Tuesday, December 5, 2017

क्या कांग्रेस के फार्मूले से मिल सकता है पाटीदारों को आरक्षण ?


गुजरात चुनाव में सबसे अहम मुद्दा पाटीदार आरक्षण और हार्दिक पटेल बन गए हैं। कांग्रेस और बीजेपी, दोनों का प्रचार इस मुद्दे पर लगभग केंद्रित है। गुजरात में पिछले लगभग तीन साल से पाटीदार समुदाय आरक्षण के लिए आंदोलन कर रहा है। इस आंदोलन में वैसे तो कई संगठन शामिल रहे हैं, लेकिन हार्दिक पटेल के नेतृत्व वाला PAAS इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण संगठन है। आरक्षण आंदोलन के दौरान पाटीदारों पर हुए अत्याचार और उस दौरान बने सैंकड़ो केस इसमें आरक्षण के अतिरिक्त मांगों में जुड़ते रहे हैं।
               चुनाव की घोषणा होने के बाद PAAS और हार्दिक पटेल के भजपा विरोधी रुख के कारण गुजरात की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने उनके साथ आरक्षण सहित उनकी मांगो पर बातचीत शुरू की। गुजरात में राजनैतिक रूप से बहुत प्रभावशाली माना जाने वाला और अब तक बीजेपी के साथ रहा पाटीदार समुदाय बीजेपी को छोड़कर कांग्रेस के साथ चले जाने की संभावनाओं को देखते हुए बीजेपी ने भी अपनी सियासी चालें चलनी शुरू की। इस क्रम में उसने हार्दिक पटेल पर कांग्रेस का एजेंट होने और आंदोलन को राजनितिक मोहरा बनाने का आरोप लगाया। उसने हार्दिक के साथ रहे कुछ लोगों को हार्दिक से अलग होकर बीजेपी के समर्थन में लाने में सफलता भी प्राप्त की। साथ ही उसने पटेल समुदाय के धार्मिक और सामाजिक संगठनों के कुछ लोगों से हार्दिक के खिलाफ बयान भी दिलवाये। हालाँकि खोडलधाम और उमिया माता ट्रस्ट जैसे बड़े और पाटीदार समुदाय पर भारी प्रभाव रखने वाले संगठनों ने सीधे राजनैतिक बयानबाजी नहीं की।
                   इसी बीच कांग्रेस और हार्दिक पटेल के बीच आरक्षण को लेकर एक फार्मूले को लेकर सहमति बन गयी। इस फार्मूले को बनाने में वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और उच्चतम न्यायालय के वकील कपिल सिब्बल ने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। उसके साथ ही बीजेपी और हार्दिक विरोधियों ने इसे आँखों में धूल झोंकने का प्रयास बताया। इस पर बहस तेज हो गयी। बीजेपी ने दावा किया की 50 % से ज्यादा आरक्षण किसी भी हालत में सम्भव नहीं है। और इस तरह कोई भी आश्वासन धोखाधड़ी है। हालाँकि बीजेपी की राज्य सरकारें अब तक हरियाणा और राजस्थान में इसके नोटिफिकेशन जारी कर चुकी हैं। खुद गुजरात सरकार भी 50 % से ऊपर EBC कोटे में 10 % आरक्षण का नोटिफिकेशन जारी कर चुकी है। हालाँकि ये सभी नोटिफिकेशन विभिन्न न्यायालयों द्वारा रद्द किये जा चुके हैं। लेकिन बीजेपी ने ये स्वीकार किया है की उसके द्वारा जारी किये गए ये तमाम नोटिफिकेशन वहां की जनता के साथ की गयी धोखाधड़ी थे। उसके बाद कांग्रेस और हार्दिक पटेल ने लगातार ये दावा जारी रखा है की 50 % से ज्यादा आरक्षण सम्भव है और वो इसे लागु करके दिखाएंगे।
                      इस मुद्दे के संवैधानिक प्रावधानों और क़ानूनी पहलुओं की जाँच की जाये तो वो इस प्रकार है। -
संविधान में सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े समुदायों को आरक्षण दिए जाने की इजाजत दी गयी है। लेकिन उसमे किसी भी तरह की संख्या का जिक्र नहीं है। सरकारों द्वारा आरक्षण दिए जाने और मण्डल कमीशन के बाद OBC को 27 % आरक्षण दिए जाने के बाद हमारे देश में आरक्षण की सीमा 50 % तक पहुंच गयी। उसके बाद अलग अलग राज्यों में विभिन्न समुदाय आरक्षण की मांग करते हुए आंदोलन करने लगे। जिसमे कई बार राजनैतिक फायदा हासिल करने के लिए विभिन्न राजनैतिक पार्टियों ने भी उसमे योगदान दिया। लेकिन उनके द्वारा जारी किये गए वो सभी नोटिफिकेशन, जिसके कारण आरक्षण की सीमा 50 % से ऊपर हो जाती है, न्यायालयों में टिक नहीं पाए। असल में 2007 में इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 % निर्धारित कर दी। इसी फैसले का हवाला देकर बार बार 50 % की सीमा का जिक्र किया जाता है।
                   सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को ध्यान से देखा जाये और इंदिरा साहनी केस में भी सुप्रीम कोर्ट ने विशेष परिस्थितियों में इस सीमा से ज्यादा आरक्षण दिए जाने की बात कही है लेकिन उसके लिए कई तरह की प्रक्रियाओं के पालन और संसद से प्रस्ताव पास करके उसे संविधान की नौवीं अनुसूची में डाले जाने जैसी बातें शामिल हैं। सवाल ये है की पुरे देश में आरक्षण के विरोधी और इन नोटिफिकेशनो को चुनौती देने वाले लोगों का क्या कहना है। इनमे एक तरफ सामान्य श्रेणी में आने वाले लोग शामिल हैं जो 50 % से ऊपर आरक्षण को अपने मौलिक अधिकारों का उलंघन मानता है और शिक्षा और रोजगार के समान अवसरों के खिलाफ मानता है। न्यायालय भी 50 % से ऊपर आरक्षण को सामान्य और अनारक्षित श्रेणी से आने वाले लोगों के मौलिक अधिकारों के खिलाफ मानता है। दूसरी तरफ वो लोग हैं जो किसी न किसी आरक्षित श्रेणी में शामिल हैं और उन श्रेणिओं में नई जातियों को शामिल किये जाने को अपने अधिकारों के खिलाफ मानते हैं। इसके लिए उच्चतम न्यायालय ने एक प्रक्रिया निर्धारित कर दी है। इस प्रक्रिया में अगर कोई जाती OBC इत्यादि किसी श्रेणी में शामिल किये जाने की मांग करती है तो उसे संबंधित आयोग में आवेदन करना होगा, जिसके बाद आयोग सर्वे करके निश्चित मानदंडों के आधार पर ये तय करेगा की क्या उस जाती का सामाजिक और आर्थिक स्तर उस कटैगरी में शामिल किये जाने के योग्य है या नहीं। पाटीदार समुदाय इस आधार पर OBC में शामिल किये जाने वाले मापदण्डों पर खरा नहीं उतरता है। इसलिए उसके सामने केवल एक ही रास्ता है की किसी तरह आरक्षण की सीमा को 50 % से बढ़ाकर उसे आरक्षण दे दिया जाये।
               कांग्रेस का फार्मूला ----
                                                 कांग्रेस और हार्दिक पटेल के बीच जिस फार्मूले पर सहमति हुई है वो इस प्रकार है। कांग्रेस का कहना है की एक सर्वे करके सामान्य वर्ग के अनारक्षित वर्ग के गरीब लोगों की संख्या का पता लगाया जाये। फिर उनके लिए 20 % या (सर्वे के नतीजों के अनुसार थोड़ा कम ज्यादा ) आरक्षण का प्रावधान किया जाये। इसमें सभी अनारक्षित जातियों को शामिल किया जाये और OBC की तरह एक क्रीमी लेयर तय कर दी जाये। जब ये प्रक्रिया पूर्ण हो जाये तो संसद में प्रस्ताव पास करके इसे संविधान की नौवीं अनुसूची में डाल दिया जाये। कांग्रेस का तर्क ये है की इस फार्मूले के अनुसार चूँकि आरक्षित जातियों के आरक्षण की संख्या में कोई परिवर्तन नहीं हो रहा है तो उनकी तरफ से इसे चुनौती नहीं दी जा सकती। दूसरी तरफ सामान्य और अनारक्षित श्रेणी के लोगों के अधिकारों पर भी इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि इस फार्मूले द्वारा आरक्षण पाने वाले लोग भी उसी श्रेणी से आते हैं। साथ ही जो लोग आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग करते रहे हैं, उन्हें भी इस पर कोई एतराज नहीं होगा। साथ ही चूँकि ये सारा काम सर्वे इत्यादि की एक पारदर्शक प्रक्रिया के द्वारा पूरा किया जायेगा और इससे किसी भी दूसरे वर्ग के अधिकारों में छेड़खानी नहीं की जा रही है, सो इसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी सहमति दिलवाई जा सकती है। इस फार्मूले से न केवल पाटीदार आंदोलन, बल्कि अलग अलग राज्यों में चल रहे जाट आरक्षण, मराठा आरक्षण या फिर गुर्जर आरक्षण आंदोलनों का भी समाधान हो सकता है।
   हार्दिक विरोधियों का रुख ---
                                             चुनाव के दौरान जो लोग हार्दिक पटेल पर पर समाज के साथ गद्दारी करने का आरोप लगाने वाले लोगों का एक तरफ तो ये कहना है की हार्दिक को पुराने फार्मूले का अनुसार आरक्षण की मांग पर कायम रहना चाहिए, वरना इसे समाज से गद्दारी माना जायेगा, दूसरी तरफ उनका खुद ही ये भी कहना है की पुराने फार्मूले के अनुसार आरक्षण सम्भव ही नहीं है। इसका मतलब ये हुआ की उनकी माने तो या तो हार्दिक पटेल को आरक्षण का आंदोलन खत्म करके घर बैठ जाना चाहिए, या फिर एक ऐसी मांग के लिए लड़ते रहना चाहिए जो खुद उनके अनुसार ही सम्भव नहीं है।
हार्दिक पटेल का रुख ----
                                      इस मामले में हार्दिक ने कांग्रेस के साथ जिस फार्मूले पर सहमति जताई है उसके हिसाब से पाटीदार समुदाय के गरीब लोगों को आरक्षण मिल सकता है। और इसे लागु करने की प्रक्रिया में संसद इत्यादि में पास करवाए जाते समय किसी भी राजनैतिक पार्टी के लिए इसका विरोध आसान नहीं होगा। 

Sunday, November 19, 2017

गुजरात चुनाव का हिसाब किताब केवल 5 % स्विंग से बदल सकता है

              जितनी निगाहें इस बार के गुजरात चुनाव के ऊपर लगी हुई हैं उतनी शायद ही किसी राज्य के विधानसभा चुनाव पर लगी हों। इसका एक कारण गुजरात में पाटीदार आंदोलन के चुनाव पर असर को जानने की उत्सुकता भी है और GST के बाद गुजरात के व्यापारियों के मूड को देखने की उत्सुकता भी है।
                  इस बात में कोई दो राय नहीं हैं की GST के कारण व्यापारियों का एक बड़ा तबका सरकार से नाराज है। सूरत में खासकर टेक्सटाइल से जुड़े व्यापारी खासे नाराज हैं। इसका एक कारण तो GST नेटवर्क की मुश्किलियाँ भी हैं और दूसरी तरफ टेक्सटाइल पर GST का मौजूदा स्वरूप उसके आधारभूत तर्क के ही खिलाफ है। अबाधित इनपुट क्रेडिट को टेक्सटाइल के मामले में लागु नहीं किया गया है। इसलिए लोगों को इस बात की उत्सुकता है की व्यापारी अपनी नाराजगी वोट के वक्त जाहिर करते हैं या नहीं।
                पिछले एक महीने में बहुत से लोगों से इस बारे में बातचीत हुई। इसमें दो विरोधी चीजें निकल कर सामने आयी। पहली ये की हर आदमी ये मानता है की लोग सरकार से नाराज हैं। दूसरी बात ये की लोगों को इस बात का अंदेशा है की जीत तो बीजेपी की ही होगी। इसके बारे में लोगों का कहना है की प्रधानमंत्री मोदी चुनाव के आखरी दौर में कुछ न कुछ ऐसा मुद्दा निकाल कर ले आएंगे की लोग बीजेपी को वोट कर देंगे। दूसरी बात जो लोग कहते हैं वो ये है की पूरे मीडिया में केवल बीजेपी ही दिखाई देती है बाकी कुछ दिखाई ही नहीं देता। एक और बात लोग कहते हैं की बीजेपी इस चुनाव को मोदी और राहुल के बीच भाषण प्रतियोगिता में बदल देगी और लोग मोदीजी के भाषण पर तालियां बजाते हुए बीजेपी को वोट कर देंगे। लेकिन इसमें एक विरोधी बात भी निकल कर आयी।
                   जब मैंने लोगों से ये पूछा की पिछले तीन चुनावों के दौरान बीजेपी और कांग्रेस के बीच वोटों का अंतर् लगभग 9 % का रहा है। और ये तीनो चुनाव एकतरफा माने जाते थे। अगर केवल 5 % वोट की स्विंग बीजेपी से कांग्रेस के पक्ष में हो जाती है तो बाजी पलट सकती है और बीजेपी हार सकती है। इस पर लोगों की प्रतिक्रिया आश्चर्यजनक थी। लोगों का कहना था की क्या वाकई में पांच प्रतिशत से बाजी पलट सकती है ? फिर वो कहते की इस बार स्विंग तो पांच प्रतिशत से ज्यादा होगी। अगर इतनी ही स्विंग से बीजेपी हार सकती है तो इस बार उसके हारने के चान्स ज्यादा हैं।
                   असल में मीडिया की एकतरफा कवरेज ने लोगों की सोचने समझने की शक्ति और सही जानकारी होने की क्षमता को भारी नुकशान पहुंचाया है। इसका असर बीजेपी के विरोधियों पर ही नहीं बल्कि उसके समर्थकों पर भी पड़ता है और उन्हें चारों तरफ हरा हरा ही नजर आने लगता है और नतीजे इण्डिया शाइनिंग जैसे आ सकते हैं। गुजरात चुनाव में मुकाबला केवल ये है की क्या कांग्रेस अपने पक्ष में केवल पांच प्रतिशत की स्विंग करवा सकती है नहीं। और इस बार के हालात  देखकर ये बहुत सम्भव लगता है और इसे हर आदमी स्वीकार करता है। 

