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Saturday, July 29, 2017

नितीश कुमार और आकाश में घूमती हुई अंतरआत्माएँ

                 भारत के आकाश में बहुत सी  अंतरआत्माएँ घूम रही थी। अलग अलग वेशभूषायें और अलग अलग अंदाज में। अचानक दो  अंतरआत्माएँ आमने सामने आ गयी। एक अंतरात्मा नई नवेली दुल्हन के वेश में थी और दूसरी अंतरात्मा विधवा के वेश में थी। दुल्हन के वेश वाली अंतरात्मा को अपने सामने अचानक आ गयी विधवा को देखकर अच्छा नहीं लगा। वह उस पर जोर से चिल्लाई, ' दिखाई नहीं देता, क्या टककर मारने का इरादा है। "
               "माफ़ करना बहन, मन दुखी था इसलिए ध्यान नहीं रहा। वैसे तुम कौन हो, पहले तो तुम्हे कभी देखा नहीं ?" विधवा अंतरात्मा ने पूछा।
                " मैं नितीश कुमार की अंतरात्मा हूँ, अभी दो दिन पहले ही हमारी शादी हुई है बिहार के हित  में। " दुल्हन अंतरात्मा ने इतराते  जवाब दिया।
                  विधवा अंतरात्मा के होठों पर एक हल्की सी मुस्कान आयी। बोली,' जाओ बहन, मैं तो तुम्हे सदासुहागण रहने का आशीर्वाद भी नहीं दे सकती। "
                  दुल्हन अंतरात्मा अचानक पलटी। उसने विधवा अंतरात्मा के कंधे पर हाथ रखकर कहा, " तुमने ऐसा क्यों कहा और तुम हो कौन ? "
                 " मैं भी नितीश कुमार की अंतरात्मा ही हूँ। अभी बीस महीने पहले हमारी शादी हुई थी। फेरों के वक्त नितीश कुमार ने मुझे वचन दिया था की मिटटी में मिल जायेंगे लेकिन बीजेपी के साथ नहीं जायेंगे। अभी कुछ दिन पहले तक भी वो संघमुक्त भारत बनाने के लिए घर से निकले थे और थोड़ी देर के बाद कुछ रोती हुई अंतरआत्मायें मेरे घर आयी और मुझे बताया की मैं विधवा गयी। " उसकी आँखों से आँसू टपकने लगे।
                 दुल्हन अंतरात्मा गंभीर हो गयी। उसे अपनी शादी की क्षणभंगुरता साफ नजर आने लगी। वो दोनों साथ साथ चलती हुई थोड़ी ही आगे गयी थी की बदबू का एक जोरदार झोंका आया और सामने बहुत सी अन्तरात्माओं की लाशे बिखरी हुई थी। वह सहम गयी और उसने विधवा अंतरात्मा की तरफ देखा।
                     विधवा अंतरात्मा ने नाक  पर रुमाल रखते हुए कहा ," ये उन बिहारियों और देश के अलग अलग हिस्सों के उन लोगों की अंतरआत्मायें हैं जिन्होंने बीजेपी को हराने के लिए नितीश कुमार का समर्थन किया था। दो दिन पहले अचानक सुनामी आयी और ये बेमौत मारी गयी। "
                   " तो इनका अंतिम संस्कार क्यों नहीं कर देते ?" दुल्हन अंतरात्मा ने पूछा।
                    " जगह कहां है ? सारे श्मशान और कब्रिस्तान पहले ही मीडिया की अन्तरात्माओं से भरे हुए हैं। " विधवा अंतरात्मा ने अफ़सोस जताया।
                       अचानक एक तरफ से अन्तरात्माओं का एक झुण्ड रोता बिलखता हुआ आता दिखाई दिया।  दोनों उस तरफ देखने लगी। जब वो पास आयी तो उनसे पूछा की तुम कौन हो और रो क्यों रही हो ?
                      उन अन्तरात्माओं ने रोते रोते कहा, " हम गुजरात के कुछ नेताओं की अंतरआत्मायें हैं। पहले हमे ऊना कांड पर और साम्प्रदायिकता पर रोने को कहा गया था। हम वहां रो ही रही थी की अचानक संदेश आया की रोना बंद करो और मंगलगान गाओ। भला ऐसा भी कभी होता है ? हमे कपड़े बदलने तक का मौका नहीं दिया। हमारे पतियों ने ये कहकर की कांग्रेस बीजेपी को हराने के लिए कुछ नहीं कर रही है बीजेपी की सदस्य्ता ले ली। आदमी ऐसा कैसे कर सकता है। इस तरह हम एक  साथ विधवा हो गयी।  हम तो कहती हैं की भगवान किसी अंतरात्मा की शादी किसी नेता से ना करवाए।"
                     अचानक दुल्हन अंतरात्मा ने अपने सारे जेवर उतार कर फेंक दिए। माथे का सिंदूर पोंछ दिया और घूमकर विधवा अंतरात्मा से बोली, " माफ़ करना दीदी, नितीश कुमार ने मिटटी में मिलने की शर्त पूरी कर दी। अब उस आदमी के अंदर इतनी जगह ही नहीं बची है की कोई अंतरात्मा उसके अंदर रह सके। इसलिए मैं उससे तलाक ले रही हूँ। दो दिन बाद विधवा होने से अच्छा है की तलाक ले लूँ। " और वो एक तरफ चली गयी। बाकि की अंतरआत्मायें उसे जाते हुए देखती रही।

