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Sunday, July 12, 2015

Vyang -- ज्योतिष के लिए अध्यादेश लाओ

गप्पी -- हमारे देश में आजकल विज्ञानं का बहुत बोलबाला है। आपको ये जानकर बहुत ख़ुशी होगी की हमारे यहां सबसे बड़ा विज्ञानं ज्योतिष को माना जाता है। और ज्योतिष में भी जो हिस्सा खगोल शास्त्र से संबंध रखता है और जिसमे ग्रहों की आकाश में स्थिति और गति की गणना की जाती है उसे नही, बल्कि उस ज्योतिष को माना जाता है जो आदमी और राशि अनुसार फल बताता है। कोई भी ज्योतिषी अपने को आइंस्टीन से दो दर्जे ऊपर समझता है। बाकि के विज्ञानों की हालत तो यह है की भौतिकी का विद्यार्थी ज्योतिषी से ज्यादा नंबर लाने का उपाय पूछता है। कुछ लोग इसे गलती से अंध विश्वास कहते हैं जबकि यह अन्धविश्वास नही है बल्कि पूर्ण विश्वास है। मशीन के सही संचालन के लिए सर्विस के शैड्यूल की जगह प्रशाद का शैड्यूल बनाया जाता है। कुछ लोग इसे नशा भी कहते हैं। लोग इसके आदी हो जाते हैं।सुबह अख़बार में सबसे पहले राशिफल देखते हैं बाद में मुख्य खबरें पढ़ते हैं। अगर अख़बार के राशिफल में उस दिन कोई बुरी खबर मिलने का योग लिखा हो तो बाकि का अख़बार नही पढ़ते। कोई कोई मजबूत दिल के लोग भी होते हैं जो उस दिन कोई बुरी खबर मिलने का योग लिखा हो तो  पहले श्रद्धांजलि वाला पेज पढ़ लेते हैं और अपने उन सभी रिश्तेदारों की फोटो चेहरा याद कर करके ढूंढते हैं जिनके टपकने का उन्हें अंदेशा होता है।

                 नशे पर मुझे याद आया की एक मशहूर ज्योतिषी हैं हमारे देश में। जिनके ग्राहकों में बड़े बड़े फ़िल्मी सितारे और राजनीतिज्ञ हैं। उनका नाम है बेजान दारूवाला। ज्योतिष भी नशा ही होता है ये इनके नाम से ही पता चल जाता है। इनके पुरखे कभी दारू का धंधा करते होंगे, ये भी धंधा तो नशे का ही करते है लेकिन उत्पाद बदल लिया है। इनका नशा धड़ल्ले से बिकता है और इतनी ऊँची कीमत पर बिकता है की आम आदमी तो उसका एक पैग नही खरीद सकता। लेकिन मुझे एक बात नही समझ में आई, की ये अपनी दारू को बेजान क्यों कहते हैं। लोग तो इनकी दारू को बहुत जानदार मानते हैं। किसी किसी को तो एक बार पी हुई महीनो नही उतरती। लेकिन ये उसे बेजान कहते हैं। हो सकता है अपनी चीज की क्वालिटी ये ज्यादा बेहतर जानते हों। इनका दारू बेचने का तरीका भी गजब का है। सामान खुद बेचते हैं और नाम गणेश जी का लेते हैं। कुछ भी कहेंगे लेकिन गणेश जी कहते हैं ये जोड़कर कहेंगे। अपनी जिम्मेदारी भी खत्म और सामने वाले पर बोझ भी पड  जाये। अब कोई ये तो कह नही सकता की गणेश जी ने गलत कहा था। अपना नाम ही नही लेते।

                 ज्योतिष को हमारे जीवन में इतने गहरे तक घुसा दिया गया है की उसके निकले मुहूर्त के बिना कोई काम नही हो सकता। हमारे एक पड़ौसी परेशान थे की उन्हें लड़की की शादी दिल्ली से जाकर मुंबई करनी पड रही थी। कारण था उस दिन दिल्ली में उनके बजट के हिसाब से कोई जगह नही मिल रही थी। मैंने कहा की दो-चार दिन बाद कर लो तो बोले मुहूर्त नही है। सारा देश उन दस दिनों में शादी करना चाहता है जिनमे मुहूर्त बताया गया होता है। उस दिन शादी के लिए न जगह मिलती है न खाना बनाने वाला , न बैंड बाजा। बाकि सारा साल सब कुछ खाली रहता है। अब तो ज्योतिषियों की हिम्मत इतनी हो गयी है की बच्चा पैदा होते ही कह देते हैं की सही समय पर नही हुआ। माँ बाप पर भारी रहेगा। उपाय में लाख रूपये का खर्चा बता देते हैं। डाक्टर कह रहा है की बच्चा सही समय पर हुआ है और कोई समस्या नही है लेकिन माँ बाप मानने को तैयार नही हैं। वो एकबार भगवान की मूर्ति की तरफ नाराजगी से देखते हैं की तुम भी कैसे कैसे काम करते हो, कम से कम सही समय का तो ध्यान रक्खा होता। तुम्हे नही मालूम था तो किसी ज्योतिषी से पूछ लेते। हमारे सिर ये फालतू की समस्या डालने की क्या जरूरत थी। गलती तुम करते हो और भुगतनी हमे पड़ेगी। 

