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Sunday, July 26, 2015

Vyang -- लो बदल दिया नाम, सारे मसले हल

खबरी -- सुना है मध्यप्रदेश सरकार ने व्यापम का नाम बदल दिया ?

गप्पी -- ये बहुत अच्छा किया। बहुत बदनामी हो रही थी। वैसे तो शैक्सपीयर ने कहा था की नाम में क्या रक्खा है। परन्तु अब समय बदल गया है। अब नाम में बहुत कुछ रक्खा है। कुछ नाम दूसरी चीजों के पर्याय हो जाते हैं। जैसे कोलगेट टूथपेस्ट का पर्याय हो गया। डालडा वनस्पति घी का पर्याय हो गया। लोग नाम किसी चीज का लेते हैं और मगज में छवि किसी दूसरी चीज की होती है। जैसे बोफोर्स का नाम आते ही घोटाला याद आने लगता था। उसी तरह व्यापम की हालत हो गयी थी। व्यापम का नाम आते ही श्मशान याद आने लगता था। रात को कोई व्यापम का जिक्र कर देता तो डर के मारे रोंगटे खड़े हो जाते थे। दहशत होने लगती थी। 

                  नाम बदलने के पीछे सरकार की दूसरी मजबूरियां भी रही होंगी। जहां व्यापम का दफ्तर है उस सड़क से लोगों ने डर के मारे आना जाना बंद कर दिया होगा। और एक सड़क बेकार हो गयी होगी। दूसरा जब कोई नई नौकरी या दाखिला निकलता होगा तो बहुत से बच्चे डर के मारे फार्म ही नही भरते होंगे। घर में छोटी मोटी  कहासुनी होने पर संतान व्यापम का फार्म भर देने की धमकी देती होगी। व्यापम का नाम आते ही पता नही किस किस का चेहरा आँखों के आगे घूम जाता होगा। मुझे तो लगता है की कर्मचारियों ने व्यापम में काम करने से इंकार कर दिया होगा परन्तु सरकार ये बात दबा गयी होगी। सो उसने इस मसले का हल निकाल दिया। उसने व्यापम का नाम बदल दिया। अब अगर कोई संसद में या बाहर व्यापम घोटाले का मामला उठाएगा तो बीजेपी और शिवराज सिंह कह सकते हैं, ' कौनसा व्यापम ? हमारे यहां तो कोई व्यापम है नही। आपके यहां है क्या। " सामने वाला चुप हो जायेगा। 

                     दूसरा राजनीती में नाम बदलने का उतना ही महत्त्व है जितना पार्टी बदलने का। महाराष्ट्र के चुनाओं में बीजेपी ने एनसीपी का नाम बदल कर नैशनल करप्ट पार्टी रख दिया। चुनाव खत्म हो गए। कुछ सीटें कम पड़ी तो शिवसेना ने आँख दिखानी शुरू कर दी। शरद पवार ने समर्थन की पेशकश की तो मोदीजी ने एनसीपी का नाम बदल कर " नैशनल कॉपरेटिव पार्टी " कर दिया। उसी तरह जम्मू-कश्मीर के चुनाव में बीजेपी ने पीडीपी का नाम बदल कर " बाप-बेटी कश्मीर लूटो पार्टी " रख दिया। लोगों ने फिर धोखा दे दिया। बीजेपी ने पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बना ली और पीडीपी का नाम बदल कर " कश्मीर विकास पार्टी "  रख दिया। 

                     अब बिहार में चुनाव आ रहे हैं तो ना जाने कितने नए नाम सुनने को मिलेंगे। शुरुआत भी हो गयी। मोदीजी ने RJD का नाम बदल कर " रोजाना जंगलराज का डर " पार्टी रख दिया। लालूजी कहाँ कम थे उन्होंने बीजेपी का  नाम बदल कर " बेशर्म और झूठी पार्टी " रख दिया। मोदीजी ने नितीश पर मांझी को हटाने को लेकर " महादलित का अपमान " करार दे दिया। बिहार के कई लोग कह रहे हैं की ये बीजेपी ही थी जिसने मांझी को कहीं का नही छोड़ा। 

