Monday, April 24, 2017

सुरक्षा बलों पर हमलों की खबरें -- राष्ट्रवादी और राष्ट्रद्रोही

खबरी --क्या सुरक्षा बलों पर हमले भी राष्ट्रवादी और राष्ट्रद्रोही होते हैं ?

गप्पी -- बिलकुल, आज ही देख लो। सुरक्षा बलों पर हमलों की तीन खबरें हैं। जिसमे दो हमले राष्ट्रद्रोही हैं और एक राष्ट्रवादी है। पहला हमला कश्मीर में पत्थर बाजों द्वारा सुरक्षा बलों पर किया गया जो देशद्रोही लोगों द्वारा किया गया हमला है। दूसरा हमला छत्तीसगढ़ में CRPF पर हुआ, ये भी देशद्रोहियों द्वारा किया गया हमला है। लेकिन एक हमला आगरा में पुलिस बल पर किया गया, ये हमला राष्ट्रवादी हमला था जो देश की संस्कृति की रक्षा के लिए किया गया था। उसी तरह जम्मू में खानाबदोश कबीले पर गौ रक्षकों द्वारा किया गया हमला तो शुद्ध राष्ट्रवादी हमला था। जब एक ही देश में एक जगह गाय का कत्ल संविधान और संस्कृति के खिलाफ और दूसरी जगह संविधान और संस्कृति के अनुसार हो सकता है तो हमला भी राष्ट्रवादी और राष्ट्रविरोधी क्यों नहीं हो सकता ?

Sunday, April 23, 2017

गाय का धंधा ( कहानी )

