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Thursday, September 10, 2015

लोकतंत्र की उलटी गिनती शुरू

            बीजेपी के मातृ संगठन आरएसएस का विश्वास कभी भी लोकतंत्र में नही रहा। इसलिए वो अपने सारे आदर्श राजतंत्र में ढूंढती है। यहां तक की जब नेपाल में राजतंत्र को खत्म करके लोकतंत्र की स्थापना हुई तो आरएसएस ने इस पर नाखुशी और चिंता जाहिर की थी। आरएसएस जिन तबकों का प्रतिनिधित्व करता है उनमे सामंती और साम्प्रदायिक तबकों का बहुमत है। इसलिए वो हमेशा लोकतान्त्रिक संस्थाओं के खिलफ रहता है और जब भी मौका मिलता है उन पर हमला करता है। वो अलग बात है की हमला करते वक्त वो कोई दूसरा बहाना बनाता है। वो समान सिविल कानून की बात करता है लेकिन हर आदमी को अपनी पसंद के अनुसार भोजन, पहनावा, भाषा और रहन सहन  की आजादी के खिलाफ है। उसके लिए समान कानून का मतलब है सब कुछ उसके अनुसार।
       हरियाणा का कानून -------
                                                   अभी-अभी हरियाणा की बीजेपी शासित सरकार ने स्थानीय संस्थाओं के चुनाव के लिए खड़े होने वाले उम्मीदवारों के लिए कुछ शर्तें लगा दी। जाहिर है की ये उनके लोकतान्त्रिक अधिकारों पर हमला था इसलिए कुछ लोगों ने उसे उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगाते हुए सरकार को नोटिस जारी कर दिया। सरकार को मालूम था की वो इसे न्यायालय में सही साबित नही कर पायेगी तो उसने इसका कानून विधानसभा में सारे विपक्ष के विरोध के बावजूद पास करवा दिया और रात को ही उसे राजयपाल से मंजूरी दिलवा कर सुबह चुनाव आयोग से चुनावों की घोषणा  करवा दी। ये सारा काम इतनी जल्दी में इस तरह प्लान किया गया की किसी को फिर से इसे न्यायालय में चुनौती देने का समय न मिले।
कानून का असर ---------------
                                               इस कानून में चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों पर न्यूनतम शिक्षा प्रमाणपत्र की शर्त लगा दी। हालाँकि इस तरह की शर्त साफ तौर पर एक बड़े तबके को चुने जाने से रोकने के लिए ही लगाई गयी है और खुल्ल्म खुल्ला उनके लोकतान्त्रिक अधिकारों के खिलाफ है। इस शर्त का असर ये हुआ की चुनाव लड़ने की इच्छुक सामान्य श्रेणी की 72 % और अनुसूचित जाती की 82 % महिलाये इससे बाहर हो गयी। इसी तरह बहुत से पुरुष उम्मीदवार भी चुनाव लड़ने के अयोग्य हो गए।
एक व्यक्ति-एक वोट का सिद्धांत ---------
                                                              पूरी दुनिया में हर आदमी को वोट देने का अधिकार हमेशा से नही था। पहले तो राजा की संतान ही राजा होती थी। उसके बाद जब इस व्यवस्था को पलट दिया गया तब उच्च स्थिति वाले तबकों ने आम जनता को वोट के अधिकार से वंचित रखने के लिए, वोट के अधिकार के लिए एक न्यूनतम सम्पत्ति होने, या फिर न्यनतम शिक्षा प्राप्त होने की शर्त लगा दी। इससे जनता का बहुमत वोट के अधिकार से बाहर हो गया और घूमफिर कर सत्ता फिर उच्च वर्ग के हाथ में रह गयी। अमेरिका में तो इस कानून के अनुसार अगर किसी आदमी की सम्पत्ति दो राज्यों में है तो वह दोनों जगह वोट का अधिकार रखता था। महिलाओं को वोट देने के अधिकार से वंचित रखा गया। आगे चल कर आम लोगों ने जब इस भेदभाव पूर्ण व्यवस्था का विरोध किया और इसके लिए संघर्ष किया तब कहीं जा कर एक व्यक्ति-एक वोट की  व्यवस्था को लागु करवाया। एक व्यक्ति-एक वोट का लागु होना लोकतंत्र के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ। अब हर आदमी की वोट की कीमत बराबर मानी  जाने लगी। मुकेश अम्बानी और उसका चपरासी, दोनों के वोट की कीमत एक जैसी हो गयी। उच्च वर्गों के लिए ये कोई आसानी से हजम होने वाली बात नही थी। इसी अधिकार के मुताबिक वोट देने के साथ साथ चुने जाने का अधिकार भी जुड़ा हुआ है।
बीजेपी और आरएसएस ------------
                                                      आरएसएस, जो वर्ण व्यवस्था में विश्वास रखती है ये बात कभी मान ही नही सकती की एक अछूत या एक महिला या फिर एक मजदूर चुनाव जीतकर शासन में बैठे। आज भी इस तरह के उदाहरण मिल जाते हैं जहां बड़ी जमीनो के मालिक अनुसूचित जाती के लिए आरक्षित सीट पर अपने यहां काम करने वाले मजदूर को चुनाव जितवाकर खुद उस पद का उपयोग करते रहते हैं। बराबरी की ये व्यवस्था आरएसएस और उसकी राजनैतिक पांख बीजेपी को कभी मंजूर नही हुई। लेकिन लोगों में इसकी स्वीकार्यता को देखते हुए उसकी हिम्मत उसे सीधे सीधे चुनौती देने की नही हुई। इसलिए उसने पिछले रस्ते से इस पर सीमाएं लगानी शुरू की। आज उसने चुने जाने के खिलाफ न्यूनतम शिक्षा की सीमा लगाई है बाद में इसे वोट देने तक भी बढ़ाया जा सकता है।
उलटी गिनती --------------
                                          सही मायने में ये लोकतंत्र की उलटी गिनती है। लोकतंत्र के प्रति बीजेपी की हिकारत उसके सभी कामों में नजर आती है। पार्लियामेंट में विपक्ष के खिलाफ उसका रुख, राज्य सभा के बारे में अरुण जेटली का बयान, प्रधानमंत्री का संसद में इतने बड़े गतिरोध के बावजूद सर्वदलीय मीटिंग में ना आना, संसद को बाईपास करके दूसरे तरीकों  से कानूनो को लागु करने की कोशिश करना इत्यादि ये सब लोकतंत्र के प्रति उसकी हिकारत को ही प्रकट करते हैं। आज हमारे देश में तानाशाही का खतरा सही मायने में तो 1975 से भी ज्यादा है। इसलिए लोकतंत्र की इस उलटी गिनती को रोका  जाना चाहिए।

