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Sunday, August 2, 2015

Vyang -- मानवाधिकार आयोग में फेरबदल

गप्पी -- सरकार  के प्रवक्ता ने एक प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन किया जिसमे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में आमूल-चूल परिवर्तन की बात की गयी। सरकारी प्रवक्ता ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष के पद पर नई नियुक्ति का एलान किया। उन्होंने नई नियुक्ति का एलान करते हुए कहा की देश में कई आयोगों के कामकाज पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है। इसलिए सरकार ने सबसे पहले मानवाधिकार आयोग को " सुधारने " का फैसला किया है। अब तक आयोग सरकार को चिट्ठी लिखने, रिपोर्ट मांगने और सरकार के कामो में अड़ंगा डालने के अलावा कोई ढंग का काम नही कर पाया है। इसलिए सरकार ने इसमें परिवर्तन का फैसला लिया है। इसलिए सरकार राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद पर स्वामी विचारानन्द की नियुक्ति की घोषणा करती है। स्वामी जी ने परम्परा के अनुसार कई साल गुरुकुल में रहकर शास्त्रों और पुराणो का अध्ययन किया है। स्वामीजी हमारी 5000 साल पुरानी भारतीय संस्कृति के विद्वान रहे हैं। इसलिए सरकार ये उम्मीद करती है की आयोग के काम और तरीके में फर्क दिखाई देगा। अब आप अपने सवाल पूछ सकते हैं। 

           पत्रकार ------ लेकिन अब तक तो ये परम्परा रही है की राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय के रिटायर मुख्य न्यायाधीश को बनाया जाता है ?

            प्रवक्ता ------- ये एक गलत परम्परा थी जिसे बिना विचार किये लागु किया गया था। जो मुख्य न्यायाधीश उच्चतम  न्यायालय जैसी सर्वाधिकार प्राप्त संस्था में रहते हुए मानवाधिकारों की रक्षा नही कर पाया उससे सरकार आगे क्या उम्मीद करेगी। इसलिए ये पद किसी विद्वान को देने का फैसला किया गया है। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए हम राज्य पालों के पद सुरक्षित रखने की योजना बना रहे हैं। 

           पत्रकार ----- लेकिन मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष को कानून और संविधान की गहन जानकारी होनी चाहिए इसलिए इस पद पर न्यायाधीश की नियुक्ति की जाती है। 

            प्रवक्ता ------ यही जानकारी समस्या की जड़ है। जब कोई आदमी किसी पुलिस अधिकारी द्वारा उसके मानवाधिकारों के हनन की शिकायत लेकर आता है तो आयोग को वो बात पता करने में तीन महीने लगते हैं जो सरकार को पहले दिन मालूम होती है। अव्वल तो पुलिस अधिकारी ने वो काम सरकार के कहने पर ही किया होगा, और अगर उसने किसी दूसरी प्रेरणा से भी ऐसा किया होगा तो वो तुरंत सरकार को बता देता है। इसलिए आयोग उस बात के लिए सरकार को तीन महीने बाद चिट्ठी लिखे ये बात समझ में नही आती। 

            पत्रकार ---  तो सरकार अब इस तरीके में क्या बदलाव लाने  जा रही है ?

           प्रवक्ता ----- इसका जवाब खुद स्वामीजी ही देंगे। ये कहकर उन्होंने माइक स्वामीजी को दे दिया। स्वामीजी 50-55 की उमर के स्वस्थ आदमी थे। उनकी दाढ़ी करीने से छँटी हुई थी जो उनके छँटे होने का आभास दे रही थी। स्वामीजी ने माइक पकड़कर दो मिनट के लिए आँखे बंद की और होठों में कुछ बड़बड़ाया। उसके बाद आँखे खोलकर उन्होंने फ़रमाया, " जब हमारे देश का संविधान बना तो उसमे कुछ आधारभूत गलतियां हो गयी। संविधान बनाने वाली सभा में कोई भी भारतीय संस्कृति को गहराई से जानने वाला विद्वान शामिल नही था वरना ऐसा नही होता। उसमे मौलिक अधिकारों के नाम का एक अध्याय जोड़ दिया गया। जबकि कोई भी अधिकार मौलिक नही होता। नागरिकों के अधिकार राजा की मर्जी के अधीन होते हैं। हमारे शास्त्रों में राजा को भगवान का प्रतिनिधि माना  गया है। यहां तक की राम की स्तुति भी राजा राम कहकर की जाती है। सारी समस्याएँ यहीं से शुरू होती हैं। आयोग अब ये देखेगा की जो काम राजाज्ञा से किया गया होगा उसकी शिकायत नही की जा सकेगी। राजा के अधिकारों को चुनौती नही दी जा सकती ये हमारी परम्परा है। हमारे यहां तो सबसे अच्छा न्याय का उदाहरण उसको माना जाता है जिसमे राजा को मृत्युदंड होने पर उसकी सोने की मूर्ति को फांसी पर लटकाया गया था। और ये हर बात पर शिकायत करना हमारी संस्कृति नही है। हमारे यहां तो कहा गया है,-