सुबह के पांच बजे थे। आंगन में बैठे एक अधेड़ उम्र के आदमी की नजरें दरवाजे पर लगी थी। ऐसा लगता था जैसे उसे बेसब्री से किसी के आने का इंतजार था। तभी गली में मोटर साइकिल के रुकने की आवाज आयी। अधेड़ की आँखों में चमक आ गयी। बाहर मोटर साइकिल पर तीन लड़के सवार थे। गले में गेरुआ रंग का दुपट्टा और हाथों में दंगाइयों जैसे हथियार लिए थे। उनमे से पीछे बैठा लड़का उतर कर घर के अंदर दाखिल हुआ। उसके उतरते ही मोटर साइकिल फर्राटे से आगे बढ़ गयी।
               उसके घर में घुसते ही अधेड़ तेजी से उसकी तरफ लपका। युवक ने जेब से एक पांच सौ रूपये का नोट निकाल कर अधेड़ के हाथ पर रख दिया।
               बस, पांच सौ ? अधेड़ ने युवक की तरह अविश्वास से देखा।
                हाँ, बस इतना ही मिला।  युवक ने जवाब दिया।
                क्यों इतना कम ? पहले पांच हजार तक मिलते थे, फिर दो हजार हुए और अब पांच सौ ? अब अधेड़ के चेहरे पर गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था।
               पहले हम नाके पर केवल दस लोग बैठते थे। अब बीस हो गए हैं। दूसरा अब हमारा नाका भी शहर के बाहर बाई पास से पहले कर दिया है। अब पशुओं की कुछ गाड़ियां बाई पास होकर निकल जाती हैं जिससे दूसरे नाके वाले उनसे उगाही करते हैं। अब केवल दो गाड़ियां आयी थी। उनसे सात हजार के हिसाब से पैसा लिया, जिसमे से दो हजार के हिसाब से पुलिस को चला गया। बाकि बचा दस हजार, तो बीस लोगों को पांच सौ ही हिस्से में आया।  युवक ने हिसाब समझा दिया।
                दूसरे दस लोगों को तुम्हे अपने साथ बैठाने की क्या जरूरत थी ? अधेड़ ने गुस्से से कहा।
               विधायक जी ने भेजे हैं। बोले अपने ही कार्यकर्ता हैं और आज से तुम्हारे साथ ही बैठेंगे। युवक ने सफाई दी।
                तुमने विधायक जी से कहा नहीं की हमारे हिस्से में क्या आएगा ? अधेड़ का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था।
                  कहा था, लेकिन बोले की एडजेस्ट करो।
              और तुमने ये गाड़ी का रेट घटाकर सात हजार करने की क्या जरूरत थी ? अधेड़ ने पूछा।
              पहले गाड़ी में गाय भी आती थी, तो हम दस हजार लेते थे। कोई मुसलमान होता था तो डरकर दस हजार भी दे देता था। अब मुसलमान गाड़ियां लेकर आने कम हो गए हैं। गाय की गाड़ियां तो सब जगमोहन की होती हैं जो सीधे लाइसेंस वाले बूचड़खाने में चली जाती हैं। पहले जगमोहन भी गाड़ी पर कुछ दे देता था। अब तो पुलिस वाले भी उसकी गाड़ी को नहीं रोकते। कहते हैं उसकी पहुंच ऊपर तक हो गयी है। युवक ने लाचारी दिखाई।
                लेकिन इलाके में आतंक बना कर मुसलमानो से ये काम हमने छुड़वाया। उसका फायदा जगमोहन अकेला कैसे उठा सकता है। मैं आज ही विधायक जी से बात करूंगा। अधेड़ गुस्से में बड़बड़ाता हुआ अंदर चला गया।
                 उसके बाद उसने नहा धोकर ढंग के कपड़े पहने और विधायक निवास पहुंच गया। वहां और भी बहुत से लोग आये हुए थे। लेकिन उसको जल्दी ही अंदर बुला लिया गया।
               आइए महाराज, कैसे आना हुआ। विधायक जी ने पुराने परिचित के हिसाब से उससे हाल पूछा।
                विधायक जी, बात ऐसी है की लड़के सारी रात नाके पर बैठते हैं फिर भी पांच सौ रुपल्ली भी हिस्से में नहीं आती। अधेड़ ने सीधे सीधे समस्या बयान कर दी।
                 अरे महाराज, गौ रक्षा का पुण्य भी तो मिलता है। विधायक जी ने हँसते हुए कहा।
                पुण्य तो हम घर रहकर भी कमा सकते थे। बात धंधे की है। इलाके में आतंक फैलाकर हमने मुसलमानो को पशुओं का व्यापार बंद करने पर मजबूर किया। और आज ये जगमोहन जैसे लोग अकेले उसका फायदा उठा रहे हैं। उसे तो गाय के पैसे भी नहीं देने पड़ते। वो अकेला सारा माल हजम कर रहा है। उससे कहिये की नाके पर भी गाड़ी के हिसाब से कुछ पैसे देना शुरू करे।  अधेड़ ने पूरी बात कह दी।
                देखिये, जगमोहन जी ऊपर बहुत पैसा देते हैं। उसे सारा पैसा नहीं मिलता। उसकी बात जाने दो। विधायक जी ने साफ साफ मना कर दिया।
                 लेकिन केवल पांच सौ रूपये रोज से क्या होता है। आप खुद समझिये। अधेड़ ने एतराज किया।
                 अरे महाराज, याद करो, पिछले साल आप ही इस लड़के के लिए पांच सात हजार की नौकरी मांगने आये थे तब मैंने ही इसे गौ रक्षकों में शामिल करवाया था। अब आपको लालच हो गया है। विधायक जी भी कोई कच्ची गोलियां नहीं खेले थे।
                लेकिन जगमोहन ----
                जगमोहन जी की बात मत करो। विधायक जी ने अधेड़ की बात बीच में ही काटी। फिर कभी मौका आएगा तो किसी दंगे में अच्छा इलाका दिलवा देंगे। पुरे साल का खर्चा निकल जायेगा । अब लड़के को शान्ती से काम करने दो।
                  अधेड़ बड़बड़ाता हुआ बाहर निकल आया। ये साला जगमोहन, साले ने गोशाला के नाम पर सरकारी जमीन पर कब्जा कर लिया। लाखों रूपये चंदा उगाह लेता है और फिर गायों को ट्रक में लदवा देता है। जिन लोगों ने सारे काम में मदद की, उनकी जात भी नहीं पूछता। साला गाय का धंधा करता है। छिः


