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Sunday, August 2, 2015

Vyang -- मानवाधिकार आयोग में फेरबदल

गप्पी -- सरकार  के प्रवक्ता ने एक प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन किया जिसमे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में आमूल-चूल परिवर्तन की बात की गयी। सरकारी प्रवक्ता ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष के पद पर नई नियुक्ति का एलान किया। उन्होंने नई नियुक्ति का एलान करते हुए कहा की देश में कई आयोगों के कामकाज पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है। इसलिए सरकार ने सबसे पहले मानवाधिकार आयोग को " सुधारने " का फैसला किया है। अब तक आयोग सरकार को चिट्ठी लिखने, रिपोर्ट मांगने और सरकार के कामो में अड़ंगा डालने के अलावा कोई ढंग का काम नही कर पाया है। इसलिए सरकार ने इसमें परिवर्तन का फैसला लिया है। इसलिए सरकार राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद पर स्वामी विचारानन्द की नियुक्ति की घोषणा करती है। स्वामी जी ने परम्परा के अनुसार कई साल गुरुकुल में रहकर शास्त्रों और पुराणो का अध्ययन किया है। स्वामीजी हमारी 5000 साल पुरानी भारतीय संस्कृति के विद्वान रहे हैं। इसलिए सरकार ये उम्मीद करती है की आयोग के काम और तरीके में फर्क दिखाई देगा। अब आप अपने सवाल पूछ सकते हैं। 

           पत्रकार ------ लेकिन अब तक तो ये परम्परा रही है की राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय के रिटायर मुख्य न्यायाधीश को बनाया जाता है ?

            प्रवक्ता ------- ये एक गलत परम्परा थी जिसे बिना विचार किये लागु किया गया था। जो मुख्य न्यायाधीश उच्चतम  न्यायालय जैसी सर्वाधिकार प्राप्त संस्था में रहते हुए मानवाधिकारों की रक्षा नही कर पाया उससे सरकार आगे क्या उम्मीद करेगी। इसलिए ये पद किसी विद्वान को देने का फैसला किया गया है। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए हम राज्य पालों के पद सुरक्षित रखने की योजना बना रहे हैं। 

           पत्रकार ----- लेकिन मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष को कानून और संविधान की गहन जानकारी होनी चाहिए इसलिए इस पद पर न्यायाधीश की नियुक्ति की जाती है। 

            प्रवक्ता ------ यही जानकारी समस्या की जड़ है। जब कोई आदमी किसी पुलिस अधिकारी द्वारा उसके मानवाधिकारों के हनन की शिकायत लेकर आता है तो आयोग को वो बात पता करने में तीन महीने लगते हैं जो सरकार को पहले दिन मालूम होती है। अव्वल तो पुलिस अधिकारी ने वो काम सरकार के कहने पर ही किया होगा, और अगर उसने किसी दूसरी प्रेरणा से भी ऐसा किया होगा तो वो तुरंत सरकार को बता देता है। इसलिए आयोग उस बात के लिए सरकार को तीन महीने बाद चिट्ठी लिखे ये बात समझ में नही आती। 

            पत्रकार ---  तो सरकार अब इस तरीके में क्या बदलाव लाने  जा रही है ?

           प्रवक्ता ----- इसका जवाब खुद स्वामीजी ही देंगे। ये कहकर उन्होंने माइक स्वामीजी को दे दिया। स्वामीजी 50-55 की उमर के स्वस्थ आदमी थे। उनकी दाढ़ी करीने से छँटी हुई थी जो उनके छँटे होने का आभास दे रही थी। स्वामीजी ने माइक पकड़कर दो मिनट के लिए आँखे बंद की और होठों में कुछ बड़बड़ाया। उसके बाद आँखे खोलकर उन्होंने फ़रमाया, " जब हमारे देश का संविधान बना तो उसमे कुछ आधारभूत गलतियां हो गयी। संविधान बनाने वाली सभा में कोई भी भारतीय संस्कृति को गहराई से जानने वाला विद्वान शामिल नही था वरना ऐसा नही होता। उसमे मौलिक अधिकारों के नाम का एक अध्याय जोड़ दिया गया। जबकि कोई भी अधिकार मौलिक नही होता। नागरिकों के अधिकार राजा की मर्जी के अधीन होते हैं। हमारे शास्त्रों में राजा को भगवान का प्रतिनिधि माना  गया है। यहां तक की राम की स्तुति भी राजा राम कहकर की जाती है। सारी समस्याएँ यहीं से शुरू होती हैं। आयोग अब ये देखेगा की जो काम राजाज्ञा से किया गया होगा उसकी शिकायत नही की जा सकेगी। राजा के अधिकारों को चुनौती नही दी जा सकती ये हमारी परम्परा है। हमारे यहां तो सबसे अच्छा न्याय का उदाहरण उसको माना जाता है जिसमे राजा को मृत्युदंड होने पर उसकी सोने की मूर्ति को फांसी पर लटकाया गया था। और ये हर बात पर शिकायत करना हमारी संस्कृति नही है। हमारे यहां तो कहा गया है,-

                                  सीताराम, सीताराम, सीताराम कहिये,

                                  जेहि विधि राखे राम, तेहि विधि रहिये। 

  उसी तरह हमारे शास्त्रों में राजा के सेवकों को देवता का दर्जा दिया गया है। क्योंकि उनके बिना राज्य का कामकाज असम्भव है। इसलिए भविष्य में किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ भी कोई शिकायत नही सुनी जाएगी। तुमने वो नया भजन तो सुना होगा। 

                                    दुनिया चले ना श्रीराम के बिना,

                                    रामजी चले ना हनुमान के बिना। 

        पत्रकार -- तो फिर आयोग का काम क्या रह जायेगा। वो क्या काम करेगा ?

       स्वामीजी ----- आयोग जगह जगह सेमिनार और प्रवचन आयोजित करेगा, जिसमे हमारी सदियों पुरानी संस्कृति की तरफ लौटने का आवाहन किया जायेगा। लोगों को समझाया जायेगा की जिन्हे वो अबतक अधिकार समझते रहे हैं वो एक तकनीकी भूल थी। 


खबरी -- तुम्हे हमेशा इस तरह के बुरे सपने ही क्यों आते हैं ?

Friday, July 24, 2015

Vyang - सबसे बढ़िया धन्धा - राजनीति

गप्पी --  कल हमने एक धन्धे के बारे में बात की। आज हम ऐसे ही दूसरे धन्धों के बारे में बात करेंगे जो कभी धन्धे नही माने जाते थे परन्तु आज के समय में भारी मुनाफा देने वाले धंधे हैं। 

राजनीति --- आज के समय में राजनीति सबसे ज्यादा मुनाफा देने वाला धन्धा है।  इस धन्धे की पहली खासियत ये है की वैसे तो हमारे देश में चपरासी तक की नौकरी के लिए न्यूनतम क्वालिफिकेशन निश्चित है लेकिन राजनीती के धंधे के लिए ऐसी कोई शर्त नही है। एक बिलकुल अंगुठाटेक आदमी ना केवल सांसद या विधायक हो सकता है बल्कि प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री भी हो सकता है। दसवीं तक पढ़ा लिखा आदमी शिक्षा मंत्री हो सकता  है और सारी  जिंदगी झाड़-फूंक करने वाला विज्ञानं और तकनीकी मंत्री हो सकता है। दूसरा फायदा इस धंधे का यह है की देश की जनता ने भी अब इसे पूर्णकालिक धंधा मान लिया है सो इसे धंधे की तरह करने में कोई नैतिक रुकावट नही है। वैसे मैं माफ़ी चाहता हूँ की राजनीती के धंधेबाजों से मैं नैतिकता की बात कर रहा हूँ। 

                     ये धंधा शुरू करने का सबसे अच्छा समय यही है। क्योंकि एक तो कुछ सालों के बाद ये धंधा बिलकुल पारिवारिक धंधा हो जाने वाला है और शायद नए लोगों को इसमें जगह नही मिले। इसलिए इसे जितना जल्दी शुरू कर लिया जाये उतना बेहतर है। दूसरा अभी बाकि दुकानों की छवि इतनी खराब है की नए दुकानदार को जमने में ज्यादा समय नही लगेगा। 

                     इस धंधे के लिए जो चीजें जरूरी हैं उनमे एक तो आपको किसी भेड़ - भेड़िये की खाल या गिरगिट की कला आनी चाहियें। आप को अभी-अभी तुरंत कही गयी बात को तुरंत इनकार करने का अभ्यास कर लेना चाहिए। आजकल मीडिआ वीडियो रिकॉर्डिंग कर लेता है इसलिए ये कहना की मीडिया ने मेरी बात को तोड़-मरोड़कर पेश किया है थोड़ा मुश्किल हो गया है लेकिन विद्वान राजनीतिज्ञों ने अब ये कहना शुरू कर दिया है की मीडिया ने मेरी बात को सही संदर्भ में पेश नही किया है। इस तरह किसी पढ़े-लिखे आदमी को सचिव रक्खा जाये तो बेहतर रहता है। वह आपके रोज-रोज के बयानों के अलावा भाषण भी लिख देगा। 

                 इस धंधे में सबसे महत्त्वपूर्ण बात ये है की आपकी जाती या धर्म के लोगों की तादाद आपके इलाके में कितनी है। अगर वह बहुमत लायक है तब तो चिंता की कोई बात ही नही है। आप तुरंत शोर मचाना शुरू कर सकते है की इस जाती या धर्म के साथ भारी अन्याय हो रहा है और अब सबको इकट्ठे हो जाने की जरूरत है। अगर आपकी जाती या धर्म के लोगों की तादाद कम है तो भी परेशान होने की जरूरत नही है। आप अपनी जाती को किसी दूसरे और नीचे के वर्ग में रखने का आंदोलन चला सकते हैं। आजकल आरक्षण के लिए एक सीढ़ी नीचे उतरने को हर जाती तैयार बैठी है। स्वर्ण जातियां बैकवर्ड में शामिल होने, बैकवर्ड जातियां अनुसूचित जाती में शामिल होने के आंदोलन चल रहे हैं। जिस वर्ग की जातियों के हाथ का छुआ हुआ ये लोग पानी नही पीते थे अब उस में शामिल होने के लिए सारा जोर लगा हुआ है। सो इस तरह का कोई बखेड़ा खड़ा किया जा सकता है। 

                        अगर आप इस ढांचे में भी फिट नही बैठते हैं तो दो चार सन्तों और पत्रकारों को पाल लीजिये। और खुद ही बयान देना शुरू कर दीजिये की नही ये खबर गलत है की मैं भाजपा या कांग्रेस में जा रहा हूँ। हर दूसरे दिन दल बदलने का खंडन कर दीजिये। महीने दो महीने में कोई ना कोई आपसे सम्पर्क जरूर करेगा और आपका काम हो जायेगा। उससे पहले हर हफ्ते राजधानी की यात्रा कीजिये और आसपड़ोस से लेकर पूरे मुहल्ले में बता दीजिये की भाई साब ( भाई साब मतलब कोई भी मंत्री का नाम ले दीजिये )ने बुलाया है। मंत्री का नाम केवल एक-दो बार ही लीजिये उसके बाद केवल भाई साब कहिये। राजधानी में सचिवालय जाकर कहीं बैठ जाइये और शाम को वापिस आ जाइये। वापिस आकर सबको बताइये की भाई साब ने क्या-क्या कहा। खाना ट्रेन में ही खा लीजिये और जब घर से कोई खाने के लिए बुलाने आये तो लोगों के बीच में ही कहिये की भाई साब ने इतना खिला दिया की दो दिन कुछ नही खाया जायेगा। थोड़े दिन में आप एक इलाके के नेता हो जायेंगे। 

     कुछ जरूरी चीजें हैं जिन्हे अच्छी तरह याद कर लीजिये। 

१.  राजनीती में देश का मतलब कभी भी अपने घर की चारदीवारी से बाहर नही होता। 

२.  राजनीती में हर कुकर्म ये कहकर किया जाता है की जनहित के लिए कर रहे हैं। 

३.  विपक्ष का हर नेता और हर पार्टी देशद्रोही होते हैं। 

४. भृष्टाचार जैसा शब्द केवल विपक्ष के लिए इस्तेमाल होता है। 

५. वायदा करने में कभी पीछे मत रहिये, चाँद को लाने और गंगा को वापिस भेजने का वायदा भी किया जा सकता है। 

६.  अपनी सारी विफलताओं का दोष विरोधियों के माथे मढ़िए। अगर एक बार गलती से मुंह से दो और दो पांच निकल जाये तो उसी पर अड़े रहिये। 

        बाकि हालात के हिसाब से कुछ दूसरे पाठ भी हैं लेकिन शुरुआत के लिए इतना काफी है। 

         बाकि कल -----------

Thursday, July 23, 2015

Vyang - सबसे बढ़िया धन्धा - पर जो धन्धा नही था (भाग-१)

खबरी -- इस मंदी के दौर में कौनसा धन्धा अच्छा है ?