                          उसी तरह नाम ही नही वायदे और नारे भी बदल रहे हैं। लोकसभा चुनाव में मोदीजी ने नारा दिया था, " कालाधन वापिस लाओ ' वायदा किया था सबको 15 -15 लाख देंगे। सारे युवाओं को रोजगार देंगे। अब नया नारा है " 24 घंटे बिजली देंगे " नया वायदा है की बिहार के लोगों को बिहार में ही काम देंगे। मोदीजी सोच रहे होंगे ये कोई दूसरे लोग हैं और लोकसभा चुनाव में दूसरे लोग थे। भूल गए होंगे, काम का दबाव रहता है। मोदीजी कह रहे हैं की बिहार को 50000 करोड़ से ज्यादा देंगे। नितीश कह रहे हैं की दे दो कौन रोक रहा है ? मोदीजी कह रहे हैं की सही समय पर इसकी घोषणा करेंगे। लोग हंस रहे हैं की नया जुमला है। 

                        कांग्रेस आरोप लगा रही है की सरकार हमारी योजनाओं का नाम बदल बदल कर वहीं  योजनाएं लागु कर रही हैं। मैं कहता हूँ की योजनाएं ही क्यों, सरकार तो हर वह काम कर रही है जो कांग्रेस करती थी। परन्तु सरकार के मंत्री इस बात के सख्त खिलाफ हैं। राजनाथसिंह कहते हैं की हमारा कोई मंत्री आरोप लगने पर UPA सरकार की तरह इस्तीफा नही देगा। बोलो फर्क हुआ की नही। अरुण जेटली जी कहते हैं की पहले हम कहते थे की संसद को चलाने की जिम्मेदारी सरकार की होती है अब हम विपक्ष से संसद चलाने की मांग को लेकर धरना दे रहे हैं। बोलो फर्क है की नही। शुष्मा जी पहले कहती थी मंत्री के पद पर रहते निष्पक्ष जाँच सम्भव ही नही है, अब कहती हैं की बिना आरोप सिद्ध हुए इस्तीफा कैसे ? बोलो फर्क हुआ की नही 

                सो राजनीती में नाम, वायदे, नारे और बयान बदलने का अपना महत्त्व है।

Sunday, July 12, 2015

Vyang -- गंगा की गन्दगी और व्यापम घोटाला

गप्पी -- गंगा को हमारे देश की सबसे पवित्र नदी माना जाता है। इसको पाप-विमोचनी, मोक्ष-दायिनी कहा गया है। मुझे लगता है की यही प्रशंसा उसे भारी पड़ी है। देश में जितने भी पाप करने वाले लोग हैं वे एक अंतराल के बाद गंगा में पाप धोने जाते है। अपने सभी पूर्वजों को मोक्ष दिलाने के लिए भी सारा देश अस्थियां लेकर गंगा में विसर्जित करने जाता है। और गंगा का ये हाल हो गया की उसको साफ करने का स्पेशल प्रोग्राम चलना पड रहा है। और गंगा है की साफ होने का नाम ही नही लेती। हजारों करोड़ रूपये खर्च हो गए और आगे होने वाले हैं लेकिन परिणाम नही आ रहा। 

                       दूसरा सवाल ये है की जब गंगा को हम इतना पवित्र मानते हैं तो उसे गन्दा क्यों करते हैं। इसका जवाब हमारी परम्परा में है। हम अपनी सारी  पवित्र चीजों को गन्दा करते हैं फिर चाहे वो नदी हो ,पहाड़ हों, तीर्थस्थान हों , पार्क हों, शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थाएं हों। गंदगी हमारी सांस्कृतिक धरोहर है सो इसे हम कैसे छोड़ सकते हैं। जब तक हमारे आसपास गन्दगी ना हो हमे अजीब अजीब लगता है। हमे लगता है की हम दूसरे देश में हैं। घर जैसा महसूस ही नही होता। इसलिए हम पहला काम गन्दगी फ़ैलाने का ही करते हैं। 