Saturday, November 18, 2017

Moody.s की रेटिंग और उसके पीछे का सच।

        जबसे मूडीज ने भारत की रेटिंग बढ़ाई है, पूरी सरकार और उसके टीवी चैनल उस पर लगातार कार्यक्रम किये जा रहे हैं। मूडीज, एस&पी, और फिच जैसी संस्थाएं पूरी दुनिया में सरकारों और वित्तीय संस्थानों की रेटिंग जारी करती रहती हैं जिससे देशी विदेशी निवेशकों को वहां के माहौल की जानकारी मिल सके। लेकिन जब ये एजेंसियां किसी देश की रेटिंग कम करती हैं तो वहां की सरकार उस पर सवाल उठाती हैं, उनके रेटिंग के तरीके में दोष निकालती हैं। और जब रेटिंग बढ़ती है तो पुरे जोर शोर से उसका श्रेय लेती हैं। लेकिन क्या ये एजंसियां वाकई किसी देश की सही रेटिंग जारी करती हैं? या ये इसको manipulate भी करती हैं ?
            इसके बहुत से उदाहरण हमारे सामने हैं जिनमे इन एजेंसियों पर manipulation के आरोप लगे हैं। खुद Moody,s पर जर्मनी, UK और अमेरिका में manipulation के लिए भारी भरकम जुर्माने लगे हैं। Moody,s पर तो अमेरिका में ऐसी सिक्योरिटीज को अच्छी रेटिंग देने के आरोप लगे हैं जो असल में कोई कीमत ही नहीं रखती थी और उन्ही सिक्योर्टीज के कारण 2008 का संकट पैदा हुआ था, जिसके बाद Moody,s पर अमेरिका में केस चला और जिसे निपटाने के लिए Moody,s को लाखों डालर देकर उसे अदालत से बाहर निपटाना पड़ा।
              ये एजेंसियां रेटिंग तय करने की फ़ीस लेती हैं। इसलिए ये आरोप भी लगते रहे हैं और साबित भी होते रहे हैं की विश्व की कुछ वित्तीय संस्थाएं अपना घटिया मॉल ( बांड्स इत्यादी ) बेचने के लिए इन एजेंसियों का सहारा लेती हैं।
                लेकिन इससे अलग भी, अगर ये सही पैमानों का इस्तेमाल करके भी रेटिंग जारी करती हों तो उसका क्या मतलब होता है ये समझना बहुत जरूरी है। इनकी रेटिंग का अर्थ होता है की किसी देश के कानून और व्यवस्था वहां मुनाफाखोरी और वित्तीय संस्थाओं के प्रति कितने उदार हैं। अगर किसी देश में अन्य चीजों के साथ इन कंपनियों को मुनाफा कमाने और उसे लेजाने के अबाधित रास्ते उपलब्ध हैं तो उसकी रेटिंग ज्यादा ऊँची होगी। इसके कुछ उदाहरण निम्न प्रकार से हैं -
१.  अगर किसी देश की सरकार किसानो को न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी करती है और उसे सही तरीके से लागु करती है तो उसकी रेटिंग कम हो जाएगी क्योंकि ये एजंसियां उसे मुक्त व्यापार के रास्ते में रुकावट मानती हैं।
२.  इसी तरह अगर किसी देश में सख्त श्रम कानून हैं और सरकार सामाजिक सेवाओं पर ज्यादा पैसा खर्च करती है तो उसकी रेटिंग भी कम हो जाएगी। जैसे अगर सरकार स्कूलों और हस्पतालों पर पैसा खर्चना बंद करके उन्हें प्राइवेट कर दे तो उसकी रेटिंग बढ़ जाएगी।
३.  इसी तरह अगर सरकार कंपनियों को करों में छूट देती है और आम आदमी पर करों का बोझ बढ़ाती है तो उसकी रेटिंग ज्यादा रहेगी।
               इसलिए इन एजेंसियों की ऊँची रेटिंग किसी देश की जनता के जीवन स्तर को तय नहीं करती, अलबत्ता वहां मुनाफा कमाने की कितनी सहूलियत है इसको प्रतिबिम्बित करती है। इसलिए इन एजेंसियों की बढ़ती हुई रेटिंग पर खुश होने के लिए आम आदमी के पास कोई कारण नहीं होता है। 

Wednesday, November 15, 2017

सवाल जवाब - लघु कविता

एक समय आएगा
जब
कोई सवाल नहीं पूछा जायेगा,
क्योंकि
सारे सवाल खत्म हो चुके होंगे
तब तुम
हकलाते हुए,
थूक निगलते हुए
वो जवाब देने की कोशिश करोगे
जो
तुम्हारे पास कभी नहीं था। 

Tuesday, November 14, 2017

चाकू मारने के तर्क और भारतीय टीवी चैनलों पर बहस।

              शहर के मुख्य चौराहे पर एक आदमी ने दूसरे को चाकू घोंप दिया। लोगों ने उसे पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया। ये घटना शहर में चर्चा का विषय बन गयी। चाकू मारने वाला सत्ताधारी पार्टी से जुड़ा हुआ था और जिसे चाकू लगा वो एक आम आदमी था। लोगों को कारण समझ में नहीं आ रहा था।
                 थोड़ी देर बाद पुलिस ने प्रैस कॉन्फ्रेंस करके कहा की चाकू मारने वाले ने कहा है की उसने चाकू इसलिए मारा की सामने वाला बहुत मोटा हो गया था और मोटापे की वजह से उसको गंभीर बीमारियां होने का खतरा था। इसलिए उसने उसकी मदद करने के लिए उसे चाकू मारा ताकि उसका वजन कुछ कम हो सके। पुलिस ने ये भी कहा की पुलिस सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर अपनी जाँच करेगी। वह ये पता लगाने के लिए की इस तरह चाकू मारने से उसका कितना वजन कम हो सकता है, विशेषज्ञों की मदद भी लेगी।
                उसके बाद तीन दिन से लगातार टीवी पर इस मामले में चर्चा चल रही है की क्या वजन ज्यादा होना और मोटा होना सचमुच हानिकारक है। शहर के सभी हस्पतालों से एक एक डाक्टर सभी चैनलों पर बैठा है जो ये बताने के साथ की मोटापा कितना हानिकारक है और उसकी वजह से कितनी बीमारियां हो सकती हैं, ये भी बताता है की उसके हस्पताल में मोटापा दूर करने के लिए कौन कौन सी सुविधाएँ उपलब्ध हैं। 

Thursday, September 21, 2017

अर्थव्यवस्था को सम्भालने के बहुत कम विकल्प बचे हैं सरकार के पास।

                   पिछले क्वार्टर के जीडीपी के आंकड़े 5 . 7 % आने के बाद भले ही अमित शाह इसको टेक्निकल कारण बता रहे हों, लेकिन सरकार को मालूम है की स्थिति वाकई गंभीर है। ये लगातार छठी तिमाही है जिसमे जीडीपी की दर लगातार गिरी है। लेकिन अब तक सरकार इसके लिए अपनी नीतियों को जिम्मेदारी देने के लिए तैयार नहीं है। जबकि सारी दुनिया के अर्थशास्त्री मानते हैं की सरकार द्वारा लिए गए लगातार गलत फैसलों की वजह से ही जीडीपी गिर रही है।
                    सबसे पहले नोटबंदी ने अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ दी। नोटबंदी का सबसे ज्यादा नुकशान गांवों और दूरदराज के इलाकों पर हुआ। नगदी की कमी के कारण असंगठित क्षेत्र के रोजगार समाप्त हो गए। उसके कारण सब्जियों और दूसरे कृषि उत्पादों की कीमतें एकदम गिर गयी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार ही ये कमी 25 % से ज्यादा है। इसके कारण दो साल से लगातार सूखे की मार झेल रहे किसानो की हालत बद से बदतर हो गयी। दूसरी तरफ सरकारी और गैरसरकारी नौकरियों के अवसर लगभग समाप्त हो गए जिससे ग्रामीण क्षेत्र को जो सहारा मिलता था वो भी खत्म हो गया। उसके साथ ही खेती के बाद इस क्षेत्र में दूसरी जो चीज बड़े पैमाने पर रोजगार उपलब्ध करवाती है वो है पशुपालन। सरकार के पशुओं के खरीद बिक्री के नियमो में किये गए फेरफार ने सीमांत किसानो के लिए ये भी घाटे का सौदा बन गया। थोड़ी बहुत जो कसर बाकी बची थी वो गोरक्षकों के नाम पर जारी गुंडागर्दी ने पूरी कर दी। इसका सीधा असर चमड़े के उत्पादन और व्यापार पर पड़ा। जिससे समाज के बिलकुल निचले तबके के गरीब लोगों के रोजगार समाप्त हो गए। और आज हालत ये है की ग्रामीण क्षेत्र, जो हमारे देश की अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ी भूमिका रखता है भारी मंदी का शिकार हो गया।
                  उसके बाद जो क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है, चाहे रोजगार देने का मामला हो या उत्पादन का, वो है लघु उद्योग और रिटेल व्यापार। ये दोनों मिलकर देश में सबसे ज्यादा लोगों को रोजगार मुहैया करवाते हैं। लेकिन सरकार के GST लागु करने के फैसले और उसके बाद इसे लागु करने के तरीके ने इन दोनों क्षेत्रों की कमर तोड़ दी। इस तरह जहां जहां भी विकास की गुंजाइश थी हर तरफ हमला किया गया। लोग पहले हमले से सम्भल भी नहीं पाते की तुरंत दूसरा हमला हो जाता। और सबसे बड़ी बात ये की सरकार में कोई भी ये मानने को तैयार नहीं की कोई समस्या है। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने तो अर्थव्यवस्था के नकारात्मक आंकड़ों को टेक्निकल कारणों की वजह से आया बता दिया।
                    लेकिन अब वित्तमंत्री अरुण जेटली के बयान के बाद लगता है की सरकार को कम से कम इतना तो पता है अर्थव्यवस्था में सचमुच कोई गिरावट है। लेकिन सवाल यह है की सरकार के पास इस स्थिति में हस्तक्षेप करने की कितनी गुंजाइश और दिशा मौजूद है।
                    साल की तीसरी तिमाही के एडवांस टैक्स के आंकड़े उम्मीद से कम हैं। GST के बाद टैक्स क्लैक्शन के जो आंकड़े पहले बताये जा रहे थे अब उन पर सवाल उठ रहे हैं। कुल 95000 करोड़ की क्लैक्शन के सामने 65000 करोड़ इनपुट टैक्स क्रेडिट का क्लेम है और बड़ी कंपनियों ने अब तक क्लेम का दावा भी पेश नहीं किया है। इसके बाद सरकार की नींद उड़ी हुई है। सरकार के बड़े अधिकारीयों के ऑफ़ दा रिकार्ड बयान आ चुके हैं की कम कलेक्सन के कारण खर्च में कटौती करनी पड़ सकती है। CAD एक झटके में बढ़कर २. ६ % हो गया है और साल के अंत तक इसके 3. 6 %  पहुंचने आसार है। सरकार का बजट  में घोषित खर्च अपनी 94 % के स्तर पर पहुंच चूका है।
                     इन हालात को देखते हुए सरकार के पास बहुत सीमित विकल्प मौजूद हैं। और जो विकल्प मौजूद हैं तो क्या सरकार उन्हें अपनाने का साहस दिखाएगी। पिछले तीन साल से अर्थव्यवस्था सरकारी इन्वैस्टमैंट पर ही चल रही थी। प्राइवेट सेक्टर पहले ही अपनी क्षमता से कम पर चल रहा था सो उसमे किसी नई इन्वैस्टमैंट की उम्मीद ही नहीं थी। अब प्राइवेट सेक्टर की क्षमता और घटकर 70 % पर आ गयी है इसलिए एकमात्र सहारा सरकारी निवेश का ही बचा है। दूसरी तरफ लोगों को सहायता की तुरंत जरूरत है। लेकिन जिस तरह उच्चस्तरीय बैठक के तुरंत बाद वित्तमंत्री ने बयान दिया है की तेल की कीमतों में कोई कटौती नहीं होगी, उसे देखते हुए लगता नहीं है की सरकार लोगों को कोई राहत देगी। उल्टा कुछ लोगों को शक है की सामाजिक योजनाओं में कटौती हो सकती है। मनरेगा जैसी योजनाओं में कटौती हो सकती है, और नौकरियों पर बैन को बढ़ाया जा सकता है। अगर सचमुच में ऐसा होता है तो ये इलाज भी बीमारी से भयानक हो सकता है। अगर लोगों के पास खरीद शक्ति नहीं होगी तो मंदी के सर्कल से बाहर निकलना असम्भव हो जायेगा। 

Friday, September 15, 2017

गैंगस्टर, उनके प्रकार और उनकी सम्पत्ति

                       पिछले दिनों खबर आयी की गैंगस्टर दाऊद इब्राहिम की कई हजार करोड़ की सम्पत्ति ब्रिटेन ने जब्त कर ली है। उसके साथ साथ और भी बहुत सी खबरें आयी। सोचा ये गैंगस्टर क्या होता है ये पता लगाया जाये। कई किताबें पढ़ी, गूगल पर सर्च किया और जानकर और पढ़ेलिखे लोगों से बात की। उसके बाद जो समझ में आया वो इस प्रकार है।
                        गैंगस्टर वो होता है जो दो या उससे ज्यादा लोगों का गिरोह बनाकर, आम लोगों की सम्पत्ति  को विभिन्न तरीकों से लूटता है और विरोध करने पर उनको मार डालता है या मार डालने की धमकी देता है।
                      उसके बाद तो विभिन्न तरह के गैंगस्टरों के कई प्रकार आँखों के सामने घूम गए।
1. इसमें पहली किस्म के गैंगस्टर वो थे जो शहर में लारी गल्ले वालों को धमका कर हफ्ता वसूलते हैं, या फिर शराब इत्यादि का धंधा करते हैं और विरोध करने वालों की टांगे तोड़ देते हैं।
2. इसके बाद वो गैंगस्टर हैं जो थोड़ा आधुनिक किस्म के हथियार रखते हैं, लोगों की जमीन जायदाद पर कब्जा करते हैं, अच्छे इलाकों में सैक्स रैकेट चलाते हैं और शहर के प्रभावशाली लोगों के साथ उनका उठना बैठना होता है।
3. उसके बाद ये सब धंधा करने वाले वो लोग आते हैं जो ये काम अंतरराज्यीय या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर करते हैं और आये दिन अख़बारों में उनके नाम पढ़ने को मिलते रहते हैं।
                                                                   लेकिन
उसके बाद इन गैंगस्टरों की जो नस्ल सामने आयी वो बड़ी भयावह है। उसके बारे में पढ़ तो लिया लेकिन अब तक कँपकपी आ रही है।
                      ये गैंगस्टर किसी एक प्लाट या दुकान पर कब्जा नहीं करते। ये पुरे के पुरे जँगल, सारे के सारे गांव, खदानें, पहाड़, नदी और देश पर कब्जा करते हैं। इनका गिरोह भी बहुत बड़ा होता है। उसमे लोगों को मारने वाले सदस्य एक अलग किस्म की वर्दी पहनते हैं। इनके गिरोह के कुछ लोग एक खास जगह बैठ कर कानून बनाते हैं। इसने गिरोह के कुछ सदस्य टीवी चैनलों में बैठकर इन्हे धर्मात्मा सिद्ध करने में लगे रहते हैं। ये अपने खिलाफ बोलने वालों को जेलों में डाल देते हैं और लिखने वालों को जन्नत में पहुंचा देते हैं। एक खबर आयी हैं की पिछले केवल तीन साल में पुरे देश की कुल सम्पत्ति का 15 % हिस्सा आम लोगों के पास से इनके कब्जे में पहुंच गया है। इनकी खासियत ये है की इनको आसानी से पहचाना नहीं जा सकता। ये लोग स्कूल और हस्पताल से लेकर मंदिर और सतसंग तक चलाते हैं। ये पुरे देश और दुनिया को गर्व के साथ बताते हैं की ये जो भी कर रहे हैं उस कानून के हिसाब से कर रहे होते हैं जो इनके गिरोह के सदस्यों ने कल बनाया है। इनके गिरोह की सदस्य्ता पूरी दुनिया में फैली होती है और कोई अनुमान भी नहीं लगा सकता की कौन कौन इनका सदस्य हो सकता है।
                      ये बहुत ही शातिर होते हैं। ये कुछ नोजवानो को अपने गिरोह की खास वर्दियाँ पहना कर उनके ही हाथों, उनके किसान बाप या मजदूर भाई को गोली मरवा देते हैं और फिर गाजे बाजे के साथ उसे सम्मानित कर देते हैं। ये खुद की सेवा को देश सेवा कहकर प्रचारित करते हैं और अपने कुकर्मो को विकास कहते हैं।
                  जब से मुझे ये पता चला है तब से नींद नहीं आ रही।