Sunday, August 2, 2015

Vyang -- मानवाधिकार आयोग में फेरबदल

गप्पी -- सरकार  के प्रवक्ता ने एक प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन किया जिसमे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में आमूल-चूल परिवर्तन की बात की गयी। सरकारी प्रवक्ता ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष के पद पर नई नियुक्ति का एलान किया। उन्होंने नई नियुक्ति का एलान करते हुए कहा की देश में कई आयोगों के कामकाज पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है। इसलिए सरकार ने सबसे पहले मानवाधिकार आयोग को " सुधारने " का फैसला किया है। अब तक आयोग सरकार को चिट्ठी लिखने, रिपोर्ट मांगने और सरकार के कामो में अड़ंगा डालने के अलावा कोई ढंग का काम नही कर पाया है। इसलिए सरकार ने इसमें परिवर्तन का फैसला लिया है। इसलिए सरकार राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद पर स्वामी विचारानन्द की नियुक्ति की घोषणा करती है। स्वामी जी ने परम्परा के अनुसार कई साल गुरुकुल में रहकर शास्त्रों और पुराणो का अध्ययन किया है। स्वामीजी हमारी 5000 साल पुरानी भारतीय संस्कृति के विद्वान रहे हैं। इसलिए सरकार ये उम्मीद करती है की आयोग के काम और तरीके में फर्क दिखाई देगा। अब आप अपने सवाल पूछ सकते हैं। 

           पत्रकार ------ लेकिन अब तक तो ये परम्परा रही है की राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय के रिटायर मुख्य न्यायाधीश को बनाया जाता है ?