              

Wednesday, April 19, 2017

महिला आरक्षण बिल -- राजनैतिक दोगलेपन का प्रतीक

                 क्या किसी ने पिछले तीन साल में महिला आरक्षण बिल का जिक्र सुना है ? उससे पहले ये लगभग परम्परा सी बन गयी थी की जब भी संसद का कोई सत्र समाप्त होता, श्रीमती सुषमा स्वराज बाकि दलों की महिला सांसदों के साथ फोटों खिंचवाती थी और महिला आरक्षण बिल को पास न करने को लेकर सरकार को कोसती थी। लेकिन जब से बीजेपी की सरकार आयी है और सुषमा जी मंत्री बनी हैं, उन्होंने महिला आरक्षण बिल का नाम भी नहीं लिया।
                 इस बात का जिक्र इसलिए हो रहा है की आजकल बीजेपी के नेताओं का महिलाओं की दुर्दशा को देखकर कलेजा फटा जा रहा है। तीन तलाक का मुद्दा तो ऐसा हो गया है जैसे देश में ये केवल एकमात्र समस्या है। वो अलग बात है की तीन तलाक से परेशान महिलाओं की तादाद वृन्दावन में भीख मांग रही हिन्दू विधवाओं से भी कम होगी, जो तीन तलाक पर छाती पीटने वाले मठाधीशों की विकृत परम्पराओं की वजह से भीख मांग रही हैं। लेकिन जिनके लिए हर मुद्दा लोगों को लड़ाकर राजनीती की रोटियां सेकने के सिवाय कुछ नहीं होता, वो इस पर क्यों बोलेंगे।
                 महिलाओं के अधिकारों पर आंसू बहाने  वाले बीजेपी के नेताओं को और योगीजी को हमारी तरफ से एक चुनौती है की जब उनके पास बीजेपी नेताओं और मंत्रियों सम्पत्ति की लिस्ट आ जाये तो वो उनके परिवार की लिंग अनुपात की लिस्ट भी मांग लें, तो ये भी देश के सामने आ जाये की गर्भ में लड़कियों का कत्ल करने वाले लोगों में कौन कौन शामिल हैं।
                    खैर, मुद्दा महिला आरक्षण बिल का है। ये बिल राज्य सभा में पास हो चुका है। और इसे केवल लोकसभा से पास करवाना बाकी है जहां बीजेपी का बहुमत है। फिर क्या कारण है की बीजेपी सरकार इसे पास नहीं करवा रही। ये बिल बीजेपी के महिलाओं के अधिकारों को लेकर उसके दोगलेपन का बेहतरीन उदाहरण है। जब उसे कोई बिल पास नहीं करवाना होता है तो वो आम सहमति का बहाना करती है और जहां सही में आम सहमति की जरूरत होती है तो उसे जबरदस्ती लागु करने की कोशिश करती है। भूमि अधिग्रहण बिल इसका ताजा उदाहरण है।

Monday, April 17, 2017

कश्मीर को खोने की जिम्मेदारी कौन लेगा ?

