Showing posts with label Krishana. Show all posts
Showing posts with label Krishana. Show all posts

Saturday, July 18, 2015

Vyang -- अथ " दामाद " कथा

गप्पी -- जम्मू के एक कार्यक्रम में प्रधानमन्त्री ने एक राष्ट्रीय समस्या की तरफ देश का ध्यान खींचा। यह समस्या है दामाद समस्या। इस समस्या का मूल भारतीय संस्कृति में बहुत गहरे तक है। कांग्रेस और मीडिया इसे राबर्ट वाड्रा से जोड़कर देखते हैं तो ये उनका समस्या का सरलीकरण करना हैं। मेरा मानना है की प्रधानमन्त्री बड़ी समस्या की तरफ देश का ध्यान आकर्षित करना चाहते थे। प्रधानमन्त्री जम्मू में कांग्रेस के स्वर्गीय नेता गिरधारीलाल डोगरा की शताब्दी के अवसर पर बोल रहे थे। और गिरधारीलाल डोगरा के दामाद अरुण जेटली उनके बाजू में बैठे हुए थे। उन्होंने भाजपा के प्रवक्ताओं को भी संदेश दे दिया की अगर भविष्य में अरुण जेटली का कोई घोटाला सामने आ जाये तो वो कह सकते हैं की आखिर हैं तो एक काँग्रेसी के ही दामाद। 

                   छोड़िये, मुख्य समस्या पर आते है। भारतीय परम्परा में दामाद का महत्त्व बहुत अधिक होता है। उसे एक विशिष्ट दर्जा हासिल है। दामाद वो प्राणी होता है जो घर में बिना कुछ किये पूरी सुविधाओं और अतिरिक्त रोबदाब से रहता है। और ये सारे लक्षण उसमे सभी तरह की जाती और धर्म से परे पाये जाते हैं। दामाद किसी जाती का हो, किसी सामाजिक और आर्थिक श्रेणी में आता हो उसके इन लक्षणों पर कोई फर्क नही पड़ता। मेरे घर से थोड़ी दूर सड़क के नुक्क्ड़ पर एक बूट पालिस करने वाला लड़का बैठता था। उम्र कोई 30 साल होगी। आते जाते उससे दुआ सलाम और बातचीत हो जाती थी। वो मुझे कई दिन दिखाई नही दिया। कई दिन बाद जब वो दुबारा दिखाई दिया तो मैंने पूछा की इतने दिन कहां थे? तो उसने जवाब दिया, " मेरे साले  की शादी थी। मैं ससुराल वालों से नाराज था सो मैंने घरवाली को अकेले भेज दिया और उसको बताया की मैं एक दो दिन बाद आऊंगा। ससुर को जब पता चला की मैं नाराजगी के कारण नही आया तो वो दूसरे चार पांच लोगों को लेकर मेरे घर आये। उन्होंने सबके बीच में मुझसे माफ़ी मांगी और पैर पकड़े, तब मैं उनके साथ ससुराल गया। मैंने भी उन्हें बता दिया की आखिर मेरी भी कोई इज्जत है। इस सारे प्रोग्राम में चार पांच दिन लग गए। "

                             दामाद होने का अहंकार उसके चेहरे से फूटा पड रहा था। और उसमें पूर्ण सन्तोष का भाव शामिल था। ये भरतीय दामाद का सर्वव्यापी लक्षण है। 

                      अब फिर थोड़ी इस राष्ट्रीय समस्या की बात कर लेते हैं। हमारे देश में सरकारी अफसरों और कर्मचारियों को सरकारी दामाद कहा जाता है। क्योंकि उनमे भी वो सारे लक्षण पाये जाते हैं जो दूसरे दामादों में पाये जाते हैं। इस समस्या का कोई हल प्रधानमंत्रीजी के पास भी नही होगा क्योकि नेता भी अपने आप को सरकारी दामाद मानते हैं। अख़बार में खबर छपी थी की एक आदमी ने RTI के तहत प्रधानमंत्री के विदेशी दौरों पर हुए खर्च का हिसाब माँगा तो सरकार ने इंकार कर दिया। भला कोई दामादों के खर्चे का हिसाब देता है ? RTI करने वाले को भारतीय परम्परा की जानकारी नही होगी।  अधिकारीयों के खिलाफ ना जाने कितनी शिकायतें पैंडिंग हैं पर आज तक कुछ हुआ, हो ही नही सकता, दामाद जो ठहरे।