Thursday, September 14, 2017

बुलेट ट्रैन -- देश को बर्बाद कर देने वाले इस महाविनाशी सपने को रोको।


         
  कल प्रधानमंत्री मोदी और जापान के प्रधानमंत्री सिंजो आबे ने अहमदाबाद में बुलेट ट्रैन का शिलान्यास कर दिया। हालाँकि इस के समर्थन और विरोध में बहुत कुछ कहा जा चुका है, लेकिन ये मामला कितना भयावह और गैरजिम्मेदार है इसका अंदाजा किसी को नहीं है। न तो विरोध करने वालों को है और न ही समर्थन करने वालों को है। इसलिए एक बार इसका हिसाब किताब लगा लिया जाये ये बहुत जरूरी है। वरना नोटबंदी की तरह पछताने के सिवा कुछ हाथ नहीं आएगा।
                  सरकार की तरफ से मीडिया में जो जानकारी दी गयी है उसके अनुसार इस पर 110000 करोड़ डॉलर का खर्च आएगा, जिसमे से 85000 करोड़ डॉलर का कर्ज जापान देगा, जिस पर  0 . 1 % का मामूली  ब्याज देना पड़ेगा। शेष 25000 करोड़ डॉलर का खर्चा भारत सरकार करेगी।
                     अब इसमें दो मुख्य बातें हैं  जिन पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। पहला ये की बुलेट ट्रैन के लिए बनाया गया पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर केवल बुलेट ट्रैन के लिए ही इस्तेमाल हो सकता है। ऐसा नहीं है की उस पर बाकी पटरियों की तरह हर तरह की गाड़ियां चल सकती हैं। दूसरा सवाल ये है की इस ट्रैन में एकबार में करीब 725 यात्री सफर कर सकेंगे। जिस पर अगर अतिउदार और अधिकतम अनुमान भी लगाया जाये तो ये ट्रैन दो राउंड ट्रिप अहमदाबाद और मुंबई के बीच लगा सकती है। अगर सभी सीटों की पूरी बुकिंग भी मान ली जाये ( जो इसके किराय को देखते हुए असम्भव है ) तो ये पूरी कवायद केवल 725 x 4 यानि केवल 2900 लोगों के लिए की जा रही है।
                    अब इस पर होने वाले खर्च में से केवल ब्याज के खर्च का हिसाब ही लगाया जाये तो वो इस तरह है।
                  जापान का कर्ज और ब्याज   85000 करोड़ x 0 . 1 %   = 85 करोड़
                  भारत सरकार का कर्ज   25000 करोड़ x 7 %   =   1750 करोड़       ( मौजूदा बांड वैल्यू के हिसाब से जिसके अनुसार सरकार घरेलू मार्किट, बैंक इत्यादि से अपनी जरूरतों के लिए कर्ज लेती है। )

                                                         कुल ब्याज = 1750 +85  = 1835 करोड़ डॉलर सालाना ,
    यानी   करीब 5 करोड़ डॉलर प्रतिदिन = 5 x 64 ( मौजूदा डॉलर रेट )  320 करोड़ रूपये प्रतिदिन
    इसका मतलब ये  हुआ की  320 करोड़ को 2900 यात्रियों से भाग दिया जाये तो =  11 लाख तीन हजार रूपये।
        यानि प्रति यात्री प्रतिदिन 11 लाख रूपये तो केवल ब्याज का खर्चा होगा। इससे तो अच्छा था की प्रति यात्री के लिए एक चार्टर्ड प्लेन चला देते तो भी इससे कम नुकशान होता।
                       इसलिए मेरी हर नागरिक से अपील है की वो इस विनाशकारी परियोजना का विरोध करे।
                                            

Wednesday, September 13, 2017

नोटबंदी पर सरकार का रुख, " रपट पड़े तो हर गंगा "

                 नोटबंदी एक विफल प्रोग्राम साबित हो चूका है। लेकिन सरकार और बीजेपी लगातार बयान बदल बदल कर कहीं न कहीं इज्जत बचाने की कोशिश कर रहे हैं। जब प्रधानमंत्री मोदीजी ने इसकी घोषणा की , तब उन्होंने  इसके कारण और लक्ष्य बताये थे। जैसे जैसे समय गुजरा तो ये समझ में आया की इससे कुछ भी हासिल नहीं हुआ, उलटे अर्थव्यवस्था का भट्ठा बैठ गया और करोड़ों लोगों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। उसके तुरंत बाद बीजेपी और सरकार में बैठे मंत्रियों ने बयान बदलने शुरू कर दिए। सबसे पहले कहा गया की नोटबंदी लोगों को डिज़िटल लेनदेन की आदत डालने के लिए की गयी थी। उसके बाद ये आंकड़े भी आ गए की जून के बाद डिजिटल लेनदेन की संख्या में भारी गिरावट आयी है।
                 लेकिन जो मुख्य मसला था वो था कालाधन।  सरकार इस बात को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर पेश करना चाहती है की जैसे वो कालेधन और भृष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ रही है। इसके लिए इस बात में विफल होने के बाद की तीन-चार लाख करोड़ रूपये कागज के टुकड़ों में बदल जायेंगे, सरकार ने तुरंत पलटी मार कर कहना शुरू किया की हमने तो नोटबंदी की ही इसलिए थी की सारा पैसा बैंक में वापिस आ जाये। और की अब हमारे पास इस बात के आंकड़े हैं की किस किस का धन काला है और उन सब को पकड़ लिया जायेगा।
                  लेकिन सरकार का ये बयान भी उसकी कार्यवाही से मेल नहीं खाता। सुप्रीम कोर्ट में एक महिला की इस याचिका पर की उसे बैंक में पैसा जमा करने का एक मौका दिया जाये, उसके जवाब में सरकार ने कहा की अगर एक मौका और दे दिया गया तो नोटबंदी का उद्देश्य ही समाप्त हो जायेगा। तो आपका उद्देश्य क्या था ? अगर आपका उद्देश्य सारा पैसा सिस्टम में वापिस लाने का था तो बाकी का भी आ जाने दो। फिर आप जिला सहकारी बैंको में जमा हुए करीब नौ हजार करोड़ रूपये को लेने से क्यों इंकार कर रहे हो ? फिर आप देश से बाहर नेपाल इत्यादि में रहने वाले भारतीयों का पैसा लेने से इंकार क्यों कर रहे हो। दूसरे अब बचा ही क्या है ? RBI के अनुसार केवल 16000 करोड़ के नोट ही बाहर बचे हैं बाकी तो सब जमा हो चुके हैं।
                इसके केवल दो कारण हो सकते हैं। पहला ये की आपका उद्देश्य वो नहीं था जो आप अब बता रहे हैं, बल्कि वही था जो घोषणा करते वक्त बताया गया था।
                 और दूसरा कारण ये की एक मौका और दे देने से तय रकम से ज्यादा पैसा बैंक में आ सकता है और नकली नोटों का वो आंकड़ा भी सामने आ जायेगा जो इस दौरान बैंको में जमा हो गए। 

Tuesday, September 12, 2017

राहुल गाँधी के इंटरव्यू पर बदहवास भाजपा

                राहुल गाँधी के अमेरिका में दिए गए इंटरव्यू पर बीजेपी बुरी तरह बौखलाई हुई है। इसके दो मुख्य कारण हैं। पहला ये की पिछले कई सालों से दिनरात मेहनत करके बीजेपी ने राहुल गाँधी की जो पप्पू वाली छवि बनाई थी, उसे राहुल गाँधी के एक इंटरव्यू ने धो कर रख दिया। दूसरा कारण ये है की राहुल गाँधी के जवाब बीजेपी के कार्यक्रम को सीधी चुनौती देते हैं। बीजेपी को राहुल पर सवाल उठाने से ज्यादा उन बयानों के जवाब देने पड़ रहे हैं जो प्रधानमंत्री ने विदेशी यात्राओं के दौरान दिए थे। 

Sunday, September 10, 2017

किसी तानाशाह की सनक नहीं है उत्तर कोरिया का परमाणु कार्यक्रम।

     
           
   पिछले लम्बे समय से विश्व मीडिया का एक हिस्सा और भारत का इलेट्रॉनिक मीडिया का एक बड़ा हिस्सा, उत्तर कोरिया के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को एक तानाशाह की सनक के तौर पर प्रचारित करता रहा है। हालाँकि भारतीय टीवी मीडिया अंतराष्ट्रीय स्तर पर अपनी साख खो चूका है और शेष दुनिया के लोग उसे केवल मनोरंजक चैनल के रूप में ही देखते हैं, लेकिन भारतीय दर्शकों का एक वर्ग अपनी कमजोर जानकारी के स्तर के कारण अब भी उससे प्रभावित होता है। हाल ही में किये गए हाइड्रोजन बम के परीक्षण के बाद हमारे चैनलों में इस तरह की रिपोर्टिंग की बाढ़ आ गयी है। लेकिन क्या ये सचमुच वैसा ही है ?
                      1950 के दशक में अमेरिका और कोरिया युद्ध के बाद, जब अमेरिका कोरिया को उत्तर और दक्षिण कोरिया के नाम से दो भागों में बाँटने में कामयाब हो गया, तब हारते हारते उसने उत्तर कोरिया के साथ युद्धविराम संधि कर ली। लेकिन उसका हमलावर और शत्रुतापूर्ण रुख जारी रहा। दक्षिण कोरिया को आधार बना कर उसने उत्तर कोरिया में किसी भी प्रकार से तख्तापलट की अपनी कोशिशें जारी रखी। इसी वजह से उत्तर कोरिया को ये समझ आ गया की अगर वो सैनिक तैयारिओं के मामले में कमजोर रहा तो अमेरिका कभी भी उसे बर्बाद कर सकता है। इसलिए उसने अपनी सैनिक ताकत को हरसम्भव इस स्तर पर रखा की युद्ध के दौरान कामयाब प्रतिरोध किया जा सके। इसी दौर में जब पूरी दुनिया मिसाईल कार्यक्रमों पर खर्चा कर रही थी तब उत्तर कोरिया की सरकार भी इसके लिए प्रयास कर रही थी।
                   लेकिन सयुंक्त राष्ट्र संघ में अमेरिका के प्रभुत्व के कारण उत्तर कोरिया के लिए ये राह आसान नहीं रही। उस पर लगातार प्रतिबन्ध लगाए गए और उसे दुनिया से अलग थलग करने की कोशिशें की गयी। लेकिन अपनी इच्छाशक्ति और चीन जैसे कुछ देशों के समर्थन से अमेरिका अपने मकसद में कामयाब नहीं हुआ।
परमाणु अप्रसार की विश्व व्यवस्था --
                                                       अब सवाल आता है की उत्तर कोरिया परमाणु अप्रसार के लिए बनाई गयी विश्व व्यवस्था का उललंघन कर रहा है। सो सभी जानते  हैं की मौजूदा परमाणु अप्रसार संधि इकतरफा और पहले से परमाणु शक्तिसम्पन्न देशों के हित में है। इसलिए भारत सहित कई देशों ने इसी कारण से इस पर हस्ताक्षर नहीं किये हैं। अमेरिका और उसके सहयोगी देश एकतरफा रूप से बाकी देशों पर इसके नाम पर प्रतिबंध लगाते रहे हैं। भारत तो इसका भुक्तभोगी रहा है। जब अटल जी के समय भारत ने परमाणु विस्फोट किया था तब भारत ने कई सालों तक इस तरह के प्रतिबंधों को झेला था। तब भारतीय मीडिया अमेरिका की आलोचना करता था और भारत के पक्ष को सही ठहराता था, अब उत्तर कोरिया के मामले में वही मीडिया अमेरिका को सही ठहराता है।
                           दूसरी तरफ मौजूदा परमाणु अप्रसार संधि, (एनपीटी ) परमाणु प्रसार को रोकने में एकदम निष्फल रही।  दुनिया के पांच परमाणु शक्तिसम्पन्न देशों के अलावा कई देशो के पास घोषित रूप से परमाणु तकनीक और हथियार हैं जैसे भारत और पाकिस्तान। इसके अलावा भी अघोषित रूप से भी कई देशों के पास परमाणु तकनीक और हथियार होना माना जाता है जैसे इसराइल और ईरान इत्यादि। सो परमाणु अप्रसार पर सबके स्वीकार करने लायक व्यवस्था का निर्माण जरूरी है जो शेष विश्व के परमाणु तकनीक प्राप्त करने के अधिकार को भी स्वीकार करती हो।
इराक और लीबिया का उदाहरण --
                                                     अमेरिका किस प्रकार से परमाणु अप्रसार के नाम  पर  झूठे प्रचार का प्रयोग करके अपने हितों को साधता रहा है, ईराक और लीबिया इसके स्पष्ट उदाहरण हैं। जब ईराक पर परमाणु और रासायनिक शस्त्र बनाने का आरोप अमेरिका ने लगाया तब ईराक ने सयुक्त राष्ट्र द्वारा सुझाये गए हर प्रस्ताव का पूरी तरह पालन किया। यहां तक की सयुक्त राष्ट्र की एजेन्सी तक के ये घोषित करने के बाद की ईराक के पास इस तरह के हथियार होने या उनका निर्माण किये जाने के कोई सबूत नहीं हैं, अमेरिका ने अपने सामरिक और व्यावसायिक हितों के लिए ईराक पर हमला किया और एक सम्पन्न देश को बर्बाद कर दिया। यही लीबिया के साथ हुआ। एक सार्वभौम और स्वतंत्र देश को नष्ट करके उसके शासक को बेइज्जत करके बेरहमी से कत्ल कर दिया गया और वो भी केवल उसके संसाधनों पर कब्जा करने के लिए। इसके बाद भी जो लोग अमेरिकी प्रचार को सच मान लेते हैं तो उनकी समझ पर तरस आने वाली बात है।
उत्तर कोरिया का पक्ष --
                                    उत्तर कोरिया इस बात को समझता है की सयुंक्त राष्ट्र इत्यादि कोई भी संस्था इतनी सक्षम नहीं है जो किसी देश की विदेशी हमले के मामले में रक्षा कर सके। वह लीबिया का उदाहरण देता है की
 किस तरह सयुंक्त राष्ट्र के प्रस्तावों को तोड़ मरोड़ कर उसे बर्बाद किया गया। और अब तो सीरिया और यमन के मामले में तो  इस तरह के किसी प्रस्ताव का भी इंतजार नहीं किया गया। अमेरिका, दक्षिण कोरिया और जापान के साथ मिलकर उत्तर कोरिया के तट पर लगातार उकसावेपूर्ण युद्ध अभ्यास करता रहा है। अमेरिका एक तरफ लगातार उत्तर कोरिया को डराने धमकाने का प्रयास करता है तो दूसरी तरफ दक्षिण कोरिया का इस्तेमाल अपने सामरिक हितों के लिए सैनिक अड्डों के निर्माण के लिए करता है। उत्तर कोरियाई खतरे को बहाना बना कर वो लगातार इस क्षेत्र में अपने आधुनिक हथियारों की तैनाती करता रहा है। दक्षिण कोरिया की भौगोलिक स्थिति ऐसी है की वहां से रूस और चीन, दोनों की सीमाओं के समीप अपने हथियार तैनात किये जा सकते हैं। इसलिए उत्तर कोरिया बिना किसी धमकी के असर में आये लगातार अपनी सुरक्षा जरूरतों के हिसाब से परमाणु और मिसाइल तकनीक पर काम करता रहा है।
खेल खत्म हो चुका है ---
                                  अमेरिका अब तक जिस धाक धमकी और प्रतिबंधों का इस्तेमाल करके उत्तर कोरिया को रोकने का प्रयास करता रहा है वो खेल अब समाप्त हो चूका है। अब उत्तर कोरिया ने न केवल अमेरिका तक पहुंच सकने वाली अंतरमहाद्वीपीय मिसाइल का सफल परीक्षण कर लिया है बल्कि इसके साथ ही उसने हाइड्रोजन बम के मिसाइल पर लगाए जाने वाले वॉर हैड को बनाने में भी सफलता प्राप्त कर ली है। इस मामले पर अमेरिकी नीति विफल हो चुकी है और उत्तर कोरिया को रोक कर रखने का खेल समाप्त हो चुका है।
कोरियाई उपमहाद्वीप  में हथियारों की नई दौड़ ----
                                                                           अब बदहवास अमेरिका को समझ में नहीं आ रहा है की वो इस चुनौती का मुकाबला कैसे करे। इसलिए उसने दक्षिण कोरिया में नए सिरे से अपने मिसाइल विरोधी सिस्टम थाड की तैनाती की घोषणा कर दी है। पर्यावरण पर इस सिस्टम के दुष्प्रभावों को देखते हुए खुद दक्षिण कोरिया में ही इसका भारी विरोध हो रहा है और इसके खिलाफ बहुत बड़े बड़े प्रदर्शन हो रहे हैं। दूसरी तरफ चीन और रूस ने इस पर गंभीर आपत्ति जताई है। रूस ने तो इसके खिलाफ अपने मिसाइल सिस्टम कैलिबर की तैनाती की घोषणा भी कर दी है। रूस का ये सिस्टम छोटी दुरी पर सटीक हमले की क्षमता रखता है और इसकी स्पीड को अब तक मात नहीं दी जा सकी है। दूसरी तरफ चीन से अब ये उम्मीद करना की वो उत्तर कोरिया के मामले में अमेरिका की कोई मदद करेगा, बेमानी ही है। जबकि चीन पहले ही ये साफ कर चूका है की कोरियाई समस्या का हल धमकी की बजाए बातचीत से ही सम्भव है और इसके लिए अमेरिका को उत्तर कोरिया के तट पर किये जाने वाले अपने युद्ध अभ्यासों पर रोक लगानी होगी। साथ ही उसने ये भी कहा है की ये उम्मीद करना की उत्तर कोरिया को डरा लिया जायेगा, असम्भव ही है।
                         इसलिए भारतीय मीडिया का जो हिस्सा उत्तर कोरिया के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को एक तानाशाह की सनक कह कर प्रचारित कर रहा है, उसे समझ लेना चाहिए की ये एक संप्रभु और सार्वभौम देश का अपनी सुरक्षा तैयारियों से जुड़ा कार्यक्रम है। 