Friday, September 11, 2015

हमारी सरकार गरीबों की सरकार है---ये रहा हमारा प्लान

हमें ये बात बार बार दोहरानी पड़ती है क्योंकि अभी तक गरीब इस बात पर भरोसा ही नही करते। परन्तु हम जो कहते हैं वो करते हैं ये हमारा रिकार्ड रहा है। इसलिए जब हमने कह दिया की हमारी सरकार गरीबों की सरकार है तो गरीबों को हम पर भरोसा करना चाहिए। हम उन्हें ताकत देना चाहते हैं। कुछ लोगों को ये हजम नही हो रहा की कैसे एक चायवाला प्रधानमंत्री बन गया। लेकिन हम हर कीमत पर गरीबों को ताकत देकर रहेंगे। ऐसा मैंने अपनी लगभग हर रैली में कहा है। आज मैं अपना प्लान लोगों के सामने रखूंगा ताकि उन्हें हमारी ईमानदारी और वायदों पर भरोसा हो सके। गरीबों को ताकत देने का हमारा प्लान इस प्रकार है।
ताकत का मतलब है संख्या -------- 
                                                          हम ये मान कर चलते हैं की किसी भी तबके की ताकत उसकी संख्या पर निर्भर करती है। हमारा दल आरएसएस का हिस्सा है इसलिए हम हिन्दुओं के हितों का खास ख्याल रखते हैं। कुछ लोग तो यहां तक भी कहते हैं की हम केवल हिन्दुओं के हितों का ही ख्याल रखते हैं। कुछ लोग ये भी कहते हैं की हम केवल हिन्दू हित की बात करते हैं और असलियत में हम केवल कुछ उच्च जाती के हिन्दुओं का ही ख्याल रखते हैं। पर ये सच नही है। इस देश में लाखों हिन्दू किसानो ने आत्महत्या कर ली पर हमने कुछ नही किया, लाखों हिन्दू नौजवान रोजगार के लिए धक्के खा रहे हैं लेकिन हमने कुछ नही किया और हजारों हिन्दू भुखमरी से मर रहे हैं पर हमारे कानो पर जूं भी नही रेंगी। ये सब आरोप हैं। हमने इस पर जो जो किया वो मैं आपके सामने रखता हूँ। जैसे ही हिन्दुओं की संख्या 80 % से 1 % नीचे आई हमने कितनी हाय तौबा मचाई आपने देखा ही होगा। हमने हिन्दुओं की जनसंख्या बढ़ाने के लिए हेल्पलाइन तक शुरू करने की बात कही । हम मानते हैं की भले ही हिन्दू कितनी ही बुरी हालत में रहें लेकिन उनकी संख्या नही घटनी चाहिए। यही समझ हमारी गरीबों के प्रति है। हमारा हर कदम गरीबों की संख्या बढ़ाने पर लगा हुआ है। हमारी सरकार आने के बाद बेरोजगारी का प्रतिशत 9 से बढ़कर 17 हो गया इस पर किसी ने ध्यान दिया। इससे गरीबों की संख्या में कितनी बढ़ौतरी हुई होगी और गरीबों की ताकत में कितनी बढ़ौतरी हुई होगी ये देखा किसी ने। हमने गरीबों की संख्या में कमी करने वाले पहले से चले आ रहे मनरेगा जैसे कार्यक्रमों का क्या हाल कर दिया ये देखा किसी ने। हम गरीबों को ताकत दे रहे हैं बिलकुल हिन्दुओं की तर्ज पर, और ये हमारे विरोधियों से बर्दाश्त नही होता।
                           हम गरीबों को ताकत देने के लिए जो प्रयास करते हैं उसका ढिंढोरा नही पीटते। हमारे हर कार्यक्रम को अगर आप ध्यान से देखोगे तो हर कार्यक्रम में गरीबों को ताकत देने और उनकी संख्या बढ़ाने पर हमारा जोर रहा है। हम जब उद्योगपतियों की मीटिंग बुलाते हैं तो उनको भी इसके लिए प्रेरित करते हैं की वो गरीबों की संख्या बढ़ाने और उन्हें ताकत देने के काम में सरकार का सहयोग करें। हालाँकि हम ये भी जानते हैं की उद्योग जगत इस पर पहले से ही बहुत योगदान कर रहा है।
                          हमने प्याज जैसी चीज 90 रूपये किलो बिकवा दी कोई अनुमान कर सकता था ? जब हम दाल 150 रूपये किलो बिकवाते हैं तो उसके पीछे भी हमारा उद्देश्य गरीबों को ताकत देने का ही होता है। और हम ये ताकत देते रहेंगे। हमारी सरकार अपने मिशन से पीछे नही हटेगी। जो लोग इसमें अड़ंगा डाल रहे हैं उन्हें हम कामयाब नही होने देंगे। हम इस देश के सभी हिन्दुओं और सभी गरीबों को ताकत दे कर रहेंगे। बल्कि सही तरीके से कहा जाये तो हम हिन्दुओं और गरीबों के बीच का फासला ही मिटा देंगे। हमारी सलाह के अनुसार अगर हिन्दू अपनी आबादी बढ़ाने जैसे काम करते रहेंगे तो ये फासला बहुत जल्दी मिट जायेगा।
                           अभी हमने देश के पूर्वी हिस्से पर फोकस किया है। मैंने कहा है की जब तक पूर्वी भारत का विकास नही होगा बाकि देश का विकास नही हो सकता। ऐसा इसलिए कहा है क्योंकि पूर्वी हिस्से में गरीबों की तादाद पहले ही ज्यादा है और उसके कारण भी हमारे से पहले ही मौजूद हैं। वहां गरीबों की संख्या और ताकत को बढ़ाना बाकि देश की अपेक्षा ज्यादा आसान है। इसलिए गरीबों को ताकत देने का हमारा मिशन बिहार अब पुरे जोर शोर से शुरू होने वाला है। हमारी हर हिन्दू और हर गरीब से ये विनती है की वो विरोधियों की बात पर ध्यान ना दें। ये सरकार आपको ताकत दे कर रहेगी।