                      हमारे यहां पुरातन काल से ससुर दामादों के कुकर्मो का भोग बनते रहे हैं। कंस को बचाने के लिए और बाद में उसकी मौत का बदला लेने के लिए जरासंघ सारी उम्र कृष्ण से लड़ता रहा और आखिर में ससुरगति को प्राप्त हो गया। विरोधी पक्ष को हराने के लिए भी दामादों का प्रयोग हमारे यहां बखूबी होता रहा है। देवताओं को शुक्राचार्य से मृतसंजीवनी विद्या चुराने के लिए कच को उसका दामाद बनाना पड़ा था। शुक्राचार्य के पेट के अंदर पहुंचाने से पहले उसके घर अंदर पहुंचाने का सबसे आसान और पुख्ता रास्ता दामाद ही था। 

भारतीय परम्परा में ऋषि मुनि पुत्र ना होने पर अपनी सारी विद्या और खोज दामाद को ही सौंपते थे। और जिनको दामाद भी प्राप्त नही होता था वो अपनी सदियों के मेहनत और विद्या अपने साथ ही लेकर मर जाता था। बाकी शिष्य भले ही कितने ही काबिल क्यों ना हों किसी को भरोसे के काबिल नही माना जाता था। 

                    इसलिए राजनितिक पार्टियों और मीडिया को इस समस्या के मूल पर विचार करना चाहिए और इसे कोई छोटा मोटा ताना मानकर नही छोड़ देना चाहिए। मेरा तो ये मानना है की अगर हम ये समस्या हल करने में कामयाब हो गए तो विकास और महंगाई जैसी छोटी छोटी समस्याओं को तो चुटकी में हल किया जा सकता है। 

खबरी -- पर मुझे तो लगता है की प्रधानमंत्रीजी को केवल देश के दामादों को सम्भालना चाहिए। इनमे बहुत से देशी विदेशी उद्योगपति भी शामिल हो गए हैं।

Thursday, June 25, 2015

संविधान में लिखे शब्दों का अर्थ

खबरी -- हमारे संविधान में जो मार्गदर्शक सिद्धान्त दिए गए हैं उनका कोई मतलब है खरा ?

 

गप्पी -- महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने कहा था की " मैंने बेड़े की तरह पार उतरने के लिए विचारों को स्वीकार किया है, उन्हें सिर पर उठाये फिरने के लिए नही। "

इसी तरह हमने कुछ विचारों और सिद्धांतों को हमारे संविधान में भी स्वीकार किया था। मेरा अनुमान है की वे भी पार उतरने के लिए ही स्वीकार किये गए होंगे। सही बात संविधान निर्माता जाने। उन विचारों में एक विचार समाजवाद का भी था। और एक विचार ये भी था की देश में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास किया जायेगा। परन्तु आजादी से अब तक हमारे नेताओं का जो आचरण रहा है उससे तो लगता है की इन्हे सिर पर उठाये फिरने के लिए ही स्वीकार किया गया है। लेकिन नेताओं के आचरण पर बात करना आाजकल देश विरोधी प्रवृति मानी  जाती है। सो इस पर बात कौन करे। अगर आज के समय में यक्ष युधिष्टर से सवाल पूछते तो एक सवाल का जवाब इस तरह होता।

 " बताओ इस दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है। "

" जनता द्वारा नेताओं के भाषणो और आचरण में समानता की खोज सबसे बड़ा आश्चर्य है। " युधिष्टर का जवाब होता।

उसके बाद यक्ष उससे उसके एक भाई को जिन्दा करने के लिए पूछते।

तो युधिष्टर कहते की " किसी को जिन्दा करने की जरूरत नही है। बस आप मुझसे ये वादा करें की आप ये बात किसी को बताएंगे नही। "

सो इस युग में इस तरह की खोज विशुद्ध मूर्खता मानी जाएगी। आजकल नेता ज्योतिषी से मुहूर्त निकलवा कर उस संविधान की शपथ लेते हैं जिसमे वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने की बात कही गयी है। मेरी मति मारी गयी थी की मैंने एक मौजूदा सत्ताधारी नेता से पूछ लिया की मंत्री जी आपका आचरण इस बात के खिलाफ है जो संविधान में लिखा हुआ है की वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया जायेगा।

 " संविधान में तो ये भी लिखा है की समाजवाद लाया जायेगा। आ गया समाजवाद? तुमने  कांग्रेस से तो कभी पूछा नही।" मंत्री जी ने मुझे लगभग गले से पकड़ लिया।

" पूछा था, पूछा था।  कांग्रेस से भी पूछा था। बल्कि यों कहो की चिल्ला चिल्ला कर पूछा था लेकिन उसने भी जवाब नही दिया। " मैंने पिटने के डर से जल्दी जल्दी कहा।