                        इसलिए हमे केवल गंगा को साफ करने का अभियान नही चलाना पड़ता बल्कि सारे देश में स्वच्छता अभियान चलाना पड़ता है। अगर हम ये देखें की गंगा में गन्दगी फ़ैलाने वाले लोगों में कौन कौन शामिल हैं तो मालूम पड़ेगा की पाप धोने वाले लोगों के अलावा और भी बहुत से लोग हैं जो ये काम करते हैं। इनमे गंगा के किनारे बसे हुए शहरों की म्युनिसिपल कमेटियां भी शामिल हैं जो सारे शहर की गन्दगी गंगा में डाल देती हैं। इसके अलावा वो सारे उद्योग जो गंगा के किनारे स्थित हैं अपनी गन्दगी गंगा में डाल देते हैं। सोचते होंगे इससे गंदगी के निकाल के साथ पाप भी धुल जायेंगे। 

                         दूसरी तरफ हमारी सरकार है जो शहरों और उद्योगों की गन्दगी की उपयुक्त सफाई का प्रबन्ध करने की बजाए केवल प्रतिबंध लगाने में विश्वास रखती है। आज ये चीज गंगा में डालने पर प्रतिबंध लगा दिया, कल दूसरी चीज गंगा में डालने पर। अब सवाल ये है की वो इस गंदगी को लेकर कहां जाएँ। जब तक वैकल्पिक व्यवस्था नही होगी तब तक या तो वो गन्दगी घुमाफिरा कर गंगा में गिरेगी या फिर वो उद्योग बंद हो जायेंगे। लेकिन सरकारों को इन चीजों से कभी सरोकार ही नही रहा। उसको केवल एक काम ही करना आता है और वो हैं प्रतिबंध लगाना। सरकार ने गंदगी से लेकर कालेधन तक, और रेप से लेकर टैक्स चोरी तक, हर चीज पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। 

                    अब एक दूसरी समस्या खड़ी हो गयी है। मध्यप्रदेश के एक बीजेपी नेता ने कहा है की मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उतने ही पवित्र हैं जितनी गंगा है। मुझे अब तक समझ में नही आया की ये बयान शिवराज सिंह के समर्थन में है की विरोध में। कुछ लोग कह रहे हैं की समर्थन में है और इसमें वो गंगा की आध्यत्मिक पवित्रता की बात कर रहे हैं। दूसरा पक्ष कहता है की विरोध में है क्योंकि मंत्री को मालूम है की गंगा ही सबसे प्रदूषित नदी है। और व्यापम की गंदगी कोई गंगा में गिरने वाली गंदगी से कम थोड़े ना है, बल्कि उससे ज्यादा ही व्यापक है। और की मंत्री ने ये बयान इस संभावना को ध्यान में रखकर दिया है की व्यापम की सफाई में भी उतना ही समय लगने वाला है जितना गंगा की सफाई में लगने वाला है। अब वाराणसी और इलाहबाद से चुनाव लड़ने वाले भाजपा के नेता मुरली मनोहर जोशी तो कहते हैं की जिस तरह सरकार गंगा की सफाई कर रही है उससे तो गंगा सौ साल में भी साफ नही हो सकती। उसी तरह मध्यप्रदेश के कुछ लोग कह रहे हैं की जिस तरह से व्यापम की जाँच हो रही है उस हिसाब से तो ये सौ साल में भी पूरी नही हो सकती। गजब का साम्य है दोनों में। दूसरी जो बात उन्होंने कही की बीजेपी को व्यापम घोटाले का कोई अफ़सोस नही है। ये बात कहने की कोई जरूरत नही थी। देश की जनता ये बात पहले से ही जानती है की सरकारों को घोटालों के अफ़सोस कभी नही रहे। आप कांग्रेस से पूछ लीजिये की क्या उसे 2G या कोयला घोटाले का कोई अफ़सोस है तो कहेगी बिलकुल नही। आप तृणमूल कांग्रेस से पूछ लीजिये की क्या उसे श्रद्धा चिट फण्ड घोटाले का कोई अफ़सोस है तो कहेगी की अफ़सोस किस बात का, बल्कि हमे तो गर्व है।