                काश्मीर के लोगों का भारत से भावनात्मक जुड़ाव खत्म हो चूका है। अब केवल भारत के नक्शे में कश्मीर भारत का हिस्सा बचा है। आज हालत ये है की सेना को खुद की रक्षा के लिए ह्यूमन शील्ड का इस्तेमाल करना पड़ता है। अलगाव इतना गहरा हो गया है एक तरफ सेना द्वारा लोगों से जबरदस्ती पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगवाने के विडिओ वायरल हो रहे हैं तो दूसरी तरह आतंकवादी बंदूक की नोक पर लोगों से हिंदुस्तान मुर्दाबाद के नारे लगवा रहे हैं।
                   और ये हालत कितने दिन में हो गयी। पिछले तीन साल से केंद्र और राज्य दोनों में बीजेपी की सरकार है। 2014 में जब लोकसभा चुनाव हुए थे तो कश्मीर में करीब 64 % वोट पड़े थे जो बाकि देश के प्रतिशत के लगभग बराबर थे। तब यूरोप और अमेरिका के अख़बारों ने खबर छापी थी की कश्मीर के लोगों ने भारत और पाकिस्तान पर अपनी पसंद स्पष्ट कर दी है। अभी हुए चुनाव में श्रीनगर की सीट पर कुल 7 % वोट पड़े हैं। जिन 38 बूथों पर दुबारा चुनाव करवाया गया वहां केवल 2 % वोट पड़े हैं और 27 बूथों पर एक भी वोट नहीं पड़ा। पता नहीं अनुपम खेर और अशोक पंडित जैसे महान क्रन्तिकारी देशभक्त किस बिल में घुसे हुए थे ? उससे पहले नरेंद्र मोदी कहते थे की कश्मीर की समस्या कश्मीरियों के कारण नहीं बल्कि दिल्ली में बैठी सरकार की गलत नीतियों के कारण है। अब अगर बीजेपी राज्य सरकार में हिस्सेदार नहीं होती तो वो हालात की खराबी की जिम्मेदारी राज्य सरकार पर डाल सकते थे। लेकिन अब उन्हें इसकी जिम्मेदारी डालने के लिए नेहरू युग तक जाना होगा।
                   आज कश्मीर के लोग आपके साथ नहीं हैं। आप को ख़ुशी हो सकती है की जमीनी तोर पर कश्मीर अभी भी भारत का हिस्सा है। लेकिन अब आप वहां पहलगाम और डलहौजी में सैर नहीं कर सकते, डल झील में शिकारे का आनंद नहीं ले सकते और कश्मीर में फिल्म की शूटिंग नहीं कर सकते। तो काश्मीर का नक्शा भारत में है या नहीं उससे क्या फर्क पड़ता है ?
                   मोदी सरकार की कश्मीर नीति पर जानकारों ने सवाल उठाये थे। लेकिन उस पर इस सरकार के भक्तों ने गालियों की बौछार कर दी। महिला पत्रकारों को रंडी कहा गया। दूसरे लोगों को पाकिस्तान का दलाल घोषित कर दिया गया। लेकिन अब क्या वो लोग इस हालात की जिम्मेदारी लेंगे। क्या ये तथाकथित राष्ट्रवादी कश्मीर में जाने की हिम्मत दिखाएंगे।
                     ये सरकार एक और वायदे के साथ सत्ता में आयी थी। वो था कश्मीरी पंडितों को वापिस कश्मीर में बसाने का वादा। क्या अब भी किसी को लगता है की कश्मीरी पंडितों को वापिस घाटी में बसाया जा सकता है। बसाने का सवाल तो दूर, आप उनकी वोट नहीं डलवा सकते। चार लाख कश्मीरी पंडित, जो सालों से अपने ही देश में शरणार्थी बन गए हैं, आपने उनके साथ धोखाधड़ी की है। आपने उनके वापिस जाने की संभावनाओं पर पानी फेर दिया है। उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया है।
                    सवाल अब भी अपनी जगह है। क्या कश्मीर को खोने की जिम्मेदारी बीजेपी, उसके समर्थक और सोशल मीडिया पर बैठे उसके बुद्धिहीन चापलूस लेंगे।

Saturday, April 15, 2017

व्यंग -- भारत में रोड शो का राजनैतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और ऐतिहासिक महत्व।