Monday, September 7, 2015

रिमोट से संचालित लोकतंत्र की सेल

आज के सभी बड़े अख़बारों में डैमोक्रेसी की सेल की खबरें छपी थी। शहर के एक प्रमुख मॉल में डैमोक्रेसी की सेल लगी हुई थी और वह भारी डिस्काउंट पर मिल रही थी। हमने भी डैमोक्रेसी के बारे में बहुत सुना था और उससे हमे भी इच्छा हुई की एक डैमोक्रेसी हम भी ले आये तो अच्छा रहेगा। हम घर से निकलने ही वाले थे की हमारी पत्नी ने कहा की अगर रँग वगैरा अच्छा हो तो एक डैमोक्रेसी उसके लिए भी ले आये। लेकिन उससे पहले दुकानदार से ये पक्का कर लें की अगर पसंद नही आई तो वापिस देंगे। पता नही मेरी पत्नी डैमोक्रेसी को क्या समझ रही थी। परन्तु समस्या ये थी की ठीक ठीक हमे भी मालूम नही था की ये कैसी होती है। थोड़ी देर में हम बाजार में पहुंच गए। बहुत लोग आये हुए थे। सबमे एक अजीब सी ख़ुशी थी। काउन्टर पर खड़ा हुआ एक आदमी सबसे बात कर रहा था। मैंने भी जाकर आहिस्ता से डरते डरते कहा की भाई साब अगर आप ठीक समझें तो हमारे लायक भी एक डेमोक्रेसी दिखा दीजिये।
               सेल्समैन उत्साह में था। तुरंत बोला, " अरे आप लायक की क्या बात करते हैं, हमारे पास तो डेमोक्रेसी के इतने डिजाइन हैं की आपको कोई न कोई तो जरूर पसंद आएगा। हमारे पास दस तरह की तो इम्पोर्टिड डेमोक्रेसी है। ये देखिये अमेरिकी डिजाइन, इसमें आपको बहुत ही ज्यादा फैसलिटी मिलेगी। और हमारे पास तो रिमोट वाली डेमोक्रेसी के भी कई डिजाइन हैं। "
                  रिमोट वाली डेमोक्रेसी ? मैंने आश्चर्य प्रकट किया।
              बिलकुल! और ये डेमोक्रेसी तो हम कई साल से बेच रहे हैं। कोई शिकायत नही है। बस आपको इसका रिमोट हर रोज चार्ज करना पड़ेगा वरना वो काम नही करेगा। हमने ये डेमोक्रेसी बाला साहेब ठाकरे को बेचीं थी, जब तक वो रहे वो इसको रोज चार्ज करते रहे। उनके जाने के बाद ठीक से चार्ज  नही हुआ तो प्रॉब्लम हो गयी।
                क्या कोई भारतीय पीस नही है ? मैंने पूछा।
             हैं, हैं क्यों नही, ये जातीय डेमोक्रेसी है। दूसरी जो आजकल बहुत चल रही है वो रिमोट वाली सनातन डेमोक्रेसी है जो हमने अभी अभी आरएसएस को बेचीं थी। हमने उसका डेमो भी दिया था अभी संघ मुख्यालय में। हर बटन पर सरकार नाच रही थी। खुद भागवत जी ने इसकी तारीफ की है आपने अख़बारों में तो पढ़ा ही होगा। सेल्समैन ने पूरी जानकारी दी।
               दूसरा कोई मॉडल ? मैंने और जानकारी चाही।
        एक मॉडल और था रिमोट वाला जो हमने 10 जनपथ को बेचा था। ठीक काम कर रहा था लेकिन पता नही क्या हुआ कम्पनी ने उसे वापिस ले लिया। सेल्समैन ने निराशा प्रकट की।
               कोई एकदम नया माडल, अच्छे रिमोट के साथ ? मैंने उसके साथ साथ  चलते हुए कहा।
               है लेकिन बहुत महंगा है। अभी अमित शाह लेकर गए हैं। इसका रिमोट दूसरे लोगों पर भी काम करता है। उसे हम सीबीआई डेमोक्रेसी  कहते हैं। उसका डेमो हमने मुलायम सिंह पर दिया था एकदम कामयाब रहा। सेल्समैन ने मेरी हालत पर नजर डाली।
               तभी एक दूसरा ग्राहक आया। सेल्समैन ने उससे पूछा, " कहां से आये हो भाई ?"
                " बिहार से। "
               " अरे, आओ आओ, बिहार के लिए तो हमने स्पेशल स्कीम निकाली है। " सेल्समैन मुझे छोड़कर उसकी तरफ लपका।
                " ये देखो, ये जो डेमोक्रेसी हम बिहार में बेच रहे हैं उसके साथ एक स्पेशल गिफ्ट पैकेज भी दिया जा रहा है। शर्त बस ये है की आपको डेमोक्रेसी अभी खरीदनी पड़ेगी और गिफ्ट पैकेज आपको चुनाव के बाद भेजा जायेगा। " सेल्समैन ने उसे एक पीस दिखाते हुए कहा।
               " लेकिन इस गिफ्ट पैकेज में क्या है ?" उसने पूछा।
              " देखिये ये तो सरपाईज है। इसमें कुछ भी निकल सकता है, हो सकता है 15 लाख निकल जाएँ। " सेल्समैन ने कहा।
              लेकिन बिहारी भी पक्का बिहारी था, उसको बिना देखे भरोसा नही हो रहा था। उसने कहा की पहले पैकेज खोल कर दिखाओ तभी डेमोक्रेसी लेंगे। और वह चला गया।
              " तो तुम दिखा क्यों नही देते ? इस तरह तो तुम्हारा एक भी पीस नही बिकेगा। " मैंने सेल्समैन से कहा।
              " कैसे दिखा दूँ साहब, इसमें प्रधानमंत्री के विदेशी दौरों की कैसेट हो सकती है, योग सिखाने वाली किताब हो सकती है, प्रधानमंत्री द्वारा ली गयी सैलफ़ियों का संग्रह हो सकता है। और---" सेल्समैन बीच में ही रुक गया।
             "और " मैंने पूछा।
            " जुमला भी हो सकता है। " सेल्समैन वापिस मुड़ गया।

Sunday, July 26, 2015

Vyang -- लो बदल दिया नाम, सारे मसले हल

खबरी -- सुना है मध्यप्रदेश सरकार ने व्यापम का नाम बदल दिया ?