गप्पी -- हर आदमी यही सवाल पूछ रहा है। लेकिन मुझे कुछ ऐसे धन्धे मालूम हैं जो इस समय में बहुत लाभदायक हैं। पहले लोग कहते थे की उत्तम खेती, मध्यम व्यापार। पर अब सबसे खराब काम अगर कोई रह गया है तो वह है खेती। खेती करने वाले ज्यादातर लोग ये काम छोड़ना चाहते है पर इससे छुटकारा केवल मर कर ही मिल सकता है। वो बात अलग है की पिछले कुछ सालों में कई लाख लोग इस तरह भी ये काम छोड़ चुके हैं। परन्तु हम बात कर रहे थे मुनाफदेय धन्धों की। इनकी एक पूरी लिस्ट मेरे पास है और ये वो धन्धे हैं जिन्हे कुछ समय पहले तक धन्धा नही माना जाता था। ये तो भला हो विकास करती हुई वर्तमान व्यवस्था का की उसने पता नही कितने कामों को धंधा बना दिया और कितने धंधों को मुनाफादेय बना दिया। सो मैं आपको उनकी लिस्ट बता रहा हूँ। 

धर्म --- आजकल सबसे ज्यादा मुनाफे का धंधा अगर कोई है तो वो धर्म है। इस धंधे में अपार सम्भावनाएं हैं। और इसमें चुनाव के अवसर भी दूसरे धंधों से ज्यादा हैं। अगर आप धोड़ी बहुत इन्वेस्टमेंट कर सकते है तो पॉश इलाके में कोई मन्दिर खोल कर बैठ सकते हैं। अगर आपकी जान-पहचान ज्यादा है तो आप यही मंदिर सरकारी जमीन पर भी बना सकते हैं। पहले तो सरकार और प्रशासन की ही कोई इच्छा नही होती है सरकारी जमीन से मंदिर हटाने की। अगर कोई अधर्मी अधिकारी ऐसा करने की कोशिश करता भी है तो आप लोगों को इक्क्ठा करके दंगा करवा सकते हैं। पहले से दूसरे धर्म के दो चार ऐसे स्थानों के नाम याद करके रक्खो और कहो की जब तक फलां मस्जिद नही हटाई जाती हम मन्दिर नही हटने देंगे और की सरकार दूसरे धर्म का तुष्टिकरण कर रही है। इस देश के लोग भरी बस में एक गुण्डे से किसी लड़की को बेशक ना बचायें पर मंदिर के नाम पर कट मरने को तैयार हो जायेंगे। बस धंधा हो गया सैट। 

                      अगर आपके पास थोड़ा पैसा भी लगाने को नही है तो यू-ट्यूब पर कुछ कथावाचकों के वीडियो देख कर याद कर लीजिये। अपने नाम के आगे सन्त लिखना शुरू कर दीजिये और पहले किसी मित्र के मुहल्ले में मुफ्त में कथा कर दीजिये। कथा में ज्यादा कुछ करना नही होता। भागवत कथा का नाम लीजिये और गुरु की महिमा गाइये। आपको भगवान से क्या लेना देना है अपनी मार्किट बनाने पर ध्यान दीजिये। ये दोहा जो सारे गावं को अच्छी तरह याद है उसे हर दिन कथा में कम से कम दस बार दुहराइए। '' गुरु गोविन्द दोउ खड़े, काके लागूं पांव। बलिहारी गुरु आपणो जिन गोविन्द दियो मिलाय। " दो तीन भजन करने वाले लोगों को तनखा पर रख लीजिये जिन्हे कुल मिलाकर दस भजन याद करवा दीजिये। एक तो कथा का तीन चौथाई समय ये लोग खा जायेंगे और आपकी समस्या हल हो जाएगी। दूसरा उन्हें भी गुरु महिमा के ही भजन याद करने को कह  दीजिये।  वो लोग गाएंगे, " आनन्द ही आनन्द बरस रहा गुरुदेव तुम्हारे चरणो में। " और सारे भक्त भाव विभोर होकर झूमेंगे। एकाध भजन भगवान के बारे में गाना भी पड़े तो वो ऐसा होना चाहिए की भगवान की छवि ऐसी बने जैसे वो कोई लोफर और मशखरे किस्म का लगे।  जैसे, " तेरा श्याम बड़ा अलबेला, मेरी मटकी को मार गया ढेला। " अगर आपमें थोड़ी सी भी बुद्धि होगी तो बड़ी जल्दी तरक्की होगी। लोगों के पैसे से बढ़िया आश्रम बनाइये और आराम से रहिये मोह माया से परे। इस धंधे की दूसरी खासियत ये है की इसे अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त है। सरकार जब किसी उद्योग का विकास करना चाहती है तो उसे टैक्स वगैरा में कुछ छूट देती है। इस धंधे को सौ प्रतिशत छूट हासिल है इसलिए आप समझ सकते हैं की सरकार इसे बढ़ाने के लिए कोई कसर नही छोड़ रही। थोड़ा पैसा हो जाये तो आप किसी धार्मिक टीवी चैनल का आधा घंटा किराये पर ले सकते हैं। एक बार आप टीवी पर आये नही की आपके भक्तों की तादाद रॉकेट गति से बढ़ती है। हालत ये हो जाती है की लोगों को ही नही, खुद आपको भी लगने लगता है की आपमें कोई अलौकिक शक्ति है। 

           ( दूसरे धन्धे के बारे मैं कल )

                       

Sunday, July 12, 2015

Vyang -- गंगा की गन्दगी और व्यापम घोटाला

गप्पी -- गंगा को हमारे देश की सबसे पवित्र नदी माना जाता है। इसको पाप-विमोचनी, मोक्ष-दायिनी कहा गया है। मुझे लगता है की यही प्रशंसा उसे भारी पड़ी है। देश में जितने भी पाप करने वाले लोग हैं वे एक अंतराल के बाद गंगा में पाप धोने जाते है। अपने सभी पूर्वजों को मोक्ष दिलाने के लिए भी सारा देश अस्थियां लेकर गंगा में विसर्जित करने जाता है। और गंगा का ये हाल हो गया की उसको साफ करने का स्पेशल प्रोग्राम चलना पड रहा है। और गंगा है की साफ होने का नाम ही नही लेती। हजारों करोड़ रूपये खर्च हो गए और आगे होने वाले हैं लेकिन परिणाम नही आ रहा। 

                       दूसरा सवाल ये है की जब गंगा को हम इतना पवित्र मानते हैं तो उसे गन्दा क्यों करते हैं। इसका जवाब हमारी परम्परा में है। हम अपनी सारी  पवित्र चीजों को गन्दा करते हैं फिर चाहे वो नदी हो ,पहाड़ हों, तीर्थस्थान हों , पार्क हों, शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थाएं हों। गंदगी हमारी सांस्कृतिक धरोहर है सो इसे हम कैसे छोड़ सकते हैं। जब तक हमारे आसपास गन्दगी ना हो हमे अजीब अजीब लगता है। हमे लगता है की हम दूसरे देश में हैं। घर जैसा महसूस ही नही होता। इसलिए हम पहला काम गन्दगी फ़ैलाने का ही करते हैं। 

                        इसलिए हमे केवल गंगा को साफ करने का अभियान नही चलाना पड़ता बल्कि सारे देश में स्वच्छता अभियान चलाना पड़ता है। अगर हम ये देखें की गंगा में गन्दगी फ़ैलाने वाले लोगों में कौन कौन शामिल हैं तो मालूम पड़ेगा की पाप धोने वाले लोगों के अलावा और भी बहुत से लोग हैं जो ये काम करते हैं। इनमे गंगा के किनारे बसे हुए शहरों की म्युनिसिपल कमेटियां भी शामिल हैं जो सारे शहर की गन्दगी गंगा में डाल देती हैं। इसके अलावा वो सारे उद्योग जो गंगा के किनारे स्थित हैं अपनी गन्दगी गंगा में डाल देते हैं। सोचते होंगे इससे गंदगी के निकाल के साथ पाप भी धुल जायेंगे। 

                         दूसरी तरफ हमारी सरकार है जो शहरों और उद्योगों की गन्दगी की उपयुक्त सफाई का प्रबन्ध करने की बजाए केवल प्रतिबंध लगाने में विश्वास रखती है। आज ये चीज गंगा में डालने पर प्रतिबंध लगा दिया, कल दूसरी चीज गंगा में डालने पर। अब सवाल ये है की वो इस गंदगी को लेकर कहां जाएँ। जब तक वैकल्पिक व्यवस्था नही होगी तब तक या तो वो गन्दगी घुमाफिरा कर गंगा में गिरेगी या फिर वो उद्योग बंद हो जायेंगे। लेकिन सरकारों को इन चीजों से कभी सरोकार ही नही रहा। उसको केवल एक काम ही करना आता है और वो हैं प्रतिबंध लगाना। सरकार ने गंदगी से लेकर कालेधन तक, और रेप से लेकर टैक्स चोरी तक, हर चीज पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। 

                    अब एक दूसरी समस्या खड़ी हो गयी है। मध्यप्रदेश के एक बीजेपी नेता ने कहा है की मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उतने ही पवित्र हैं जितनी गंगा है। मुझे अब तक समझ में नही आया की ये बयान शिवराज सिंह के समर्थन में है की विरोध में। कुछ लोग कह रहे हैं की समर्थन में है और इसमें वो गंगा की आध्यत्मिक पवित्रता की बात कर रहे हैं। दूसरा पक्ष कहता है की विरोध में है क्योंकि मंत्री को मालूम है की गंगा ही सबसे प्रदूषित नदी है। और व्यापम की गंदगी कोई गंगा में गिरने वाली गंदगी से कम थोड़े ना है, बल्कि उससे ज्यादा ही व्यापक है। और की मंत्री ने ये बयान इस संभावना को ध्यान में रखकर दिया है की व्यापम की सफाई में भी उतना ही समय लगने वाला है जितना गंगा की सफाई में लगने वाला है। अब वाराणसी और इलाहबाद से चुनाव लड़ने वाले भाजपा के नेता मुरली मनोहर जोशी तो कहते हैं की जिस तरह सरकार गंगा की सफाई कर रही है उससे तो गंगा सौ साल में भी साफ नही हो सकती। उसी तरह मध्यप्रदेश के कुछ लोग कह रहे हैं की जिस तरह से व्यापम की जाँच हो रही है उस हिसाब से तो ये सौ साल में भी पूरी नही हो सकती। गजब का साम्य है दोनों में। दूसरी जो बात उन्होंने कही की बीजेपी को व्यापम घोटाले का कोई अफ़सोस नही है। ये बात कहने की कोई जरूरत नही थी। देश की जनता ये बात पहले से ही जानती है की सरकारों को घोटालों के अफ़सोस कभी नही रहे। आप कांग्रेस से पूछ लीजिये की क्या उसे 2G या कोयला घोटाले का कोई अफ़सोस है तो कहेगी बिलकुल नही। आप तृणमूल कांग्रेस से पूछ लीजिये की क्या उसे श्रद्धा चिट फण्ड घोटाले का कोई अफ़सोस है तो कहेगी की अफ़सोस किस बात का, बल्कि हमे तो गर्व है।

                     मेरे पड़ौसी को इस बात पर बहुत एतराज है की अब नेताओं की गन्दगी भी गंगा में डाली जा रही है। उनका कहना है की इससे तो गंगा की सफाई की रही सही सम्भावना भी खत्म हो जाएगी। उसका कहना है की कम से कम गंगा को तो राजनीति से दूर रक्खो , क्योंकि गंगा की स्वीकार्यता सभी धर्मों से परे है। हर धर्म और सम्प्रदाय के लोग गंगा को जीवन दायिनी मानते हैं। इसका एक उदाहरण मैं नीचे दे रहा हूँ जिसमे गंगा के किनारे रहने वाला एक मुसलमान शायर गंगा को सम्बोधित करते हुए कहता है ,

                                        बहुत नमाजें पढ़ी हैं हमने,

                                                              अ गंगा तेरे पानी में वजू करके। 

खबरी -- शायद हमारा यही सामूहिक जज्बा ही गंगा को बचा ले जाये। 


 