                                  सीताराम, सीताराम, सीताराम कहिये,

                                  जेहि विधि राखे राम, तेहि विधि रहिये। 

  उसी तरह हमारे शास्त्रों में राजा के सेवकों को देवता का दर्जा दिया गया है। क्योंकि उनके बिना राज्य का कामकाज असम्भव है। इसलिए भविष्य में किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ भी कोई शिकायत नही सुनी जाएगी। तुमने वो नया भजन तो सुना होगा। 

                                    दुनिया चले ना श्रीराम के बिना,

                                    रामजी चले ना हनुमान के बिना। 

        पत्रकार -- तो फिर आयोग का काम क्या रह जायेगा। वो क्या काम करेगा ?

       स्वामीजी ----- आयोग जगह जगह सेमिनार और प्रवचन आयोजित करेगा, जिसमे हमारी सदियों पुरानी संस्कृति की तरफ लौटने का आवाहन किया जायेगा। लोगों को समझाया जायेगा की जिन्हे वो अबतक अधिकार समझते रहे हैं वो एक तकनीकी भूल थी। 


खबरी -- तुम्हे हमेशा इस तरह के बुरे सपने ही क्यों आते हैं ?

Tuesday, July 28, 2015

Vyang -- No Politics Please !

गप्पी -- हम गाहे बगाहे ये बात सुनते रहते हैं की कृपया इस मुद्दे पर राजनीती ना करें। कल पंजाब के गुरदासपुर में आतंकवादी हमला हुआ। कई लोग मारे गए। पंजाब के मुख्यमंत्री बादल साहब का बयान आया की आतंकवादी सीमा पार से आये थे इसलिए ये राज्य का मामला नही है। संसद में विपक्ष ने जब इस पर गुप्तचर असफलता का आरोप  लगाया तो वेंकैया नायडू ने कहा की आतंकवाद के मुद्दे पर राजनीती नही की जानी  चाहिए। विपक्ष के लोगों को तो एक बार जैसे सांप सूंघ गया। ये बात उस पार्टी के नेता और खुद वो मंत्री कह रहे हैं जो लगभग सारी राजनीती इसी मुद्दे पर करते रहे हैं। पिछली  UPA सरकार का उन्होंने ये कह कह कर जीना हराम कर दिया था की ये सरकार देश की सुरक्षा के मामले पर असफल है।

                 इससे पहले जब भूमि बिल पर विपक्ष ने विरोध जताया था तब भी सरकार ने कहा था की विपक्ष को देश के विकास के सवाल पर राजनीती नही करनी चाहिए। सरकार बार बार विपक्ष को ये याद दिलाती है की भैया इन मामलों पर राजनीती मत करो। लेकिन विपक्ष है की मानता ही नही है। वह हमेशा गलत चीजों पर राजनीती करता है जैसे आतंकवाद, महंगाई, बेरोजगारी, भूमि बिल इत्यादि। अब अगर विपक्ष इन मामलों पर राजनीती करेगा तो देश का क्या होगा ?