Saturday, September 9, 2017

JNUSU चुनाव में लेफ्ट यूनिटी की जीत और उसके सबक

      
 
                                JNUSU चुनाव 2017 के अंतिम परिणाम आ चुके हैं।  जो इस प्रकार है।


    1. अध्यक्ष      - लेफ्ट यूनिटी की गीता कुमारी ने ABVP की निधि त्रिपाठी को 464 वोट से हराया।

    2.  उपाध्यक्ष -  लेफ्ट यूनिटी की सिमोन जोया खान ने ABVP के दुर्गेश कुमार को 848 वोट से हराया।

    3.  महासचिव -- लेफ्ट यूनिटी उम्मीदवार दुग्गीराला ने ABVP के निकुंज मकवाना को 1107 वोट से हराया।

    4.  सहसचिव -  लेफ्ट यूनिटी उम्मीदवार शुभांशु सिंह ने ABVP के पंकज केसरी को 835 वोट से हराया।


                  सभी  चारों सीटों पर कई साल के बाद लेफ्ट ने कब्जा किया है। लेकिन इन चुनावो के दौरान और परिणाम आने के बाद इसके कुछ सबक भी हैं। जैसे -

1.     लोग चाहते हैं की लेफ्ट एक साथ खड़ा हो। अगर लेफ्ट साथ रहता है तो समाज के बड़े वर्ग का समर्थन उसे मिलता है।

2.   AISF के लेफ्ट से अलग होकर चुनाव लड़ने को लोगों के बहुमत ने रिजेक्ट कर दिया।

3.   ABVP की बजाय लेफ्ट को दुश्मन नंबर 1 करार देकर चुनाव लड़ने वाली बापसा  ( BAPSA ) इस बार तीसरे नंबर पर चली गयी जो पिछली बार दूसरे नंबर पर थी। दलितों के नाम पर बने संगठन अगर दक्षिणपंथी हिन्दूवादियों के बजाय लेफ्ट को दुश्मन घोषित करते हैं तो उन्हें लोगों का समर्थन घट जाता है। क्योंकि दलित देख रहे हैं की किस प्रकार लेफ्ट उनके सवालों पर लगातार लड़ता रहा है।

Wednesday, August 30, 2017

नोटबंदी के कारण 2 लाख फर्जी कम्पनियां पकड़े जाने का झूठ

                       नोटबंदी की विफलता इतनी बड़ी है की अब इसका उद्देश्य साबित करने की कोशिश में सरकार हकलाने लगी है। अब उसको खुद नहीं पता होता की वो क्या कह रही है और क्यों कह रही है।  इस विफलता को छिपाने की कोई भी कोशिश कामयाब नहीं हो पा रही है। शुरू में इसकी सफलता पर कुछ अर्थशास्त्री सवाल उठा रहे थे, कुछ समय बाद साधारण अर्थशास्त्र का विद्यार्थी भी इसकी विफलता को समझने लगा था। अब तो हालत ये है की साधारण आदमी, जिसका अर्थशास्त्र से कोई लेना देना नहीं है वो भी इसकी विफलता को खुली आँखों से देख सकता है। अब अगर कोई नोटबंदी के फायदे गिनवाने की कोशिश करता है तो सामने वाला पहले ही हसना शुरू कर देता है।
                         इस क्रम में सबसे ज्यादा फजीहत अगर किसी की हुई है तो वो है रिजर्व बैंक। सरकार के फैसले की जिम्मेदारी और उसकी विफलता को छुपाने की कोशिश में रिजर्व बैंक ने अपनी साख में बट्टा लगा लिया है। लगातार नो महीने तक ये कहना की अभी वो नोटों की गिनती कर रहा है, उसे हास्यास्पद स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है। हालाँकि इस फैसले की सफलता और विफलता की पूरी जिम्मेदारी प्रधानमंत्री की है, लेकिन हमारे प्रधानमंत्री तो अब मान-अपमान और हंसी मखौल से ऊपर उठ चुके हैं। अब तो हालत ये है की प्रधानमंत्री कुछ भी बोल देते हैं और सरकार तुरंत उस बयान की सफाई ढूढ़ने में लग जाती है। जैसे 56लाख नए करदाता जुड़ने वाला बयान। जिस पर वित्तमंत्रालय  से लेकर CBDT तक सफाई नहीं पेश कर पा रहे हैं और उस पर बड़ी बात ये की ये आंकड़ा प्रधानमंत्री ने लालकिले से पेश कर दिया।
                        अब रिजर्व बैंक ने आखिर में ये आंकड़ा पेश कर दिया है की 99 % नोट बैंक में वापिस आ गए हैं। यानि रिजर्व बैंक के अनुसार जो केवल मात्र 16 हजार करोड़ के नोट वापिस नहीं आये उनकी रकम उतनी भी नहीं बनती जितना नए नोटों पर खर्चा हो गया है। और इसमें भी एक चालाकी की गयी है। रिजर्व बैंक ने ये आंकड़ा देते हुए (मार्च तक ) शब्द का प्रयोग किया है। सबको मालूम है की मार्च तक सरकार ने जिला कोपरेटिव बैंको में जमा 1000 और 500 के नोटों को स्वीकार नहीं  किया था। अगर उस रकम को भी जोड़ लिया जाये  तो लोगों की वो आशंका सही साबित हो जाएगी की कहीं घोषित रकम से ज्यादा नोट तो वापिस नहीं आ गए। क्योंकि लोगों को शक है की नोट जमा कराने के दौरान बड़े पैमाने पर नकली नोट भी जमा हुए हो सकते हैं, क्योंकि रिजर्व बैंक के पास तो नोट गिनने तक का इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं था फिर असली नकली देखने का तो सवाल ही कहां पैदा होता है।
                      लेकिन अब रिजर्व बैंक का आंकड़ा सामने आने के बाद सरकार एक बार फिर नोटबंदी की सफलता के पक्ष में एक बहुत ही हास्यास्पद तर्क दे रही है। वो तर्क ये है की नोटबंदी के कारण 2 लाख फर्जी कम्पनियों का पता चला। जो लोग भी थोड़ा सा भी इस प्रक्रिया को समझते हैं की इन तथाकथित फर्जी कम्पनियों और नोटबंदी का आपस में कोई लेना देना नहीं है। असल में ये मामला इस तरह है - हर साल लाखों लोग रजिस्ट्रार ऑफ़ कम्पनीज ( ROC ) के पास नई कम्पनी रजिस्टर्ड करवाते हैं। इसके पीछे भविष्य में कोई काम शुरू करने की इच्छा होती है। लेकिन कई तरह के कारणों की वजह से वो कामकाज शुरू नहीं कर पाते हैं। इसलिए उनमे से बहुत से लोग ROC में सालाना लेखा पेश नहीं करते। और कुछ शून्य कामकाज का लेखा पेश करते हैं। ROC अपने नियमो के हिसाब से लेखा पेश न करने वाली कंपनियों की सदस्य्ता हर साल कैंसिल कर देती है। ये एक सामान्य प्रक्रिया है और इसका रिकार्ड हमेशा ROC के पास रहता है। इस साल सरकार के कहने पर ROC ने ऐसी कम्पनियों का रजिस्ट्रेशन बड़ी तादाद में एक साथ रद्द कर दिया। बस इतना सा मामला है और इसका नोटबंदी से कुछ भी लेना देना नहीं है। ROC को हमेशा पता होता है की कितनी कम्पनिया शून्य कामकाज के स्तर पर हैं।
                      अब सरकार इसको इस तरह पेश कर रही है जैसे उसने बहुत बड़ा गोलमाल पकड़ लिया हो जो सालों से चल रहा था। अगर ऐसा है तो सरकार बताये की कितने लोगों पर केस दर्ज हुआ है। और कितने लोग जेल के अंदर हैं। जबकि ऐसा कुछ नहीं है। सरकार का व्यवहार खिसियायी बिल्ली जैसा हो गया है और इसके  कारण हमारा देश पूरी दुनिया में मजाक का पात्र बन गया है।

Sunday, August 20, 2017

गोरखपुर में हुई बच्चों की मौत के लिए राहुल गाँधी जिम्मेदार

                    गोरखपुर में ऑक्सीजन के बिना हुई बच्चों की मौत के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है ? ये एक ऐसा सवाल बना दिया गया जैसे की ये बहुत बड़ा रहस्य हो। गनीमत है की केंद्रीय गृहमंत्रालय ने FBI को जाँच के लिए नहीं बुलाया। पूरी बीजेपी और उसके चैनल इस पर थूक बिलो रहे हैं और हाथ झाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। इसी बीच में कल योगीजी का बयान आया की इसके लिए पिछली सरकार जिम्मेदार है। देश को उनसे ऐसी ही उम्मीद थी। वैसे भी ऐसे लोगों को जिन्होंने मुख्यमंत्री चुना है, उन्होंने कोई विज्ञानं की खोज के लिए थोड़ा न चुना है। इसी तरह की बातें करने के लिए चुना है। किसी पढ़े लिखे को चुन लेते तो उसको ऐसा कहने में दिक्क्त हो सकती थी। इसलिए बीजेपी ने हरियाणा से उत्तरप्रदेश तक हर जगह ऐसे लोगों को ही बिठाया है ताकि कल कोई असुविधा न हो।
                     कल हमारे मुहल्ले के चबूतरे पर इस पर गहन विचार विमर्श हुआ। उसमे व्यक्त किये  गए विचार इस प्रकार हैं। -
                      एक बुजुर्ग ने कहा की भाई जिसे ऑक्सीजन का प्रबंध करना था और जिस सरकार को निगरानी करनी थी उनकी जिम्मेदारी बनती है। बस फिर क्या था। भक्तों में कोहराम मच गया। एक भक्त ने कहा की ये बुड्ढा तो पुराना कांग्रेसी है इसलिए ऐसा कह रहा है। ये बात कोई भी टीवी चैनल नहीं कह रहा।
                     दूसरे भक्त ने हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा की कोई डॉक्टर कफील है जो इसके लिए जिम्मेदार है। उस पर पहले रेप का आरोप लगा है।
                       एक दूसरे आदमी ने कहा की ये कोई छेड़खानी का मामला है क्या जो पिछले रेप का उदाहरण दे रहे हो।
                  इस पर एक भक्त चिल्लाया, ये देशद्रोही है , मैंने इसे पाकिस्तान और इंग्लैंड के मैच में पाकिस्तान की टीम का समर्थन करते देखा है।
                  तभी एक आचार्यजी ने वहां प्रवेश किया जो सीधे संघ के बौद्धिक से पधार रहे थे। भक्तों ने उसके लिए अतिरिक्त सम्मान का परिचय देते हुए उनको इस विषय पर विशेष कमेंट करने के लिए कहा।
                    आचार्यजी ने इधर उधर देखा और कहा , आज संघ के बौद्धिक में इस विषय पर गहन विचार विमर्श हुआ है। इसके सभी पहलुओं की बारीकी से  छानबीन करने के बाद ये निष्कर्ष निकला है। -
                      जैसे योगी जी ने कहा की इसके लिए पिछली सरकार जिम्मेदार है, उससे संघ सहमत है। लेकिन पिछली सरकार से मतलब अखिलेश की सरकार से नहीं है। इसकी जड़ें काफी गहरी हैं। उसके लिए हमे उस आंदोलन तक जाना होगा जिसे देश के कुछ लोग आजादी का आंदोलन कहते हैं। हम उसे आजादी का आंदोलन नहीं कहते, और इसीलिए हमने उसमे हिस्सा नहीं लिया था। हम अंग्रेजो की उस बात से सहमत थे की हिंदुस्तानिओं को शासन करना नहीं आता। और अंग्रेज इस देश को सभ्य बनाने के लिए आये हैं। लेकिन उस समय की कांग्रेस और दूसरे लोगों ने मिलकर अंग्रेजों की इस योजना पर पानी फेर दिया। उस समय तक केवल संघ से जुड़े लोग ही सभ्य हो पाए थे और बाकी सारा देश असभ्य ही था। लेकिन जवाहरलाल नेहरू के सत्ता के लालच ने  अंग्रेजों को अपना सभ्यता का मिशन बीच में ही छोड़कर वापिस जाने के लिए मजबूर कर दिया। वरना अब तक अंग्रेज राज कर रहे होते और हम इस घटना की जिम्मेदारी उन पर डाल सकते थे। लेकिन नेहरू गाँधी परिवार और कांग्रेस के सत्ता के लालच के चलते ऐसा नहीं हो पाया। इसलिए संघ इस घटना के लिए राहुल गाँधी को जिम्मेदार मानता है और उससे देश से माफ़ी मांगने की मांग करता है।
                      भक्तों ने तालियां बजाई और आचार्यजी देश की बाकी समस्याओं पर प्रवचन देने लगे।