" किसी ने नही पूछा। और भले ही पूछा हो उसे चुना तो तुमने ही था। अब भुगतो उसका फल। " नेता जी ने मुझे उलाहना दिया।

" लेकिन चुना तो आपको भी हमने ही है। " मैंने कहा।

" तो उसका फल तुम्हारी आने वाली पीढ़ियां भुगतेंगी। ? नेता जी ने जवाब दिया।

अब आने वाली पीढ़ियों का भविष्य मुझे अपने से भी काला नजर आ रहा था। मैंने सोचा की इससे निपटने के लिए मुझे पावरफुल मीडिया की मदद लेनी चाहिए। मैं एक रिपोर्टर के पास पहुंचा। उसको सारी स्थिति बताई।

     वह मुझे बोला की कौनसे चैनल से मदद लेना चाहोगे।

मैं विचार करने लगा। सामने टीवी था मैंने सोचा की टीवी चालू कर लेता हूँ। इससे सारे चैनलों के नाम याद आ जायेंगे  पहला चैनल लगाया , यहां एक बाबा काले कपड़े पहने शनि से बचने का उपाय बता रहा था। दूसरा चैनल लगाया, यहां एक महिला अजीब सा मेकअप किये बैठी थी और ताश के पत्तों से देश का भविष्य बता रही थी। मैंने  तीसरा चैनल लगाया,यहां एक बाबा जी ग्रहयोग से बिमारियों का इलाज बता रहा था। मैंने एक-एक करके सारे  न्यूज़ चैनल लगा कर देखे। सब पर कोई ना कोई बाबा या साध्वी ग्रहयोग से लोगों की समस्याओं का हल बता रही थी।

            मुझे जोर की हंसी आई, खूब हँसी आई, बहुत हँसी आई, इतनी हंसी आई की आँखों में आँसूं आ गए।

.


Monday, June 22, 2015

हरी अनन्त, हरी कथा अनन्ता - आधुनिक महाभारत की कथा

गप्पी -- जिस तरह हरी ने इस संसार की रचना की, समय समय पर अवतार लेकर धर्म की रक्षा की, असंख्य लीलाएँ की और लोगों को संदेश दिए, उससे हरी कथा अनन्त हो गयी है। उसी तरह एक संसार की रचना और की गयी जिसे आईपीएल का संसार कहा जाता है। इस संसार के रचयिता ललित प्रभु हैं। इनकी कथा भी उतनी ही अनन्त है। जैसे जैसे इसका संसार लोगो के सामने दृष्टिगोचर हो रहा है इसका अनन्त स्वरूप सामने आ रहा है। कहते हैं की भगवान के हजारों नाम हैं उनमे एक नाम ललित भी है। इसमें एक महाभारत की शुरुआत हो गयी है। परन्तु इसके पात्र बदल गए हैं। किसी को समझ नही आ रहा है की कौन किसकी तरफ है।

                        इस युद्ध के महान धनुर्धर नरेन्द्र युद्ध के मैदान के बीचों बीच खड़े हैं। पहली महाभारत की तरह इस बार वो युद्ध से भागते नही हैं। परन्तु उन्हें समझ नही आ रहा है की वध किसका करना है। दुश्मन के खेमे से आवाज आ रही है की उसे अपने ही पक्ष के योद्धाओं में से कुछ का वध कर देना चाहिए। वो प्रभु  की तरफ देखते हैं। प्रभु  अपना विराट रूप दिखाते हैं। ये रूप इतना विराट है की धरती के दोनों छोरों तक फैला हुआ है। इसमें उन्हें सुषमा स्वराज का सिर दिखाई देता है अपने पूरे परिवार के साथ, वसुन्धरा राजे का सिर भी है अपने पुत्र के साथ, शशि थरूर का सर भी है , शरद पवार और प्रफुल्ल पटेल का सर भी है। महाराष्ट्र के पुलिस कमिशनर राकेश मरिया का सिर भी है। और भी न जाने कितने सिर हैं जिनकी शक्लें अभी साफ नही हैं। अर्जुन, मेरा मतलब है की नरेन्द्र असमंजस में हैं। प्रभु  धीरे धीरे मुस्कुरा रहे हैं और कह रहे हैं की वत्स," देख लो और पहचान लो, कौन दुश्मन है और कौन साथी ," नरेंद्र हक्के बक्के खड़े हैं। धीरे से पूछते है की प्रभु क्या मुझे भी आपकी तरह रण छोड़ कर भागना पड़ेगा।