                     इसलिए मेरा सरकार को सुझाव है की वो संसद में एक बिल लेकर आये और उसमे तय कर दिया जाये की किन किन मुद्दों पर राजनीती की जा सकती है। और उन मुद्दों पर राजनीती करने के लिए संसद का एक विशेष सत्र हर साल बुलाया जाये। इसके अलावा बाकि जो भी संसद के सत्र हों उनमे विपक्ष को राजनीती करने पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए। इन सत्रों में विपक्ष का काम केवल हाथ ऊपर करना तय कर दिया जाये वो भी तब जब सरकार कहे।

                     राजनीती करने के लिए जो विशेष सत्र बुलाया जाये उसमे इस तरह का काम रक्खा जाये जैसे राजनीती पर चुटकुले सुनाना, होली खेलना और होली के गीत गाना जिनमे कुछ गालियों की भी छूट दी जा सकती है। संसद से वाकआउट करने और कार्यवाही रोकने जैसे प्रोग्राम भी केवल इसी सत्र में किये जा सकते हैं। कितना अच्छा लगेगा जब संसदीय कार्य मंत्री विपक्ष के किसी नेता पर कोई चुटकुला सुनाएंगे और विपक्ष उसका विरोध करते हुए वाकआउट करेगा। विपक्ष के वाकआऊट की तारीफ करते हुए सत्ता पक्ष के लोग तालियां बजायेंगे और प्रदर्शन की प्रशंसा करेंगे। संसद में एकदम राष्ट्रीय एकता का नजारा होगा।

                       बाकि सत्रों में इस पर रोक का बिल पास होने के बाद जो नियम बनाएं जाएँ उनमे कुछ इस तरह के हो सकते हैं।

        १. सत्र के दौरान विपक्ष के सदस्य मुंह पर कपड़ा लपेट कर आएंगे लेकिन वो काले रंग का नही होना चाहिए।

        २. सरकार किसी बिल पर जब हाथ उठाने के लिए कहेगी तब सभी सदस्यों को पार्टी से ऊपर उठकर हाथ उठाना होगा।

        ३. अचानक कोई घटना घटित होने पर अगर विपक्ष को लगता है की उसे सदन में उठाया जाये तो वो उसे लिखकर संसदीय कार्य मंत्री को देंगे और मंत्री उसकी भाषा कागज पर लिखकर देंगे। उसके अलावा कोई शब्द नही बोला जायेगा।

          ४. किसी मंत्री का कोई घोटाला सामने आता है तो उसे राष्ट्रीय कर्म माना  जायेगा और जब तक सरकार के अंदरुनी मतभेदों के कारण मंत्री को हटाने की नौबत नही आएगी विपक्ष तब तक इंतजार करेगा। ऐसा समय आने पर सरकार विपक्ष को सुचना देगी और विपक्ष उसका इस्तीफा मांग सकता है। इसके अलावा किसी भी मंत्री का इस्तीफा मांगना देशद्रोह माना जायेगा।

           ५.  प्रधानमंत्री से किसी भी मामले पर बयान देने को नही कहा जायेगा और प्रधानमंत्री केवल अपने विदेशी दौरों पर बयान देंगे। और इस पर पूरा देश प्रधानमंत्री के साथ है ये संदेश देने के लिए विपक्ष के सभी सदस्यों द्वारा मेज थपथपाना जरूरी होगा।

            ६. बजट पर विपक्ष के बहस करने पर पाबंदी रहेगी और केवल सत्ता पक्ष के लोग उस पर बोल सकते हैं।

            ७. देश की सभी संवैधानिक संस्थाए मंत्रियों के नीचे और इशारे पर काम करेंगी। संविधान को सरकार के अधीन माना जायेगा। अब तक जो सरकार को संविधान के अधीन माना जाता है वो गलत है और इस भूल का सुधार कर लिया जायेगा। 

            ८. उच्चतम न्यायालय के जजों की नियुक्ति प्रधानमंत्री करेंगे और उच्च न्यायालय के जजों की नियुक्ति का अधिकार मुख्यमंत्री का होगा। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री अगर चाहें तो अपने परिवार के सदस्यों की राय ले सकते हैं।

            ९. अगर कोई न्यायिक बैंच दो सदस्यों की है तो  अटार्नी जनरल को बैंच का तीसरा सदस्य माना जायेगा।

            १०. न्यायालय के सभी फैसले मंत्रिमंडल की छानबीन और अनुमति के अधीन रहेंगे। 

            ११.  चुनाव की घोषणा के बाद ही विपक्ष सरकार की आलोचना कर सकेगा। शेष समय सरकार की आलोचना पर पाबंदी रहेगी। 

             १२. किसानों और मजदूरों से संबन्धित किसी भी मांग को विकास विरोधी, अल्पसंख्यकों से संबंधित मांगो को तुष्टिकरण और महिलाओं से संबन्धित मांगों को संस्कृति विरोधी माना जायेगा। 

