Sunday, August 20, 2017

गोरखपुर में हुई बच्चों की मौत के लिए राहुल गाँधी जिम्मेदार

                    गोरखपुर में ऑक्सीजन के बिना हुई बच्चों की मौत के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है ? ये एक ऐसा सवाल बना दिया गया जैसे की ये बहुत बड़ा रहस्य हो। गनीमत है की केंद्रीय गृहमंत्रालय ने FBI को जाँच के लिए नहीं बुलाया। पूरी बीजेपी और उसके चैनल इस पर थूक बिलो रहे हैं और हाथ झाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। इसी बीच में कल योगीजी का बयान आया की इसके लिए पिछली सरकार जिम्मेदार है। देश को उनसे ऐसी ही उम्मीद थी। वैसे भी ऐसे लोगों को जिन्होंने मुख्यमंत्री चुना है, उन्होंने कोई विज्ञानं की खोज के लिए थोड़ा न चुना है। इसी तरह की बातें करने के लिए चुना है। किसी पढ़े लिखे को चुन लेते तो उसको ऐसा कहने में दिक्क्त हो सकती थी। इसलिए बीजेपी ने हरियाणा से उत्तरप्रदेश तक हर जगह ऐसे लोगों को ही बिठाया है ताकि कल कोई असुविधा न हो।
                     कल हमारे मुहल्ले के चबूतरे पर इस पर गहन विचार विमर्श हुआ। उसमे व्यक्त किये  गए विचार इस प्रकार हैं। -
                      एक बुजुर्ग ने कहा की भाई जिसे ऑक्सीजन का प्रबंध करना था और जिस सरकार को निगरानी करनी थी उनकी जिम्मेदारी बनती है। बस फिर क्या था। भक्तों में कोहराम मच गया। एक भक्त ने कहा की ये बुड्ढा तो पुराना कांग्रेसी है इसलिए ऐसा कह रहा है। ये बात कोई भी टीवी चैनल नहीं कह रहा।
                     दूसरे भक्त ने हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा की कोई डॉक्टर कफील है जो इसके लिए जिम्मेदार है। उस पर पहले रेप का आरोप लगा है।
                       एक दूसरे आदमी ने कहा की ये कोई छेड़खानी का मामला है क्या जो पिछले रेप का उदाहरण दे रहे हो।
                  इस पर एक भक्त चिल्लाया, ये देशद्रोही है , मैंने इसे पाकिस्तान और इंग्लैंड के मैच में पाकिस्तान की टीम का समर्थन करते देखा है।
                  तभी एक आचार्यजी ने वहां प्रवेश किया जो सीधे संघ के बौद्धिक से पधार रहे थे। भक्तों ने उसके लिए अतिरिक्त सम्मान का परिचय देते हुए उनको इस विषय पर विशेष कमेंट करने के लिए कहा।
                    आचार्यजी ने इधर उधर देखा और कहा , आज संघ के बौद्धिक में इस विषय पर गहन विचार विमर्श हुआ है। इसके सभी पहलुओं की बारीकी से  छानबीन करने के बाद ये निष्कर्ष निकला है। -
                      जैसे योगी जी ने कहा की इसके लिए पिछली सरकार जिम्मेदार है, उससे संघ सहमत है। लेकिन पिछली सरकार से मतलब अखिलेश की सरकार से नहीं है। इसकी जड़ें काफी गहरी हैं। उसके लिए हमे उस आंदोलन तक जाना होगा जिसे देश के कुछ लोग आजादी का आंदोलन कहते हैं। हम उसे आजादी का आंदोलन नहीं कहते, और इसीलिए हमने उसमे हिस्सा नहीं लिया था। हम अंग्रेजो की उस बात से सहमत थे की हिंदुस्तानिओं को शासन करना नहीं आता। और अंग्रेज इस देश को सभ्य बनाने के लिए आये हैं। लेकिन उस समय की कांग्रेस और दूसरे लोगों ने मिलकर अंग्रेजों की इस योजना पर पानी फेर दिया। उस समय तक केवल संघ से जुड़े लोग ही सभ्य हो पाए थे और बाकी सारा देश असभ्य ही था। लेकिन जवाहरलाल नेहरू के सत्ता के लालच ने  अंग्रेजों को अपना सभ्यता का मिशन बीच में ही छोड़कर वापिस जाने के लिए मजबूर कर दिया। वरना अब तक अंग्रेज राज कर रहे होते और हम इस घटना की जिम्मेदारी उन पर डाल सकते थे। लेकिन नेहरू गाँधी परिवार और कांग्रेस के सत्ता के लालच के चलते ऐसा नहीं हो पाया। इसलिए संघ इस घटना के लिए राहुल गाँधी को जिम्मेदार मानता है और उससे देश से माफ़ी मांगने की मांग करता है।
                      भक्तों ने तालियां बजाई और आचार्यजी देश की बाकी समस्याओं पर प्रवचन देने लगे।

Monday, July 31, 2017

बिहार, भाजपा और राष्ट्रवादी भृष्टाचार

                      बिहार में सरकार बदलते ही कई नई चीजें और परिभाषाएँ सामने आयी। जैसे बिहार के पिछले चुनाव में नरेंद्र मोदी ने नितीश कुमार के घोटालों की एक लम्बी लिस्ट जारी की थी। जिसमे करीब 23 घोटाले शामिल थे। जैसे ही नितीश ने बीजेपी के पाले में जाकर सरकार बनाई, मोदीजी ने उसके स्वागत में ट्वीट करते हुए कहा की भृष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में नितीश का स्वागत है। इसका एक तो मतलब ये हुआ की भृष्टाचार का घोटालों से कोई लेना देना नहीं है। भृष्टाचार का लेना देना केवल इस बात से है की आदमी अपनी पार्टी में है या विपक्ष का है। जैसे अभी गुजरात में है। जो जो विधायक बीजेपी में शामिल हो जायेंगे वो भृष्टाचारी नहीं रहेंगे और जो नहीं होंगे वो भृष्टाचारी रहेंगे। बीजेपी में भृष्टाचार की यह परिभाषा सुखराम के जमाने से चली आ रही है।
                     मैं अभी अभी अपने मुहल्ले की किराने की दुकान के सामने से गुजरा तो दुकानदार ने मुझे आवाज लगाई की भाई साहब देखो बिहार में फिर से सुशासन आ गया है। मैंने पूछा की नितीश तो वही है, फिर ये सुशासन कौन है क्या सुशील मोदी का नाम है सुशासन ?
                      देखिये भाई साहब, नितीश जब तक लालू के साथ थे तभी तक भृष्ट थे वरना बिहार में तो लोग उनको सुशासन बाबू के नाम से पुकारते हैं। उन्होंने तेजस्वी यादव से पीछा छुड़ा लिया है। उस पर 120 बी का मुकदमा था।
                     120 बी का मुकदमा तो सुशील मोदी पर भी है। उल्टा दो चार धाराएं ज्यादा ही हैं। फिर बदला क्या ? मैंने पूछा।
                      वो 120 बी दूसरी तरह का है। राजनैतिक बदले की भावना से लगाया हुआ है। उसने कहा।
                     ठीक यही राजनैतिक बदले की बात तो तेजस्वी भी कह रहा है। चलो छोडो। ये बताओ की देश से भृष्टाचार दूर करने के लिए सरकार क्या कर रही है ? मैंने पूछा।
                     बहुत काम कर रही है। अभी अभी लालू यादव पर केस दर्ज किया है।
                      भृष्टाचार के बहुत से केस सीबीआई के पास पेंडिंग हैं। सीबीआई क्या कर रही है ?
                     सीबीआई बहुत काम कर रही है। अभी अभी उसने लालू यादव के कितने ठिकानो पर रेड की है। उसने जवाब दिया।
                       आर्थिक भृष्टाचार के बहुत से मामले ED के पास भी पेंडिंग हैं। ED क्या कर रही है। मैंने पूछा।
                        अभी दो दिन पहले ही ED ने लालू यादव के खिलाफ केस दर्ज किया है। आपने पढ़ा नहीं ? उसने मुझसे पूछा।
                     थोड़े दिन पहले प्रधानमंत्री ने चार्टर्ड अकाउंटेंटस के सम्मेलन में चेतावनी दी थी की जो भी CA किसी को गलत तरिके से टैक्स बचाने में मदद करेगा, उसके खिलाफ कार्यवाही की जाएगी। क्या हुआ ? मैंने पूछा।
                      लगता आपने अख़बार पढ़ना छोड़ दिया है। अभी अभी लालू यादव की लड़की मीसा भारती  के CA के यहां रेड हुई है  आपको पता होना चाहिए। उसने जवाब दिया।
                       इससे तो ऐसा लगता है की अगर लालू यादव और उसका परिवार देश छोड़ दे तो भारत से भृष्टाचार का खात्मा हो सकता है ? मैंने पूछा।
                         नहीं, नहीं, भाई साहब, देश छोड़ देने से भृष्टाचार थोड़ा न खत्म हो सकता है। उसके लिए तो लालू यादव को राष्ट्रवादी होना पड़ेगा। उसने कहा।
                         उसके लिए क्या करना होगा ? मैंने पूछा।
                          बीजेपी में शामिल होना पड़ेगा। उसने कहा और अपने काम में लग गया।
 

Saturday, July 29, 2017

नितीश कुमार और आकाश में घूमती हुई अंतरआत्माएँ

                 भारत के आकाश में बहुत सी  अंतरआत्माएँ घूम रही थी। अलग अलग वेशभूषायें और अलग अलग अंदाज में। अचानक दो  अंतरआत्माएँ आमने सामने आ गयी। एक अंतरात्मा नई नवेली दुल्हन के वेश में थी और दूसरी अंतरात्मा विधवा के वेश में थी। दुल्हन के वेश वाली अंतरात्मा को अपने सामने अचानक आ गयी विधवा को देखकर अच्छा नहीं लगा। वह उस पर जोर से चिल्लाई, ' दिखाई नहीं देता, क्या टककर मारने का इरादा है। "
               "माफ़ करना बहन, मन दुखी था इसलिए ध्यान नहीं रहा। वैसे तुम कौन हो, पहले तो तुम्हे कभी देखा नहीं ?" विधवा अंतरात्मा ने पूछा।
                " मैं नितीश कुमार की अंतरात्मा हूँ, अभी दो दिन पहले ही हमारी शादी हुई है बिहार के हित  में। " दुल्हन अंतरात्मा ने इतराते  जवाब दिया।
                  विधवा अंतरात्मा के होठों पर एक हल्की सी मुस्कान आयी। बोली,' जाओ बहन, मैं तो तुम्हे सदासुहागण रहने का आशीर्वाद भी नहीं दे सकती। "
                  दुल्हन अंतरात्मा अचानक पलटी। उसने विधवा अंतरात्मा के कंधे पर हाथ रखकर कहा, " तुमने ऐसा क्यों कहा और तुम हो कौन ? "
                 " मैं भी नितीश कुमार की अंतरात्मा ही हूँ। अभी बीस महीने पहले हमारी शादी हुई थी। फेरों के वक्त नितीश कुमार ने मुझे वचन दिया था की मिटटी में मिल जायेंगे लेकिन बीजेपी के साथ नहीं जायेंगे। अभी कुछ दिन पहले तक भी वो संघमुक्त भारत बनाने के लिए घर से निकले थे और थोड़ी देर के बाद कुछ रोती हुई अंतरआत्मायें मेरे घर आयी और मुझे बताया की मैं विधवा गयी। " उसकी आँखों से आँसू टपकने लगे।
                 दुल्हन अंतरात्मा गंभीर हो गयी। उसे अपनी शादी की क्षणभंगुरता साफ नजर आने लगी। वो दोनों साथ साथ चलती हुई थोड़ी ही आगे गयी थी की बदबू का एक जोरदार झोंका आया और सामने बहुत सी अन्तरात्माओं की लाशे बिखरी हुई थी। वह सहम गयी और उसने विधवा अंतरात्मा की तरफ देखा।
                     विधवा अंतरात्मा ने नाक  पर रुमाल रखते हुए कहा ," ये उन बिहारियों और देश के अलग अलग हिस्सों के उन लोगों की अंतरआत्मायें हैं जिन्होंने बीजेपी को हराने के लिए नितीश कुमार का समर्थन किया था। दो दिन पहले अचानक सुनामी आयी और ये बेमौत मारी गयी। "
                   " तो इनका अंतिम संस्कार क्यों नहीं कर देते ?" दुल्हन अंतरात्मा ने पूछा।
                    " जगह कहां है ? सारे श्मशान और कब्रिस्तान पहले ही मीडिया की अन्तरात्माओं से भरे हुए हैं। " विधवा अंतरात्मा ने अफ़सोस जताया।
                       अचानक एक तरफ से अन्तरात्माओं का एक झुण्ड रोता बिलखता हुआ आता दिखाई दिया।  दोनों उस तरफ देखने लगी। जब वो पास आयी तो उनसे पूछा की तुम कौन हो और रो क्यों रही हो ?
                      उन अन्तरात्माओं ने रोते रोते कहा, " हम गुजरात के कुछ नेताओं की अंतरआत्मायें हैं। पहले हमे ऊना कांड पर और साम्प्रदायिकता पर रोने को कहा गया था। हम वहां रो ही रही थी की अचानक संदेश आया की रोना बंद करो और मंगलगान गाओ। भला ऐसा भी कभी होता है ? हमे कपड़े बदलने तक का मौका नहीं दिया। हमारे पतियों ने ये कहकर की कांग्रेस बीजेपी को हराने के लिए कुछ नहीं कर रही है बीजेपी की सदस्य्ता ले ली। आदमी ऐसा कैसे कर सकता है। इस तरह हम एक  साथ विधवा हो गयी।  हम तो कहती हैं की भगवान किसी अंतरात्मा की शादी किसी नेता से ना करवाए।"
                     अचानक दुल्हन अंतरात्मा ने अपने सारे जेवर उतार कर फेंक दिए। माथे का सिंदूर पोंछ दिया और घूमकर विधवा अंतरात्मा से बोली, " माफ़ करना दीदी, नितीश कुमार ने मिटटी में मिलने की शर्त पूरी कर दी। अब उस आदमी के अंदर इतनी जगह ही नहीं बची है की कोई अंतरात्मा उसके अंदर रह सके। इसलिए मैं उससे तलाक ले रही हूँ। दो दिन बाद विधवा होने से अच्छा है की तलाक ले लूँ। " और वो एक तरफ चली गयी। बाकि की अंतरआत्मायें उसे जाते हुए देखती रही।