Vyang -- ज्योतिष के लिए अध्यादेश लाओ

गप्पी -- हमारे देश में आजकल विज्ञानं का बहुत बोलबाला है। आपको ये जानकर बहुत ख़ुशी होगी की हमारे यहां सबसे बड़ा विज्ञानं ज्योतिष को माना जाता है। और ज्योतिष में भी जो हिस्सा खगोल शास्त्र से संबंध रखता है और जिसमे ग्रहों की आकाश में स्थिति और गति की गणना की जाती है उसे नही, बल्कि उस ज्योतिष को माना जाता है जो आदमी और राशि अनुसार फल बताता है। कोई भी ज्योतिषी अपने को आइंस्टीन से दो दर्जे ऊपर समझता है। बाकि के विज्ञानों की हालत तो यह है की भौतिकी का विद्यार्थी ज्योतिषी से ज्यादा नंबर लाने का उपाय पूछता है। कुछ लोग इसे गलती से अंध विश्वास कहते हैं जबकि यह अन्धविश्वास नही है बल्कि पूर्ण विश्वास है। मशीन के सही संचालन के लिए सर्विस के शैड्यूल की जगह प्रशाद का शैड्यूल बनाया जाता है। कुछ लोग इसे नशा भी कहते हैं। लोग इसके आदी हो जाते हैं।सुबह अख़बार में सबसे पहले राशिफल देखते हैं बाद में मुख्य खबरें पढ़ते हैं। अगर अख़बार के राशिफल में उस दिन कोई बुरी खबर मिलने का योग लिखा हो तो बाकि का अख़बार नही पढ़ते। कोई कोई मजबूत दिल के लोग भी होते हैं जो उस दिन कोई बुरी खबर मिलने का योग लिखा हो तो  पहले श्रद्धांजलि वाला पेज पढ़ लेते हैं और अपने उन सभी रिश्तेदारों की फोटो चेहरा याद कर करके ढूंढते हैं जिनके टपकने का उन्हें अंदेशा होता है।

                 नशे पर मुझे याद आया की एक मशहूर ज्योतिषी हैं हमारे देश में। जिनके ग्राहकों में बड़े बड़े फ़िल्मी सितारे और राजनीतिज्ञ हैं। उनका नाम है बेजान दारूवाला। ज्योतिष भी नशा ही होता है ये इनके नाम से ही पता चल जाता है। इनके पुरखे कभी दारू का धंधा करते होंगे, ये भी धंधा तो नशे का ही करते है लेकिन उत्पाद बदल लिया है। इनका नशा धड़ल्ले से बिकता है और इतनी ऊँची कीमत पर बिकता है की आम आदमी तो उसका एक पैग नही खरीद सकता। लेकिन मुझे एक बात नही समझ में आई, की ये अपनी दारू को बेजान क्यों कहते हैं। लोग तो इनकी दारू को बहुत जानदार मानते हैं। किसी किसी को तो एक बार पी हुई महीनो नही उतरती। लेकिन ये उसे बेजान कहते हैं। हो सकता है अपनी चीज की क्वालिटी ये ज्यादा बेहतर जानते हों। इनका दारू बेचने का तरीका भी गजब का है। सामान खुद बेचते हैं और नाम गणेश जी का लेते हैं। कुछ भी कहेंगे लेकिन गणेश जी कहते हैं ये जोड़कर कहेंगे। अपनी जिम्मेदारी भी खत्म और सामने वाले पर बोझ भी पड  जाये। अब कोई ये तो कह नही सकता की गणेश जी ने गलत कहा था। अपना नाम ही नही लेते।

                 ज्योतिष को हमारे जीवन में इतने गहरे तक घुसा दिया गया है की उसके निकले मुहूर्त के बिना कोई काम नही हो सकता। हमारे एक पड़ौसी परेशान थे की उन्हें लड़की की शादी दिल्ली से जाकर मुंबई करनी पड रही थी। कारण था उस दिन दिल्ली में उनके बजट के हिसाब से कोई जगह नही मिल रही थी। मैंने कहा की दो-चार दिन बाद कर लो तो बोले मुहूर्त नही है। सारा देश उन दस दिनों में शादी करना चाहता है जिनमे मुहूर्त बताया गया होता है। उस दिन शादी के लिए न जगह मिलती है न खाना बनाने वाला , न बैंड बाजा। बाकि सारा साल सब कुछ खाली रहता है। अब तो ज्योतिषियों की हिम्मत इतनी हो गयी है की बच्चा पैदा होते ही कह देते हैं की सही समय पर नही हुआ। माँ बाप पर भारी रहेगा। उपाय में लाख रूपये का खर्चा बता देते हैं। डाक्टर कह रहा है की बच्चा सही समय पर हुआ है और कोई समस्या नही है लेकिन माँ बाप मानने को तैयार नही हैं। वो एकबार भगवान की मूर्ति की तरफ नाराजगी से देखते हैं की तुम भी कैसे कैसे काम करते हो, कम से कम सही समय का तो ध्यान रक्खा होता। तुम्हे नही मालूम था तो किसी ज्योतिषी से पूछ लेते। हमारे सिर ये फालतू की समस्या डालने की क्या जरूरत थी। गलती तुम करते हो और भुगतनी हमे पड़ेगी। 

                                          इस धंधे के बाकि व्यापारी भी छाती थोक कर धन्धा करते हैं। अख़बारों के विज्ञापन पढ़ लीजिये।     " सब जगह से निराश , 101 % गारण्टी के साथ काम करवाएं। मेरा किया कोई काट नही सकता। बाबा मूसा बंगाली -- महाकाली उपासक " इतनी गारंटी तो कोलगेट भी नही देती। मैं कहता हूँ की इन पर सर्विस टैक्स क्यों नही लागु किया जाता। वरना सरकार को बैठे बिठाये बड़ी आमदनी का जरिया हो जाता।

                   लेकिन कई बार ऐसा भी होता है की ज्योतिषी मुहूर्त देख कर पुल का उद्धघाट्न तय करता है। नेताजी नारियल फोड़ कर घर नही पहुँचते और पुल गिर जाता है। लड़का लड़की दोनों के माँ बाप अच्छी तरह शुभ मुहूर्त देखकर शादी करते हैं और छह महीने में नौबत तलाक की आ जाती है। जिस बच्चे को वो बिलकुल सही समय और योग के अनुसार पैदा हुआ बताते हैं वही ऐसे ऐसे कुकर्म करता है की माँ बाप को मुंह छिपाना मुश्किल हो जाता है। पर इसकी जिम्मेदारी लेने को कोई तैयार नही है। ज्योतिषी फ़ीस लेकर भविष्य बताता है और मुसीबत का उपाय करता है लेकिन परिणाम उल्टा निकलता है। कानून के हिसाब से तो यह ग्राहक सुरक्षा अदालत का मामला बनता है। सरकार को चाहिए की वो ज्योतिष को व्यापार घोषित कर दे ताकि लोग अदालत जा सकें। 

                       पिछले दिनों ये खबर आई थी की कुछ विश्वविधालय ज्योतिष का डिग्री प्रोग्राम शुरू कर रहे हैं। मैं कहता हूँ की देश धन्य हो जायेगा। एक तो इससे विज्ञानं के क्षेत्र में हमारी स्थिति सुधरेगी और हम योग दिवस की तरह ज्योतिष के नोबल पुरुस्कार की मांग कर सकते हैं। इससे कम से कम एक नोबल पुरुस्कार हर साल हमारे लिए पक्का हो जायेगा। दूसरा सरकार के सभी सरकारी विभाग एक स्थाई ज्योतिषी रख सकेंगे जो यह बता सकेगा की किस इमारत का फीता कौनसे मंत्री से कटवाना शुभ रहेगा। सरकार तय कर सकेगी की कौनसी सड़क किस मुहूर्त में शुरू की जाये। जिस दिन राहुकाल हो उस दिन दफ्तर में छुट्टी रक्खी जा सकती है। दफ्तर खुलने का समय बाकायदा चौघड़िया देखकर तय किया जा सकता है। साथ ही संविधान में जो साइंटिफिक टेम्परामेन्ट को बढ़ावा देने जैसी उल-जलूल बातें लिखी गयी हैं उन्हें घोषित रूप से खत्म किया जा सकेगा और उसके लिए सरकार को इतने लचर बहाने बनाने की जरूरत नही पड़ेगी जैसे वो अब बना रही है। इसलिए विश्व महत्त्व के इस काम पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है और संसद के मानसून सत्र में इसके लिए प्रस्ताव लाया जा सकता है। बल्कि मैं तो कहता हूँ की उतना इंतजार करने की भी जरूरत नही है, इसके लिए एक अध्यादेश लाया जा सकता है। वैसे भी सरकार इस महीने कोई अध्यादेश नही लाई है और उसकी छवि खराब हो रही है। 

 

खबरी -- उम्मीद रखनी चाहिए की सरकार अच्छा सा मुहूर्त देखकर अध्यादेश जरूर लाएगी।

              
               

Sunday, July 5, 2015

Vyang -----बड़ा धार्मिक दिखने का मुकाबला

 

खबरी -- लोगों में धार्मिक होने की जैसे हौड़ लगी हुई है।


गप्पी -- ये हौड़ धार्मिक होने की नही है। धार्मिक दिखने की है। होने और दिखने में फर्क होता है। दिखने के लिए होना जरूरी शर्त नही है। उसी तरह जैसे होने के लिए दिखना जरूरी शर्त नही है। धार्मिक होने और दिखने में उतना ही फर्क है जितना आसाराम बापू और विवेकानन्द में है। आजकल विज्ञापन का जमाना है। हर चीज की मार्केटिंग हो रही है। व्यक्ति समाज में खुद की भी मार्केटिंग करता है। धर्म और व्यक्ति दोनों ब्राण्ड हो गए हैं।

                     विज्ञापन में किसी वस्तु के बारे में जो बातें कही गयी होती हैं जरूरी नही है की वो चीजें उसमे हों। बल्कि यों कहिये वे चीजें उसमे होती नही हैं। इसके क़ानूनी पचड़े से बचने के लिए विज्ञापन कम्पनी उसमे नीचे छोटे छोटे अक्षरों में सूचना लिख देती हैं। लेकिन धार्मिक दिखने के मुकाबले वाले लोग ऐसा नही करते बल्कि उल्टा जोर जोर से उसके होने का झूठा दावा करते हैं। 

                  कई बार ये लोग ऐसी हरकतें करते हैं की समझ से बाहर की बात हो जाती है। मेरे दो पड़ौसी हैं जो एक ही टाइम पर छत पर जाते हैं सूर्य को पानी देने। एक दिन एक आदमी ने देखा की दूसरे का पानी लाल रंग का है। उसने उससे पूछा की पानी लाल क्यों है। पहले ने जवाब दिया की पानी देने के बाद सूर्य महाराज को तिलक भी तो करना होता है इसलिए पानी में सिंदूर से तिलक किया हुआ है इसलिए पानी लाल दीखता है। पहले आदमी में काटो तो खून नही। इसका मतलब है तुम सूर्य के मुझसे बड़े भगत हो,  देख लूँगा तुम्हे, ऐसा मन ही मन बड़बड़ाता हुआ वो नीचे आ गया। चार पांच दिन वो अलग से पानी देने गया। छठे दिन वो उसके साथ ही पहुंचा। आज उसके पानी में सिंदूर तो था ही थोड़े से चावल और शककर के दाने  भी थे। अब पूछने की बारी पहले की थी। 

         " वो क्या है की हमारे यहां देवताओं को तिलक चावल के बिना नही करते। और तिलक करने के बाद मीठा मुंह तो करवाना ही होता है। अब जिनको ये नही मालूम तो नही मालूम। " दूसरे आदमी ने जवाब देकर पांच दिन से रोक कर रखी हुई भड़ास निकाल ली। 

               दूसरा आदमी  एक हफ्ते उसके साथ पानी देने नही गया। 

   एक हफ्ते बाद पहला आदमी पानी देने गया तो उसके पानी  में सिंदूर, चावल,शक़्क़र के साथ लाल रंग का धागा भी था जिसे मौली कहते हैं। 

                   दूसरे आदमी ने देखा और कुढ़ कर नीचे आ गया। 

           अगले हफ्ते उसके पानी के साथ बाकि की सारी चीजें तो थी ही साथ में जलती हुई अगरबत्ती भी थी। 