Monday, July 31, 2017

बिहार, भाजपा और राष्ट्रवादी भृष्टाचार

                      बिहार में सरकार बदलते ही कई नई चीजें और परिभाषाएँ सामने आयी। जैसे बिहार के पिछले चुनाव में नरेंद्र मोदी ने नितीश कुमार के घोटालों की एक लम्बी लिस्ट जारी की थी। जिसमे करीब 23 घोटाले शामिल थे। जैसे ही नितीश ने बीजेपी के पाले में जाकर सरकार बनाई, मोदीजी ने उसके स्वागत में ट्वीट करते हुए कहा की भृष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में नितीश का स्वागत है। इसका एक तो मतलब ये हुआ की भृष्टाचार का घोटालों से कोई लेना देना नहीं है। भृष्टाचार का लेना देना केवल इस बात से है की आदमी अपनी पार्टी में है या विपक्ष का है। जैसे अभी गुजरात में है। जो जो विधायक बीजेपी में शामिल हो जायेंगे वो भृष्टाचारी नहीं रहेंगे और जो नहीं होंगे वो भृष्टाचारी रहेंगे। बीजेपी में भृष्टाचार की यह परिभाषा सुखराम के जमाने से चली आ रही है।
                     मैं अभी अभी अपने मुहल्ले की किराने की दुकान के सामने से गुजरा तो दुकानदार ने मुझे आवाज लगाई की भाई साहब देखो बिहार में फिर से सुशासन आ गया है। मैंने पूछा की नितीश तो वही है, फिर ये सुशासन कौन है क्या सुशील मोदी का नाम है सुशासन ?
                      देखिये भाई साहब, नितीश जब तक लालू के साथ थे तभी तक भृष्ट थे वरना बिहार में तो लोग उनको सुशासन बाबू के नाम से पुकारते हैं। उन्होंने तेजस्वी यादव से पीछा छुड़ा लिया है। उस पर 120 बी का मुकदमा था।
                     120 बी का मुकदमा तो सुशील मोदी पर भी है। उल्टा दो चार धाराएं ज्यादा ही हैं। फिर बदला क्या ? मैंने पूछा।
                      वो 120 बी दूसरी तरह का है। राजनैतिक बदले की भावना से लगाया हुआ है। उसने कहा।
                     ठीक यही राजनैतिक बदले की बात तो तेजस्वी भी कह रहा है। चलो छोडो। ये बताओ की देश से भृष्टाचार दूर करने के लिए सरकार क्या कर रही है ? मैंने पूछा।
                     बहुत काम कर रही है। अभी अभी लालू यादव पर केस दर्ज किया है।
                      भृष्टाचार के बहुत से केस सीबीआई के पास पेंडिंग हैं। सीबीआई क्या कर रही है ?
                     सीबीआई बहुत काम कर रही है। अभी अभी उसने लालू यादव के कितने ठिकानो पर रेड की है। उसने जवाब दिया।
                       आर्थिक भृष्टाचार के बहुत से मामले ED के पास भी पेंडिंग हैं। ED क्या कर रही है। मैंने पूछा।
                        अभी दो दिन पहले ही ED ने लालू यादव के खिलाफ केस दर्ज किया है। आपने पढ़ा नहीं ? उसने मुझसे पूछा।
                     थोड़े दिन पहले प्रधानमंत्री ने चार्टर्ड अकाउंटेंटस के सम्मेलन में चेतावनी दी थी की जो भी CA किसी को गलत तरिके से टैक्स बचाने में मदद करेगा, उसके खिलाफ कार्यवाही की जाएगी। क्या हुआ ? मैंने पूछा।
                      लगता आपने अख़बार पढ़ना छोड़ दिया है। अभी अभी लालू यादव की लड़की मीसा भारती  के CA के यहां रेड हुई है  आपको पता होना चाहिए। उसने जवाब दिया।
                       इससे तो ऐसा लगता है की अगर लालू यादव और उसका परिवार देश छोड़ दे तो भारत से भृष्टाचार का खात्मा हो सकता है ? मैंने पूछा।
                         नहीं, नहीं, भाई साहब, देश छोड़ देने से भृष्टाचार थोड़ा न खत्म हो सकता है। उसके लिए तो लालू यादव को राष्ट्रवादी होना पड़ेगा। उसने कहा।
                         उसके लिए क्या करना होगा ? मैंने पूछा।
                          बीजेपी में शामिल होना पड़ेगा। उसने कहा और अपने काम में लग गया।
 

Saturday, July 29, 2017

नितीश कुमार और आकाश में घूमती हुई अंतरआत्माएँ

                 भारत के आकाश में बहुत सी  अंतरआत्माएँ घूम रही थी। अलग अलग वेशभूषायें और अलग अलग अंदाज में। अचानक दो  अंतरआत्माएँ आमने सामने आ गयी। एक अंतरात्मा नई नवेली दुल्हन के वेश में थी और दूसरी अंतरात्मा विधवा के वेश में थी। दुल्हन के वेश वाली अंतरात्मा को अपने सामने अचानक आ गयी विधवा को देखकर अच्छा नहीं लगा। वह उस पर जोर से चिल्लाई, ' दिखाई नहीं देता, क्या टककर मारने का इरादा है। "
               "माफ़ करना बहन, मन दुखी था इसलिए ध्यान नहीं रहा। वैसे तुम कौन हो, पहले तो तुम्हे कभी देखा नहीं ?" विधवा अंतरात्मा ने पूछा।
                " मैं नितीश कुमार की अंतरात्मा हूँ, अभी दो दिन पहले ही हमारी शादी हुई है बिहार के हित  में। " दुल्हन अंतरात्मा ने इतराते  जवाब दिया।
                  विधवा अंतरात्मा के होठों पर एक हल्की सी मुस्कान आयी। बोली,' जाओ बहन, मैं तो तुम्हे सदासुहागण रहने का आशीर्वाद भी नहीं दे सकती। "
                  दुल्हन अंतरात्मा अचानक पलटी। उसने विधवा अंतरात्मा के कंधे पर हाथ रखकर कहा, " तुमने ऐसा क्यों कहा और तुम हो कौन ? "
                 " मैं भी नितीश कुमार की अंतरात्मा ही हूँ। अभी बीस महीने पहले हमारी शादी हुई थी। फेरों के वक्त नितीश कुमार ने मुझे वचन दिया था की मिटटी में मिल जायेंगे लेकिन बीजेपी के साथ नहीं जायेंगे। अभी कुछ दिन पहले तक भी वो संघमुक्त भारत बनाने के लिए घर से निकले थे और थोड़ी देर के बाद कुछ रोती हुई अंतरआत्मायें मेरे घर आयी और मुझे बताया की मैं विधवा गयी। " उसकी आँखों से आँसू टपकने लगे।
                 दुल्हन अंतरात्मा गंभीर हो गयी। उसे अपनी शादी की क्षणभंगुरता साफ नजर आने लगी। वो दोनों साथ साथ चलती हुई थोड़ी ही आगे गयी थी की बदबू का एक जोरदार झोंका आया और सामने बहुत सी अन्तरात्माओं की लाशे बिखरी हुई थी। वह सहम गयी और उसने विधवा अंतरात्मा की तरफ देखा।
                     विधवा अंतरात्मा ने नाक  पर रुमाल रखते हुए कहा ," ये उन बिहारियों और देश के अलग अलग हिस्सों के उन लोगों की अंतरआत्मायें हैं जिन्होंने बीजेपी को हराने के लिए नितीश कुमार का समर्थन किया था। दो दिन पहले अचानक सुनामी आयी और ये बेमौत मारी गयी। "
                   " तो इनका अंतिम संस्कार क्यों नहीं कर देते ?" दुल्हन अंतरात्मा ने पूछा।
                    " जगह कहां है ? सारे श्मशान और कब्रिस्तान पहले ही मीडिया की अन्तरात्माओं से भरे हुए हैं। " विधवा अंतरात्मा ने अफ़सोस जताया।
                       अचानक एक तरफ से अन्तरात्माओं का एक झुण्ड रोता बिलखता हुआ आता दिखाई दिया।  दोनों उस तरफ देखने लगी। जब वो पास आयी तो उनसे पूछा की तुम कौन हो और रो क्यों रही हो ?
                      उन अन्तरात्माओं ने रोते रोते कहा, " हम गुजरात के कुछ नेताओं की अंतरआत्मायें हैं। पहले हमे ऊना कांड पर और साम्प्रदायिकता पर रोने को कहा गया था। हम वहां रो ही रही थी की अचानक संदेश आया की रोना बंद करो और मंगलगान गाओ। भला ऐसा भी कभी होता है ? हमे कपड़े बदलने तक का मौका नहीं दिया। हमारे पतियों ने ये कहकर की कांग्रेस बीजेपी को हराने के लिए कुछ नहीं कर रही है बीजेपी की सदस्य्ता ले ली। आदमी ऐसा कैसे कर सकता है। इस तरह हम एक  साथ विधवा हो गयी।  हम तो कहती हैं की भगवान किसी अंतरात्मा की शादी किसी नेता से ना करवाए।"
                     अचानक दुल्हन अंतरात्मा ने अपने सारे जेवर उतार कर फेंक दिए। माथे का सिंदूर पोंछ दिया और घूमकर विधवा अंतरात्मा से बोली, " माफ़ करना दीदी, नितीश कुमार ने मिटटी में मिलने की शर्त पूरी कर दी। अब उस आदमी के अंदर इतनी जगह ही नहीं बची है की कोई अंतरात्मा उसके अंदर रह सके। इसलिए मैं उससे तलाक ले रही हूँ। दो दिन बाद विधवा होने से अच्छा है की तलाक ले लूँ। " और वो एक तरफ चली गयी। बाकि की अंतरआत्मायें उसे जाते हुए देखती रही।

Wednesday, July 26, 2017

भारतीय टीवी चैनल पर बहस का नमूना

                     दोपहर के 12 बजे हैं। एक भारतीय राष्ट्रवादी टीवी चैनल पर एंकर एक बहस का  आयोजन कर रहा है। स्टूडियो में तीन लोग बैठे हैं एक सरकारी पार्टी यानि बीजेपी के प्रवक्ता, दूसरे कांग्रेस के प्रवक्ता और एक विशेषज्ञ। बहस का विषय है की क्या अब रात है या दिन। अब इसका वर्णन  प्रकार है।
एंकर --
                 सबसे पहले मैं बीजेपी के प्रवक्ता से पूछना चाहता हूँ की प्रधानमंत्री ने अभी अभी कहा है की इस समय  आधी रात  है। इस पर आपका क्या कहना है ?
बीजेपी प्रवक्ता --
                          देखिये जब प्रधानमंत्री जी ने कहा है तो निश्चित रूप से आधी रात ही है। इस पर सवाल उठाने की गुंजाइश कहां है। प्रधानमत्री जी दुनिया के सबसे बड़े नेता हैं।
एंकर --
                    अब मैं काँग्रेस के प्रवक्ता से पूछना चाहता हूँ की वो इस पर सवाल क्यों उठा रहे हैं ? जब उनकी सरकार तब उन्होंने तो देश को कभी बताया नहीं की अभी दिन है या रात।
काँग्रेस प्रवक्ता --
                         इसमें सवाल उठाने की क्या बात है। दोपहर के 12 बजे हैं ,सूरज सर पर है और आप कह रहे हैं की आधी रात है।
एंकर --
             लेकिन जब सरकार कह रही है तो विपक्ष को कम से कम राष्ट्रीय सवालों पर तो सरकार के साथ खड़ा होना चाहिए। आप इस मुददे पर भी राजनीति कर रहे हैं ?
बीजेपी प्रवक्ता --
                           काँग्रेस हमेशा से राष्ट्रीय सवालों पर राजनीती करती रही है। इसीलिए जनता ने इन्हे 44 के आंकड़े पर पहुंचा दिया।
एंकर --
               हमारे स्टूडियो में एक निष्पक्ष विशेषज्ञ भी मौजूद हैं। मैं उनसे पूछना चाहूंगा की अभी रात है या दिन इस पर उनका क्या कहना है ?
विशेषज्ञ --
                 देखिये ये एक वैज्ञानिक सवाल है। मेरी घड़ी में 12 PM का समय लिखा हुआ है। और PM से जो संकेत मिलता है वो तो रात की तरफ ही इशारा करता है। फिर भी इस पर हमे इसरो के बयान का इंतजार करना चाहिए और विपक्ष को इस पर राजनीति नहीं करनी चाहिए।
बीजेपी प्रवक्ता --
                           हमने अभी अभी अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प से फोन पर बात की है। उन्होंने भी कहा है की अभी आधी रात है और वो अभी शयनकक्ष में हैं। हमारे प्रधानमंत्री जी का समर्थन अमेरिका सहित दुनिया के सारे देश कर रहे हैं लेकिन काँग्रेस को तो केवल राजनीति करनी है।
एंकर --
                मैं काँग्रेस के प्रवक्ता से ये पूछना चाहता हूँ की रात और दिन में कुछ बुनियादी फर्क होते हैं। वो किस आधार पर कह रहे हैं की अभी दिन है ?
कांग्रेस प्रवक्ता --
                            इसका सबसे मुख्य आधार ---
( बीजेपी प्रवक्ता उसकी बात बीच में काटकर )  ये तो आधार कार्ड का भी विरोध कर रहे हैं , ये क्या आधार की बात करेंगे। आधार के सवाल पर ये प्राइवेसी का सवाल उठाना शुरू कर देते हैं। अब आधी रात को इस पर बहस करने में क्या प्राइवेसीका उललंघन नहीं होता।
एंकर --
                ठीक है अगर आपके पास कोई ठोस आधार नहीं है तो कम से कम आपको प्रधानमंत्रीजी के इस बयान का विरोध नहीं करना चाहिए। कम से कम अमेरिकी राष्ट्रपति का जवाब आ जाने के बाद तो बिलकुल नहीं। वरना पूरी दुनिया में ये संदेश जायेगा की हमारे अन्दर राष्ट्रीय सवालों पर भी एकता नहीं है।
काँग्रेस प्रवक्ता --
                          लेकिन मैं इसका जवाब ---
( विशेषज्ञ, उसकी बात बीच में काटकर ) काँग्रेस के लोगों को  अपनी बातों को भी याद रखना चाहिए। जब 15 अगस्त 1947 को संसद में आजादी की घोषणा करते हुए जवाहरलाल नेहरू ने उस समय को आधी रात कहा था तब विपक्ष ने उसका विरोध नहीं किया था। इन्होने तो GST की घोषणा करने के लिए संसद में हुए समारोह का बायकाट किया क्योंकि प्रधानमंत्री मोदीजी ने उसे आधी रात कहा था। ये काँग्रेस की हार से पैदा हुई निराशा है की  प्रधानमंत्री मोदीजी की किसी भी बात का समर्थन नहीं कर सकती।
एंकर --
                 तो आज की बहस से ये साफ होता है की कांग्रेस के पास इस बात का कोई तर्क नहीं है और वो केवल राजनीती कर रही है।