Wednesday, July 26, 2017

भारतीय टीवी चैनल पर बहस का नमूना

                     दोपहर के 12 बजे हैं। एक भारतीय राष्ट्रवादी टीवी चैनल पर एंकर एक बहस का  आयोजन कर रहा है। स्टूडियो में तीन लोग बैठे हैं एक सरकारी पार्टी यानि बीजेपी के प्रवक्ता, दूसरे कांग्रेस के प्रवक्ता और एक विशेषज्ञ। बहस का विषय है की क्या अब रात है या दिन। अब इसका वर्णन  प्रकार है।
एंकर --
                 सबसे पहले मैं बीजेपी के प्रवक्ता से पूछना चाहता हूँ की प्रधानमंत्री ने अभी अभी कहा है की इस समय  आधी रात  है। इस पर आपका क्या कहना है ?
बीजेपी प्रवक्ता --
                          देखिये जब प्रधानमंत्री जी ने कहा है तो निश्चित रूप से आधी रात ही है। इस पर सवाल उठाने की गुंजाइश कहां है। प्रधानमत्री जी दुनिया के सबसे बड़े नेता हैं।
एंकर --
                    अब मैं काँग्रेस के प्रवक्ता से पूछना चाहता हूँ की वो इस पर सवाल क्यों उठा रहे हैं ? जब उनकी सरकार तब उन्होंने तो देश को कभी बताया नहीं की अभी दिन है या रात।
काँग्रेस प्रवक्ता --
                         इसमें सवाल उठाने की क्या बात है। दोपहर के 12 बजे हैं ,सूरज सर पर है और आप कह रहे हैं की आधी रात है।
एंकर --
             लेकिन जब सरकार कह रही है तो विपक्ष को कम से कम राष्ट्रीय सवालों पर तो सरकार के साथ खड़ा होना चाहिए। आप इस मुददे पर भी राजनीति कर रहे हैं ?
बीजेपी प्रवक्ता --
                           काँग्रेस हमेशा से राष्ट्रीय सवालों पर राजनीती करती रही है। इसीलिए जनता ने इन्हे 44 के आंकड़े पर पहुंचा दिया।
एंकर --
               हमारे स्टूडियो में एक निष्पक्ष विशेषज्ञ भी मौजूद हैं। मैं उनसे पूछना चाहूंगा की अभी रात है या दिन इस पर उनका क्या कहना है ?
विशेषज्ञ --
                 देखिये ये एक वैज्ञानिक सवाल है। मेरी घड़ी में 12 PM का समय लिखा हुआ है। और PM से जो संकेत मिलता है वो तो रात की तरफ ही इशारा करता है। फिर भी इस पर हमे इसरो के बयान का इंतजार करना चाहिए और विपक्ष को इस पर राजनीति नहीं करनी चाहिए।
बीजेपी प्रवक्ता --
                           हमने अभी अभी अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प से फोन पर बात की है। उन्होंने भी कहा है की अभी आधी रात है और वो अभी शयनकक्ष में हैं। हमारे प्रधानमंत्री जी का समर्थन अमेरिका सहित दुनिया के सारे देश कर रहे हैं लेकिन काँग्रेस को तो केवल राजनीति करनी है।
एंकर --
                मैं काँग्रेस के प्रवक्ता से ये पूछना चाहता हूँ की रात और दिन में कुछ बुनियादी फर्क होते हैं। वो किस आधार पर कह रहे हैं की अभी दिन है ?
कांग्रेस प्रवक्ता --
                            इसका सबसे मुख्य आधार ---
( बीजेपी प्रवक्ता उसकी बात बीच में काटकर )  ये तो आधार कार्ड का भी विरोध कर रहे हैं , ये क्या आधार की बात करेंगे। आधार के सवाल पर ये प्राइवेसी का सवाल उठाना शुरू कर देते हैं। अब आधी रात को इस पर बहस करने में क्या प्राइवेसीका उललंघन नहीं होता।
एंकर --
                ठीक है अगर आपके पास कोई ठोस आधार नहीं है तो कम से कम आपको प्रधानमंत्रीजी के इस बयान का विरोध नहीं करना चाहिए। कम से कम अमेरिकी राष्ट्रपति का जवाब आ जाने के बाद तो बिलकुल नहीं। वरना पूरी दुनिया में ये संदेश जायेगा की हमारे अन्दर राष्ट्रीय सवालों पर भी एकता नहीं है।
काँग्रेस प्रवक्ता --
                          लेकिन मैं इसका जवाब ---
( विशेषज्ञ, उसकी बात बीच में काटकर ) काँग्रेस के लोगों को  अपनी बातों को भी याद रखना चाहिए। जब 15 अगस्त 1947 को संसद में आजादी की घोषणा करते हुए जवाहरलाल नेहरू ने उस समय को आधी रात कहा था तब विपक्ष ने उसका विरोध नहीं किया था। इन्होने तो GST की घोषणा करने के लिए संसद में हुए समारोह का बायकाट किया क्योंकि प्रधानमंत्री मोदीजी ने उसे आधी रात कहा था। ये काँग्रेस की हार से पैदा हुई निराशा है की  प्रधानमंत्री मोदीजी की किसी भी बात का समर्थन नहीं कर सकती।
एंकर --
                 तो आज की बहस से ये साफ होता है की कांग्रेस के पास इस बात का कोई तर्क नहीं है और वो केवल राजनीती कर रही है।

Sunday, July 23, 2017

मुद्रा लोन, रोजगार के आंकड़े और नोटों की गिनती।

                    अभी अभी केंद्र सरकार का बयान आया है की उसने पिछले तीन सालों में सात करोड़ से ज्यादा लोगों को रोजगार दिया है। और ये रोजगार उसने मुद्रा बैंक से साढ़े तीन लाख करोड़ लोन देकर दिया है। उसके बाद सब तरफ इसकी चर्चा है और कुछ भक्त तो ये भी कह रहे हैं की देखो, मोदीजी ने वायदा तो सालाना दो करोड़ नौकरियों का किया था और रोजगार सात करोड़ से ज्यादा लोगों को दे दिया।
                     इस पर सबसे ज्यादा हैरानी की बात ये है की लोगों को पता ही नहीं है की सरकार ने उनको रोजगार दे दिया। और लोग हैं की फालतू में लाइन लगा कर खड़े हैं और सरकार को कोस रहे हैं। अब सरकार का काम लोगों को रोजगार देना था सो दे दिया, लोगों को इसका पता लगे न लगे ये सरकार की जिम्मेदारी थोड़ी है। कुछ लोग कह रहे हैं की वायदा नौकरियों का था और सरकार अब घुमा फिरा कर रोजगार के आंकड़े दे रही है। इस पर भक्त लोग कह रहे हैं की रोजगार और नौकरी में क्या फर्क होता है ? लोगों की भाषा कमजोर है तो ये मोदीजी की जिम्मेदारी थोड़ी है।
                       ये बयान सुनते ही मेरे पड़ौसी तुरंत मेरे घर पर आ धमके। पता नहीं वो मेरे घर को सरकार का लोक सम्पर्क विभाग का दफ्तर क्यों समझते हैं ? आते ही सवाल दागा ," ये सात करोड़ लोगों को रोजगार कैसे दे दिया ?"
                       मैंने कहा, " जब सरकार कह रही है तो दिया ही होगा। वैसे सरकार का कहना है की उसने सात करोड़ लोगों को साढ़े तीन लाख करोड़ का लोन मुद्रा योजना से दिया है जिससे उन्हें रोजगार मिला। "
                       " लेकिन लोन तो पहले से धंधा कर रहे लोगों को मिलता है। अगर किसी छोटे दुकानदार ने अपनी पूंजी की जरूरत के लिए पचास हजार का लोन ले लिया तो क्या उसे दूसरा रोजगार मिल गया। वो तो पहले से ही रोजगार शुदा था। " पड़ोसी ने अगला सवाल किया।
                        मैंने कहा ," देखो, अगर किसी दुकानदार के पास पैसे नहीं हैं तो उसे तो देर सबेर बेरोजगार होना ही था। तुम ऐसा समझ लो की सरकार ने उसे एडवांस में रोजगार दे दिया। "
                          " ऐसे कैसे समझ लें ? तुमने पहले से रोजगार शुदा लोगों को लोन दिया और अब उसे नए रोजगार में खपा रहे हो। " पड़ोसी ने सख्त एतराज किया और लगभग मुझे ही सरकार मान लिया।
                       " देखो, तुम ये तो मानते ही हो न की देश में बहुत भृष्टाचार है। इसमें बहुत से लोगों ने गलत काम धंधा दिखाकर और बैंक के लोगों से मिलीभगत करके भी लोन लिया होगा। इसके अलावा सरकारी पार्टी के कार्यकर्ताओं को भी लोन मिला होगा। तो उनको रोजगार मिला की नहीं ?" मैंने स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की।
                       मेरे पड़ोसी की आँखे चौड़ी हो गयी। उसने गर्दन हिला कर कहा। " बहुत अच्छे, चलो ये बताओ की सरकार को कैसे पता चला की साढ़े तीन लाख करोड़ का लोन दिया गया है ?"
                           " कमाल  करते हो, बैंको के आंकड़े हैं और कैसे पता चलेगा। " मैंने कहा।
                        "लेकिन रिजर्व बैंक में तो अभी तक नोटों की गिनती चल रही है। उसको तो ये भी नहीं मालूम की उसके पास कितना पैसा है। वो कैसे बता सकता है की कितने का लोन दिया। अगर सारे नोट गिनने के बाद एक दो लाख करोड़ का फर्क आ गया तो क्या करोगे ?" मेरे पड़ोसी ने आखरी पैंतरा आजमाया।
                        " तो सरकार अपने आंकड़े सुधार लेगी और क्या करेगी। अगर रकम बढ़ गयी तो विजय माल्या के खाते में जमा कर देंगे। " मैंने पीछा छुड़वाना चाहा।
                         हा हा हा। पड़ोसी ने ठहाका लगाया और चला गया।

Saturday, July 22, 2017

गौ रक्षकों पर सरकार का बयान भरोसा पैदा नहीं करता।

                गौ रक्षकों द्वारा लगातार की जा रही हिंसा और उसमे कई जान चले जाने के महीनो बाद प्रधानमंत्री ने हिंसा की आलोचना करने वाला बयान जारी किया। उससे पहले लगातार हो रही हिंसा पर पूरा देश उन्हें मुंह खोलने के लिए कहता रहा, लेकिन उनके मुंह से इसके खिलाफ एक शब्द नहीं निकला। इससे हिंसा करने वाले गौ रक्षकों में इस बात का स्पष्ट संकेत गया की सरकार की मंशा क्या है। प्रधानमंत्री का ये बयान संसद का सत्र शुरू होने के एक दिन पहले और सुप्रीम कोर्ट में इस पर होने वाली सुनवाई से तीन दिन पहले आया। जानकारों का स्पष्ट मानना है की ये संसद में विपक्ष के हमले से बचने और सुप्रीम कोर्ट में किसी सख्त टिप्पणी से बचने की कवायद भर है। वरना क्या कारण था की सुदूर साइबेरिया में होने वाली दुर्घटना में अगर कोई मौत हो जाती है तो हमारे प्रधानमंत्री का ट्वीट वहां के प्रधानमंत्री के बयान से भी पहले आ जाता है। इसलिए लोग मानते हैं की गौ रक्षकों की हिंसा को बीजेपी, आरएसएस और सरकार का समर्थन प्राप्त है।
                     प्रधानमंत्री ने जब गौ रक्षकों की हिंसा की आलोचना करने वाला बयान दिया तो वो भी एकदम सीधा और स्पष्ट होने की बजाय किन्तु और परन्तु वाला बयान है। इसमें उन्होंने देश की बहुसंख्या द्वारा गाय को माता मानने जैसे शब्दों को शामिल कर दिया जो गौ रक्षकों को इस बयान की गंभीरता की असलियत बता देते हैं। और यही कारण है की उसके बाद भी गौ रक्षकों की हिंसा कम नहीं हुई।
                    इस मामले में सरकार और संघ परिवार की मंशा एकदम साफ है। एक तरफ सरकार गौ रक्षकों की हिंसा रोकने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर डालती है और दूसरी तरफ राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आने वाले पशु व्यापार पर केंद्र की तरफ से नोटिफिकेशन जारी करती है। वहीं खुद उनकी पार्टी की राज्य सरकारें सारे सबूतों को अनदेखा करके हिंसा करने वाले गौ रक्षकों पर केस दर्ज करने की बजाय पीड़ितों पर की केस दायर करती हैं।
                   इसके साथ ही उस घटनाक्रम को भी देखना होगा जिसमे गुजरात चुनावों में इस बार बीजेपी की पतली हालत को देखते हुए बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए " आलिया, मालिया, जमालिया " जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। लगभग सभी मोर्चों पर विफल बीजेपी सरकार अब लोगों के सवालों का जवाब देने की पोजीशन में नहीं है। इसलिए उसे अब केवल साम्प्रदायिक विभाजन का ही सहारा है। उसका विकास और भृष्टाचार विरोध का नकली प्रभामंडल ध्वस्त हो चूका है। इसलिए अब उसे इस विभाजन की जरूरत पहले किसी भी समय से ज्यादा है। इसलिए उसके हर कार्यक्रम और बयान में साम्प्रदायिक रुझान साफ नजर आता है। अब तो ये इतना स्पष्ट है की दूर विदेशों में बैठे लोगों को भी साफ साफ दिखाई दे रहा है। न्यूयॉर्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट से लेकर दा इण्डिपेंडन्ट जैसे अख़बारों में छपने वाले लेख इसके गवाह हैं।
                     इसलिए लोगों को प्रधानमंत्री और उसकी ही तर्ज पर संसद में दिए गए अरुण जेटली के किन्तु परन्तु वाले बयानों पर भरोसा करने की बजाय साम्प्रदायिक विभाजन के विरोध की अपनी कोशिशों को और  तेज करना चाहिए।