           अगले हफ्ते पहला आदमी अगरबत्ती के साथ दीपक भी लिए था। 

   दो महीने में ये हाल हो गया की दोनों पानी के लोटे के साथ सामान से भरी हुई एक थाली भी लेकर छत पर जाने लगे। 

                     ये बड़ा धार्मिक दिखने का मुकाबला था। 

       हमारी सोसायटी में एक आदमी ने सुंदर कांड का प्रोग्राम रखा। सोसायटी के कई लोगो को बुलाया। सबको प्रशाद देकर विदा किया। अगले शनिवार को दूसरे आदमी ने सुंदर कांड का प्रोग्राम रखा। बाकि सारी चीजें तो वैसी ही थी लेकिन उसने लाऊड स्पीकर और जोड़ दिया। पूरी रात सोसायटी शोर से परेशान रही। सुबह मैंने उससे पूछा की भाई साब आपने लाऊड स्पीकर क्यों रक्खा। 

                " देखो भाई साब, प्रोग्राम किआ जाये तो थोड़ा ढंग से किया जाए। सुंदर कांड रखते हो तो थोड़ा खर्चा करने की भी हिम्मत रखो। पूरी सोसायटी के कान में भगवान का नाम पड गया। " उसने आसपास के आदमियों को भी सुनाकर कहा। 

                  " लेकिन भाई साब, लोगों को परेशानी भी हुई। सारी रात लाऊड स्पीकर बजाना क्या अच्छी बात है। आप सभ्य आदमी हैं। " मैंने कहा। 

                 वो गुस्से से कांपने लगा। " सभ्य होगा तू, तेरा बाप। तेरी हिम्मत कैसे हुई मुझे सभ्य कहने की। जुबान संभालकर बात किया करो। "

               मैं वापिस आ गया। 

              एक पैसे वाला आदमी जागरण रखवाता है। बड़ी भीड़ होती है। दूसरे आदमी ने जागरण में फ़िल्मी हीरो और हीरोइन को बुलवा लिया। वो बड़ा भगत था। 

              शहर में एक बड़े नामी कथावाचक का प्रोग्राम हुआ। शहर के बड़े बड़े लोग कथा सुनने जाते। ये कथावाचक भी अपने नाम के आगे सन्त लिखते हैं। एक दिन एक पैसे वाले बड़े सेठ ने उन्हें घर बुला लिया। साथ में उसने अपने सारे विरोधिओं और मिलने वालों को भी न्योता भेज दिया। सभी आये। सबके भोजन के बाद भरे हुए हाल में सन्त ने कहा की " मैं कभी किसी के घर जाता नही हूँ। भई सन्तों को गृहस्थियों से जरा दूर ही रहना चाहिए। लेकिन इन भाई साब के साथ प्रेम का व्यवहार है, बहुत धार्मिक विचारों और संस्कारों वाला परिवार है इसलिए इंकार नही कर सका। "

                लाखों का खर्चा वसूल हो गया। ये बड़े धार्मिक हो गए। 

आजकल तो लोग एक दूसरे से सतसंग में जाने के बारे में इस तरह पूछते हैं जैसे क्लब के बारे में पूछ रहे हों। ये सतसंग नए जमाने के क्लब हैं। जो काम लोग पहले क्लबों में साधते थे अब सतसंग में साधते हैं। एक पुराने फ़िल्मी गाने की लाइने इस स्थिति को बखूबी बयान करती हैं। 

                             देवा हो देवा गणपति देवा ,

                                                  तुमसे बढ़कर कौन। 

                            और तुम्हारे भक्त जनो में ,

                                                    हमसे बढ़कर कौन।

Tuesday, June 30, 2015

गाय के खेत चर जाने को नुकसान नही मानना चाहिए

गप्पी -- ये बात मैं गाँव में भी सुनता था बचपन में। गाय हमारे देश में बहुत ऊँचा स्थान रखती है। हमारे देश में हजार आदमी मर जाएँ कोई फर्क नही पड़ता, लेकिन एक गाय मर जाये तो दंगे हो जाते है। घर जल जाते हैं। कुछ लोग तो बस यही  काम करते हैं।

                      लेकिन ये ऊपर वाली बात की, गाय अगर खेत चर जाये तो पुण्य ही होता है, ये बात बहुत बार कही और सुनी गयी है। लेकिन मुझे याद नही आता ये बात कहने वालों में एक भी आदमी ऐसा था जिसके पास खेत हो। ये बात कहने वाले बहुत से लोगों के पास अलबत्ता गाय जरूर थी। या फिर वो लोग थे जिनका गाय से रिश्ता बस सुबह सुबह रोटी खिलाने तक सिमित था।

                           अब तीन तरह के लोग हो गए। एक वो जिनके पास गाय थी पर खेत नही थे। दूसरे वो जिनके पास खेत थे भले ही गाय हो ना हो। और तीसरे वो जिनके पास ना गाय थी और ना खेत थे। अब जिन लोगों के पास गाय थी और खेत नही थे वो ये बात बड़ी जोर शोर से कहते थे। वो ये भी कहते थे की गाय तो सबकी माता होती है। लेकिन जब दूध निकालने का समय होता था तो गाय केवल उनकी माता रह जाती थी। कोई दूसरा उसके नजदीक भी नही जा सकता था। और लोगों को अपनी ही माता का दूध खरीदना पड़ता था।

                 अब गाय के साथ बछड़े भी होते हैं। और जाहिर है की जब गाय दूसरे का खेत चरती है तो बछड़े भी उसके साथ चरते हैं। अब माँ वाले रिश्ते से बछड़ा हमारा भाई हुआ। बछड़ा बड़ा होकर बैल बनता है और खेत में काम करता है। लेकिन वो उस खेत में काम नही करता जिसे उसने मुफ्त में चरा होता है बल्कि उस खेत में करता है जिसमे गाय का मालिक करने को कहता है। लेकिन कुछ गाय बड़ी भाग्यशाली होती हैं। उनका बछड़ा बड़ा होकर बैल नही बनता बल्कि सांड बनता है।ये रिश्ते वाला भाई नही बल्कि "भाई " होता है। सांड बनने से एक तो उसे सारी जिंदगी के लिए काम ना करने छूट मिल जाती है और दूसरे उसे किसी का भी खेत चरने का लाइसेंस मिल जाता है।

                     आजकल जो गाय और बछड़े हमारा खेत चर रहे हैं वो कहते हैं की उनके पास खेत चरने का लाइसेंस है। वो ये भी कहते हैं की ये लाइसेंस उन्हें हमने दिया है। इसलिए हमे कम से कम पांच साल तो इस खेत चरने पर एतराज नही करना चाहिए। फिर भी अगर कोई एतराज कर ही देता है तो आसपास से जोर की आवाज आती है अरे अरे क्या कर रहे हो ? गोमाता के ऊपर आरोप लगा रहे हो। शास्त्रों का इतना ज्ञान भी नही हैं। थोड़ी शर्म करो अधर्मिओं। तुम्हारे खेत में गौमाता ने मुंह मार लिया तो समझो तुम तो धन्य हो गए।

                       मैं ध्यान से देख रहा हूँ की इनमे से भी किसी के पास खेत नही है केवल गाय हैं। ये अपनी गाय का दूध निकालते वक़्त सारे दरवाजे बंद कर लेते हैं। ये लोग खुद दूध पीते  है और दूसरों को गाय का पेशाब पीने की सलाह देते हैं। ये लोग गाय के पेशाब में जितने गुण बताते हैं उतने तो दूध में भी नही होते। जो लोग अंदर की बात जानते हैं उनका  कहना है की ये गाय अमेरिकन जर्सी गायों से भी ज्यादा दूध देती हैं। खेत वालों से ये बात छिपाई जाती है।

                           अब हमारी सरकार ने हमारे राजनैतिक जीवन में गाय का कितना महत्त्व है ये साबित करने के लिए गौमांस पर प्रतिबन्ध लगा दिआ। सामाजिक जीवन में गाय का महत्त्व तो सबको मालूम ही था सरकार को छोड़ कर। गाय का कत्ल करने पर भी प्रतिबंध लगा दिया। अलबत्ता कोई गौशाला वाला सारा चंदा खुद खा जाये और गाय भूख से मर जाये उस पर प्रतिबन्ध नही है। उस पर प्रतिबन्ध लगाने से वो लोग भी फंस सकते थे जो केवल दूध पीते है। हमारी सरकार दूरदर्शी है सो इस तरह का फैसला कैसे ले सकती थी। हाँ तो हम गौमांस पर प्रतिबन्ध की बात कर रहे थे। कुछ लोगों  ने इस बात पर एतराज किया की सदियों से गौमांस हमारा भोजन है तो उनको कह दिया गया की वो पाकिस्तान चले जाएँ। हमने गाय के मांस के निर्यात पर प्रतिबन्ध नही लगाया है इसलिए आप कृपया पाकिस्तान चले जाइए हम वहां गौमांस भेज देंगे आप खा लीजिये। ये सलाह देने के लिए सरकार ने कुछ लोगों की टीम बनाई हुई है और उन्हें भगवा ड्रेस कोड दिया गया है। लोगों को आइन्दा ध्यान रखना चाहिए की इस भगवा ड्रेस वाले लोग सरकार के आदमी हैं। लोगों की सुविधा के लिए ये व्यवस्था की गयी है। वैसे दो तीन लोग ऐसे भी हैं जो बिना भगवा कपड़े के भी लगातार रट लगाये रहते हैं की हमने कभी गौमांस नही खाया। कोई उनसे पूछता भी नही है फिर भी वो इस बात रट लगाये हुए है। या की वो असली राष्ट्रवादी हैं। मैंने किसी से पूछा की ये लोग ड्रेस में  क्यों नही हैं तो उसने बताया की इनके जिम्मे कुछ ऐसे काम भी हैं जहां भगवा ड्रेस पहनना मना है जैसे इफ्तार पार्टिओं का आयोजन करना। उसने ये भी बताया की चिन्ता मत करो भगवा कपड़े ये भी पहने हुए हैं लेकिन दूसरे कपड़ों के नीचे।

                           कुछ लोगों ने मांग की है की गाय को हमारा राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाये। अभी हमारा राष्ट्रीय पशु शेर है जो वैसे भी हमारे कर्मों के साथ मेल नही खाता। मैं कहता हूँ की गाय और शेर दोनों को राष्ट्रीय पशु रखा जाए तो क्या परेशानी है। वैसे भी सारे कामों में हमारी नीति दोगली ही होती है। दूसरा इससे हमे हमारी सही पहचान मिलेगी। घर में शेर और बाहर गाय। 

                            एक दूसरी तरह की गाय होती है जिसे नीलगाय कहा जाता है। इनके झुण्ड के झुण्ड होते हैं और पूरे खेत के खेत साफ कर देतें हैं। इनका झुण्ड जब खेत में घुसता है तो एक दो आदमी की तो हिम्मत नही होती इन्हे निकालने की। ये उस पर हमला कर देती हैं। तो लोगों ने तय किया की वो इक्क्ठे होकर इन्हे निकालेंगे। अब गाँव के लोग समूह बनाते हैं और इनके झुण्ड  भगा देते हैं। 

                       इसलिए मैं ये पूछना चाहता हूँ की ये जो पहली किस्म की जो गाय हैं उन्हें भी लोग इक्क्ठे हो कर क्यों नही निकाल देते। 

 

खबरी -- लेकिन इसके लिए उन्हें माँ बेटे की रिश्ते से बाहर आना पड़ेगा।

Monday, June 29, 2015

विज्ञानं का भविष्य बहुत उज्ज्वल है हनुमान जी की कृपा से

गप्पी -- मुझे अपने पड़ौसी के साथ सुबह सुबह बाहर जाना था। मैं उनके घर पहुंचा तो वे घर के बाहर ही मेरा इंतजार कर रहे थे। उनके साथ उनका सुपुत्र भी था जो आठवीं क्लास में पढ़ता है। पड़ौसी ने बताया की आज उसका विज्ञानं का पेपर है सो उसे भी लगे हाथ स्कूल छोड़ देते हैं। अच्छी बात है, मैंने कहा। हम तीनो साथ में चले। थोड़ी दूर चलने पर सड़क के किनारे हनुमान जी का मंदिर आया। मेरे पड़ौसी ने लड़के से कहा की बेटा जाओ मंदिर में जाकर हनुमान जी को प्रणाम करो और प्रशाद  भी ले लो। साथ ही ये भी बोल देना की हनुमान जी अगर नंबर अच्छे आये तो ग्यारह रूपये का प्रशाद भी चढ़ाएंगे। बेटा अंदर चला गया। विज्ञानं के पेपर में लड़का अब हनुमान जी के भरोसे था।

      मैंने पड़ौसी से पूछा," क्या तुम्हे लगता है की हनुमान जी ने विज्ञानं पढ़ा  होगा ?"