            प्रवक्ता ------- ये एक गलत परम्परा थी जिसे बिना विचार किये लागु किया गया था। जो मुख्य न्यायाधीश उच्चतम  न्यायालय जैसी सर्वाधिकार प्राप्त संस्था में रहते हुए मानवाधिकारों की रक्षा नही कर पाया उससे सरकार आगे क्या उम्मीद करेगी। इसलिए ये पद किसी विद्वान को देने का फैसला किया गया है। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए हम राज्य पालों के पद सुरक्षित रखने की योजना बना रहे हैं। 

           पत्रकार ----- लेकिन मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष को कानून और संविधान की गहन जानकारी होनी चाहिए इसलिए इस पद पर न्यायाधीश की नियुक्ति की जाती है। 

            प्रवक्ता ------ यही जानकारी समस्या की जड़ है। जब कोई आदमी किसी पुलिस अधिकारी द्वारा उसके मानवाधिकारों के हनन की शिकायत लेकर आता है तो आयोग को वो बात पता करने में तीन महीने लगते हैं जो सरकार को पहले दिन मालूम होती है। अव्वल तो पुलिस अधिकारी ने वो काम सरकार के कहने पर ही किया होगा, और अगर उसने किसी दूसरी प्रेरणा से भी ऐसा किया होगा तो वो तुरंत सरकार को बता देता है। इसलिए आयोग उस बात के लिए सरकार को तीन महीने बाद चिट्ठी लिखे ये बात समझ में नही आती। 

            पत्रकार ---  तो सरकार अब इस तरीके में क्या बदलाव लाने  जा रही है ?

           प्रवक्ता ----- इसका जवाब खुद स्वामीजी ही देंगे। ये कहकर उन्होंने माइक स्वामीजी को दे दिया। स्वामीजी 50-55 की उमर के स्वस्थ आदमी थे। उनकी दाढ़ी करीने से छँटी हुई थी जो उनके छँटे होने का आभास दे रही थी। स्वामीजी ने माइक पकड़कर दो मिनट के लिए आँखे बंद की और होठों में कुछ बड़बड़ाया। उसके बाद आँखे खोलकर उन्होंने फ़रमाया, " जब हमारे देश का संविधान बना तो उसमे कुछ आधारभूत गलतियां हो गयी। संविधान बनाने वाली सभा में कोई भी भारतीय संस्कृति को गहराई से जानने वाला विद्वान शामिल नही था वरना ऐसा नही होता। उसमे मौलिक अधिकारों के नाम का एक अध्याय जोड़ दिया गया। जबकि कोई भी अधिकार मौलिक नही होता। नागरिकों के अधिकार राजा की मर्जी के अधीन होते हैं। हमारे शास्त्रों में राजा को भगवान का प्रतिनिधि माना  गया है। यहां तक की राम की स्तुति भी राजा राम कहकर की जाती है। सारी समस्याएँ यहीं से शुरू होती हैं। आयोग अब ये देखेगा की जो काम राजाज्ञा से किया गया होगा उसकी शिकायत नही की जा सकेगी। राजा के अधिकारों को चुनौती नही दी जा सकती ये हमारी परम्परा है। हमारे यहां तो सबसे अच्छा न्याय का उदाहरण उसको माना जाता है जिसमे राजा को मृत्युदंड होने पर उसकी सोने की मूर्ति को फांसी पर लटकाया गया था। और ये हर बात पर शिकायत करना हमारी संस्कृति नही है। हमारे यहां तो कहा गया है,-

                                  सीताराम, सीताराम, सीताराम कहिये,

                                  जेहि विधि राखे राम, तेहि विधि रहिये। 

  उसी तरह हमारे शास्त्रों में राजा के सेवकों को देवता का दर्जा दिया गया है। क्योंकि उनके बिना राज्य का कामकाज असम्भव है। इसलिए भविष्य में किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ भी कोई शिकायत नही सुनी जाएगी। तुमने वो नया भजन तो सुना होगा। 

                                    दुनिया चले ना श्रीराम के बिना,

                                    रामजी चले ना हनुमान के बिना। 

        पत्रकार -- तो फिर आयोग का काम क्या रह जायेगा। वो क्या काम करेगा ?

       स्वामीजी ----- आयोग जगह जगह सेमिनार और प्रवचन आयोजित करेगा, जिसमे हमारी सदियों पुरानी संस्कृति की तरफ लौटने का आवाहन किया जायेगा। लोगों को समझाया जायेगा की जिन्हे वो अबतक अधिकार समझते रहे हैं वो एक तकनीकी भूल थी। 


खबरी -- तुम्हे हमेशा इस तरह के बुरे सपने ही क्यों आते हैं ?

Sunday, June 28, 2015

हम भेड़ बकरियां हैं क्या ?