                                          इस धंधे के बाकि व्यापारी भी छाती थोक कर धन्धा करते हैं। अख़बारों के विज्ञापन पढ़ लीजिये।     " सब जगह से निराश , 101 % गारण्टी के साथ काम करवाएं। मेरा किया कोई काट नही सकता। बाबा मूसा बंगाली -- महाकाली उपासक " इतनी गारंटी तो कोलगेट भी नही देती। मैं कहता हूँ की इन पर सर्विस टैक्स क्यों नही लागु किया जाता। वरना सरकार को बैठे बिठाये बड़ी आमदनी का जरिया हो जाता।

                   लेकिन कई बार ऐसा भी होता है की ज्योतिषी मुहूर्त देख कर पुल का उद्धघाट्न तय करता है। नेताजी नारियल फोड़ कर घर नही पहुँचते और पुल गिर जाता है। लड़का लड़की दोनों के माँ बाप अच्छी तरह शुभ मुहूर्त देखकर शादी करते हैं और छह महीने में नौबत तलाक की आ जाती है। जिस बच्चे को वो बिलकुल सही समय और योग के अनुसार पैदा हुआ बताते हैं वही ऐसे ऐसे कुकर्म करता है की माँ बाप को मुंह छिपाना मुश्किल हो जाता है। पर इसकी जिम्मेदारी लेने को कोई तैयार नही है। ज्योतिषी फ़ीस लेकर भविष्य बताता है और मुसीबत का उपाय करता है लेकिन परिणाम उल्टा निकलता है। कानून के हिसाब से तो यह ग्राहक सुरक्षा अदालत का मामला बनता है। सरकार को चाहिए की वो ज्योतिष को व्यापार घोषित कर दे ताकि लोग अदालत जा सकें। 

                       पिछले दिनों ये खबर आई थी की कुछ विश्वविधालय ज्योतिष का डिग्री प्रोग्राम शुरू कर रहे हैं। मैं कहता हूँ की देश धन्य हो जायेगा। एक तो इससे विज्ञानं के क्षेत्र में हमारी स्थिति सुधरेगी और हम योग दिवस की तरह ज्योतिष के नोबल पुरुस्कार की मांग कर सकते हैं। इससे कम से कम एक नोबल पुरुस्कार हर साल हमारे लिए पक्का हो जायेगा। दूसरा सरकार के सभी सरकारी विभाग एक स्थाई ज्योतिषी रख सकेंगे जो यह बता सकेगा की किस इमारत का फीता कौनसे मंत्री से कटवाना शुभ रहेगा। सरकार तय कर सकेगी की कौनसी सड़क किस मुहूर्त में शुरू की जाये। जिस दिन राहुकाल हो उस दिन दफ्तर में छुट्टी रक्खी जा सकती है। दफ्तर खुलने का समय बाकायदा चौघड़िया देखकर तय किया जा सकता है। साथ ही संविधान में जो साइंटिफिक टेम्परामेन्ट को बढ़ावा देने जैसी उल-जलूल बातें लिखी गयी हैं उन्हें घोषित रूप से खत्म किया जा सकेगा और उसके लिए सरकार को इतने लचर बहाने बनाने की जरूरत नही पड़ेगी जैसे वो अब बना रही है। इसलिए विश्व महत्त्व के इस काम पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है और संसद के मानसून सत्र में इसके लिए प्रस्ताव लाया जा सकता है। बल्कि मैं तो कहता हूँ की उतना इंतजार करने की भी जरूरत नही है, इसके लिए एक अध्यादेश लाया जा सकता है। वैसे भी सरकार इस महीने कोई अध्यादेश नही लाई है और उसकी छवि खराब हो रही है। 

 

खबरी -- उम्मीद रखनी चाहिए की सरकार अच्छा सा मुहूर्त देखकर अध्यादेश जरूर लाएगी।

              
               

Thursday, June 25, 2015

संविधान में लिखे शब्दों का अर्थ

खबरी -- हमारे संविधान में जो मार्गदर्शक सिद्धान्त दिए गए हैं उनका कोई मतलब है खरा ?