             १३. संविधान संशोधन बिल पर जो दो- तिहाई बहुमत का प्रावधान है उसे सदन की नही बल्कि सत्तापक्ष की सदस्यता का दो-तिहाई माना जायेगा।

             १४.  ये सभी नियम सरकार के स्थाईत्व को ध्यान में रखकर बनाये गए हैं इसके बावजूद देश के दुर्भाग्य से अगर भाजपा की सरकार चली जाती है तो ये नियम समाप्त मान लिए जायेंगे। 

 

खबरी -- उम्मीद करता हूँ की सरकार तुम्हारे सुझावों को प्रत्यक्ष रूप से भी लागु करेगी।

Wednesday, July 15, 2015

Vyang -- नेताजी की घोटाला यात्रा, सरकार से सरकार तक

गप्पी -- हुआ यों की पुलिस ने एक कालाबाजारिये के यहां छापा मारा तो उसके यहां से जो कागज मिले उनमे नेताजी को दिए पैसों का जिक्र था। जिसमे नेताजी के हाथ की लिखी हुई एक चिट्ठी भी थी। नेताजी सरकार में वित्त मंत्री के पद पर थे सो हल्ला हो गया। चारों तरफ से इस्तीफा माँगा जाने लगा। जब दबाव बढ़ा तो सरकारी पार्टी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कहा,

                    " नेताजी का किसी गलत काम से कोई लेना देना नही है।  उनका इसके साथ कोई लेनदेन नही है।"

         " लेकिन उसके घर से नेताजी के हाथ का लिखा पत्र मिला है, जिसमे पैसे भेजने के लिए कहा गया है। " एक पत्रकार ने पूछा।

             " पत्र मिला है ये बात सही है, लेकिन अभी ये साबित नही हुआ है की वो लिखाई नेताजी की ही है। "

           " लेकिन मंत्रीजी ने खुद माना है की चिट्ठी उन्होंने लिखी थी। "

            " हमे ये भी देखना चाहिए की क्या पैसों के लेनदेन की कोई रशीद भी मिली है क्या ? आदमी जरूरत में हजार लोगों से पैसे मांगता है इसका मतलब ये नही होता की पैसा लिया ही गया है। "

            " जिस आदमी के यहां से चिट्ठी पकड़ी गयी है वो कह रहा है की उसने मंत्रीजी को पैसे दिए हैं। " पत्रकार ने कहा।

             " तुम एक गुनहगार की बात का यकीन कर रहे हो। आखिर एक गुनहगार की बात की क्या वैल्यू है। " प्रवक्ता ने कहा।

               " महोदय, जब कहीं डकैती होती है और एक डकैत पकड़ा जाता है तो बाकि डकैतों को पकड़ने के लिए पुलिस उस डकैत से ही बाकि नाम पूछती है और बाकि लोगों को पकड़ती है। " पत्रकार ने कहा।

               लेकिन सरकार नही मानी। कई दिन संसद नही चली। ना काम हो रहा था ना बात खत्म हो रही थी। आखिर में मंत्रीजी ने ये कहते हुए इस्तीफा दे दिया की ," ये मेरे खिलाफ विपक्ष की साजिश है और मैं नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे रहा हूँ और मुझे देश के कानून और अदालतों पर पूरा भरोसा है। "

                एक पत्रकार ने दूसरे से पूछा की ये अदालतों पर पूरा भरोसा होने की बात का क्या मतलब है, तो सीनियर पत्रकार ने उसे आहिस्ता से बताया की इसका मतलब है की अदालत उसके जीवनकाल में सुनवाई पूरी नही करेगी, उसे इसका भरोसा है।

                 दो-तीन साल जाँच चलती रही लेकिन पुलिस किसी निर्णय पर नही पंहुची। तब तक दूसरी पार्टी की सरकार आ गयी। सरकार ने लोगों की मांग को ध्यान में रखते हुए मामला सीबीआई को दे दिया। सीबीआई ने तुरंत छापेमारी की और बहुत से दस्तावेज बरामद होने का दावा किया। सीबीआई चार्जशीट दाखिल करने के नजदीक पहुंच गयी। तभी उस नेताजी का बयान आया की उसकी पार्टी में सब ठीक नही चल रहा है और उसके खिलाफ साजिश रची जा रही हैं। दूसरी सरकारी पार्टी ने पीछे से उससे अपनी पार्टी में शामिल होने की बात चलाई। बात आगे बढ़ी और चार्जशीट पीछे खिसक गयी। थोड़े दिन बाद नेताजी ने पार्टी बदल ली। अदालत में सीबीआई ने स्टेट्स रिपोर्ट जमा करवाई जिसमे नेताजी के खिलाफ कोई पुख्ता सबूत नही मिलने की बात कही। सरकारी पार्टी के अध्यक्ष ने सीबीआई के अधिकारी को बुलाकर कहा की इतनी जल्दबाजी करने की जरूरत नही है।