                  भारत में आजकल राजनीती में रोड शो का बहुत महत्व है। सही तरीके से कहा जाये तो कुछ लोगों की तो राजनीती चल ही रोड शो के कारण रही है। वैसे रोड शो सबसे आसान काम होता है। इसमें आपको केवल खड़े होकर हाथ हिलाना होता है। राजनीती में आने वाले ज्यादातर लोग वो होते हैं जिन्हे स्कूल में हाथ ऊपर करके खड़े रहने का खासा अभ्यास होता है। इसमें आयोजकों को भी आसानी रहती है। लोग अगर कम हों तो पहले वाले लोगों को आगे पहुंचाया जा सकता है। बाकी तो बस हाथ हिलाना है। न किसी मुद्दे पर अपनी राय स्पष्ट करनी होती है और न किसी सवाल का जवाब देना होता है। आप हाथ हिलाकर चले जाइये, बाकी का काम मीडिया कर देगा।
                  वैसे रोड शो का मतलब होता है रोड के ऊपर शो करना, या फिर रोड को ही शो करना। अभी उत्तर प्रदेश के चुनाव में अखिलेश एक तरफ रोड के ऊपर शो कर रहे थे और दूसरी तरफ आगरा लखनऊ एक्सप्रेस वे नाम के रोड को शो कर रहे थे। अब हमारे प्रधानमंत्री लगभग हररोज रोड के ऊपर शो करते रहते हैं। अगर वो दो चार दिन रोड शो न करें तो उनके हाथ में दर्द होने लगता है।
                   रोड के ऊपर होने वाले शो भी अलग अलग तरह से होने लगे हैं। कुछ दिन पहले तमिलनाडु के किसानो ने ठीक प्रधानमंत्री कार्यालय के सामने सारे कपड़े उतार कर शो कर दिया। परन्तु प्रधानमंत्री और उनकी सरकार को ये शो पसंद नहीं आया इसलिए उनके शो को कोई देखने नहीं आया। इस तरह के शो पिछले दिनों सड़कों पर बहुत हुए हैं। जैसे कहीं किसान सड़क पर सब्जी डाल रहे हैं, कहीं दूध बिखेर रहे हैं। लेकिन किसानो के रोड शो भी कोई शो होते हैं ? मुझे लगता है किसी दिन किसान इकट्ठे होकर रोड पर सरकार  के कपड़े उतारने का शो न कर दें।
                     लेकिन जिस तरह के प्रभावशाली शो करने की महारत हमारी पुलिस को है उसका कोई सानी नहीं है। उसका मुकाबला केवल सेना ही कर सकती है। अभी हाल ही में हमारी सेना ने कश्मीर में एक आदमी को जीप के आगे बांधकर बहुत ही कामयाब शो किया था। इस शो के बाद पूरी दुनिया को हमारी कश्मीर नीति की गहराई समझ में आ गयी। जो चीज दुनिया को पाकिस्तान लगातार गला फाड़कर नहीं समझा पा रहा था वो हमारी सेना के एक रोड शो ने समझा दिया। जबसे हमारे प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी ने इसराइल को अपना सबसे भरोसेमंद साथी घोषित किया है, हमारी सेना उसके विडिओ देखकर रणनीति बना रही है। कुछ दिन बाद दुनिया को ये फर्क करना मुश्किल हो जायेगा की अमुक रोड शो कश्मीर का है या फिलिस्तीन का।
                         हमारे यहां कुछ सांस्कृतिक किस्म के रोड शो भी होते हैं। इस तरह के रोड शो अभी योगी जी के आशीर्वाद से उत्तर प्रदेश की सड़कों पर हो रहे हैं। जिसमे कुछ ऐसे लोग, जिन्हे कोई शरीफ आदमी घर के अंदर बैठाना भी खतरनाक समझता है, मिलकर आजकल बेटियों को बचा रहे हैं। ये लड़कियों को गालियां देते हैं, उनके साथ रोड पर मारपीट करते हैं ताकि उन्हें बचाया जा सके। एक दो बार पिट जाएँगी तो अपने आप घर से बाहर निकलना बंद कर देंगी। ये एक आजमाया हुआ और कामयाब तरीका है जो इन्होने तालिबान से लिया है। तालिबान के साथ इनके वैचारिक और सांस्कृतिक संबंध हैं सो उसके आजमाए हुए तरीकों का इस्तेमाल करना इनका हक बनता है।

Friday, April 14, 2017

कहीं भृष्टाचार में कमी केजरीवाल की हार का कारण तो नहीं ?