Sunday, July 23, 2017

मुद्रा लोन, रोजगार के आंकड़े और नोटों की गिनती।

                    अभी अभी केंद्र सरकार का बयान आया है की उसने पिछले तीन सालों में सात करोड़ से ज्यादा लोगों को रोजगार दिया है। और ये रोजगार उसने मुद्रा बैंक से साढ़े तीन लाख करोड़ लोन देकर दिया है। उसके बाद सब तरफ इसकी चर्चा है और कुछ भक्त तो ये भी कह रहे हैं की देखो, मोदीजी ने वायदा तो सालाना दो करोड़ नौकरियों का किया था और रोजगार सात करोड़ से ज्यादा लोगों को दे दिया।
                     इस पर सबसे ज्यादा हैरानी की बात ये है की लोगों को पता ही नहीं है की सरकार ने उनको रोजगार दे दिया। और लोग हैं की फालतू में लाइन लगा कर खड़े हैं और सरकार को कोस रहे हैं। अब सरकार का काम लोगों को रोजगार देना था सो दे दिया, लोगों को इसका पता लगे न लगे ये सरकार की जिम्मेदारी थोड़ी है। कुछ लोग कह रहे हैं की वायदा नौकरियों का था और सरकार अब घुमा फिरा कर रोजगार के आंकड़े दे रही है। इस पर भक्त लोग कह रहे हैं की रोजगार और नौकरी में क्या फर्क होता है ? लोगों की भाषा कमजोर है तो ये मोदीजी की जिम्मेदारी थोड़ी है।
                       ये बयान सुनते ही मेरे पड़ौसी तुरंत मेरे घर पर आ धमके। पता नहीं वो मेरे घर को सरकार का लोक सम्पर्क विभाग का दफ्तर क्यों समझते हैं ? आते ही सवाल दागा ," ये सात करोड़ लोगों को रोजगार कैसे दे दिया ?"
                       मैंने कहा, " जब सरकार कह रही है तो दिया ही होगा। वैसे सरकार का कहना है की उसने सात करोड़ लोगों को साढ़े तीन लाख करोड़ का लोन मुद्रा योजना से दिया है जिससे उन्हें रोजगार मिला। "
                       " लेकिन लोन तो पहले से धंधा कर रहे लोगों को मिलता है। अगर किसी छोटे दुकानदार ने अपनी पूंजी की जरूरत के लिए पचास हजार का लोन ले लिया तो क्या उसे दूसरा रोजगार मिल गया। वो तो पहले से ही रोजगार शुदा था। " पड़ोसी ने अगला सवाल किया।
                        मैंने कहा ," देखो, अगर किसी दुकानदार के पास पैसे नहीं हैं तो उसे तो देर सबेर बेरोजगार होना ही था। तुम ऐसा समझ लो की सरकार ने उसे एडवांस में रोजगार दे दिया। "
                          " ऐसे कैसे समझ लें ? तुमने पहले से रोजगार शुदा लोगों को लोन दिया और अब उसे नए रोजगार में खपा रहे हो। " पड़ोसी ने सख्त एतराज किया और लगभग मुझे ही सरकार मान लिया।
                       " देखो, तुम ये तो मानते ही हो न की देश में बहुत भृष्टाचार है। इसमें बहुत से लोगों ने गलत काम धंधा दिखाकर और बैंक के लोगों से मिलीभगत करके भी लोन लिया होगा। इसके अलावा सरकारी पार्टी के कार्यकर्ताओं को भी लोन मिला होगा। तो उनको रोजगार मिला की नहीं ?" मैंने स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की।
                       मेरे पड़ोसी की आँखे चौड़ी हो गयी। उसने गर्दन हिला कर कहा। " बहुत अच्छे, चलो ये बताओ की सरकार को कैसे पता चला की साढ़े तीन लाख करोड़ का लोन दिया गया है ?"
                           " कमाल  करते हो, बैंको के आंकड़े हैं और कैसे पता चलेगा। " मैंने कहा।
                        "लेकिन रिजर्व बैंक में तो अभी तक नोटों की गिनती चल रही है। उसको तो ये भी नहीं मालूम की उसके पास कितना पैसा है। वो कैसे बता सकता है की कितने का लोन दिया। अगर सारे नोट गिनने के बाद एक दो लाख करोड़ का फर्क आ गया तो क्या करोगे ?" मेरे पड़ोसी ने आखरी पैंतरा आजमाया।
                        " तो सरकार अपने आंकड़े सुधार लेगी और क्या करेगी। अगर रकम बढ़ गयी तो विजय माल्या के खाते में जमा कर देंगे। " मैंने पीछा छुड़वाना चाहा।
                         हा हा हा। पड़ोसी ने ठहाका लगाया और चला गया।

Saturday, July 22, 2017

गौ रक्षकों पर सरकार का बयान भरोसा पैदा नहीं करता।

                गौ रक्षकों द्वारा लगातार की जा रही हिंसा और उसमे कई जान चले जाने के महीनो बाद प्रधानमंत्री ने हिंसा की आलोचना करने वाला बयान जारी किया। उससे पहले लगातार हो रही हिंसा पर पूरा देश उन्हें मुंह खोलने के लिए कहता रहा, लेकिन उनके मुंह से इसके खिलाफ एक शब्द नहीं निकला। इससे हिंसा करने वाले गौ रक्षकों में इस बात का स्पष्ट संकेत गया की सरकार की मंशा क्या है। प्रधानमंत्री का ये बयान संसद का सत्र शुरू होने के एक दिन पहले और सुप्रीम कोर्ट में इस पर होने वाली सुनवाई से तीन दिन पहले आया। जानकारों का स्पष्ट मानना है की ये संसद में विपक्ष के हमले से बचने और सुप्रीम कोर्ट में किसी सख्त टिप्पणी से बचने की कवायद भर है। वरना क्या कारण था की सुदूर साइबेरिया में होने वाली दुर्घटना में अगर कोई मौत हो जाती है तो हमारे प्रधानमंत्री का ट्वीट वहां के प्रधानमंत्री के बयान से भी पहले आ जाता है। इसलिए लोग मानते हैं की गौ रक्षकों की हिंसा को बीजेपी, आरएसएस और सरकार का समर्थन प्राप्त है।
                     प्रधानमंत्री ने जब गौ रक्षकों की हिंसा की आलोचना करने वाला बयान दिया तो वो भी एकदम सीधा और स्पष्ट होने की बजाय किन्तु और परन्तु वाला बयान है। इसमें उन्होंने देश की बहुसंख्या द्वारा गाय को माता मानने जैसे शब्दों को शामिल कर दिया जो गौ रक्षकों को इस बयान की गंभीरता की असलियत बता देते हैं। और यही कारण है की उसके बाद भी गौ रक्षकों की हिंसा कम नहीं हुई।
                    इस मामले में सरकार और संघ परिवार की मंशा एकदम साफ है। एक तरफ सरकार गौ रक्षकों की हिंसा रोकने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर डालती है और दूसरी तरफ राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आने वाले पशु व्यापार पर केंद्र की तरफ से नोटिफिकेशन जारी करती है। वहीं खुद उनकी पार्टी की राज्य सरकारें सारे सबूतों को अनदेखा करके हिंसा करने वाले गौ रक्षकों पर केस दर्ज करने की बजाय पीड़ितों पर की केस दायर करती हैं।
                   इसके साथ ही उस घटनाक्रम को भी देखना होगा जिसमे गुजरात चुनावों में इस बार बीजेपी की पतली हालत को देखते हुए बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए " आलिया, मालिया, जमालिया " जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। लगभग सभी मोर्चों पर विफल बीजेपी सरकार अब लोगों के सवालों का जवाब देने की पोजीशन में नहीं है। इसलिए उसे अब केवल साम्प्रदायिक विभाजन का ही सहारा है। उसका विकास और भृष्टाचार विरोध का नकली प्रभामंडल ध्वस्त हो चूका है। इसलिए अब उसे इस विभाजन की जरूरत पहले किसी भी समय से ज्यादा है। इसलिए उसके हर कार्यक्रम और बयान में साम्प्रदायिक रुझान साफ नजर आता है। अब तो ये इतना स्पष्ट है की दूर विदेशों में बैठे लोगों को भी साफ साफ दिखाई दे रहा है। न्यूयॉर्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट से लेकर दा इण्डिपेंडन्ट जैसे अख़बारों में छपने वाले लेख इसके गवाह हैं।
                     इसलिए लोगों को प्रधानमंत्री और उसकी ही तर्ज पर संसद में दिए गए अरुण जेटली के किन्तु परन्तु वाले बयानों पर भरोसा करने की बजाय साम्प्रदायिक विभाजन के विरोध की अपनी कोशिशों को और  तेज करना चाहिए।

Sunday, July 16, 2017

नोटों की गिनती और उर्जित पटेल का मजाक।

                    जिस दिन उर्जित पटेल ने संसदीय कमेटी के सामने ये कहा की अभी तक RBI को पता नहीं है की कितने नोट बैंको में जमा हुए हैं, और अभी तक नोटों की गिनती चल रही है , तो उनका ये बयान सुनकर मुहल्ले के चबूतरे पर बैठे लोगों का हँस हँस कर बुरा हाल हो गया। पता नहीं संसदीय समिति के सदस्यों का क्या हाल हुआ होगा। उसकी एक झलक तो समिति के सदस्य श्री दिग्विजय सिंह के उस सवाल से मिल सकती है जिसमे उसने श्री उर्जित पटेल से ये पूछा की मई 2019 तक तो RBI बता देगा न की कितना पैसा जमा हुआ है ?
                      उस दिन चबूतरे पर एक भक्त भी बैठा हुआ था और उसकी समझ में नहीं आ रहा था की आखिर इस बात पर लोग हँस क्यों रहे हैं। उसने ये कहा भी की इसमें उर्जित पटेल ने क्या गलत कह दिया , और की वो नोट गिनकर बता देगा। इस पर लोगों को एक बार हँसी का दौरा पड़ गया।
                      आज वो भक्त मेरे पास आया और बोला की उसे पचास हजार रुपयों की जरूरत है और मैं उसे ये रुपया उधार दे दूँ।
                      लेकिन मैं तो घर पर इतना रुपया नहीं रखता। मैंने कहा।
                      कोई बात नहीं , आप मुझे चैक दे दीजिये। आपके बैंक खाते में तो रुपया होगा ही। उसने कहा।
                      मैं आपको चैक नहीं दे सकता। क्योंकि मुझे पता नहीं  है की मेरे खाते में और बैंक में रुपया है की नहीं है। मैंने जवाब दिया।
                     कमाल करते हो भाई साहब, आपके खाते  में जो रुपया होगा वो तो आपकी पास बुक में जमा होगा ? उसने एतराज जताया।
                      लेकिन बैंक में कितना रुपया है और उसमे मेरा कितना है ये तो गिनने के बाद ही पता चलेगा ? मैंने जवाब दिया।
                      आप अजीब आदमी हैं। आपने बैंक में जो रुपया जमा करवाया होगा वो तो बैंक ने गिनकर ही लिया होगा और उसके हिसाब से ही आपके खाते में जमा किया होगा ? उसने फिर नाराजगी दिखाई।
                      भाई साहब, अब तक तो मैं भी यही समझता था। और ये भी समझता था की बैंक जो पैसा RBI में जमा करवाते हैं, RBI उसे गिनकर ही लेती है और उसके हिसाब से ही बैंक के खाते में जमा करती है। लेकिन पिछले आठ महीनो से सरकार और RBI , दोनों कह रहे हैं की उन्हें पता नहीं है की कितना पैसा जमा हुआ है और उसकी गिनती चल रही है। आपने उर्जित पटेल का बयान नहीं सुना ? मुझे लगता है की पहले वो RBI का पैसा गिनेंगे, फिर सभी बैंको का गिनेंगे, फिर उसे खातों से मिलाएंगे और उसके बाद मुझे पता चलेगा की मेरा कितना पैसा है। आप एक काम कीजिये, गिनती पूरी होने के बाद आइये और चैक ले जाइये।

Wednesday, May 17, 2017

जिस दिन सर्वोच्च न्यायालय किसी भी एक मौलिक अधिकार की सभी नागरिकों के लिए समान रूप से गारण्टी कर देगा, वो देश के न्यायायिक इतिहास की सबसे क्रांतिकारी घटना होगी।

               माननीय सर्वोच्च न्यायालय छुट्टियों के बावजूद तीन तलाक पर सुनवाई कर रहा है। इस सुनवाई के दौरान कई चीजों का जिक्र बार बार होता है। इनमे से एक है मूलभूत अधिकार। सबसे ख़ुशी की बात ये है की मुस्लिम महिलाओं के मूलभूत अधिकारों के लिए सबसे ज्यादा चिंतित कोई दिख रहा है तो वो सरकार है। सरकार के आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। अगर सरकारें मूलभूत अधिकारों पर सचमुच में इतनी चिंता दिखाने लगें तो अदालतों को तो काम ही आधा रह जाये। मूलभूत अधिकार तो नागरिकों को हासिल वो अधिकार हैं जिन्हे सरकारें गाहे बगाहे खत्म करने पर लगी रहती हैं और नागरिकों द्वारा मांग करने पर अदालतों को हस्तक्षेप करना पड़ता है। इस बार उल्टा हो रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे सरकार मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करना चाहती है और अदालत सहित कुछ तबके उसे रोक रहे हैं।
                कुछ लोग ये सवाल भी उठा रहे हैं की दूसरे मूलभूत अधिकारों के मामले में तो सरकार का वही रुख है। न्यूनतम मजदूरी का अधिकार संविधान के आर्टिकल 23 के तहत मूलभूत अधिकार है। लेकिन जितना उपेक्षित रवैया इसके प्रति सरकार और अदालतों का है उसे देखकर तो ये लगता ही नहीं है की ये मूलभूत अधिकार है। उसी तरह आदिवासियों के अधिकार हैं, दलितों के साथ होने वाले जुल्म भी समान मानवीय अधिकारों के अनुसार मूलभूत अधिकारों के तहत हैं। मुस्लिम महिलाओं के अलावा दूसरी महिलाओं के भी अधिकार हैं, लेकिन उन पर कोई बात नहीं होती है। अब तो लोगों को अदालतों के कुछ निर्णयों से आश्चर्य होने लगा है। सहारा-बिरला डायरी के मामले में उच्चतम न्यायालय ने जिन कागजात को सबूत मानने से इंकार कर दिया, अगर उसे सब पर लागु कर दिया जाये तो टैक्स चोरी के 90 % मामले एक झटके में समाप्त हो सकते हैं। सहारा -बिरला डायरी मामले में मोदीजी के खिलाफ मामला जिस तरह से ख़ारिज किया गया उस पर आम आदमी भी ये पूछ रहा है की क्या सुप्रीम कोर्ट को मोदीजी की दस्तखत की हुई रशीद चाहिए ?
               छत्तीसगढ़ के आदिवासियों पर होने वाले जुल्म के बारे में सारे सबूतों के बावजूद एक भी केस में किसी को सजा नहीं सुनाई गयी। यहां तक की सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले लोगों की हत्याएं हो गयी, महिलाएं गायब हो गयी, खुद सरकारी एजेंसी सीबीआई ने अपनी रिपोर्ट में पुलिस पर आदिवासियों के गांव जलाने , महिलाओं से बलात्कार करने और लोगों की हत्याओं के आरोपों को सही पाया, लेकिन अदालत  की तरफ से कोई ठोस आदेश जारी नहीं हुआ। गुजरात में फर्जी मुठभेड़ों के अभियुक्तों को, जिनको राज्य सरकार खुद फर्जी मुठभेड़ों का जिम्मेदार मानती है और कानून के अनुसार उनके खिलाफ एक पक्ष भी है, वही सरकार उन्ही लोगों को पद्दोन्ती देकर ऊँचे पदों पर नियुक्ति दे देती है, इससे बड़ा कानून का मजाक आखिर क्या हो सकता है। लेकिन अदालत इसे मूकदर्शक की तरह देखती रही।
                  सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के मामले में अदालत कभी भी उतनी ततपरता नहीं दिखाती जितनी जरूरत होती है। हालत ये है की किसी का बच्चा किडनैप हो जाये और सामने वाला फिरौती के लिए चौबीस घंटे का वक्त दे दे और पुलिस कार्यवाही करने से इंकार कर दे , और उसका परिवार पुलिस को आदेश देने के लिए ऊपरी अदालत में गुहार लगाए, तो अदालत सरकार को छह हफ्तों में जवाब दाखिल करने को कह देगी। इसलिए लोगों को लगता है की सरकार के साथ साथ अदालतों का रवैया भी गरीबों और अमीरों के मामले में अलग  अलग होता है। जो लोग मार्क्स को उद्दृत करके कहते हैं की आखिर अदालतें भी राजसत्ता का ही हिस्सा होती हैं, इस मामले में तो एकदम सही लगते हैं।
                   तीन तलाक के मामले में जो भी फैसला आये, लेकिन लोगों के मूलभूत अधिकारों की चिंता करने वाली सरकार और अदालतें जिस दिन संविधान प्रदत किसी भी एक ( केवल एक ) मूलभूत अधिकार को देश के सभी नागरिकों को  समान रूप से लागू करवा देंगी, वो दिन भारत के न्याय के इतिहास का सबसे क्रन्तिकारी होगा।

Monday, April 24, 2017

सुरक्षा बलों पर हमलों की खबरें -- राष्ट्रवादी और राष्ट्रद्रोही

खबरी --क्या सुरक्षा बलों पर हमले भी राष्ट्रवादी और राष्ट्रद्रोही होते हैं ?