     " क्या सुबह सुबह मजाक करते हो भाई साब, भला हनुमान जी को विज्ञानं पढ़ने  की क्या जरूरत है वो तो देवता हैं उन्हें तो सबकुछ मालूम है। "

     " लेकिन उन्हें सीताजी का पता तो नही मालूम था। वो उसे ढूंढने लंका तक गए। सब कुछ मालूम था तो वहीं क्यों बता दिया खड़े खड़े। " मैंने पूछा।

     " देवताओं के बारे में ऐसी बातें नही करते वो नाराज हो जायेंगे। " पड़ौसी के चेहरे पर सचमुच घबराहट के भाव थे।

       तब तक बेटा काम निपटा कर आ गया और हम आगे चल पड़े।

       "बेटा क्या तुम्हे मालूम है की आदमी कैसे बना >"

      " मुझे कैसे मालूम होगा अंकल ! मुझे तो अभी आदमी बनने में देर है। आप पापाजी से पूछ लीजिये। " लड़के ने जवाब दिया।

      देर क्या मुझे तो इस बात में ही शक है की तुम्हारे पापा तुम्हे कभी आदमी बनने देंगे। मैंने मन ही मन सोचा। मैंने दुबारा कोशिश की ," बेटा मेरा मतलब था की पृथ्वी पर मनुष्य कैसे पैदा हुआ ?"

      " अंकल वो तो पापाजी कहते हैं की ब्रह्मा जी ने मनुष्य की रचना की। उधर स्कूल के टीचर कहते हैं की आदमी बन्दर से बना। " लड़के ने जवाब दिया।

         मुझे कुछ आशा बंधी।

    तभी मेरे पड़ौसी बोले ," टीचर और किताबों का क्या है जी  कुछ भी लिख देते है। लेकिन हमने तो अपने लड़के को अच्छे संस्कार दिए हैं। उसे सारी बातें बताते हैं।"

        मुझे लगा मौजूदा शिक्षा मंत्री मेरे पड़ौसी से प्रभावित होकर सारे देश को अच्छे संस्कार देने की कोशिश कर रही हैं।

           " लेकिन बेटा अगर परीक्षा में ये सवाल आया तो तुम क्या लिखोगे ?" मैंने फिर पूछा।

          " अंकल, वो तो पापाजी ने कहा है की जो टीचर ने बताया है वही लिख देना वरना ये अल्पबुद्धि टीचर नंबर नही देंगे। " लड़के ने जवाब दिया।

           " अच्छा बेटा ये बताओ की रॉकेट की खोज सबसे पहले कहाँ हुई थी ?" मैंने दूसरा सवाल पूछा।

           " हमारे यहां हुई थी महाभारत काल में। " बेटे की जगह बाप ने जवाब दिया।

    अब मेरी हिम्मत  जवाब दे चुकी थी।

         मैंने सीधा बाप से सवाल किया। " हमारे देश में विज्ञानं का क्या भविष्य है ?"

      " एकदम उज्ज्वल है हनुमान जी की कृपा से। " बाप ने पूरे इत्मीनान से जवाब दिया।

      मैंने उसे धमकाते हुए गुस्से से कहा," बच्चा स्कूल से कुछ पढ़ कर आता है और तुम दूसरा कुछ पढ़ा देते हो उसे घर पर। "

          " अब शास्त्रों में जो लिखा है वही पढाते है हम तो। स्कूल की किताबों का क्या है जी हर तीन साल में  बदल जाती है। शास्त्र थोड़ा ना बदलते हैं। " बाप पूरी तरह समझा हुआ था।

           "लेकिन शास्त्रों में तो ये भी लिखा है की धरती चपटी है गोल नही है और सूर्य उसके चारों तरफ चककर लगाता है। " मैंने कहा।

           " अब वो तो सबको दीखता है कोई माने या न माने। " उसने जवाब दिया।

         तभी उस लड़के का विज्ञानं का अध्यापक वहां से गुजरा। हमें और लड़के को देखकर रुक गया। बड़ी आत्मीयता से हमारे पास आया। थैले से निकाल कर प्रशाद हमे देता हुआ बोला," शहर के बड़े हनुमान मन्दिर गया था। बस किसी तरह स्कूल का रिजल्ट अच्छा आ जाए। "

           अब मुझे पूरा विश्वास हो गया की हमारे देश में विज्ञानं का भविष्य बहुत अच्छा है हनुमान जी की कृपा से। 

 

खबरी -- ऐसी शिक्षा का कोई मूल्य नही जो आपके विचारों को ऊपर नही उठा सके।

Friday, June 26, 2015

भगत की पुकार पर दौड़े आये भगवान

गप्पी -- सदियों से तुम्हारे बारे में ये बात फैलाई गयी है की तुम भगत की पुकार पर दौड़े चले आते हो। इस बात से प्रभावित होकर बहुत से लोग फँस जाते हैं। परन्तु तुम किन भगतों की पुकार पर दौड़ते हो यह न उनकी समझ में आता है और न मेरी समझ में आता है। मैं यहां हजारों लोगों को रोज तुम्हे पुकारते हुए देखता हूँ पर कभी तुम्हे आते हुए नही देखा। और लोग हैं की तुम्हे पुकारते ही रहते हैं। 

                 ऐसा भी नही है की तुम कभी आते ही नही हो। पुराणो में एक कथा है की अजामिल नाम के एक डाकू ने मरते समय अपने लड़के को पुकारा। उसके लड़के का नाम नारायण था। लेकिन तुमने सोचा की वो तुम्हे पुकार रहा है और तुम दौड़े चले आये और उसके लिए स्वर्ग के दरवाजे खोल दिए। मुझे समझ नही आता की तुम चोर डाकुओं की पुकार पर तो तुरंत आ जाते हो और कोई शरीफ आदमी जब तुम्हे पुकारता है तो तुम्हारे कान  पर जूँ भी नही रेंगती। इसी अजामिल वाली कथा से प्रभावित हो कर आसाराम बापू ने भी अपने लड़के का नाम नारायण रख लिया ताकि बाद में स्वर्ग के दरवाजे खुलवाने के काम आये। उसने अपने कर्मों का मिलान भी अजामिल के साथ किया था या नही ये नुझे मालूम नही। 

                इधर हमारी सरकार भी तुम्हारे पद चिन्हो पर चल रही है। जब भी उसकी पार्टी के किसी अजामिल का नाम किसी घोटाले में सामने आता है मदद के लिए दौड़ी चली आती है और बाकि सारा देश चिल्ला चिल्ला कर मर जाता है तो उसकी पलक भी नही झपकती। किसी के खिलाफ कोई दस्तावेज सामने आ जाता है तो कह देती है साइन नही है। साइन सामने आ जाते हैं तो कह देती है की नोटरी नही है। 

               इधर हमारे पड़ौस में एक बूढी अम्मा रहती हैं। पिछले कई दिन से रट लगाये हुए  थी चारधाम की यात्रा पर जाना है। बेटा  बहू समझा रहे थे अम्मा रहने दो रास्ता सही नही है। पिछली बार कितनी जाने चली गयी थी। अम्मा कहती हैं की बेटा अब बची ही कितनी है। अगर भगवान के रास्ते में मौत आती है तो स्वर्ग ही मिलेगा, सो मेरा जाने का प्रबन्ध कर दो। बच्चों ने मन मार कर भेज दिया। पहाड़ पर चढ़ते ही बाढ़ में फँस गयी। सैंकड़ों लोग फंसे हुए हैं। लेकिन अम्मा है की रो रोकर बुरा हाल है। हाय अभी तक तो मैंने एक भी पोते की शादी नही देखी। सेना के जवान हेलीकॉप्टर से लोगों को निकाल रहे हैं। अम्मा धक्के मार मार कर सबसे आगे आ रही है। एक नौजवान ने एतराज किया तो बोली तुम्हारा क्या है तुम तो जवान हो। वो जवान इस तरह कह रही थी जैसे कह रही हो उठाईगिरे हो। अब अम्मा की आँखे आसमान पर लगी हैं।  न न न , ज्यादा खुश मत होओ वो आसमान पर तुम्हारा नही हेलीकॉप्टर का इंतजार कर रही है। उसे अब रेस्क्यू टीम पर तुम्हारे से ज्यादा भरोसा है। ये तुम्हारे लिए बुरी खबर है की लोगों का भरोसा आहिस्ता आहिस्ता तुम्हारे से उठ रहा है। 

               एक आदमी ने मुझसे कहा की तुम बेकार की बात कर रहे हो। भगवान अपने सच्चे भगतों की पुकार जरूर सुनते हैं। अभी खबर आई है की ISIS ने 18 लोगों की हत्या इस लिए कर दी की उन्होंने रमजान के दौरान खाना खा लिया था यानि रोजा नही रक्खा था। इन 18 लोगों में दो बच्चे भी थे जिन्हे तुम्हारे इन भगतों ने फांसी दे दी। मेरा अनुमान है की उन्होंने तुम्हे जरूर पुकारा होगा। आवाज शायद साफ न हो क्योंकि गले में रस्सी लिपटी हुई थी। लेकिन पुकारा तो होगा। लेकिन तुम नही आये। क्या तुम मानते हो की उनकी पुकार सच्चे दिल से नही थी। या फिर मारने वाले बड़े भगत थे। 

                     मैं तुमसे ये विनती नही कर रहा की गरीबों और मजलूमों की पुकार पर तुम जरूर आओ। मुझे मालूम है तुम नही आओगे। मैं तो केवल ये कह रहा हूँ की इन अजामीलों की आवाज पर उन्हें बचाने भी मत आओ। कहीं ऐसा ना हो लोगों की समझ में ये आ जाये की अजामिल, सरकार और तुम, तीनो से एक साथ निपटना पड़ेगा। 

खबरी -- गरीब आदमी को अब भगवान के सहारे से बाहर निकलना होगा। अपने रास्ते निकालने होंगे।

 

Monday, June 22, 2015

हरी अनन्त, हरी कथा अनन्ता - आधुनिक महाभारत की कथा

गप्पी -- जिस तरह हरी ने इस संसार की रचना की, समय समय पर अवतार लेकर धर्म की रक्षा की, असंख्य लीलाएँ की और लोगों को संदेश दिए, उससे हरी कथा अनन्त हो गयी है। उसी तरह एक संसार की रचना और की गयी जिसे आईपीएल का संसार कहा जाता है। इस संसार के रचयिता ललित प्रभु हैं। इनकी कथा भी उतनी ही अनन्त है। जैसे जैसे इसका संसार लोगो के सामने दृष्टिगोचर हो रहा है इसका अनन्त स्वरूप सामने आ रहा है। कहते हैं की भगवान के हजारों नाम हैं उनमे एक नाम ललित भी है। इसमें एक महाभारत की शुरुआत हो गयी है। परन्तु इसके पात्र बदल गए हैं। किसी को समझ नही आ रहा है की कौन किसकी तरफ है।

                        इस युद्ध के महान धनुर्धर नरेन्द्र युद्ध के मैदान के बीचों बीच खड़े हैं। पहली महाभारत की तरह इस बार वो युद्ध से भागते नही हैं। परन्तु उन्हें समझ नही आ रहा है की वध किसका करना है। दुश्मन के खेमे से आवाज आ रही है की उसे अपने ही पक्ष के योद्धाओं में से कुछ का वध कर देना चाहिए। वो प्रभु  की तरफ देखते हैं। प्रभु  अपना विराट रूप दिखाते हैं। ये रूप इतना विराट है की धरती के दोनों छोरों तक फैला हुआ है। इसमें उन्हें सुषमा स्वराज का सिर दिखाई देता है अपने पूरे परिवार के साथ, वसुन्धरा राजे का सिर भी है अपने पुत्र के साथ, शशि थरूर का सर भी है , शरद पवार और प्रफुल्ल पटेल का सर भी है। महाराष्ट्र के पुलिस कमिशनर राकेश मरिया का सिर भी है। और भी न जाने कितने सिर हैं जिनकी शक्लें अभी साफ नही हैं। अर्जुन, मेरा मतलब है की नरेन्द्र असमंजस में हैं। प्रभु  धीरे धीरे मुस्कुरा रहे हैं और कह रहे हैं की वत्स," देख लो और पहचान लो, कौन दुश्मन है और कौन साथी ," नरेंद्र हक्के बक्के खड़े हैं। धीरे से पूछते है की प्रभु क्या मुझे भी आपकी तरह रण छोड़ कर भागना पड़ेगा।