                      केजरीवाल की सरकार आने के बाद दिल्ली में  भृष्टाचार में कमी आयी है ये बात तो उसके दुश्मन भी स्वीकार करते हैं। यहां तक की अभी अभी आये ताजा आंकड़े जो एक तरफ केंद्र में भृष्टाचार की शिकायतों में बढ़ोतरी दिखा रहे हैं तो दूसरी तरफ दिल्ली में इन शिकायतों में तीन चौथाई की कमी दिखा रहे हैं। उसके बावजूद दिल्ली विधानसभा के उपचुनाव में AAP की इतनी बुरी हार हुई।
                     उसके बाद मेरी दिल्ली के कई लोगों से बात हुई। उनमे से कई लोग पहले केजरीवाल के साथ थे और अब उनसे बहुत नाराज हैं। जब उनकी नाराजगी के कारण जानने की कोशिश की तो बहुत ही अजीब सी बात सामने आयी। हर आदमी ने कहा की केजरीवाल ने अपने वायदे पुरे नहीं किये। जब उनसे  पूछा गया की कोनसा वायदा, तो वो केवल फ्री वाई फाई के अलावा कुछ नहीं बता पाए। मैंने जब उनसे सरकारी स्कूलों पर किये गए कामो के बारे में पूछा तो उनमे से कईयों का जवाब था, हाँ काम हुआ है और बहुत काम हुआ है, लेकिन हमे क्या फायदा? हम तो अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाते नहीं। जब मैंने मोहल्ला क्लिनिक इत्यादि के बारे में पूछा तो भी उनका वही जवाब था, हाँ काम हुआ है लेकिन हम तो कभी इनमे जाते नहीं। मैं हैरान था। अजीब तर्क हैं। मैंने उनसे भृष्टाचार के बारे में पूछा तो उन्होंने जो बताया वो इस प्रकार है ," हाँ भृष्टाचार कम हो गया है। और इसकी वजह से परेशानी बढ़ गयी है। कोई अधिकारी न पैसे लेने को तैयार है और न पहले काम करने को तैयार है। अब लाइन में लगने की फुरसत किसके पास है ? पहले पैसे देते थे और काम हो जाता था। "
                   लेकिन केजरीवाल तो भृष्टाचार के मुद्दे को ही लेकर आया था। तब तुमने उसका समर्थन क्यों किया था ? मैंने पूछा तो उनका जवाब था की हमे थोड़ा न पता था की इस तरह का झंझट खड़ा हो जायेगा।
                     अब मुझे लगता है की भृष्टाचार का कम होना ही केजरीवाल की हार का कारण बन जायेगा। केजरीवाल के पास कोई भावनात्मक मुद्दा तो है नहीं। और अपनी वर्गीय खासियत के कारण मध्यम वर्ग एक नंबर का अवसरवादी होता है। उसे न तो पूर्णराज्य के दर्जे से कुछ लेना देना है और न ही गरीब लोगों के लिए किये कार्यों से कुछ लेना देना है। उसे केवल इस बात से मतलब है की उसकी जेब में क्या आ रहा है। या फिर वो चालाक खिलाडियों के भावनात्मक मुद्दों के साथ चल सकता है। ये दोनों चीजें न तो केजरीवाल के पास हैं और न कम्युनिस्टों के पास, इसलिए दोनों हार गए।

Monday, April 10, 2017

केजरीवाल पर फिजूलखर्ची के आरोप, जो भाजपा नहीं उठा रही।

खबरी - शुंगलू कमेटी की रिपोर्ट, LG के आदेश और बीजेपी के आरोप क्या साबित करते हैं ?

गप्पी -  बाकि सारी चीजों के अलावा एक बात बहुत हैरान करने वाली है। केजरीवाल द्वारा जनता के पैसे के दुरूपयोग का एक बहुत ही पुख्ता उदाहरण सामने है लेकिन न तो उसका जिक्र किसी कमेटी की रिपोर्ट में है, न उस पर LG को एतराज है और न ही भाजपा उसको मुद्दा बना रही है।
               वो फिजूलखर्ची का उदाहरण है, क़ानूनी रूप से विपक्ष के नेता के पद के लायक सीटें न होने के बावजूद केजरीवाल सरकार ने बीजेपी के विधायक विजेंद्र गुप्ता को न केवल विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दी, बल्कि उसे एक कैबिनेट मंत्री के बराबर सुविधाएं भी प्रदान की। जो जनता के पैसे की खुली लूट है। बीजेपी को चाहिए की वो इस मुद्दे को जोर शोर से उठाये और केजरीवाल सरकार को फैसला बदलने पर मजबूर करे।