गप्पी -- बिलकुल, आज ही देख लो। सुरक्षा बलों पर हमलों की तीन खबरें हैं। जिसमे दो हमले राष्ट्रद्रोही हैं और एक राष्ट्रवादी है। पहला हमला कश्मीर में पत्थर बाजों द्वारा सुरक्षा बलों पर किया गया जो देशद्रोही लोगों द्वारा किया गया हमला है। दूसरा हमला छत्तीसगढ़ में CRPF पर हुआ, ये भी देशद्रोहियों द्वारा किया गया हमला है। लेकिन एक हमला आगरा में पुलिस बल पर किया गया, ये हमला राष्ट्रवादी हमला था जो देश की संस्कृति की रक्षा के लिए किया गया था। उसी तरह जम्मू में खानाबदोश कबीले पर गौ रक्षकों द्वारा किया गया हमला तो शुद्ध राष्ट्रवादी हमला था। जब एक ही देश में एक जगह गाय का कत्ल संविधान और संस्कृति के खिलाफ और दूसरी जगह संविधान और संस्कृति के अनुसार हो सकता है तो हमला भी राष्ट्रवादी और राष्ट्रविरोधी क्यों नहीं हो सकता ?

Sunday, April 23, 2017

गाय का धंधा ( कहानी )

सुबह के पांच बजे थे। आंगन में बैठे एक अधेड़ उम्र के आदमी की नजरें दरवाजे पर लगी थी। ऐसा लगता था जैसे उसे बेसब्री से किसी के आने का इंतजार था। तभी गली में मोटर साइकिल के रुकने की आवाज आयी। अधेड़ की आँखों में चमक आ गयी। बाहर मोटर साइकिल पर तीन लड़के सवार थे। गले में गेरुआ रंग का दुपट्टा और हाथों में दंगाइयों जैसे हथियार लिए थे। उनमे से पीछे बैठा लड़का उतर कर घर के अंदर दाखिल हुआ। उसके उतरते ही मोटर साइकिल फर्राटे से आगे बढ़ गयी।
               उसके घर में घुसते ही अधेड़ तेजी से उसकी तरफ लपका। युवक ने जेब से एक पांच सौ रूपये का नोट निकाल कर अधेड़ के हाथ पर रख दिया।
               बस, पांच सौ ? अधेड़ ने युवक की तरह अविश्वास से देखा।
                हाँ, बस इतना ही मिला।  युवक ने जवाब दिया।
                क्यों इतना कम ? पहले पांच हजार तक मिलते थे, फिर दो हजार हुए और अब पांच सौ ? अब अधेड़ के चेहरे पर गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था।
               पहले हम नाके पर केवल दस लोग बैठते थे। अब बीस हो गए हैं। दूसरा अब हमारा नाका भी शहर के बाहर बाई पास से पहले कर दिया है। अब पशुओं की कुछ गाड़ियां बाई पास होकर निकल जाती हैं जिससे दूसरे नाके वाले उनसे उगाही करते हैं। अब केवल दो गाड़ियां आयी थी। उनसे सात हजार के हिसाब से पैसा लिया, जिसमे से दो हजार के हिसाब से पुलिस को चला गया। बाकि बचा दस हजार, तो बीस लोगों को पांच सौ ही हिस्से में आया।  युवक ने हिसाब समझा दिया।
                दूसरे दस लोगों को तुम्हे अपने साथ बैठाने की क्या जरूरत थी ? अधेड़ ने गुस्से से कहा।
               विधायक जी ने भेजे हैं। बोले अपने ही कार्यकर्ता हैं और आज से तुम्हारे साथ ही बैठेंगे। युवक ने सफाई दी।
                तुमने विधायक जी से कहा नहीं की हमारे हिस्से में क्या आएगा ? अधेड़ का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था।
                  कहा था, लेकिन बोले की एडजेस्ट करो।
              और तुमने ये गाड़ी का रेट घटाकर सात हजार करने की क्या जरूरत थी ? अधेड़ ने पूछा।
              पहले गाड़ी में गाय भी आती थी, तो हम दस हजार लेते थे। कोई मुसलमान होता था तो डरकर दस हजार भी दे देता था। अब मुसलमान गाड़ियां लेकर आने कम हो गए हैं। गाय की गाड़ियां तो सब जगमोहन की होती हैं जो सीधे लाइसेंस वाले बूचड़खाने में चली जाती हैं। पहले जगमोहन भी गाड़ी पर कुछ दे देता था। अब तो पुलिस वाले भी उसकी गाड़ी को नहीं रोकते। कहते हैं उसकी पहुंच ऊपर तक हो गयी है। युवक ने लाचारी दिखाई।
                लेकिन इलाके में आतंक बना कर मुसलमानो से ये काम हमने छुड़वाया। उसका फायदा जगमोहन अकेला कैसे उठा सकता है। मैं आज ही विधायक जी से बात करूंगा। अधेड़ गुस्से में बड़बड़ाता हुआ अंदर चला गया।
                 उसके बाद उसने नहा धोकर ढंग के कपड़े पहने और विधायक निवास पहुंच गया। वहां और भी बहुत से लोग आये हुए थे। लेकिन उसको जल्दी ही अंदर बुला लिया गया।
               आइए महाराज, कैसे आना हुआ। विधायक जी ने पुराने परिचित के हिसाब से उससे हाल पूछा।
                विधायक जी, बात ऐसी है की लड़के सारी रात नाके पर बैठते हैं फिर भी पांच सौ रुपल्ली भी हिस्से में नहीं आती। अधेड़ ने सीधे सीधे समस्या बयान कर दी।
                 अरे महाराज, गौ रक्षा का पुण्य भी तो मिलता है। विधायक जी ने हँसते हुए कहा।
                पुण्य तो हम घर रहकर भी कमा सकते थे। बात धंधे की है। इलाके में आतंक फैलाकर हमने मुसलमानो को पशुओं का व्यापार बंद करने पर मजबूर किया। और आज ये जगमोहन जैसे लोग अकेले उसका फायदा उठा रहे हैं। उसे तो गाय के पैसे भी नहीं देने पड़ते। वो अकेला सारा माल हजम कर रहा है। उससे कहिये की नाके पर भी गाड़ी के हिसाब से कुछ पैसे देना शुरू करे।  अधेड़ ने पूरी बात कह दी।
                देखिये, जगमोहन जी ऊपर बहुत पैसा देते हैं। उसे सारा पैसा नहीं मिलता। उसकी बात जाने दो। विधायक जी ने साफ साफ मना कर दिया।
                 लेकिन केवल पांच सौ रूपये रोज से क्या होता है। आप खुद समझिये। अधेड़ ने एतराज किया।
                 अरे महाराज, याद करो, पिछले साल आप ही इस लड़के के लिए पांच सात हजार की नौकरी मांगने आये थे तब मैंने ही इसे गौ रक्षकों में शामिल करवाया था। अब आपको लालच हो गया है। विधायक जी भी कोई कच्ची गोलियां नहीं खेले थे।
                लेकिन जगमोहन ----
                जगमोहन जी की बात मत करो। विधायक जी ने अधेड़ की बात बीच में ही काटी। फिर कभी मौका आएगा तो किसी दंगे में अच्छा इलाका दिलवा देंगे। पुरे साल का खर्चा निकल जायेगा । अब लड़के को शान्ती से काम करने दो।
                  अधेड़ बड़बड़ाता हुआ बाहर निकल आया। ये साला जगमोहन, साले ने गोशाला के नाम पर सरकारी जमीन पर कब्जा कर लिया। लाखों रूपये चंदा उगाह लेता है और फिर गायों को ट्रक में लदवा देता है। जिन लोगों ने सारे काम में मदद की, उनकी जात भी नहीं पूछता। साला गाय का धंधा करता है। छिः


              

Wednesday, April 19, 2017

महिला आरक्षण बिल -- राजनैतिक दोगलेपन का प्रतीक

                 क्या किसी ने पिछले तीन साल में महिला आरक्षण बिल का जिक्र सुना है ? उससे पहले ये लगभग परम्परा सी बन गयी थी की जब भी संसद का कोई सत्र समाप्त होता, श्रीमती सुषमा स्वराज बाकि दलों की महिला सांसदों के साथ फोटों खिंचवाती थी और महिला आरक्षण बिल को पास न करने को लेकर सरकार को कोसती थी। लेकिन जब से बीजेपी की सरकार आयी है और सुषमा जी मंत्री बनी हैं, उन्होंने महिला आरक्षण बिल का नाम भी नहीं लिया।
                 इस बात का जिक्र इसलिए हो रहा है की आजकल बीजेपी के नेताओं का महिलाओं की दुर्दशा को देखकर कलेजा फटा जा रहा है। तीन तलाक का मुद्दा तो ऐसा हो गया है जैसे देश में ये केवल एकमात्र समस्या है। वो अलग बात है की तीन तलाक से परेशान महिलाओं की तादाद वृन्दावन में भीख मांग रही हिन्दू विधवाओं से भी कम होगी, जो तीन तलाक पर छाती पीटने वाले मठाधीशों की विकृत परम्पराओं की वजह से भीख मांग रही हैं। लेकिन जिनके लिए हर मुद्दा लोगों को लड़ाकर राजनीती की रोटियां सेकने के सिवाय कुछ नहीं होता, वो इस पर क्यों बोलेंगे।
                 महिलाओं के अधिकारों पर आंसू बहाने  वाले बीजेपी के नेताओं को और योगीजी को हमारी तरफ से एक चुनौती है की जब उनके पास बीजेपी नेताओं और मंत्रियों सम्पत्ति की लिस्ट आ जाये तो वो उनके परिवार की लिंग अनुपात की लिस्ट भी मांग लें, तो ये भी देश के सामने आ जाये की गर्भ में लड़कियों का कत्ल करने वाले लोगों में कौन कौन शामिल हैं।
                    खैर, मुद्दा महिला आरक्षण बिल का है। ये बिल राज्य सभा में पास हो चुका है। और इसे केवल लोकसभा से पास करवाना बाकी है जहां बीजेपी का बहुमत है। फिर क्या कारण है की बीजेपी सरकार इसे पास नहीं करवा रही। ये बिल बीजेपी के महिलाओं के अधिकारों को लेकर उसके दोगलेपन का बेहतरीन उदाहरण है। जब उसे कोई बिल पास नहीं करवाना होता है तो वो आम सहमति का बहाना करती है और जहां सही में आम सहमति की जरूरत होती है तो उसे जबरदस्ती लागु करने की कोशिश करती है। भूमि अधिग्रहण बिल इसका ताजा उदाहरण है।

Monday, April 17, 2017

कश्मीर को खोने की जिम्मेदारी कौन लेगा ?

                काश्मीर के लोगों का भारत से भावनात्मक जुड़ाव खत्म हो चूका है। अब केवल भारत के नक्शे में कश्मीर भारत का हिस्सा बचा है। आज हालत ये है की सेना को खुद की रक्षा के लिए ह्यूमन शील्ड का इस्तेमाल करना पड़ता है। अलगाव इतना गहरा हो गया है एक तरफ सेना द्वारा लोगों से जबरदस्ती पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगवाने के विडिओ वायरल हो रहे हैं तो दूसरी तरह आतंकवादी बंदूक की नोक पर लोगों से हिंदुस्तान मुर्दाबाद के नारे लगवा रहे हैं।
                   और ये हालत कितने दिन में हो गयी। पिछले तीन साल से केंद्र और राज्य दोनों में बीजेपी की सरकार है। 2014 में जब लोकसभा चुनाव हुए थे तो कश्मीर में करीब 64 % वोट पड़े थे जो बाकि देश के प्रतिशत के लगभग बराबर थे। तब यूरोप और अमेरिका के अख़बारों ने खबर छापी थी की कश्मीर के लोगों ने भारत और पाकिस्तान पर अपनी पसंद स्पष्ट कर दी है। अभी हुए चुनाव में श्रीनगर की सीट पर कुल 7 % वोट पड़े हैं। जिन 38 बूथों पर दुबारा चुनाव करवाया गया वहां केवल 2 % वोट पड़े हैं और 27 बूथों पर एक भी वोट नहीं पड़ा। पता नहीं अनुपम खेर और अशोक पंडित जैसे महान क्रन्तिकारी देशभक्त किस बिल में घुसे हुए थे ? उससे पहले नरेंद्र मोदी कहते थे की कश्मीर की समस्या कश्मीरियों के कारण नहीं बल्कि दिल्ली में बैठी सरकार की गलत नीतियों के कारण है। अब अगर बीजेपी राज्य सरकार में हिस्सेदार नहीं होती तो वो हालात की खराबी की जिम्मेदारी राज्य सरकार पर डाल सकते थे। लेकिन अब उन्हें इसकी जिम्मेदारी डालने के लिए नेहरू युग तक जाना होगा।
                   आज कश्मीर के लोग आपके साथ नहीं हैं। आप को ख़ुशी हो सकती है की जमीनी तोर पर कश्मीर अभी भी भारत का हिस्सा है। लेकिन अब आप वहां पहलगाम और डलहौजी में सैर नहीं कर सकते, डल झील में शिकारे का आनंद नहीं ले सकते और कश्मीर में फिल्म की शूटिंग नहीं कर सकते। तो काश्मीर का नक्शा भारत में है या नहीं उससे क्या फर्क पड़ता है ?
                   मोदी सरकार की कश्मीर नीति पर जानकारों ने सवाल उठाये थे। लेकिन उस पर इस सरकार के भक्तों ने गालियों की बौछार कर दी। महिला पत्रकारों को रंडी कहा गया। दूसरे लोगों को पाकिस्तान का दलाल घोषित कर दिया गया। लेकिन अब क्या वो लोग इस हालात की जिम्मेदारी लेंगे। क्या ये तथाकथित राष्ट्रवादी कश्मीर में जाने की हिम्मत दिखाएंगे।
                     ये सरकार एक और वायदे के साथ सत्ता में आयी थी। वो था कश्मीरी पंडितों को वापिस कश्मीर में बसाने का वादा। क्या अब भी किसी को लगता है की कश्मीरी पंडितों को वापिस घाटी में बसाया जा सकता है। बसाने का सवाल तो दूर, आप उनकी वोट नहीं डलवा सकते। चार लाख कश्मीरी पंडित, जो सालों से अपने ही देश में शरणार्थी बन गए हैं, आपने उनके साथ धोखाधड़ी की है। आपने उनके वापिस जाने की संभावनाओं पर पानी फेर दिया है। उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया है।
                    सवाल अब भी अपनी जगह है। क्या कश्मीर को खोने की जिम्मेदारी बीजेपी, उसके समर्थक और सोशल मीडिया पर बैठे उसके बुद्धिहीन चापलूस लेंगे।

Saturday, April 15, 2017

व्यंग -- भारत में रोड शो का राजनैतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और ऐतिहासिक महत्व।