                        दलबदल किये नेताजी को जैसे ही सीबीआई की स्टेटस रिपोर्ट का पता चला उसने पार्टी से उपयुक्त पद की मांग की और वायदा पूरा ना करने का आरोप लगाया।

                अगले दिन सीबीआई ने प्रेस कांफ्रेंस में कुछ नए तथ्य सामने आने की बात कही।

           नेताजी ने कहा की मीडिया ने उनके बयान को तोड़मरोड़ कर पेश किया है और उनका नई पार्टी के साथ कोई मतभेद नही है।

                सीबीआई का बयान आया की छापे के दौरान मिली चिट्ठी की लिखाई नेताजी की लिखाई से नही मिलती है और जाँच रिपोर्ट आ गयी है।

                 नेताजी ने फिर पार्टी को अपने वायदे की याद दिलाई और पद की मांग की।

          अगले दिन सीबीआई ने अदालत में कहा की चिट्ठी को जाँच के लिए दूसरी लैब में भेजा गया है ताकि कोई शक ना रहे।

                  अदालत ने कहा सीबीआई पिंजरे में बंद तोता है। 

                  सीबीआई के एक बड़े अधिकारी ने ऑफ़ दा रिकॉर्ड बातचीत में कहा की अदालत ने तोता शब्द का प्रयोग गलत किया है। उसने दलील दी की क्या तोता किसी को काट सकता है ? हम तो सरकार एक बार ऊँगली से जिसकी तरफ इशारा कर देती है उसे उधेड़ कर रख देते हैं। इसलिए अदालत को किसी दूसरे जानवर का नाम लेना चाहिए था।

                  इस तरह पांच साल और निकल गए। ना चार्जशीट दाखिल हुई और ना पद मिला।

   मामला अभी अदालत में पेन्डिंग है और इलेक्शन के बाद चार्जशीट दाखिल होने की सम्भावना है। सीबीआई ने मामले की जाँच में तेजी लाने के लिए विशेष जांचदल गठित किया है।अगली जाँच इस बात पर निभर करेगी की कौनसी पार्टी सत्ता में आती है और नेताजी कौनसी पार्टी में रहते हैं। इसलिए इंतजार कीजिये। 

खबरी -- सरकार ने कहा है की भृष्टाचार को बर्दाश्त नही किया जायेगा।








Thursday, July 9, 2015

Vyang--शिवराज सिंह हाजिर हों।


गप्पी -- मध्यप्रदेश आजकल खबरों में है। खबरों में व्यापम घोटाले की वजह से है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह पर आरोप लग रहे हैं और वो इनकार कर रहे हैं हमेशा की तरह। ये तय किया गया की एक जनअदालत लगा ली जाए जिसमे शिवराज सिंह से कुछ सवाल पूछे जाएँ।

          अदालत लगी हुई है। आवाज लगाई जाती है, शिवराज सिंह हाजिर हों।

           शिवराज सिंह अदालत में हाजिर होते हैं तो जनता का वकील उनसे सवाल पूछता है।

वकील -- क्या आप जनता के सवालों का जवाब देने के लिए तैयार है ?

शिवराज सिंह -- मैं जनता के प्रति जवाबदेह नही हूँ। वैसे तो मैं किसी के प्रति भी जवाबदेह नही हूँ। परन्तु जनता के प्रति जवाबदेह होने का तो सवाल ही पैदा नही होता। हमारी पार्टी में इसका रिवाज ही नही है।

वकील -- लेकिन आप जनता के चुने हुए नुमाइन्दे हैं। आप जनता के प्रति जवाबदेही से इनकार कैसे कर सकते हैं ?