                      परन्तु ये आधुनिक युग के प्रभु हैं। इन्हे मालूम था की कानून नाम के जरासंघ से वो हार सकते हैं। इसलिए युद्ध शुरू होने से पहले ही निकल लिए। अब लन्दन नाम की नई द्वारका में बैठकर ताल ठोँक रहे हैं की मैं जरासंघ से डरता नही हूँ। कंस के द्वारपालों को रिश्वत दे कर भाग निकले और अब वेनीश और मलेशिया में गोपियों के साथ रास रचा रहे हैं।

                          प्रभु  उपदेश देते हैं की मित्र अपने पिता देवेन्द्र से बात करके दो एक मेनका मंगवा लो और दुश्मन पक्ष के कुछ योद्धाओं को भेज दो। नरेन्द्र निराशा से कहते हैं की प्रभु सीबीआई नाम की मेनका को दुश्मन के दो बड़े योद्धाओं शंकर सिंह वाघेला और वीरभद्र सिंह के पास भेज चुके हैं। उसने अपने जाल में उनको फंसा भी लिया है परन्तु दुश्मन खेमा फिर भी मजबूत नजर आ रहा है। हमने जिन दो मोर्चो पर महिला योद्धाओं को लगा रक्खा है उनके बारे में अब कुछ साथी कहते हैं की ये कमजोर कड़ी हैं इन्हे बदल दो, वरना युद्ध हारने  का खतरा है। हमने उनको बदलने का सोचा ही था की उन्होंने संदेश भेज दिया की अगर उन्हें बदला गया तो वो अपनी सेना साथ में लेकर चली जाएँगी।

                       इसलिए हे प्रभु बहुत कन्फ्यूजन है , उचित मार्गदर्शन दीजिये।

प्रभु फिर मुस्कुराते हैं और कहते हैं की," हे संघेय ! तुमने मेरे साथ ठीक नही किया। तुम्हारे नियुक्त किये हुए पुजारी मेरा सारा चढ़ावा खा गए। जबकि तुमने वादा  किया था की न खाऊंगा और न खाने दूंगा।"

             नरेंद्र मुश्किल की मुद्रा में कहते हैं की हे प्रभु, आपने वचन के अनुसार अपनी पूरी यादव सेना तो दुश्मन को दे दी और खुद मेरी तरफ आने की बजाए द्वारका निकल गए। अब मेरे रथ का सारथी नही मिल रहा है। हमारे पक्ष में जिस एकमात्र योद्धा को रथयात्रा का अनुभव था हमने बब्रुवाहन की तरह उनका सिर युद्ध की शुरुआत में  उनके ही हाथों कटवा दिया था कुल की रक्षा के लिए। अब उनका कटा हुआ सिर भी अंट शंट बोलता रहता है। हमारे मराठा नरेश शल्य की भूमिका में आ गए हैं। लड़ भी हमारी तरफ से रहे हैं और गालियां भी हमे ही दे रहे हैं। अभिमन्यु अब दूध पिता बच्चा नही रहा। वो अब मगध नरेश है। हमने जिस चक्रव्यूह का निर्माण उसको  मारने  के लिए किया था उसमे वो भीम को साथ में लेकर घुस गए हैं। हमने दुशासन और जयद्रथ को भेजा तो है परन्तु वहां से खबर आ रही है की वो आपस में लड़ रहे हैं। इसलिए बहुत मुश्किल समय है प्रभु, अगर इस समय में उचित मार्गदर्शन नही मिला तो आपका ये मित्र और भक्त युद्ध हार सकता है। ऊपर  से आप अपने विराट रूप में जब राजीव शुक्ला का चेहरा दिखाते हैं तो साथ में अरुण जेटली का भी दिखा देतें हैं। अब हमारे पास कोई शकुनि भी नही है और हम केवल सुब्रमणियम स्वामी के भरोसे हैं। इसलिए हे माधव हमारी गलतियों को क्षमा करके इस मुसीबत से निकालिये।

           लड़ाई जारी है। भगवान के विराट रूप में और किस किस के सिर लगे हैं ये धीरे धीरे साफ हो रहे हैं। ये युद्ध कौरवों और पांडवों के बीच नही है। लोगों को लग रहा है की दोनों तरफ कौरव हैं। दोनों खेमे केवल एक दूसरे पर ही हमला नही कर रहे हैं बल्कि अपने पक्ष के योद्धाओं पर भी हमले हो रहे हैं। एक ही चीज एक जैसी है की प्रभु तब भी बिना हथियार उठाये सबको मार रहे थे और अब भी बिना हथियार उठाये संहार कर रहे हैं। हे प्रभु तेरी लीला अनन्त है। 

खबरी -- ये युद्ध भी अट्ठारह दिन में खत्म हो जायेगा क्या ?