाव का समय है।
मोदीजी -- ये भी चुनाव का समय है ? फिर अपने अधिकारी की तरफ देखकर कहते हैं , " अभी चुनाव आयोग में फोन लगा कर मेरी बात करवाओ। उनकी हिम्मत कैसे हुई मुझसे पूछे बिना चुनाव घोषित करने की। " फिर शशि थरूर से पूछते हैं -- अभी कहां का चुनाव है ?
शशि थरूर -- काँग्रेस कार्यसमिति का।
मोदीजी -ओह, मैं समझा किसी राज्य का चुनाव घोषित हो गया। हाँ तो मैं कह रहा था की थरूर साहब आपको हिंदी भी अच्छी खासी आती है फिर ये विदेशियों की भाषा का इस्तेमाल क्यों कर रहे हो ?
शशि थरूर - मोदीजी आप बार बार मलयालम को विदेशी भाषा क्यों कह रहे हैं ? मलयालम कब से विदेशी भाषा हो गयी ?
मोदीजी - तो आप मलयालम बोल रहे थे ? देखिये आप कल आ जाइये। मैं दो तीन मलयालम जानने वालों को बुला लेता हूँ।
               ____ शशि थरूर बाहर चले जाते हैं ----
मोदीजी फिर चेहरे से पसीना पोंछते हुए बड़बड़ाते है -- इस देश को समझने में ही उम्र निकल जाएगी -

Wednesday, February 21, 2018

व्यंग -नीरव मोदी को खींच कर लाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

PNB घोटाले के बाद माननीय गृहमंत्री श्री राजनाथ सिंह का बयान आया है की अगर जरूरत पड़ी तो नीरव मोदी को खींच कर लायेंगे। मैं कहता हूँ की जरूरत नहीं पड़ेगी। ये कोई भूखे नंगों का देश है क्या ? क्यों खींच कर लाएंगे और अपनी बेइज्जती करवाएंगे। बाकी दुनिया हमारे बारे में क्या सोचेगी ? कहेगी, देखो कैसा निर्लज्ज देश है जो इतनी सी बात के लिए खींच कर ले गए। 130 करोड़ की आबादी वाला देश इतना प्रबंध भी नहीं कर सका। कैसे विजय माल्या के बाद हमने मिनिमम बैलेंस ना होने पर चार्ज लगा कर नुकशान की भरपाई कर ली थी। अब हम उसको दुगना कर सकते हैं। वरना 5000 रूपये बैलेंस न होने पर 100 रूपये जुर्माना लगा सकते हैं और होने पर 150 रूपये लगा सकते हैं। कोई भी नहीं बच पायेगा। साथ ही हम ये भी कह सकते हैं की गरीबों की सरकार है। जो गरीब लोग 5000 का बैलेंस नहीं रख सकते उन पर तो केवल 100 रूपये ही लगाया है और जो अमीर लोग रख सकते हैं उन पर 150 लगाया है। सबका साथ सबका विकास।
                 इसके अलावा हमारी एक संस्कृति है परम्परा है जो हमे विश्व गुरु बनाती है। इस तरह की तुच्छ बात के लिए हम अपनी हजारों साल पुरानी परम्परा का त्याग तो नहीं कर सकते। हमने ललित मोदी के लिए ऐसा कह दिया था। बाद में याद आया की मानवता भी कोई चीज होती है सो हमने अपनी परम्परा की इज्जत रख ली। कहने को तो हमने दाऊद इब्राहिम को भी खींच कर लाने की बात कही थी। लेकिन दाऊद ने एक बार भी नहीं कहा की हमे खींच कर ले चलो। सो हम क्या करें? हम किसी को जबरदस्ती तो खींच कर नहीं ला सकते। छोटा राजन ने जरूर हमे कहा की अब मैं दाऊद से बचने के लिए इंतजाम करने की पोजीशन में नहीं हूँ, इसलिए इससे पहले की दाऊद मुझे टपका दे, मुझे खींच कर ले चलो। और हम खींच लाये।
                ऐसा ही मामला हाफिज सईद का है। पाकिस्तान हमे इजाजत ही नहीं दे रहा है की खींच ले जाओ, वरना तो कब का खींच लाते। हमने विजय माल्या को भी खींच कर लाने के लिए मनाने की कोशिश की थी लेकिन उसने भी मना कर दिया। सो हम कोई दूसरा ढूंढ रहे हैं।
                 कुछ लोग तो इतने निर्लज्ज हैं की भागे ही नहीं। यहीं मौज़ कर रहे हैं। सो उनको तो खींच कर ला नहीं सकते। इटली के मरीन सैनिकों के मामले में तो हमारी संस्कृति का पतन होते होते बचा। वो तो अच्छा हुआ की हमने इटली की सरकार की बात मानकर उन्हें वहीं रहने की इजाजत सुप्रीम कोर्ट से दिलवा दी वरना कुछ देशविरोधी तत्व तो उनको भी खींच कर लाने की बात करने लगे थे। जो लोग देश की परम्परा और हमारी महान संस्कृति को नहीं समझते, उनके मुंह लगना हमने छोड़ दिया है।
              हाँ तो हम नीरव मोदी की बात कर रहे थे। सो हम माननीय राजनाथ सिंह को विश्वास दिलाते हैं की उसे खींच कर लाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अरे कुल रकम ही कितनी होती है। जो लोग पूरा दिन एक बार खाना खाकर रहते हैं वो कुछ दिन दो दिन में एक बार खाकर रह लेंगे तो कोई पहाड़ थोड़ा न टूट पड़ेगा। आखिर देश के लिए किसी न किसी को तो क़ुरबानी देनी ही होती है। पिछले दिनों में बैंको ने ढाई लाख करोड़ माफ़ कर दिया , वित्त मंत्री ने बैंको में दूसरा ढाई लाख करोड़ डालने की घोषणा कर दी। हमने दोनों की रक्षा कर ली, घोटालेबाजों की भी और हमारी महान परम्परा की भी। इस देश में अब तक इतने घोटाले हुए, कुछ लोग भाग गए और कुछ लोग यहीं रह गए, लेकिन हमारा कुछ बिगड़ा ? नहीं बिगड़ सकता। आखिर कवि ने ऐसे ही तो नहीं लिखा था की "कुछ बात है की हस्ती मिटती नहीं हमारी " . कवि पहले से जानता था की भले ही गजनवी और गौरी न आएं, भले ही अंग्रेज चले जाएँ, लेकिन हमारे महान देश में लूट की सनातन परम्परा हमेशा जारी रहेगी और हमारा कुछ नहीं बिगड़ेगा। इसलिए हमे नीरव मोदी को खींच कर लाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। 