Sunday, July 16, 2017

नोटों की गिनती और उर्जित पटेल का मजाक।

                    जिस दिन उर्जित पटेल ने संसदीय कमेटी के सामने ये कहा की अभी तक RBI को पता नहीं है की कितने नोट बैंको में जमा हुए हैं, और अभी तक नोटों की गिनती चल रही है , तो उनका ये बयान सुनकर मुहल्ले के चबूतरे पर बैठे लोगों का हँस हँस कर बुरा हाल हो गया। पता नहीं संसदीय समिति के सदस्यों का क्या हाल हुआ होगा। उसकी एक झलक तो समिति के सदस्य श्री दिग्विजय सिंह के उस सवाल से मिल सकती है जिसमे उसने श्री उर्जित पटेल से ये पूछा की मई 2019 तक तो RBI बता देगा न की कितना पैसा जमा हुआ है ?
                      उस दिन चबूतरे पर एक भक्त भी बैठा हुआ था और उसकी समझ में नहीं आ रहा था की आखिर इस बात पर लोग हँस क्यों रहे हैं। उसने ये कहा भी की इसमें उर्जित पटेल ने क्या गलत कह दिया , और की वो नोट गिनकर बता देगा। इस पर लोगों को एक बार हँसी का दौरा पड़ गया।
                      आज वो भक्त मेरे पास आया और बोला की उसे पचास हजार रुपयों की जरूरत है और मैं उसे ये रुपया उधार दे दूँ।
                      लेकिन मैं तो घर पर इतना रुपया नहीं रखता। मैंने कहा।
                      कोई बात नहीं , आप मुझे चैक दे दीजिये। आपके बैंक खाते में तो रुपया होगा ही। उसने कहा।
                      मैं आपको चैक नहीं दे सकता। क्योंकि मुझे पता नहीं  है की मेरे खाते में और बैंक में रुपया है की नहीं है। मैंने जवाब दिया।
                     कमाल करते हो भाई साहब, आपके खाते  में जो रुपया होगा वो तो आपकी पास बुक में जमा होगा ? उसने एतराज जताया।
                      लेकिन बैंक में कितना रुपया है और उसमे मेरा कितना है ये तो गिनने के बाद ही पता चलेगा ? मैंने जवाब दिया।
                      आप अजीब आदमी हैं। आपने बैंक में जो रुपया जमा करवाया होगा वो तो बैंक ने गिनकर ही लिया होगा और उसके हिसाब से ही आपके खाते में जमा किया होगा ? उसने फिर नाराजगी दिखाई।
                      भाई साहब, अब तक तो मैं भी यही समझता था। और ये भी समझता था की बैंक जो पैसा RBI में जमा करवाते हैं, RBI उसे गिनकर ही लेती है और उसके हिसाब से ही बैंक के खाते में जमा करती है। लेकिन पिछले आठ महीनो से सरकार और RBI , दोनों कह रहे हैं की उन्हें पता नहीं है की कितना पैसा जमा हुआ है और उसकी गिनती चल रही है। आपने उर्जित पटेल का बयान नहीं सुना ? मुझे लगता है की पहले वो RBI का पैसा गिनेंगे, फिर सभी बैंको का गिनेंगे, फिर उसे खातों से मिलाएंगे और उसके बाद मुझे पता चलेगा की मेरा कितना पैसा है। आप एक काम कीजिये, गिनती पूरी होने के बाद आइये और चैक ले जाइये।

Wednesday, May 17, 2017

जिस दिन सर्वोच्च न्यायालय किसी भी एक मौलिक अधिकार की सभी नागरिकों के लिए समान रूप से गारण्टी कर देगा, वो देश के न्यायायिक इतिहास की सबसे क्रांतिकारी घटना होगी।

               माननीय सर्वोच्च न्यायालय छुट्टियों के बावजूद तीन तलाक पर सुनवाई कर रहा है। इस सुनवाई के दौरान कई चीजों का जिक्र बार बार होता है। इनमे से एक है मूलभूत अधिकार। सबसे ख़ुशी की बात ये है की मुस्लिम महिलाओं के मूलभूत अधिकारों के लिए सबसे ज्यादा चिंतित कोई दिख रहा है तो वो सरकार है। सरकार के आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। अगर सरकारें मूलभूत अधिकारों पर सचमुच में इतनी चिंता दिखाने लगें तो अदालतों को तो काम ही आधा रह जाये। मूलभूत अधिकार तो नागरिकों को हासिल वो अधिकार हैं जिन्हे सरकारें गाहे बगाहे खत्म करने पर लगी रहती हैं और नागरिकों द्वारा मांग करने पर अदालतों को हस्तक्षेप करना पड़ता है। इस बार उल्टा हो रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे सरकार मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करना चाहती है और अदालत सहित कुछ तबके उसे रोक रहे हैं।
                कुछ लोग ये सवाल भी उठा रहे हैं की दूसरे मूलभूत अधिकारों के मामले में तो सरकार का वही रुख है। न्यूनतम मजदूरी का अधिकार संविधान के आर्टिकल 23 के तहत मूलभूत अधिकार है। लेकिन जितना उपेक्षित रवैया इसके प्रति सरकार और अदालतों का है उसे देखकर तो ये लगता ही नहीं है की ये मूलभूत अधिकार है। उसी तरह आदिवासियों के अधिकार हैं, दलितों के साथ होने वाले जुल्म भी समान मानवीय अधिकारों के अनुसार मूलभूत अधिकारों के तहत हैं। मुस्लिम महिलाओं के अलावा दूसरी महिलाओं के भी अधिकार हैं, लेकिन उन पर कोई बात नहीं होती है। अब तो लोगों को अदालतों के कुछ निर्णयों से आश्चर्य होने लगा है। सहारा-बिरला डायरी के मामले में उच्चतम न्यायालय ने जिन कागजात को सबूत मानने से इंकार कर दिया, अगर उसे सब पर लागु कर दिया जाये तो टैक्स चोरी के 90 % मामले एक झटके में समाप्त हो सकते हैं। सहारा -बिरला डायरी मामले में मोदीजी के खिलाफ मामला जिस तरह से ख़ारिज किया गया उस पर आम आदमी भी ये पूछ रहा है की क्या सुप्रीम कोर्ट को मोदीजी की दस्तखत की हुई रशीद चाहिए ?
               छत्तीसगढ़ के आदिवासियों पर होने वाले जुल्म के बारे में सारे सबूतों के बावजूद एक भी केस में किसी को सजा नहीं सुनाई गयी। यहां तक की सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले लोगों की हत्याएं हो गयी, महिलाएं गायब हो गयी, खुद सरकारी एजेंसी सीबीआई ने अपनी रिपोर्ट में पुलिस पर आदिवासियों के गांव जलाने , महिलाओं से बलात्कार करने और लोगों की हत्याओं के आरोपों को सही पाया, लेकिन अदालत  की तरफ से कोई ठोस आदेश जारी नहीं हुआ। गुजरात में फर्जी मुठभेड़ों के अभियुक्तों को, जिनको राज्य सरकार खुद फर्जी मुठभेड़ों का जिम्मेदार मानती है और कानून के अनुसार उनके खिलाफ एक पक्ष भी है, वही सरकार उन्ही लोगों को पद्दोन्ती देकर ऊँचे पदों पर नियुक्ति दे देती है, इससे बड़ा कानून का मजाक आखिर क्या हो सकता है। लेकिन अदालत इसे मूकदर्शक की तरह देखती रही।
                  सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के मामले में अदालत कभी भी उतनी ततपरता नहीं दिखाती जितनी जरूरत होती है। हालत ये है की किसी का बच्चा किडनैप हो जाये और सामने वाला फिरौती के लिए चौबीस घंटे का वक्त दे दे और पुलिस कार्यवाही करने से इंकार कर दे , और उसका परिवार पुलिस को आदेश देने के लिए ऊपरी अदालत में गुहार लगाए, तो अदालत सरकार को छह हफ्तों में जवाब दाखिल करने को कह देगी। इसलिए लोगों को लगता है की सरकार के साथ साथ अदालतों का रवैया भी गरीबों और अमीरों के मामले में अलग  अलग होता है। जो लोग मार्क्स को उद्दृत करके कहते हैं की आखिर अदालतें भी राजसत्ता का ही हिस्सा होती हैं, इस मामले में तो एकदम सही लगते हैं।
                   तीन तलाक के मामले में जो भी फैसला आये, लेकिन लोगों के मूलभूत अधिकारों की चिंता करने वाली सरकार और अदालतें जिस दिन संविधान प्रदत किसी भी एक ( केवल एक ) मूलभूत अधिकार को देश के सभी नागरिकों को  समान रूप से लागू करवा देंगी, वो दिन भारत के न्याय के इतिहास का सबसे क्रन्तिकारी होगा।

Monday, April 24, 2017

सुरक्षा बलों पर हमलों की खबरें -- राष्ट्रवादी और राष्ट्रद्रोही

खबरी --क्या सुरक्षा बलों पर हमले भी राष्ट्रवादी और राष्ट्रद्रोही होते हैं ?

गप्पी -- बिलकुल, आज ही देख लो। सुरक्षा बलों पर हमलों की तीन खबरें हैं। जिसमे दो हमले राष्ट्रद्रोही हैं और एक राष्ट्रवादी है। पहला हमला कश्मीर में पत्थर बाजों द्वारा सुरक्षा बलों पर किया गया जो देशद्रोही लोगों द्वारा किया गया हमला है। दूसरा हमला छत्तीसगढ़ में CRPF पर हुआ, ये भी देशद्रोहियों द्वारा किया गया हमला है। लेकिन एक हमला आगरा में पुलिस बल पर किया गया, ये हमला राष्ट्रवादी हमला था जो देश की संस्कृति की रक्षा के लिए किया गया था। उसी तरह जम्मू में खानाबदोश कबीले पर गौ रक्षकों द्वारा किया गया हमला तो शुद्ध राष्ट्रवादी हमला था। जब एक ही देश में एक जगह गाय का कत्ल संविधान और संस्कृति के खिलाफ और दूसरी जगह संविधान और संस्कृति के अनुसार हो सकता है तो हमला भी राष्ट्रवादी और राष्ट्रविरोधी क्यों नहीं हो सकता ?

Sunday, April 23, 2017

गाय का धंधा ( कहानी )

सुबह के पांच बजे थे। आंगन में बैठे एक अधेड़ उम्र के आदमी की नजरें दरवाजे पर लगी थी। ऐसा लगता था जैसे उसे बेसब्री से किसी के आने का इंतजार था। तभी गली में मोटर साइकिल के रुकने की आवाज आयी। अधेड़ की आँखों में चमक आ गयी। बाहर मोटर साइकिल पर तीन लड़के सवार थे। गले में गेरुआ रंग का दुपट्टा और हाथों में दंगाइयों जैसे हथियार लिए थे। उनमे से पीछे बैठा लड़का उतर कर घर के अंदर दाखिल हुआ। उसके उतरते ही मोटर साइकिल फर्राटे से आगे बढ़ गयी।
               उसके घर में घुसते ही अधेड़ तेजी से उसकी तरफ लपका। युवक ने जेब से एक पांच सौ रूपये का नोट निकाल कर अधेड़ के हाथ पर रख दिया।
               बस, पांच सौ ? अधेड़ ने युवक की तरह अविश्वास से देखा।
                हाँ, बस इतना ही मिला।  युवक ने जवाब दिया।
                क्यों इतना कम ? पहले पांच हजार तक मिलते थे, फिर दो हजार हुए और अब पांच सौ ? अब अधेड़ के चेहरे पर गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था।
               पहले हम नाके पर केवल दस लोग बैठते थे। अब बीस हो गए हैं। दूसरा अब हमारा नाका भी शहर के बाहर बाई पास से पहले कर दिया है। अब पशुओं की कुछ गाड़ियां बाई पास होकर निकल जाती हैं जिससे दूसरे नाके वाले उनसे उगाही करते हैं। अब केवल दो गाड़ियां आयी थी। उनसे सात हजार के हिसाब से पैसा लिया, जिसमे से दो हजार के हिसाब से पुलिस को चला गया। बाकि बचा दस हजार, तो बीस लोगों को पांच सौ ही हिस्से में आया।  युवक ने हिसाब समझा दिया।
                दूसरे दस लोगों को तुम्हे अपने साथ बैठाने की क्या जरूरत थी ? अधेड़ ने गुस्से से कहा।
               विधायक जी ने भेजे हैं। बोले अपने ही कार्यकर्ता हैं और आज से तुम्हारे साथ ही बैठेंगे। युवक ने सफाई दी।
                तुमने विधायक जी से कहा नहीं की हमारे हिस्से में क्या आएगा ? अधेड़ का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था।
                  कहा था, लेकिन बोले की एडजेस्ट करो।
              और तुमने ये गाड़ी का रेट घटाकर सात हजार करने की क्या जरूरत थी ? अधेड़ ने पूछा।
              पहले गाड़ी में गाय भी आती थी, तो हम दस हजार लेते थे। कोई मुसलमान होता था तो डरकर दस हजार भी दे देता था। अब मुसलमान गाड़ियां लेकर आने कम हो गए हैं। गाय की गाड़ियां तो सब जगमोहन की होती हैं जो सीधे लाइसेंस वाले बूचड़खाने में चली जाती हैं। पहले जगमोहन भी गाड़ी पर कुछ दे देता था। अब तो पुलिस वाले भी उसकी गाड़ी को नहीं रोकते। कहते हैं उसकी पहुंच ऊपर तक हो गयी है। युवक ने लाचारी दिखाई।
                लेकिन इलाके में आतंक बना कर मुसलमानो से ये काम हमने छुड़वाया। उसका फायदा जगमोहन अकेला कैसे उठा सकता है। मैं आज ही विधायक जी से बात करूंगा। अधेड़ गुस्से में बड़बड़ाता हुआ अंदर चला गया।
                 उसके बाद उसने नहा धोकर ढंग के कपड़े पहने और विधायक निवास पहुंच गया। वहां और भी बहुत से लोग आये हुए थे। लेकिन उसको जल्दी ही अंदर बुला लिया गया।
               आइए महाराज, कैसे आना हुआ। विधायक जी ने पुराने परिचित के हिसाब से उससे हाल पूछा।
                विधायक जी, बात ऐसी है की लड़के सारी रात नाके पर बैठते हैं फिर भी पांच सौ रुपल्ली भी हिस्से में नहीं आती। अधेड़ ने सीधे सीधे समस्या बयान कर दी।
                 अरे महाराज, गौ रक्षा का पुण्य भी तो मिलता है। विधायक जी ने हँसते हुए कहा।
                पुण्य तो हम घर रहकर भी कमा सकते थे। बात धंधे की है। इलाके में आतंक फैलाकर हमने मुसलमानो को पशुओं का व्यापार बंद करने पर मजबूर किया। और आज ये जगमोहन जैसे लोग अकेले उसका फायदा उठा रहे हैं। उसे तो गाय के पैसे भी नहीं देने पड़ते। वो अकेला सारा माल हजम कर रहा है। उससे कहिये की नाके पर भी गाड़ी के हिसाब से कुछ पैसे देना शुरू करे।  अधेड़ ने पूरी बात कह दी।
                देखिये, जगमोहन जी ऊपर बहुत पैसा देते हैं। उसे सारा पैसा नहीं मिलता। उसकी बात जाने दो। विधायक जी ने साफ साफ मना कर दिया।
                 लेकिन केवल पांच सौ रूपये रोज से क्या होता है। आप खुद समझिये। अधेड़ ने एतराज किया।
                 अरे महाराज, याद करो, पिछले साल आप ही इस लड़के के लिए पांच सात हजार की नौकरी मांगने आये थे तब मैंने ही इसे गौ रक्षकों में शामिल करवाया था। अब आपको लालच हो गया है। विधायक जी भी कोई कच्ची गोलियां नहीं खेले थे।
                लेकिन जगमोहन ----
                जगमोहन जी की बात मत करो। विधायक जी ने अधेड़ की बात बीच में ही काटी। फिर कभी मौका आएगा तो किसी दंगे में अच्छा इलाका दिलवा देंगे। पुरे साल का खर्चा निकल जायेगा । अब लड़के को शान्ती से काम करने दो।
                  अधेड़ बड़बड़ाता हुआ बाहर निकल आया। ये साला जगमोहन, साले ने गोशाला के नाम पर सरकारी जमीन पर कब्जा कर लिया। लाखों रूपये चंदा उगाह लेता है और फिर गायों को ट्रक में लदवा देता है। जिन लोगों ने सारे काम में मदद की, उनकी जात भी नहीं पूछता। साला गाय का धंधा करता है। छिः