गप्पी -- ये बहुत अच्छा किया। बहुत बदनामी हो रही थी। वैसे तो शैक्सपीयर ने कहा था की नाम में क्या रक्खा है। परन्तु अब समय बदल गया है। अब नाम में बहुत कुछ रक्खा है। कुछ नाम दूसरी चीजों के पर्याय हो जाते हैं। जैसे कोलगेट टूथपेस्ट का पर्याय हो गया। डालडा वनस्पति घी का पर्याय हो गया। लोग नाम किसी चीज का लेते हैं और मगज में छवि किसी दूसरी चीज की होती है। जैसे बोफोर्स का नाम आते ही घोटाला याद आने लगता था। उसी तरह व्यापम की हालत हो गयी थी। व्यापम का नाम आते ही श्मशान याद आने लगता था। रात को कोई व्यापम का जिक्र कर देता तो डर के मारे रोंगटे खड़े हो जाते थे। दहशत होने लगती थी। 

                  नाम बदलने के पीछे सरकार की दूसरी मजबूरियां भी रही होंगी। जहां व्यापम का दफ्तर है उस सड़क से लोगों ने डर के मारे आना जाना बंद कर दिया होगा। और एक सड़क बेकार हो गयी होगी। दूसरा जब कोई नई नौकरी या दाखिला निकलता होगा तो बहुत से बच्चे डर के मारे फार्म ही नही भरते होंगे। घर में छोटी मोटी  कहासुनी होने पर संतान व्यापम का फार्म भर देने की धमकी देती होगी। व्यापम का नाम आते ही पता नही किस किस का चेहरा आँखों के आगे घूम जाता होगा। मुझे तो लगता है की कर्मचारियों ने व्यापम में काम करने से इंकार कर दिया होगा परन्तु सरकार ये बात दबा गयी होगी। सो उसने इस मसले का हल निकाल दिया। उसने व्यापम का नाम बदल दिया। अब अगर कोई संसद में या बाहर व्यापम घोटाले का मामला उठाएगा तो बीजेपी और शिवराज सिंह कह सकते हैं, ' कौनसा व्यापम ? हमारे यहां तो कोई व्यापम है नही। आपके यहां है क्या। " सामने वाला चुप हो जायेगा। 

                     दूसरा राजनीती में नाम बदलने का उतना ही महत्त्व है जितना पार्टी बदलने का। महाराष्ट्र के चुनाओं में बीजेपी ने एनसीपी का नाम बदल कर नैशनल करप्ट पार्टी रख दिया। चुनाव खत्म हो गए। कुछ सीटें कम पड़ी तो शिवसेना ने आँख दिखानी शुरू कर दी। शरद पवार ने समर्थन की पेशकश की तो मोदीजी ने एनसीपी का नाम बदल कर " नैशनल कॉपरेटिव पार्टी " कर दिया। उसी तरह जम्मू-कश्मीर के चुनाव में बीजेपी ने पीडीपी का नाम बदल कर " बाप-बेटी कश्मीर लूटो पार्टी " रख दिया। लोगों ने फिर धोखा दे दिया। बीजेपी ने पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बना ली और पीडीपी का नाम बदल कर " कश्मीर विकास पार्टी "  रख दिया। 

                     अब बिहार में चुनाव आ रहे हैं तो ना जाने कितने नए नाम सुनने को मिलेंगे। शुरुआत भी हो गयी। मोदीजी ने RJD का नाम बदल कर " रोजाना जंगलराज का डर " पार्टी रख दिया। लालूजी कहाँ कम थे उन्होंने बीजेपी का  नाम बदल कर " बेशर्म और झूठी पार्टी " रख दिया। मोदीजी ने नितीश पर मांझी को हटाने को लेकर " महादलित का अपमान " करार दे दिया। बिहार के कई लोग कह रहे हैं की ये बीजेपी ही थी जिसने मांझी को कहीं का नही छोड़ा। 

                          उसी तरह नाम ही नही वायदे और नारे भी बदल रहे हैं। लोकसभा चुनाव में मोदीजी ने नारा दिया था, " कालाधन वापिस लाओ ' वायदा किया था सबको 15 -15 लाख देंगे। सारे युवाओं को रोजगार देंगे। अब नया नारा है " 24 घंटे बिजली देंगे " नया वायदा है की बिहार के लोगों को बिहार में ही काम देंगे। मोदीजी सोच रहे होंगे ये कोई दूसरे लोग हैं और लोकसभा चुनाव में दूसरे लोग थे। भूल गए होंगे, काम का दबाव रहता है। मोदीजी कह रहे हैं की बिहार को 50000 करोड़ से ज्यादा देंगे। नितीश कह रहे हैं की दे दो कौन रोक रहा है ? मोदीजी कह रहे हैं की सही समय पर इसकी घोषणा करेंगे। लोग हंस रहे हैं की नया जुमला है। 

                        कांग्रेस आरोप लगा रही है की सरकार हमारी योजनाओं का नाम बदल बदल कर वहीं  योजनाएं लागु कर रही हैं। मैं कहता हूँ की योजनाएं ही क्यों, सरकार तो हर वह काम कर रही है जो कांग्रेस करती थी। परन्तु सरकार के मंत्री इस बात के सख्त खिलाफ हैं। राजनाथसिंह कहते हैं की हमारा कोई मंत्री आरोप लगने पर UPA सरकार की तरह इस्तीफा नही देगा। बोलो फर्क हुआ की नही। अरुण जेटली जी कहते हैं की पहले हम कहते थे की संसद को चलाने की जिम्मेदारी सरकार की होती है अब हम विपक्ष से संसद चलाने की मांग को लेकर धरना दे रहे हैं। बोलो फर्क है की नही। शुष्मा जी पहले कहती थी मंत्री के पद पर रहते निष्पक्ष जाँच सम्भव ही नही है, अब कहती हैं की बिना आरोप सिद्ध हुए इस्तीफा कैसे ? बोलो फर्क हुआ की नही 