                     मेरे पड़ौसी को इस बात पर बहुत एतराज है की अब नेताओं की गन्दगी भी गंगा में डाली जा रही है। उनका कहना है की इससे तो गंगा की सफाई की रही सही सम्भावना भी खत्म हो जाएगी। उसका कहना है की कम से कम गंगा को तो राजनीति से दूर रक्खो , क्योंकि गंगा की स्वीकार्यता सभी धर्मों से परे है। हर धर्म और सम्प्रदाय के लोग गंगा को जीवन दायिनी मानते हैं। इसका एक उदाहरण मैं नीचे दे रहा हूँ जिसमे गंगा के किनारे रहने वाला एक मुसलमान शायर गंगा को सम्बोधित करते हुए कहता है ,

                                        बहुत नमाजें पढ़ी हैं हमने,

                                                              अ गंगा तेरे पानी में वजू करके। 

खबरी -- शायद हमारा यही सामूहिक जज्बा ही गंगा को बचा ले जाये। 


 

Thursday, July 9, 2015

Vyang--शिवराज सिंह हाजिर हों।


गप्पी -- मध्यप्रदेश आजकल खबरों में है। खबरों में व्यापम घोटाले की वजह से है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह पर आरोप लग रहे हैं और वो इनकार कर रहे हैं हमेशा की तरह। ये तय किया गया की एक जनअदालत लगा ली जाए जिसमे शिवराज सिंह से कुछ सवाल पूछे जाएँ।

          अदालत लगी हुई है। आवाज लगाई जाती है, शिवराज सिंह हाजिर हों।

           शिवराज सिंह अदालत में हाजिर होते हैं तो जनता का वकील उनसे सवाल पूछता है।

वकील -- क्या आप जनता के सवालों का जवाब देने के लिए तैयार है ?

शिवराज सिंह -- मैं जनता के प्रति जवाबदेह नही हूँ। वैसे तो मैं किसी के प्रति भी जवाबदेह नही हूँ। परन्तु जनता के प्रति जवाबदेह होने का तो सवाल ही पैदा नही होता। हमारी पार्टी में इसका रिवाज ही नही है।

वकील -- लेकिन आप जनता के चुने हुए नुमाइन्दे हैं। आप जनता के प्रति जवाबदेही से इनकार कैसे कर सकते हैं ?

शिवराज सिंह -- मुझे मुख्यमंत्री जनता ने नही बनाया, पार्टी ने बनाया है। इसलिए मैं जनता के प्रति नही पार्टी के प्रति जवाबदेह हूँ। जनता को अपना भरम निकाल देना चाहिए।

वकील -- लेकिन आपको विधायक तो जनता ने ही चुना है।

शिवराज सिंह -- आपने मुझे यहां मुख्यमंत्री की हैसियत से बुलाया है। इसलिए बात भी उसी हिसाब से कीजिये। मैं यहां विधायक की हैसियत से नही आया। हूँ, जनता।

वकील -- क्या आप व्यापम घोटाले की नैतिक जिम्मेदारी लेते हैं। 

शिवराज सिंह -- आप हमसे नैतिकता की बात कैसे कर सकते हैं ? आपको मालूम होना चाहिए की हम राजनीती में हैं। 

वकील -- तो आप किस चीज की जिम्मेदारी लेते हैं। 

शिवराज सिंह -- हम केवल मध्यप्रदेश की जिम्मेदारी लेते हैं। मध्यप्रदेश का विकास हमारी जिद है, हमारा पैशन है। 

वकील -- लेकिन इतना बड़ा घोटाला हुआ है। 

शिवराज सिंह -- ये मध्यप्रदेश को बदनाम करने की साजिश है ये स्टैण्ड हमने कल ही तय किया है। अब आपको हररोज ये सुनने को मिलेगा की ये मध्यप्रदेश को बदनाम करने की साजिश है। बिलकुल गुजरात की तरह। ये कांग्रेस की साजिश है। 

वकील -- क्या आप कहना चाहते हैं की घोटाला नही हुआ ? तो फिर आप कैसे कहते हैं की इस घोटाले का पर्दाफाश आपने किया था। 

शिवराज सिंह -- हाँ, हम मानते हैं की घोटाला हुआ है इसीलिए तो हम जाँच करा रहे हैं। आखिर सबसे ज्यादा नुकशान तो हमारा ही हुआ है। 

वकील -- वो कैसे ?