Saturday, April 8, 2017

गौ - वंश पर अत्याचार की जिम्मेदारी और उसका मतलब।

                  भारत में आज सबसे बड़ा मुद्दा गौ वंश पर अत्याचार और गौ रक्षा बना दिया गया है। जाहिर है की ये एक ऐसा मुद्दा है जिसके लिए सरकार को जिम्मेदार नहीं माना जाता। अब तक लोगों में जो मुद्दे होते थे उनके लिए सरकार जिम्मेदार होती थी, चाहे वो बेरोजगारी हो, महंगाई हो, किसानो की हालत हो या दूसरी समस्याएं हों। सरकार ने बड़ी चालाकी से अपनी जिम्मेदारी से ध्यान हटाने के लिए उन मुद्दों को आगे कर दिया जिनकी जिम्मेदारी सीधे तौर पर उसकी नहीं है।
                   खैर, हमारा आज का विषय ये है की गौ वंश पर अत्याचार का मतलब आखिर है क्या ? वैसे तो ये स्वयंसिद्ध है की गाय एक पशु है और उसके बारे में जो भी बात हो उसके लिए इस संदर्भ को याद रखा जाना चाहिए। इससे बात अगर शुरू करेंगे तो वहां से शुरू होगी, जहां से पशुपालन की शुरुआत हुई। फिर ये बात आएगी की विश्व में पशुपालन की शुरुआत मांस के लिए हुई थी और दूध का उपयोग बहुत बाद में शुरू हुआ। ऐतिहासिक खुदाईओं में जो चित्र मिलते हैं, खासकर भारत में, उसमे गाय के चित्र नहीं हैं बल्कि बैल के चित्र हैं जो कम से कम दूध का प्रतीक नहीं है। लेकिन हम बात गाय पर और गौ वंश पर होने वाले अत्याचार की कर रहे हैं।
                  भारत में आज बड़ी तादाद में ऐसे लोग हैं जिन्होंने गाय को माता मानना शुरू कर दिया है। इस माता मानने के सवाल को राजनैतिक रूप से भुनाने का मामला खड़ा हो गया है। इसलिए हम गौ वंश पर अत्याचार को इसी संदर्भ में देखना चाहते हैं। इस पर मेरा जो सवाल है वो ये है। -
                  एक आदमी एक गाय पालता है और उसे खूंटे से बांधकर रखता है। जब वो बछड़ा देती है तो उसके बछड़े को दूध पीने से रोकता है और उसे खींचकर दूर खूंटे से बांध देता है और उसके हिस्से का दूध खुद हड़प कर या तो पी लेता है या बेच देता है। उसके बाद जब बछड़ा जवान हो जाता है तो उसकी नाक में छेद करके रस्सा डाल देता है और उसको खस्सी ( बधिया ) कर देता है। फिर उसके कंधे पर बोझा रखकर सारी जिंदगी उससे काम लेता है और जब वो बूढ़ा हो जाता है तो उसका रस्सा निकाल कर मारे मारे फिरने के लिए छोड़ देता है। अब ये कौनसा माँ बेटे और भाई भाई का संबंध है। पहली नजर में ही ये हद दर्जे की क्रूरता दिखाई देती है बशर्ते की इसे गाय को माता मानने के संदर्भ में देखा जाये। अगर इसे केवल पशु होने के संदर्भ में देखा जाये तो सब सही है और उसके साथ भी वही हो रहा है जो भैंस, घोड़े, और दूसरे पशुओं के साथ हो रहा है। इसलिए गाय को माता मानने वालों को इस अत्याचार का हिसाब देना चाहिए और दूसरों पर आरोप लगाने से और हमला करने से पहले खुद को सुधार लेना चाहिए।