                सो राजनीती में नाम, वायदे, नारे और बयान बदलने का अपना महत्त्व है।

Monday, June 22, 2015

हरी अनन्त, हरी कथा अनन्ता - आधुनिक महाभारत की कथा

गप्पी -- जिस तरह हरी ने इस संसार की रचना की, समय समय पर अवतार लेकर धर्म की रक्षा की, असंख्य लीलाएँ की और लोगों को संदेश दिए, उससे हरी कथा अनन्त हो गयी है। उसी तरह एक संसार की रचना और की गयी जिसे आईपीएल का संसार कहा जाता है। इस संसार के रचयिता ललित प्रभु हैं। इनकी कथा भी उतनी ही अनन्त है। जैसे जैसे इसका संसार लोगो के सामने दृष्टिगोचर हो रहा है इसका अनन्त स्वरूप सामने आ रहा है। कहते हैं की भगवान के हजारों नाम हैं उनमे एक नाम ललित भी है। इसमें एक महाभारत की शुरुआत हो गयी है। परन्तु इसके पात्र बदल गए हैं। किसी को समझ नही आ रहा है की कौन किसकी तरफ है।

                        इस युद्ध के महान धनुर्धर नरेन्द्र युद्ध के मैदान के बीचों बीच खड़े हैं। पहली महाभारत की तरह इस बार वो युद्ध से भागते नही हैं। परन्तु उन्हें समझ नही आ रहा है की वध किसका करना है। दुश्मन के खेमे से आवाज आ रही है की उसे अपने ही पक्ष के योद्धाओं में से कुछ का वध कर देना चाहिए। वो प्रभु  की तरफ देखते हैं। प्रभु  अपना विराट रूप दिखाते हैं। ये रूप इतना विराट है की धरती के दोनों छोरों तक फैला हुआ है। इसमें उन्हें सुषमा स्वराज का सिर दिखाई देता है अपने पूरे परिवार के साथ, वसुन्धरा राजे का सिर भी है अपने पुत्र के साथ, शशि थरूर का सर भी है , शरद पवार और प्रफुल्ल पटेल का सर भी है। महाराष्ट्र के पुलिस कमिशनर राकेश मरिया का सिर भी है। और भी न जाने कितने सिर हैं जिनकी शक्लें अभी साफ नही हैं। अर्जुन, मेरा मतलब है की नरेन्द्र असमंजस में हैं। प्रभु  धीरे धीरे मुस्कुरा रहे हैं और कह रहे हैं की वत्स," देख लो और पहचान लो, कौन दुश्मन है और कौन साथी ," नरेंद्र हक्के बक्के खड़े हैं। धीरे से पूछते है की प्रभु क्या मुझे भी आपकी तरह रण छोड़ कर भागना पड़ेगा।

                      परन्तु ये आधुनिक युग के प्रभु हैं। इन्हे मालूम था की कानून नाम के जरासंघ से वो हार सकते हैं। इसलिए युद्ध शुरू होने से पहले ही निकल लिए। अब लन्दन नाम की नई द्वारका में बैठकर ताल ठोँक रहे हैं की मैं जरासंघ से डरता नही हूँ। कंस के द्वारपालों को रिश्वत दे कर भाग निकले और अब वेनीश और मलेशिया में गोपियों के साथ रास रचा रहे हैं।

                          प्रभु  उपदेश देते हैं की मित्र अपने पिता देवेन्द्र से बात करके दो एक मेनका मंगवा लो और दुश्मन पक्ष के कुछ योद्धाओं को भेज दो। नरेन्द्र निराशा से कहते हैं की प्रभु सीबीआई नाम की मेनका को दुश्मन के दो बड़े योद्धाओं शंकर सिंह वाघेला और वीरभद्र सिंह के पास भेज चुके हैं। उसने अपने जाल में उनको फंसा भी लिया है परन्तु दुश्मन खेमा फिर भी मजबूत नजर आ रहा है। हमने जिन दो मोर्चो पर महिला योद्धाओं को लगा रक्खा है उनके बारे में अब कुछ साथी कहते हैं की ये कमजोर कड़ी हैं इन्हे बदल दो, वरना युद्ध हारने  का खतरा है। हमने उनको बदलने का सोचा ही था की उन्होंने संदेश भेज दिया की अगर उन्हें बदला गया तो वो अपनी सेना साथ में लेकर चली जाएँगी।

                       इसलिए हे प्रभु बहुत कन्फ्यूजन है , उचित मार्गदर्शन दीजिये।

प्रभु फिर मुस्कुराते हैं और कहते हैं की," हे संघेय ! तुमने मेरे साथ ठीक नही किया। तुम्हारे नियुक्त किये हुए पुजारी मेरा सारा चढ़ावा खा गए। जबकि तुमने वादा  किया था की न खाऊंगा और न खाने दूंगा।"

             नरेंद्र मुश्किल की मुद्रा में कहते हैं की हे प्रभु, आपने वचन के अनुसार अपनी पूरी यादव सेना तो दुश्मन को दे दी और खुद मेरी तरफ आने की बजाए द्वारका निकल गए। अब मेरे रथ का सारथी नही मिल रहा है। हमारे पक्ष में जिस एकमात्र योद्धा को रथयात्रा का अनुभव था हमने बब्रुवाहन की तरह उनका सिर युद्ध की शुरुआत में  उनके ही हाथों कटवा दिया था कुल की रक्षा के लिए। अब उनका कटा हुआ सिर भी अंट शंट बोलता रहता है। हमारे मराठा नरेश शल्य की भूमिका में आ गए हैं। लड़ भी हमारी तरफ से रहे हैं और गालियां भी हमे ही दे रहे हैं। अभिमन्यु अब दूध पिता बच्चा नही रहा। वो अब मगध नरेश है। हमने जिस चक्रव्यूह का निर्माण उसको  मारने  के लिए किया था उसमे वो भीम को साथ में लेकर घुस गए हैं। हमने दुशासन और जयद्रथ को भेजा तो है परन्तु वहां से खबर आ रही है की वो आपस में लड़ रहे हैं। इसलिए बहुत मुश्किल समय है प्रभु, अगर इस समय में उचित मार्गदर्शन नही मिला तो आपका ये मित्र और भक्त युद्ध हार सकता है। ऊपर  से आप अपने विराट रूप में जब राजीव शुक्ला का चेहरा दिखाते हैं तो साथ में अरुण जेटली का भी दिखा देतें हैं। अब हमारे पास कोई शकुनि भी नही है और हम केवल सुब्रमणियम स्वामी के भरोसे हैं। इसलिए हे माधव हमारी गलतियों को क्षमा करके इस मुसीबत से निकालिये।