 

गप्पी -- महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने कहा था की " मैंने बेड़े की तरह पार उतरने के लिए विचारों को स्वीकार किया है, उन्हें सिर पर उठाये फिरने के लिए नही। "

इसी तरह हमने कुछ विचारों और सिद्धांतों को हमारे संविधान में भी स्वीकार किया था। मेरा अनुमान है की वे भी पार उतरने के लिए ही स्वीकार किये गए होंगे। सही बात संविधान निर्माता जाने। उन विचारों में एक विचार समाजवाद का भी था। और एक विचार ये भी था की देश में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास किया जायेगा। परन्तु आजादी से अब तक हमारे नेताओं का जो आचरण रहा है उससे तो लगता है की इन्हे सिर पर उठाये फिरने के लिए ही स्वीकार किया गया है। लेकिन नेताओं के आचरण पर बात करना आाजकल देश विरोधी प्रवृति मानी  जाती है। सो इस पर बात कौन करे। अगर आज के समय में यक्ष युधिष्टर से सवाल पूछते तो एक सवाल का जवाब इस तरह होता।

 " बताओ इस दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है। "

" जनता द्वारा नेताओं के भाषणो और आचरण में समानता की खोज सबसे बड़ा आश्चर्य है। " युधिष्टर का जवाब होता।

उसके बाद यक्ष उससे उसके एक भाई को जिन्दा करने के लिए पूछते।

तो युधिष्टर कहते की " किसी को जिन्दा करने की जरूरत नही है। बस आप मुझसे ये वादा करें की आप ये बात किसी को बताएंगे नही। "

सो इस युग में इस तरह की खोज विशुद्ध मूर्खता मानी जाएगी। आजकल नेता ज्योतिषी से मुहूर्त निकलवा कर उस संविधान की शपथ लेते हैं जिसमे वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने की बात कही गयी है। मेरी मति मारी गयी थी की मैंने एक मौजूदा सत्ताधारी नेता से पूछ लिया की मंत्री जी आपका आचरण इस बात के खिलाफ है जो संविधान में लिखा हुआ है की वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया जायेगा।

 " संविधान में तो ये भी लिखा है की समाजवाद लाया जायेगा। आ गया समाजवाद? तुमने  कांग्रेस से तो कभी पूछा नही।" मंत्री जी ने मुझे लगभग गले से पकड़ लिया।

" पूछा था, पूछा था।  कांग्रेस से भी पूछा था। बल्कि यों कहो की चिल्ला चिल्ला कर पूछा था लेकिन उसने भी जवाब नही दिया। " मैंने पिटने के डर से जल्दी जल्दी कहा।

" किसी ने नही पूछा। और भले ही पूछा हो उसे चुना तो तुमने ही था। अब भुगतो उसका फल। " नेता जी ने मुझे उलाहना दिया।

" लेकिन चुना तो आपको भी हमने ही है। " मैंने कहा।

" तो उसका फल तुम्हारी आने वाली पीढ़ियां भुगतेंगी। ? नेता जी ने जवाब दिया।

अब आने वाली पीढ़ियों का भविष्य मुझे अपने से भी काला नजर आ रहा था। मैंने सोचा की इससे निपटने के लिए मुझे पावरफुल मीडिया की मदद लेनी चाहिए। मैं एक रिपोर्टर के पास पहुंचा। उसको सारी स्थिति बताई।

     वह मुझे बोला की कौनसे चैनल से मदद लेना चाहोगे।

मैं विचार करने लगा। सामने टीवी था मैंने सोचा की टीवी चालू कर लेता हूँ। इससे सारे चैनलों के नाम याद आ जायेंगे  पहला चैनल लगाया , यहां एक बाबा काले कपड़े पहने शनि से बचने का उपाय बता रहा था। दूसरा चैनल लगाया, यहां एक महिला अजीब सा मेकअप किये बैठी थी और ताश के पत्तों से देश का भविष्य बता रही थी। मैंने  तीसरा चैनल लगाया,यहां एक बाबा जी ग्रहयोग से बिमारियों का इलाज बता रहा था। मैंने एक-एक करके सारे  न्यूज़ चैनल लगा कर देखे। सब पर कोई ना कोई बाबा या साध्वी ग्रहयोग से लोगों की समस्याओं का हल बता रही थी।

            मुझे जोर की हंसी आई, खूब हँसी आई, बहुत हँसी आई, इतनी हंसी आई की आँखों में आँसूं आ गए।

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