              

Wednesday, April 19, 2017

महिला आरक्षण बिल -- राजनैतिक दोगलेपन का प्रतीक

                 क्या किसी ने पिछले तीन साल में महिला आरक्षण बिल का जिक्र सुना है ? उससे पहले ये लगभग परम्परा सी बन गयी थी की जब भी संसद का कोई सत्र समाप्त होता, श्रीमती सुषमा स्वराज बाकि दलों की महिला सांसदों के साथ फोटों खिंचवाती थी और महिला आरक्षण बिल को पास न करने को लेकर सरकार को कोसती थी। लेकिन जब से बीजेपी की सरकार आयी है और सुषमा जी मंत्री बनी हैं, उन्होंने महिला आरक्षण बिल का नाम भी नहीं लिया।
                 इस बात का जिक्र इसलिए हो रहा है की आजकल बीजेपी के नेताओं का महिलाओं की दुर्दशा को देखकर कलेजा फटा जा रहा है। तीन तलाक का मुद्दा तो ऐसा हो गया है जैसे देश में ये केवल एकमात्र समस्या है। वो अलग बात है की तीन तलाक से परेशान महिलाओं की तादाद वृन्दावन में भीख मांग रही हिन्दू विधवाओं से भी कम होगी, जो तीन तलाक पर छाती पीटने वाले मठाधीशों की विकृत परम्पराओं की वजह से भीख मांग रही हैं। लेकिन जिनके लिए हर मुद्दा लोगों को लड़ाकर राजनीती की रोटियां सेकने के सिवाय कुछ नहीं होता, वो इस पर क्यों बोलेंगे।
                 महिलाओं के अधिकारों पर आंसू बहाने  वाले बीजेपी के नेताओं को और योगीजी को हमारी तरफ से एक चुनौती है की जब उनके पास बीजेपी नेताओं और मंत्रियों सम्पत्ति की लिस्ट आ जाये तो वो उनके परिवार की लिंग अनुपात की लिस्ट भी मांग लें, तो ये भी देश के सामने आ जाये की गर्भ में लड़कियों का कत्ल करने वाले लोगों में कौन कौन शामिल हैं।
                    खैर, मुद्दा महिला आरक्षण बिल का है। ये बिल राज्य सभा में पास हो चुका है। और इसे केवल लोकसभा से पास करवाना बाकी है जहां बीजेपी का बहुमत है। फिर क्या कारण है की बीजेपी सरकार इसे पास नहीं करवा रही। ये बिल बीजेपी के महिलाओं के अधिकारों को लेकर उसके दोगलेपन का बेहतरीन उदाहरण है। जब उसे कोई बिल पास नहीं करवाना होता है तो वो आम सहमति का बहाना करती है और जहां सही में आम सहमति की जरूरत होती है तो उसे जबरदस्ती लागु करने की कोशिश करती है। भूमि अधिग्रहण बिल इसका ताजा उदाहरण है।

Monday, April 17, 2017

कश्मीर को खोने की जिम्मेदारी कौन लेगा ?

                काश्मीर के लोगों का भारत से भावनात्मक जुड़ाव खत्म हो चूका है। अब केवल भारत के नक्शे में कश्मीर भारत का हिस्सा बचा है। आज हालत ये है की सेना को खुद की रक्षा के लिए ह्यूमन शील्ड का इस्तेमाल करना पड़ता है। अलगाव इतना गहरा हो गया है एक तरफ सेना द्वारा लोगों से जबरदस्ती पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगवाने के विडिओ वायरल हो रहे हैं तो दूसरी तरह आतंकवादी बंदूक की नोक पर लोगों से हिंदुस्तान मुर्दाबाद के नारे लगवा रहे हैं।
                   और ये हालत कितने दिन में हो गयी। पिछले तीन साल से केंद्र और राज्य दोनों में बीजेपी की सरकार है। 2014 में जब लोकसभा चुनाव हुए थे तो कश्मीर में करीब 64 % वोट पड़े थे जो बाकि देश के प्रतिशत के लगभग बराबर थे। तब यूरोप और अमेरिका के अख़बारों ने खबर छापी थी की कश्मीर के लोगों ने भारत और पाकिस्तान पर अपनी पसंद स्पष्ट कर दी है। अभी हुए चुनाव में श्रीनगर की सीट पर कुल 7 % वोट पड़े हैं। जिन 38 बूथों पर दुबारा चुनाव करवाया गया वहां केवल 2 % वोट पड़े हैं और 27 बूथों पर एक भी वोट नहीं पड़ा। पता नहीं अनुपम खेर और अशोक पंडित जैसे महान क्रन्तिकारी देशभक्त किस बिल में घुसे हुए थे ? उससे पहले नरेंद्र मोदी कहते थे की कश्मीर की समस्या कश्मीरियों के कारण नहीं बल्कि दिल्ली में बैठी सरकार की गलत नीतियों के कारण है। अब अगर बीजेपी राज्य सरकार में हिस्सेदार नहीं होती तो वो हालात की खराबी की जिम्मेदारी राज्य सरकार पर डाल सकते थे। लेकिन अब उन्हें इसकी जिम्मेदारी डालने के लिए नेहरू युग तक जाना होगा।
                   आज कश्मीर के लोग आपके साथ नहीं हैं। आप को ख़ुशी हो सकती है की जमीनी तोर पर कश्मीर अभी भी भारत का हिस्सा है। लेकिन अब आप वहां पहलगाम और डलहौजी में सैर नहीं कर सकते, डल झील में शिकारे का आनंद नहीं ले सकते और कश्मीर में फिल्म की शूटिंग नहीं कर सकते। तो काश्मीर का नक्शा भारत में है या नहीं उससे क्या फर्क पड़ता है ?
                   मोदी सरकार की कश्मीर नीति पर जानकारों ने सवाल उठाये थे। लेकिन उस पर इस सरकार के भक्तों ने गालियों की बौछार कर दी। महिला पत्रकारों को रंडी कहा गया। दूसरे लोगों को पाकिस्तान का दलाल घोषित कर दिया गया। लेकिन अब क्या वो लोग इस हालात की जिम्मेदारी लेंगे। क्या ये तथाकथित राष्ट्रवादी कश्मीर में जाने की हिम्मत दिखाएंगे।
                     ये सरकार एक और वायदे के साथ सत्ता में आयी थी। वो था कश्मीरी पंडितों को वापिस कश्मीर में बसाने का वादा। क्या अब भी किसी को लगता है की कश्मीरी पंडितों को वापिस घाटी में बसाया जा सकता है। बसाने का सवाल तो दूर, आप उनकी वोट नहीं डलवा सकते। चार लाख कश्मीरी पंडित, जो सालों से अपने ही देश में शरणार्थी बन गए हैं, आपने उनके साथ धोखाधड़ी की है। आपने उनके वापिस जाने की संभावनाओं पर पानी फेर दिया है। उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया है।
                    सवाल अब भी अपनी जगह है। क्या कश्मीर को खोने की जिम्मेदारी बीजेपी, उसके समर्थक और सोशल मीडिया पर बैठे उसके बुद्धिहीन चापलूस लेंगे।

Saturday, April 15, 2017

व्यंग -- भारत में रोड शो का राजनैतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और ऐतिहासिक महत्व।

                  भारत में आजकल राजनीती में रोड शो का बहुत महत्व है। सही तरीके से कहा जाये तो कुछ लोगों की तो राजनीती चल ही रोड शो के कारण रही है। वैसे रोड शो सबसे आसान काम होता है। इसमें आपको केवल खड़े होकर हाथ हिलाना होता है। राजनीती में आने वाले ज्यादातर लोग वो होते हैं जिन्हे स्कूल में हाथ ऊपर करके खड़े रहने का खासा अभ्यास होता है। इसमें आयोजकों को भी आसानी रहती है। लोग अगर कम हों तो पहले वाले लोगों को आगे पहुंचाया जा सकता है। बाकी तो बस हाथ हिलाना है। न किसी मुद्दे पर अपनी राय स्पष्ट करनी होती है और न किसी सवाल का जवाब देना होता है। आप हाथ हिलाकर चले जाइये, बाकी का काम मीडिया कर देगा।
                  वैसे रोड शो का मतलब होता है रोड के ऊपर शो करना, या फिर रोड को ही शो करना। अभी उत्तर प्रदेश के चुनाव में अखिलेश एक तरफ रोड के ऊपर शो कर रहे थे और दूसरी तरफ आगरा लखनऊ एक्सप्रेस वे नाम के रोड को शो कर रहे थे। अब हमारे प्रधानमंत्री लगभग हररोज रोड के ऊपर शो करते रहते हैं। अगर वो दो चार दिन रोड शो न करें तो उनके हाथ में दर्द होने लगता है।
                   रोड के ऊपर होने वाले शो भी अलग अलग तरह से होने लगे हैं। कुछ दिन पहले तमिलनाडु के किसानो ने ठीक प्रधानमंत्री कार्यालय के सामने सारे कपड़े उतार कर शो कर दिया। परन्तु प्रधानमंत्री और उनकी सरकार को ये शो पसंद नहीं आया इसलिए उनके शो को कोई देखने नहीं आया। इस तरह के शो पिछले दिनों सड़कों पर बहुत हुए हैं। जैसे कहीं किसान सड़क पर सब्जी डाल रहे हैं, कहीं दूध बिखेर रहे हैं। लेकिन किसानो के रोड शो भी कोई शो होते हैं ? मुझे लगता है किसी दिन किसान इकट्ठे होकर रोड पर सरकार  के कपड़े उतारने का शो न कर दें।
                     लेकिन जिस तरह के प्रभावशाली शो करने की महारत हमारी पुलिस को है उसका कोई सानी नहीं है। उसका मुकाबला केवल सेना ही कर सकती है। अभी हाल ही में हमारी सेना ने कश्मीर में एक आदमी को जीप के आगे बांधकर बहुत ही कामयाब शो किया था। इस शो के बाद पूरी दुनिया को हमारी कश्मीर नीति की गहराई समझ में आ गयी। जो चीज दुनिया को पाकिस्तान लगातार गला फाड़कर नहीं समझा पा रहा था वो हमारी सेना के एक रोड शो ने समझा दिया। जबसे हमारे प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी ने इसराइल को अपना सबसे भरोसेमंद साथी घोषित किया है, हमारी सेना उसके विडिओ देखकर रणनीति बना रही है। कुछ दिन बाद दुनिया को ये फर्क करना मुश्किल हो जायेगा की अमुक रोड शो कश्मीर का है या फिलिस्तीन का।
                         हमारे यहां कुछ सांस्कृतिक किस्म के रोड शो भी होते हैं। इस तरह के रोड शो अभी योगी जी के आशीर्वाद से उत्तर प्रदेश की सड़कों पर हो रहे हैं। जिसमे कुछ ऐसे लोग, जिन्हे कोई शरीफ आदमी घर के अंदर बैठाना भी खतरनाक समझता है, मिलकर आजकल बेटियों को बचा रहे हैं। ये लड़कियों को गालियां देते हैं, उनके साथ रोड पर मारपीट करते हैं ताकि उन्हें बचाया जा सके। एक दो बार पिट जाएँगी तो अपने आप घर से बाहर निकलना बंद कर देंगी। ये एक आजमाया हुआ और कामयाब तरीका है जो इन्होने तालिबान से लिया है। तालिबान के साथ इनके वैचारिक और सांस्कृतिक संबंध हैं सो उसके आजमाए हुए तरीकों का इस्तेमाल करना इनका हक बनता है।

Friday, April 14, 2017

कहीं भृष्टाचार में कमी केजरीवाल की हार का कारण तो नहीं ?

                      केजरीवाल की सरकार आने के बाद दिल्ली में  भृष्टाचार में कमी आयी है ये बात तो उसके दुश्मन भी स्वीकार करते हैं। यहां तक की अभी अभी आये ताजा आंकड़े जो एक तरफ केंद्र में भृष्टाचार की शिकायतों में बढ़ोतरी दिखा रहे हैं तो दूसरी तरफ दिल्ली में इन शिकायतों में तीन चौथाई की कमी दिखा रहे हैं। उसके बावजूद दिल्ली विधानसभा के उपचुनाव में AAP की इतनी बुरी हार हुई।
                     उसके बाद मेरी दिल्ली के कई लोगों से बात हुई। उनमे से कई लोग पहले केजरीवाल के साथ थे और अब उनसे बहुत नाराज हैं। जब उनकी नाराजगी के कारण जानने की कोशिश की तो बहुत ही अजीब सी बात सामने आयी। हर आदमी ने कहा की केजरीवाल ने अपने वायदे पुरे नहीं किये। जब उनसे  पूछा गया की कोनसा वायदा, तो वो केवल फ्री वाई फाई के अलावा कुछ नहीं बता पाए। मैंने जब उनसे सरकारी स्कूलों पर किये गए कामो के बारे में पूछा तो उनमे से कईयों का जवाब था, हाँ काम हुआ है और बहुत काम हुआ है, लेकिन हमे क्या फायदा? हम तो अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाते नहीं। जब मैंने मोहल्ला क्लिनिक इत्यादि के बारे में पूछा तो भी उनका वही जवाब था, हाँ काम हुआ है लेकिन हम तो कभी इनमे जाते नहीं। मैं हैरान था। अजीब तर्क हैं। मैंने उनसे भृष्टाचार के बारे में पूछा तो उन्होंने जो बताया वो इस प्रकार है ," हाँ भृष्टाचार कम हो गया है। और इसकी वजह से परेशानी बढ़ गयी है। कोई अधिकारी न पैसे लेने को तैयार है और न पहले काम करने को तैयार है। अब लाइन में लगने की फुरसत किसके पास है ? पहले पैसे देते थे और काम हो जाता था। "
                   लेकिन केजरीवाल तो भृष्टाचार के मुद्दे को ही लेकर आया था। तब तुमने उसका समर्थन क्यों किया था ? मैंने पूछा तो उनका जवाब था की हमे थोड़ा न पता था की इस तरह का झंझट खड़ा हो जायेगा।
                     अब मुझे लगता है की भृष्टाचार का कम होना ही केजरीवाल की हार का कारण बन जायेगा। केजरीवाल के पास कोई भावनात्मक मुद्दा तो है नहीं। और अपनी वर्गीय खासियत के कारण मध्यम वर्ग एक नंबर का अवसरवादी होता है। उसे न तो पूर्णराज्य के दर्जे से कुछ लेना देना है और न ही गरीब लोगों के लिए किये कार्यों से कुछ लेना देना है। उसे केवल इस बात से मतलब है की उसकी जेब में क्या आ रहा है। या फिर वो चालाक खिलाडियों के भावनात्मक मुद्दों के साथ चल सकता है। ये दोनों चीजें न तो केजरीवाल के पास हैं और न कम्युनिस्टों के पास, इसलिए दोनों हार गए।

Monday, April 10, 2017

केजरीवाल पर फिजूलखर्ची के आरोप, जो भाजपा नहीं उठा रही।

खबरी - शुंगलू कमेटी की रिपोर्ट, LG के आदेश और बीजेपी के आरोप क्या साबित करते हैं ?

