Tuesday, December 5, 2017

क्या कांग्रेस के फार्मूले से मिल सकता है पाटीदारों को आरक्षण ?


गुजरात चुनाव में सबसे अहम मुद्दा पाटीदार आरक्षण और हार्दिक पटेल बन गए हैं। कांग्रेस और बीजेपी, दोनों का प्रचार इस मुद्दे पर लगभग केंद्रित है। गुजरात में पिछले लगभग तीन साल से पाटीदार समुदाय आरक्षण के लिए आंदोलन कर रहा है। इस आंदोलन में वैसे तो कई संगठन शामिल रहे हैं, लेकिन हार्दिक पटेल के नेतृत्व वाला PAAS इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण संगठन है। आरक्षण आंदोलन के दौरान पाटीदारों पर हुए अत्याचार और उस दौरान बने सैंकड़ो केस इसमें आरक्षण के अतिरिक्त मांगों में जुड़ते रहे हैं।
               चुनाव की घोषणा होने के बाद PAAS और हार्दिक पटेल के भजपा विरोधी रुख के कारण गुजरात की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने उनके साथ आरक्षण सहित उनकी मांगो पर बातचीत शुरू की। गुजरात में राजनैतिक रूप से बहुत प्रभावशाली माना जाने वाला और अब तक बीजेपी के साथ रहा पाटीदार समुदाय बीजेपी को छोड़कर कांग्रेस के साथ चले जाने की संभावनाओं को देखते हुए बीजेपी ने भी अपनी सियासी चालें चलनी शुरू की। इस क्रम में उसने हार्दिक पटेल पर कांग्रेस का एजेंट होने और आंदोलन को राजनितिक मोहरा बनाने का आरोप लगाया। उसने हार्दिक के साथ रहे कुछ लोगों को हार्दिक से अलग होकर बीजेपी के समर्थन में लाने में सफलता भी प्राप्त की। साथ ही उसने पटेल समुदाय के धार्मिक और सामाजिक संगठनों के कुछ लोगों से हार्दिक के खिलाफ बयान भी दिलवाये। हालाँकि खोडलधाम और उमिया माता ट्रस्ट जैसे बड़े और पाटीदार समुदाय पर भारी प्रभाव रखने वाले संगठनों ने सीधे राजनैतिक बयानबाजी नहीं की।
                   इसी बीच कांग्रेस और हार्दिक पटेल के बीच आरक्षण को लेकर एक फार्मूले को लेकर सहमति बन गयी। इस फार्मूले को बनाने में वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और उच्चतम न्यायालय के वकील कपिल सिब्बल ने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। उसके साथ ही बीजेपी और हार्दिक विरोधियों ने इसे आँखों में धूल झोंकने का प्रयास बताया। इस पर बहस तेज हो गयी। बीजेपी ने दावा किया की 50 % से ज्यादा आरक्षण किसी भी हालत में सम्भव नहीं है। और इस तरह कोई भी आश्वासन धोखाधड़ी है। हालाँकि बीजेपी की राज्य सरकारें अब तक हरियाणा और राजस्थान में इसके नोटिफिकेशन जारी कर चुकी हैं। खुद गुजरात सरकार भी 50 % से ऊपर EBC कोटे में 10 % आरक्षण का नोटिफिकेशन जारी कर चुकी है। हालाँकि ये सभी नोटिफिकेशन विभिन्न न्यायालयों द्वारा रद्द किये जा चुके हैं। लेकिन बीजेपी ने ये स्वीकार किया है की उसके द्वारा जारी किये गए ये तमाम नोटिफिकेशन वहां की जनता के साथ की गयी धोखाधड़ी थे। उसके बाद कांग्रेस और हार्दिक पटेल ने लगातार ये दावा जारी रखा है की 50 % से ज्यादा आरक्षण सम्भव है और वो इसे लागु करके दिखाएंगे।
                      इस मुद्दे के संवैधानिक प्रावधानों और क़ानूनी पहलुओं की जाँच की जाये तो वो इस प्रकार है। -
संविधान में सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े समुदायों को आरक्षण दिए जाने की इजाजत दी गयी है। लेकिन उसमे किसी भी तरह की संख्या का जिक्र नहीं है। सरकारों द्वारा आरक्षण दिए जाने और मण्डल कमीशन के बाद OBC को 27 % आरक्षण दिए जाने के बाद हमारे देश में आरक्षण की सीमा 50 % तक पहुंच गयी। उसके बाद अलग अलग राज्यों में विभिन्न समुदाय आरक्षण की मांग करते हुए आंदोलन करने लगे। जिसमे कई बार राजनैतिक फायदा हासिल करने के लिए विभिन्न राजनैतिक पार्टियों ने भी उसमे योगदान दिया। लेकिन उनके द्वारा जारी किये गए वो सभी नोटिफिकेशन, जिसके कारण आरक्षण की सीमा 50 % से ऊपर हो जाती है, न्यायालयों में टिक नहीं पाए। असल में 2007 में इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 % निर्धारित कर दी। इसी फैसले का हवाला देकर बार बार 50 % की सीमा का जिक्र किया जाता है।