                      परन्तु ये आधुनिक युग के प्रभु हैं। इन्हे मालूम था की कानून नाम के जरासंघ से वो हार सकते हैं। इसलिए युद्ध शुरू होने से पहले ही निकल लिए। अब लन्दन नाम की नई द्वारका में बैठकर ताल ठोँक रहे हैं की मैं जरासंघ से डरता नही हूँ। कंस के द्वारपालों को रिश्वत दे कर भाग निकले और अब वेनीश और मलेशिया में गोपियों के साथ रास रचा रहे हैं।

                          प्रभु  उपदेश देते हैं की मित्र अपने पिता देवेन्द्र से बात करके दो एक मेनका मंगवा लो और दुश्मन पक्ष के कुछ योद्धाओं को भेज दो। नरेन्द्र निराशा से कहते हैं की प्रभु सीबीआई नाम की मेनका को दुश्मन के दो बड़े योद्धाओं शंकर सिंह वाघेला और वीरभद्र सिंह के पास भेज चुके हैं। उसने अपने जाल में उनको फंसा भी लिया है परन्तु दुश्मन खेमा फिर भी मजबूत नजर आ रहा है। हमने जिन दो मोर्चो पर महिला योद्धाओं को लगा रक्खा है उनके बारे में अब कुछ साथी कहते हैं की ये कमजोर कड़ी हैं इन्हे बदल दो, वरना युद्ध हारने  का खतरा है। हमने उनको बदलने का सोचा ही था की उन्होंने संदेश भेज दिया की अगर उन्हें बदला गया तो वो अपनी सेना साथ में लेकर चली जाएँगी।

                       इसलिए हे प्रभु बहुत कन्फ्यूजन है , उचित मार्गदर्शन दीजिये।

प्रभु फिर मुस्कुराते हैं और कहते हैं की," हे संघेय ! तुमने मेरे साथ ठीक नही किया। तुम्हारे नियुक्त किये हुए पुजारी मेरा सारा चढ़ावा खा गए। जबकि तुमने वादा  किया था की न खाऊंगा और न खाने दूंगा।"

             नरेंद्र मुश्किल की मुद्रा में कहते हैं की हे प्रभु, आपने वचन के अनुसार अपनी पूरी यादव सेना तो दुश्मन को दे दी और खुद मेरी तरफ आने की बजाए द्वारका निकल गए। अब मेरे रथ का सारथी नही मिल रहा है। हमारे पक्ष में जिस एकमात्र योद्धा को रथयात्रा का अनुभव था हमने बब्रुवाहन की तरह उनका सिर युद्ध की शुरुआत में  उनके ही हाथों कटवा दिया था कुल की रक्षा के लिए। अब उनका कटा हुआ सिर भी अंट शंट बोलता रहता है। हमारे मराठा नरेश शल्य की भूमिका में आ गए हैं। लड़ भी हमारी तरफ से रहे हैं और गालियां भी हमे ही दे रहे हैं। अभिमन्यु अब दूध पिता बच्चा नही रहा। वो अब मगध नरेश है। हमने जिस चक्रव्यूह का निर्माण उसको  मारने  के लिए किया था उसमे वो भीम को साथ में लेकर घुस गए हैं। हमने दुशासन और जयद्रथ को भेजा तो है परन्तु वहां से खबर आ रही है की वो आपस में लड़ रहे हैं। इसलिए बहुत मुश्किल समय है प्रभु, अगर इस समय में उचित मार्गदर्शन नही मिला तो आपका ये मित्र और भक्त युद्ध हार सकता है। ऊपर  से आप अपने विराट रूप में जब राजीव शुक्ला का चेहरा दिखाते हैं तो साथ में अरुण जेटली का भी दिखा देतें हैं। अब हमारे पास कोई शकुनि भी नही है और हम केवल सुब्रमणियम स्वामी के भरोसे हैं। इसलिए हे माधव हमारी गलतियों को क्षमा करके इस मुसीबत से निकालिये।

           लड़ाई जारी है। भगवान के विराट रूप में और किस किस के सिर लगे हैं ये धीरे धीरे साफ हो रहे हैं। ये युद्ध कौरवों और पांडवों के बीच नही है। लोगों को लग रहा है की दोनों तरफ कौरव हैं। दोनों खेमे केवल एक दूसरे पर ही हमला नही कर रहे हैं बल्कि अपने पक्ष के योद्धाओं पर भी हमले हो रहे हैं। एक ही चीज एक जैसी है की प्रभु तब भी बिना हथियार उठाये सबको मार रहे थे और अब भी बिना हथियार उठाये संहार कर रहे हैं। हे प्रभु तेरी लीला अनन्त है। 

खबरी -- ये युद्ध भी अट्ठारह दिन में खत्म हो जायेगा क्या ?

Sunday, June 21, 2015

बन गया वर्ल्ड रिकार्ड, चलो अब काम करो।

खबरी -- सुना है योग दिवस पर कई वर्ल्ड रिकार्ड बन गए। 


गप्पी -- इसी लिए तो सारा देश लगा हुआ था। वरना योग की किसको पड़ी है। हम वर्ल्ड रिकार्डों से बहुत प्रेम करते हैं। और जहां भीड़ इक्क्ठी करने से वर्ल्ड रिकार्ड बन सकता हो वहां तो हम टूट पड़ते है। ये हमारा राष्ट्रीय चरित्र है। हमे महान होने में नही, महान दिखने में बहुत मजा आता है, सन्तोष मिलता है गर्व होता है। लेकिन अगर कोई जरा सा छेड़ दे तो सारी  असलियत सामने आ जाती है। 

                कुछ वर्ल्ड रिकार्ड ऐसे भी हैं जो हमारे नाम पर अपने आप बनते जाते हैं। हम उन पर भी गर्व महसूस करते हैं। दुनिया में सबसे ज्यादा कुपोषित बच्चों का रिकार्ड , सबसे ज्यादा भूखों का रिकार्ड, सबसे ज्यादा अनपढ़ों का रिकार्ड और शायद सबसे ज्यादा अनैतिक होने का रिकार्ड भी। कुछ रिकार्ड ऐसे भी हैं जिनको कभी भी कोई चुनौती नही हैं। ये हमेशा हमारे ही नाम पर रहने वाले हैं। जैसे दहेज के लिए बहुओं को जलाने का रिकार्ड, स्त्री भ्रूण हत्या का रिकार्ड। 

                  हम अपनी महानता का ढिंढोरा भी खूब पीटते हैं। हमारी क्रिकेट टीम बंगलादेश गयी तो हमने अपनी महानता के विज्ञापन अख़बारों में दिए। " बाप बाप होता है बेटा बेटा होता है " .क्रिकेट के विशेषज्ञ टीवी चैनलों पर हमारी महानता का प्रचार कर रहे थे। पर बेटा बताई जाने वाली बांग्लादेश की टीम ने हमें ऐन फादर्स डे के दिन पीट दिया। जब हारने  लगे तो हमारी सारी महानता खुल कर सामने आ गयी। मिस्टर कूल कहलाने वाले धोनी को धक्का मारते  हुए सबने देखा। हमारी टीम के सदस्यों को गाली  गलौच करते हुए भी सबने देखा। इसे खेल की भाषा में हारते हुए रोना कहते हैं। हम जीत नही पाये कोई बात नही लेकिन सम्मान से हार भी नही पाये। ये हमारा राष्ट्रीय चरित्र है। 

                   लेकिन हमने विश्व रिकार्ड तो बना लिया। आगे का क्या होगा। हम इस बात पर गर्व करते हुए की हमने विश्व को जीरो दिया गणित में जीरो हो गए। हम इस बात पर गर्व करते रहे की हमने दुनिया को सभ्यता सिखाई, सारी असभ्यता के रिकार्ड बनाते चले गए। महिलाओं के खिलाफ हिंसा, दलितों के खिलाफ भेदभाव शायद असभ्यता नही माना जाता। क्योंकि इसके उदाहरण तो राम राज्य में भी मिलते हैं। शम्बूक की हत्या और सीता का त्याग इसके क्लासिक उदाहरण हैं। इस तरह के काम करने के बावजूद अगर राम मर्यादा पुरुषोत्तम कहला सकते हैं तो हमने क्या गुनाह किया है। हमारी संस्कृति में पूर्ण पुरुषोत्तम होने के लिए चोरी और बेईमानी का शामिल होना पूर्व  शर्त है। इसीलिए कृष्ण को पूर्ण पुरुषोत्तम कहा गया है। हम गुरु हो कर शिष्य का अँगूठा काट सकते है हमारा अधिकार है। हम धर्मराज होते हुए पत्नी को जुए में हार सकते हैं। इन छोटी छोटी घटनाओं से हमारी महानता पर पहले भी फर्क नही पड़ता था अब भी नही पड़ता। 

                       खैर अब हमने विश्व रिकार्ड बना ही लिया है तो अब इस देश का सामान्य जन ये अपेक्षा करता है की अब थोड़ा काम भी कर लिया जाये। उन चीजों पर ध्यान दिया जाये जो महान होने के लिए नही लेकिन जीने के लिए जरूरी होती हैं।

Saturday, June 20, 2015

हम आगे तो बढ़ रहे हैं भले ही पीछे की तरफ

 गप्पी -- मैं शिक्षा के क्षेत्र की बात कर रहा हूँ। इसमें बहुत तेजी से तरक्की हो रही है। जैसा सरकार चाहती थी वैसी ही हो रही है। हमारे प्रधानमन्त्री डिजिटल इंडिया की बात करते थे। अभी अभी जो AIPMT की परीक्षा रद्द की गयी है उसके बारे में कहा गया है की उसमे एक चिप के द्वारा जो परीक्षा देने वाले के अंडरवियर में लगाई गयी थी, के द्वारा नकल की जा रही थी। किसी ने फोन करके इसकी सूचना पुलिस को दे दी और पुलिस ने छापा मारकर इस स्कैंडल को पकड़ लिया। परन्तु इससे ये बात तो साबित होती ही है की हम डिजिटल इंडिया की तरफ बढ़ रहे हैं। 

                   दूसरी महत्वपूर्ण बात जो शिक्षा के क्षेत्र हो रही है वो सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयास हैं जो शिक्षा के क्षेत्र में बहुत ही दूरगामी भूमिका निभा सकते हैं। हम शिक्षा के क्षेत्र में हमारी 5000 साल पुरानी संस्कृति की तरफ बढ़ रहे हैं। इसकी शुरुआत तब हुई जब हमारे प्रधानमन्त्री ने एक बारहवीं पास सांसद को इस क्षेत्र का मंत्री बना दिया। उसको ये जिम्मेदारी दी गयी है की वो विश्वविद्यालयों के कुलपति और उपकुलपति नियुक्त करें। ऐसा करने से पहले वो उनकी योग्यता की जाँच जरूर करेंगी। लेकिन कोई कह रहा था की किसी कुँए की गहराई मापने लिए डंडे की लम्बाई कुँए से ज्यादा होनी चाहिए। खैर ये पुरानी और दकियानूसी बात है। उन्होंने इस क्षेत्र में काम भी करना शुरू कर दिया है। पूना फिल्म इंस्टिट्यूट में गजेन्द्र चौहान को चेयरमैन नियुक्त कर दिया गया है। उनकी कुल योग्यता ये है की वो पिछले बहुत सालों से भाजपा से जुड़े रहे हैं। इस पर वहां हड़ताल हो गयी। वहां के छात्र कह रहे हैं की जिस पद पर कभी गिरीश कर्नाड , श्याम बेनेगल , अडूर गोपालकृष्णन जैसे ख्याति प्राप्त लोग रहे हो वहां सरकार ऐसी नियुक्ति कैसे कर सकती है। सरकार का कहना है की उनका तीस साल का फिल्म इन्डस्ट्री का अनुभव है। अब लोगों को ये बात समझ नही आ रही की क्या तीस साल सब्जी की रेहड़ी लगाने से कोई व्यक्ति बागवानी अनुसंधान का निदेशक होने की योग्यता प्राप्त कर सकता है। उसके बाकी निदेशक भी इसी तरह की योग्यताओं के अनुसार नियुक्त किये गए हैं। 

                     इससे पहले इतिहास अनुसंधान से जुडी एक पत्रिका का निदेशक मण्डल भंग कर दिया गया, जिसमे रोमिला थापर जैसे अंतरराष्ट्रीय श्रेणी के लोग थे। बाकि संस्थाओं के लिए भी योग्य लोगों की तलाश चल रही है। 

                     मैं कल्पना करता हूँ की मान लीजिये किसी विज्ञानं एवं तकनीकी संस्थान के निदेशक के पद के लिए इन्टरव्यू चल रहा हो तो उसका दृश्य कैसा होगा। साक्षात्कार चल रहा है। सामने बैठे उम्मीदवार से प्रसन्न पूछा जाता है, " आपकी विज्ञानं के क्षेत्र की जानकारी को अपडेट करने के लिए आप क्या करते हैं ?"