गप्पी -- मैं ये  सवाल बहुत ही संजीदगी से पूछ रहा था और मेरा पड़ौसी मजाक के मूड में था। उसने तुरंत उत्तर दिया की जब आप दूध नही देते तो भेड बकरी कैसे हो सकते हो। अब मुझे कहना पड़ा की हम यानि आम जनता सदियों से ऊपर के वर्ग के लिए बाकायदा दूध देते रहे हैं। और इतना देते रहे हैं की उनकी सन्ताने इतनी मोटी  हो गयी हैं की उन्हें डाइटिंग करनी पड़ रही है। भेड़ की तरह ही वो हर साल हमे मूँड़ कर ऊन उतार लेते है। और हम सचमुच भेड़ की तरह चुपचाप बिना कोई एतराज किए ऊन उतरवाते रहते हैं।

                लेकिन मैं ये सवाल और भेड़ बकरियों से हमारी तुलना एक मुहावरे के अनुसार कर रहा था। मेरा संदर्भ दूसरा था।

                 आजकल हम कोई सामान लेने जाते हैं या सिनेमा देखने जाते हैं, बिजली का बिल जमा करवाने जाते हैं या राशन लेने जाते हैं तो क्या देखते हैं की भीड़ बहुत होती है। हर आदमी सबसे पहले काम करवाना चाहता है। शोर गुल होता है, कभी कभी गाली गलौच भी होता है। लेकिन हम इन्सानो की तरह लाइन से बारी बारी ये काम नही करते हैं। अचानक एक वाचमैन आता है या सिक्योरिटी गार्ड आता है और डण्डा हिला कर सबको लाइन में कर देता है बिलकुल भेड़ बकरियों की तरह। लाइन हम खुद भी लगा सकते थे लेकिन नही इसके लिए हमे एक गार्ड या पुलिस वाला चाहिए। जिस तरह भेड़ बकरिओं को हांकने के लिए एक रखवाला चाहिए।

                 चौराहे पर ट्रैफिक जाम है। एम्बुलेंस तक फंसी हुई है। चूँकि हर आदमी पहले निकलना चाहता है इसलिए कोई भी नही निकल पा रहा है। तभी एक पुलिस वाला आता है और सब लाइन में हो जाते हैं। हिं हिं करते हैं और चले जाते हैं। मैं इसलिए पूछ रहा था की हम भेड़ बकरियां हैं क्या ?

              आदमी घर में बैठा है। टीवी देख रहा है। टीवी पर कार्यक्रम आ रहा है की सरकार सफाई के लिए कुछ नही करती। टीवी में जगह जगह कूड़े कचरे के ढेर दिखाए जा रहे हैं। टीवी देखने वाला पूरी सरकार को गालियां दे रहा है। कोस रहा है सारे अधिकारीयों और नेताओं को। कर्मचारी काम ही नही करना चाहते। कहता है इस देश का चरित्र बिलकुल गिर गया है। यहाँ मिल्ट्री राज की जरूरत है तब सुधरेंगे लोग और तब काम करेंगे कर्मचारी। फिर काम पर जाने के लिए घर से निकलता है। हाथ में कचरे की थैली है जो गली के मोड़ पर रखी कचरापेटी में डालनी है। वह वहां तक जाता है और कचरे की थैली कचरापेटी के अंदर नही डालता उसके पास फेंक कर आगे निकल जाता है। पूरे मुहल्ले का कूड़ा कचरापेटी के पास पड़ा है और पेटी  खाली रखी है।

                 शाम को आदमी घर पर आता है। पार्किंग में गाड़ियाँ इस तरह खड़ी हुई हैं की ना तो दूसरी लगाने की जगह है और ना निकालने की जगह है। वह पूरी सोसाइटी को गालियां देता है। फिर अपनी गाड़ी इस तरह खड़ी कर देता है की चार गाड़ियों का रास्ता बंद हो जाता है। 

                  सार्वजनिक परिवहन की बस  जा रही है। सवारियों से पूरी भरी हुई है। एक आदमी एक लड़की के साथ छेड़खानी करता है। लड़की उसका विरोध करती है। झगड़ा होता है। पूरी बस की सवारियां देख रही हैं। कोई नही बोलता। साठ सवारियों के मुंह में दही जमा हुआ है। घर पर पहुंच कर इस बात पर सरकार को सौ गालियां देते हैं की एक गार्ड नही है बस में। भरी बस में एक लड़की को छेड़खानी से बचाने के लिए गार्ड चाहिए।                    इन सारे किस्सों में सरकार की जिम्मेदारी से कोई इनकार नही करता। लेकिन समाज और व्यक्ति की कोई जिम्मेदारी नही है। हमारी कोई जिम्मेदारी नही है। क्योंकि हम तो घर परिवार वाले शरीफ लोग हैं। तुम घर परिवार वाले शरीफ लोग हो तभी तो तुम्हारी जिम्मेदारी बनती है की समाज ऐसा रहे जिसमे घर परिवार इज्जत और सम्मान के साथ रह सके। 