                   सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को ध्यान से देखा जाये और इंदिरा साहनी केस में भी सुप्रीम कोर्ट ने विशेष परिस्थितियों में इस सीमा से ज्यादा आरक्षण दिए जाने की बात कही है लेकिन उसके लिए कई तरह की प्रक्रियाओं के पालन और संसद से प्रस्ताव पास करके उसे संविधान की नौवीं अनुसूची में डाले जाने जैसी बातें शामिल हैं। सवाल ये है की पुरे देश में आरक्षण के विरोधी और इन नोटिफिकेशनो को चुनौती देने वाले लोगों का क्या कहना है। इनमे एक तरफ सामान्य श्रेणी में आने वाले लोग शामिल हैं जो 50 % से ऊपर आरक्षण को अपने मौलिक अधिकारों का उलंघन मानता है और शिक्षा और रोजगार के समान अवसरों के खिलाफ मानता है। न्यायालय भी 50 % से ऊपर आरक्षण को सामान्य और अनारक्षित श्रेणी से आने वाले लोगों के मौलिक अधिकारों के खिलाफ मानता है। दूसरी तरफ वो लोग हैं जो किसी न किसी आरक्षित श्रेणी में शामिल हैं और उन श्रेणिओं में नई जातियों को शामिल किये जाने को अपने अधिकारों के खिलाफ मानते हैं। इसके लिए उच्चतम न्यायालय ने एक प्रक्रिया निर्धारित कर दी है। इस प्रक्रिया में अगर कोई जाती OBC इत्यादि किसी श्रेणी में शामिल किये जाने की मांग करती है तो उसे संबंधित आयोग में आवेदन करना होगा, जिसके बाद आयोग सर्वे करके निश्चित मानदंडों के आधार पर ये तय करेगा की क्या उस जाती का सामाजिक और आर्थिक स्तर उस कटैगरी में शामिल किये जाने के योग्य है या नहीं। पाटीदार समुदाय इस आधार पर OBC में शामिल किये जाने वाले मापदण्डों पर खरा नहीं उतरता है। इसलिए उसके सामने केवल एक ही रास्ता है की किसी तरह आरक्षण की सीमा को 50 % से बढ़ाकर उसे आरक्षण दे दिया जाये।
               कांग्रेस का फार्मूला ----
                                                 कांग्रेस और हार्दिक पटेल के बीच जिस फार्मूले पर सहमति हुई है वो इस प्रकार है। कांग्रेस का कहना है की एक सर्वे करके सामान्य वर्ग के अनारक्षित वर्ग के गरीब लोगों की संख्या का पता लगाया जाये। फिर उनके लिए 20 % या (सर्वे के नतीजों के अनुसार थोड़ा कम ज्यादा ) आरक्षण का प्रावधान किया जाये। इसमें सभी अनारक्षित जातियों को शामिल किया जाये और OBC की तरह एक क्रीमी लेयर तय कर दी जाये। जब ये प्रक्रिया पूर्ण हो जाये तो संसद में प्रस्ताव पास करके इसे संविधान की नौवीं अनुसूची में डाल दिया जाये। कांग्रेस का तर्क ये है की इस फार्मूले के अनुसार चूँकि आरक्षित जातियों के आरक्षण की संख्या में कोई परिवर्तन नहीं हो रहा है तो उनकी तरफ से इसे चुनौती नहीं दी जा सकती। दूसरी तरफ सामान्य और अनारक्षित श्रेणी के लोगों के अधिकारों पर भी इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि इस फार्मूले द्वारा आरक्षण पाने वाले लोग भी उसी श्रेणी से आते हैं। साथ ही जो लोग आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग करते रहे हैं, उन्हें भी इस पर कोई एतराज नहीं होगा। साथ ही चूँकि ये सारा काम सर्वे इत्यादि की एक पारदर्शक प्रक्रिया के द्वारा पूरा किया जायेगा और इससे किसी भी दूसरे वर्ग के अधिकारों में छेड़खानी नहीं की जा रही है, सो इसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी सहमति दिलवाई जा सकती है। इस फार्मूले से न केवल पाटीदार आंदोलन, बल्कि अलग अलग राज्यों में चल रहे जाट आरक्षण, मराठा आरक्षण या फिर गुर्जर आरक्षण आंदोलनों का भी समाधान हो सकता है।
   हार्दिक विरोधियों का रुख ---
                                             चुनाव के दौरान जो लोग हार्दिक पटेल पर पर समाज के साथ गद्दारी करने का आरोप लगाने वाले लोगों का एक तरफ तो ये कहना है की हार्दिक को पुराने फार्मूले का अनुसार आरक्षण की मांग पर कायम रहना चाहिए, वरना इसे समाज से गद्दारी माना जायेगा, दूसरी तरफ उनका खुद ही ये भी कहना है की पुराने फार्मूले के अनुसार आरक्षण सम्भव ही नहीं है। इसका मतलब ये हुआ की उनकी माने तो या तो हार्दिक पटेल को आरक्षण का आंदोलन खत्म करके घर बैठ जाना चाहिए, या फिर एक ऐसी मांग के लिए लड़ते रहना चाहिए जो खुद उनके अनुसार ही सम्भव नहीं है।
हार्दिक पटेल का रुख ----
                                      इस मामले में हार्दिक ने कांग्रेस के साथ जिस फार्मूले पर सहमति जताई है उसके हिसाब से पाटीदार समुदाय के गरीब लोगों को आरक्षण मिल सकता है। और इसे लागु करने की प्रक्रिया में संसद इत्यादि में पास करवाए जाते समय किसी भी राजनैतिक पार्टी के लिए इसका विरोध आसान नहीं होगा। 