शिवराज सिंह -- मुझे मुख्यमंत्री जनता ने नही बनाया, पार्टी ने बनाया है। इसलिए मैं जनता के प्रति नही पार्टी के प्रति जवाबदेह हूँ। जनता को अपना भरम निकाल देना चाहिए।

वकील -- लेकिन आपको विधायक तो जनता ने ही चुना है।

शिवराज सिंह -- आपने मुझे यहां मुख्यमंत्री की हैसियत से बुलाया है। इसलिए बात भी उसी हिसाब से कीजिये। मैं यहां विधायक की हैसियत से नही आया। हूँ, जनता।

वकील -- क्या आप व्यापम घोटाले की नैतिक जिम्मेदारी लेते हैं। 

शिवराज सिंह -- आप हमसे नैतिकता की बात कैसे कर सकते हैं ? आपको मालूम होना चाहिए की हम राजनीती में हैं। 

वकील -- तो आप किस चीज की जिम्मेदारी लेते हैं। 

शिवराज सिंह -- हम केवल मध्यप्रदेश की जिम्मेदारी लेते हैं। मध्यप्रदेश का विकास हमारी जिद है, हमारा पैशन है। 

वकील -- लेकिन इतना बड़ा घोटाला हुआ है। 

शिवराज सिंह -- ये मध्यप्रदेश को बदनाम करने की साजिश है ये स्टैण्ड हमने कल ही तय किया है। अब आपको हररोज ये सुनने को मिलेगा की ये मध्यप्रदेश को बदनाम करने की साजिश है। बिलकुल गुजरात की तरह। ये कांग्रेस की साजिश है। 

वकील -- क्या आप कहना चाहते हैं की घोटाला नही हुआ ? तो फिर आप कैसे कहते हैं की इस घोटाले का पर्दाफाश आपने किया था। 

शिवराज सिंह -- हाँ, हम मानते हैं की घोटाला हुआ है इसीलिए तो हम जाँच करा रहे हैं। आखिर सबसे ज्यादा नुकशान तो हमारा ही हुआ है। 

वकील -- वो कैसे ?

शिवराज सिंह --  देखिए पूरी बात ध्यान से सुनिए। वरना आप कभी भी इस घोटाले की गंभीरता और हमारा नुकशान समझ नही पाएंगे। पहले कांग्रेस का राज था। दाखिलों और भर्तिओं की कोई सही प्रणाली नही थी। पर्चियों पर भर्ती हो जाती थी। हमने व्यापम की स्थापना की। आप नाम से ही समझ सकते हैं की हमारी योजना कितनी व्यापक थी। हमने सारी नौकरियों के रेट तय किये। दाखिलों के रेट तय किये। MBBS का 35 लाख और MD का एक करोड़। इसी तरह इंजीनियरिंग के रेट तय किये। फिर सभी नौकरियों के रेट तय किये। MBBS का झूठा पेपर देने के पैसे तय हुए। दलाली की दरें तय की। हमारे पास नई नौकरियां नही थी तो हमने 10 -15 साल से नौकरी कर रहे अध्यापकों को पेपर दिलवा कर 24000 अध्यापकों को बर्खास्त किया और उनकी जगह नई भर्तियां की। हम सोच रहे थे की इस तरह लगाये हुए अध्यापकों के पढाये हुए बच्चे तो भविष्य में पेपर पास ही नही कर पाएंगे और हमारा धन्धा बढ़ेगा। इस तरह की पूरी योजना बनाने और लागु करने में कितनी मेहनत होती है आप समझ सकते हैं। लेकिन अब हिसाब मिलाता हूँ तो हिसाब ही नही मिल रहा। जितनी नौकरियाँ दी गयी, दाखिले किये गए उसके हिसाब से जितना पैसा आना चाहिए था नही आया। घोटाला हो गया। इसलिए मैंने जाँच शुरू की। मेरी तो सारी मेहनत पानी में चली गयी। 

वकील -- लेकिन आपने अभी जो सीबीआई की जाँच की मांग की है तो लोग कहते हैं की रपट पड़े तो हर-गंगा। 

शिवराज सिंह -- जिन लोगों ने मेरे साथ ये घोटाला किया वो ही विपक्ष से मिल गए। कहते हैं की हमारा नाम आया है तो तुम्हारा भी आना चाहिए। कलियुग है। मैं अगर नही कहता तो भी सीबीआई जाँच तो होनी ही थी। इसलिए मैंने भी कह दिया। 

वकील -- सुना है की आपकी पार्टी के अंदर भी आपसे इस्तीफा मांगने वाले बढ़ रहे हैं क्या आपको इस्तीफा देना पड़ेगा ?