गप्पी -  बाकि सारी चीजों के अलावा एक बात बहुत हैरान करने वाली है। केजरीवाल द्वारा जनता के पैसे के दुरूपयोग का एक बहुत ही पुख्ता उदाहरण सामने है लेकिन न तो उसका जिक्र किसी कमेटी की रिपोर्ट में है, न उस पर LG को एतराज है और न ही भाजपा उसको मुद्दा बना रही है।
               वो फिजूलखर्ची का उदाहरण है, क़ानूनी रूप से विपक्ष के नेता के पद के लायक सीटें न होने के बावजूद केजरीवाल सरकार ने बीजेपी के विधायक विजेंद्र गुप्ता को न केवल विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दी, बल्कि उसे एक कैबिनेट मंत्री के बराबर सुविधाएं भी प्रदान की। जो जनता के पैसे की खुली लूट है। बीजेपी को चाहिए की वो इस मुद्दे को जोर शोर से उठाये और केजरीवाल सरकार को फैसला बदलने पर मजबूर करे।


Saturday, April 8, 2017

गौ - वंश पर अत्याचार की जिम्मेदारी और उसका मतलब।

                  भारत में आज सबसे बड़ा मुद्दा गौ वंश पर अत्याचार और गौ रक्षा बना दिया गया है। जाहिर है की ये एक ऐसा मुद्दा है जिसके लिए सरकार को जिम्मेदार नहीं माना जाता। अब तक लोगों में जो मुद्दे होते थे उनके लिए सरकार जिम्मेदार होती थी, चाहे वो बेरोजगारी हो, महंगाई हो, किसानो की हालत हो या दूसरी समस्याएं हों। सरकार ने बड़ी चालाकी से अपनी जिम्मेदारी से ध्यान हटाने के लिए उन मुद्दों को आगे कर दिया जिनकी जिम्मेदारी सीधे तौर पर उसकी नहीं है।
                   खैर, हमारा आज का विषय ये है की गौ वंश पर अत्याचार का मतलब आखिर है क्या ? वैसे तो ये स्वयंसिद्ध है की गाय एक पशु है और उसके बारे में जो भी बात हो उसके लिए इस संदर्भ को याद रखा जाना चाहिए। इससे बात अगर शुरू करेंगे तो वहां से शुरू होगी, जहां से पशुपालन की शुरुआत हुई। फिर ये बात आएगी की विश्व में पशुपालन की शुरुआत मांस के लिए हुई थी और दूध का उपयोग बहुत बाद में शुरू हुआ। ऐतिहासिक खुदाईओं में जो चित्र मिलते हैं, खासकर भारत में, उसमे गाय के चित्र नहीं हैं बल्कि बैल के चित्र हैं जो कम से कम दूध का प्रतीक नहीं है। लेकिन हम बात गाय पर और गौ वंश पर होने वाले अत्याचार की कर रहे हैं।
                  भारत में आज बड़ी तादाद में ऐसे लोग हैं जिन्होंने गाय को माता मानना शुरू कर दिया है। इस माता मानने के सवाल को राजनैतिक रूप से भुनाने का मामला खड़ा हो गया है। इसलिए हम गौ वंश पर अत्याचार को इसी संदर्भ में देखना चाहते हैं। इस पर मेरा जो सवाल है वो ये है। -
                  एक आदमी एक गाय पालता है और उसे खूंटे से बांधकर रखता है। जब वो बछड़ा देती है तो उसके बछड़े को दूध पीने से रोकता है और उसे खींचकर दूर खूंटे से बांध देता है और उसके हिस्से का दूध खुद हड़प कर या तो पी लेता है या बेच देता है। उसके बाद जब बछड़ा जवान हो जाता है तो उसकी नाक में छेद करके रस्सा डाल देता है और उसको खस्सी ( बधिया ) कर देता है। फिर उसके कंधे पर बोझा रखकर सारी जिंदगी उससे काम लेता है और जब वो बूढ़ा हो जाता है तो उसका रस्सा निकाल कर मारे मारे फिरने के लिए छोड़ देता है। अब ये कौनसा माँ बेटे और भाई भाई का संबंध है। पहली नजर में ही ये हद दर्जे की क्रूरता दिखाई देती है बशर्ते की इसे गाय को माता मानने के संदर्भ में देखा जाये। अगर इसे केवल पशु होने के संदर्भ में देखा जाये तो सब सही है और उसके साथ भी वही हो रहा है जो भैंस, घोड़े, और दूसरे पशुओं के साथ हो रहा है। इसलिए गाय को माता मानने वालों को इस अत्याचार का हिसाब देना चाहिए और दूसरों पर आरोप लगाने से और हमला करने से पहले खुद को सुधार लेना चाहिए।

Monday, March 20, 2017

राजनीति के मूढ़मतियों का पश्चाताप।

                  राजनीति में कुछ मूढमति होते हैं। वैसे तो मूढमति हर जगह होते हैं लेकिन लोकतंत्र में राजनीती के मूढ़मतियों की एक खास जगह होती है। ज्यादातर लोकतंत्र इन्ही के सहारे जिन्दा रहते हैं। अगर ये न हों तो चुनाव जीतना तो दूर, चुनाव करवाना भी मुश्किल हो जाये। इनकी एक पहचान है। इन्हें मीडिया के सहारे कुछ चीजें समझा दी जाती हैं। फिर कोई दूसरा लाख सिर पटक ले ये टस से मस नही होते। आप कितने ही तर्क, कितने ही उदाहरण दे लो, ये अपनी जगह से नही हिलते। इन्ही में से विकास करके कुछ लोग भक्त की श्रेणी में पहुंच जाते हैं और वापिस आने के सारे रास्ते बन्द कर लेते हैं।
                    इन मूढ़मतियों की एक खाशियत ये भी होती है की ये अपने किये पर पछताते जरूर हैं। जैसे किसी पार्टी को वोट देंगे, और फिर कहते फिरेंगे की मैं तो इसे वोट देकर पछता रहा हूँ। कोई कोई तो वोट डालकर बूथ से बाहर निकलने से पहले ही पछताना शुरू कर देते हैं। कुछ लोग पछताने में दो चार दिन का समय लेते हैं।
                    अब एक मूढमति मेरे मुहल्ले में रहते हैं। कल आ धमके घर पर। बोले की मैं तो बीजेपी को वोट देकर पछता रहा हूँ। मैंने पूछा क्यों तो बोले की उन्होंने योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बना दिया। अरे, इससे तो अखिलेश लाख दर्जा अच्छा था।
                     " तो आप क्या चाहते थे की बीजेपी अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाये ?" मैंने पूछा।
                      " लेकिन किसी दूसरे को बनाया जा सकता था। अगर मुझे पता होता की ये योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाएंगे तो मैं कभी इन्हें वोट नही देता। " उसने जोर देकर कहा।
                     " योगी आदित्यनाथ बीजेपी का ही सदस्य है कोई बाहर से तो लाये नही हैं। और फिर किसी दूसरे से तुम्हारा मतलब किस्से है, संगीत सोम से है, साध्वी प्राची से है, विनय कटियार से है ? आखिर तुम किसे बनाना चाहते थे ?" मैंने पूछा।
                     " इनके अलावा भी लोग हैं। किसी साफ सुथरी छवि वाले, नरम स्वभाव के, पढ़े लिखे और सबको साथ लेकर चलने वाले आदमी को बना सकते थे। " उसने जवाब दिया।
                     ' अगर उनके पास ऐसा कोई आदमी होता तो वो पहले ही उसे मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित नही कर देते। जब उन्होंने उम्मीदवार घोषित नही किया तो इसका मतलब है की वो किसी को भी बना सकते हैं। " मैंने कहा।
                     ' लेकिन समाज को लड़ाने भिड़ाने वाला आदमी अच्छा नही होता है। " उसने निराशा जाहिर की।
                    " तो तुम पहले पूछ लेते की भाई किसको बनाओगे ? या फिर कोई दूसरी पार्टी ढूंढ लेते। " मैंने कहा।
                     " इसीलिए तो पछता रहा हूँ। वैसे हमने 325 लोग चुने थे। उन्होंने एक मुख्यमंत्री और दो उप मुख्यमंत्री बनाये, लेकिन चुने हुए लोगों में से एक भी नही है। ये तो वही बात हुई की तुम सैम्पल कुछ और दिखाओ और पैसे लेने के बाद माल कोई दूसरा पकड़ा दो। " उसने उदाहरण के साथ अपनी बात कह दी।
                   अब ये पछता रहा है। पिछली बार भी पछता रहा था। कह रहा था की मैंने तो मुलायम सिंह के लिए वोट दिया था और इन्होंने अखिलेश को बना दिया। ये तो राजशाही हो गयी। तब भी मैंने पूछा था की जो आदमी पंचायत का मुखिया भी अपने घर से बाहर नही बनाता, उससे तुम क्या उम्मीद कर रहे थे। खैर ये पछताता रहा। अब फिर पछता रहा है।

Thursday, March 16, 2017

भारत में राजनैतिक सवालों पर कॉरपोरेट मीडिया का बदलता रुख।

                     अभी कुछ साल पहले की ही बात है की भारत का कॉरपोरेट मीडिया इस बात पर बहस करता था की चुनाव के बाद में बने हुए गठबंधन ( Post poll alliance ) अनैतिक होते हैं और की इस तरह के गठबंधन चुनाव से पहले ( Pre poll alliance)  होने चाहिए। तब भी वो कोई राजनीती में अनैतिकता के सवाल पर चिंतित नही था। उसकी तब की चिंता थी वामपंथ के समर्थन से बनने वाली UPA सरकारें। तब भारत का कॉरपोरेट क्षेत्र वामपंथ को अपने रस्ते की बड़ी रुकावट मानता था। इसलिए किसी भी तरह वो इस गठबंधन और समर्थन को अनैतिक सिद्ध करने पर लगा रहता था।
                     उसके बाद स्थिति बदली। बीजेपी की सरकारों का दौर शुरू हुआ।  कॉरपोरेट की पसन्दीदा सरकारें थी। इसलिए इनके सारे कारनामो को या तो मजबूरीवश लिए गए फैसले बताना शुरू किया, अगर ये सम्भव नही हुआ तो इतिहास से दूसरे अनैतिक उदाहरण ढूंढे गए और उन्हें सही सिद्ध किया जाने लगा। जब बीजेपी ने जम्मू कश्मीर में पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बनाई, तो राजनैतिक इतिहास के इस सबसे अवसरवादी फैसले को इस तरह पेश किया गया गोया इसके बिना तो देश बर्बाद हो जाता। उस दिन के बाद आपको कभी भी किसी भी न्यूज़ चेंनल पर Post Poll Alliance or Pre Poll Alliance पर कोई चर्चा नही मिलेगी।
                      उसके बाद महाराष्ट्र का उदाहरण सामने आया। किस तरह सत्ता में साझेदार दो पार्टियां एक दूसरे के खिलाफ जहर उगलती हैं और मलाई में हिस्सेदार भी हैं। उसके बाद ये बहस भी मीडिया से समाप्त हो गयी की क्या एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ने वाली दो मुख्य पार्टियां आपस में मिलकर सरकार बना सकती हैं या नही।
                     और अब ताजा उदाहरण है गोवा चुनाव का। जिसमे सभी तरह की नैतिकता और संवैधानिक तरीकों को ताक पर रखकर बीजेपी ने सरकार बना ली। इस मामले पर मीडिया की कवरेज लाजवाब थी।  सारी चीजों को छोड़कर मीडिया बहस को यहां ले आया की गडकरी ज्यादा तेज थे या दिग्विजय सिंह। जैसे ये कोई जनमत और संवैधानिक सवाल न होकर गडकरी और दिग्विजय के बीच 100 मीटर की दौड़ का मामला हो। सारे सवाल खत्म। गडकरी ज्यादा तेज थे सो बीजेपी की सरकार बन गयी।
                      अब बीजेपी के समर्थन में मीडिया सारी बहसों को यहां ले आया की पहले जब ऐसा हुआ था तब कोई क्यों नही बोला ? मुझे तो ऐसा लग रहा है की अगर मीडिया का ऐसा ही रुख रहा ( जो की ऐसा ही रहने वाला है ) तो मान लो कभी मोदीजी को बहुमत नही मिले और वो सेना की मदद से सरकार पर कब्जा कर लें तो मीडिया कहेगा की जब बाबर सेना के बल पर देश पर कब्जा कर रहा था तब तुम कहाँ थे। या मान लो देश के चार पांच बड़े उद्योगपति देश का सारा पैसा लेकर विदेश भाग जाएँ तो मीडिया कहेगा की जब मोहम्मद गौरी और गजनी देश को लूट कर  ले गए थे तब तुम क्यों नही बोले।

Monday, March 13, 2017

क्या जनमत से अलग भी लोकतंत्र का कोई मतलब होता है।

                   लोकतन्त्र कोई तकनीकी अवधारणा नही है। और न ही ये कोई किसी भी तरह, यानि येन केन प्रकारेण प्राप्त किये गए बहुमत का नाम है। पिछले दो दिन में जो कुछ गोवा और मणिपुर में हुआ है वो कम से कम लोकतन्त्र की अवधारणा के तो बिलकुल उल्ट है। यहां सवाल केवल बीजेपी का नही है। क्योंकि बीजेपी जिस संगठन से पैदा हुई है, उसकी लोकतंत्र में कभी आस्था नही रही। वो हमेशा से राजशाही के समर्थक रहे हैं। क्योंकि जिस हिन्दूवादी, वर्णवादी और स्त्री विरोधी शासन और विधान का सपना आरएसएस और बीजेपी देखती रही हैं, वो लोकतन्त्र में सम्भव नही है। इसलिए प्रधानमंत्री ने विजय जलूस में भले ही कुछ भी कहा हो ( हमे और ज्यादा जिम्मेदार और नरम होने की जरूरत है ) उसने गोवा और  मणिपुर में सरकार बनाने के लिए वही अलोकतांत्रिक और भृष्ट तरीके अपनाये और उनके लिए तकनीकी बहाने बनाये। इस पर मैं केवल एक ही सवाल पूछना चाहता हूँ की क्या गोवा और मणिपुर में वही सरकार बन रही हैं जिसके लिए लोगों ने वोट दिया था ?
                    लेकिन यहां सवाल बाकि लोगों का भी है। सबसे पहले कांग्रेस। जो इन चुनावों में सबसे ज्यादा सीट लेकर सरकार बनाने की दावेदार थी। जब बीजेपी ने जनमत को कुचलकर अपनी सरकार बनाई तो उसने क्या किया ? उसके नेता ने केवल ट्वीट किया की माफ़ करना गोवा। कांग्रेस के नेता लोगों को लामबन्द करने और उनके गुस्से की अगुवाई करने में न केवल विफल रहे, बल्कि उन्होंने इसकी कोई इच्छा तक प्रकट नही की।  क्या इस तरह की पार्टी के भरोसे लोकतंत्र की रक्षा होगी ?
                    उसके बाद दूसरा सवाल उन छोटे छोटे दलों का है जो पैसे और लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ करके लोगों से जिस पार्टी के खिलाफ वोट लेते हैं, बाद में अच्छी कीमत मिलने पर उसी के घर पानी भरने लगते हैं। अब वक्त आ गया है की बिना किसी ठोस विचारधारा और प्रोग्राम के उग आयी इन पार्टियों को सबक सिखाया जाये। इन विधायको का सामाजिक बहिष्कार किया जाना चाहिए। अगर लोग इसी तरह राजनीती के व्यापारियों को चुनते रहेंगे तो हमेशा अच्छी कीमत पर बिकते रहेंगे।
                    इसके अलावा अगला सवाल उन राजनितिक पार्टियों से भी है जो बेसक वहां बड़ी ताकत न हों, लेकिन लोगों को विरोध और धोखाधड़ी के समय कम से कम अपने साथ तो खड़े दिखाई दें।