Sunday, November 19, 2017

गुजरात चुनाव का हिसाब किताब केवल 5 % स्विंग से बदल सकता है

              जितनी निगाहें इस बार के गुजरात चुनाव के ऊपर लगी हुई हैं उतनी शायद ही किसी राज्य के विधानसभा चुनाव पर लगी हों। इसका एक कारण गुजरात में पाटीदार आंदोलन के चुनाव पर असर को जानने की उत्सुकता भी है और GST के बाद गुजरात के व्यापारियों के मूड को देखने की उत्सुकता भी है।
                  इस बात में कोई दो राय नहीं हैं की GST के कारण व्यापारियों का एक बड़ा तबका सरकार से नाराज है। सूरत में खासकर टेक्सटाइल से जुड़े व्यापारी खासे नाराज हैं। इसका एक कारण तो GST नेटवर्क की मुश्किलियाँ भी हैं और दूसरी तरफ टेक्सटाइल पर GST का मौजूदा स्वरूप उसके आधारभूत तर्क के ही खिलाफ है। अबाधित इनपुट क्रेडिट को टेक्सटाइल के मामले में लागु नहीं किया गया है। इसलिए लोगों को इस बात की उत्सुकता है की व्यापारी अपनी नाराजगी वोट के वक्त जाहिर करते हैं या नहीं।
                पिछले एक महीने में बहुत से लोगों से इस बारे में बातचीत हुई। इसमें दो विरोधी चीजें निकल कर सामने आयी। पहली ये की हर आदमी ये मानता है की लोग सरकार से नाराज हैं। दूसरी बात ये की लोगों को इस बात का अंदेशा है की जीत तो बीजेपी की ही होगी। इसके बारे में लोगों का कहना है की प्रधानमंत्री मोदी चुनाव के आखरी दौर में कुछ न कुछ ऐसा मुद्दा निकाल कर ले आएंगे की लोग बीजेपी को वोट कर देंगे। दूसरी बात जो लोग कहते हैं वो ये है की पूरे मीडिया में केवल बीजेपी ही दिखाई देती है बाकी कुछ दिखाई ही नहीं देता। एक और बात लोग कहते हैं की बीजेपी इस चुनाव को मोदी और राहुल के बीच भाषण प्रतियोगिता में बदल देगी और लोग मोदीजी के भाषण पर तालियां बजाते हुए बीजेपी को वोट कर देंगे। लेकिन इसमें एक विरोधी बात भी निकल कर आयी।
                   जब मैंने लोगों से ये पूछा की पिछले तीन चुनावों के दौरान बीजेपी और कांग्रेस के बीच वोटों का अंतर् लगभग 9 % का रहा है। और ये तीनो चुनाव एकतरफा माने जाते थे। अगर केवल 5 % वोट की स्विंग बीजेपी से कांग्रेस के पक्ष में हो जाती है तो बाजी पलट सकती है और बीजेपी हार सकती है। इस पर लोगों की प्रतिक्रिया आश्चर्यजनक थी। लोगों का कहना था की क्या वाकई में पांच प्रतिशत से बाजी पलट सकती है ? फिर वो कहते की इस बार स्विंग तो पांच प्रतिशत से ज्यादा होगी। अगर इतनी ही स्विंग से बीजेपी हार सकती है तो इस बार उसके हारने के चान्स ज्यादा हैं।
                   असल में मीडिया की एकतरफा कवरेज ने लोगों की सोचने समझने की शक्ति और सही जानकारी होने की क्षमता को भारी नुकशान पहुंचाया है। इसका असर बीजेपी के विरोधियों पर ही नहीं बल्कि उसके समर्थकों पर भी पड़ता है और उन्हें चारों तरफ हरा हरा ही नजर आने लगता है और नतीजे इण्डिया शाइनिंग जैसे आ सकते हैं। गुजरात चुनाव में मुकाबला केवल ये है की क्या कांग्रेस अपने पक्ष में केवल पांच प्रतिशत की स्विंग करवा सकती है नहीं। और इस बार के हालात  देखकर ये बहुत सम्भव लगता है और इसे हर आदमी स्वीकार करता है।