Sunday, February 18, 2018

व्यंग -- PNB का मोदी और हमारा मोदी

शाम का समय, मोहल्ले के चबूतरे पर हम दस बारह लोग बैठे हुए थे। PNB घोटाला चर्चा का विषय था। तभी सामने से शर्माजी आते हुए दिखाई दिए। सब उनका इंतजार करने लगे। शर्माजी PNB में काम करते हैं। शर्माजी ने भी देख लिया। वो भी निपटने की मुद्रा में आ गए। जैसे ही वो नजदीक आये, एक आदमी बोला,
          क्यों शर्माजी, बैंको में कोई नियम कायदा होता है की नहीं ?
          किसी को भी और कितना ही पैसा यूँ आँख बंद करके दे देते हो। दूसरा बोला।
          कोई गारंटी वारंटी भी लेते हो की नहीं ? तीसरा बोला।
          क्या गारंटी ली थी जो इतना पैसा दे दिया ? चौथा बोला।
शर्माजी उखड़ गए। बोले, तुमने क्या गारंटी ली थी जब पूरा देश दे दिया था ?
          क्या मतलब ? चौथा आदमी बोला।
          मतलब क्या ? हमने एक मोदी पर, उसकी बातों पर भरोसा करके पैसे दे दिए। तुमने भी तो एक मोदी पर भरोसा करके पूरा देश दे दिया। क्या वापिस आया अब तक ? शर्माजी बोले।
          वो तो पंद्रह साल से गुजरात चला रहे थे। पूरा मीडिया वहां के विकास के गुण गा रहा था। पहला आदमी बोला।
            तो वो भी इससे ज्यादा साल से कंपनियां चला रहा था पुरे देश में।  और सारे फ़िल्मी एक्टर उसके साथ फोटो खिंचवाने जाते थे। वो भी कोई ऐरा गेरा नहीं था। शर्माजी ने जवाब दिया।
             लेकिन तुमने साल दो साल उसका व्यवहार देख लिया था तो फिर उसके LOU रिवाइज क्यों किये ? एक आदमी ने प्रतिवाद किया।
             तो तुमने भी तो साल दो साल देख लिया था उसके बाद भी विधानसभाओं में उसके LOU रिवाइज क्यों किये ? शर्माजी पूरी तैयारी में थे।
            लेकिन वो तो अभी बाकी कामों को पूरा करने की कह ही रहे हैं। दूसरा आदमी बोला।
             कहने को तो हमारे वाला भी छह महीने में सारा पैसा चुकाने की कह रहा है, तुम्हारे वाला तो 2022 की बात कर रहा है जबकि उसका समय 2019 में खत्म हो रहा है। शर्माजी ने पलटकर  कहा।
अब किसी को कुछ सूझ नहीं रहा था।
आखिर में हथियार डालते हुए एक आदमी बोला, चलो ये बताओ की रिकवरी के लिए क्या कर रहे हो ?
शर्माजी ने एक लपेटे हुए पोस्टर को खोलकर दिखाया। जिसमे लिखा हुआ था -
                                                       तलाश है नीरव मोदी की
                                               11500 करोड़ बैंक घोटाले के आरोपी
                                 अंतिम बार प्रधानमंत्री मोदीजी के साथ दावोस में देखे गए
            ये क्यों लिख रहे हो। मोदीजी का जिक्र क्यों कर रहे हो। ये तो गलत बात है। एक आदमी ने एतराज किया।
           तो तुम बता दो उसके बाद कहां देखा था वहां का नाम लिख देते हैं। शर्माजी मुस्कुराये।
इतना कह कर शर्माजी आगे चल पड़े और रुक कर बोले, अरे हाँ, तुम चार साल की रिकवरी के लिए क्या कर रहे हो ?