Sunday, March 12, 2017

मणिपुर मे बंधक लोकतंत्र के मायने।

                    मणिपुर देश के सिरे पर स्थित एक छोटा सा राज्य है जिसकी समस्याओं और खबरों का कोई TRP मूल्य नही है। इसलिए उसकी खबरें दिखाने में मीडिया की कोई रूचि नही होती है। उसकी खबर तभी आती है जब वहां कोई आतंकवादी घटना होती है। अभी अभी सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव में ईरोम शर्मिला की उम्मीदवारी के कारण कभी कभी कोई खबर देखने को मिली। चुनाव में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी 28 सीटें लेकर 60 सीटों वाली सभा में बहुमत से थोड़ी दूर रह गयी। 21 सीटें लेकर बीजेपी दूसरे नम्बर पर रही और अब उसने केंद्र की सत्ता और दूसरे तरीकों का उपयोग करके वहां सरकार बनाने का दावा कर दिया। ये तरीके वो पहले अरुणाचल प्रदेश में भी अपना चुकी है।
                      लेकिन मेरा सवाल वहां के चुनाव और उसके मुद्दों को लेकर है। मणिपुर में नागा उग्रवादी और उनकी समर्थक पार्टियां लम्बी लम्बी आर्थिक नाकाबन्दी करती रही हैं। इस बार चुनाव से कई महीने पहले वहां इसी तरह की आर्थिक नाकाबन्दी कर दी गयी। नाकाबन्दी करने वाली पार्टी नागा पीपुल्स फ्रंट वहां बीजेपी की सहयोगी पार्टी है। जीवन के लिए जरूरी सामान की भारी कमी को झेलते हुए मणिपुर की जनता को चुनाव में बीजेपी वादा करती है की अगर बीजेपी जीती तो फिर कभी मणिपुर में आर्थिक नाकाबन्दी नही होगी। इसका मतलब ये भी है की अगर बीजेपी नही जीती तो ये नाकेबन्दी जारी रहेगी। क्योंकि नाकाबन्दी करने वाली पार्टी और लोग बीजेपी के सहयोगी हैं। दूसरी तरफ केंद्र में बैठी बीजेपी सरकार इस नाकाबन्दी को खत्म करने के लिए कोई गम्भीर प्रयास नही करेगी। इस नाकाबन्दी से परेशान लोगों के एक हिस्से ने बीजेपी को वोट दिया, ठीक उसी तरह जैसे 2002 के दंगों के बाद जान बचाने के लिए गुजरात के मुसलमानो ने बड़ी संख्या में बीजेपी को वोट दिया था।
                      इस तरह मणिपुर में जनता को बंधक बना कर चुनाव जीतने की कोशिश की गयी। दूसरी तरफ वहां की सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी ने वहां की नाकाबन्दी को खत्म करवाने के लिए कोई असरकारक प्रयत्न किया हो ये भी दिखाई नही देता। संसद में छोटे छोटे सवालों पर कार्यवाही रोकने वाली कांग्रेस पार्टी ने इस सवाल पर कभी संसद नही रोकी। कांग्रेस की सरकार अगर कायम है तो उसे मणिपुर के लोगों की तकलीफों से क्या लेना देना है। इसलिए इस बंधक लोकतंत्र के क्या मायने हैं इसे लोगों को ठीक से समझ लेना चाहिए।

अमेरिका में भारतियों पर हमलों को लेकर सरकार के ढीले रुख का कारण।

                  अमेरिका में जब राष्ट्रपति का चुनाव हो रहा था और रिपब्लिकन उम्मीदवार ट्रम्प मुस्लिमों के खिलाफ जहर उगल रहा था, तब भारत में कई संगठन उसकी जीत के लिए हवन कर रहे थे। उन्हें लगता था की ट्रम्प की जीत के बाद मुसलमानो के प्रति उसके रुख से यहां हिंदुस्तान में इन संगठनों की राजनीती और विचारधारा को नया समर्थन मिलेगा। लेकिन जीतने के बाद ट्रम्प ने जिस तरह बाहर से आने वाले हर आप्रवासी पर प्रतिबन्ध लगाने शुरू किये, तो इन संगठनों ने चुप्पी साध ली।
                   असल में ट्रम्प भी उसी कट्टर राष्ट्रवादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं जो अमेरिका में बेरोजगारी से लेकर आतंकवाद तक हर समस्या का सरलीकरण करके बाहर से आने वाले लोगों को इसका जिम्मेदार मानती है। इसके साथ ही बेरोजगारी और आतंकवाद से जूझ रहे अमेरिकी नोजवानो को एक स्पष्ट दुश्मन दिखला कर उन्हें अपने पक्ष में करना आसान हो जाता है। अब इसमें भारतीय समुदाय भी इसी दुश्मन वर्ग में शामिल हो जाता है। इसलिए एक तरफ सरकार उन पर प्रतिबन्ध लगाने के नए नए कानून बनाती है तो दूसरी तरफ उग्र और अति उत्साही लोग उन पर हमले कर रहे हैं।
                    लेकिन भारतियों पर इतने हमलों के बावजूद, हमारी सरकार की प्रतिक्रिया एकदम बेदम और ढीली ढाली रही है। इसका सबसे बड़ा कारण ये है की सत्ता में बैठा गुट भी उसी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता है। वो लगातार एक धार्मिक समुदाय को देश की समस्याओं के लिए जिम्मेदार ठहराता रहा है और उसके खिलाफ राजनीती करके लोगों को गोलबन्द करता रहा है। यहां तो खुद अपने ही देश के दूसरे हिस्सों से गए लोगों पर मुम्बई में हमले होते रहे हैं और हमले करने वाले लोग और पार्टियां मजे से सरकार में हिस्सेदार रही हैं। इसलिए जब हम विचारधारा के रूप में इनका समर्थन करते हैं तो ऐसी घटनाओं पर विरोध करते वक्त मुंह पोपला हो जाता है और आवाज हलक से बाहर नही निकलती।
                     इसका एक बहुत ही शानदार उदाहरण हमारे सामने है। सन 2000 में अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री थे। उस समय बीजेपी ने सोनिया गाँधी के विदेशी मूल के मुद्दे को पूरे जोर शोर से उठाया था। यहां तक की उसके बाद के समय में इसी मुद्दे पर शुष्मा स्वराज और उमा भारती अपने सिर के बाल कटवाने की धमकी दे रही थी। ठीक उसी समय 2000 में फिजी में भारतीय मूल के प्रधानमंत्री महेंद्र चौधरी का तख्ता पलट दिया गया। तख्ता पलटने वाले जार्ज स्पेट ने यही कहा की कोई विदेशी मूल का व्यक्ति फिजी का प्रधानमंत्री कैसे हो सकता है। ये वही मुद्दा था जो यहां भारत में बीजेपी और आरएसएस उठा रहे थे। मुझे अच्छी तरह याद है की तब पूरे एक हफ्ते तक भारत सरकार ने कोई प्रतिक्रिया तक नही दी। आखिर में महेंद्र चौधरी को हटा दिया गया और संविधान बदल कर उसमे उसके चुनाव तक लड़ने पर पाबन्दी लगा दी गयी। लेकिन अपनी  गलत विचारधारा के चलते वाजपेयी जी और बीजेपी इसमें कोई हस्तक्षेप नही कर पाई। उनका खुद का थूका हुआ उनके मुंह पर आ गिरा। ठीक यही हालत अब है। इसी पृथकतावादी विचारधारा के चलते ये सरकार इस मुद्दे पर जोर से बोलने का नैतिक साहस ही नही रखती।

Saturday, March 11, 2017

सभी पांच राज्यों में सत्ताधारी पार्टियों की हार।

                 कल सम्पन्न हुए पांच राज्यों के परिणामो से ये बात साबित हुई है की सभी राज्यों में शासन करने वाली पार्टियां हार गयी हैं। इन परिणामो को मीडिया और कुछ दूसरे लोग इस तरह पेश कर रहे हैं जैसे पुरे देश ने नरेंद्र मोदी और बीजेपी के एजेंडे को स्वीकार कर लिया है। कॉरपोरेट मीडिया के सरकार के साथ अपने हित जुड़े हैं और मीडिया समूह के मालिकों के अपने हित जुड़े हैं। इसलिए हमारा कॉरपोरेट लूट में बड़ी छूट पाने के लिए बहुत पहले से नरेन्द्र मोदी का समर्थन करता रहा है। इसलिए मीडिया की हिस्सेदारी ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में बीजेपी की जीत को थोड़ा और शानदार बना दिया है। लेकिन ये बात किसी भी तरह से सही नही है की नरेन्द्र मोदी और बीजेपी के एजेंडे को पुरे देश ने स्वीकार कर लिया है। अगर ये बात सही है तो ऐसा कहने वाले मीडिया और उसमे बैठे विशेषज्ञों को कुछ सवालों के जवाब देने होंगे। जैसे -

१.  मीडिया बताये की गोवा और पंजाब में जहां बीजेपी और उसकी सहयोगियों की सरकारें थी, वहां वो क्यों हारे ?

२.  हर राज्य में बीजेपी को दूसरे दलों के नेताओं को शामिल करने की जरूरत क्यों पड़ती है ? अगर लोग केवल मोदीजी के साथ हैं तो वो उन बीजेपी के कार्यकर्ताओं को टिकट क्यों नही देते जो सालों से पार्टी के लिए काम तो करते हैं लेकिन बहुत जाने पहचाने नही हैं ?

३. गोवा को बीजेपी अपनी मॉडल स्टेट के रूप में प्रस्तुत करती रही है, वहां उसके मुख्यमंत्री भी हार गए।  ऐसा क्यों हुआ ?

                   इसलिए इन चुनाव परिणामो को उसके सही परिपेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। अगर सत्ता विरोधी ये लहर इसी तरह चलती रही तो गुजरात, मध्यप्रदेश और राजस्थान में बीजेपी को लेने के देने पड़ सकते हैं। जहां पहले किये गए वायदों का हिसाब बीजेपी को देना है। गुजरात के पिछले चुनावो में गरीबों को दस लाख घर देने का वायदा हवा में ही है।

Monday, March 6, 2017

नए बैंक चार्जिज ( Bank Charges ) से बचने के उपाय।

                   सरकार ने नोटबन्दी के बाद लोगों को इसके लिए मजबूर किया की वो अपने खर्चे चलाने के लिए नकद की बजाय डिज़िटल पेमेन्ट करें। उसके बाद डिज़िटल पेमेन्ट का प्लेटफार्म उपलब्ध करवाने वाली कम्पनियों ने इसका इस्तेमाल करने वालों पर कई तरह के चार्ज लगा दिए। उसके बाद अब बैंको ने भी छोटे ग्राहकों पर बैंक से लेनदेन करने पर कई तरह के चार्ज लगाने की घोषणा कर दी। बैंको में सामान्य आदमी जो सेविंग खाता रखता है और जो कर्मचारी सैलरी खाता रखते हैं, ये नए चार्ज उन पर लागू होंगे। एक तरफ सरकार ने कानून बना कर सैलरी को केवल बैंक में ट्रांसफर करने का आदेश जारी कर दिया और दूसरी तरफ बैंको ने उन खातों पर चार्ज लगाने की घोषणा कर दी। दूसरी तरफ सरकार ने आम आदमी को मिलने वाली हर तरह की सब्सिडी और सहायता के लिए बैंक खाता होने की शर्त लगा दी और बैंको ने उन पर चार्ज लगा दिया।
                     बड़े कॉरपोरेट घरानों द्वारा कर्जा न चुकाने के चलते बैंको को जो घाटा हो रहा है उसे पूरा करने के लिए उन्हें आम आदमी की जेब काटने की छूट दे दी गयी। पहले तेल कम्पनियों को, उसके बाद रेल मंत्रालय को और  बैंको को ये छूट मुहैया करवा दी गयी है।  गरीबों के लिए काम करने वाली सरकार के फैसले हैं।
                    इसलिए लोगों को अब थोड़ा ध्यान से लेन देन करने की जरूरत है। बैंको ने ये चार्ज दो तरह से लगाए हैं। 

१.    बैंक में बचत खाता और सैलरी खाता धारकों को अब खाते में मिनिमम बैलेंस न रखने पर चार्ज लगेगा। 

२.     बैंक से पैसे निकालने, पैसे जमा करवाने और एटीएम  इस्तेमाल करने पर चार्ज लगेगा। 

                     इससे बचने के लिए कुछ चीजों का ध्यान रखने की जरूरत है। जैसे -

१.    सैलरी खाता धारक अपने खाते से सीधे कटने वाली होमलोन या व्हीकल लोन इत्यादि की किस्तों और दूसरी सीधी पेमेन्ट होने वाली रकम को छोड़कर बाकी पैसा एक ही बार में बैंक से निकाल लें। इस पैसे को घर पर रखें और बाकी महीने का खर्च चलायें। ये पैसा सीधे बैंक से चैक के द्वारा निकालें, क्योंकि एटीएम की लिमिट कम होती है और उससे एक बार में सारा पैसा नही निकाला जा सकता है। 
२.     बचत खाता धारक अपने बैंक खाते का कम से कम उपयोग करें। उसमे बार बार पैसे जमा करवाने और निकालने से बचें। 
३.    नकद की बजाय डिज़िटल पेमेंट करने पर आपको कभी भी किसी न किसी तरह का चार्ज लग सकता है। इसलिए छोटे लेनदेन के लिए नकदी का इस्तेमाल करें और बड़े लेनदेन के लिए चैक का इस्तेमाल करें। 

Thursday, March 2, 2017

राष्ट्रवाद पर अरुण जेटली

खबरी -- राष्ट्रवाद पर आज आये अरुण जेटली के बयान पर क्या कहना है ?