शिवराज सिंह -- सब ऊपर वाले की मर्जी पर निर्भर करता है। हम तो उसके हाथ की कठपुतलियां हैं। वैसे मैं उनको हमेशा अपना बड़ा भाई कहता रहा हूँ। लेकिन हर मुख्यमंत्री वशुन्धरा राजे की तरह ताकतवर तो नही होता न। 

                 तभी जनता में से आवाज आई की ये शिवराज सिंह नकली है। ये असली शिवराज सिंह नही है। 

अदालत ने पूछा की क्या तुम असली शिवराज सिंह नही हो ?

लेकिन मेरे सारे जवाब असली हैं आपको आम खाने से मतलब होना चाहिए। 

अदालत ने इस बात की जाँच होने तक की ये शिवराज सिंह असली है या नकली कार्यवाही स्थगित कर दी। 

 

खबरी -- लगे हाथ ये भी सीबीआई को दे देते।

Thursday, June 25, 2015

मेरा पड़ौसी और आपातकाल

गप्पी -- मेरा एक पड़ौसी एकदम झल्लाया हुआ मेरे पास आया और बोला, " ये क्या हो रहा है भई , जो भी चैनल लगाओ एक ही रट लगी हुई है, आपातकाल, आपातकाल। मैं पूछना चाहता हूँ की आखिर ये आपातकाल आखिर है क्या बला। इससे ऐसा क्या हो जायेगा जो लोगों को इस तरह डराया  जा रहा है। अच्छा तुम बताओ की आपातकाल से क्या हो जाता है। "

" देखो आपातकाल का मतलब होता है की उसमे  सारे नागरिक अधिकार छीन लिए जाते हैं। " मैंने उसे समझाने का प्रयास किया। 

" क्या अभी आपातकाल है ?" उसने पूछा। 

" कैसी बात करते हो यार। अभी कौन कहता है की आपातकाल है। " मैंने कहा। 

" अच्छा, तो अब तुम्हे कौन सा अधिकार है। " उसने दोनों हाथ कमर पर रख लिए। 

" देखो, नागरिक अधिकारों का मतलब होता है वो बड़े बड़े अधिकार जैसे भाषण देने का अधिकार ओर…… " मैंने बताना शुरू किया तो उसने मुझे बीच में ही रोककर पूछा, " तुमने कभी भाषण दिया है ?"

"नही।"  मैंने कहा . 

" तो इस अधिकार का तुम क्या करोगे। अच्छा ये बताओ की अगर तुम बीमार हो और तुम्हारी जेब में पैसे न हों तो क्या तुम इलाज करवा सकते हो ?" उसने अपनी बात पूरी की। 

" बिना पैसे तो इलाज नही हो सकता। " मैंने कहा। 

" अगर पुलिस तुम्हे पकड़ने आये तो क्या तुम उससे पूछ सकते हो की मेरा वारंट है या नही। "

" वैसे कोई पूछता नही क्योंकि इसमें पिटने का खतरा रहता है। " मैंने कहा। 

" चलो जाने दो, ये बताओ की क्या तुम किसी बड़े आदमी को जिसने तुम्हे मारने की धमकी दी हो, बिना किसी सिफारिश या रिश्वत के उसके खिलाफ FIR दर्ज करवा सकते हो ?" उसने अगला सवाल पूछा। 

" नही करवा सकता। " मैं ढीला हो कर सच पर उत्तर आया। 

" क्या तुम अपने  बच्चो को अपनी मर्जी के स्कूल या विषय में पढ़ा  सकते हो, बिना पैसे। " 

" नही पढ़ा सकता। "

" अच्छा, कुछ बड़े अधिकारों के बारे में पूछता हूँ। क्या तुम बिना पुलिस से इजाजत लिए धरना दे सकते हो ?"