शिवराज सिंह --  देखिए पूरी बात ध्यान से सुनिए। वरना आप कभी भी इस घोटाले की गंभीरता और हमारा नुकशान समझ नही पाएंगे। पहले कांग्रेस का राज था। दाखिलों और भर्तिओं की कोई सही प्रणाली नही थी। पर्चियों पर भर्ती हो जाती थी। हमने व्यापम की स्थापना की। आप नाम से ही समझ सकते हैं की हमारी योजना कितनी व्यापक थी। हमने सारी नौकरियों के रेट तय किये। दाखिलों के रेट तय किये। MBBS का 35 लाख और MD का एक करोड़। इसी तरह इंजीनियरिंग के रेट तय किये। फिर सभी नौकरियों के रेट तय किये। MBBS का झूठा पेपर देने के पैसे तय हुए। दलाली की दरें तय की। हमारे पास नई नौकरियां नही थी तो हमने 10 -15 साल से नौकरी कर रहे अध्यापकों को पेपर दिलवा कर 24000 अध्यापकों को बर्खास्त किया और उनकी जगह नई भर्तियां की। हम सोच रहे थे की इस तरह लगाये हुए अध्यापकों के पढाये हुए बच्चे तो भविष्य में पेपर पास ही नही कर पाएंगे और हमारा धन्धा बढ़ेगा। इस तरह की पूरी योजना बनाने और लागु करने में कितनी मेहनत होती है आप समझ सकते हैं। लेकिन अब हिसाब मिलाता हूँ तो हिसाब ही नही मिल रहा। जितनी नौकरियाँ दी गयी, दाखिले किये गए उसके हिसाब से जितना पैसा आना चाहिए था नही आया। घोटाला हो गया। इसलिए मैंने जाँच शुरू की। मेरी तो सारी मेहनत पानी में चली गयी। 

वकील -- लेकिन आपने अभी जो सीबीआई की जाँच की मांग की है तो लोग कहते हैं की रपट पड़े तो हर-गंगा। 

शिवराज सिंह -- जिन लोगों ने मेरे साथ ये घोटाला किया वो ही विपक्ष से मिल गए। कहते हैं की हमारा नाम आया है तो तुम्हारा भी आना चाहिए। कलियुग है। मैं अगर नही कहता तो भी सीबीआई जाँच तो होनी ही थी। इसलिए मैंने भी कह दिया। 

वकील -- सुना है की आपकी पार्टी के अंदर भी आपसे इस्तीफा मांगने वाले बढ़ रहे हैं क्या आपको इस्तीफा देना पड़ेगा ?

शिवराज सिंह -- सब ऊपर वाले की मर्जी पर निर्भर करता है। हम तो उसके हाथ की कठपुतलियां हैं। वैसे मैं उनको हमेशा अपना बड़ा भाई कहता रहा हूँ। लेकिन हर मुख्यमंत्री वशुन्धरा राजे की तरह ताकतवर तो नही होता न। 

                 तभी जनता में से आवाज आई की ये शिवराज सिंह नकली है। ये असली शिवराज सिंह नही है। 

अदालत ने पूछा की क्या तुम असली शिवराज सिंह नही हो ?

लेकिन मेरे सारे जवाब असली हैं आपको आम खाने से मतलब होना चाहिए। 

अदालत ने इस बात की जाँच होने तक की ये शिवराज सिंह असली है या नकली कार्यवाही स्थगित कर दी। 

 

खबरी -- लगे हाथ ये भी सीबीआई को दे देते।