Thursday, February 15, 2018

PNB घोटाले पर सरकार के रुख पर उठते सवाल

                   PNB के 11400 करोड़ के घोटाले पर टीवी पर बहस के दौरान बीजेपी के प्रवक्ता सरफराज आलम ने कहा की ये घोटाला कांग्रेस की देन है और इस पर कांग्रेस को देश से माफ़ी मांगनी चाहिए। उसने ये भी कहा की कांग्रेस के शासन के दौरान पीएमओ से फोन करके बैंको पर दबाव डाल कर बड़े बड़े लोन दिलवाये जाते थे और उनमे कमीशन लिया जाता था।
                     ये आरोप अपनी जिम्मेदारी से पीछा छुड़ाने की नाकाम कोशिश के साथ साथ अपनी भाषा के स्तर पर निहायत घटिया भी है। लेकिन फिर भी अगर इसे सच मान लें, तो भी कुछ सवालों के जवाब बीजेपी को देने ही होंगे। जैसे -
१.  इस तरह कमीशन लेकर दिलवाये गए लोन के अपराध में आपने कितने कांग्रेस नेताओं को पकड़ा ? या आप भी उनसे हिस्से की बात कर रहे थे।
२. हरएक लोन का हर साल नवीनीकरण होता है। इस तरह दिलवाये गए कितने लोन का नवीनीकरण नहीं किया गया ये बात देश को बताइये।
३. अगर PNB के LOU फरवरी 2017 में जारी किये गए तो उनके लिए किसने फोन किया था उसका नाम देश को बताइये।
४. अरुण जेटली ने दावोस के लिए प्रधानमंत्री के साथ गए उद्योगपतियों के समूह के बारे में किये गए ट्वीट में नीरव मोदी का भी नाम है।  ये रिकार्ड की चीज है, तो अब बीजेपी और सरकार उससे इंकार क्यों कर रही है ?
५. RBI के पूर्व निदेशक ने कहा की बैंक का स्विफ्ट SWIFT सिस्टम और CBS सिस्टम finacal आपस में जुड़ा हुआ नहीं था जिसकी वजह से ये घोटाला सम्भव हो सका। सत्यम के केस में भी ठीक यही कहा गया था। फिर इतने दिन तक RBI किस चीज का इंतजार कर रहा था और उसके रैगुलेटर की जिम्मेदारी का क्या मतलब है। अगर उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं है तो पुरे देश के आम आदमी का पैसा बैंको के कर्मचारियों के रहमोकरम पर है।
           ये कुछ सवाल हैं जिनका जवाब मौजूदा सरकार और बीजेपी को देना चाहिए और उसे देना होगा।

               इसके अलावा एक चीज देश की जनता को भी समझनी होगी। जिस तरह से ये सरकार अपनी हर विफलता की जिम्मेदारी पिछली कांग्रेसी सरकारों पर और पिछले 70 सालों पर डालती है उससे ये मौका भी आ सकता है। मन लीजिये किसी ताकतवर देश के साथ कोई युद्ध हो जाता है और उसमे देश को नुकशान उठाना पड़ता है तो सरकार का जवाब ये होगा -
               पिछली सरकारों ने अच्छे हथियार नहीं खरीदे, सैनिको को उचित प्रशिक्षण नहीं दिया गया और सीमा पर इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण नहीं हुआ इस लिए हम युद्ध में कामयाब नहीं हुए।
                देश ये सुनने के लिए तैयार रहे।

Monday, January 22, 2018

देश का भविष्य और गौशाला

कलैक्टर साहब, आपने हमारी स्कूल खोलने के आवेदन को रद्द कर दिया ? भला क्यों ? -- आगंतुक ने ऑफिस में घुसते ही प्रश्न किया।
क्योंकि वो जमीन सरकार की है , और वहां बाजू में आपने जो गौशाला खोली हुई है वो जमीन भी सरकार की है। कलैक्टर ने जवाब दिया।
जमीन सरकार की नहीं राष्ट्र की है। सरकार तो केवल देखभाल करती है। और गाय राष्ट्र माता है। सो अगर  राष्ट्र की माता राष्ट्र की जमीन पर नहीं रहेगी तो कहां रहेगी ? और जहां तक स्कूल की बात है तो बच्चे भी राष्ट्र का भविष्य हैं इसलिए राष्ट्र की जमीन पर स्कूल खोलना हमारा हक है। आगन्तुक ने जवाब दिया।
लेकिन आपको गौशाला के बाजू में ही स्कूल क्यों खोलना है ? कलैक्टर ने पूछा।
क्योंकि अगर स्कूल गौशाला के बाजू में रहेगा तो गाय के गौबर को बच्चों के दिमाग में लीपने में आसानी रहेगी। हम नहीं चाहते की आने वाली पीढ़ियाँ भी आपकी तरह बेहूदा सवाल पूछें।
और कलैक्टर ने देश के भविष्य का ख्याल करते हुए इजाजत दे दी।


Tuesday, December 5, 2017

क्या कांग्रेस के फार्मूले से मिल सकता है पाटीदारों को आरक्षण ?