             " मैं उसके लिए पिछले तीस साल से "कल्याण" पढ़ रहा हूँ। " उम्मीदवार जवाब देता है। 

 " आपके विचारों का श्रोत क्या है और आप विज्ञानं के इतिहास के बारें में क्या जानते हैं ?" दूसरा प्रश्न पूछा जाता है। 

              " मैं मानता हूँ की विज्ञानं का उदय और अन्त हमारे वेदों में ही है। जो तरक्की हमने अस्त्र-शस्त्रों के क्षेेत्र में महाभारत काल में कर ली थी उसके बाद हमे और कुछ करने की जरूरत नही है। जहां तक विचारों का सवाल है तो गुरु जी ने जो "बंच ऑफ़ थॉट्स " लिखा था मैं नही समझता की उससे बाहर विचारों  अस्तित्व है। "

उम्मीदवार ने जवाब दिया। 

              इन्टरव्यू कमेटी के सदस्यों के चेहरे पर सन्तोष के साथ मुस्कान उभरी। उन्होंने बाकि बचे लोगों को वापिस भेज दिया। उपयुक्त उम्मीदवार मिल चूका था। 

 

खबरी -- हे भगवान इस देश का भविष्य अब केवल तुम्हारे हाथों  में है, इसे अपने अनुयायिओं से बचाइये।


एक बार फिर भ्रम आसन को तैयार देश

खबरी -- योग क्या क्या (नही) कर सकता है।


गप्पी -- हमारा देश योगियों का देश है। यहां बड़े बड़े योगी हुए हैं। लोगों ने हजारों साल तपस्याएँ की हैं। हमारे देश में हमेशा योगी और योगिराज बड़ी संख्या में रहे हैं।ये साधु बाबा और योगियों को अगर अलग बसा दिआ जाये तो एक दूसरा आस्ट्रेलिया बस जाये। समाज को गाली देने और उसी समाज पर पलने वाले ये परोपजीवी इतनी बड़ी संख्या में में दुनिया में और कही नही मिलेंगे। लेकिन हमारा देश फिर भी भूखा नंगा ही रहा। सालों पहले भी हमारी समस्या भूख , गरीबी और बेरोजगारी थी और आज भी वही है। आंकड़े कहते हैं की दुनिया के सबसे ज्यादा अन्धे हमारे भारत में हैं। योग दिवस पर हम इसका प्रदर्शन पूरी दुनिया के सामने करेंगे। हम पूरे देश में हर उमर के और हर प्रकार के शरीर के लोगों के लिए एक ही तरह के योगासन करेंगे। एक दोनों पैरों पर भी मुश्किल से खड़ा होने वाला आदमी एक पैर पर खड़ा होने की कोशिश करेगा। जिसे कमर दर्द की शिकायत है और डाक्टर ने बैड पर आराम करने को कहा है वो चक्रासन करेगा। जो आसन कुछ लोग मोटा होने के लिए करेंगे, वही आसन कुछ लोग पतला होने के लिए भी करेंगे। 21 जून को एक ही दिन में हम योग का मजाक बना कर रख देंगे।हमारी जो समस्याएं हैं वो योग दिवस बाद भी रहने वाली हैं। फिर क्यों सारा देश इसके पीछे पागलों की तरह लगा हुआ है। 

                   हमारे देश में झूठी प्रशंसा के भूखों की कमी नही है। कभी नही रही। देवता भी झूठी प्रशंसा से प्रसन्न होते थे।

Wednesday, June 17, 2015

माया का मोह कैसे छोड़ूँ

खबरी -- क्या कभी सतसंग में गए हो ?


गप्पी -- कई बार गया हूँ। लेकिन मुझे सतसंग करने वालों और सुनने वालों दोनों में कोई दिलचस्पी नही है। मेरे सारे मित्र  भी इस बात को जानते हैं इसलिए मुझे चलने के लिए कोई जोर नही देता। लेकिन एक दिन एक ऐसी घटना हुई जिसे मैं जरूर बताना चाहूंगा। 

                         मेरे एक मित्र मेरे पास बैठे थे। उनकी सतसंग में बहुत श्रद्धा थी। वो कई  बार अपने गुरु के गुणगान कर चुका था परन्तु हमारी तरफ से कोई उत्सुकता न दिखाने  के कारण निराश हो जाता था। नौकरी से रिटायर हो चुका था और लड़के अच्छे पदों पर थे। कोई काम उनके जिम्मे नही था यानि सतसंग का पूरा योग बनता था। तभी वहां हमारे एक दूसरे मित्र का आगमन हुआ। ये बेचारा स्वभाव से थोड़ा भोला था और काम धन्धे के बारे में  हमेशा परेशान रहता था। इसी वजह से घर में थोड़ी बहुत कहा सुनी भी हो जाती थी। वह परेशान हाल हमारे पास आता और हम उसे थोड़ी सांत्वना दे देते और उसका धीरज बंधाते तो वह सामान्य हो जाता। उस दिन भी वह बुरी तरह परेशान था। उसने घर के झगड़े का जिक्र किया ही था की पहला मित्र बोला चलो आज तुम मेरे साथ सतसंग में चलो। वहां गुरु जी की वाणी सुनोगे तो सारे सन्ताप दूर हो जायेंगे। उन्होंने जोर देकर मुझे भी साथ आने को कहा। मैं जाना नही चाहता था क्योंकि दो एक बार मित्रों के साथ गया था तो वहां मैंने एकाध सवाल पूछ लिया और नतीजा ये निकला की दोनों दोस्तों के साथ हमेशा के लिए संबंध समाप्त हो गए। मैं वैसा कोई खतरा उठाना नही चाहता था परन्तु अधिक जोर देने के बाद मुझे साथ जाना पड़ा। परन्तु मैंने तय कर लिया की सवाल पूछना तो दूर, मैं एक शब्द भी नही बोलूंगा। 

                       हम वहां पहुंचे। हमारे से पहले ही वहां 30 -35 लोग बैठे हुए थे। उनके गुरूजी भी बैठे हुए थे। सतसंग थोड़ी देर पहले शुरू हो चुका था। प्रवचन चालू था। गुरूजी ने एक बार रुक कर हमारी तरफ देखा और जब हम बैठ गए तो आगे बोलना शुरू किया। 

                        " आत्मा और शरीर का किराये के मकान जैसा संबंध है। किरायेदार को चले जाना है और मकान को वहीं रह जाना है। शरीर को सुख दुःख का अनुभव होता है, आत्मा को नही होता। इसलिए मनुष्य को शरीर की चिंता नही करनी चाहिए केवल आत्मा की शुद्धि की तरफ ध्यान देना चाहिए। मनुष्य माया के जाल  में जकड़ा हुआ है माया उसे तरह तरह का नाच नचाती है। इसलिए मनुष्य को माया के मोह में नही पड़ना चाहिए। "

                       मैंने देखा की हमारा नया दोस्त कुछ ज्यादा ही सतर्क हो कर सुन रहा है। 

                      गुरु जी ने आगे बोलना शुरू किया। " मनुष्य को चाहिए की वो माया को छोड़ दे और शांति की तलाश करे। मनुष्य का उद्देश्य शांति प्राप्त करना होना चाहिए। "

                   हाल में भीड़ बढ़ गयी थी और पहले ही गर्मी के मौसम के कारण गर्मी और बढ़ गयी। गुरु जी ने  सफेद अँगौछे से पसीना पौंछा और पहली कतार में बैठे एक आदमी को सम्बोधित किया। ये आदमी एक मिल मालिक था जो आधे शहर का पैसा खा जाने के कारण बदनाम था। 

                   " विकट गर्मी है। साधकों की आत्मा को बहुत कष्ट होता है। एकाध वातानुकूलित यंत्र का प्रबंध हो जाता तो अच्छा रहता। "

                  क्यों नही गुरूजी , कल ही करवा देता हूँ। मिल मालिक ने जवाब दिआ। 

                   दोनों के चेहरे पर संतुष्टि  भाव उभर आये। मैंने अपने आप को बड़ी मुश्किल से ये पूछने से रोका की अभी तो आप कह रहे थे आत्मा को कष्ट नही होता। परन्तु मुझे मेरे मित्र पर दया आई और मैंने नही पूछा। परन्तु मुझे मालूम पड़ गया था की अब सतसंग ज्यादा से ज्यादा आधे घंटे और चलेगा क्योंकि उसके बाद गुरूजी को अपनी आत्मा को ठंडी बियर में डुबोने की जरूरत पड़ेगी वरना वो इस नश्वर शरीर को छोड़ जाने की कोशिश कर सकती है। वही हुआ , गुरूजी ने सतसंग समाप्त करने की घोषणा कर दी। हम तीनो बाहर आए। हमारे सतसंगी साथी ने नए साथी से पूछा की कुछ समझ में आया की नही। 

                        नया साथी पहली बार सतसंग आया था और स्वभाव से भोला भी था। उसने कहा की गुरूजी तो सचमुच अंतर्यामी हैं। उन्हें मेरी समस्या का बिना बताये ही पता चल गया। ये बात सही है की माया ने मुझ पर अधिकार जमा रक्खा है। और माया के अधिक मोह के कारण ही हमारे पांच बच्चे हो गए जो इस महंगाई के जमाने में ज्यादा ही हैं। लेकिन मुझे गुरूजी की एक बात ठीक नही लगी।  उसने उलाहना देने जैसा मुंह बनाया। 

             मैं अपनी हंसी को मुश्किल से रोके हुए था। 

           क्या पसंद नही आया? सतसंगी ने पूछा। 

  यही की माया को छोड़ दो। ये बात सही है की मैं भी शांति को ज्यादा पसंद करता था परन्तु अब इस उम्र में मैं माया को छोड़ दूँ तो मेरे बच्चों का क्या होगा। उसने भोलेपन में जवाब दिया। 

               मेरे मुंह से ठहाका निकला और हँसते हँसते पेट में बल पड़ गए। मेरे सतसंगी मित्र की हालत ऐसी थी जैसी उस आदमी की होती है जो खजाने की तलाश में बिल में हाथ डालता है और उसे बिच्छू काट लेता है।

Thursday, June 4, 2015

और अब सोमनाथ के घेराबंदी

खबरी -- आज की ताजा खबर क्या है ?