गप्पी -- अरुण जेटली ने कहा है की राष्ट्रवाद कोई खराब शब्द नही है, और केवल भारत में ही इसे गलत रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
              इस पर पहली बात तो ये है की पूरी दुनिया के मानवतावादी और जाने माने और प्रगतिशील लोग राष्ट्रवाद के बारे में कोई अच्छी राय नही रखते। इस पर हजारों लेख और टिप्पणियां मौजूद हैं और ये कोई भारत का सवाल नही है।
              दूसरे, इसे जो लोग प्रयोग करते हैं उनकी मंशा पर इसका अर्थ निर्भर करता है। कोई देश आजादी की लड़ाई में अपने देशवासियों को शामिल करने के लिए इसका प्रयोग कर सकता है , तो कोई इसे किसी हमलावर देश के खिलाफ लोगों को एकजुट करने के लिए राष्ट्रवाद शब्द का प्रयोग करता है।
                लेकिन हालात तब बिगड़ते हैं जब लोगों का कोई समूह अपने ही देश के लोगों के दूसरे समूह को गद्दार और देशविरोधी साबित करने के लिए राष्ट्रवाद शब्द का प्रयोग करता है , जैसा की आरएसएस और बीजेपी कर रहे हैं। ये लोग अपने हिसाब से राष्ट्रवाद की परिभाषा तय करते हैं और उसे दूसरों पर थोपते हैं। इस प्रयास में राष्ट्रवाद शब्द न केवल विभाजनकारी भूमिका निभाता है, बल्कि एक समुदाय के खिलाफ अत्याचार और जुल्म का पर्यायवाची बन जाता है। इस तरह के प्रयोग जर्मनी से लेकर अरब तक और अफ्रीका से लेकर भारत तक होते रहे हैं। इसलिए बुद्धिजीवी इसके दुरूपयोग की सम्भावनाओ को ध्यान में रखते हुए इसे बहुत अच्छा नही मानते।
                 लेकिन अरुण जेटली इस बात को जिस मौजूदा विवाद के सन्दर्भ में उठा रहे हैं उसमे क्या वो बताएंगे की क्या आजादी खराब शब्द है जिस पर आरएसएस और बीजेपी इतना हो-हल्ला मचाये हुए है ?

Friday, February 24, 2017

व्यंग -- एक गधे से प्रेरित प्रधानमंत्री।

                 
   और चुनाव के बीच में प्रधानमंत्री ने अचानक घोषणा कर दी की वो गधे से प्रेरणा लेते हैं। जैसे ही ये खबर आयी, मेरे पडौसी तुरन्त मेरे घर में घुस आये और बोले, देखो मैं न कहता था की ये आदमी जरूर गधे से प्रेरित है। मैंने इस पर प्रतिवाद करने की कोशिश की, " देखो प्रेरणा तो कोई किसी से भी ले सकता है। हमारी अंग्रेजी की किताब में किंग ब्रुश मकड़ी से प्रेरणा लेता है। "
                     " अब बात को घुमाओ मत। प्रधानमंत्री कोई कृश्न चन्दर के पढ़े लिखे गधे से प्रेरणा नही ले रहे हैं। वो गुजरात के जंगली गधों से प्रेरणा ले रहे हैं। जो काम धाम तो कुछ करते नही हैं बस खाते  हैं और घूमते दौड़ते रहते हैं। हमारे प्रधानमंत्री भी जब से सत्ता में आये हैं, बस घूम ही रहे हैं। अब तो शायद ही कोई देश बचा हो। " पड़ोसी ने तर्क दिया।
                     " लेकिन प्रधानमंत्री ने तो कहा है की वो देश के लिए गधे की तरह काम करते हैं। इसलिए  जंगली गधे से तो प्रेरित नही लगते। " मैंने फिर टोका।
                    " अब तक जब लोग कहते थे की प्रधानमंत्री गधे की तरह काम करते हैं तो तुम्हे बड़ा एतराज था। अब खुद कह रहे हो तो ये सम्मान की बात हो गयी। खैर छोडो, चलो तुम्हारी बात भी अगर मान लें और ये मान लें की प्रधानमंत्री किसी कुम्हार या धोबी के गधे से प्रेरणा ले रहे हैं तो भी उससे क्या निष्कर्ष निकलता है ?  कुम्हार का गधा अपने आप कुछ नही करता है। वो सब कुछ कुम्हार की मर्जी से करता है। जब हम कहते थे की ये प्रधानमंत्री भी कुछ पूँजीपतियों के कहने से सब कुछ करता है, तब भी तुम एतराज करते थे। " पड़ोसी ने अगला तर्क दिया।
                     " लेकिन गधे में भी कुछ तो खासियत होती होगी ?" मैंने कहा।
                     " हाँ, होती है। होती क्यों नही। एक तो गधे को तेजी पसन्द नही है। उसकी चाल सुस्त होती है। इसी खासियत के कारण प्रधानमंत्री ने नोटबन्दी करके अर्थव्यवस्था की चाल सुस्त कर दी। दूसरी ये की वो काम तो कुम्हार का करता है और चरता है किसान के खेत में। यही काम हमारे प्रधानमंत्री भी कर रहे हैं। " मेरे पड़ोसी ने पहले से तैयार तर्क दे मारा।
                        मुझे गुस्सा आया। मैंने कहा की गधे की खासियत तो ये भी होती है की बोलता कुछ नही है बस चुपचाप अपना काम करता रहता है। हमारे प्रधानमंत्री तो बहुत बोलते हैं। यहां तक की कुछ लोग तो ये भी कहते हैं की प्रधानमंत्री बस बोलते ही हैं और करते कुछ नही।
                      मेरे पड़ोसी ने ठहाका लगाया। " अरे भई, वो गधे से प्रेरित हैं खुद गधे थोड़ा न हैं। और ये तुलना मैंने नही की है, खुद प्रधानमंत्री ने की है। "
                      ये कह कर पड़ोसी विजेता के अंदाज में बाहर चले गए और मैं पिटे हुए के अंदाज में सिर सहलाता रह गया।

Thursday, February 9, 2017

नोटबंदी - जीना भी मुश्किल, मरना भी मुश्किल।

           ये एक पुरानी हिंदी फिल्म का गीत है जो अब हम सब भारतीयों पर खरा उतर रहा है। जब से नोटबन्दी हुई है और सरकार रोज नए नए नियम तय कर रही है उससे लोगों का जीना तो मुश्किल हो ही गया था, अब मरणा भी मुश्किल हो गया है। जैसे - 
             रिजर्व बैंक ने करंट खातों से रकम उठाने की सीमा खत्म करने की घोषणा कर दी। साथ ही एटीएम से भी सीमा हटा ली गयी। लेकिन इसके साथ निजी कम्पनियों की तरह एक टर्म एंड कन्डीशन लगा दी। वो ये है की रिजर्व बैंक ने भले ही सीमा हटा ली हो, लेकिन बैंक अपनी सुविधा के अनुसार सीमा तय कर सकते हैं। अब हाल ये है की बैंक में 20000 का चैक लेकर जाओ तो बैंक कहता है की केवल 12000 मिल सकते हैं। अब क्या करें ? यानी जीना भी मुश्किल, और मरना भी मुश्किल।
              यही हाल एटीएम का है। सीमा समाप्त कर दी गयी है लेकिन एटीएम बन्द हैं। पुरे शहर में 15 - 20 % एटीएम ही चालू हैं। उनमे भी कब कैश खत्म हो जायेगा पता नही है। मार्च के बाद सरकार और RBI सारी सीमाएं हटाने की घोषणा कर देंगी। लेकिन देश बन्द एटीएम और बैंक में नाकाफी नकदी के भरोसे रह जायेगा।
              दूसरा मुद्दा सरकार के दूसरे नियमो का है। सरकार कहती है की आप घर पर एक सीमा से ज्यादा पैसा नही रख सकते। अगर जरूरत है तो डिजिटल पेमेन्ट करिये। डिजिटल पेमेन्ट करेंगे तो चार्ज लगेगा। आप बैंक से नकदी निकालेंगे तो चार्ज लगेगा। आपकी मजबूरी है की आप चार्ज देकर भुगतान करें। सारा देश बंधक हो गया और इसको लोकतंत्र कहते हैं। ये पूरी दुनिया में अपनी तरह का अकेला लोकतंत्र है। प्रधानमंत्री कहते हैं की पूरी दुनिया के अर्थशास्त्रियों के पास हमारी नोटबन्दी का मूल्यांकन करने का पैमाना ही नही है। यानि पूरी दुनिया के अर्थशास्त्रियों ने अब तक जो पढ़ा है वो सब बेकार गया। अब इस लोकतंत्र के मूल्यांकन के लिए भी दुनिया के समाजशास्त्रियों और राजनीती के विद्यार्थियों को नए पैमाने तय करने पड़ेंगे। उन्हें ये सीखना होगा की अब तक वो जिसे तानाशाही कहते आये हैं, उसे अब लोकतंत्र में कैसे फिट किया जाये।
               अब आपको जिन्दा रहने का चार्ज देना पड़ेगा। कैश निकलोगे तो चार्ज और डिजिटल पेमेंट करोगे तो चार्ज। और लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए इसमें भी बायें हाथ से जेब काटने का प्रबन्ध किया गया है। सरकार कहती है की कार्ड से पट्रोल खरीदने पर ग्राहक को कोई चार्ज नही देना पड़ेगा और की चार्ज का भुगतान तेल कम्पनियां करेंगी। यानि तेल कम्पनियां चार्ज का खर्च निकालने के लिए कीमत उस हिसाब से तय करेंगी। सरकार तो पहले ही कह चुकी है की अब तेल की कीमतें तय करना कम्पनियों पर छोड़ दिया गया है और सरकार का उसमे कोई दखल नही है। यानि अब आपको तेल की कीमत में चार्ज जोड़ कर देना होगा। इसी तरह बाकि सामान की कार्ड पेमेंट करने पर दुकानदार को जो चार्ज देना होता है वो सामान की कीमत में जुड़ जाता है। जाहिर है की कोई भी व्यापारी अपने पास से उसका भुगतान क्यों करेगा। इस तरह अब आपकी जेब काटने से पहले आपको देशभक्ति और भृष्टाचार से लड़ने वाले सिपाही होने का एनस्थिसिया दिया जायेगा और फिर आपकी जेब काटी जाएगी। और आप जेब कटवाकर ख़ुशी ख़ुशी मोदी मोदी करते हुए घर चले जायेंगे। जो लोग सरकार की इस बाजीगरी को नही समझते हैं और भक्ति की मुद्रा में हैं उनको तो कोई परेशानी नही है। जो लोग इसको समझते हैं उनके लिए तो जीना भी मुश्किल, मरना भी मुश्किल।

नोटबन्दी से कर्ज सस्ता होने की उम्मीद भी समाप्त।

                 

p chidambaram image speeking in parliament
8 नवम्बर को प्रधानमंत्री मोदी ने नोटबन्दी की घोषणा करते हुए इसके चार उद्देश्य बताये थे। उसके बाद हर दिन गुजरने के साथ उन्हें और उनकी सरकार को ये अहसास होने लगा की इन उद्देश्यों में से कोई भी पूरा नही होने जा रहा है। इसके बाद हर रोज वो और उनकी पार्टी इस पर अपना स्टैंड बदलने लगी। इसी क्रम में भृष्टाचार और कालेधन से होती हुई कैशलेस इंडिया की बातें करने लगी। लोगों को डिज़िटल लेनदेन करने के लिए मजबूर करने के तमाम उपाय किये गए। और कैशलेस होने का सबसे बड़ा फायदा ये बताया गया की एक तो इससे टैक्स चोरी रुकेगी, दूसरा बैंको के पास बड़ी मात्रा में कैश उपलब्ध होने के कारण लोगों को सस्ता कर्ज मिलेगा, जिससे अर्थव्यवस्था में तेजी आएगी। सरकार के सारे मंत्री लोगों को सस्ते कर्ज के फायदे गिनवाने लगे। नोटबन्दी की विफलता को छुपाने की ये सरकार की आखिरी कोशिश थी। लेकिन पिछले तीन दिन में ये कोशिश भी दम तोड़ गयी।
                        रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने मुद्रा पालिसी पर विचार करते हुए ये कह कर ब्याज दर घटाने से इंकार कर दिया की खुदरा महंगाई दर अपनी जगह चिपकी हुई है और कच्चे तेल और धातुओं के मूल्य में होने वाली बढ़ोतरी और रूपये की घटती हुई कीमत के कारण इसके बढ़ने का खतरा मौजूद है। इसलिए रेपो रेट में कोई भी बदलाव सम्भव नही है। इसके साथ की रिजर्व बैंक ने ब्याज दर कम होने के सायकिल के समाप्त होने की घोषणा करके भविष्य में ब्याज कम होने की सम्भावना पर भी पूर्णविराम लगा दिया।  RBI के निर्णय की घोषणा होते ही सभी बैंको के अध्यक्षों  घोषणा कर दी की और ब्याज कम करने के लिए अब बैंकों के पास कोई जगह ( रूम ) नही है। यानि ब्याज कम होने का आखरी बहाना भी समाप्त हो गया। अब सरकार के पास नोटबन्दी से हासिल फायदा गिनाने के लिए कुछ नही बचा है। नोटबन्दी का फैसला एक आपराधिक और गैरजिम्मेदाराना फैसला था जिसने देश की अर्थव्यवस्था को गंभीर और स्थाई नुकशान पहुंचाया है।
                        आज बजट पर चर्चा के दौरान राज्य सभा में बोलते हुए पूर्व वित्त मंत्री पी चिदम्बरम ने जिस तरह आंकड़ों के साथ सरकार के इस निर्णय की आलोचना की, उसका कोई भी जवाब बीजेपी के पास नही था। उसके नेता केवल कांग्रेस के 44 सीटों पर आ जाने जैसे घिसेपिटे जुमले ही दोहराते रहे। उन्होंने चिदम्बरम की एक भी बात का जवाब नही दिया।

Demonetisation a grave mistake by govt: P Chidambaram

                       आने वाले समय में नोटबन्दी सरकार के लिए विफलता का मील का पत्थर साबित होने जा रही है।