गुजरात चुनाव में सबसे अहम मुद्दा पाटीदार आरक्षण और हार्दिक पटेल बन गए हैं। कांग्रेस और बीजेपी, दोनों का प्रचार इस मुद्दे पर लगभग केंद्रित है। गुजरात में पिछले लगभग तीन साल से पाटीदार समुदाय आरक्षण के लिए आंदोलन कर रहा है। इस आंदोलन में वैसे तो कई संगठन शामिल रहे हैं, लेकिन हार्दिक पटेल के नेतृत्व वाला PAAS इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण संगठन है। आरक्षण आंदोलन के दौरान पाटीदारों पर हुए अत्याचार और उस दौरान बने सैंकड़ो केस इसमें आरक्षण के अतिरिक्त मांगों में जुड़ते रहे हैं।
               चुनाव की घोषणा होने के बाद PAAS और हार्दिक पटेल के भजपा विरोधी रुख के कारण गुजरात की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने उनके साथ आरक्षण सहित उनकी मांगो पर बातचीत शुरू की। गुजरात में राजनैतिक रूप से बहुत प्रभावशाली माना जाने वाला और अब तक बीजेपी के साथ रहा पाटीदार समुदाय बीजेपी को छोड़कर कांग्रेस के साथ चले जाने की संभावनाओं को देखते हुए बीजेपी ने भी अपनी सियासी चालें चलनी शुरू की। इस क्रम में उसने हार्दिक पटेल पर कांग्रेस का एजेंट होने और आंदोलन को राजनितिक मोहरा बनाने का आरोप लगाया। उसने हार्दिक के साथ रहे कुछ लोगों को हार्दिक से अलग होकर बीजेपी के समर्थन में लाने में सफलता भी प्राप्त की। साथ ही उसने पटेल समुदाय के धार्मिक और सामाजिक संगठनों के कुछ लोगों से हार्दिक के खिलाफ बयान भी दिलवाये। हालाँकि खोडलधाम और उमिया माता ट्रस्ट जैसे बड़े और पाटीदार समुदाय पर भारी प्रभाव रखने वाले संगठनों ने सीधे राजनैतिक बयानबाजी नहीं की।
                   इसी बीच कांग्रेस और हार्दिक पटेल के बीच आरक्षण को लेकर एक फार्मूले को लेकर सहमति बन गयी। इस फार्मूले को बनाने में वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और उच्चतम न्यायालय के वकील कपिल सिब्बल ने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। उसके साथ ही बीजेपी और हार्दिक विरोधियों ने इसे आँखों में धूल झोंकने का प्रयास बताया। इस पर बहस तेज हो गयी। बीजेपी ने दावा किया की 50 % से ज्यादा आरक्षण किसी भी हालत में सम्भव नहीं है। और इस तरह कोई भी आश्वासन धोखाधड़ी है। हालाँकि बीजेपी की राज्य सरकारें अब तक हरियाणा और राजस्थान में इसके नोटिफिकेशन जारी कर चुकी हैं। खुद गुजरात सरकार भी 50 % से ऊपर EBC कोटे में 10 % आरक्षण का नोटिफिकेशन जारी कर चुकी है। हालाँकि ये सभी नोटिफिकेशन विभिन्न न्यायालयों द्वारा रद्द किये जा चुके हैं। लेकिन बीजेपी ने ये स्वीकार किया है की उसके द्वारा जारी किये गए ये तमाम नोटिफिकेशन वहां की जनता के साथ की गयी धोखाधड़ी थे। उसके बाद कांग्रेस और हार्दिक पटेल ने लगातार ये दावा जारी रखा है की 50 % से ज्यादा आरक्षण सम्भव है और वो इसे लागु करके दिखाएंगे।
                      इस मुद्दे के संवैधानिक प्रावधानों और क़ानूनी पहलुओं की जाँच की जाये तो वो इस प्रकार है। -
संविधान में सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े समुदायों को आरक्षण दिए जाने की इजाजत दी गयी है। लेकिन उसमे किसी भी तरह की संख्या का जिक्र नहीं है। सरकारों द्वारा आरक्षण दिए जाने और मण्डल कमीशन के बाद OBC को 27 % आरक्षण दिए जाने के बाद हमारे देश में आरक्षण की सीमा 50 % तक पहुंच गयी। उसके बाद अलग अलग राज्यों में विभिन्न समुदाय आरक्षण की मांग करते हुए आंदोलन करने लगे। जिसमे कई बार राजनैतिक फायदा हासिल करने के लिए विभिन्न राजनैतिक पार्टियों ने भी उसमे योगदान दिया। लेकिन उनके द्वारा जारी किये गए वो सभी नोटिफिकेशन, जिसके कारण आरक्षण की सीमा 50 % से ऊपर हो जाती है, न्यायालयों में टिक नहीं पाए। असल में 2007 में इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 % निर्धारित कर दी। इसी फैसले का हवाला देकर बार बार 50 % की सीमा का जिक्र किया जाता है।