गप्पी -- कल टीवी पर खबर सुनी की सोमनाथ ट्रस्ट ने सोमनाथ मंदिर में गैर हिन्दुओं के प्रवेश पर रोक लगा दी। अब अगर कोई गैर हिन्दू मंदिर में जाना चाहे तो उसे मैनजमेंट से पहले अनुमति लेनी होगी और मंदिर में जाने का मकसद बताना होगा। मान लो कोई आतंकवादी मकसद वाले खाने में ये लिख दे की वो मंदिर को उड़ाना चाहता है तो मैनजमेंट उसको अनुमति नही देगी। लेकिन साहब मुझे ये खबर पढ़कर मजा आ गया अब भगवान सोमनाथ यानि शंकर को किस किस से मिलना है ये ट्रस्ट तय करेगी। बड़ा भगवान बना फिरता था 

              सोमनाथ मंदिर की जो ट्रस्ट है उसमे नरेंद्र मोदी , लाल कृष्ण आडवाणी और गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल शामिल हैं। अब केशुभाई और आडवाणी जी का तो बीजेपी में ये हाल है की कोई नेता इनसे मिलना भी चाहे तो उसे पार्टी हाई कमान से पहले अनुमति लेनी होती है और मकसद भी बताना होता है। ये दोनों नेता कहते होंगे देखो सोमनाथ तुमने हमारा ये हाल कर दिया तो हमने भी तुम्हारा यही हाल  कर दिया। अब तुम्हारे जो भूत-प्रेत , राक्षस , चुड़ैल तुमसे मिलने की कोशिश करेंगे उन्हें हिन्दू होने का प्रमाण पत्र साथ में रखना होगा। मुझे तो लगता है की ट्रस्ट ने आपको भी कहा होगा की आप यूँ फालतू में हर आदमी से मिलना बंद कीजिये , आप भगवान हैं और हर भगवान की एक रेपुटेसन होती है। मुझे तो ये भी लगता है की अब गैर हिन्दुओं के बाद अगला नंबर दलितों का आने वाला है। 

               लोग आपको भोले शंकर कहते हैं।  कहते हैं की आपको महादेव इसलिए कहा गया की आपने तपस्या करने वाले को वरदान देते समय उसकी जाती, धर्म नही पूछा और असुरों को भी वरदान दिए।  देवताओं ने कई बार इसकी शिकायत ब्रह्मा जी से की परन्तु ब्रह्मा जी ने कह दिया मामला उनके बस  से बाहर है। लेकिन अब समय बदल गया  है भोलेनाथ, अब यहां ब्रह्मा जी की नही नरेन्द्र मोदी जी की चलती है। इसलिए आप अपनी ओकात में रहेंगे तो अच्छा रहेगा वरना आपको भी मार्गदर्शक मंडल में भेजने में कितनी देर लगती है। वैसे भी आपके ज्योतिर्लिंग की ज्योति अब अपने ही ट्रस्ट के लोगों के दिमाग रौशन करने लायक नही बची।

                  कुछ लोग कह रहे हैं की सोमनाथ का मंदिर सरकार के खर्चे पर बना था और उस समय के राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रशाद ने इसका उदघाटन किया था।

डॉ. राजेन्द्र प्रशाद को लगा होगा की वो राष्ट्रीय गौरव और साम्प्रदायिक एकता का पुनर्निर्माण कर रहे है। परन्तु समय के साथ लोग इस निर्माण को भी राष्ट्रीय शर्म में बदल सकते है इसका उन्हें अनुमान नही रहा होगा। 

                   वैसे जब कोई खबर आती है की मुंबई में किसी ने इसलिए मकान भाड़े पर देने से मना कर दिया की सामने वाला मुस्लिम था या नौकरी देने से मना कर दिया ये कहकर की वो केवल हिन्दुओं को नौकरी पर रखते हैं तो सफाई में ये कहा जाता है की ये केवल एक कर्मचरी की भूल थी और  की यह  केवल किरायेदार और दलाल का झगड़ा है तो इनकी मासूमियत पर मर मिटने को जी चाहता है। ये  कोई इक्का दुक्का भूल नही हैं बल्कि हिन्दू राष्ट्र के सपने की बड़ी साजिश का हिस्सा हैं। लेकिन तुम  कितने ही सोमनाथो की घेराबंदी कर लो ये सपना कभी पूरा नही होगा।

Wednesday, June 3, 2015

आखिर अम्बेडकर क्या चाहते हैं

खबरी -- इन दिनों डॉ. अम्बेडकर पर कुछ ज्यादा मंथन नही हो रहा है ?


गप्पी -- अरे, इस मंथन पर याद आया।  मैं तुम्हे आज सुबह की बात बताता हूँ।  सुबह-सुबह मुझे ऐसा लगा जैसे मैं दिल्ली के इंडिया गेट पर खड़ा हूँ। वहां बड़ी तादाद में लोग जमा हैं। गेट के बिलकुल सामने एक स्टेज बनी हुई है।  उसके एक सिरे पर एक आदमी खड़ा है हाथ में एक किताब पकड़े, चश्मा लगाये और नीले रंग का कोट पहने। मैंने तुरंत पहचान लिया की ये तो डॉ. भीमराव अम्बेडकर हैं। मैंने इनकी बिलकुल इसी तरह की फोटो हजारों बार किताबों और अख़बारों में देखी है। उनकी आँखों में अजीब किस्म की बेचैनी और गुस्सा था और वो स्टेज के सिरे पर आगे पीछे टहल  रहे थे। स्टेज के दूसरे सिरे पर एक दूसरा आदमी खड़ा था जो पहनावे से तो बड़ा आदमी लग ही रहा था उसके साथ अंगरक्षकों का एक पूरा दस्ता था। लेकिन एक अजीब बात थी की उसकी शक्ल बार बार बदल रही थी। कभी वो इंदिरा गांधी जैसा लगता तो कभी वाजपेयी जैसा, कभी राजीव गांधी जैसा तो कभी नरेंद्र मोदी जैसा।  ओह, अब समझ में आया की ये भारत सरकार थी। दोनों के बीच में किसी मामले पर तीखी बहस चल रही थी। मैंने जिज्ञासावस आगे जा कर सुनने की कोशिश की। 

         मुझे हर दलित के लिए इंसान का दर्जा चाहिए।  अम्बेडकर चिल्लाये। 

         सरकार इसके लिए प्रतिबद्ध है।   सरकार ने थोड़ा झुकते हुए कहा। 

         लेकिन कब तक इंतजार करें, आजादी को 65 साल हो गए। तुमने वादा  किया था।  अम्बेडकर ने  तीखे स्वर में पूछा। 

          जब तक दर्जा  मिल नही जाता तब तक इंतजार कीजिए। सरकार एक बार फिर अपना वादा दोहराती है।   सरकार ने अपने स्वर को थोड़ा और नरम किया। 

        लोग अब भी सिर पर मैला ढो रहे हैं।  अम्बेडकर ने आष्चर्य व्यक्त किया। 

         हम पूरे देश में शौचालयों का निर्माण कर रहे हैं, जैसे ही वो काम पूरा होगा हम इस प्रथा पर रोक लगा देंगे।  सरकार ने आश्वासन दिया। 

        हमे गावों कस्बों में आज भी अछूत माना जाता है।  अम्बेडकर ने शिकायत की। 

        हम इस साल भी देश के दो मंदिरों में हरिजनों के प्रवेश की योजना बना रहे हैं। सरकार ने पूरे इत्मीनान से कहा। अब सरकार की शक्ल राजीव गांधी जैसी लग रही थी। 

        हमे मंदिरों में प्रवेश नही, पानी के कुओं पर प्रवेश चाहिए।  अम्बेडकर ने एतराज किया।

        उसके लिए समाज में परिवर्तन लाना होगा , लोगों की सोच बदलनी होगी। सरकार ने लगभग असमर्थता दिखाई। 

          लेकिन जो लोग सोच बदलने की कोशिश कर रहे हैं उन पर तुम प्रतिबंध लगा रहे हो।  अम्बेडकर ने अख़बार की प्रति लहराई। 

           उन्हें सरकार की आलोचना नही करनी चाहिए।  सरकार ने सफाई दी। सरकार की शक्ल बदल कर नरेंद्र मोदी जैसी हो गयी। 

           मैंने सविंधान में अभिव्यक्ति की आजादी की गारंटी दी है। अम्बेडकर ने बगल से सविधान की प्रति निकाल कर दिखाई। 

            सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्ध है।  सरकार ने झुक कर कहा। 

            तुमने खेतमजदूरों के रोजगार के कार्यक्रम मनरेगा में कटौती कर दी।  अम्बेडकर ने कहा। 

            नही , ये  बात गलत है, हमने उसके लिए बजट में  प्रावधान किया है। सरकार सही समय पर उसे खर्च करने का फैसला लेगी। सरकार खेतमजदूरों के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध है।  सरकार ने अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा। 

             तुमने भूमि बिल से मजदूरों पर पड़ने वाले प्रभाव के अध्धयन करने वाले क्लाज को निकाल  दिया।  अम्बेडकर अब बहुत परेशान लग रहे थे। 

               सरकार एक बिल में एक ही वर्ग का ध्यान रख सकती है, वैसे सरकार मजदूरों के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध है।  सरकार ने आश्वासन की मुद्रा बनाई। 

               तुमने राशन में मिलने वाले अनाज तक में कटौती कर दी, तुम ऐसा कैसे कर सकते हो। मालूम है कितने लोग भूख से मर जायेंगे।  अम्बेडकर से बोलना मुश्किल हो रहा था। 

               सरकार देश के गरीबों के सिर से सब्सिडी का बोझ कम करना चाहती है, वरना हम किसी को भी भूख से नही मरने देना चाहते, आप चाहें तो विश्व बैंक से पूछ सकते है।  सरकार ने जवाब दिया।

           सरकार न तो संविधान, न सविधान की भावना और न ही संविधान के निर्माताओं का सम्मान कर रही है।  अम्बेडकर ने फिर एतराज किया। 

             नही ये आरोप गलत है, हम अभी सविधान में कुछ संशोधन ल रहे हैं, अगर वो पास हो जाते हैं तो हम सविधान की भावना को भी संशोधित करने की कोशिश करेंगे। जहां तक सविधान निर्माताओं के सम्मान का सवाल है हमने आपके जन्मदिन पर छुट्टी की घोषणा की है।  सरकार ने भीड़ की तरफ देखते हुए कहा। 

            हमे छुट्टी की नही, बराबरी की जरूरत है।  अम्बेडकर जोर से चिल्लाये। 

            सरकार ने सर्वे करवाया है और हम बराबरी के लिए प्रतिबद्ध हैं। इसके लिए हमने 99 करोड़ की लागत से आपका स्मारक बनाने का फैसला किया है। सरकार ने ये बात अम्बेडकर को नही बल्कि लोगों को सम्बोधित करते हुए कही। तभी भीड़ में से किसी ने नारा लगाया , बाबासाहेब की जय !

              दूसरे  लोगों ने भी जोर से जवाब दिया , बाबासाहेब जिंदाबाद।   उसके बाद बाबासाहेब जिंदाबाद और जय हो के नारों से आसमान गूँजने लगा। मैंने देखा की अम्बेडकर कुछ कहने  कोशिश कर रहे हैं परन्तु जिंदाबाद के शोर में उनकी बात कोई सुन नही रहा है। सरकार स्टेज के बीच में आ गयी है और रहस्यमय ढंग से मुस्कुरा रही है। 


Tuesday, May 26, 2015

Amit Shah on core issues -- अमित शाह धारा 370 व अन्य मुददों पर

खबरी -- अमित शाह ने कहा है की पार्टी को धरा 370 जैसे मुददों को हल करने के लिए 370 सीटें चाहियें। 


गप्पी -- पहले पूर्ण बहुमत , फिर लोकसभा में 370 सीटें, फिर राज्य सभा में बहुमत, उसके बाद अदालतों का रोड़ा , असल में आपको राजतन्त्र चाहिए।  और वो होने वाला नही है।

Sunday, May 17, 2015

सेना के गोला-बारूद के भण्डार में कमी के लिए रक्षा मंत्री ने UPA सरकार को जिम्मेदार ठहराया

खबरी -- नई सरकार के एक साल बाद भी पिछली सरकार को दोष देना क्या सही है। 


गप्पी -- बीजेपी और आरएसएस के अनुसार पिछले 65 साल में कोई काम नही हुआ। जो चीजें हमे दिखाई दे रही है वो या तो पिछले एक साल में बनी हैं या आजादी से पहले बनी थी, देश में जितनी समस्याएं हैं उन सब के लिए नेहरू जिम्मेदार हैं जो बाकि गलत चीजें बचती हैं उसके लिए मुसलमान जिम्मेदार हैं। अगर रूस और नेहरू की साजिश के कारण भारत में ट्रैक्टर नही आता और देश की अर्थव्यवस्था को गाय और बैलों के आधार पर चलाया जाता तो हम अमेरिका से आगे निकल गए होते।

Saturday, May 16, 2015

सिख युवक ने बच्चे की सहायता के लिए पगड़ी उतारी।

खबरी -- समाचार है की न्यूजीलैंड में दुर्घटना में घायल एक बच्चे को बचाने के लिए एक सिख युवक ने अपनी पगड़ी उत्तर कर उसके घाव पर बांध दी। 


गप्पी -- उसने सच्चा सिख होने का न केवल सबूत दिया बल्कि पगड़ी की लाज भी रख ली।

Friday, May 15, 2015

(श्री श्री रविशंकर डॉलर की कीमत पर ) Shree Shree Ravishanker on Rupee V/S Doller

खबरी -- सोशल मीडिया में इस बात पर चर्चा हो रही है की श्री श्री रविशंकर ने कहा था की अगर मोदी जी की सरकार आई तो डॉलर की कीमत 40 रूपये हो जाएगी। 


गप्पी -- श्री श्री रविशंकर हों, बाबा रामदेव हों या कोई दूसरे बाबा, ये लोग हररोज अपनी बातों से लगातार सिद्ध करते रहते हैं की उन्हें आर्थिक , सामाजिक और राजनैतिक मामलों की कोई समझ नही है।