           लड़ाई जारी है। भगवान के विराट रूप में और किस किस के सिर लगे हैं ये धीरे धीरे साफ हो रहे हैं। ये युद्ध कौरवों और पांडवों के बीच नही है। लोगों को लग रहा है की दोनों तरफ कौरव हैं। दोनों खेमे केवल एक दूसरे पर ही हमला नही कर रहे हैं बल्कि अपने पक्ष के योद्धाओं पर भी हमले हो रहे हैं। एक ही चीज एक जैसी है की प्रभु तब भी बिना हथियार उठाये सबको मार रहे थे और अब भी बिना हथियार उठाये संहार कर रहे हैं। हे प्रभु तेरी लीला अनन्त है। 

खबरी -- ये युद्ध भी अट्ठारह दिन में खत्म हो जायेगा क्या ?

Tuesday, June 16, 2015

बिहार चुनाव और चेहरे की जरूरत

खबरी -- अभी-अभी खबर आई है की बिहार में बीजेपी मोदीजी के चेहरे पर चुनाव लड़ेगी। 


गप्पी -- खबर तो सही है। अभी-अभी कोई मुझसे पूछ रहा था की कोनसे मोदी के चेहरे पर , ललित मोदी या नरेंद्र मोदी। मैंने उसे समझाया की बेवकूफ आदमी नरेंद्र मोदी के चेहरे पर ही लड़ेगी न। क्योंकि बिहार में उसके पास दूसरा कोई चेहरा नही है। 

                  उसने मुझसे पूछा की पूरे बिहार में एक भी आदमी बीजेपी के पास ऐसा नही है जिसे लोग एक ठीक- ठाक मुख्यमंत्री मान लें। और जिस तरह मोदी जी चेहरे की लाली उत्तर रही है उससे तो ये भी हो सकता है की बिहार चुनाव तक ये चेहरा रंगहीन हो जाए। और फिर ललित मोदी को जनता मानवीय आधार पर जीता भी सकती है। कम से कम बीजेपी ने ये तो कह ही दिया है की ललित मोदी पर कोई ऐसे गंभीर आरोप नही हैं। दूसरा ललित मोदी चुनाव में पैसा भी खूब खर्च कर सकते हैं। पहले पीछे से करते रहे होंगे अब सामने से करेंगे। और इसका सबसे बड़ा फायदा तो ये होगा की फिर बिहार में बीजेपी के पास तीन मोदी हो जाएंगे। नरेंद्र मोदी, सुशील मोदी और ललित मोदी। तीन मोदी तो मिलकर चुनाव जीत ही सकते हैं। 

                   मैंने उसे समझाया की मोदीजी का चेहरा आगे रखने के कई फायदे हैं। आरएसएस की यह पुरानी नीति रही है की वो हजार मुँह से बोलती है और अलग अलग बोलती है। लोग मजाक में ये भी कहते हैं की आरएसएस हजार मुंह वाला साँप है। खैर मैं ये तो नही कहता परन्तु अलग अलग मुँह से बोलने के फायदे तुम्हे बता देता हूँ। 

                     आरएसएस का एक नेता मुसलमानो के खिलाफ जहर उगलता है तो दूसरा उसका खंडन कर देता है। इससे ये फायदा होता है की मंदिर आंदोलन के कार्यकर्ताओं की मीटिंग होती है तो संघ पहले बयान को अपनी आधिकारिक लाइन बता देता है और जब बाकि देश को या कानून को जवाब देना होता है तो दूसरे बयान को आगे कर देता है पहले बयान को निजी राय बता देता है। 

                       उसी तरह बीजेपी बिहार में जब ठाकुरों के बीच में जाएगी तो किसी ठाकुरों के नेता के कंधे पर हाथ रखकर जाएगी। उसे मंच पर प्रधानमंत्री के बगल वाली सीट पर बिठाया जायेगा। ठकुरों को लगेगा की ही मुख्यमंत्री बनने वाला है। इसी तरह यादवों के बीच में यादव नेता को लेकर, पिछड़ों के बीच में पिछड़े नेता को लेकर, दलितों के बीच में दलित नेता को लेकर, इस तरह हर जाती और वर्ग को विश्वास दिल दिया जायेगा की मुख्यमंत्री तो उनमे से ही बनने वाला है। अगर चुनाव से पहले नेता घोषित कर दिया जायेगा तो ये सुविधा खत्म हो जाएगी। और अगर जनता का ज्यादा ही दबाव पड़ा तो तब तक किरण बेदी की तरह कोई चेहरा ढूंढ लिया जायेगा। 

                      
                     

Friday, June 5, 2015

सत्ता के " आम " और जीतनराम मांझी

खबरी -- खबर है की अब बिहार में आमों के लिए झगड़ा शुरू हो गया है। 


गप्पी -- "आम" के लिए झगड़ा कोई केवल बिहार में ही थोड़ा न हो रहा है, पूरी दुनिया में हो रहा है। बिहार में नितीश कुमार ने आम के बगीचे की जिम्मेदारी जीतनराम मांझी को दे दी थी। कुछ दिन ठीक चला। मांझी कुछ आम खुद खाते और बाकी टोकरे भर-भर कर नितीश कुमार को भेज देते। नितीश भी खुश थे की बिना रखवाली किए आम तो खाने को मिल ही रहे हैं। कोई पत्रकार जब मांझी से पूछता की बगीचे का मालिक कौन है तो मांझी विनम्रता से कह देते की बगीचे का मालिक तो नितीश जी हैं और वो तो केवल रखवाले हैं। खबर अख़बार में छपती और नितीश जी सन्तोष की साँस लेते की अभी प्रॉपर्टी पर कब्जा नही हुआ है। एक दिन  पत्रकार ने मांझी से पूछा की आम  का मालिक कौन है तो मांझी ने कह दिया की जब आम मेरे बंगले में लगे हैं तो मालिक भी तो मैं ही हूँगा। खबर अख़बार में छप गयी। नितीश कुमार भौचंके रह गए, किरायेदार ने मकान पर कब्जा कर लिया। छानबीन करवाई गयी तो मालूम पड़ा की आमों के टोकरे भर-भर कर गाड़ियां बीजेपी के दफ्तर जा रही हैं। लालू प्रशाद यादव ने कहा की तुम भी एकदम बौड़म हो, अरे कुछ दिन बाहर जा ही रहे थे तो बंगले में किसी घर के आदमी को छोड़ कर जाना चाहिए न मेरी तरह।  इस बार तो खाली  करवा देता हूँ बाद में ध्यान रखना। समझाने  बुझाने का सिलसिला चला। काम नही बना तो नितीश कुमार ने गांव इक्क्ठा करके किरायेदार को निकाल  बाहर किया। जब लोग मांझी का सामान उठा-उठा कर बाहर फेंक रहे थे तब मांझी बीजेपी का इंतजार कर रहे थे की अभी आए और बचा लेंगे। 