                   सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को ध्यान से देखा जाये और इंदिरा साहनी केस में भी सुप्रीम कोर्ट ने विशेष परिस्थितियों में इस सीमा से ज्यादा आरक्षण दिए जाने की बात कही है लेकिन उसके लिए कई तरह की प्रक्रियाओं के पालन और संसद से प्रस्ताव पास करके उसे संविधान की नौवीं अनुसूची में डाले जाने जैसी बातें शामिल हैं। सवाल ये है की पुरे देश में आरक्षण के विरोधी और इन नोटिफिकेशनो को चुनौती देने वाले लोगों का क्या कहना है। इनमे एक तरफ सामान्य श्रेणी में आने वाले लोग शामिल हैं जो 50 % से ऊपर आरक्षण को अपने मौलिक अधिकारों का उलंघन मानता है और शिक्षा और रोजगार के समान अवसरों के खिलाफ मानता है। न्यायालय भी 50 % से ऊपर आरक्षण को सामान्य और अनारक्षित श्रेणी से आने वाले लोगों के मौलिक अधिकारों के खिलाफ मानता है। दूसरी तरफ वो लोग हैं जो किसी न किसी आरक्षित श्रेणी में शामिल हैं और उन श्रेणिओं में नई जातियों को शामिल किये जाने को अपने अधिकारों के खिलाफ मानते हैं। इसके लिए उच्चतम न्यायालय ने एक प्रक्रिया निर्धारित कर दी है। इस प्रक्रिया में अगर कोई जाती OBC इत्यादि किसी श्रेणी में शामिल किये जाने की मांग करती है तो उसे संबंधित आयोग में आवेदन करना होगा, जिसके बाद आयोग सर्वे करके निश्चित मानदंडों के आधार पर ये तय करेगा की क्या उस जाती का सामाजिक और आर्थिक स्तर उस कटैगरी में शामिल किये जाने के योग्य है या नहीं। पाटीदार समुदाय इस आधार पर OBC में शामिल किये जाने वाले मापदण्डों पर खरा नहीं उतरता है। इसलिए उसके सामने केवल एक ही रास्ता है की किसी तरह आरक्षण की सीमा को 50 % से बढ़ाकर उसे आरक्षण दे दिया जाये।
               कांग्रेस का फार्मूला ----
                                                 कांग्रेस और हार्दिक पटेल के बीच जिस फार्मूले पर सहमति हुई है वो इस प्रकार है। कांग्रेस का कहना है की एक सर्वे करके सामान्य वर्ग के अनारक्षित वर्ग के गरीब लोगों की संख्या का पता लगाया जाये। फिर उनके लिए 20 % या (सर्वे के नतीजों के अनुसार थोड़ा कम ज्यादा ) आरक्षण का प्रावधान किया जाये। इसमें सभी अनारक्षित जातियों को शामिल किया जाये और OBC की तरह एक क्रीमी लेयर तय कर दी जाये। जब ये प्रक्रिया पूर्ण हो जाये तो संसद में प्रस्ताव पास करके इसे संविधान की नौवीं अनुसूची में डाल दिया जाये। कांग्रेस का तर्क ये है की इस फार्मूले के अनुसार चूँकि आरक्षित जातियों के आरक्षण की संख्या में कोई परिवर्तन नहीं हो रहा है तो उनकी तरफ से इसे चुनौती नहीं दी जा सकती। दूसरी तरफ सामान्य और अनारक्षित श्रेणी के लोगों के अधिकारों पर भी इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि इस फार्मूले द्वारा आरक्षण पाने वाले लोग भी उसी श्रेणी से आते हैं। साथ ही जो लोग आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग करते रहे हैं, उन्हें भी इस पर कोई एतराज नहीं होगा। साथ ही चूँकि ये सारा काम सर्वे इत्यादि की एक पारदर्शक प्रक्रिया के द्वारा पूरा किया जायेगा और इससे किसी भी दूसरे वर्ग के अधिकारों में छेड़खानी नहीं की जा रही है, सो इसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी सहमति दिलवाई जा सकती है। इस फार्मूले से न केवल पाटीदार आंदोलन, बल्कि अलग अलग राज्यों में चल रहे जाट आरक्षण, मराठा आरक्षण या फिर गुर्जर आरक्षण आंदोलनों का भी समाधान हो सकता है।
   हार्दिक विरोधियों का रुख ---
                                             चुनाव के दौरान जो लोग हार्दिक पटेल पर पर समाज के साथ गद्दारी करने का आरोप लगाने वाले लोगों का एक तरफ तो ये कहना है की हार्दिक को पुराने फार्मूले का अनुसार आरक्षण की मांग पर कायम रहना चाहिए, वरना इसे समाज से गद्दारी माना जायेगा, दूसरी तरफ उनका खुद ही ये भी कहना है की पुराने फार्मूले के अनुसार आरक्षण सम्भव ही नहीं है। इसका मतलब ये हुआ की उनकी माने तो या तो हार्दिक पटेल को आरक्षण का आंदोलन खत्म करके घर बैठ जाना चाहिए, या फिर एक ऐसी मांग के लिए लड़ते रहना चाहिए जो खुद उनके अनुसार ही सम्भव नहीं है।
हार्दिक पटेल का रुख ----
                                      इस मामले में हार्दिक ने कांग्रेस के साथ जिस फार्मूले पर सहमति जताई है उसके हिसाब से पाटीदार समुदाय के गरीब लोगों को आरक्षण मिल सकता है। और इसे लागु करने की प्रक्रिया में संसद इत्यादि में पास करवाए जाते समय किसी भी राजनैतिक पार्टी के लिए इसका विरोध आसान नहीं होगा। 