                लेकिन नही, हम तो भेड़ बकरियां हैं। कोई हमारा दूध निकाल ले जाये, ऊन उतार ले जाये हम नही रोकेंगे। हमे चलना कैसे है खड़ा कैसे होना है रहना कैसे है, इस सब के लिए हमे एक डण्डे वाला गार्ड चाहिए।

खबरी -- जब तक लोग भेड़ बकरी रहेंगे, सरकारें और बदमाश उन्हें हांकते  रहेंगे ।

Thursday, June 25, 2015

मेरा पड़ौसी और आपातकाल

गप्पी -- मेरा एक पड़ौसी एकदम झल्लाया हुआ मेरे पास आया और बोला, " ये क्या हो रहा है भई , जो भी चैनल लगाओ एक ही रट लगी हुई है, आपातकाल, आपातकाल। मैं पूछना चाहता हूँ की आखिर ये आपातकाल आखिर है क्या बला। इससे ऐसा क्या हो जायेगा जो लोगों को इस तरह डराया  जा रहा है। अच्छा तुम बताओ की आपातकाल से क्या हो जाता है। "

" देखो आपातकाल का मतलब होता है की उसमे  सारे नागरिक अधिकार छीन लिए जाते हैं। " मैंने उसे समझाने का प्रयास किया। 

" क्या अभी आपातकाल है ?" उसने पूछा। 

" कैसी बात करते हो यार। अभी कौन कहता है की आपातकाल है। " मैंने कहा। 

" अच्छा, तो अब तुम्हे कौन सा अधिकार है। " उसने दोनों हाथ कमर पर रख लिए। 

" देखो, नागरिक अधिकारों का मतलब होता है वो बड़े बड़े अधिकार जैसे भाषण देने का अधिकार ओर…… " मैंने बताना शुरू किया तो उसने मुझे बीच में ही रोककर पूछा, " तुमने कभी भाषण दिया है ?"

"नही।"  मैंने कहा . 

" तो इस अधिकार का तुम क्या करोगे। अच्छा ये बताओ की अगर तुम बीमार हो और तुम्हारी जेब में पैसे न हों तो क्या तुम इलाज करवा सकते हो ?" उसने अपनी बात पूरी की। 

" बिना पैसे तो इलाज नही हो सकता। " मैंने कहा। 

" अगर पुलिस तुम्हे पकड़ने आये तो क्या तुम उससे पूछ सकते हो की मेरा वारंट है या नही। "

" वैसे कोई पूछता नही क्योंकि इसमें पिटने का खतरा रहता है। " मैंने कहा। 

" चलो जाने दो, ये बताओ की क्या तुम किसी बड़े आदमी को जिसने तुम्हे मारने की धमकी दी हो, बिना किसी सिफारिश या रिश्वत के उसके खिलाफ FIR दर्ज करवा सकते हो ?" उसने अगला सवाल पूछा। 

" नही करवा सकता। " मैं ढीला हो कर सच पर उत्तर आया। 

" क्या तुम अपने  बच्चो को अपनी मर्जी के स्कूल या विषय में पढ़ा  सकते हो, बिना पैसे। " 

" नही पढ़ा सकता। "

" अच्छा, कुछ बड़े अधिकारों के बारे में पूछता हूँ। क्या तुम बिना पुलिस से इजाजत लिए धरना दे सकते हो ?"

" नही दे सकता। " मैंने कहा। 

" अगर तुम्हारे पास काम नही है तो क्या तुम काम के अधिकार से परिवार का पेट भर सकते हो। "  वो अब हावी होने लगा था। 

" बिना काम परिवार कैसे  पाला जा सकता है। " मैंने जवाब दिया। 

" अगर कारखाने का मालिक नही चाहे तो क्या तुम वहां यूनियन बना सकते हो ?" उसने मुस्कुराते हुए पूछा। 

" नही, लेबर इन्स्पेक्टर अगले ही दिन मालिक को बता देता है की फलां आदमी ने यूनियन बनाने की दरख्वास्त दी है। " मैंने हकीकत के हिसाब से जवाब दिया। 

" तो तुम ये बताओ की तुम्हारे लिए आपातकाल हटा कब था। फालतू शोर मचा रक्खा है। " उसने कहा और बिना मेरे जवाब का इन्तजार किये चला गया।


खबरी -- लेकिन आपातकाल नही है इसलिए तुम ये सब कह सकते हो।