                  भारत में आजकल राजनीती में रोड शो का बहुत महत्व है। सही तरीके से कहा जाये तो कुछ लोगों की तो राजनीती चल ही रोड शो के कारण रही है। वैसे रोड शो सबसे आसान काम होता है। इसमें आपको केवल खड़े होकर हाथ हिलाना होता है। राजनीती में आने वाले ज्यादातर लोग वो होते हैं जिन्हे स्कूल में हाथ ऊपर करके खड़े रहने का खासा अभ्यास होता है। इसमें आयोजकों को भी आसानी रहती है। लोग अगर कम हों तो पहले वाले लोगों को आगे पहुंचाया जा सकता है। बाकी तो बस हाथ हिलाना है। न किसी मुद्दे पर अपनी राय स्पष्ट करनी होती है और न किसी सवाल का जवाब देना होता है। आप हाथ हिलाकर चले जाइये, बाकी का काम मीडिया कर देगा।
                  वैसे रोड शो का मतलब होता है रोड के ऊपर शो करना, या फिर रोड को ही शो करना। अभी उत्तर प्रदेश के चुनाव में अखिलेश एक तरफ रोड के ऊपर शो कर रहे थे और दूसरी तरफ आगरा लखनऊ एक्सप्रेस वे नाम के रोड को शो कर रहे थे। अब हमारे प्रधानमंत्री लगभग हररोज रोड के ऊपर शो करते रहते हैं। अगर वो दो चार दिन रोड शो न करें तो उनके हाथ में दर्द होने लगता है।
                   रोड के ऊपर होने वाले शो भी अलग अलग तरह से होने लगे हैं। कुछ दिन पहले तमिलनाडु के किसानो ने ठीक प्रधानमंत्री कार्यालय के सामने सारे कपड़े उतार कर शो कर दिया। परन्तु प्रधानमंत्री और उनकी सरकार को ये शो पसंद नहीं आया इसलिए उनके शो को कोई देखने नहीं आया। इस तरह के शो पिछले दिनों सड़कों पर बहुत हुए हैं। जैसे कहीं किसान सड़क पर सब्जी डाल रहे हैं, कहीं दूध बिखेर रहे हैं। लेकिन किसानो के रोड शो भी कोई शो होते हैं ? मुझे लगता है किसी दिन किसान इकट्ठे होकर रोड पर सरकार  के कपड़े उतारने का शो न कर दें।
                     लेकिन जिस तरह के प्रभावशाली शो करने की महारत हमारी पुलिस को है उसका कोई सानी नहीं है। उसका मुकाबला केवल सेना ही कर सकती है। अभी हाल ही में हमारी सेना ने कश्मीर में एक आदमी को जीप के आगे बांधकर बहुत ही कामयाब शो किया था। इस शो के बाद पूरी दुनिया को हमारी कश्मीर नीति की गहराई समझ में आ गयी। जो चीज दुनिया को पाकिस्तान लगातार गला फाड़कर नहीं समझा पा रहा था वो हमारी सेना के एक रोड शो ने समझा दिया। जबसे हमारे प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी ने इसराइल को अपना सबसे भरोसेमंद साथी घोषित किया है, हमारी सेना उसके विडिओ देखकर रणनीति बना रही है। कुछ दिन बाद दुनिया को ये फर्क करना मुश्किल हो जायेगा की अमुक रोड शो कश्मीर का है या फिलिस्तीन का।
                         हमारे यहां कुछ सांस्कृतिक किस्म के रोड शो भी होते हैं। इस तरह के रोड शो अभी योगी जी के आशीर्वाद से उत्तर प्रदेश की सड़कों पर हो रहे हैं। जिसमे कुछ ऐसे लोग, जिन्हे कोई शरीफ आदमी घर के अंदर बैठाना भी खतरनाक समझता है, मिलकर आजकल बेटियों को बचा रहे हैं। ये लड़कियों को गालियां देते हैं, उनके साथ रोड पर मारपीट करते हैं ताकि उन्हें बचाया जा सके। एक दो बार पिट जाएँगी तो अपने आप घर से बाहर निकलना बंद कर देंगी। ये एक आजमाया हुआ और कामयाब तरीका है जो इन्होने तालिबान से लिया है। तालिबान के साथ इनके वैचारिक और सांस्कृतिक संबंध हैं सो उसके आजमाए हुए तरीकों का इस्तेमाल करना इनका हक बनता है।

Friday, April 14, 2017

कहीं भृष्टाचार में कमी केजरीवाल की हार का कारण तो नहीं ?

                      केजरीवाल की सरकार आने के बाद दिल्ली में  भृष्टाचार में कमी आयी है ये बात तो उसके दुश्मन भी स्वीकार करते हैं। यहां तक की अभी अभी आये ताजा आंकड़े जो एक तरफ केंद्र में भृष्टाचार की शिकायतों में बढ़ोतरी दिखा रहे हैं तो दूसरी तरफ दिल्ली में इन शिकायतों में तीन चौथाई की कमी दिखा रहे हैं। उसके बावजूद दिल्ली विधानसभा के उपचुनाव में AAP की इतनी बुरी हार हुई।
                     उसके बाद मेरी दिल्ली के कई लोगों से बात हुई। उनमे से कई लोग पहले केजरीवाल के साथ थे और अब उनसे बहुत नाराज हैं। जब उनकी नाराजगी के कारण जानने की कोशिश की तो बहुत ही अजीब सी बात सामने आयी। हर आदमी ने कहा की केजरीवाल ने अपने वायदे पुरे नहीं किये। जब उनसे  पूछा गया की कोनसा वायदा, तो वो केवल फ्री वाई फाई के अलावा कुछ नहीं बता पाए। मैंने जब उनसे सरकारी स्कूलों पर किये गए कामो के बारे में पूछा तो उनमे से कईयों का जवाब था, हाँ काम हुआ है और बहुत काम हुआ है, लेकिन हमे क्या फायदा? हम तो अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाते नहीं। जब मैंने मोहल्ला क्लिनिक इत्यादि के बारे में पूछा तो भी उनका वही जवाब था, हाँ काम हुआ है लेकिन हम तो कभी इनमे जाते नहीं। मैं हैरान था। अजीब तर्क हैं। मैंने उनसे भृष्टाचार के बारे में पूछा तो उन्होंने जो बताया वो इस प्रकार है ," हाँ भृष्टाचार कम हो गया है। और इसकी वजह से परेशानी बढ़ गयी है। कोई अधिकारी न पैसे लेने को तैयार है और न पहले काम करने को तैयार है। अब लाइन में लगने की फुरसत किसके पास है ? पहले पैसे देते थे और काम हो जाता था। "
                   लेकिन केजरीवाल तो भृष्टाचार के मुद्दे को ही लेकर आया था। तब तुमने उसका समर्थन क्यों किया था ? मैंने पूछा तो उनका जवाब था की हमे थोड़ा न पता था की इस तरह का झंझट खड़ा हो जायेगा।
                     अब मुझे लगता है की भृष्टाचार का कम होना ही केजरीवाल की हार का कारण बन जायेगा। केजरीवाल के पास कोई भावनात्मक मुद्दा तो है नहीं। और अपनी वर्गीय खासियत के कारण मध्यम वर्ग एक नंबर का अवसरवादी होता है। उसे न तो पूर्णराज्य के दर्जे से कुछ लेना देना है और न ही गरीब लोगों के लिए किये कार्यों से कुछ लेना देना है। उसे केवल इस बात से मतलब है की उसकी जेब में क्या आ रहा है। या फिर वो चालाक खिलाडियों के भावनात्मक मुद्दों के साथ चल सकता है। ये दोनों चीजें न तो केजरीवाल के पास हैं और न कम्युनिस्टों के पास, इसलिए दोनों हार गए।

Monday, April 10, 2017

केजरीवाल पर फिजूलखर्ची के आरोप, जो भाजपा नहीं उठा रही।

खबरी - शुंगलू कमेटी की रिपोर्ट, LG के आदेश और बीजेपी के आरोप क्या साबित करते हैं ?

गप्पी -  बाकि सारी चीजों के अलावा एक बात बहुत हैरान करने वाली है। केजरीवाल द्वारा जनता के पैसे के दुरूपयोग का एक बहुत ही पुख्ता उदाहरण सामने है लेकिन न तो उसका जिक्र किसी कमेटी की रिपोर्ट में है, न उस पर LG को एतराज है और न ही भाजपा उसको मुद्दा बना रही है।
               वो फिजूलखर्ची का उदाहरण है, क़ानूनी रूप से विपक्ष के नेता के पद के लायक सीटें न होने के बावजूद केजरीवाल सरकार ने बीजेपी के विधायक विजेंद्र गुप्ता को न केवल विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दी, बल्कि उसे एक कैबिनेट मंत्री के बराबर सुविधाएं भी प्रदान की। जो जनता के पैसे की खुली लूट है। बीजेपी को चाहिए की वो इस मुद्दे को जोर शोर से उठाये और केजरीवाल सरकार को फैसला बदलने पर मजबूर करे।


Saturday, April 8, 2017

गौ - वंश पर अत्याचार की जिम्मेदारी और उसका मतलब।

                  भारत में आज सबसे बड़ा मुद्दा गौ वंश पर अत्याचार और गौ रक्षा बना दिया गया है। जाहिर है की ये एक ऐसा मुद्दा है जिसके लिए सरकार को जिम्मेदार नहीं माना जाता। अब तक लोगों में जो मुद्दे होते थे उनके लिए सरकार जिम्मेदार होती थी, चाहे वो बेरोजगारी हो, महंगाई हो, किसानो की हालत हो या दूसरी समस्याएं हों। सरकार ने बड़ी चालाकी से अपनी जिम्मेदारी से ध्यान हटाने के लिए उन मुद्दों को आगे कर दिया जिनकी जिम्मेदारी सीधे तौर पर उसकी नहीं है।
                   खैर, हमारा आज का विषय ये है की गौ वंश पर अत्याचार का मतलब आखिर है क्या ? वैसे तो ये स्वयंसिद्ध है की गाय एक पशु है और उसके बारे में जो भी बात हो उसके लिए इस संदर्भ को याद रखा जाना चाहिए। इससे बात अगर शुरू करेंगे तो वहां से शुरू होगी, जहां से पशुपालन की शुरुआत हुई। फिर ये बात आएगी की विश्व में पशुपालन की शुरुआत मांस के लिए हुई थी और दूध का उपयोग बहुत बाद में शुरू हुआ। ऐतिहासिक खुदाईओं में जो चित्र मिलते हैं, खासकर भारत में, उसमे गाय के चित्र नहीं हैं बल्कि बैल के चित्र हैं जो कम से कम दूध का प्रतीक नहीं है। लेकिन हम बात गाय पर और गौ वंश पर होने वाले अत्याचार की कर रहे हैं।
                  भारत में आज बड़ी तादाद में ऐसे लोग हैं जिन्होंने गाय को माता मानना शुरू कर दिया है। इस माता मानने के सवाल को राजनैतिक रूप से भुनाने का मामला खड़ा हो गया है। इसलिए हम गौ वंश पर अत्याचार को इसी संदर्भ में देखना चाहते हैं। इस पर मेरा जो सवाल है वो ये है। -
                  एक आदमी एक गाय पालता है और उसे खूंटे से बांधकर रखता है। जब वो बछड़ा देती है तो उसके बछड़े को दूध पीने से रोकता है और उसे खींचकर दूर खूंटे से बांध देता है और उसके हिस्से का दूध खुद हड़प कर या तो पी लेता है या बेच देता है। उसके बाद जब बछड़ा जवान हो जाता है तो उसकी नाक में छेद करके रस्सा डाल देता है और उसको खस्सी ( बधिया ) कर देता है। फिर उसके कंधे पर बोझा रखकर सारी जिंदगी उससे काम लेता है और जब वो बूढ़ा हो जाता है तो उसका रस्सा निकाल कर मारे मारे फिरने के लिए छोड़ देता है। अब ये कौनसा माँ बेटे और भाई भाई का संबंध है। पहली नजर में ही ये हद दर्जे की क्रूरता दिखाई देती है बशर्ते की इसे गाय को माता मानने के संदर्भ में देखा जाये। अगर इसे केवल पशु होने के संदर्भ में देखा जाये तो सब सही है और उसके साथ भी वही हो रहा है जो भैंस, घोड़े, और दूसरे पशुओं के साथ हो रहा है। इसलिए गाय को माता मानने वालों को इस अत्याचार का हिसाब देना चाहिए और दूसरों पर आरोप लगाने से और हमला करने से पहले खुद को सुधार लेना चाहिए।

Monday, March 20, 2017

राजनीति के मूढ़मतियों का पश्चाताप।

                  राजनीति में कुछ मूढमति होते हैं। वैसे तो मूढमति हर जगह होते हैं लेकिन लोकतंत्र में राजनीती के मूढ़मतियों की एक खास जगह होती है। ज्यादातर लोकतंत्र इन्ही के सहारे जिन्दा रहते हैं। अगर ये न हों तो चुनाव जीतना तो दूर, चुनाव करवाना भी मुश्किल हो जाये। इनकी एक पहचान है। इन्हें मीडिया के सहारे कुछ चीजें समझा दी जाती हैं। फिर कोई दूसरा लाख सिर पटक ले ये टस से मस नही होते। आप कितने ही तर्क, कितने ही उदाहरण दे लो, ये अपनी जगह से नही हिलते। इन्ही में से विकास करके कुछ लोग भक्त की श्रेणी में पहुंच जाते हैं और वापिस आने के सारे रास्ते बन्द कर लेते हैं।
                    इन मूढ़मतियों की एक खाशियत ये भी होती है की ये अपने किये पर पछताते जरूर हैं। जैसे किसी पार्टी को वोट देंगे, और फिर कहते फिरेंगे की मैं तो इसे वोट देकर पछता रहा हूँ। कोई कोई तो वोट डालकर बूथ से बाहर निकलने से पहले ही पछताना शुरू कर देते हैं। कुछ लोग पछताने में दो चार दिन का समय लेते हैं।
                    अब एक मूढमति मेरे मुहल्ले में रहते हैं। कल आ धमके घर पर। बोले की मैं तो बीजेपी को वोट देकर पछता रहा हूँ। मैंने पूछा क्यों तो बोले की उन्होंने योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बना दिया। अरे, इससे तो अखिलेश लाख दर्जा अच्छा था।
                     " तो आप क्या चाहते थे की बीजेपी अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाये ?" मैंने पूछा।
                      " लेकिन किसी दूसरे को बनाया जा सकता था। अगर मुझे पता होता की ये योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाएंगे तो मैं कभी इन्हें वोट नही देता। " उसने जोर देकर कहा।
                     " योगी आदित्यनाथ बीजेपी का ही सदस्य है कोई बाहर से तो लाये नही हैं। और फिर किसी दूसरे से तुम्हारा मतलब किस्से है, संगीत सोम से है, साध्वी प्राची से है, विनय कटियार से है ? आखिर तुम किसे बनाना चाहते थे ?" मैंने पूछा।
                     " इनके अलावा भी लोग हैं। किसी साफ सुथरी छवि वाले, नरम स्वभाव के, पढ़े लिखे और सबको साथ लेकर चलने वाले आदमी को बना सकते थे। " उसने जवाब दिया।
                     ' अगर उनके पास ऐसा कोई आदमी होता तो वो पहले ही उसे मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित नही कर देते। जब उन्होंने उम्मीदवार घोषित नही किया तो इसका मतलब है की वो किसी को भी बना सकते हैं। " मैंने कहा।
                     ' लेकिन समाज को लड़ाने भिड़ाने वाला आदमी अच्छा नही होता है। " उसने निराशा जाहिर की।
                    " तो तुम पहले पूछ लेते की भाई किसको बनाओगे ? या फिर कोई दूसरी पार्टी ढूंढ लेते। " मैंने कहा।
                     " इसीलिए तो पछता रहा हूँ। वैसे हमने 325 लोग चुने थे। उन्होंने एक मुख्यमंत्री और दो उप मुख्यमंत्री बनाये, लेकिन चुने हुए लोगों में से एक भी नही है। ये तो वही बात हुई की तुम सैम्पल कुछ और दिखाओ और पैसे लेने के बाद माल कोई दूसरा पकड़ा दो। " उसने उदाहरण के साथ अपनी बात कह दी।
                   अब ये पछता रहा है। पिछली बार भी पछता रहा था। कह रहा था की मैंने तो मुलायम सिंह के लिए वोट दिया था और इन्होंने अखिलेश को बना दिया। ये तो राजशाही हो गयी। तब भी मैंने पूछा था की जो आदमी पंचायत का मुखिया भी अपने घर से बाहर नही बनाता, उससे तुम क्या उम्मीद कर रहे थे। खैर ये पछताता रहा। अब फिर पछता रहा है।