Sunday, November 19, 2017

गुजरात चुनाव का हिसाब किताब केवल 5 % स्विंग से बदल सकता है

              जितनी निगाहें इस बार के गुजरात चुनाव के ऊपर लगी हुई हैं उतनी शायद ही किसी राज्य के विधानसभा चुनाव पर लगी हों। इसका एक कारण गुजरात में पाटीदार आंदोलन के चुनाव पर असर को जानने की उत्सुकता भी है और GST के बाद गुजरात के व्यापारियों के मूड को देखने की उत्सुकता भी है।
                  इस बात में कोई दो राय नहीं हैं की GST के कारण व्यापारियों का एक बड़ा तबका सरकार से नाराज है। सूरत में खासकर टेक्सटाइल से जुड़े व्यापारी खासे नाराज हैं। इसका एक कारण तो GST नेटवर्क की मुश्किलियाँ भी हैं और दूसरी तरफ टेक्सटाइल पर GST का मौजूदा स्वरूप उसके आधारभूत तर्क के ही खिलाफ है। अबाधित इनपुट क्रेडिट को टेक्सटाइल के मामले में लागु नहीं किया गया है। इसलिए लोगों को इस बात की उत्सुकता है की व्यापारी अपनी नाराजगी वोट के वक्त जाहिर करते हैं या नहीं।
                पिछले एक महीने में बहुत से लोगों से इस बारे में बातचीत हुई। इसमें दो विरोधी चीजें निकल कर सामने आयी। पहली ये की हर आदमी ये मानता है की लोग सरकार से नाराज हैं। दूसरी बात ये की लोगों को इस बात का अंदेशा है की जीत तो बीजेपी की ही होगी। इसके बारे में लोगों का कहना है की प्रधानमंत्री मोदी चुनाव के आखरी दौर में कुछ न कुछ ऐसा मुद्दा निकाल कर ले आएंगे की लोग बीजेपी को वोट कर देंगे। दूसरी बात जो लोग कहते हैं वो ये है की पूरे मीडिया में केवल बीजेपी ही दिखाई देती है बाकी कुछ दिखाई ही नहीं देता। एक और बात लोग कहते हैं की बीजेपी इस चुनाव को मोदी और राहुल के बीच भाषण प्रतियोगिता में बदल देगी और लोग मोदीजी के भाषण पर तालियां बजाते हुए बीजेपी को वोट कर देंगे। लेकिन इसमें एक विरोधी बात भी निकल कर आयी।
                   जब मैंने लोगों से ये पूछा की पिछले तीन चुनावों के दौरान बीजेपी और कांग्रेस के बीच वोटों का अंतर् लगभग 9 % का रहा है। और ये तीनो चुनाव एकतरफा माने जाते थे। अगर केवल 5 % वोट की स्विंग बीजेपी से कांग्रेस के पक्ष में हो जाती है तो बाजी पलट सकती है और बीजेपी हार सकती है। इस पर लोगों की प्रतिक्रिया आश्चर्यजनक थी। लोगों का कहना था की क्या वाकई में पांच प्रतिशत से बाजी पलट सकती है ? फिर वो कहते की इस बार स्विंग तो पांच प्रतिशत से ज्यादा होगी। अगर इतनी ही स्विंग से बीजेपी हार सकती है तो इस बार उसके हारने के चान्स ज्यादा हैं।
                   असल में मीडिया की एकतरफा कवरेज ने लोगों की सोचने समझने की शक्ति और सही जानकारी होने की क्षमता को भारी नुकशान पहुंचाया है। इसका असर बीजेपी के विरोधियों पर ही नहीं बल्कि उसके समर्थकों पर भी पड़ता है और उन्हें चारों तरफ हरा हरा ही नजर आने लगता है और नतीजे इण्डिया शाइनिंग जैसे आ सकते हैं। गुजरात चुनाव में मुकाबला केवल ये है की क्या कांग्रेस अपने पक्ष में केवल पांच प्रतिशत की स्विंग करवा सकती है नहीं। और इस बार के हालात  देखकर ये बहुत सम्भव लगता है और इसे हर आदमी स्वीकार करता है। 