                   बीजेपी ने उनको इलाके के थानेदार की तरह आश्वासन दे रखा था की तुम्हे चिन्ता करने की जरूरत नही है। इलाके में हमारा हुक्म चलता है। अगर फिर भी कोई ऐसी-वैसी बात हुई तो ऊपर कमिशनर से बात करेंगे, वो भी हमारा है। तसल्ली करवाने के लिए दिल्ली ले जाकर कमिशनर से मीटिंग भी करवा दी। कमिशनर ने भी कह दिया की थानेदार के कहे अनुसार काम करो बाकी मैं बैठा हूँ। जब मौका आया तो थानेदार और कमिशनर दोनों ने देखा की सामान फेकने वाले ज्यादा हैं और उनकी पेश नही पड़ेगी तो उन्होंने कहना शुरू कर दिया की हो तो गलत रहा है की एक गरीब किरायेदार को घर से बाहर निकाला जा रहा है लेकिन हम कानून को अपने हाथ में नही लेंगे। मांझी बेचारे देखते-देखते सड़क पर आ गए। लोग कहते हैं की भाजपाई थानेदार  ने मांझी को कहीं का नही छोड़ा। वरना मजे से आम खा रहे थे। 

                  अब मांझी को आम खाने को नही मिल रहे हैं और वो इसकी शिकायत बीजेपी से कर रहे हैं। उनका कहना है की आम के इस मौसम में उनके लिए भी आम का प्रबंध करे। मांझी का इशारा दिल्ली से आने वाले आम के ट्रक की तरफ है जो सारे आम गिरिराज सिंह और राधामोहन सिंह जैसे ठाकुरों के घर उतार जाता है। एकाध टोकरी दलित मुहल्ले में पहुचती भी है तो रामबिलास पासवान के घर उत्तर जाती है। अब बेचारे मांझी का घर एकदम पिछली गली में है। 

                     अब रोज इस बात का शोर होता है की नितीश कुमार आम खा रहे हैं जिन पर असली हक मांझी का था। दूसरा पक्ष भी याद दिला देता है की मांझी केवल किरायदार थे और असली मालिक नितीश कुमार हैं। लेकिन बहुत दिनों से आम खाने के कारण ये सब भूल गए है की असली मालिक वो लोग है जो बंगले से बाहर खड़े हैं।

Tuesday, June 2, 2015

लोकतंत्र की अगली मंडी बिहार में

खबरी -- चुनाव आयोग ने सितम्बर -अक्टूबर में बिहार चुनाव की सम्भावना जाहिर की। 


गप्पी -- हाँ , और ऐसा सुनते ही लोकतंत्र की मण्डी के लिए तैयारियां शुरू हो गयी हैं। राजनीति के बड़े-बड़े दुकानदार पटना के गांधी मैदान में स्टाल बुक करवा रहे हैं। सजावट के लिए झंडे-बैनर बनवाने शुरू हो गए हैं। खरीददारों के लिए डिस्काउंट की घोषणाएं की जा रही हैं। नारे खोजे जा रहे हैं , गठबंधन तलाशे जा रहे है। जातियों के सम्मेलन हो रहे हैं। महापुरुषों की जातियां पता लगाने का काम इतिहासकारों को सौपां जा रहा है। इलेक्शन में अपने आप को बिकने योग्य समझने वाले उम्मीदवार मोल-भाव के लिए अलग-अलग दुकानो के चककर लगा रहे हैं। कुल मिलाकर मेले का माहौल बन रहा है। इस मौके पर बिहार की दो बड़ी पार्टियों के अघोषित प्रवक्ता मेरे साथ हैं। इनमे एक बीजेपी के है जो जरूरत पड़ने पर संघ के प्रवक्ता का रोल भी निभा लेते हैं , और दूसरे राजद के प्रवक्ता हैं जो गली के नुक्क्ड़ पर रहने वाले पानवाले से लेकर सयुंक्त राष्ट्र संघ के महासचिव तक, सबके कामो पर आधिकारिक राय रखते हैं। 

          मैंने पहले बीजेपी के प्रवक्ता से बात शुरू की ( प्रधानमंत्री उनका है तो पहला हक भी उनका ही बनता है ) सुना है बीजेपी इस बार जीतनराम मांझी के सवाल पर महादलित को लुभाने की कोशिश में है ?

         कोशिश का क्या सवाल है , जिस तरह नितीश कुमार ने एक महादलित को मुख्यमंत्री नही रहने दिया वो हम बिहार की जनता को बता रहे हैं।  प्रवक्ता ने जवाब दिया। 

          लेकिन जीतनराम मांझी ने कहा है ही बीजेपी चुनाव के बाद मुझे मुख्यमंत्री बनाएगी इसकी घोषणा करे। क्या बीजेपी मांझी को मुख्यमंत्री बनाएगी ? मैंने पूछा। 

            क्या बात करते हो ! आपने देखा नही जब मांझी मुख्यमंत्री थे तब उनके काम और बयान कितने मजाक का कारण बनते थे।  प्रवक्ता ने हैरानी जताई। 

              फिर आप नितीश को मांझी को हटाने पर दोष क्यों देते हो ?