" नही दे सकता। " मैंने कहा। 

" अगर तुम्हारे पास काम नही है तो क्या तुम काम के अधिकार से परिवार का पेट भर सकते हो। "  वो अब हावी होने लगा था। 

" बिना काम परिवार कैसे  पाला जा सकता है। " मैंने जवाब दिया। 

" अगर कारखाने का मालिक नही चाहे तो क्या तुम वहां यूनियन बना सकते हो ?" उसने मुस्कुराते हुए पूछा। 

" नही, लेबर इन्स्पेक्टर अगले ही दिन मालिक को बता देता है की फलां आदमी ने यूनियन बनाने की दरख्वास्त दी है। " मैंने हकीकत के हिसाब से जवाब दिया। 

" तो तुम ये बताओ की तुम्हारे लिए आपातकाल हटा कब था। फालतू शोर मचा रक्खा है। " उसने कहा और बिना मेरे जवाब का इन्तजार किये चला गया।


खबरी -- लेकिन आपातकाल नही है इसलिए तुम ये सब कह सकते हो।


Wednesday, June 17, 2015

संविधान का दम घुट रहा है

खबरी -- संविधान को लागु करने और हिफाजत करने वाली संस्थाओं पर सवाल उठ रहे हैं। 


गप्पी -- देखिये हमारे देश का संविधान लगभग 65 साल पहले बना। अब इस बात पर सवाल किये जा रहे हैं की क्या पिछले 65 सालों में देश का कामकाज संविधान  के अनुसार चला। लेकिन देश में एक चीज और है जो संविधान से पहले बनी, वह है पुलिस। उम्र के लिहाज से वह संविधान को अपने से छोटी चीज मानती है। इसलिए जब पुलिस को कहा जाता है की वह संविधान के अनुसार काम करे उसे ये बात हजम नही होती। दूसरी जो जमात जिसे संविधान से सबसे ज्यादा एतराज है वह है नेता। अब सरकार नेता चलाते हैं। संविधान की एक गंदी आदत थी की वो बार बार सरकार के सामने आ कर खड़ा हो जाता था। नेता के काम में रोड़ा अटकता था। इसलिए सरकार ने पूरा विचार-विमर्श करके संविधान को पुलिस थाने  में रखवा दिआ। पुलिस कमिशनर को  हिदायत दी गयी की इसकी इस तरह देखभाल करनी है की ये हिल न सके। अब पुलिस ने विचार किया और उसने संविधान को उठा कर सीट की जगह कुर्सी पर रख लिया और उसके ऊपर बैठ गयी। संविधान का दम  घुटने लगा। लोगों ने शिकायत की कि संविधान का दम घुट रहा है। सरकार ने कहा कानून अपना काम करेगा। किसी को दम घुट कर मरने नही दिया जायेगा। 

                       लोग अदालत के पास गए और कहा की संविधान का दम घुट रहा है। अदालत संजीदा हुई और थाने पहुंच गयी। पुलिस अफसर ने अदालत को थाने में देखा तो तुरन्त उठ कर सैल्यूट किया। संविधान को थोड़ा सा साँस आया और उसने चिल्लाना शुरू किया। अदालत ने कहा की तुम संविधान का दम नही घोंट सकते। अदालत ने सरकार से पूछा की उसने संविधान को पुलिस थाने में क्यों रखवाया। सरकार ने कहा की संविधान बहुत महत्वपूर्ण चीज है और उसकी सुरक्षा के लिए उसे पुलिस थाने  में रक्खा गया है। और ये सरकार का विशेषाधिकार है की वो संविधान को अपनी मर्जी से कहीं भी रख सकती है। अदालत ने कहा चलो हम इसको देखेंगे की संविधान को कोई तकलीफ न हो। उसके बाद अदालत वक़्त-बेवक़्त थाने पहुंच जाती। पुलिस उठ कर सैल्यूट करती और संविधान चिल्लाने लगता। अदालत पुलिस को डांट पिलाती। 

                    स्थिति बहुत विकट हो गयी। सरकार ने नया आदेश  जारी किया की अदालत को पहले नोटिस देना पड़ेगा की वो कब पुलिस थाने जा रही है। उसके बाद पुलिस ने संविधान के ऊपर दूसरा अफसर बिठा दिया और सैल्यूट करने के लिए दूसरा अफसर रख लिया। अब जब भी अदालत पुलिस थाने जाती है उसे संविधान के चिल्लाने की आवाज सुनाई नही देती। इस तरह सब ठीक ठाक चल रहा है। 

                     अब संविधान को दम घुटने से बचाने का केवल एक ही रास्ता बचा है की लोग थाने में घुसकर संविधान को पुलिस के नीचे से निकाल लें और उसे उसकी सही जगह पर रख दें। देंखे ये कब होता है।