Saturday, November 18, 2017

Moody.s की रेटिंग और उसके पीछे का सच।

        जबसे मूडीज ने भारत की रेटिंग बढ़ाई है, पूरी सरकार और उसके टीवी चैनल उस पर लगातार कार्यक्रम किये जा रहे हैं। मूडीज, एस&पी, और फिच जैसी संस्थाएं पूरी दुनिया में सरकारों और वित्तीय संस्थानों की रेटिंग जारी करती रहती हैं जिससे देशी विदेशी निवेशकों को वहां के माहौल की जानकारी मिल सके। लेकिन जब ये एजेंसियां किसी देश की रेटिंग कम करती हैं तो वहां की सरकार उस पर सवाल उठाती हैं, उनके रेटिंग के तरीके में दोष निकालती हैं। और जब रेटिंग बढ़ती है तो पुरे जोर शोर से उसका श्रेय लेती हैं। लेकिन क्या ये एजंसियां वाकई किसी देश की सही रेटिंग जारी करती हैं? या ये इसको manipulate भी करती हैं ?
            इसके बहुत से उदाहरण हमारे सामने हैं जिनमे इन एजेंसियों पर manipulation के आरोप लगे हैं। खुद Moody,s पर जर्मनी, UK और अमेरिका में manipulation के लिए भारी भरकम जुर्माने लगे हैं। Moody,s पर तो अमेरिका में ऐसी सिक्योरिटीज को अच्छी रेटिंग देने के आरोप लगे हैं जो असल में कोई कीमत ही नहीं रखती थी और उन्ही सिक्योर्टीज के कारण 2008 का संकट पैदा हुआ था, जिसके बाद Moody,s पर अमेरिका में केस चला और जिसे निपटाने के लिए Moody,s को लाखों डालर देकर उसे अदालत से बाहर निपटाना पड़ा।
              ये एजेंसियां रेटिंग तय करने की फ़ीस लेती हैं। इसलिए ये आरोप भी लगते रहे हैं और साबित भी होते रहे हैं की विश्व की कुछ वित्तीय संस्थाएं अपना घटिया मॉल ( बांड्स इत्यादी ) बेचने के लिए इन एजेंसियों का सहारा लेती हैं।
                लेकिन इससे अलग भी, अगर ये सही पैमानों का इस्तेमाल करके भी रेटिंग जारी करती हों तो उसका क्या मतलब होता है ये समझना बहुत जरूरी है। इनकी रेटिंग का अर्थ होता है की किसी देश के कानून और व्यवस्था वहां मुनाफाखोरी और वित्तीय संस्थाओं के प्रति कितने उदार हैं। अगर किसी देश में अन्य चीजों के साथ इन कंपनियों को मुनाफा कमाने और उसे लेजाने के अबाधित रास्ते उपलब्ध हैं तो उसकी रेटिंग ज्यादा ऊँची होगी। इसके कुछ उदाहरण निम्न प्रकार से हैं -
१.  अगर किसी देश की सरकार किसानो को न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी करती है और उसे सही तरीके से लागु करती है तो उसकी रेटिंग कम हो जाएगी क्योंकि ये एजंसियां उसे मुक्त व्यापार के रास्ते में रुकावट मानती हैं।
२.  इसी तरह अगर किसी देश में सख्त श्रम कानून हैं और सरकार सामाजिक सेवाओं पर ज्यादा पैसा खर्च करती है तो उसकी रेटिंग भी कम हो जाएगी। जैसे अगर सरकार स्कूलों और हस्पतालों पर पैसा खर्चना बंद करके उन्हें प्राइवेट कर दे तो उसकी रेटिंग बढ़ जाएगी।
३.  इसी तरह अगर सरकार कंपनियों को करों में छूट देती है और आम आदमी पर करों का बोझ बढ़ाती है तो उसकी रेटिंग ज्यादा रहेगी।
               इसलिए इन एजेंसियों की ऊँची रेटिंग किसी देश की जनता के जीवन स्तर को तय नहीं करती, अलबत्ता वहां मुनाफा कमाने की कितनी सहूलियत है इसको प्रतिबिम्बित करती है। इसलिए इन एजेंसियों की बढ़ती हुई रेटिंग पर खुश होने के लिए आम आदमी के पास कोई कारण नहीं होता है। 

Wednesday, November 15, 2017

सवाल जवाब - लघु कविता

एक समय आएगा
जब
कोई सवाल नहीं पूछा जायेगा,
क्योंकि
सारे सवाल खत्म हो चुके होंगे
तब तुम
हकलाते हुए,
थूक निगलते हुए
वो जवाब देने की कोशिश करोगे
जो
तुम्हारे पास कभी नहीं था। 

Tuesday, November 14, 2017

चाकू मारने के तर्क और भारतीय टीवी चैनलों पर बहस।

              शहर के मुख्य चौराहे पर एक आदमी ने दूसरे को चाकू घोंप दिया। लोगों ने उसे पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया। ये घटना शहर में चर्चा का विषय बन गयी। चाकू मारने वाला सत्ताधारी पार्टी से जुड़ा हुआ था और जिसे चाकू लगा वो एक आम आदमी था। लोगों को कारण समझ में नहीं आ रहा था।
                 थोड़ी देर बाद पुलिस ने प्रैस कॉन्फ्रेंस करके कहा की चाकू मारने वाले ने कहा है की उसने चाकू इसलिए मारा की सामने वाला बहुत मोटा हो गया था और मोटापे की वजह से उसको गंभीर बीमारियां होने का खतरा था। इसलिए उसने उसकी मदद करने के लिए उसे चाकू मारा ताकि उसका वजन कुछ कम हो सके। पुलिस ने ये भी कहा की पुलिस सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर अपनी जाँच करेगी। वह ये पता लगाने के लिए की इस तरह चाकू मारने से उसका कितना वजन कम हो सकता है, विशेषज्ञों की मदद भी लेगी।
                उसके बाद तीन दिन से लगातार टीवी पर इस मामले में चर्चा चल रही है की क्या वजन ज्यादा होना और मोटा होना सचमुच हानिकारक है। शहर के सभी हस्पतालों से एक एक डाक्टर सभी चैनलों पर बैठा है जो ये बताने के साथ की मोटापा कितना हानिकारक है और उसकी वजह से कितनी बीमारियां हो सकती हैं, ये भी बताता है की उसके हस्पताल में मोटापा दूर करने के लिए कौन कौन सी सुविधाएँ उपलब्ध हैं। 