              क्योंकि वो हमारी विरोधी पार्टी के नेता हैं। जब वो हमारे साथ थे हम उन्हें विकास का अवतार बताते थे , जब वो हमसे अलग हुए हमने अगले ही दिन उन्हें बिहार को पाताल में पहुंचाने का जिम्मेदार ठहरा दिया। भला दो दिन में कोई प्रदेश आकाश से पाताल में कैसे पहुंच सकता है ? लेकिन हम पहुंचा सकते हैं। जैसे हमने कह दिया की अच्छे दिन आ गए हैं तो आ गए हैं। 

               पप्पू यादव के बारे में आपकी क्या योजना है ? मैंने पूछा। 

              अगर पप्पू यादव  हमारे साथ नही आये तो हम बिहार की जनता को बताएंगे की राजद ने कैसे-कैसे लोगों को सांसद बना दिया है। 

                 और अगर वो आपके साथ आ गए तो ? मैंने जानना चाहा। 

तो बिहार की जनता जानती है की पप्पू यादव यादवों के कितने बड़े नेता हैं। वैसे हमने पप्पू यादव को कह दिया है की वो अलग मोर्चा बनाएं। अगर राजद और जदयू का गठबंधन होता है तो दोनों पार्टियों के आधे लोगों को टिकट नही मिलेगा। और उसी दिन उनका पार्टी से मोहभंग हो जायेगा। उनमे राजद वालों को लालू का परिवारवाद नजर आना शुरू हो जायेगा और जदयू के लोगों को नितीश तानाशाह लगने शुरू हो जायेंगे।  और इन सब मोहभंग लोगों को साथ लेकर पप्पू यादव चुनाव में उतरें। उनकी गठबंधन में जगह उनके वोट काटने की हैसियत से हम चुनाव के बाद तय कर देंगे उद्धव ठाकरे की तरह। 

                  वैसे जातियों के आधार पर आप कोनसा गठबंधन बनाने की सोच रहे है? मैंने बात आगे बढ़ाई। 

                   इस बार हम स्वर्ण दलित मोर्चा बनाने की सोच रहे हैं। 

                 ये कोनसा मोर्चा है और इसमें कौन-कौन शामिल होंगे ? मैंने आश्चर्यवश पूछा!

                 देखिये इसमें वो स्वर्ण शामिल होंगे जिनके पास जाति  के अहंकार के सिवाय कुछ बचा नही है। न काम है, न नौकरी है और न जमीन है। दूसरे इसमें वो दलित शामिल होंगे जो जाति  के नाम पर ली गयी सुविधाओं और लाभों को अकेले हजम करके स्वर्ण की तरह चमक रहे हैं। और हम दलितों और पिछड़ों को मुद्दा बनायेगे। 

                   लेकिन लोग आपसे ये नही पूछेंगे की आप ने केंद्र में बिहार से जो मंत्री अपनी पार्टी से बनाये हैं उनमे एक भी दलित या पिछड़ा नही है सब ऊंची जाती के क्षत्रिय हैं ? मैंने शक जाहिर किया। 

                    नही पूछेंगे। प्रवक्ता ने आत्मविश्वास से कहा। 

                    क्यों नही पूछेंगे ? मैंने हैरानी जताई। 

                 हमने सभी इवेंट मैनजमेंट कम्पनियों को साफ तौर पर कह  दिया है की टीवी शो और सवाल जवाब के किसी भी कार्यक्रम में उनका कोई भी आदमी ये सवाल नही पूछेगा।  प्रवक्ता ने बात साफ की। 

                   मेरे पास और कुछ पूछने को नही था सो मैंने राजद के प्रवक्ता की तरफ रुख किया। 

                  इस चुनाव में आप लोगों का क्या रुख होगा ? मैंने शुरुआत की। 

                  हमारे नेता लालू जी ने तो पहले ही कह दिया है की इस बार बड़े त्याग के लिए तैयार रहना चाहिए . उसने इत्मीनान से जवाब दिया। 

                    तो इस बार सीट बटवारे पर या पदों पर लालूजी कोई मांग नही रखेंगे ? मुझे आश्चर्य हुआ। 

                   आप गलत समझ रहे हैं। बड़ा त्याग बड़े पद के लिए होता है। और बड़ा पद किसके पास है ? हमने नितीश जी को साफ इशारा कर दिया है की उन्हें इस त्याग के लिए तैयार रहना चाहिए।  उसने बात साफ की। 

                 लेकिन अगर नितीश जी मुख्यमंत्री नही होंगे तो आपके गठबंधन का मुख्यमंत्री कौन होगा ? मैंने असमंजस में पूछा। 

                 आप लोगों ने बिहार को समझ क्या रक्खा है ? क्या बिहार में योग्य लोग नही हैं ? बिहार में महात्मा बुद्ध से लेकर सम्राट अशोक तक और राजेन्द्र प्रशाद से लेकर राहुल सांकृत्यायन तक एक से एक महापुरुष हुए हैं। जब दुनिया को लोकतंत्र की परिभाषा भी मालूम नही थी तब वैशाली और मगध जैसे जनपदों में लोकतंत्र लागु था। प्रवक्ता तमतमा गया। 

                      देखिये मुझे बिहार के इतिहास और बिहार के लोगों की योग्यता पर कोई शक नही है। मैं तो केवल जानकारी के लिए पूछ रहा था।  मैंने अपनी सफाई दी। 

                      पहले हमारी सरकार बनने दो। मुख्यमंत्री कोई भी हो सकता है , राबड़ी देवी हो सकती हैं , तेजस्वी हो सकता है, और मीसा भी हो सकती हैं। प्रवक्ता ने सभी महापुरुषों के नाम उदघाटित कर दिए। 

                    मुझे लगा जैसे कोसी का पानी धीरे-धीरे बढ़ रहा है और पूरा बिहार उसकी चपेट में आ रहा है। मैं जान बचाने के लिए सुरक्षित जगह की तरफ दौड़ा।