Tuesday, February 7, 2017

कुत्तों वाली परम्परा और प्रधानमंत्री मोदी

                  
modiji and other members image in parliyament
   आज संसद में बोलते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस नेता के इस बयान का की आरएसएस  के परिवार से किसी ने कोई क़ुरबानी नही दी, यहां तक की एक कुत्ता तक नही मरा, जवाब देते हुए कहा की वो कुत्तों की परम्परा में पले बढ़े नही हैं।
                      अब होने को तो इस बयान के बहुत से मतलब हो सकते हैं। लेकिन हमारे देश की महान परम्परा के अनुसार अगर किसी वाक्य के चार मतलब होते हों, तो छह तो निकाल ही लिए जाते हैं। सारे देश में इस बयान पर बहस हो रही है। लोग मजाक उड़ा रहे हैं। उनमे से एक आदमी की राय इस प्रकार है -
                        प्रधानमंत्री ने आखिर इस बात को स्वीकार कर ही लिया। अब तक हम कहते थे तो वो इंकार करते थे। आज मान लिया। कुत्तों वाली परम्परा का मतलब होता है वफादारी की परम्परा। पूरी दुनिया में कुत्ते को वफादारी का प्रतीक माना जाता है। और जब हम कहते थे की आरएसएस की परम्परा देश से गद्दारी की परम्परा रही है, उसने हमेशा दुश्मनो का साथ दिया। आजादी की लड़ाई में जब सारा देश गोलियां खा रहा था, लोग जेल जा रहे थे, तब आरएसएस अंग्रेजो का समर्थन कर रहा था। वह देश की जनता और अपने सदस्यों को आजादी की लड़ाई से अलग रहने को कह रहा था। अंग्रेजो के लिए मुखबिरी कर रहा था। आजादी के सिपाहियों के खिलाफ गवाहियां दे रहा था। जब मुस्लिम लीग बंटवारे की मांग कर रही थी तब उसके नेता मुस्लिम लीग के साथ साझा सरकार चला रहे थे। जब बंटवारा हुआ और दंगे भड़के, तब उसके सदस्य सीधे तौर पर दंगों में शामिल थे। जब आजादी मिली तब उसके सदस्य तिरंगा जला रहे थे। और यहां तक की उसके लोगों ने आजादी की लड़ाई के सबसे बड़े नेता और राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का कत्ल भी कर दिया। वो अलग बात है की आरएसएस गोडसे के बारे में कहता है की उसने गाँधी हत्या से पहले आरएसएस छोड़ दिया था। लेकिन जो संगठन अपनी सदस्यता का रिकार्ड तक नही रखता हो उसकी इस बात पर कितना भरोसा किया जा सकता है। गोडसे के धरवाले तो आज भी कहते हैं की गोडसे ने कभी आरएसएस नही छोड़ा था।
                         उसके बाद उसने अपनी साम्प्रदायिक विचारधारा से हमेशा इस देश की एकता अखण्डता और भाईचारे की जड़ों में मट्ठा डाला। आजादी के बाद हुए कितने ही दंगो की जाँच करने वाले आयोगों ने उसमे आरएसएस का हाथ होने की बात कही है। इसलिए जो संगठन देश  के खिलाफ काम करता हो, उसकी तुलना कुत्तों वाली परम्परा से कैसे की जा सकती है। अच्छा हुआ आज प्रधानमंत्री ने खुद ही मान लिया।

Monday, January 9, 2017

आंकड़ों की कलाबाजी से देश को गुमराह कर रहे हैं अरुण जेटली।

             
  नोटबन्दी के फैसले के बाद सरकार की साँस फूली हुई है। सरकार को अच्छी तरह मालूम है की नोटबन्दी अपने घोषित उद्देश्यों में पूरी तरह फेल हो चुकी है। उल्टा इसके कारण लोगों और अर्थव्यवस्था को जो नुकशान हुआ है वो बहुत बड़ा है। लेकिन चूँकि ये बीजेपी की सरकार है जिसने कभी भी अपनी गलती स्वीकार नही की, चाहे कुछ भी हो जाये। ठीक उसी तरह जैसे भृष्टाचार के किसी भी आरोप की जाँच की मांग को नही मानकर ये रट लगाए रखना की सरकार पर एक भी भृष्टाचार का आरोप नही है।  इसलिए पूरी पार्टी और सरकार, मीडिया का इस्तेमाल करके इस तरह का सन्देश देने की कोशिश कर रही हैं जैसे नोटबन्दी से फायदा हुआ हो। इसके लिए पूरी सरकार को इस काम पर लगा दिया गया है की किसी भी तरह आंकड़ों को तोड़ मरोड़ कर ये सिद्ध किया जाये की नोटबन्दी से फायदा हुआ है।
                 इसी क्रम में वित्तमंत्री अरुण जेटली हररोज आंकड़ों की कलाबाजी से देश को गुमराह करने की कोशिश करते हैं। मीडिया में दाऊद की सम्पत्ति जब्त करने जैसी झूठी खबरें प्लांट की जा रही हैं। अरुण जेटली जिस तरह से अर्थव्यवस्था के आंकड़ों की कलाबाजी कर रहे हैं उसे अगर ठीक तरह से समझ जाये तो वो इस तरह से है।
                 एक आदमी अपने बच्चे को लेकर डॉक्टर के पास गया और कहा की बच्चे की ग्रोथ नही हो रही है। डॉक्टर ने उसे दो महीने में सब कुछ ठीक करने का भरोसा देकर मोटी फ़ीस ऐंठ ली। दो महीने के बाद बच्चे का वजन और कम हो गया। बच्चे के बाप और डॉक्टर का झगड़ा हुआ। लोग जमा हो गए। डॉक्टर कह रहा था की बच्चे का विकास हुआ है और उसका वजन बढ़ गया है। इसके तर्क में डॉक्टर ने लोगों को बताया की बच्चे का वजन पिछली नवम्बर में 8 किलो था जो अब 9 किलो हो गया है, तो बताओ वजन बढा है की नही ? बच्चे का बाप कह रहा है की अक्टूबर में जब मैं बच्चे को डॉक्टर के पास लेकर आया था तब उसका वजन 10 किलो था जो अब घटकर 9 किलो रह गया है।
                  अरुण जेटली ठीक उस डॉक्टर की तरह बात कर रहे हैं। वो नवम्बर के टैक्स और जीडीपी के आंकड़ों की तुलना पिछले साल से कर रहे हैं जबकि असलियत ये है की सितम्बर और अक्टूबर के मुकाबले नवम्बर  दिसम्बर में टैक्स और जीडीपी में कमी आयी है और अर्थव्यवस्था में मंदी साफ दिखाई दे रही है। लेकिन अरुण जेटली इनकी तुलना करना ही नही चाहते।
                   नोटबन्दी के बाद सरकार कोई भी आंकड़ा सार्वजनिक नही करना चाहती। ना तो रिजर्व बैंक के गवर्नर और ना ही वित्त मंत्री, ये बताने को तैयार हैं की कितने नोट वापिस जमा हो गए। और ना ही ये बताने को तैयार हैं की कितना कालाधन पकड़ा गया। इसको छिपाने के लिए इस तरह के बयान दिए जा रहे हैं की इनकम टैक्स, बैंको में जमा हुए 4 लाख करोड़ रुपयों की छानबीन कर रहा है। ताकि लोगों को ऐसा लगे की कुछ तो हाथ लगा है। जबकि असलियत ये है की इनकम टैक्स के नोटिस देने भर से या छानबीन करने से कोई धन काला नही हो जाता। इससे पहले इनकम टैक्स ने जिन लोगों की छानबीन करके जिन लोगों को टैक्स भरने के लिए कहा था, वो सारे केस कोर्ट में पैंडिंग हैं और अब सरकार उसके निपटारे के लिए रोज नई स्कीमो की घोषणा करती है। अगर इनकम टैक्स इतना सक्षम है तो उनकी उगाही क्यों नही कर लेता। और दूसरा इनकम टैक्स अगर किसी के खिलाफ टैक्स चोरी का मामला बनाता भी है और वो कोई देशी विदेशी बड़ी कम्पनी होती है तो सरकार खुद इनकम टैक्स के खिलाफ खड़ी हो जाती है, जैसे वोडाफोन के केस में हुआ।
                  इसलिए आंकड़ों की बाजीगरी से देश को गुमराह करना बन्द कीजिये और सीधे सीधे ये बताइये की नोटबन्दी से पहले महीने, यानि अकटूबर के मुकाबले क्या पोजिशन है।

Friday, January 6, 2017

"खूनबन्दी " और उसके बाद के हालात।

         और एक दिन एक देश के प्रधानमंत्री ने टीवी पर आकर घोषणा कर दी,
मित्रों,
            जैसा की आप जानते हैं की देश में खून का काला कारोबार चल रहा है। किसी भी गरीब आदमी को किसी भी ब्लड बैंक से खून नही मिलता। हालाँकि ये गरीबों का खून होता है जो बैंको में जमा है। डॉक्टर और ब्लड बैंक वाले मिलकर खून का व्यापार करते हैं। लोगों से खून पैसे लिए जाते हैं। इसके अलावा ये भी जानकारी है की बिना चेक किये खून दे दिया जाता है। जिससे लोग गम्भीर बिमारियों का शिकार हो रहे हैं। इनमे से कुछ बीमारियां तो लाईलाज होती हैं। इसके अलावा कुछ लोग बाकायदा खून बेचने का धंधा करते हैं। ये लोग तीन महीने के तय समय से पहले भी दुबारा खून दे देते हैं। अभी अभी ये खबर भी आयी है की लोग नकली खून भी बना रहे हैं और उसे मार्केट में बेच रहे हैं। कुल मिलाकर हालत बहुत ही खराब हो गयी है।
            इसलिए सरकार ने ये फैसला लिया है की आज आधीरात के बाद किसी भी ब्लड बैंक में रखा खून गैरकानूनी घोषित किया जाता है। आधी रात के बाद पहले का कोई भी खून किसी काम का नही रहेगा। अब इसके बाद खून के लिए सरकार ने कुछ नियम बनाये हैं। अब कोई भी खून देने वाला पहले सरकारी हस्पताल जा कर अपनी  टेस्टिंग करवाएगा और इस बात का सर्टिफिकेट प्राप्त करेगा की वो खून देने लायक है या नही। उसके बाद उसे शपथपत्र के द्वारा ये बताना पड़ेगा की वो जो खून दान कर रहा है वो उसे लेने वाले को व्यक्तिगत रूप से जानता है। साथ ही उसे इस बात का सबूत भी देना होगा की उसने खून बेचा  नही है। अब हर ब्लड बैंक को इसका रिकार्ड रखना होगा की किस आदमी का खून किसको चढ़ाया गया है। इससे पहले खून लेने वाले को डॉक्टर से इस बात का प्रमाणपत्र लेना होगा की उसे खून की जरूरत है और कितने की है। उसके बाद डॉक्टर को ये भी लिखकर देना होगा की ये खून देने के बाद मरीज बच जायेगा और खून बेकार नही जायेगा।
              मित्रों,
                       इन नियमो के बाद खून की कालाबाज़ारी बिलकुल खत्म हो जाएगी। साथ ही प्रदूषित खून चढ़ाने की शिकायतें भी खत्म हो जाएगी। साथ ही खून को बेचने का कारोबार भी खत्म हो जायेगा।
                अगले दिन से सभी ब्लड बैंको पर लम्बी लम्बी लाइन लगी हुई थी। खून दान करने वालों को वापिस भेज जा रहा था क्योंकि उनके पास जरूरी कागजात नही थे। खून लेने वालो के लिए खून उपलब्ध ही नही था। सारे ऑपरेशन रोक दिए गए थे। एक्सीडेंट में घायल होने वाले लोग खून के अभाव में मर रहे थे। चारों तरफ हाहाकार मच गया।
               इस पर देश के स्वास्थ्य मंत्री ने टीवी पर बयान दिया की देश में खून की कोई कमी नही हैं। जरूरत के हिसाब से पूरा खून मौजूद है। और जो लोग सरकार के इस फैसले पर सवाल उठा रहे हैं, दरअसल वो खून का काला कारोबार करने वाले लोग हैं जिनकी कमर टूट गयी है।
                  उसके बाद देश सकुशल चल रहा है। लोग सरकार के फैसले को सही बता रहे हैं। जो मर रहे हैं उन्हें कुछ दिन तकलीफ सहने और इंतजार करने को कहा जा रहा है।

Wednesday, January 4, 2017

एक फरवरी को बजट पर क्या है विपक्ष का विरोध ?

             सरकार ने बजट पेश करने की तारीख को 28 फरवरी से बदल कर 1 फरवरी कर दिया है। सरकार के इस  कदम का पुरे विपक्ष ने विरोध किया है। खासकर जब चुनाव आयोग ने चार फरवरी को चुनाव की तिथि घोषित कर दिया है। सरकार  का कहना है की बजट को चुनाव से नही जोड़ना चाहिए। इस पर विपक्ष का कहना है की चुनाव को बजट से विपक्ष नही सरकार जोड़ रही है। वरना सालों पुराणी परम्परा को बदलने का कोई खास कारण सरकार नही बता पाई। इस पर विपक्ष ने जो सवाल उठाये हैं वो इस तरह हैं। -

१.  चार फरवरी को चुनाव है और दो फरवरी को चुनाव प्रचार बन्द हो जायेगा। इसलिए बजट में लोगों के मुद्दों पर बहस ही नही हो पायेगी। और सरकार बजट की कुछ योजनाओं को लोगों के हित की योजनाओं के रूप में पेश कर सकती है जो सही नही होगा।
२.  चुनाव घोषित होने पर आचार सहिंता लागु हो जाती है, जिसके बाद सरकार ऐसा कोई काम या घोषणा नही कर सकती जो लोगों को लुभाने और द्वारा चुनाव को प्रभावित कर सकती हो। इस सूरत में चुनाव से दो दिन पहले बजट पेश करना एक तरह से चुनाव आचार सहिंता का उलन्घन माना जाना चाहिए।
३.  एक फरवरी को बजट पेश करने पर माकपा नेता सीताराम येचुरी का कहना है की साल का चौथा क्वार्टर एक जनवरी से शुरू होता है और आर्थिक सर्वेक्षण 31 जनवरी को पेश करना पड़ेगा। इस सर्वेक्षण में साल के अंतिम क्वार्टर में नोटबन्दी से हुए नुकशान के आंकड़े शामिल नही होंगे। सरकार नोटबन्दी के नुकशान को लोगों के सामने आने से पहले ही चुनाव और बजट पेश करना चाहती है ताकि जुबानी तौर पर नोटबन्दी को देश और लोगों के हित में होने का गलत प्रचार कर सके।
                        इन सारी चीजों को देखते हुए चुनाव आयोग ने इस पर विचार करने का आश्वासन दिया है।

नोटबंदी का असर - सूरत में जेम्स और ज्वैलरी की प्रदर्शनी " स्पार्कल -2017 " स्थगित।



एक तरह सरकार और वित्तमंत्री दावा कर रहे हैं की नोटबन्दी के बाद अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ है, वहीं दूसरी तरफ बाजार से जो खबरें आ रही हैं वो कुछ और कहानी कहती हैं। सूरत देश का सबसे बड़ा डायमंड हब है। यहां दिसम्बर में हर साल जेम्स और ज्वैलरी के लिए "स्पार्कल " के नाम से प्रदर्शनी का आयोजन होता था। इस प्रदर्शनी के आयोजक दक्षिण गुजरात चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स और गुजरात सरकार होते थे। इसमें हीरे और आभूषण के व्यवसाय से जुडी कम्पनियां अपने उत्पादों का प्रदर्शन और बिक्री करती थी।
                लेकिन इस बार नोटबन्दी के कारण इस प्रदर्शनी में हिस्सा लेने वाली कम्पनियों की तरफ से कोई उत्साह नही दिखाया जा रहा है। पिछले साल हिस्सा लेने वाली कम्पनियों की संख्या 120 थी, लेकिन इस बार 70 से भी कम कम्पनियों ने बुकिंग करवाई। इसलिए अब " स्पार्कल - 2017 " को स्थगित कर दिया गया है। अब इसका आयोजन 20 जनवरी के आसपास होने की सभावना है।