Thursday, September 21, 2017

अर्थव्यवस्था को सम्भालने के बहुत कम विकल्प बचे हैं सरकार के पास।

                   पिछले क्वार्टर के जीडीपी के आंकड़े 5 . 7 % आने के बाद भले ही अमित शाह इसको टेक्निकल कारण बता रहे हों, लेकिन सरकार को मालूम है की स्थिति वाकई गंभीर है। ये लगातार छठी तिमाही है जिसमे जीडीपी की दर लगातार गिरी है। लेकिन अब तक सरकार इसके लिए अपनी नीतियों को जिम्मेदारी देने के लिए तैयार नहीं है। जबकि सारी दुनिया के अर्थशास्त्री मानते हैं की सरकार द्वारा लिए गए लगातार गलत फैसलों की वजह से ही जीडीपी गिर रही है।
                    सबसे पहले नोटबंदी ने अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ दी। नोटबंदी का सबसे ज्यादा नुकशान गांवों और दूरदराज के इलाकों पर हुआ। नगदी की कमी के कारण असंगठित क्षेत्र के रोजगार समाप्त हो गए। उसके कारण सब्जियों और दूसरे कृषि उत्पादों की कीमतें एकदम गिर गयी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार ही ये कमी 25 % से ज्यादा है। इसके कारण दो साल से लगातार सूखे की मार झेल रहे किसानो की हालत बद से बदतर हो गयी। दूसरी तरफ सरकारी और गैरसरकारी नौकरियों के अवसर लगभग समाप्त हो गए जिससे ग्रामीण क्षेत्र को जो सहारा मिलता था वो भी खत्म हो गया। उसके साथ ही खेती के बाद इस क्षेत्र में दूसरी जो चीज बड़े पैमाने पर रोजगार उपलब्ध करवाती है वो है पशुपालन। सरकार के पशुओं के खरीद बिक्री के नियमो में किये गए फेरफार ने सीमांत किसानो के लिए ये भी घाटे का सौदा बन गया। थोड़ी बहुत जो कसर बाकी बची थी वो गोरक्षकों के नाम पर जारी गुंडागर्दी ने पूरी कर दी। इसका सीधा असर चमड़े के उत्पादन और व्यापार पर पड़ा। जिससे समाज के बिलकुल निचले तबके के गरीब लोगों के रोजगार समाप्त हो गए। और आज हालत ये है की ग्रामीण क्षेत्र, जो हमारे देश की अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ी भूमिका रखता है भारी मंदी का शिकार हो गया।
                  उसके बाद जो क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है, चाहे रोजगार देने का मामला हो या उत्पादन का, वो है लघु उद्योग और रिटेल व्यापार। ये दोनों मिलकर देश में सबसे ज्यादा लोगों को रोजगार मुहैया करवाते हैं। लेकिन सरकार के GST लागु करने के फैसले और उसके बाद इसे लागु करने के तरीके ने इन दोनों क्षेत्रों की कमर तोड़ दी। इस तरह जहां जहां भी विकास की गुंजाइश थी हर तरफ हमला किया गया। लोग पहले हमले से सम्भल भी नहीं पाते की तुरंत दूसरा हमला हो जाता। और सबसे बड़ी बात ये की सरकार में कोई भी ये मानने को तैयार नहीं की कोई समस्या है। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने तो अर्थव्यवस्था के नकारात्मक आंकड़ों को टेक्निकल कारणों की वजह से आया बता दिया।
                    लेकिन अब वित्तमंत्री अरुण जेटली के बयान के बाद लगता है की सरकार को कम से कम इतना तो पता है अर्थव्यवस्था में सचमुच कोई गिरावट है। लेकिन सवाल यह है की सरकार के पास इस स्थिति में हस्तक्षेप करने की कितनी गुंजाइश और दिशा मौजूद है।
                    साल की तीसरी तिमाही के एडवांस टैक्स के आंकड़े उम्मीद से कम हैं। GST के बाद टैक्स क्लैक्शन के जो आंकड़े पहले बताये जा रहे थे अब उन पर सवाल उठ रहे हैं। कुल 95000 करोड़ की क्लैक्शन के सामने 65000 करोड़ इनपुट टैक्स क्रेडिट का क्लेम है और बड़ी कंपनियों ने अब तक क्लेम का दावा भी पेश नहीं किया है। इसके बाद सरकार की नींद उड़ी हुई है। सरकार के बड़े अधिकारीयों के ऑफ़ दा रिकार्ड बयान आ चुके हैं की कम कलेक्सन के कारण खर्च में कटौती करनी पड़ सकती है। CAD एक झटके में बढ़कर २. ६ % हो गया है और साल के अंत तक इसके 3. 6 %  पहुंचने आसार है। सरकार का बजट  में घोषित खर्च अपनी 94 % के स्तर पर पहुंच चूका है।
                     इन हालात को देखते हुए सरकार के पास बहुत सीमित विकल्प मौजूद हैं। और जो विकल्प मौजूद हैं तो क्या सरकार उन्हें अपनाने का साहस दिखाएगी। पिछले तीन साल से अर्थव्यवस्था सरकारी इन्वैस्टमैंट पर ही चल रही थी। प्राइवेट सेक्टर पहले ही अपनी क्षमता से कम पर चल रहा था सो उसमे किसी नई इन्वैस्टमैंट की उम्मीद ही नहीं थी। अब प्राइवेट सेक्टर की क्षमता और घटकर 70 % पर आ गयी है इसलिए एकमात्र सहारा सरकारी निवेश का ही बचा है। दूसरी तरफ लोगों को सहायता की तुरंत जरूरत है। लेकिन जिस तरह उच्चस्तरीय बैठक के तुरंत बाद वित्तमंत्री ने बयान दिया है की तेल की कीमतों में कोई कटौती नहीं होगी, उसे देखते हुए लगता नहीं है की सरकार लोगों को कोई राहत देगी। उल्टा कुछ लोगों को शक है की सामाजिक योजनाओं में कटौती हो सकती है। मनरेगा जैसी योजनाओं में कटौती हो सकती है, और नौकरियों पर बैन को बढ़ाया जा सकता है। अगर सचमुच में ऐसा होता है तो ये इलाज भी बीमारी से भयानक हो सकता है। अगर लोगों के पास खरीद शक्ति नहीं होगी तो मंदी के सर्कल से बाहर निकलना असम्भव हो जायेगा।